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आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध .

   "भारतीय दंड सहिंता की धारा ३०९ कहती है -''जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा ओर उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .''
सम्पूर्ण दंड सहिंता में ये ही एक ऐसी धारा है जिसमे अपराध के होने पर कोई सजा नहीं है ओर अपराध के पूर्ण न हो पाने पर इसे करने वाला सजा काटता है.ये धारा आज तक न्यायविदों के गले से नीचे नहीं उतरी है क्योंकि ये ही ऐसी धारा है जिसे न्याय की कसौटी पर खरी नहीं कहा जा सकता है .आये दिन समाचार पत्रों में ऐसे समाचार आते हैं -''जैसे अभी हाल में मुज़फ्फरनगर में एक महिला द्वारा अपने व् अपने तीन बच्चों पर तेल छिड़ककर आत्महत्या के प्रयास करने पर पुलिस द्वारा उसे पकड़ा गया .ऐसे ही एक समाचार के अनुसार आत्मदाह के प्रयास पर मुकदमा ,ये ऐसे समाचार हैं जो हमारी न्याय व्यवस्था पर ऊँगली उठाने के लिए पर्याप्त हैं .
पी.रथिनम नागभूषण पट्नायिक बनाम भारत संघ ए.आई.आर. १९९४ एस.सी. १८४४ के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय   ने दंड विधि का मानवीकरण करते हुए अभिकथन किया है कि ''व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .''इस न्यायालय  की खंडपीठ ने [न्यायमूर्ति आर एम् सहाय एवं न्यायमूर्ति बी एल हंसारिया द्वारा गठित ]दंड सहिंता की धारा ३०९ को जो कि आत्महत्या के प्रयास को अपराध निरुपित करती है ,असंवैधानिक घोषित कर दिया क्योंकि यह धारा संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों से विसंगत थी .
     उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय में अभिकथन किया है कि'' किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन के अधिकार का उपभोग स्वयं के अहित ,अलाभ या नापसन्दी से करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता .आत्महत्या का कृत्यधर्म नैतिकता या लोकनीति के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है तथा आत्महत्या के प्रयास के कृत्य का समाज पर कोई हानिकारक या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है इसके आलावा आत्महत्या या आत्महत्या के प्रयास से अन्यों को कोई हानि कारित नहीं होती  इसीलिए व्यक्ति की इस व्यैतिक स्वतंत्रता में राज्य द्वारा हस्तक्षेप किये जाने का कोई औचित्य नहीं है .
          दंड सहिंता की धारा ३०९ को संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त स्वतंत्रता का अतिक्रमण निरूपत करते हुए  उच्चतम न्यायालय ने कहा -
''इस धारा का दंड विधि से विलोपन होना चाहिए ताकि दंड विधि का मानवीकरण हो सके .''
विद्वान न्यायाधीशों ने इस धारा को क्रूर व् अनुचित बताया और  कहा कि इस धारा के कारण व्यक्ति दोहरा दंड भुगतता है प्रथम तो वह आत्महत्या की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ा दायक होती है ऐसी स्थिति को स्वयं न्यायालय भी अनुचित मानते हैं और इस धारा को विलोपित किया जाना आवश्यक मानते हैं .

क्योंकि एक ऐसा व्यक्ति जिसने आत्महत्या का प्रयास किया ऐसी स्थिति में होता है कि वह अपने परिवार समाज से फिर से जुड़ सकता है किन्तु उसके लिए दंड का प्रावधान उसके लिए और भी मुश्किलें खड़ी कर देता है .ऐसा प्रावधान तो आत्महत्या करने वाले के लिए होना चाहिए किन्तु उसके लिए ऐसा संभव नहीं है .अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने आगे कहा कि यह कहना गलत है कि आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को दंड नहीं मिलता है जबकि वह तो दुहरा दंड भोगता है प्रथम आत्महत्या करने के प्रयास में उसे पहुंची यंत्रणा और संत्रास ,तथा दूसरे आत्महत्या करने में विफल रहने पर उसकी बदनामी या अपकीर्ति 
मारुति श्रीपति  दूबल बनाम महाराष्ट्र राज्य १९८७ क्रि.ला.जन.७४३ बम्बई में अभियोजन कार्यवाही इसलिए निरस्त कर दी क्योंकि यह धारा असंवैधानिक है न्यायमूर्ति सांवंत ने इसे संविधान के अनुच्छेद १४ व् २१ के उल्लंघन के कारण शक्ति बाह्य [ultra vires ]मानाऔर इसके विलोपन के लिए कहा .और इसके कारण निम्न बताये -
१-अनुच्छेद २१ में व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्राप्त है जिसमे जीवन को समाप्त करने का अधिकार विविक्षित रूप से शामिल है ऐसा इसलिए क्योंकि अनु.२१ में दिए गए मौलिक अधिकारों की व्याख्या अन्य मौलिक अधिकारों के समान की जानी चाहिए चूँकि वक् स्वतंत्रता में न बोलने के अधिकार का भी समावेश है  तथा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता में व्यवसाय न करने के अधिकार का भी समावेश है अतः जीवन के अधिकार में जीवन को समाप्त करने का अधिकार भी शामिल है .
२- यदि इस बात पर विचार किया जाये कि साधारणतःव्यक्ति आत्महत्या की ओर प्रवृत क्यों होता है तो प्राय यह देखा जाता है कि इसके लिए मानसिक अस्वस्थता तथा अस्थिरता ,असह्य शारीरिक कष्ट .असाध्य रोग आसाधारण शारीरिक विकृति सांसारिक  सुख के प्रति विरक्ति आदि में व्यक्ति विवश होकर आत्महत्या का मार्ग अपनाता है .इस प्रकार जो व्यक्ति पहले से ही व्यथित ओर जीवन से हताश है क्या उसे आत्महत्या के प्रयास के लिए दंड दिया जाना उचित होगा ?
३- भारतवर्ष में आत्महत्या के अनेक प्रकार चिरकाल से प्रचलित रहे हैं जौहर सती प्रथा आदि प्रमुख रूप से प्रचलित थे ,इस दृष्टि से भी आत्महत्या के प्रयास को अपराध माने जाने का कोई औचित्य नहीं है .
इसलिए न्यायालय ने इस धारा को अनु.१४ व् २१ का उल्लंघन करते हैं ओर मनमाने भी हैं ये माना.
     भारत के विधि आयोग ने भी अपने ४२ वे प्रतिवेदन में १९७१ में धारा ३०९ को निरसित किये जाने की अनुशंसा की थी क्योंकि उसके विचार से इस धारा के उपबंध कठोर होने के साथ साथ न्यायोचित नहीं हैं .
तात्पर्य यह है कि पी.आर.नागभूषण पतनायिक बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा २६ अप्रैल १९९४ को दिए गए निर्णय के परिणाम स्वरुप दंड सहिंता  की धारा ३०९ असंवैधानिक होने के कारण शून्य घोषित की गयी तथा अपीलार्थी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए उरिसा के कोरापुट जिले के गुनपुर के सब  जज के न्यायालय में लंबित प्रकरण संख्या जी.आर.१७७ सन १९८४ की राज्य बनाम नाग भूषण पतनायिक    के वाद की कार्य वाही निरस्त कर दी गयी .अतः इस निर्णय के बाद अब आत्महत्या के प्रयास को अपराध नहीं माना जायेगा ओर इस प्रकार धारा ३०९ के प्रावधान अब निष्प्रभावी हो गए हैं.
इसी प्रकार लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य  ए.आई आर.१९९६ सु.को. में न्यायालय ने कहा -जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं ओर उनका उद्गम अनु.२१ के अंतर्गत ''प्राण के अधिकार के  संरक्षण नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .प्राण की पवित्रता के महत्वपूर्ण पहलू की भी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए  .अनु.२१ प्राण ओर देहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से ''प्राण के संरक्षण '' में प्राण की समाप्ति शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपने प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग रूप में ''मरने का अधिकार'' सम्मिलित है ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्वयन  करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ''प्राण का अधिकार'' नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है ओर इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ असंयोज्य  ओर असंगत है .हम यह अभिनिर्धारित करने में असमर्थ हैं कि भा.दंड.सहिंता की धारा ३०९ अनु.२१ की अतिक्रमण कारी है .इस वाद में पी .रथिनं नागभूषण पतनायिक बनाम भारत संघ उल्टा गया .
साथ ही कानून विदों की भी ये राय है कि आज इस धारा  को  निष्प्रभावी तो कर दिया गया है किन्तु आज भी इस पर कार्य चल रहा है और आत्महत्या के प्रयास में अब भी मुक़दमे दर्ज किये जा रहे हैं.
                                                    शालिनी कौशिक 

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