निर्भीक-आजाद पंछी: हमारे जीवन का दर्शन ( सितम्बर -2015 )
1 सितम्बर 2015 :मान-शान की इच्छा से दिये गए लाख रूपये की तुलना में
प्रेम व ईमानदारी से दान किये गए मुट्ठी भर चावल का अधिक महत्व है.
2 सितम्बर 2015 : यदि आप हिम्मत का पहला कदम आगे बढायेगे तब परमात्मा की सम्पूर्ण मदद मिल जायेगी.
3 सितम्बर 2015 : मुस्कराना, संतुष्टता की निशानी है. इसलिए सदा मुस्कराते रहो.
4 सितम्बर 2015 : क्या मेरे विचारों का स्तर ऐसा है कि मैं परमात्मा का बच्चा कहलाने का अधिकारी हूँ.
5 सितम्बर 2015 : स्वयं में दैवी गुणों का आह्वान करो तो अवगुण भाग जायेंगे.
6
सितम्बर 2015 : एक अच्छा, स्वच्छ मन वाला व्यक्ति दूसरों की विशेषताओं को
देखता है. दूषित मन वाला व्यक्ति दूसरों में बुराई ही तलाशता है.
7 सितम्बर 2015 : जो संकल्प करो उसे बीच-बीच में दृढ़ता का ठप्पा लगाओ तब विजयी बन जायेंगे. आगे पढ़े......
निर्भीक-आजाद पंछी: हमारे जीवन का दर्शन ( सितम्बर -2015 )
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प्रेम व ईमानदारी से दान किये गए मुट्ठी भर चावल का अधिक महत्व है.
2 सितम्बर 2015 : यदि आप हिम्मत का पहला कदम आगे बढायेगे तब परमात्मा की सम्पूर्ण मदद मिल जायेगी.
3 सितम्बर 2015 : मुस्कराना, संतुष्टता की निशानी है. इसलिए सदा मुस्कराते रहो.
4 सितम्बर 2015 : क्या मेरे विचारों का स्तर ऐसा है कि मैं परमात्मा का बच्चा कहलाने का अधिकारी हूँ.
5 सितम्बर 2015 : स्वयं में दैवी गुणों का आह्वान करो तो अवगुण भाग जायेंगे.
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सितम्बर 2015 : एक अच्छा, स्वच्छ मन वाला व्यक्ति दूसरों की विशेषताओं को
देखता है. दूषित मन वाला व्यक्ति दूसरों में बुराई ही तलाशता है.
7 सितम्बर 2015 : जो संकल्प करो उसे बीच-बीच में दृढ़ता का ठप्पा लगाओ तब विजयी बन जायेंगे. आगे पढ़े......
निर्भीक-आजाद पंछी: हमारे जीवन का दर्शन ( सितम्बर -2015 )
पतंजलि के योग दर्शन में सूर्य नमस्कार नहीं है
पतंजलि के योग दर्शन में सूर्य नमस्कार नहीं है। सूर्य नमस्कार तो क्या उसमें सुखासन के सिवा और कोई दूसरा आसन ही नहीं है। योग करने के लिए सुखासन काफ़ी है। योग है चित्त की नकारात्मक वृत्ति का निरोध करना। सुखासन में बैठो और अपने चित्त की वृत्ति का निरोध करते रहो। इसमें किसी मुसलमान को कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन जब योग के नाम पर शिर्क और कुफ्र (मिश्रकपन और नास्तिकता) थोपा जाएगा तो उसे वही क़ुबूल करेगा जिसे सत्य, तथ्य और अध्यात्म का ख़ाक पता नहीं है। ऐसे ही गुरू आज विश्व में योग के प्रचारक बने घूम रहे हैं।
हमने योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में डिप्लोमा किया है, जो इस बात का सुबूत है कि मुसलमानों योग का नहीं बल्कि कूटनीतिक हथकंडों का विरोध करते हैं।
आओ सब मिलकर नमाज़ अदा करें, जो कि संतुलित और पूर्ण योग है, सरल है।
हमने योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में डिप्लोमा किया है, जो इस बात का सुबूत है कि मुसलमानों योग का नहीं बल्कि कूटनीतिक हथकंडों का विरोध करते हैं।
आओ सब मिलकर नमाज़ अदा करें, जो कि संतुलित और पूर्ण योग है, सरल है।
क़ुदरती आफ़तें हमें एक होने का अहसास कराती हैं
नेपाल से चले भूकम्प में बहुत इन्सान मरे हैं। वे सभी हमारे भाई-बहन थे और उनके पीछे जितने लोग जि़न्दा बचे हैं, वे भी हमारे भाई-बहन ही हैं। हमारी मान्यताएं और हमारी परम्पराएं अलग हो सकते हैं लेकिन हमारे दुख-दर्द अलग नहीं होते। ऐसे समय में भी एक साहब मुसलमानों को बुरा भला कह रहे हैं और दूसरे बहुत से उनसे सहमत हो रहे हैं। ऐसी शिक्षा हिन्दू धर्म नहीं देता। इन्सानियत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखना इन्सानियत से गिरना है।
कहीं पानी का सैलाब आता है या जंगल में आग लगती है तब भेडि़ए और बकरे भी एक साथ जान बचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में वह भी शिकार नहीं करते। हम सबकी भलाई और तरक़्क़ी की दुआ करते हैं। हमारी चेतना पवित्र और कल्याणमयी होगी तो हम सब ज़लज़ले जैसी प्राकृतिक आफ़तों को निमन्त्रित नहीं करेंगे। ये सब हमारे सूक्ष्म चिन्तन और कर्मों के असन्तुलन का भौतिक रूप है। हम सभी ईश्वर की इन चेतावनियों पर ध्यान देकर अपने चिन्तन और कर्मों को शुद्ध और कल्याणकारी बनाएं। यही हमारा मक़सद होना चाहिए।
हम सबका दुख-दर्द और उसका अहसास एक है। हम सब एक हैं। हमारा कल्याण भी एक ही बात से, सत्य से होता आया है और इसी से अब होगा।
कहीं पानी का सैलाब आता है या जंगल में आग लगती है तब भेडि़ए और बकरे भी एक साथ जान बचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में वह भी शिकार नहीं करते। हम सबकी भलाई और तरक़्क़ी की दुआ करते हैं। हमारी चेतना पवित्र और कल्याणमयी होगी तो हम सब ज़लज़ले जैसी प्राकृतिक आफ़तों को निमन्त्रित नहीं करेंगे। ये सब हमारे सूक्ष्म चिन्तन और कर्मों के असन्तुलन का भौतिक रूप है। हम सभी ईश्वर की इन चेतावनियों पर ध्यान देकर अपने चिन्तन और कर्मों को शुद्ध और कल्याणकारी बनाएं। यही हमारा मक़सद होना चाहिए।
हम सबका दुख-दर्द और उसका अहसास एक है। हम सब एक हैं। हमारा कल्याण भी एक ही बात से, सत्य से होता आया है और इसी से अब होगा।
शिव जी थे पहले मुस्लिमःMufti Ilyas
इस बयान को नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर ‘अभी अभी’ काॅलम के तहत प्रकाशित किया गया है। देखिए पूरी ख़बर-
शिव थे मुस्लिमों के पहले पैगंबर: जमीयत उलेमा
मनोज पांडेय, फैजाबाद
जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने अयोध्या में चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं। उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है।
जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने अयोध्या में चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं। उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है।
जमीयत उलेमा का एक डेलिगेशन बुधवार को अयोध्या आया था। जमीयत उलेमा 27 फरवरी को बलरामपुर में कौमी एकता का कार्यक्रम करने जा रहा है। इसी सिलसिले में वह अयोध्या के साधु-संतों को कार्यक्रम में हिस्सा लेने की अपील करने आए थे। मौलाना ने कहा कि मुसलमान भी सनातन धर्मी है और हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे भी मां-बाप है। उन्होंने आरएसएस के हिंदू राष्ट्र वाली बात पर कहा कि मुस्लिम हिंदू राष्ट्र के विरोधी नहीं हैं।
मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा कि जिस तरह से चीन में रहने वाला चीनी, अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी है, उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। यह तो हमारा मुल्की नाम है। उन्होंने कहा कि जब हमारे मां-बाप, खून और मुल्क एक है तो इस लिहाज से हमारा धर्म भी एक है। इस दौरान मुस्लिम डेलिगेशन ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिलकर आतंकवाद का पुतला फूंका।
मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा कि जिस तरह से चीन में रहने वाला चीनी, अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी है, उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। यह तो हमारा मुल्की नाम है। उन्होंने कहा कि जब हमारे मां-बाप, खून और मुल्क एक है तो इस लिहाज से हमारा धर्म भी एक है। इस दौरान मुस्लिम डेलिगेशन ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिलकर आतंकवाद का पुतला फूंका।
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इस बयान में मुफ़्ती इलियास साहब ने जो कहा है, उसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसे महापुरूष हुए हैं जिन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही मानते हैं। हिन्दू भाई-बहन उन्हें अपनी भाषा में अलग नाम से याद रखे हुए हैं और उन्हीं महापुरूषों को मुस्लिम अलग भाषा में अलग नाम से जानते हैं। इस बयान के देने वााले मुफ़्ती साहब ने बरसों के तुलनात्मक अध्ययन किया है।
उनके इस बयान पर एक दूसरी जगह यह रद्दे-अमल ज़ाहिर किया गया है-
Mufti Mukarram Ahmed, Imam of Fatehpuri Masjid, rejected Ilyas’s statements.
“We don’t accept what he said, it’s completely wrong. It’s no where written in Quran. This could be his political statement,” Mukarram said.
फ़तेहपुरी मस्जिद के इमाम मुफ़्ती मुकर्रम साहब के द्वारा इस बयान को नकारे जाने का कारण यह है कि उन्होंने हिन्दू भाईयों के धर्मग्रन्थों को नहीं पढ़ा है। पहले पैग़म्बर का नाम क़ुरआन में आदम आया है जो कि आदिम् का बदला हुआ रूप है और यह शब्द संस्कृत की धातु ‘आद्य’ से बना है। आदम अ. की कथा भविष्य पुराण में आई है, जिसे सभी मुफ़्ती-मौलवियों को पढ़ना चाहिए। इससे दूरियां कम होंगी और एक मां-बाप की सारी औलाद ख़ुद को एक परिवार के रूप में देखने लगेगी।
विद्वानों ने माना है कि पुराण कथाओं में समय समय पर वृद्धि और क्षेपक हुए हैं लेकिन आज भी उनमें सच्चाई को तलाश किया जाता है तो वह मिल जाती है। सभी धर्मों विद्वानों को मिलकर यह कोशिश करनी चाहिए कि समान बातों को सामने लाया जाए।
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को ईसाई लोग क्राइस्ट के नाम से और अय्यूब को जाॅब के नाम से मानते हैं जबकि क़ुरआन में क्राइस्ट और जाॅब नाम नहीं आए है। इसके बावजूद मुस्लिम आलिम समझ लेते हैं कि ईसाई क्राइस्ट और जाॅब किसे कह रहे हैं क्योंकि उनकी किताबों सैकड़ों साल तक पढा है। हिन्दू धर्मग्रन्थों को भी जानने समझने की कोशिश की गई होती तो दोनों समुदायों को ऐसे कई महापुरूष मिल जाते, जिन्हें दोनों ही आदर देते हैं। इस विषय पर हम दिनांक 22 मार्च 2010 को एक लेख लिख चुके हैं-
क्या काबा सनातन शिव मंदिर है ? Is kaba an ancient sacred hindu temple?
अच्छी ख़बर यह है कि आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब की कोशश से इस तरफ़ पहल की जा चुकी है। मुफ़्ती इलियास साहब का बयान उसी की एक बानमी है।
ओरिजिनल कारण केजरी की जीत का और केसरी की हार का
क्या भाजपा यह रियालाइज़ कर पायेगी कि दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल जी को ख़ुद भाजपा ने ही जिताया है. कैसे? अरविन्द केजरीवाल जी को मुसलमानों ने एकमुश्त वोट डाला, जिसकी वजह से वह ऐतिहासिक जीत हासिल कर सके. मुसलमानों को ऐसी वोटिंग करने के लिए मजबूर किया आगरा में मुसलमानों का धर्मान्तरण करवाने और हिन्दुत्वियों की बयानबाज़ी ने. भाजपा के केन्द्र में आते ही वे दावे कर रहे थे कि सन 2021 तक भारत के सब लोगों को हिन्दू बना लिया जाएगा. लिहाज़ा जिसे मुस्लिम ही रहना पसन्द था उसके लिये अरविन्द को जिताना उसकी मजबूरी बना दिया ताकि भाजपा की जीत पर और हिन्दुत्वियों की जीभ पर विराम लग सके ...और तुरंत ही लग भी गया है. अपना दांव उल्टा पड गया है. अब आगे आगे देखिये कि अति उत्साही और अदूरदर्शी ह़िन्दुतवी भाजपा के लिये क्या करते है? फिलहाल तो केजरीवाल जी को गुजरात में मिलने का समय न देने वाले मोदी जी को हमने आज के अखबार में साथ साथ बैठे बतियाते देखा है, बहुत बढिया मुद्रा में. मालिक सबका भला करता है और सबके प्रयास का फल अवश्य देता है.

ग़ज़लगंगा.dg: उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए
उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए
सबकी नज़रों से जुदा हो जाए.
उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए.
चीख उसके निजाम तक पहुंचे
वर्ना गूंगे की सदा हो जाए.
अपनी पहचान साथ रहती है
वक़्त कितना भी बुरा हो जाए.
थक चुके हैं तमाम चारागर
दर्द से कह दो दवा हो जाए.
उसके साए से दूर रहता हूं
क्या पता मुझसे खता हो जाए.
कुछ भला भी जरूर निकलेगा
जितना होना है बुरा हो जाए.
होश उसको कभी नहीं आता
जिसको दौलत का नशा हो जाए.
घर में बच्चा ही कहा जाएगा
चाहे जितना भी बड़ा हो जाए.
-देवेंद्र गौतम
उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए.
चीख उसके निजाम तक पहुंचे
वर्ना गूंगे की सदा हो जाए.
अपनी पहचान साथ रहती है
वक़्त कितना भी बुरा हो जाए.
थक चुके हैं तमाम चारागर
दर्द से कह दो दवा हो जाए.
उसके साए से दूर रहता हूं
क्या पता मुझसे खता हो जाए.
कुछ भला भी जरूर निकलेगा
जितना होना है बुरा हो जाए.
होश उसको कभी नहीं आता
जिसको दौलत का नशा हो जाए.
घर में बच्चा ही कहा जाएगा
चाहे जितना भी बड़ा हो जाए.
-देवेंद्र गौतम
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वीर अब्दुल हमीद जैसों की शहादत को भूल जाने वालों के लिए कोई भला अपनी जान क्यों देगा?
वीरों की शहादत को भूल जाने वालों के लिए कोई भला अपनी जान क्यों देगा? वीर अब्दुल हमीद शहीद के घर वाले जानते हैं या फिर थोड़े से और लोग कि आज 4th बटालियन, ग्रेनेडियर में तैनात हवालदार अब्दुल हमीद की शहादत दिन है। 1965 युद्ध में पाकिस्तानी सेना का सीना चीर कर उस समय के अपराजेय माने जाने वाले उसके "पैटन टैंकों" को तबाह कर देने वाले 32 वर्षीय वीर अब्दुल हमीद आज ही के दिन खेमकरण सेक्टर, तरन तारण में शहीद हुए थे.
क्या इस देश में कहीं सार्वजनिक रूप से वीर अब्दुल हमीद को याद किया गया? अगर नहीं तो हरेक को चाहिए कि वह बेईमान हाकिम कि शिकायत करने के बजाय अपने चेहरे धूल साफ़ करे. इसी से हालात बदलेंगे.
क्या इस देश में कहीं सार्वजनिक रूप से वीर अब्दुल हमीद को याद किया गया? अगर नहीं तो हरेक को चाहिए कि वह बेईमान हाकिम कि शिकायत करने के बजाय अपने चेहरे धूल साफ़ करे. इसी से हालात बदलेंगे.
जंगे-आज़ादी के नायक अशफाक उल्ला खान
इंसान को अपनी बेहतरी के लिये खुद ही संघर्ष करना पड़ता है.
हरेक इंसान को जानना चाहिये कि उसके लिये क्या बेहतर है ?
आज़ादी की सालगिरह मुबारक.
देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे।अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह-तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहाकि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजादहोकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था,तुम लोग हिन्दू-मुसलमानो में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते।उनके इस जवाब से अंग्रेज दंग रह गये उन्होने कहा भारतमाँ अगर हिँदुओ की माँ है तो हम मुस्लमान भी इसी माँ के लाल है अब हिन्दुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा। 22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्लाखान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
अशफाक पर गांधी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। जो कि अशफाक के बचपन के मित्र थे । बिस्मिल औरचंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी,ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। एक-एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई।
अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिएबाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया।
हुमायूं और कर्मावती के बीच का प्रगाढ़ रिश्ता और राखी का मर्म

भारतीय नारी का एक रूप ‘बहन‘ भी है और भारतीय पर्व और त्यौहारों की सूची में एक त्यौहार का नाम ‘रक्षा बंधन‘ भी है। जहां होली का हुड़दंग और दीवाली पर पटाख़ों का शोर शराबा लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है और उनके पीछे की मूल भावना दब जाती है वहीं रक्षा बंधन का त्यौहार आज भी दिलों को सुकून देता है। यह त्यौहार मुझे सदा से ही प्यारा लगता आया है।
यह पर्व भाई-बहन के बीच पवित्र स्नेह का द्योतक भी है। बहन भाई की कलाई पर रेशम की डोरी यानी राखी बांधती है आरती उतार कर भाई के माथे पर टीका लगाती है तथा सुख एवं समृद्धि हेतु नारियल एवं रूमाल भाई को भेंट स्वरूप देती है। भाई भी बहन की रक्षा के संकल्प को दोहराते हुए भेंट स्वरूप कुछ रुपये अथवा वस्तुएं प्रदान करता है।
इतिहास में एक अध्याय कर्मावती व हुमायूं के बीच प्रगाढ़ रिश्ते और राखी की लाज से जुड़ा है। कर्मावती ने हुमायूं को पत्रा भेज कर सहायता मांगी थी। बादशाह हुमायूं ने राखी की लाज निभाते हुए अपनी राजपूत बहन कर्मावती की मदद की थी। अतः रक्षाबंधन हमारे लिए विजय कामना का भी पर्व है।
हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए।
हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए।
इस त्यौहार के पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है, जो इस प्रकार है :
उस दिन श्रावणमास शुक्ल की चतुर्थी थी। दूसरे दिन प्रातः इंद्र देवता की पत्नी ने गुरू बृहस्पति की आज्ञा से यज्ञ किया और यज्ञ की समाप्ति पर इंद्र की दाई कलाई पर ‘रक्षा‘-सूत्रा’ बांधा। तत्पश्चात देव-दानव युद्ध में देवताओं को जीत की प्राप्ति हुई। कहा जाता है तभी से श्रावणी की पूर्णिमा को रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
प्राचीन काल में शिष्य अपने गुरूओं के हाथ में सूत का धागा बांधकर उनसे आशीष प्राप्त करते थे। ब्राह्मण भी हाथ में सूत का धागा बांध कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। रक्षाबंधन भले ही हिंदुओं का पावन पर्व है किंतु दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी स्वेच्छा से रक्षा बंधन पर्व में अपनी आस्था व्यक्त की है।
समयानुसार सभी पर्व प्रभावित हुए हैं। रक्षाबंधन भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाया। रेशम की डोरी की जगह फैंसी राखियां चलन में आ गई। हमारी अर्थव्यवस्था में रक्षाबंधन पर्व के महत्त्वपूर्ण योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। करोड़ों रूपयों का कारोबार लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान कर रहा है।
ज्वैलरी मार्केट में भी रक्षाबंधन के दौरान उछाल आ जाता है। मिठाइयां, ड्रायफ्रुटस्, चाॅकलेटस की भी अच्छी खासी बिक्री होती है। डाक विभाग और कूरियर कारोबारी भी रक्षाबंधन के दौरान विशेष सेवाएं प्रदान करते हैं। रक्षा बंधन के पर्व को कुछ लोगों ने अपनी हरकतों से नुक्सान भी पहुंचाया है। पश्चिमी सभ्यता से रेशम की डोरी भी प्रभावित हुई है। फ्रैण्डशिप डे’ के दिन स्कूल और कालेज के विद्यार्थी एक-दूसरे की कलाइयों में फ्रैण्डशिप बेल्ट बांधते हैं नये दोस्त बनाने के लिए लड़के उन लड़कियों को भी बेल्ट बांधने से नही चूकते जिनसे जान थी और न ही पहचान।
रक्षाबंधन को भी कान्वेंट स्कूलों ने उसी तर्ज पर मनाने की परंपरा स्थापित कर नुक्सान ही पहुंचाया है। माना कि खून के रिश्ते से भी ज्यादा मायने मानवीय रिश्तों में छुपे हैं। मुंहबोली बहन अथवा भाई बनाने का फैशन ही भाई-बहन के पवित्रा रिश्ते को संदेहास्पद बनाता है। बहनों और भाइयों दोनों को रिश्तों की नाजुकता को ध्यान में रखना चाहिए। नई पीढ़ी को शायद यह नहीं पता कि भावनाओं का अनादर एवं विश्वास के साथ घात अशोभनीय है।
फिर यह भी प्रश्न उठता है कि रिश्ते तो और भी हैं, क्या उनमें भी कर्त्तव्य बोध जागृत करने के लिए कोई त्योहार मनाया जाता है? क्या पिता अपने बच्चों की पालना करे, इसके लिए कोई त्योहार है? मां अपने बच्चों को खुशी दे, इसके लिए कोई त्योहार है? फिर भाई, बहन की रक्षा करे, इसी के लिए त्योहार क्यों?
वास्तव में यह त्योहार एक बहुत ही ऊंची भावना के साथ शुरू हुआ था, जो समय के अंतराल में धूमिल हो गया और इस त्योहार का अर्थ संकुचित हो गया। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करती है। इसका अर्थ है कि सारा विश्व ही एक परिवार है। भाई-बहन का नाता ऐसा नाता है जो कहीं भी, कभी भी बनाया जा सकता है।
आप किसी भी नारी को बहन के रूप में निसंकोच संबोधित कर सकते हैं। बहुत छोटी आयु वाली को , हो सकता है , माता न कह सकें , पर बहन तो बच्ची , बूढ़ी हरेक को कह सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् हमें यही सिखाता है कि संसार की हर नारी को बहन मानकर और हर नर को भाई मानकर निष्पाप नजरों से देखो।
आपकी सगी बहन सब नारियों की प्रतिनिधि है - इस निष्पाप वैश्विक संबंध की याद दिलाने यह त्योहार आता है और इसके लिए निमित्त बनती है सगी बहन , क्योंकि बहन - भाई के नाते में लौकिक बहन का नाता स्वाभाविक रूप से पवित्रता लिए रहता है। बहन जब अपने लौकिक भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो यही संकल्प देती है कि भाई , जैसे तुम अपनी इस बहन को पवित्र नजर से देखते हो , दुनिया की सभी नारियों को , कन्याओं को ऐसी ही नजर से निहारना। संसार की सारी नारियां तुझे राखी नहीं बांध सकतीं , पर मैं उन सबकी तरफ से बांध रही हूं। वो सब मुझमें समाई हुई हैं , उन सबका प्रतिनिधि बनकर मैं आपसे निवेदन करती हूं , आपको प्रतिज्ञाबद्ध करती हूं कि आप निष्पाप बनें।
भारतीय नारी का एक रूप ‘बहन‘ भी है और भारतीय पर्व और त्यौहारों की सूची में एक त्यौहार का नाम ‘रक्षा बंधन‘ भी है। जहां होली का हुड़दंग और दीवाली पर पटाख़ों का शोर शराबा लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है और उनके पीछे की मूल भावना दब जाती है वहीं रक्षा बंधन का त्यौहार आज भी दिलों को सुकून देता है। यह त्यौहार मुझे सदा से ही प्यारा लगता आया है।
यह पर्व भाई-बहन के बीच पवित्र स्नेह का द्योतक भी है। बहन भाई की कलाई पर रेशम की डोरी यानी राखी बांधती है आरती उतार कर भाई के माथे पर टीका लगाती है तथा सुख एवं समृद्धि हेतु नारियल एवं रूमाल भाई को भेंट स्वरूप देती है। भाई भी बहन की रक्षा के संकल्प को दोहराते हुए भेंट स्वरूप कुछ रुपये अथवा वस्तुएं प्रदान करता है।
इतिहास में एक अध्याय कर्मावती व हुमायूं के बीच प्रगाढ़ रिश्ते और राखी की लाज से जुड़ा है। कर्मावती ने हुमायूं को पत्रा भेज कर सहायता मांगी थी। बादशाह हुमायूं ने राखी की लाज निभाते हुए अपनी राजपूत बहन कर्मावती की मदद की थी। अतः रक्षाबंधन हमारे लिए विजय कामना का भी पर्व है।
हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए।
हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए।
इस त्यौहार के पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है, जो इस प्रकार है :
उस दिन श्रावणमास शुक्ल की चतुर्थी थी। दूसरे दिन प्रातः इंद्र देवता की पत्नी ने गुरू बृहस्पति की आज्ञा से यज्ञ किया और यज्ञ की समाप्ति पर इंद्र की दाई कलाई पर ‘रक्षा‘-सूत्रा’ बांधा। तत्पश्चात देव-दानव युद्ध में देवताओं को जीत की प्राप्ति हुई। कहा जाता है तभी से श्रावणी की पूर्णिमा को रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
प्राचीन काल में शिष्य अपने गुरूओं के हाथ में सूत का धागा बांधकर उनसे आशीष प्राप्त करते थे। ब्राह्मण भी हाथ में सूत का धागा बांध कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। रक्षाबंधन भले ही हिंदुओं का पावन पर्व है किंतु दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी स्वेच्छा से रक्षा बंधन पर्व में अपनी आस्था व्यक्त की है।
समयानुसार सभी पर्व प्रभावित हुए हैं। रक्षाबंधन भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाया। रेशम की डोरी की जगह फैंसी राखियां चलन में आ गई। हमारी अर्थव्यवस्था में रक्षाबंधन पर्व के महत्त्वपूर्ण योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। करोड़ों रूपयों का कारोबार लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान कर रहा है।
भैया और बहन के पावन रिश्ते को बांधने वाली रेशम की डोर का रंग और ढंग भी बदलते दौर में बदल गया है। अब इस रेशम की डोर पर फैशन का रंग चढ़ गया है। कारोबारी इस प्रेम के पर्व को अपने तरीके से कैश कर रहे हैं। बाजार में सोने और चांदी से जड़ी राखी उतारकर बहनों को आकर्षित किया जा रहा है। इसकी कीमत भी काफी हाई-फाई है। दूसरी तरफ बहनें भी अपने भैया के लिए महंगी राखी खरीदने को तवज्जो दे रही हैं। सोना-चांदी से जडि़त राखी के स्वर्णकारों के पास स्पेशल आर्डर भी आ रहे हैं। बाजार में 20 हजार रुपए कीमत वाली राखी आ गई है। बदलते दौर में स्वर्णकारों को भी भाई बहन के प्यार के पर्व पर चांदी कूटने का मौका मिल गया है। आशा शर्मा, मीना धीमान, पूजा राणा, मंजू कविता, आमना और रेखा धीमान का कहना है कि भाई की कलाई को सजाने के लिए हजारों रुपए भी कम पड़ जाते हैं।
धर्मशाला के वर्मा ज्यूलर शाप के मालिक राजेश वर्मा का कहना है कि इस राखी के पर्व पर सोने चांदी से जडि़त राखियों के अलावा मोती जडि़त राखी के आर्डर भी आ रहे हैं। सोने और चांदी से जडि़त राखी के आर्डर धर्मशाला ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में बुक किए जा रहे हैं। सोने का भाव आसमान पर है, बावजूद इसके बहनें अपने भाई की कलाई को सजाने के लिए इसकी परवाह नहीं कर रही हैं।
धर्मशाला के वर्मा ज्यूलर शाप के मालिक राजेश वर्मा का कहना है कि इस राखी के पर्व पर सोने चांदी से जडि़त राखियों के अलावा मोती जडि़त राखी के आर्डर भी आ रहे हैं। सोने और चांदी से जडि़त राखी के आर्डर धर्मशाला ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में बुक किए जा रहे हैं। सोने का भाव आसमान पर है, बावजूद इसके बहनें अपने भाई की कलाई को सजाने के लिए इसकी परवाह नहीं कर रही हैं।
ब्रह्माकुमारी दादी हृदयमोहिनी कहती हैं कि
हम हर वर्ष रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं। हर बार हमें समझाया जाता है कि बहन, भाई को इसलिए राखी बांधती है कि वह उसकी रक्षा करेगा। लेकिन यदि बहन राखी नहीं बांधेगी, तो क्या भाई उसकी रक्षा नहीं करेगा? हिंदुओं को छोड़कर बाकी किसी संस्कृति -बौद्ध, क्रिश्चियन, मुस्लिम आदि संप्रदायों में राखी नहीं बांधी जाती, परंतु भाइयों द्वारा अपनी लौकिक बहनों की रक्षा तो वहां भी की जाती है। ऐसे कर्त्तव्य बोध के लिए कोई और त्योहार क्यों नहीं मनाया जाता? यदि कोई कहे कि यह त्योहार भाई-बहन के बीच प्रेम बढ़ने का प्रतीक है, तो भी प्रश्न उठता है कि क्या राखी न बांधी जाए तो बहन-भाई का प्रेम समाप्त हो जाएगा?
भाई-बहन को सहोदर-सहोदरी कहा जाता है, यानी एक ही उदर (पेट) से जन्म लेने वाले। जो एक उदर से जन्म लें, एक ही गोद में पलें, उनमें आपस में स्नेह न हो, यह कैसे हो सकता है। सफर के दौरान किसी यात्री के साथ दो-चार घंटे एक ही गाड़ी में सफर करने से भी कई बार इतना स्नेह हो जाता है कि हम उसका पता लेते हैं, पुन: मिलने का वायदा भी कर लेते हैं। तो क्या सहोदर-सहोदरी में स्वाभाविक स्नेह नहीं होगा, जो उन्हें आपस के प्रेम की याद दिलाने के लिए राखी का सहारा लेना पड़े।
मेरी सुरक्षा भी तभी होगी जब आप औरों की बहनों की सुरक्षा करेंगे। यदि आपके किसी कर्म से संसार की कोई भी बहन असुरक्षित हो गई , तो आपकी यह बहन भी किसी के नीच कर्म से असुरक्षित हो सकती है। आपसे कोई अन्य बहन न डरे और अन्य किसी भाई से आपकी इस बहन को कोई डर न हो , यही राखी का मर्म है।
'जब मैंने हिन्दी बोली' -एक क़हक़हेदार पोस्ट
महंगाई बढ़ने की खबरें हिन्दी बोलने वालों को भी डरा रही हैं लेकिन फिर भी लोग हिन्दी बोल रहे हैं और बहुत अच्छी बोल रहे हैं. आप भी अपने जीवन में हिन्दी बोलकर अपना और समाज का बहुत भला कर सकते हैं. आज भारी भरकम मुद्दों को उठाती हुई पोस्ट्स के दरम्यान एक क़हक़हेदार पोस्ट पढी तो उसे यहाँ देने की तबियत हुई.
फ़ेसबुक पर एक बहन ने लिखा है कि
मुझे भी आज हिंदी बोलने का शौक हुआ, होटल से निकली और एक ऑटो वाले से पूछा,
"त्री चक्रीय चालक पूरे जयपुर नगर के परिभ्रमण में कितनी मुद्रायें व्यय होंगी"?
ऑटो वाले ने कहा, "अरे हिंदी में बोलो न..."
मैंने कहा, "श्रीमान मै हिंदी में ही वार्तालाप कर रही हूँ ।"
ऑटो वाले ने कहा, "मोदी जी पागल करके ही मानेंगे ।" चलो बैठो कहाँ चलोगी ?
मैंने कहा, "परिसदन चलो ।"
ऑटो वाला फिर चकराया !!
"अब ये परिसदन क्या है.? बगल वाले श्रीमान ने कहा, "अरे सर्किट हाउस जाएगा ।।"
"अब ये परिसदन क्या है.? बगल वाले श्रीमान ने कहा, "अरे सर्किट हाउस जाएगा ।।"
ऑटो वाले ने सर खुजाया बोला,
"बैठिये मैडम ।।"
"बैठिये मैडम ।।"
रास्ते में मैंने पूछा, "इस नगर में कितने छवि गृह हैं.??"
ऑटो वाले ने कहा, "छवि गृह मतलब..??"
मैंने कहा, "चलचित्र मंदिर ।"
मैंने कहा, "चलचित्र मंदिर ।"
उसने कहा, "यहाँ बहुत मंदिर हैं राम मंदिर, हनुमान मंदिर, जग्गनाथ मंदिर, शिव मंदिर ।।"
मैंने कहा, "मै तो चलचित्र मंदिर की बात कर रही हूँ जिसमें
नायक तथा नायिका प्रेमालाप करते हैं ।।"
नायक तथा नायिका प्रेमालाप करते हैं ।।"
ऑटो वाला फिर चकराया, "ये चलचित्र मंदिर क्या होता है..??"
यही सोचते सोचते उसने सामने वाली गाडी में टक्कर मार दी ।
ऑटो का अगला चक्का टेढ़ा हो गया ।
ऑटो का अगला चक्का टेढ़ा हो गया ।
मैंने कहा, "त्री चक्रीय चालक तुम्हारा अग्र चक्र तो वक्र हो गया ।।"
ऑटो वाले ने मुझे घूर कर देखा और कहा, "उतरो जल्दी उतरो !!
चलो भागो यहाँ से ।"
चलो भागो यहाँ से ।"
तब से यही सोच रही हूँ अब और हिंदी बोलूं या नहीं !!!
प्रिय ब्लॉगर भाई डॉ अनवर जमाल जी, वाकई पोस्ट पढ़ते ही हंसी से लोटपोट हो गए. बहुत साल पहले का एक चुट्कुला याद आ गया. एक व्यक्ति ने ऑटो वाले से पूछा, " भाई, केंद्रीय सचिवालय चलोगे?'' ऑटो वाला बोला, "हमने तो इस जगह का नाम ही नहीं सुना!'' उस व्यक्ति ने कहा, "सैंट्रल सेक्रेटियेरेट चलोगे?'' व्यक्ति बोला, "मैं पहले भी तो यही कह रहा था.'' ऑटो वाला बोला, "अब के हिंदी में बोला तो, समझ में आ गया.''
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