क्या यही माँ का सम्मान है ............?

क्या यही माँ का सम्मान है ............?

दोस्तों कल मातृत्व दिवस हिंदी में और अंग्रेजी में मदर्स डे की नोटंकी की जायेगी में ,आप और सभी इस नोटंकी में शामिल होने लगे हैं खुद को माँ का  सबसे बढा भगत सबसे बढा प्रेमी साबित करने की होड़ लग गयी है ......और इस मदर डे और हिंदी के मात्रत्व  दिवस पर अख़बार विज्ञापनों से ..लेखों से कविताओं से मन लुभावनी तस्वीरों से भर जायेंगे टी वी पर खबरें और रिपोर्टिंग होगी ,ब्लोगिंग में हर कोई ब्लोगर इस पर लेख लिखेगा लेकिन दोस्तों एक सच यही है के कुछ अपवादों को छोड़ कर जरा हम अपने गिरेबान में झाँक कर तो देखें हम इस कसोटी पर कितना खरा उतारते हैं .जी हा दोस्तों एक हकीक़त जो आज मेरे सामने से गुजरी है मेरे रोंगटे खड़े हो गए हमारे पडोस में खुद को कोंग्रेस और भाजपा का नेता कहने वाले चार भाई जिनमे से एक करोड़ों की सम्पत्ति का मालिक है भाजपा का नेता खुद को कहता है ...एक भाई कोंग्रेस का नेता खुद को कहता है और उसके पास भी नोटों की कमी नहीं है खुद हाजी है खुद को समाज सेवक कहते हैं नेताओं के मान सम्मान के नाम पर हजारों के विज्ञापन बधाइयों के नाम पर छपवाते है ..दो और भाई है यानी चार बच्चों की एक ह्ज्जानी माँ अचानक बीमार हुई ..सीने में दर्द से तड़पती रही और बच्चे एक दुसरे को फोन पर माँ को अस्पताल ले जाने के लियें कहते रहे उनका कहना था के तू ज्यादा कमाता है इसलियें माँ को तू ही अस्पताल लेकर जा .
खेर इस बीमार माँ को पड़ोसी लोग एक निजी अस्पताल में ले गए दो भाई तो मोबाईल का स्विच ऑफ़ कर सो गए एक कोंग्रेस का नेता बेटा जिसे मोहल्ले वालों ने लानतें मलामते दी तो यह जनाब एक विजिटर के रूप में अस्पताल अपनी माँ को देखने पहुंचे अस्पताल का बिल एक दिन का छ हजार रूपये देखकर घबरा गए और फिर जेब से मोबाईल निकाल कर अपने भाइयों को फोन मिलाने लगे रिश्तेदारों से खर्चा गिनाने लगे माँ अस्पताल में तड़प रही थी साँस लेने में उसे तकलीफ नहीं हो रही थी  लेकिन माँ के पास बेटे नहीं थे पड़ोसी थे उनके दुसरे रिश्तेदार थे ..में सोचने लगा क्या ऐसे बेटे होते हैं में अस्पताल से बाहर जाता इसी बीच एक लडका अपनी माँ को कंधे पर उठाकर आता हुआ नज़र आया वोह बेटा अपनी मोटर साइकल बेचकर माँ का इलाज करवाने आया था इस देहाती भाई को देख कर एक बार फिर मेरा विश्वास जागा के नहीं इंसानियत और रिश्ते आज भी इस दुनिया में ज़िंदा है ..................... अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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अकीदत के फूल


विजय मिश्र बुद्धिहीन पेशे से रेलवे में अधिशासी इंजीनियर हैं। इंजीनियर का काम होता है लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को समेट कर उसको रेलवे लाइनों पर चलाना, या यूं मान लें कि निर्जीव लोहे के टुकड़ों में जान भरकर उसको दौड़ाना। मगर 28 फरवरी 2010 को उनके जीवन गाड़ी मानो थम सी गयी। कहावत है कि अच्छे लोगों को ईश्वर जल्द अपने पस बुला लेता है। मैट की परीक्षा सर्वोच्च अंक से पास होने के बावजूद इनका सबसे दुलारा व सबसे बड़ा पुत्र आलोक इस फानी दुनियां को अल्विदा कह गया। उसे क्या मालूम कि उसके जाने के बाद लोहों में जान पैदा करने वाला इंजीनियर निर्जीव सा हो जायेगा। वह क्या जानता है कि किसके सहारे जिन्दा रहेगा उसका परिवार? मृत्यु सत्य है क्योंकि मरने के बाद फिर जिन्दा होना है। बकौल एक शायर.....
मौत जिन्दगी का वक्फा है
यानि आगे चलेंगे दम लेकर।
इस नश्वर शरीर को त्यागने के बाद नया जीवन जरूर मिलेगा आलोक को मगर उस नवजीवन से इस बुद्धिहीन का क्या सरोकार। सब उजड़ने के बाद आलोक तुम्हारी यादें ही सहारा हैं वरना अब कौन हमारा है। तुम्हे याद करते हुए.....



चाहा जिसे हरदम रहे मेरे नजर के पास
दूर
वह इतना गया न लौटने की आस।

जिसकी
खुशी मेरे लिए की संजीवनी की काम

हाय
मेरी जिन्दगी आई ना उसके काम।

आरजू मिन्नत इबादत हर जगह सज्दा किया
नयन जल भर अंजलि आराध्य पद प्रच्छालन किया।
पुष्प श्रद्धा के शिवशक्ति पर अर्पित किया
मौन रह मैं स्नेह सरिता किनारे था खड़ा
पर तोड़ कर बंधन सभी हमसे किनारा कर लिया।

विकट है यह जिन्दगी
पर है काटना
दुःख छिपा अंतस्थली में
केवल
खुशी ही बांटना।

बोलना है अगर तो
बोलना
मीठे
या फिर रहकर मौन
कर प्रभु आराधना।

जो
स्मृति है शेष
ना तू उसका धारण कर
हो रहा जो घटित उस सत्य का वरण कर।
समय
के आगे नहीं चलती हमारी ना तुम्हारी

मोह
के बंधन बंधे हम सभी प्राणी अनाड़ी।

भोग अपना भोगना है हम सभी को अकेले
इसलिए अब तोड़ बंधन और दुनियां के झमेले।

कुछ भी मनुज का सोचना काम है आता नहीं
चाहे हम जितना वापस कोई आता नहीं।



चाह थी आखों में उसके ना कभी आंसू
ऐसा दिया कि अश्रू अब रूकते नहीं।
हर जगह मैं ढूढ़ता उसके सभी पदचिन्ह को
जगह
तो दिखाते सभी पर वह कहीं दिखता नहीं।


हर
कदम के आहटों पर आ रहा है नित कोई
सुन रहा पदचाप उसका पर अब तो वह आता नहीं।
छोड़कर
स्थूल अंग अनन्त में है खोगया

नीद
से मतभेद कल था, अब चीर निद्र सो गया।



विजय मिश्र बुद्धिहीन


असीम दुःख की इस घड़ी में विजय मिश्र बुद्धिहीन जो कि मेरी प्रेरण के श्रोत हैं, इनके तिल-तिल जलते मन के साथ संवेदना की गहराइयों से मैं इनके साथ हूं। ईश्वर से प्रार्थना और दुआ है कि इनको जिन्दगी की तल्खियों से महफूज रखे।

एम अफसर खान सागर
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ब्लोगिंग की दुनिया के एक यायावर घुमक्कड़ प्रशिक्षक है भाई ललित शर्मा

ब्लोगिंग की दुनिया के एक यायावर घुमक्कड़ प्रशिक्षक है भाई ललित शर्मा

                                                                                                                       ब्लोगिंग की दुनिया के,एक यायावर ,घुमक्कड़, प्रशिक्षक है भाई ललित शर्मा ,,, क्या इस बात को आप लोग जानते हैं, नहीं ना ,जी हाँ,ब्लोगिंग की दुनिया की,, ,हर डाल पर फुदक फुदक कर ,,चहकने और दिलों में प्यार के तराने पैदा करने वाली इस शख्सियत को ,लोग अब घुमक्कड़ भाई साहब के नाम से ,,,,,,, पहचानने  लगे हैं ...........आप,घुमक्कड़ भाई साहब,,इन दिनों दिल्ली की ब्लोगिंग सम्मलेन से फुदक कर, सीधे हिमाचल में चले गए है, वहां बैठकर आप जनाब  हिंदी ब्लोगिंग के टिप्स बाँट रहे हैं ..हाल ही में,, हिंदी भाषा और न्यू मिडिया ,,विषय पर इन ज्ञानी जी ने ,हिमाचल विश्व विद्द्यालय में ब्लोगिंग और हिंदी के बारे में जब छात्र छात्राओं को बताया तो सभी इन के फेन हो गए, और फिर आप स्मार्ट तो हैं ही ,मुछों से फोजी और रोबीला चेहरा ,जो इन्हें और स्मार्ट बना रहा है ,गोरा रंग, खुबसूरत इकहरा फ़िल्मी हीरो सा बदन और फिर रहन सहन की हीरो स्टाइल ,अन्दर से साफ़ सुथरा मन, बेदाग़ छवि ,ना काहू से दोस्ती ना काहू से बेर,का स्वभाव सभी के मददगार ,मधुरवाणी ,भाई ललितजी की खूबियों ने इन्हें बस एक इंसान के रूप में ब्लोगिंग की दुनिया का हर दिल अज़ीज़ गाइड मास्टर प्रशिक्षक बना दिया है ...................१५ सितम्बर २००९ हिंदीदिवस से आपने हिंदी ब्लॉग ललित डोट कोम की पहली पोस्ट  भाई ललित ने हिंदी दिवस को समर्पित कर लिखी थी ,जब सेकड़ा पोस्ट हुई तो बस इन जनाब ने फिर हिंदी ब्लोगिंग के बारे में ही लिखना मुनासिब समझा और लिख डाला, .ब्लोगिग्न में भाई  ललित कभी अकेले नहीं चले,इन्होने मनमानी नहीं, की ब्लॉग पर वोह लिखा जो साथियों ने पढना चाहा ,,,जो साथियों को अच्छा लगा ,साथी ब्लोगर के लियें उपयोगी रहा ,और इसीलियें भाई ललित जी ब्लोगिंग के पहले ऐसे ब्लोगर बने हैं जो शायद खुद सभी ब्लोगरों से सीधे सम्पर्क में बने हैं ...इनकी लाइफ स्टाइल शिक्षाविद होते हुए भी फोजी है जहां चाहे उठे और चल दिए ,जब चाहा जहां पढाव डाल लिया, और एक जासूस की तरह से जहां गए वहां के हालातों का जायजा लिया ,और ब्लोगिंग कर डाली ,बस इसीलियें भाई ललित जीवन्त ब्लोगिग्न करने वाले ब्लोगर भी बन गए है, जो होता है यह वही लिख रहे है, जो नहीं है जिसकी कल्पना की जाती है ,उसे भाई ललित बचते रहे हैं अमनपुर छत्तीसगढ़ के बाशिंदे भाई ललित की ब्लोगिग्न की सुगंध पुरे देश में खुशबु फेला रही है ..अपने परिचय के बारे में भाई ललित शर्मा  जी बताते है के में अपना परिचय क्या दूँ ....में तो अपना नेह भरी जल की बदरी हूँ ....किसी पथिक की प्यास बुझाने कुँए में बंधी हुई गगरी हूँ ....मीत बनाने जग में आया  मानवता का सजग प्रहरी हूँ ....हर द्वार खुला जिसके घर का सबका स्वागत करती नगरी हूँ ......कहने को तो यह शब्द हैं ,लेकिन इन शब्दों में भाई ललित शर्मा जी का स्वभाव ,उनके अन्दर का आदमी उजागर हुआ है और वोह इस कसोटी पर खरे भी उतरे हैं ...भाई ललित वेदों के शोकिन रहे हैं और इसीलियें उनकी लेखनी में वैदिक ज्ञान का अभाव अवश्य रहता है ..शिल्पकार के मुख से .........अखिल ब्रह्मण ब्लोगर संगठन ....एक लोहार की .....चलती का नाम गाडी ........पिता जी......................चर्चा पान की दूकान पर .......... ब्लोग४ वार्ता..भारतीय ब्लॉग लेखक मंच ......ललित डोट कोम ..........अड़हां  के गोठ......ललित वाणी ......चिट्ठाकार चर्चा और ना जाने कितने ब्लॉग है जिनके हजारों हजार रीडर और प्रशंसक   है इनकी हर लेखनी सो सुनार की एक लुहार की होती है लेकिन इनका एक शोक एक पसंद अगर देखना हो तो अड़हां के गोठ हिंदी ब्लॉग पर एक गगरी झलकाती घांस ले जाती लडकी का फोटू देख कर आप खुद ही समझ जायेंगे के भाई ललित एक अच्छे ब्लोगर के साथ शोख मिजाज़ भी है और इसीलियें आप अपने साथ गुज़रे हर हसीन लम्हे को सभी ब्लोगर्स से बांटते है ऐसे भाई ललित जी को एक छोटे भाई का नमस्कार .............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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