आयोजन

जख्म तो मिलते हैं पर दवा नहीं मिलती


पूर्व मध्य रेलवे मुगलसराय मण्डल के प्लांट डिपो इंजिनीयरिंग कारखाना के तत्वाधान में 14 से 21 सितंबर तक हिन्दी पखवारा-2011 मनाया गया। पखवारा के समापन समारोह में 21 सिंतंबर को विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसमें हिन्द प्रदर्शनी, गीत-संगीत व कवि सम्मेलन शामिल है।


कवि सम्मेलन का आगाज मुख्य कारखाना प्रबन्धक राजेश कुमार अग्रवाल ने मां सरस्वती के तैलचित्र पर माल्यर्पण व द्वीप प्रज्जवलित कर किया। इसके बाद गोरखपुर दूरदर्शन के मोहन तिवारी ने सरस्वती वंदना सहित विभिन्न भजनों से दर्शकों का मन मोहा। कार्यक्रम की अगली कड़ी में युवा कवि व शायर एम. अफसर खां ‘सागर’ ने अपनी रचना आजकल के लोगों में वफा क्यों नहीं मिलती, जख्म तो मिलते हैं मगर दवा नहीं मिलती व महलों में रहने वाले फुटपाथों का दर्द न जाने, बदहाली की इस सुरत को कैसे भला विकास लिखूंगा सुनाकर वर्तमान सामाजिक परिवेष पर कटाक्ष किया। कवि विजय बुद्धिहीन ने हिन्दी हिन्दुस्तान हमारा हमको है प्राणें से प्यारा और मुस्लिम फकीर, पीर ने काषी को संवारा; तुलसी, कबीर, सूर ने अल्लाह को पुकार सुनाकर समप्रदायिकता पर करारा प्रहार किया। वाराणसी से आये नागरी प्रचारणी पत्रिका के संपादक ब्रजेष चन्द पाण्डेय ने जहां गांधी को भी गोली मारी गयी; कोई अन्ना हजारे को क्या समझाए, भ्रष्टाचार की जड़ तो इस हिमालय में है किसी की हिम्मत है जो इस हिमालय पर आये सुनाया। इलाहाबाद से आये हास्य कवि डा0 अनिल चौबे ने जितनी दाल रोटी पाकिस्तान खाता है; उतनी की बिहारी खैनी थूक देते हैं व लालू राबड़ी जो इस्लामाबाद चले जायें तो इस्लामाबाद भैंस का तबेला बन जाएगा और पाक की हिना है कभी रंग नहीं ला सकेगी, हाथ लगाओगे विस्फोट कर जायेगी सुनाकर श्रोताओे को हंसे पर मजबूर कर दिया।
इस दौरान राजेश कुमार अग्रवाल ने उपस्थित लोगों से आहवाहन किया कि हम अपनी राज भाषा को दिल से अपनायें। हिन्दी हमारी सभ्यता व संस्कृति से जुड़ी है। इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। अब वक्त आ गया है कि हिन्दी का विस्तार विष्व स्तर पर किया है। प्लाण्ट डिपो के अधिशासी इंजिनीयर विजय कुमार मिश्र ने आये हुए लोगों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
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हिन्दू और मुसलमान, दोनों में लोकप्रिय थे बाबा फ़रीद


बाबा फ़रीदउद्दीन गंजशकर का जन्म मुल्तान में हुआ था। ये बाबा फ़रीद के नाम से प्रसिद्घ हुए। पंजाब के फरीदकोट शहर का नाम बाबा फरीद के नाम पर ही पड़ा है। फरीद वर्तमान हरियाणा के हांसी कस्बे में 12 वर्ष तक रहे सूफी प्रचार किया। हांसी सूफी विचारधारा के केन्द्र के तौर पर विकसित हुआ। बाबा फरीद से भेंट करने के लिए यहां मशहूर सूफी आए। हांसी में चार कुतुब के नाम से आज भी ऐतिहासिक स्मारक है। बाबा फरीद को उनकी इच्छा के अनुसार उनको पंजाब के पाकपटन में दफनाया गया। आज भी यह प्रसिद्घ तीर्थ-स्थल बना हुआ है।
बाबा फरीद के शिष्य हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। वे दोनों में लोकप्रिय थे। वे सत्ता के साथ कभी नहीं मिले और न ही सत्ता के जुल्मों को उन्होंने कभी उचित ठहराया। सत्ता से दूरी बनाए रखने और लोगों से जुड़े रहने का संदेश उन्होंने अपने शिष्यों को दिया। निजामुद्दीन औलिया भी बाबा फरीद के शिष्य बन गए। निजामुद्दीन औलिया से जब कुछ सुल्तानों ने भेंट करनी चाही तो उन्होंने कहा कि मेरे गुरु का उपदेश है कि सत्ता से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना। पाकपटन में उस समय का सुल्तान बलबन सोने-चांदी भेंट करने के लिए गया, तो उनकी भेंट ठुकराते हुए कहा कि 'बादशाह गांव और सोने चांदी की चमक दिखाकर हमें एहसान के बोझ से दबाना चाहते हैं। हम तो ऐसे खुदा के बन्दे हैं जो रिजक भी देता है मगर एहसान कभी नहीं जताता।'
बाबा फरीद पंजाबी के पहले कवि हैं। पंजाब की प्रसिद्घ रचना 'हीर रांझा' के कवि वारिसशाह ने, अपनी रचना के आरम्भ में बाबा फरीद को 'कामिल पीर' कहकर संबोधित किया, यह उनके प्रति सच्चा सम्मान है। गुरुनानक देव बाबा फरीद के गद्दीधारी शेख इब्राहिम से दो बार मिले और उनसे बाबा फरीद की रचनाएं प्राप्त कीं। सिक्खों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी ने जब 'गुरुग्रन्थ साहिब' की रचना की, तो बाबा फरीद के चार सबद और 114 श्लोकों को उसमें स्थान दिया। ''फरीद का यहां की जनभाषा 'हिन्दवी' का उपयोग करना उन्हें सामान्य जन के और निकट ले आया। उर्दू और मुलतानी पंजाबी का यह पूर्वतम मिश्र रूप ही आम लोगों की भाषा था। उलेमा लोग और अधिकारी वर्ग अपने काम फारसी में करते थे। इनसे भिन्न बाबा फरीद अपने श्रोता समाज से 'हिन्दवी' में बोलते, जिसे वे सब समझते थे और घर की ही भाषा मानते थे। फरीद पंजाबी के एक बहुत बड़े कवि भी थे सर्वप्रथम कवि, जिन्होंने आध्यात्मिक एषणा जैसे गूढ़ विषय को, वहीं के ग्राम परिवेश से चुने हुए बिम्बों और चित्रों द्वारा सजा-संवार कर जनभाषा में प्रस्तुत किया। नि:संदेह ऐसा काव्य लोकप्रिय होता ही। लोग फरीद के 'सलोकों' का पाठ करते और भावमय होकर जब गाने लगते तब तो आनन्द विभोर ही हो जाते"1
फरीद ने इस बात पर जोर दिया कि ''ईश्वर के आगे सभी मनुष्य बराबर हैं, भले ही मत या धर्म किसी का कुछ भी हो। 'फरीदी लंगर' अर्थात सबके लिए समान भोजन का नियम सभी भेदभावों को दूर करने का ही एक और उपाय था"।2
बाबा फरीद ने सारे संसार को एक ही तत्व की उपज माना है। संसार के सब प्राणी एक ही मिट्टी के बने हुए हैं। जब सारे एक ही मिट्टी के बने हुए हैं तो फिर उनमें कोई ऊंच नीच नहीं है। सबमें एक ही तत्व मौजूद हैं, इसलिए सब बराबर हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं है।
फरीदा खालुक खलक महि, खलक बसै रब माहि।
मन्दा किस नो आखिअ, जा तिस बिनु कोई नाहि।।
बाबा फरीद ने धार्मिक कट्टरता के खिलाफ धार्मिक उदारता को अपनाया। धर्म के बाहरी कर्मकाण्डों को छोड़कर उसके मर्म को पहचानने पर जोर दिया। बाबा फरीद ने धर्म के आन्तरिक पक्ष पर जोर दिया है न कि बाहरी दिखावे पर। उन्होंने बाहरी आडम्बरों को धर्म में अनावश्यक माना। आन्तरिक शुद्घता एवं पवित्रता पर जोर दिया और कहा कि बाहरी क्रियाओं की अपेक्षा अपने अंदर को स्वच्छ और पवित्र रखो।
फरीदा कनि मुसला सूफू गलि, दिलि काती गुडू बाति
बाहरि दिसै चानणा, दिलि अंधिआरी राति।

फरीद कहते हैं कि ईश्वर का ऊंची आवाज में पुकारने की यानि स्पीकर लगाकर कीर्तन-जगराते-पाठ-जाप करने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने विचार व कर्मों में जो बेईमानी, झूठ व जरूरत से अधिक धन इक_ा करने के लिए किए जा रहे कुकर्मों को छोड़़कर स्वच्छ आचरण करना ही सच्ची पूजा है।
फरीदा उच्चा न कर सद्द, रब्ब दिलां दीआं जाणदा।
जे तुध विच कलब्ब, सो मझा हूं दूर कर।।

यदि तुम हज के लिए जाना चाहते हो तो हज तो हृदय में ही है। अपने हृदय में झांककर देखो। सच्चा हाजी बनो।
फरीदा जे तू वंजे हज, हज हब्भो ही जीआ में
लाह-दिले दी लज, सच्चा हाजी तंा थीये ।।

तेरे अन्दर ही मक्का है तेरे अन्दर ही मक्का की मीनारें और मेहराब हैं। तेरे अन्दर ही काबा हैं। तू कहां नमन अहा कर रहा है। तीर्थ, व्रत, यात्रा करना ढोंग है भक्ति नहीं। श्रद्घा व्यक्ति के अन्दर होती है। बाहर प्रदर्शन से नहीं।
फरीदा मंझ मक्का मंझ, माड़ीयां मंझे ही महराब ।
मंझे ही कावा थीआ, कैं दे करीं नमाज ।।

सिर मुंडा लेने से क्या होगा ? कितनी भेड़ों का सिर मुंडा जा चुका है लेकिन किसी को स्वर्ग नहीं मिला।
मनां मुन्न मुनाइयां, सिर मुन्ने क्या हो ?
केती भेडां मुन्नीआं, सुरग न लद्धी को ?
इसलिए सिर मुंडाने, व्रत रखने, तीर्थों की यात्रा करने, गेरुए वस्त्र या काले वस्त्र धारण करने तथा पूजा-पाठ, जप-माला, तिलक लगाने आदि के ढोंग-पाखण्ड करने में धर्म नहीं है बल्कि इनको त्यागकर स्वच्छ करने, किसी का मन न दुखाने, अहंकार त्यागने व शोषण-लूट व छल में शामिल न होने में ही सच्चा धर्म है। हृदय में पाप भरा हो तो सियाह चोला धरण करने से, कपड़ा फिर चाहे कैसा ही पहनो, लेकिन उससे फकीर नहीं बन सकते।
फरीदा काले मैडे कपड़े काला मैडा वेसु।
गुनही भरिया मै फिरा लोकु कहै दरवेसु।।
बाबा फरीद ने कहा कि यदि तू समझदार है तो बुरे काम न कर, अपने कार्यों को देख। अपने गिरेबान में झांककर देख कि तूने कितने अच्छे काम किए हैं और कितने बुरे काम किए हैं
फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख।
आपनडे गिरीवान महिं, सिरु नीवां करि देख।।
जिन्होंने शानदार भवन बनवाए थे वे भी यहां से चले गए। उन्होंने संसार में झूठ का कारोबार किया ओर अन्तत: कब्र में दफन किए गए। अर्थात जिन्होंने समाज के शोषण, लूट से अपने ऐश्वर्य-विलास के लिए सामान एकत्रित किया वे भी मिट्टी में मिल गए।
कोठे मण्डप माड़ीयां उसारेदे भी गए ।
कूड़ा सौदा करि गए गोरी आए गए ।।
फरीद ने गरीबों की सेवा को ही सच्चा धर्म माना है। उनका संदेश है कि अपना आदर सम्मान कराने के लिए गरीब और दीन-दुखियों के बीच बैठकर उनकी सेवा में सहयोग करो। इसीलिए उन्होंने अमीरी से दूर गरीबी में रहना स्वीकार किया। मिट्टी के बारे में उन्होंने कहा कि उससे बड़ा इस संसार में कोई नहीं है, उसकी निन्दा न करो। वह मनुष्य का साथ देती है,जब तक मनुष्य जीवित रहता है ,तब तक वह उसके पैरों के नीचे रहती है उसको सहारा देती है, लेकिन जब मनुष्य मर जाता है तो वह उसके उस पर आती है, उसको ढक लेती है।
फरीदा खाकु न निंदिअै, खाकू जेडु न कोई।
जीवदिआं पैरां तलै , मुइयां उपरि होई ।

सब्र जीवन का उद्देश्य है, यदि मनुष्य इसे दृढ़ता से अपना ले तो बढ़कर दरिया बन जाएगा यदि सब्र को तोड़ दे तो अवारा प्रलय जाएगा। अर्थात सब्र की सीमा को तोड़कर व्यक्ति शोषण करे तो वह मनुष्य के लिए नुकसान दायक है।
सबर एह सुआऊ जे तू बंदा दिडु करहि ।
वध् िथीवहि दरीआऊ, टुटि न थीवहि वाहड़ा ।।
कईयों के पास जरूरत से अधिक आटा है तो कईयों के नमक भी नहीं है। वे सब पहचाने जायेंगे और उनमें से किसको सजा मिलेगी। फरीद कहते हैं कि समाज में कुछ ने शोषण करके बहुत अधिक इक_ा कर लिया और कुछ के पास जरूरत से बहुत कम है। समाज में यह असमानता के दोषी लोग सजा के पात्र हैं।
फरीदा इकनां आटा अगला इकना नाही लोणु ।
अजै गए सिंआपसण चोटा खासी कउणु ।।
जिन शासकों-राजाओंं के आस-पास नगाड़े बजते थे, सिर पर छत्र थे, जिनके द्वारों पर ढोल बजे थे और जिनकी प्रशंसा में चारण-भाट गीत गाते थे। अन्त में वे भी कब्रिस्तान में सो गए और अनाथों की तरह धरती में गाड़ दिए गए। फरीद का कहना है कि छल, कपट, झूठ, बेईमानी, चोरी, ठगी और व्यक्ति की मेहनत का शोषण बहुत बुरा है।
पासि दमामे छतु सिरि भेरी सडो रड
जाइ सुते जीराण महि थीए अतीमा गड ।
जब तक संसार में जिन्दा हो, कहीं पांव न लगाओ, एक कफन रखकर सब कुछ लुटा दो। अर्थात संसार में जमीन-जायदाद न बनाओ।
जे जे जीवें दुनी ते खुरचे कहीं न लाय ।
इक्को खपफ्फग रख के हारे सब्भो देह लुटाय ।।
जो शासक संसार पर राज करते थे, राजा कहलाते थे। जिनके आगे-आगे प्यादे और पीछे घोड़े चलते थे। जो खुद पालकियों में सवारी करते थे और ऊपर सेवक चंवर झुलाते थे, जिनके सोने के लिए सेज भी सेवक बिछाते थे उनकी कब्रे भी दूर से ही नजर आ रही हैं।
फरीदा करन हकूमत दुनी दी, हाकिम नाओं धन ।
आगे धैल पिआदिआं पिच्छे कोत चलन ।।
चढ़ चल्लण सुख-आसनी, उप्पर चैर झुलन ।
सेज बिछावन पाहरू जित्थे जाइ सवन ।।
तिन्हां जनां दीआं ढेरीआं दूरों पइआं दिसन्न ।
आठों पहर दिन-रात बेशक पांव पसार कर सोओ, जप-तप कुछ न करो लेकिन अपने अंदर से अहंकार का त्याग कर दो। फरीद ने आचरण को सुधरने पर जोर दिया है।
फरीदा पांव पसार के, अठ पहर ही सौं ।
लेखा कोई न पुच्छई, जे विच्चों जावी हौं ।।
फरीद के काव्य का मुख्य विषय है - मानव और आध्यात्मिकता। घड़ी-पल उन्हें चिन्ता है तो मानव की, धरती पर उसके चार दिन की, उसके अनिश्चित जीवन और चिरदिन-व्यापी मृत्यु भय की, निर्वश जनसमूह के दुर्दिन और भूख की, उसे घेरे आयी निरंकुश अन्याय की, सत्ता और वैभव के चौंध-भरे सम्मोहन की, और अर्थहीन मायाचक्रों में समय के अनर्थकर विनाश की। फरीद ने सामाजिक और सदाचरण पर बल दिया, पर सभी धर्मों में तो यह समान रूप से विहित था।"
बाबा फरीद का जीवन और शिक्षाएं राष्ट्रीय एकता की कड़ी हैं। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों में एकता स्थापित करने की कोशिश की, दोनों सम्प्रदाय के लोगों को एक दूसरे के करीब लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। दोनों धर्मों के सार को पहचाना और उनकी आन्तरिक एकता को उद्घाटित किया। उनके जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। वे संतों के लिए भी आदर्श थे, वे कभी सत्ता के पास भी नहीं गए, वे सच्चे अर्थों में संत थे।

संदर्भ:
1- बाबा फरीद; बलवन्त सिंह; साहित्य अकादमी,नई दिल्ली; 2002; पृ.34
2- बाबा फरीद; बलवन्त सिंह; साहित्य अकादमी,नई दिल्ली; पृ. 37

साझी विरासत

par सुभाष चन्द्र, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र

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तिहाड़ में शुरु हो गई तैयारी !


रविवार छुट्टी का दिन है, आप सभी को जरूरी काम निपटाने हैं। इसलिए मैने तय किया है कि आज मैं आप सब को कुछ गंभीर विषय पर चर्चा कर ज्यादा बोझिल नहीं करुंगा। हां दिल्ली के तिहाड़ जेल की एक छोटी सी बात जरूर आप सभी के साथ शेयर करना चाहता हूं।
मुझे लगता है कि आप सब को ये बात पता होगी कि नेताओं और मंत्रियों को लगभग सभी जगह प्राथमिकता मिलती है। दिल्ली के सरकारी अस्पताल एम्स में प्रधानमंत्री के लिए हमेशा एक ब्लाक रिजर्व रहता है, जिससे उन्हें आपात स्थिति में कभी भी आना पडे़ तो दिक्कत ना हो। इसी तरह केंद्रीय मंत्री या फिर कोई भी सांसद हो उसे भी यहां प्राथमिकता दी जाती है। इन लोगों को आम आदमी की तरह अपनी बारी का इंतजार नहीं करना होता है।
ट्रेन में सफर के दौरान भी इन्हें प्राथमिकता दी जाती है। ये किसी भी ट्रेन से कभी भी सफर कर सकते हैं। इनका कोटा तय है। नेताओं, मंत्रियों को इस बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं होती है कि उनकी बर्थ कन्फर्म होगी या नहीं। वो कन्फर्म होनी ही है। इसी तरह हवाई जहाज में भी इनकी सीट सुरक्षित है।
आजकल तिहाड जेल प्रशासन मुश्किल में है। यहां जिस तरह वीआईपी का आना लगातार बना हुआ है, उससे जेल अधिकारियों की परेशानी स्वाभाविक है। लिखा पढी में भले ही ये कहा जाए कि टू जी स्पेक्ट्रम  घोटाले के आरोपी ए राजा और डीएमके प्रमुख करुणानिधि के बेटी कनिमोझी सामान्य कैदी की तरह यहां हैं। लेकिन जेल के भीतर कौन देख रहा है। इनकी पार्टी के समर्थन से केंद्र की सरकार चल रही है, उसके नेता को आप आम कैदी की तरह थोडे रख सकते हैं। कामनवेल्थ घोटाले के आरोपी सुरेश कलमाडी तो जेलर के साथ उन्हीं के आफिस में चाय पीते पकडे जा चुके हैं। ऐसे में उन्हें भी वीआईपी व्यवस्था मिली ही होगी। इसके अलावा भी बाहुबलि और दबंग किस्म के कई लोग यहां बंद हैं। टूजी स्पेक्ट्रम मामले में कई नामी गिरामी कंपनियों के सीईओ भी इसी तिहाड जेल में बंद हैं।
पिछले दिनों जब नोट फार वोट कांड में राज्यसभा सदस्य अमर सिंह जेल गए तो उन्होंने सबसे पहले जेल में अलग से बाथरूम की मांग की। उनका कहना था कि वो अस्वस्थ हैं और किसी दूसरे के साथ बाथरूम शेयर नहीं कर सकते। बडी मुश्किल से उनकी मांग को पूरा करते हुए उन्हें वीआईपी व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकी।
अब टू जी की आंच ना सिर्फ पी चिदंबरम तक पहुंच रही है, बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इसके घेरे में आ चुके हैं। सुब्रह्मयम स्वामी ने जो दो तीन पत्र सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए हैं, उससे साफ है कि इस गोरखधंधे में चिदंबरम और मनमोहन सिंह भी बेदाग नहीं हैं। हां इन पर ये आरोप भले साबित ना हो सके कि उन्होंने फायदा उठाया है, पर इतना साफ है कि जो कुछ भी ए राजा ने किया, अगर प्रधानमंत्री और उस समय वित्त मंत्री रहे चिदंबरम चाहते तो इसे रोका जा सकता था। खैर ताजा हालात ये हैं कि विपक्ष चिदंबरम को जेल भेजने की मांग कर रहा है। जैसे हालात बन रहे हैं और कोर्ट जितना सख्त नजर आ रहा है, उससे हो सकता है कि चिदंबरम को भी तिहाड का रुख करना पडे।
जेल प्रशासन की मुश्किल ये है कि वो इतने ढेर सारे लोगों को एक साथ वीआईपी सुविधा नहीं दे सकता। चूंकि सरकार के सब मंत्री हैं और जेल आने से पहले भले ही इन्हें इस्तीफा देना पडा हो, पर बाहर जाकर ये फिर मंत्री नहीं बनेगें, इस बात की क्या गारंटी है। ऐसे में जेल के अधिकारियों को मरना थोडे ही है, जो इनसे पंगा लेगें।
जानकार बता रहे हैं कि तिहाड जेल के भीतर तैयारी शुरू हो गई है। कुछ कमरों की साफ सफाई की जा रही है। हालाकि कोई इसे कन्फर्म नहीं कर रहा है, लेकिन अफसर इस बात पर भी सोच रहे हैं कि इतने ब़डे बडे लोग आएंगे, सभी अटैच बाथरूम की मांग करेंगे। ऐसे में क्यों ना पहले ही कुछ कमरों में अटैच बाथरूम की व्यवस्था कर ली जाए।
वैसे मेरा भी तिहाड जेल प्रशासन को सुझाव है कि जेल मे जो भी कमियां है, सब को दुरुस्त करने के लिए फाइल सरकार के पास भेज दें। पहले भले ही उन्हें ये काम कराने के लिए दिल्ली सरकार या केंद्र सरकार पैसा देने में आना कानी कर रही हो, लेकिन अब वो सभी  सुविधाओं को यहां पूरा कराने में बिल्कुल देर नहीं करेंगे। वजह भी साफ है, क्योंकि कौन सा मंत्री कब जेल जाए, कह नहीं सकते। बहरहाल सरकार भले ही मंत्रियों को पाक साफ बताने की कोशिश कर रही हो, लेकिन जेल प्रशासन रिस्क लेने को तैयार नहीं है, उसने तैयारी शुरू कर दी है।




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सूखे नैन



नहीं आते आंसू,
सुख गया सागर,
इतना बहा कि अब
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

याद है मुझको
तेरा वो रूठना,
दो बुँदे बहके
तुझे मन थी लेती,
जहर गई वो बूंदें
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

आंसू नहीं मोती हैं
तुम्ही तो थे कहते,
एक भी ये मोती
तुम बिखरने नहीं देते,
खो गए वो मोती
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

वर्दी पहने जब निकले थे
दी मुस्कान के साथ विदाई,
आँखों में था पानी
दिल रुलाता था जुदाई,
सुख गया वो पानी,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

तब भी बहुत बहा था
जब ये खबर थी आई
देश रक्षा में तुने
अपनी जान है लुटाई,
पर अब नहीं बहते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

जानती हूँ मैं
तुम नहीं हो आने वाले,
पर ये दिल ही नहीं मानता
तेरा इंतज़ार है करता,
करवटें बदल रोते-रोते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |
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मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी

आधुनिकता के नाम पर लड़के और लड़कियां बिना विवाह किए ही संबंध बना रहे हैं और जब दिल भर जाता है तो फिर संबंध तोड़ भी रहे हैं।
इन संबंधों से दोनों को कुछ वक्त के लिए सुकून भी मिलता है और ख़ुशी भी लेकिन जब ये रिश्ते टूटते हैं तो तकलीफ़  भी देते हैं और ज़िल्लत का अहसास भी कराते हैं। बहुत लोग ज़िल्लत और शर्मिंदगी का अहसास लेकर जीते रहते हैं और जो जी नहीं पाते वे ख़ुदकुशी करके मर जाते हैं।
मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी भी इसी सिलसिले की एक और कड़ी है।
रिश्तों में पवित्रता ईश्वर के नाम से आती है।
पत्नी से संबंध केवल पवित्र इसीलिए तो होता है कि पति और पत्नी ईश्वर के नाम से जुड़ते हैं। जहां यह नाम नहीं होता वहां पवित्रता भी नहीं होती। आज जब लोग पवित्र रिश्तों की जिम्मेदारियों तक को लोग अनदेखा कर रहे हैं। ऐसे में मौज-मस्ती और टाइम पास करने के लिए बनाए गए रिश्तों की गरिमा को निभाने लायक  इंसान बचा ही कहां है ?
ऐसे में या तो फिर बेशर्मों की तरह मोटी चमड़ी  बना लो कि जानवरों की तरह जो चाहो करो और कोई कुछ कहे भी तो फ़ील ही मत करो। जब अहसासे शर्मिंदगी ही न बचेगा तो फिर कोई डिप्रेशन भी नहीं होगा।
लेकिन यह कोई हल नहीं है समस्या का।
समस्या का हल यह है कि रिश्तों की अहमियत को समझो और नेकी के दायरे से कदम बाहर मत निकालो। जब आप मर्यादा का पालन करेंगे तो ऐसी कोई नौबत नहीं आएगी कि आप मुंह न दिखा सकें।
मालिक से जुड़ो, नेक बनो, शान से जियो और लोगों को सही राह दिखाओ।
Source
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/09/suicide-due-to-facebook.html
and
क्या बड़ा ब्लॉगर टंकी पर ज़रूर चढता है ?

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बहन में भी होता है मां का दर्द....


ज मन में कुछ अजीब सा चल रहा है, बुरी तरह से उलझा हुआ हूं। सच कहूं तो मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि ये बनावटी बातें हैं, या फिर वाकई हकीकत है। मुझे तो अपने सुने पर ही भरोसा ही नहीं हो रहा है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के बारे में मेरी राय बिल्कुल उनके खिलाफ है। राजनीतिक भ्रष्टाचार की बात हो और मायावती का जिक्र ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। निकम्मे मंत्रिमंडल की बात हो तो मायावती की अगुवाई वाले यूपी सरकार के मंत्रिमंडल को नंबर एक पर रखना होगा। सूबे में आराजकता का जिक्र होने पर भी हमारी नजर यूपी पर ही जा टिकती है। लोकतंत्र को कमजोर करने के मामले में भी मायावती का कोई मुकाबला नहीं हैं। नौकरशाही में भेदभाव, ट्रांसफर पोस्टिंग में वसूली, बाहुबलियों को संरक्षण, जबरन चंदा वसूली, अपनी मूर्तिंयों पर अनाप शनाप खर्च.. कहने का मतलब साफ है कि जितना मैं अभी तक मायावती को जानता था, उनमें कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे मैं उनका समर्थन करुं।
महिलाओं के प्रति भी मायावती में कोई खास हमदर्दी नहीं है। अगर हम गंभीरता से विचार करें तो मुझे लगता है कि मायावती की बहुजन समाज पार्टी ही एक मात्र ऐसी राजनीतिक पार्टी होगी, जिन्होंने महिला प्रकोष्ठ तक नहीं बनाया है। महिला होते हुए भी महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा के टिकट कम ही दिए जाते हैं। राज्यसभा में तो आज तक उन्होंने किसी को भेजा ही नहीं होगा। मेरी व्यक्तिगत नफरत इस पार्टी और इनकी कार्यप्रणाली से इस कदर है कि मैं किसी भी मां-बाप को ये सलाह नहीं दे सकता कि वो अपनी बेटी का नाम मायावती रखें।
इन तमाम खामियों के बाद भी आज मैं दिल से मायावती को सलाम करता हूं। मेरे मन में उनके प्रति आज एक सम्मान है। उनके प्रति श्रद्धा की और कोई वजह नहीं है, सिर्फ ये कि वो साहित्य की प्रेमी हैं और पूरे दिन जोड तोड की सियासत करने के बाद कम से काम रात में वो एक सामान्य महिला की तरह आम लोगों जैसा सोचती हैं। उनके भीतर भी मां, बहन जैसे रिश्तों  की टीस बरकरार है। चलिए अब मैं पूरा वाक्या आपको बताता हूं।
बात बीते रविवार की है, एक टीवी चैनल के दस साल पूरे होने पर जयपुर में भारी भरकम मुशायरे का आयोजन किया गया था, जिसे उस टीवी पर लाइव सुना और देखा जा सकता था। रात के करीब एक बजे बारी आई, जाने माने शायर मुनव्वर राना की। मुनव्वर भाई ने एक से बढकर एक शेर और गजल पढकर हमारी नींद उडा दी थी। एक शेर आप भी सुनिये।
मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊं,
जिस शान से आया हूं, उसी शान से जाऊं।
इस शेर के साथ उन्होंने श्रोताओं से बिदा ले लिया और दूसरे शायर अपने अपने कलाम पढने लगे। आधे घंटे बाद यानि रात के डेढ बजे मुशायरे का संचालन कर रहे अनवर भाई खड़े़ हो गए और मंच से उन्होंने जो कुछ कहा, उससे मैं हक्का बक्का रह गया। उन्होंने श्रोताओं को जानकारी दी, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती जयपुर में हो रहे इस मुशायरे को लखनऊ में अपने निवास पर सुन रही हैं और उन्होंने फोन के जरिए मुनव्वर राना से अपील की है कि वो " मां "  पर लिखी रचना सुना दें तो मेहरबानी होगी। श्रोताओं ने भी इसका समर्थन किया, लेकिन ना जाने क्यों मेरी आंखें छलक गईं। मैने भी कई बार मुनव्वर राना की " मां " पर लिखी रचना को सुना है, उसमें दर्द है, भावनाओं का एहसास है। मुझे उम्मीद भी थी कि राना भाई ये रचना खुद ही सुनाएंगे, पर उन्होंने नहीं सुनाया। वहां बैठे लोगों ने भी उनसे ये अपील नहीं की, लेकिन मायावती जी ने फोन पर फरमाइश की तो मुझे वाकई अच्छा लगा। सच कहूं तो आज मायावती की मेरी नजर बहुत ऊंची जगह बन गई  है। इसलिए मैं कहता हूं कि बहन में भी होता है मां दर्द। यहां भाई राना की दो लाइन का जिक्र ना करुं तो नाइंसाफी होगी।

ऐ अंधेरे देख ले, मुंह तेरा काला हो गया,
मां ने आंखे खोल दीं, घर में उजाला हो गया।

मां मेरे गुनाहों को कुछ इस तरह धो देती है,
जब वो बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।

मैं सलाम करता हूं भाई मुनव्वर राना को भी, जिन्होंने मायावती की फरमाइश को सम्मान देते हुए अपनी ये रचना सुनाई। लेकिन इस पूरे वाकये का जब जाने माने शायर भाई राहत इंदौरी ने मजाक बनाया तो थोडा अच्छा नहीं लगा।
  
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होम्योपैथी सबके लिए

दुनिया में लोग आम तौर पर अपनी और अपने परिवार की चिंता में ही जी रहे हैं लेकिन इन्हीं लोगों के बीच ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों की भलाई की ख़ातिर जी रहे हैं। ऐसे लोग आपको हरेक गांव और हरेक बस्ती में ज रूर मिल जाएंगे।
ऐसे लोगों ने इंसानियत की भलाई की खातिर अपनी जान ख तरे में डाली और इंसानियत को कुछ दिया।
होम्योपैथी के वुजूद में आने के पीछे भी ऐसे ही लोगों की मेहनत है।
यह पद्धति सस्ती और प्रभावी है। भारत जैसे देश में जहां बहुत से लोग २० रूपये प्रतिदिन भी मुश्किल से कमा पाते हैं, वहां ऐसी चिकित्सा पद्धति की बहुत ज रूरत है।
कुछ लोग होम्योपैथी की दवाओं पर विश्वास नहीं करते। टीन एज में हम भी नहीं करते थे लेकिन कुछ बीमारियों को इन दवाओं से जब हैरतअंगेज  तरीके  से ठीक होते देखा तो फिर शक जाता रहा।
भारत में सैक्स रोगों में आम तौर पर वैद्य हकीम पर ज्यादा भरोसा किया जाता है लेकिन इस तरह के रोगों में भी होम्योपैथी को कारगर पाया गया।
होम्योपैथी जिन सिद्धांतों पर काम करती है। वे सिद्धांत डा. हैनीमैन से पहले भी पाए जाते थे लेकिन उन्होंने इन सिद्धांतों से जितना व्यापक काम लिया है, उतना काम इन सिद्धांतों से उनसे पहले नहीं लिया गया था।
आज भारत में होम्योपैथिक दवाओं की खपत पहले के मुक़ाबले कई गुना ज्यादा है तो यह केवल इसलिए है कि लोगों ने इसे बरता और इसे असरकारी पाया है।
सरकारी अस्पतालों में भी होम्योपैथी से इलाज करने वाले चिकित्सकों की व्यवस्था होती है। यह भी होम्योपैथी के सिद्धांतों की विजय ही है।

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Creation of homeopathy

दुनिया में लोग आम तौर पर अपनी और अपने परिवार की चिंता में ही जी रहे हैं लेकिन इन्हीं लोगों के बीच ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों की भलाई की ख़ातिर जी रहे हैं। ऐसे लोग आपको हरेक गांव और हरेक बस्ती में ज रूर मिल जाएंगे।
ऐसे लोगों ने इंसानियत की भलाई की ख ातिर अपनी जान ख तरे में डाली और इंसानियत को कुछ दिया।
होम्योपैथी के वुजूद में आने के पीछे भी ऐसे ही लोगों की मेहनत है।
यह पद्धति सस्ती और प्रभावी है। भारत जैसे देश में जहां बहुत से लोग २० रूपये प्रतिदिन भी मुश्किल से कमा पाते हैं, वहां ऐसी चिकित्सा पद्धति की बहुत ज रूरत है।
कुछ लोग होम्योपैथी की दवाओं पर विश्वास नहीं करते। टीन एज में हम भी नहीं करते थे लेकिन कुछ बीमारियों को इन दवाओं से जब हैरतअंगेज  तरीके  से ठीक होते देखा तो फिर शक जाता रहा।
भारत में सैक्स रोगों में आम तौर पर वैद्य हकीम पर ज् यादा भरोसा किया जाता है लेकिन इस तरह के रोगों में भी होम्योपैथी को कारगर पाया गया।
होम्योपैथी जिन सिद्धांतों पर काम करती है। वे सिद्धांत डा. हैनीमैन से पहले भी पाए जाते थे लेकिन उन्होंने इन सिद्धांतों से जितना व्यापक काम लिया है, उतना काम इन सिद्धांतों से उनसे पहले नहीं लिया गया था।. . .
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मान अपमान से ऊपर उठ चुके श्री चन्द्रभूषण तिवारी का जीवन वृक्ष लगाने एवं गरीब मजबूर व मजदूरों के बच्चों के लिये समर्पित है

वे आम, कटहल, नींबू, पाकड़, जामुन, नीम, अमरूद, आदि के वृक्ष साईकिल पर लेकर घर-घर घूमते हुए नजर आयेंगे। जिस किसी को भी वृक्ष की जरूरत हो उसे वह मुफ्त में देते हैं और कहते हैं कि इस वृक्ष को उसी तरह से देखें जिस तरह से अपने बच्चे को देखते हैं।

खादी का कुर्ता पैजामा और पौकेट, कंधे पर खादी का झोला लगाये चन्द्रभूषण तिवारी, लखनऊ शहर में एक लाख वृक्ष लगाने का लक्ष्य लेकर साइकिल से भ्रमण करते, ठण्ड के दिनों में गरीब बच्चों के लिए पुराने कपड़े बांटते आपको किसी समय दिखाई दे सकते हैं। चन्द्रभूषण तिवारी का कहना है कि उ.प्र. के राज्यपाल महामहिम श्री बी. एल. जोशी उनके साथ हैं। एक दिन सायं काल उनके घर महामहिम राज्यपाल का एक व्यक्ति आया और 15 अक्टूबर, 2009 को सायं 5.30 बजे स्वल्पाहार के लिए आमंत्रित किया। मिलने के दौरान महामहिम अति प्रसन्न हुये और उन्होंने कहा कि आचार्य जी इस कार्य में आप अकेले नहीं, मैं भी आपके साथ हूं और वृक्षारोपण के लिये मैं 5000 रुपए की धनराशि आपको दे रहा हूं।
मान अपमान से ऊपर उठ चुके श्री तिवारी का जीवन वृक्ष लगाने एवं गरीब मजबूर व मजदूरों के बच्चों के लिये समर्पित है। अब तक शहर में 58,000 वृक्ष लगा चुके श्री तिवारी का लक्ष्य लखनऊ शहर को बागों के शहर के रूप में पुनर्स्थापित करना है। वह कहते हैंµ
बगिया के शहर उजरि गयिले बाबा
बनि गयिले ईटा के मकान हो
ओहि के शहरिया में पत्थर दिल बसि गयिलें
नाहि करें मन में विचार हो,
जहां रहे चारबाग, आलमबाग, कैसरबाग,
नीबूबाग के नाहीं बा निशान हो।
आग्रह करने पर चन्द्रभूषण तिवारी ऐसे ही गाने बहुत ही अच्छे ढंग से गाते हैं, लखनऊ से गुलबर्गा (कर्नाटक) की यात्रा में हमारी उनसे मुलाकात हुयी। उनसे मुलाकात के दौरान पता चला कि कम खर्चे में जीवन चलाने वाले तिवारी जी को अकूत सम्पत्ति अर्जित करने वाले शहरी अमीरी लोग पागल लगते हैं। उनका कहना है कि अमीरों का लक्ष्य धन अर्जित करना है और मेरा लक्ष्य निर्धनों के आस-पास रहकर वृक्ष लगाना है। वे आम, कटहल, नींबू, पाकड़, जामुन, नीम, अमरूद, आदि के वृक्ष घर-घर साईकिल पर लेकर घूमते हुए नजर आयेंगे। जिस किसी को भी वृक्ष की जरूरत हो उसे वह मुफ्त में देते हैं और कहते हैं कि इस वृक्ष को उसी तरह से देखें जिस तरह से अपने बच्चे को देखते हैं। कारण यह कि वृक्ष फल और आक्सीजन मुफ्त देता है। धनवान लोग उन्हें पागल इसलिए समझते हैं क्योंकि उनका मानना है कि समझदार व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी में लगता है न कि घर-घर घूमकर वृक्ष बांटता है।
मूलत: देवरिया जिले के रहने वाले चन्द्रभूषण तिवारी बी.ए. करने के निमित्त लखनऊ आये। अखबार बेचकर बी.ए. की पढ़ाई पूरी की, उसके बाद आचार्य की डिग्री लेने के कुछ समय पश्चात् गरीब बच्चों को पढ़ाने के काम में लग गये। इसी बीच उन्हें सेन्ट्रल स्कूल सम्बलपुर उड़ीसा में अध्यापक के रूप में नौकरी मिल जाने के कारण वहां जाना पड़ा।
जिन बच्चों को पढ़ाया करते थे वे अब चिट्ठी आचार्य जी को लिखते। उसमें लिखा होता था- ”आचार्य जी आप कब आयेंगे, खिलौने कब तक लायेगें।” आचार्य जी के मन मस्तिष्क को लगा कि मेरी जरूरत यहां कहां है। अत: नौकरी छोड़कर 1994 में लखनऊ आ गये। शहर आकर पुन: बच्चों को पढ़ाना शुरू किया इस समय उनके स्कूल में लगभग 350 बच्चे हैं। यह ऐसे बच्चे हैं जिनकी फीस उनके माता-पिता नहीं दे सकते हैं। अत: यह स्कूल नि:शुल्क चलता है। किसी बच्चे से कोई फीस नहीं ली जाती है। अध्यापकों को दिये जाने वाले पारिश्रमिक की व्यवस्था आचार्य जी पर ही है। आचार्य जी बताते हैं कि यह व्यवस्था सज्जन शक्तियों के कारण सुगमता से हो जाती है। उनका लक्ष्य है कि लखनऊ शहर बागों का शहर हो और शहर के चारों तरफ ऐसे स्कूल हों जहां गरीब और मजदूरों के बच्चे पढ़ सके।
आचार्य चन्द्रभूषण तिवारी कहते हैं कि गांव भी शहर की नकल से अछूते नहीं हैं। गांव की पुरानी संस्कृति पहले से बदल चुकी है। वहां भी रिजर्व रहना बड़प्पन की निशानी है। गांव के सम्पन्न परिवार यह कहने लगे हैं कि मेरा लड़का रिजर्व रहता है, किसी से मिलता-जुलता नहीं है। वे बताते हैं कि जब मैं पढ़ता था तो हाई स्कूल की पढ़ाई करते समय मेरा स्कूल घर से 10 कि.मी. दूर होने के कारण वहां साइकिल से जाना पड़ता था। रास्ते में किसी बूढ़े को देखकर मैं उसको साइकिल पर बैठा लिया करता था। बच्चे आकर इसकी शिकायत भी करते थे। मेरे पिताजी भी उन अमीर पिताओं से बहुत प्रभावित थे। मैंने बूढ़े असहाय वृध्द व्यक्ति को अपनी साइकिल पर बैठाकर उसके गांव क्यों छोड़ा, इस बात पर मेरी पिटाई भी होती थी। कभी-कभी तो यह काम न करने पर भी शिकायत होने पर मेरी पिटाई होती थी। आचार्य जी का कहना है कि कोई भी पिता यह नहीं चाहता कि उसका पुत्र लायक हो, वह यह चाहता है कि उसका पुत्र कमाऊ बने। हमारी शिक्षा पध्दति ऐसी है जिसमें हमने खुद को मेकैनिकल बना लिया है। हमारा समाज संस्कृति और राष्ट्र से कोई लेना-देना नहीं है। वृक्षों को काटकर, नदियों को प्रदूषित कर, वातावरण को विषाक्त बनाकर हमने उसे रहने लायक नहीं छोड़ा है। अब इसे ठीक करने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। पशु-पक्षी, वृक्ष, हवा, नदियां सब मनुष्य का स्वागत ही करते हैं। मनुष्य जब चलता है, हवा बहती है, पशु-पक्षी सहयोग करते ही हैं। वृक्ष आक्सीजन देता है। नदियां पानी-पीने से कभी मना नहीं करती हैं। किन्तु मनुष्य भ्रमित है। पशु-पक्षी भोजन करने के पश्चात् न तो भोजन की इच्छा रखेंगे और हिंसक होने के बावजूद किसी जीव का शिकार नहीं करेंगे। किन्तु मनुष्य पेट भरने के बाद भी हिंसक हो जाता है। पशु का आचरण निश्चित है, मनुष्य का आचरण अनिश्चित है। पढ़े-लिखे लोगों की वजह से संकट ज्यादा है। अनपढ़ लोग प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम करते हैं। पढ़े-लिखे लोग धनवान होने के लिये अधिक से अधिक प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं। सुविधा संग्रह की वृत्ति ने मनुष्य के बीच घृणा और द्वेष पैदा कर दिया है, मनुष्य जाति के वजूद पर आज प्रश्नचिह्न। इस सबके बावजूद आचार्य जी को किसी से कोई शिकायत नहीं है। वह कहते हैं कि लोग शरीर से बड़े हो गये हैं किन्तु विकसित नहीं हुए हैं। अविकसित लोग करुणा, कृपा, दया के पात्र हैं। चोरी, डकैती, भ्रष्टाचार का कारण अविकसित मान्यता है। सुविधा से सुखी होने का भ्रम है। वे कहते हैं कि यदि सुविधा और धन संग्रह से सुख मिलता तो मुकेश अम्बानी और अनिल अम्बानी अलग क्यों होते।
इस समय सम्पूर्ण विश्व में लोभ-उन्मादी, काम-उन्मादी, और भोग-उन्मादी संस्कृति पनप चुकी है। आप किसी बच्चे से पूछ लीजिये कि पढ़कर क्या करोगे तो कहेगा नौकरी। बहुत अच्छा निकला तो मां-बाप को साथ रखेगा, नहीं तो यदि विकसित हो गया तो पत्नी के साथ विदेश चला जायेगा। उसकी पढ़ाई में समाज या राष्ट्र नामक चीज नहीं है। वह यह नहीं सोचता कि मेरा पालन-पोषण भी इसी समाज और राष्ट्र की देन है। मुझे ऐसा लगता है कि एक गांव का अनपढ़ बालक जो खेती करता है, वह कम से कम प्रकृति का दोहन करता है और समाज का भी पोषण करता है, मां-बाप के साथ रहता है, अतिथियों का भी आदर और सम्मान यथा शक्ति करता ही है, जबकि आई.आई.टी. पढ़ने-लिखने वाले बालक के मन में न तो समाज है, न राष्ट्र और न कर्तव्य, क्योंकि आधुनिक शिक्षा पध्दति में समाज-निर्माण या राष्ट्र-निर्माण की कोई डिजाईन नहीं है।
आचार्य जी का मानना है कि एक हाईस्कूल का विद्यार्थी कम से कम 4 गांव के लोगों को जाने और आस-पास के चार गांव उसे जाने-पहचाने, इण्टर का विद्यार्थी एक ब्लाक को जाने और उसे पूरा ब्लाक जाने पहचाने। यदि इस आधार पर पढ़ाई आगे बढ़ेगी तो आगे चलकर एक बालक राष्ट्र को जानेगा और राष्ट्र उसे जाने-पहचानेगा और दूसरा बालक विश्व को जानेगा और विश्व उसे जाने पहचानेगा। ऐसी दशा में राष्ट्र भाव जाग्रत नहीं होने की समस्या नहीं रहेगी। आज पढ़ा-लिखा व्यक्ति न तो स्वयं पर विश्वास करता है और न ही समाज पर। जबकि एक गांव का अनपढ़ व्यक्ति जो खेती करता है, खेती पर पल रहा है और खेती को पोषित करता है, वह स्वयं पर भी भरोसा करता है और समाज पर भी। आचार्य जी के लिए वृक्षारोपण पर्यावरण सुधारने के साथ-साथ समाज और संस्कृति को भी बेहतर करने का माध्यम है।
संपर्क : ई-4/192, सेक्टर-एम, अलीगंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 - हरिगोविन्द उपाध्याय
See : 
http://www.bhartiyapaksha.com/?p=104

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कोन कहता है हमारे देश में ३२ रूपये में दो वक्त पेट भर कहा नहीं सकते अरे इन गरीबों को संसद में तो जाकर देखो


कितनी अजीब बात है ..केसे हमारे देश के लोग हैं .बेचारी हमारी सरकार इतनी महनत और लगन के बाद सरकारी आंकड़े तय्यार करती है गरीबी का आंकलन करती है और हम .हमारा मिडिया सरकारी महनत का मजाक उढ़ाते हैं अभी हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत में सरकार ने गरीबी को परिभाषित करते हुए एक शपथ पत्र दिया जिसमे शहर में ३२ रूपये और गाँव में २८ रूपये में पेट भरनेवाली बात कही और इससे कम आमदनी वालेको गरीब माना गया है हमारे देश में ४५ करोड़ लोगों की यह संख्या बताई गयी है सवा सो करोड़ में से ४५ करोड़ आज भी देश में बदतर हालात में है यह तो सरकार ने स्वीकार कर लिया है दोस्तों ..आओ सोचते हैं सरकार ने यह आंकड़े कहां से प्राप्त किये ...................भाई सरकार का कोई भी कारिन्दा जो एयर कंडीशन से कम बात नहीं करता है वोह किसी गाँव या कच्ची बस्ती गरीबों की बस्ती में तो नहीं गया ...लेकिन हाँ संसद की केन्टीन से यह आंकड़े उन्होंने प्राप्त किये हैं जहां एक सांसद इस गरीबी की परिभाषा में आता है दोस्तों आप जानते हैं संसद की केन्टीन में एक रूपये की चाय दो रूपये का दूध ..डेढ़ रूपये की दाल ..दो रूपये के चांवल ..एक रूपये की चपाती चार iरूपये का डोसा ..आठ रूपये की बिरयानी ...तेरह रूपये की मछली और २४ रूपये का मुर्गा मिलता है और यह बेचारे इतने गरीब है के इतना महंगा सामान खरीद कर खाने के इन्हें कम रूपये मिलते इन्हें केवल अस्सी हजार रूपये प्रति माह का वेतन मिलता है और करीब एक लाख रूपये के दुसरे भत्ते मिलते हैं ..अब देश के इन गरीबों का बेचारों का क्या करें बेचारे संसद में जाकर सोते हैं संसद में जाकर लड़ते हैं जब कानून बनाने या विधेयक पारित करने की बात होती है तो वाक् आउट कर कानून पारित करवा देते हैं जब विश्वास मत की बात आती है तो बेचारे रिश्वत लेकर वोट डाल देते हैं ..लोकसभा में सवाल पूंछना हो तो इसके भी रूपये ले लेते हैं और संसद के बाहर कोई अगर इस सच को उजागर करे तो उन्हें विशेषाधिकार का नोटिस देकर डरा देते हैं .हैं ना हमारा देश गरीब और हमारे देश की गरीबी के आंकड़े बिलकुल सही और ठीक हैं .............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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होम्योपैथी की तासीर बेजोड़ है

-डॉ.  ए. के.  अरुण
एक प्रसिध्द अमेरिकी एलोपैथ डा. सी हेरिंग ने होम्योपैथी को बेकार सिध्द करने के लिए एक शोध प्रबन्ध लिखने की जिम्मेदारी ली। वे गम्भीरता से होम्योपैथी का अध्ययन करने लगे। एक दूषित शव के परीक्षण के दौरान उनकी एक ऊंगली सड़ चुकी थी। होम्योपैथिक उपचार से उनकी अंगुली कटने से बच गई। इस घटना के बाद उन्होंने होम्योपैथी के खिलाफ अपना शोध प्रबन्ध फेंक दिया।
इस वर्ष 10 अप्रैल को होम्योपैथी के भारत में 200 साल पूरे हो रहे हैं। इस बहाने होम्योपैथी के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा जरूरी हो जाती है। शुरू से ही आधुनिक चिकित्सा पध्दति एलोपैथी का होम्योपैथी के प्रति तंग नजरिया रहा है। एक सहज एवं सस्ती चिकित्सा प्रणाली होते हुए भी होम्योपैथी को कभी महत्वपूर्ण या प्रमुख चिकित्सा पध्दति नहीं माना गया। कभी जादू की फड़िया, मीठी गोलियां या जादू की झप्पी तो कभी प्लेसिबो कहकर इसे महत्वहीन बताने की कोशिश हुई, लेकिन अपनी क्षमता और वैज्ञानिकता के बलबूते होम्योपैथी विकसित होती रही। होम्योपैथी एलोपैथी के बाद दुनिया में एक दूसरी सबसे बड़ी चिकित्सा पध्दति है। होम्योपैथी एक ऐसी चिकित्सा विधि है जो शुरू से ही चर्चित, रोचक और आशावादी पहलुओं के साथ विकसित हुई है।
सन् 1810 में इसे जर्मन यात्री और मिशनरीज अपने साथ लेकर भारत आए। इन छोटी मीठी गोलियों ने भारतीयों को लाभ पहुंचा कर, अपना सिक्का जमाना शुरू कर दिया। सन् 1839 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की गम्भीर बीमारी के इलाज के लिए प्रफांस के होम्योपैथिक चिकित्सक डा. होनिंगबर्गर भारत आए थे। उनके उपचार से महाराजा को बहुत लाभ मिला था। बाद में सन 1849 में जब पंजाब पर सर हेनरी लारेन्स का कब्जा हुआ, तब डा. होनिंगबर्गर अपने देश लौट गए। सन 1851 में एक अन्य विदेशी चिकित्सक सर जान हंटर लिट्टर ने कलकत्ता में मुफ्त होम्योपैथिक चिकित्सालय की स्थापना की। सन् 1868 में कलकत्ता से ही पहली भारतीय होम्योपैथिक पत्रिका शुरू हुई तथा 1881 में डा. पीसी मुजुमदार एवं डा. डीसी राय ने कलकत्ता में भारत के प्रथम होम्योपैथिक कालेज की स्थापना की।
होम्योपैथी के आविष्कार की कहानी भी बड़ी रोचक है। जर्मनी के एक विख्यात एलोपैथिक चिकित्सक डा. सैमुएल हैनिमैन ने चिकित्सा क्रम में यह महसूस किया कि एलोपैथिक दवा से रोगी को केवल अस्थाई लाभ ही मिलता है। अपने अध्ययन और अनुसंधान के आधार पर उन्होंने दवा को शक्तिकृत कर प्रयोग किया तो उन्हें अत्यधिक सफलता मिली और उन्होंने सन् 1890 में होम्योपैथी का आविष्कार किया। होम्योपैथी के सिध्दान्तों का उल्लेख हिप्पोक्रेटस एवं उनके शिष्य पैरासेल्सस ने अपने ग्रन्थों में किया था लेकिन इसे व्यावहारिक रूप में सर्वप्रथम प्रस्तुत करने का श्रेय डा. हैनिमैन को जाता है।
उस दौर में एलोपैथिक चिकित्सकों ने होम्योपैथिक सिध्दान्त को अपनाने का बड़ा जोखिम उठाया, क्योंकि एलोपैथिक चिकित्सकों का एक बड़ा व शक्तिशाली वर्ग इस क्रान्तिकारी सिध्दान्त का घोर विरोधी था। एक प्रसिध्द अमेरिकी एलोपैथ डा. सी हेरिंग ने होम्योपैथी को बेकार सिध्द करने के लिए एक शोध प्रबन्ध लिखने की जिम्मेदारी ली। वे गम्भीरता से होम्योपैथी का अध्ययन करने लगे। एक दूषित शव के परीक्षण के दौरान उनकी एक ऊंगली सड़ चुकी थी। होम्योपैथिक उपचार से उनकी अंगुली कटने से बच गई। इस घटना के बाद उन्होंने होम्योपैथी के खिलाफ अपना शोध प्रबन्ध फेंक दिया।
बाद में वे होम्योपैथी के एक बड़े स्तम्भ सिध्द हुए। उन्होंने ‘रोग मुक्ति का नियम’ भी प्रतिपादित किया। डा. हेरिंग ने अपनी जान जोखिम में डालकर सांप के घातक विष से होम्योपैथी की एक महत्वपूर्ण दवा ‘लैकेसिस’ तैयार की जो कई गम्भीर रोगों की चिकित्सा में महत्वपूर्ण है।
होम्योपैथी ने गम्भीर रोगों के सफल उपचार के अनेक दावे किये लेकिन अन्तरराष्ट्रीय चिकित्सा मंच ने इन दावों के प्रमाण प्रस्तुत करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। मसलन यह वैज्ञानिक चिकित्सा विधि महज ‘संयोग’ मानी जाने लगी और समाज में ऐलोपैथी जैसी प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर पाई। अन्तरराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिकाओं में भी होम्योपैथी को महज प्लेसिबो (खुश करने की दवा) से ज्यादा और कुछ नहीं माना गया।
होम्योपैथी को एलोपैथी लाबी द्वारा कमतर आंकने के पीछे जाहिर है कि उनकी व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता ज्यादा है। होम्योपैथी को जन सुलभ बनाने की जिम्मेदारी तो समाज और सरकार की है। लेकिन हमारे योजनाकार भी महंगी होती एलोपैथिक चिकित्सा के मोहजाल से बच नहीं पाए हैं। सालाना 22,300 करोड़ रुपये के बजट में से मात्र 964 करोड़ (4.4 प्रतिशतश् रुपये अन्य चिकित्सा विधियों पर खर्च होता है। इसमें होम्योपैथी चिकित्सा के हिस्से केवल 100 करोड़ रुपये आते हैं। इस हिसाब से सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में होम्योपैथी का विकास होगा, इस बात में संशय ही संशय है। अपने ही दम-खम पर भारत में तेजी से लोकप्रिय होती जा रही होम्योपैथी के मौजूदा विकास का ज्यादा श्रेय तो होम्योपैथी के चिकित्सकों और प्रशंसकों को ही जाता है। लेकिन यह भी सच है कि सरकारी पहल के बिना होम्योपैथी को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता।
एलोपैथिक चिकित्सा द्वारा बिगड़े एवं लाइलाज घोषित कर दिये गए रोगों में होम्योपैथी उम्मीद की अन्तिम किरण की तरह होती है। कुछ मामले में तो होम्योपैथी वरदान सिध्द हुई है तथा अनेक मामले में तो होम्योपैथी ने रोगी में जीवन की उम्मीद का भरोसा जगाया है। चर्म रोग, जोड़ों के दर्द, कैंसर, टयूमर, पेट रोग, शिशुओं और माताओं के विभिन्न रोगों में होम्योपैथी की प्रभाविता बेजोड़ है। होम्योपैथी की इतनी अच्छी योग्यता के बावजूद स्वास्थ्य विभाग पर हावी आधुनिक चिकित्सकों एवं एलोपैथिक दवा लाबी होम्योपैथी को आगे नहीं आने देना चाहती। कारण स्पष्ट है कि एलोपेथिक दुष्प्रभावों से ऊबकर काफी लोग होम्योपैथी या दूसरी देशी चिकित्सा पध्दतियों को अपनाने लगेंगे। फिर तो सरकार और मंत्रालय में इनका रुतबा बढ़ेगा और एलोपैथी की प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी। होम्योपैथी के प्रति एलोपैथिक एवं आधुनिक चिकित्सा लाबी की यह दृष्टि इस सरल चिकित्सा पध्दति को आम लोगों के लिये पूर्ण भरोसेमन्द नहीं बनने देती।
सर्वविदित है कि दुनिया में जनस्वास्थ्य की चुनौतियां बढ़ रही हैं और आधुनिक चिकित्सा पध्दति इन चुनौतियों से निबटने में एक तरह से किल सिध्द हुई है। प्लेग हो या सार्स, मलेरिया हो या टीबी, दस्त हो या लू, एलोपैथिक दवाओं ने उपचार की बात तो दूर, रोगों की जटिलता को और बढ़ा दिया है। मलेरिया और घातक हो गया है। टीबी की दवाएं प्रभावहीन हो गई हैं। शरीर में और ज्यादा एन्टीबायोटिक्स को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं रही। ऐसे में होम्योपैथी एक बेहतर विकल्प हो सकती है। अनेक घातक महामारियों से बचाव के लिये होम्योपैथिक दवाओं की एक पूरी रेंज उपलब्ध है। आवश्यकता है इस पध्दति को मुक्कमल तौर पर आजमाने की।
भारत ही नहीं, होम्योपैथी के खिलाफ इन दिनों दुनिया भर में मुहिम चलाई जा रही है। अभी पिछले दिनों ब्रिटेन में एक अनुसंधान का हवाला देते हुए एलोपैथी लाबी ने होमियोपैथी के सिध्दांतों को अवैज्ञानिक घोषित कर दिया। इस दुष्प्रचार के बावजूद आम आदमी आज भी होमियोपैथी के प्रति विश्वास रखता है।
सवाल है कि देश में जहां 70 फीसदी से ज्यादा लोग लगभग 20 रुपये रोज पर गुजारा करते हों वहां होम्योपैथी जैसी सस्ती चिकित्सा पध्दति एक बढ़िया विकल्प हो सकती है? 
हमारे योजनाकारों को इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार करना होगा।
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क्या हमारी आत्मा में बसा है भ्रष्टाचार ?

हमारी आत्मा में बसा है भ्रष्टाचार 
सौरभ सुमन, गलियां
सुना है आजकल शहद और नारियल पानी की देश में मांग बढ़ गई है। शायद साउथ के किसानों के चेहरों पर शहद और नारियल पानी में पाए जाने वाले प्राकृतिक चीजों का असर भी शायद अब दिखने लगे। मांग में तेजी के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। वजह भ्रष्टाचार के खिलाफ 13 दिन तक अन्ना बाबा का अनशन। मांग मान लेने पर उन्होंने अनशन तोड़ा। अनशन तो ट्रॉपिकाना और रीयल जूस से तोड़ने की भी बात आई लेकिन अन्ना ने शहद और नारियल पानी से ही अनशन तोड़ा। भ्रष्टाचार के कारण अनशन ने इसकी मांग भी बढा़ दी।
लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आखिर कुछ महीनों से देशभर में अनशन और भ्रष्टाचार जैसे शब्द जोर-शोर से क्यों तैर रहे हैं? हजारों-लाखों लोग दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लामबंद हो जाते हैं। बेशक यह देश की जनता के लिए एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन क्या हम सब ईमानदारी से भ्रष्टाचार से लड़ने की ताकत या नीयत रखते हैं? ऐसा अभी के समय में तो बिल्कुल ही नहीं है। दरअसल भ्रष्टाचार तो हमारी आत्मा में बसा है। यह सौ फीसदी कड़वी सच्चाई है। यहां पर भ्रष्टाचार को सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से देखना गलत होगा। यह हमारे समाज, हमारे चरित्र, हमारी सोच और हमारे कर्म में रचा-बसा है। भ्रष्टाचार तो हमारी रगों में दौड़ रहा है, भले ही कुछ लोग मेरी इस कड़वी बात से सहमत न हों, लेकिन यही सच है।
सुना है आजकल शहद और नारियल पानी की देश में मांग बढ़ गई है। शायद साउथ के किसानों के चेहरों पर शहद और नारियल पानी में पाए जाने वाले प्राकृतिक चीजों का असर भी शायद अब दिखने लगे। मांग में तेजी के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। वजह भ्रष्टाचार के खिलाफ 13 दिन तक अन्ना बाबा का अनशन। मांग मान लेने पर उन्होंने अनशन तोड़ा। अनशन तो ट्रॉपिकाना और रीयल जूस से तोड़ने की भी बात आई लेकिन अन्ना ने शहद और नारियल पानी से ही अनशन तोड़ा। भ्रष्टाचार के कारण अनशन ने इसकी मांग भी बढा़ दी।
मेरा मानना है कि अन्ना के अनशन के बाद भी आज कोई इसांन अपने निजी काम को ईमानदारी से कराने की कोशिश करता भी है तो जल्द हार मानकर सामने वाले को तुरंत घूस का प्रसाद बांट देता है। क्योंकि हर कोई सोचता है कि अब कौन इतने चक्कर काटेगा और अपना समय खराब करेगा। इसी सोच ने तो भ्रष्ट लोगों की झोली भरी है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। हम भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कानून की भी बात खूब करते हैं। लेकिन यह बताइए कि अगर घूस लेने वाला और घूस देने वाला दोनों तैयार हो तो कौन सा कानून इन्हें यह करने पर रोक लगा देगा। यह तो वही बात हो गई कि मियां बीबी राजी तो क्या करेगा काजी। इसलिए भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए हमें सबसे पहले आत्मा से ईमानदार और साफ नियत वाला बनना पहले जरूरी है।
भ्रष्टाचार में हम आज इतने डूबे हुए हैं कि जब कभी भी हमें मौका मिलता है, हम मौके पर चौके जड़ने से चूकते नहीं हैं। वरना क्या वजह है कि सब कुछ से संपन्न इंसान भी करोड़ों रुपए का गोलमाल कर जाता है। स्वार्थ, प्रलोभन, महत्वाकांक्षा और अधिक पाने की चाहत ने हमें अंधा बना दिया और भ्रष्टाचार का गुलाम। आज इसी देश में ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी में पूरी ईमानदारी को बरकरार रखा और शान से सर उठाके शीर्ष पर पहुंचे। पेशा के नाम पर भ्रष्टाचार करने वालों की आज सबसे लंबी फौज है। वकील अपने क्लाइंट से केस के नाम पर पैसे उगाहता है, पुलिस वाला नेशनल हाइवे पर ट्रक ड्राइवर से 50-100 रुपए की उगाही में लगा है, कॉरपोरेट में डील के लिए मोटी रकम की आरती की जाती है, बाबू व साहब तो पान दबाए बड़े प्यार से मीठी बातें कर कोड वर्ड में सेवा की रकम समझा जाते हैं। ऐसी सूची बड़ी लंबी हो सकती है। फिर हम किस बात के लिए भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं जब हम खुद ही लड़ने और ईमानदार बनने को तैयार नहीं।
बात सामाजिक भ्रष्टाचार की भी जरूर होनी चाहिए। छोटे शहरों में तो सामाजिक भ्रष्टाचार थोड़ी कम भी है। महानगरों में तो यह अपने चरम पर है। शहर में सड़क पर अगर किसी का एक्सीडेंट हो जाय तो कुछ ही ऐसे लोग हैं जो मदद के लिए दौड़ते हैं, वरना टाई और कोट पहन कर बड़ी गाड़ियों में चलने वाले तो उसके बगल से गुजर जाते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि अपना क्या जाता है और कौन मुफ्त में अपने सिर परेशानी ले। भ्रष्टाचार की हालत तो इतनी खराब है कि घंटों इस पर लगातार बहस चल सकती है। लेकिन कुल मिलाकर हमें अपने आप को आत्मा से ईमानदार, संतुष्ट और मदद करने जैसी इच्छाशक्ति जगानी होगी, वरना अन्ना जैसे आंदोलन होते रहेंगे और कुछ दिनों बाद भुला दिये जाते रहेंगे।
http://blogs.livehindustan.com/yuva_park/2011/09/17/%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0/
साभार : 
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भूकंप

भूकंप 


कब  क्या  हो  जाए कुछ पता नहीं 
यहाँ इंसान की जिंदगी की कीमत कुछ नहीं |
 आम इंसान बम विस्फोट से,दुर्घटना से, नहीं तो भूकंप के झटकों से मर जाता है 
चार दिन हल्ला मचता है .और फिर सब शांत हो जाता है | 
ना कोई बाद में उसके बारे में सोचता है,ना रोकने का उपाय करता है 
जिसके घर का कोई प्रभावित होता है वो ही परिवार रोता रह जाता है |
हम सदभावना रैली के नाम पर, कॉमनवेअल्थगेम के नाम पर करोडो खर्च कर देतें हैं |
परन्तु ऐसी दुर्घटनाएं रोकने के लिए कोई उपाय नहीं करतें है | 
आम आदमी मरे तो मरे, कुछ रुपये देने की घोषणा कर देते हैं 
और अपने कर्त्तव्य से इतिश्री कर लेते हैं  |
अगर जापान जैसी तीव्रता लिए कोई भूकंप आ गया 
तो हमारा देश की आधे से ज्यादा छेत्रों को प्रभाबित कर जाएगा |
और पता नहीं कितनी जनसंख्या और सम्पति को नष्ट कर जाएगा 
जान माल की हानि के साथ राष्ट्रीय सम्पति का भी नाश होगा |
परन्तु इसके बारे मैं कोई नहीं सोच रहा ,ना ही भूकंप निरोधी इमारतें बना रहा 
सडकों के हाल ,ट्रेफिक का हाल ,रेलों के हाल बद से बदतर हो रहा |
इसी कारण दुर्घटनाओं से कितने ही जान माल का नुक्सान हो रहा 
आम आदमी इन सब त्रासदी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा या मर रहा| 
इनके सुधार पर हर साल करोडो रुपया  सरकार दे रही 
.परन्तु ये आधे से ज्यादा सुधार की जगह लोगों की जेबें भर रही |
भ्रष्टाचार ने इस देश का सत्यानाश कर दिया 
वोट की राजनीति ने नेताओं कोअपनी अपनी पार्टियों तक सीमित कर दिया |
इस देश की है बस यही है  विडम्बना ,की यहाँ है "प्रजातंत्र" 
इसलिए अब नहीं इस देश में बचा है कोई "तंत्र"| 
देश की नहीं हर नेता को बस अपनी कुर्सी की पड़ी है 
जनता बेवकूफ बनी देश का नाश इन नेताओं द्वारा होते देखती खड़ी है |
एक हो गयें हैं चोर -सिपाही, देश की हो रही तबाही |  
काश कोई ऐसा भूकंप आये जो इस भ्रष्टाचार रुपी इमारत को ही गिरा जाए 
देश में भीतर तक फैली इसकी जड़ों को पूरी तरह हिला जाए |
मिट जाए इसका नामो -निशान,देश हमारा बन जाए महान |
फिर तो चारों तरफ होगा खुशियों का साम्राज्य 
लोट आयेगा रामराज्य  |
        


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लखनऊ के शिक्षा सम्मेलन में सलीम ख़ान को और डा. अनवर जमाल को 'Best Blogger' के ईनाम से नवाज़ा गया

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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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