धोका : Blogger.com का


ब्लॉगर.कॉम ने मेरे साथ किया धोका... 
इस बात पे खुश होऊं या गुस्सा... कुछ समझ में नहीं आ रहा...

११ मई २०११, को मैंने अपने ब्लॉग "माही" पर एक कविता लिखी. शीर्षक था - "तड़प

अब हुआ यूं कि मैंने ये कविता पोस्ट कर दी पर कोई कमेन्ट नहीं आया... पर १२ मई २०११ को 
संजय भास्कर जी  का एक कमेन्ट आया. - "मैं क्या बोलूँ अब....अपने निःशब्द कर दिया है..... बहुत ही सुंदर कविता."

और मैंने भी उनको धन्यवाद कहा.. 

और आज जब मैंने अपने ब्लॉग पे वही कविता फिर से देखी तो....

संजय जी का कमेन्ट गायब था, और मेरा भी...

वैसे मुझे इस बात पे गुस्सा भी आया कि आखिर कैसे हुआ ये सब... 
फिर दिमाग पे थोडा जोर लगाया तो मैंने पाया कि दोपहर में ब्लॉगर.कॉम खोलने पर खुल नहीं रहा था. वह दर्शा रहा था कि ब्लॉगर.कॉम अभी उपलब्ध नहीं है.

अब आप शायद कहें कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मेरी कविता से कमेन्ट बिना मेरी इज़ाज़त के गायब हो जाये. तो मेरे पास एक और इलज़ाम है ब्लॉगर.कॉम के लिए...

११ मई २०११ को ही मैंने एक नया साझा ब्लॉग बनाया था. नाम रखा - नवोदित चिट्ठाकार
चूंकि मैंने अपनी दूसरी जीमेल आई डी से ये ब्लॉग बनाया था और फिर  मैंने अपनी इस आई डी में सदस्य बन्ने के लिए आमंत्रण भेजा. और फिर अभी जब मैंने अपना ब्लॉगर डैशबोर्ड देखा तो वो ब्लॉग भी गायब था. ब्लॉगर ने उस ब्लॉग को तथा उसमे लिखे एक पोस्ट (जो कि ड्राफ्ट में था) को भी डिलीट कर दिया...

अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूँ ? 

ब्लॉगर.कॉम की बेवकूफी पे हंसी ज्यादा आ रही है गुस्से कि बजाये... 
 :-D

महेश बारमाटे "माही"

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धर्म का अर्थ पता चल गया


भूखा था
किसी ने खाने को
दो रोटी दी 
मेरी भूख मिटायी
प्यासा था
किसी ने पानी पिलाया
प्यास को बुझाया
दर्द से पीड़ित था
आँख से आंसूं निकल
रहे थे
किसी ने कंधे पर
हाथ रख कर सांत्वना दी
दर्द कम हुआ
बीमार था
किसी ने चिकित्सा कर
जान बचायी
आँखों से दिखता ना था
किसी ने हाथ पकड़
सड़क पार करायी
निरंतर सोचता था
धर्म क्या होता है ?
अब धर्म का अर्थ
पता चल गया
13-05-2011
848-55-05-11
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एक सवाल

क्या कोई हमारी पत्रकार धन-दौलत से परे हटकर देश की दबती आवाजोँ को सरकार तक पहुँचाने मेँ हमारी मदद कर सकता है?
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कविता ----- दिलबाग विर्क

                 चीरहरण 

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एक कश्मीरी महिला पंडित ने इतिहास रचा !

यह एक ऐतिहासिक वाक़िया है. इससे लोग यह जान लेंगे कि घाटी में लोग काश्मिरी पंडितों से नफरत नहीं करते, जैसा कि साज़िशन प्रचारित किया जाता है. पेश है एक रिपोर्ट :

कश्मीरी महिला पंडित ने इतिहास रचा !

by रजनीश के झा (Rajneesh K Jha)

 

कश्मीर के बारामूला जिले में एक कश्मीरी महिला पंडित ने चुनाव जीता है। अपनी जीत को दशकों पहले घाटी से पलायन करने वाले परिवारों के लिए शुभ संकेत बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें अब लौट आना चाहिए।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी उनकी जीत को "घाटी तथा कश्मीरियत के लिए उम्मीद" की किरण बताया है। बारामूला जिले में वुसान कुंजर गांव की आशा ने शनिवार को हुए चुनाव में अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी सरवा बेगम को 11 मतों के अंतर से हराया। जीत के बाद आशा ने कहा, "मेरी जीत मेरे प़डोसी मुसलमानों के समर्थन से ही सम्भव हो सकी। मेरी जीत घाटी के प्रवासी पंडितों के लिए स्पष्ट संदेश है। उन्हें अपनी मातृभूमि लौट आना चाहिए।"
आशा की जीत पर मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट टि्वटर पर लिखा, "हमने नहीं देखा कि वह मुस्लिम है या गैर-मुस्लिम। वह एक भद्र महिला है। हमने उन्हें मुस्लिम उम्मीदवारों की तुलना में तरजीह दी।" मुख्यमंत्री ने लिखा, "दोनों पक्षों के आतंकवादी दुनिया को जो यकीन दिलाना चाहते हैं, उसकी परवाह न करते हुए घाटी और कश्मीरियत के लिए अब भी कुछ आशा बची है।"

साभार 
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दलदल --ग़ज़ल -----डा श्याम गुप्त ....

बड़े शौक से आये थे कुछ काम करेंगे |
सेवा करेंगे देश की और नाम करेंगे |

गंदला गई है  राजनीति इस देश की ,
कुछ पाक साफ़ करेंगे,जब काम करेंगे 

काज़ल की कोठरी है, हम जानते थे खूब,
इक लीक तो लगेगी पर पर नाम करेंगे |

सब दुश्मनों से हम तो हरदम  थे खबरदार,
जाना नहीं  था,  अपने ही बदनाम करेंगे |

वो साथ भी चले नहीं और खींच लिए  पाँव ,
था  भरोसा,   कि साथ  कदमताल करेंगे |

सच की ही  राह चलते रहे हम तो उम्र भर,
राहें बदलकर अब तो क्या ख़ाक करेंगे |

हर शाख ही यहाँ की है, उलूकों के हवाले,
मंजिल बदल कर क्या नया मुकाम करेंगे |

बैठे हैं  गिद्ध  चील  कौवे  हर  डाल  पर ,
व्याख्यान श्वान देते , गधे गान करेंगे ||

इतना है दलदल ,कोई कहां  बैठे खडा हो,
कीचड़ से लथपथ होगये क्या काम करेंगे |

दलदल से बाहर कैसे आयें, सोच रहे 'श्याम,
सारा  ही   इंतजाम   अब  तो  राम  करेंगे ||
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दहेज़ प्रताड़ना कानून का संशोधन संतुलित रखने का प्रयास होगा .जस्टिस शिवकुमार शर्मा

दहेज़ प्रताड़ना कानून का संशोधन संतुलित रखने का प्रयास होगा .जस्टिस शिवकुमार शर्मा

केन्द्रीय विधि आयोग के सदस्य और राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधिपति रहे जस्टिस शिवकुमार ने आज कोटा में आयोजित एक सेमीनार में घोषणा की के दहेज़ प्रताड़ना कानून में जो भी प्रस्तावित संशोधन है वोह बहु पक्षीय होंगे उन्होंने विशवास दिलाया के इस संशोधित प्रस्तावों में महिला और पुरुष उत्पीडन दोनों का ख्याल रख कर ही कोई सुझाव दिए जायेंगे .................जस्टिस शिवकुमार शर्मा आज कोटा अभिभाषक परिषद में आयोजित दहेज़ प्रताड़ना कानून के संशोधन विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वकील और न्यायिक अधिकारियों को सम्बोधित कर रहे थे .
जस्टिस शिवकुमार शर्मा ने माहोल को गम्भीरता से हंसी की तरफ लेजाते हुए एक चुटकुला अकबर बीरबल का सुनाया जिसमे अकबर से एक व्यक्ति को मनहूस शक्ल का बताकर उसे देश निकाला देने  या फिर फांसी की सजा देने  की कुछ लोगों ने मांग की ..अकबर ने खा के पहले में जनाचुन्गा परखूंगा फिर आगे सोचूंगा ,,सुबह सवेरे अकबर के दरवाजे पर इस कथित मनहूस शक्ल वाले को खड़ा कर दिया गया और जेसे ही अकबर ने इस व्यक्ति की शक्ल देखी उनके जूते पहनते वक्त काँटा चुभ गया ..अकबर ने इस व्यक्ति को मनहूस घोषित कर फांसी की सजा सूना दी उसे फांसी होते देख पीड़ित की पत्नी बीरबल के पास पहुंची .बीरबल अकबर के पास पहुंचे अकबर से बीरबल ने जब फांसी का कारण पूंछा तो अकबर ने कहा के यह मेरे राज्य का सबसे मनहूस शक्ल का व्यक्ति है जो इसकी शक्ल देखता है उसका काम बिगड़ जाता है मेने भी इस चेक कर लिया है इसलियें इसकी फांसी की सजा ठीक है .बीरबल ने कहा के जनाब इससे भी एक मनहूस आदमी इस राज्य में है अकबर ने उस व्यक्ति का नाम पूछा तो बीरबल ने अकबर का नाम बता दिया ..अकबर यह सुनकर लाल पीला हो गया बीरबल से इस बात को साबित करने के लियें कहा बीरबल ने कहा के जिस शख्स की आप बात कर रहे हो उस शख्स की शक्ल आपने देखी तो आपके कानता चुभ गया लेकिन इस शख्स ने आपकी शक्ल देखी तो उसे फांसी पर चढाया जा रहा  है अकबर बीरबल की यह बात सुनकर आवाक रह गया और फिर उसने इस शख्स को बरी कर दिया .......शिवकुमार जी ने कानूनी बात कहते हुए कहा के जजों को क्रिकेट के अम्पायर नहीं बनना चाहिए के एक जगह खड़े खड़े हाथ उठा कर फेसला सुनाते रहे उन्होंने कहा के जजों को फ़ुटबाल एम्पायर बनना चाहिए जो फ़ुटबाल के साथ साथ दोद कर फेसला करता है और यही सही फेसला होता है .
आज इस गोष्ठी में मेने भी अपने विचार रख जिसमे दहेज़ प्रताड़ना की धारा को जमानती अपराध बनाने ,समझोता योग्य बनाने ,झुन्ठा मुकदमा करने वाली महिला के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने ...घरेलू हिंसा कानून को प्रभावी बनाने ...दहेज़ और उपहार की सूचि शादी के वक्त रजिस्ट्रेशन कराने ..पुलिस अनुसन्धान में बदलाव कर महिला जहां रहती थी उस जगह के दो सम्भ्रांत गवाहों के ब्यान आवश्यक रूप से लेने के  सुझाव शामिल थे ,,,मेरे अलावा हरीश शर्मा ,जमील अहमद. दीपक मित्तल ...नाजिमुद्दीन सिद्दीकी ....कल्पना शर्मा ..सलीम खान ..मदन लाल शर्मा .महेश गुप्ता एडवोकेट और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राकेश शर्मा ,नीरज भामू ने भी अपने सुझाव दिए ..शिव कुमार शर्मा ने भाई दिनेश द्विवेदी के ब्लॉग अदालत पर इन दिनों चलाई गयी दहेज़ प्रताड़ना के सुझावों की मुहीम की भी सराहना की .......अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............


हम कौन थे?क्या हो गए?और क्या होंगे अभी?...............
आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएं सभी.
                 आज कुछ ब्लोग्स पर ''शिखा कौशिक जी''द्वारा प्रस्तुत आलेख ''ब्लोगर सम्मान परंपरा का ढकोसला बंद कीजिए''चर्चा में है और विभिन्न ब्लोगर में से कोई इससे सहमत है तो कोई असहमत.चलिए वो तो कोई बात नहीं क्योंकि ये तो कहा ही गया है कि जहाँ बुद्धिजीवी वर्ग होगा वहां तीन राय बनेंगी सहमति ,असहमति और अनिर्णय की किन्तु सबसे ज्यादा उल्लेखनीय टिप्पणियां ''दीपक मशाल जी ''की और ''डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''की रही .एक और दीपक जी पुरुस्कृत सभी ब्लोगर्स का पक्ष लेते हैं जबकि शिखा जी द्वारा किसी भी ब्लोगर पर कोई आक्षेप किया ही नहीं गया है उनका आक्षेप केवल चयन प्रक्रिया पर है तो दूसरी और डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी ''खट्टा मीठा तीखा पचाने की सलाह देते हैं भूल जातेहै कि ''जो डर गया वो मर गया'' की उक्ति आजकल के नए ब्लोगर्स के सर चढ़कर बोल रही है.दोनों में से कोई भी आलेख के मर्म तक नहीं पहुँचता जिसका साफ साफ कहना है कि पहले आप सम्मान दिए जाने के दिशा निर्देश तैयार कीजिये और जिस तरह अन्य पुरुस्कारों के आयोजन में होता है नामांकन चयन इत्यादि  प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही सम्मान के हक़दार का चयन कीजिये. अन्यथा जैसा कि सभी सम्मानों के आयोजन में विवाद पैदा हो जाते हैं वैसा ही यहाँ हो जाने में कोई देर नहीं है.
                साथ ही दीपक 'मशाल' जी ने तो हद ही कर दी उन्होंने तो शिखा जी को यहाँ तक कह दिया कि ''वे भी एक इनाम लिए बैठी हैं''उन्हें यह जानकारी तो होनी ही चाहिए कि शिखा जी ने ये पुरस्कार महाभारत-१ के नाम से आयोजित प्रतियोगिता में जीता है और इसमें क्रमवार ढंग से सभी कुछ किया गया था.पहले प्रतियोगिता का विषय घोषित किया गया फिर भाग लेने की तिथि निर्धारित की गयी उसके बाद क्रमवार अभ्यर्थियों के आलेख प्रकाशित किये गए और अंत में डॉ.श्याम गुप्त जी  और डॉ.अनवर जमाल जी को निर्णायक के रूप में निर्णय करने के लिए कहा गया अंत में उन आलेखों में से चयन किये जाने के बाद शिखा जी को विजेता घोषित किया गया.क्या ऐसी पारदर्शिता वे इन सम्मान समारोह में अपनाई गयी ,अपने तर्कों द्वारा साबित कर सकते हैं?जिन सम्मान समारोहों के पक्ष में वे खड़े हैं उनमे केवल अंतिम स्थिति दिखाई देती है और वह है ''विजेता घोषित करने की''उससे पहले चयन प्रक्रिया का कोई नामो-निशान नहीं है.और रही पुरुस्कार पाने वाले ब्लोगर्स के लेखन आलेखन क्षमता की तो वह देखना निर्णायक मंडल का काम है हमारा नहीं.
                           आज यदि हम देखते हैं तो हमें इस बात पर गर्व होता है कि हम ब्लॉग जगत से जुड़े हैं उस ब्लॉग जगत से जो देश की समस्याओं को उठाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और दे भी रहा है.ऐसे में यदि यहाँ कोई गलत बात सर उठाती है तो उसे कुचलने में हर जागरूक ब्लोगर को अपना योगदान देना चाहिए न कि लेखक की व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पूरी न होने जैसी तुच्छ बात कह कर उसे हतोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए.स्पष्ट तौर पर शिखा जी के आलेख का मर्म यही है कि ये सम्मान समारोह क्योंकि पूर्ण रूप से पारदर्शिता पर आधारित नहीं हैं इसलिए मात्र ढकोसला बन कर रह गए हैं ऐसे में इससे अच्छा यही है कि ''ब्लोगर मीट'' का आयोजन हो जहाँ हर कर्त्तव्य निष्ठ ब्लोगर को अन्य ब्लोगर का प्यार व् सराहना मिले कवि श्रेष्ठ ''दुष्यंत सिंह ''के शब्दों में मैंने उनके आलेख का यही मर्म समझा है-
   ''हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
   इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए.
   सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
    मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.''
                                  शालिनी कौशिक 
              शिखा कौशिक जी का आलेख आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं-
              

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अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान: में कलम से हाले दिल कहता गया ...समीरलाल उड़नतश्तर...

अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान: में कलम से हाले दिल कहता गया ...समीरलाल उड़नतश्तर...: "में कलम से हाले दिल कहता गया ...समीरलाल उड़नतश्तरी ख़यालों की उढ़ान, अपने हिंदी अल्फाजों में सजाकर ,ब्लोगिंग करने वाले, एक भारतीय शख..."
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में कलम से हाले दिल कहता गया ...समीरलाल उड़नतश्तरी

में कलम से हाले दिल कहता गया ...समीरलाल उड़नतश्तरी

   ख़यालों की उढ़ान, अपने हिंदी अल्फाजों में सजाकर ,ब्लोगिंग करने वाले, एक भारतीय शख्स, जिसे हिंदी ,हिंदीवासी  और भारतीयों से प्यार है, उस आदमी का नाम ,समीरलाल है, जिन्होंने जबलपुर से कनाडा तक का सफर तय करने के बाद भी ,भारतीयता और हिंदी का दामन ,नहीं छोड़ा है और इसीलियें ऐसी राष्ट्रप्रेमी हिंदी प्रेमी शख्सियत को खुद बा खुद सलाम करने को जी चाहता है ..........जबलपुर में रहने के बाद कनाडा के टोरंटो और फिर एजेक्स ओटोरीया कनाडा में बस जाने वाले भाई समीरलाल हिन्दुस्तानी है, इनका दिल हिन्दुस्तानी है ,इनकी लेखनी, इनकी जुबान ,और साहित्य ,हिन्दुस्तानी है, इनकी भाषा, हिन्दुस्तानी है ,और इसीलियें कहते है के सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा ..कनाडा में भाई समीरलाल  एकाउंटिंग सलाहकार के कार्य से जुड़े हैं,और रोज़गार के सिलसिले में कनाडा ही बस गए हैं ,लेकिन भारत से इनका जुड़ाव आत्मिक होने से वोह भारत और भारतीयों से लगातार जुड़े रहे हैं ..............
अखिल ब्राह्मण ब्लोगर  संगठन ....उड़नतश्तरी ....लाल और बवाल जुगलबंदी ...tech notes exchange .... जेसे ब्लॉग बनाकर, उनपर नियमित अपनी लेखनी के माध्यम से दस्तक देने वाले, पहले , ऐसे ब्लोगर हैं ,जो हर भारतीय ब्लोगर के ब्लॉग पर घूमते हैं, उसे पढ़ते हैं ,और फिर अपने प्यार भरे अल्फाज़ ,टिप्पणी के रूप में परोसते हैं ....इनके ब्लॉग का सारांश इन्होने ,,जान निसार अख्तर के एक शेर में समो दिया है वोह लिखते हैं ..और क्या इससे ज्यादा कोई नरमी बरतूं ..दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह ,इस शेर को अपने ब्लॉग पर सजा कर भाई समीरलाल जी ने अपने दिल की बात कह डाली  है, साथ ही भाई समीरलाल, विदेश में रहकर भी अपनी धर्म परम्पराओं को नहीं भूले हैं, उन्होंने इसी ब्लॉग पर हनुमान चालीसा.आरती संग्रह .......भी लगा रखा है ...भाई समीर लाल एक ऐसे ख्यातनाम लेखक हैं के इनकी ब्लोगिंग अधिकतम अख़बारों में छाई रहती है ,देश के हिंदी देनिक समाचार पत्रों में  इनके हिंदी ब्लोगिंग लेख व् रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं ......भाई समीरलाल साहित्य की दुनिया में पुस्तक प्रकाशन में भी नाम कमा चुके हैं शिवना प्रकाशन के माध्यम से इनका काव्य संग्रह  बिखरे मोती एवं उपन्यासिका.देख लूँ तो चलूं प्रकाशित हुई है जिसे देश के अधिकतम साहित्यकारों .ब्लोगरों और पत्रकारों ने सराहा है ..भाई समीर लाल केनेडा में रह कर भी, देश की हिंदी भाषा ,और पर्यावरण के प्रति चिंतित हैं वोह पर्यावरण के लियें .....धरा बचाओ पेढ़  लगाओं...... का नारा बुलंद करते हैं तो दुसरे तरफ हिंदी में लिखने की अपील इसी ब्लॉग पर करते हैं ...इनकी ब्लोगिंग मार्च २००६, में शुरू हुई लेकिन पहली रचना समीरलाल जी ने अपने ब्लॉग पर फरवरी के अंतिम सप्ताह में लिखी थी उन्होंने लिखा था ........मेरी शुरुआत एक प्रयास हिंदी में लिखने का हिंदी में ब्लोगिंग का मन करा इसलियें लिखना शुरू किया है,इनके इस लेख पर जिसमे समीरलाल जी ने गागर में सागर भर दिया था, कुल आठ टिप्पणियाँ आयीं और इनके पहले टिप्पणीकार,, भाई अनिल जी बन गए ................भाई समीर कहते हैं के खयालों की बेलगाम, उढ़ान कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप ,और कभी कविता के माध्यम से, विचार प्रस्तुत है .........वोह लिखते हैं ..हाल में लेकर कलम में हाले दिल कहता गया .....काव्य निर्झर आप ही बहता गया ...और यह सही भी है, के भाई समीरलाल के विचारों की उड़ान उडन तश्तरी के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी तश्तरी की तरह उडी के विश्व के विचारों का एक सतरंगी इन्द्रधनुष उड़न तश्तरी ब्लॉग में बना डाला है ........इनकी दूसरी रचना पंडित काली भीषण शर्मा पर है, और पहली काव्य रचना, कभी जी भर का ख़्वाब लिए है .........भाई समीर लाल का ब्लॉग लाल और बवाल जुगलबंदी में दो साथियों की जुगलबंदी की जोड़ी से ब्लॉग बना है जिसमे एक वकील साहब और एक जनाब खुद समीर लाल ने अपनी रचनाओं को पेश कर ब्लोगर्स को लुभाया है इनकी महत्वपूर्ण प्रासंगिक रचना में मेरे पिता ने रुपया छोड़ा नहीं होता ..मेरे भाई ने मुझ से मुंह मोड़ा नहीं होता काफी चर्चित रही है अब तक कुल २९९७०  लोगों की टिप्पणी एवं २२७५३२ लोगों की इनके ब्लॉग पर आवा जाहि प्राप्त कर चुके भाई समीरलाल जितने धार्मिक,जितने साहित्यकार जितने हिंदी प्रेमी जितने राष्ट्रीयता भाव रखने वाले है उतने ही भाई समीरलाल बहतरीन इंसान भी हैं और वोह सभी ब्लोगर्स से सम्पर्क कर प्यार बाँटने का काम भी करते रहते हैं .,इनकी एक मात्रत्व पर रचना आज के दिन प्रासंगिक है जो इन्होने वर्स २००६ में ही लिख डाली है ......इनके अंग्रेजी ब्लॉग में भी काफी लेख लिखे गए है जनाब ऐसे भारतवासी जो विदेश में रहकर भी अपनी मिटटी की खुशबु नहीं भूले हों यहाँ के मोसम ,यहाँ के त्यौहार ,यहाँ की समस्याओं ,यहाँ के लोगों के आचार विचार पर ब्लोगिंग करते हों यहाँ की भाषा को अपनाकर दूसरों को भी अपनाने की सलाह देते हों ऐसे राष्ट्रीय ब्लोगर,हिंदी साहित्यकार भाई समीरलाल की वैचारिक उड़ान की उडनतश्तरी को सलाम .............अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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'ब्लोगर सम्मान परम्परा का ढकोसला बंद कीजिये !''


'ब्लोगर सम्मान परम्परा का ढकोसला बंद कीजिये !''
इस आलेख का जन्म वर्तमान में ब्लोगिंग जगत में चल रही ''ब्लोगर सम्मान समारोह परम्परा 'के प्रति मेरे मस्तिष्क में चल रही उधेड़-बुन से हुआ .सम्मान पाना सभी चाहते हैं और इसमें कोई बुराई भी नहीं है किन्तु ब्लॉग-जगत में जो भी सम्मान प्रदान किये गए उनका आधार क्या है ?इसकी कोई ठोस जानकारी तथाकथित सम्मान सम्मलेन आयोजित करने वालों ने अंतर्जाल पर नहीं डाली.आखिर क्या हैं ये आधार -

१-क्या किसी ब्लॉग के समर्थकों के आधार पर उसे सर्वश्रेठ ब्लोगर चुना जाता है ?

२-क्या ब्लॉग पर आने वाली टिप्पन्नियों की संख्या के आधार पर सर्वश्रेठ ब्लोगर का चुनाव होता है ?

३-आप किन ब्लोग्स को किस आधार पर सम्मान प्रदान करने हेतु विश्लेषण के लिए चुनते हैं?

४-नन्हे ब्लोगर का चयन किस आधार पर करते हैं जबकि सभी जानते हैं की नन्हे ब्लोगर स्वयं ब्लोग्स पर पोस्ट नहीं डालते उनके माता-पिता ही ये काम करते हैं ?

५-किसी बलोगर की टिपण्णी और ब्लोगर्स से श्रेठ है इसका क्या आधार है ?

६-ऐसा क्या खास है सम्मान पाने वाले ब्लोगर में जो उसे अन्य ब्लोगर से श्रेष्ठ  बनता है ?क्या उसकी लेखन क्षमता अन्य ब्लोगर्स से श्रेष्ठ है ?

७-ब्लोग्स को  किन किन kश्रेणियों  में बांटा गया -राजनैतिक,सामाजिक ,अथवा-साहित्यिक  विधा के आधार पर पर-कविता,कहानी,लघु कथा,आलेख आदि ?

                                    हो सकता है मेरा ज्ञान कम हो किन्तु मैंने सम्मान प्राप्त करने वालों की सोची तो देखी,फोटो भी देखे पर सम्मान किस आधार पर प्रदान किये गए इस सम्बन्ध में एक भी पोस्ट सम्मान आयोजित करने वालों की और से अंतर्जाल पर डाली गए हो मैंने नहीं पढ़ी  . 
                                   इस परम्परा में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है .अभी से ही ब्लॉग जगत दो धडों में टूटता नज़र आ रहा है .मेरी समझ में नहीं आता की आखिर सम्मान की जरूरत क्या है ?मैं तो जिस भी ब्लॉग पर जाती हूँ मुझे तो ख़ुशी होती है की यहाँ पर भी एक नया ब्लोगर अपनी समस्त दुनिया को अपनी नज़र से हमारे समक्ष रख रहा है .सम्मान तो सभी के विचारों का किया जाना चाहिए .ये क्या की इसके विचार उससे बेहतर है ?
                                    इस सन्दर्भ में ''ब्लोगर मीट ''बहुत उपयोगी हो सकती हैं .ये समाज व् राष्ट्र की समस्याओं को सुलझाने की दिशा में सार्थक पहल कर सकती हैं .हर ब्लोगर का सम्मान कीजिये-सम्मान समारोह द्वारा नहीं उसका उत्साहवर्धन करके .उसकी सोच को सराह्कर.
                               ''ये ब्लोगर बेस्ट है ''कहने से ही तो सम्मान नहीं होता ये परम्परा ब्लोगर्स के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के स्थान पर कटुता की खाई ही चौड़ी करेगी .ब्लोगिंग की बगिया को फूलों से महकने दे नफरत के कांटे निकाल फेकिये .सम्मान परम्परा सभी ब्लोगर आपस में एक दूजे के ब्लोग्स पर सार्थक व् सटीक टिपण्णी देकर निभा ही रहे हैं.सभी बेस्ट ब्लोगर हैं .सभी अच्छा लिख रहे हैं ,सभी अच्छी टिपण्णी कर रहे हैं ,सभी लघु कथाएं सार्थक मुद्दे उठा रही हैं .सभी कवितायेँ दिल को छू रही हैं और .....सभी का सम्मान हमारे ह्रदय में समान रूप से है .आगे जब भी कोई सम्मान समारोह हो आप उसका बहिष्कार करें.सम्मान प्राप्त करने के स्थान पर सभी को सम्मान देने की वकालत करें ऐसा मेरा आपसे अनुरोध है .क्या आप मुझसे सहमत नहीं ?
                                                    शिखा कौशिक 
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माँ रोती है ..........

माँ रोती है ..........

माँ रोती है ..........
जी हाँ 
माँ तो रोती ही है .
बच्चा जब माँ के गर्भ में होता है 
प्रसव पीड़ा से तड़प कर तब  माँ रोती है .
बच्चा जब बीमार होता है 
तब भी माँ ममता के दर्द से तडप कर रोती थी .
जी हां बच्चा जब भूखा रहता था रोती नहीं खाता था 
तब भी माँ बच्चे के भूखा होने पर रोती थी 
आज बच्चा बढा हो गया है 
बीवी के कहने में आकर 
माँ से अलग हो गया है 
माँ भूखी रहती है 
बच्चा उसे रोटी नहीं देता  
इसीलियें आज भी 
बूढी माँ बेचारी रोती है 
अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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अंदाज ए मेरा: मां

अंदाज ए मेरा: मां: "मां। दुनिया का सबसे प्‍यारा शब्‍द। दुनिया में कई रिश्‍ते होते हैं लेकिन शायद ही ऐसा कोई रिश्‍ता होगा जो सिर्फ एक अक्षर में सिमटा हो, लेकिन ..."
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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