ब्लॉगर्स मीट वीकली (36) Vajr aasan

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  • Saturday, March 24, 2012
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • साथियों सबसे पहले
    हिंदू नव संवत्सर 2069 की शुभकामनाएं स्वीकार कीजिए और पढ़िए एक उम्दा लेख
    posted by DR. ANWER JAMAL at Blog News - 12 hours ago
    होली आकर जा चुकी है और नया हिन्दू वर्ष आरम्भ हो गया है .

    अब एक सूचना- प्रेरणा अर्गल जी फिर से कुछ दिनों के टूर पर हैं लिहाज़ा लिंक चयन हमें अकेले ही करना है। जिनका लिंक रह जाए वे ईमेल से भेज दें, मीट में लगा दिया जाएगा। मजबूरी भी है। कल सहारनपुर में एक अंतधार्मिक महासभा है। उसमें शामिल होना है।

    हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल पर पेश की गई हफ़्ते पर की पोस्ट्स का ज़ख़ीरा पेशे खि़दमत है-

     ग़ज़लगंगा.dg: आदमी के भेष में शैतान था -Devendra Gautam


    हे!माँ मेरे जिले के नेता को सी .एम् .बना दो.


  • शालिनी कौशिक



  • हे!माँ  मेरे जिले के नेता  को  सी .एम् .बना  दो.       

    अरे भई साधो......: गरीबी मिटाने का नायाब फार्मूला

    Devendra Gautam

    और काबा में राम देखिये



  • श्यामल सुमन 


  •  है साजिश, परिणाम देखिये

    ब्लॉग जगत में सैर करते हुए सबसे पहले श्री जी के ब्लॉग पर जाना हुआ तो पता चला कि वह आर्ट ऑफ़ लिविंग का वह कोर्स भी करने गए थे जिसे कराने वाले श्री श्री एक बार हमारे यहां आए थे।

    My Photo

    लगता है बहक गए हैं श्री श्री ...

    मैने सोचा नहीं था कि कभी मुझे आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर को कटघरे में खड़ा करना पड़ेगा। मैं जानना चाहतां हूं कि श्री श्री को हो क्या गया है, आप कह क्या रहे हैं, इसका मतलब समझ रहे हैं। देश के सरकारी स्कूलों में पढने वाले बच्चे हिंसक और नक्सली हैं, कभी नहीं। मैं आपकी बात को सिरे से खारिज करता हूं। बहरहाल  मैं इस बात में नहीं जाना चाहता कि आप लोगों को जो जीवन जीने की कला ( यानि आर्ट आफ लीविंग) का ज्ञान दे रहे हैं, वो ठीक है या नहीं। लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि ये सब देश के आम आदमी के लिए नहीं है, ये तथाकथित बड़े लोगों   (यानि पैसे से मजबूत) लोगों का चोचला भर है।

    जीवन के अलग अलग रंग होते हें और सबके संघर्ष का रंग भी अलग अलग होता है किसी के लिए vah किस रूप में सामने आता है और उसको कौन कैसे अपने ढंग से अपने अनुकूल बना कर आगे चलता है कि वह सारी चुनौती अपने पैर समेट कर पीछे हो जाती है। आज अपनी कहानी सुना रहे हें डॉ अनवर जमाल खान --

    चुनौती जिन्दगी की: संघर्ष भरे वे दिन (१६)



    सन 2020 तक भारत में काम करने लायक़ लोगों का प्रतिशत कुल आबादी का 64 प्रतिशत हो जाएगा। इनकी आयु 15-59 होगी । समाजशास्त्रियों को डर है कि रोज़गार के अवसर देकर इस ऊर्जा का रचनात्मक उपयोग न किया गया तो भारत एक भयंकर गृहयुद्ध में फंस जाएगा। भारत को विनाश से बचाना है तो हरेक हाथ को काम देना होगा




    मैं धरा हूँ
    रात्रि के गहन तिमिर के बाद
    भोर की बेला में


    पुस्तक परिचय-21
    08102009148_editedमनोज कुमार

    17 comments:

    Devendra Gautam said...

    इतने सारे लिंक्स..वह भी चुनिंदा,,,वाह! मज़ा आ गया..मेरे लिंक्स भी शामिल...शुक्रिया!

    रविकर said...

    आभार भाई जी ।

    Asha Saxena said...

    कई सुन्दर लिंक्स से सजी ब्लोगर्स मीट३६ बहुत अच्छी रही |
    आशा

    शिखा कौशिक said...

    bahut achchhe links .meri post ko yahan sthan dene hetu hardik dhanyvad .

    महेन्द्र श्रीवास्तव said...

    सुंदर लिंक्स
    इस बार काफी पहले ही आपने पोस्ट कर दिया,
    मुझे तो सोमवार का इंतजार रहता है।
    बहरहाल मुझे भी स्थान देने के लिए शुक्रिया

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ Mahendra ji ! is baar dedh ghanta pahle post publish kar di kyonki Prerna ji bhi bahar thin aur hamen bhi bahar jana tha . aaj laut kar aaye hain.

    Sadhana Vaid said...

    बहुत सुन्दर मीट है अनवर भाई ! आजकल प्रवास पर हूँ इसलिए देर से देख पाई ! क्या ब्लॉगर मीट का दिन बदल दिया गया है ? मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया व आभार !

    संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

    umda links saheje achchhi bloger's meet

    Kailash Sharma said...

    बहुत सुंदर लिंक्स...आभार

    सदा said...

    बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स का चयन किया है आपने ...आभार ।

    Udan Tashtari said...

    आभार लिंक्स के लिए.

    चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह! बेसुरम की कई पोस्ट आपने शामिल किया जिसमें मेरी भी है आभार

    Dr. Ayaz Ahmad said...

    Umda meet .

    yhan bhi dekhiyega---

    http://drayazahmad.blogspot.in/2012/03/36-vajr-aasan.html

    मनोज कुमार said...

    एक से एक उम्दा लिंक्स। इस टीम को आभार।
    हमारे पोस्ट को स्थान दिया इसके लिए शुक्रिया।

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    बहुत उम्दा!

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    क्या नवसम्वतसर की जगह हिन्दू नवसम्वतसर लिखना जरूरी था?

    DR. ANWER JAMAL said...

    अविष्कारक का ज़िक्र ज़रूरी है
    @आदरणीय रूपचंद शास्त्री जी ! चैत्र मास से आरंभ होने वाला यह कैलेंडर हिंदू वैज्ञानिकों ने दिया है। यह कौन सा तरीक़ा है कि देन से तो लाभ उठाया जाए और देने वाले को भुला दिया जाए ?
    ऐसा करना हमें ठीक न लगा सो इस कैलेंडर के अविष्कारकों को भी याद किया गया है।
    तरीक़ा भी यही है कि जब आर्किमिडीज़,न्यूटन और आइन्सटीन आदि का नियम बताया जाता है तो पहले उनका नाम लिया जाता है, उनका नियम बाद में बताया जाता है ताकि याद रहे कि यह नियम हमें किस महान वैज्ञानिक ने बताया है ?
    जिन लोगों ने ऐसा नहीं किया, उन्होंने हिंदू कैलेंडर के महान अविष्कारकों को भुला दिया है।
    यही कारण है कि आज कोई भी नहीं बता सकता कि हिंदू कैलेंडर का अविष्कार कितने वर्ष पहले और किस ऋषि ने किया था और किन किन ऋषियों ने इसमें किस किस समय पर कितने बदलाव किए ?
    दुख की बात यह है कि सब जगह नव सम्वतसर के अवसर पर ब्रह्मा जी का ज़िक्र किया जाता है लेकिन बताया जाता है विक्रम संवत। ब्रह्मा जी का सृष्टि संवत का ज़िक्र ग़ायब कर दिया जाता है।
    ब्लॉग जगत की पोस्ट्स इसका उदाहरण है।

    हम अब्राहम को याद करें और आप ब्रहमा जी को याद रखें तो इससे हमारे दिलों में हमारे पूर्वज की याद तो बनी रहेगी और तब किसी दिन पता चलेगा कि हमारा परमेश्वर ही नहीं हमारा पूर्वज भी एक ही है।
    तब हिंदू, मुस्लिम, यहूदी और ईसाई शब्द पर्यायवाची बनकर रह जाएंगे।

    Brahma और Abraham शब्द लिखकर गूगल सर्च के ज़रिये देखते हैं तो इस विषय पर अथाह जानकारी सामने आ जाती है।
    धन्यवाद !

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