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Quranic Healing क़ुरआन के तरीक़े से हर बीमारी का इलाज मुमकिन है

सेहत आज एक बड़ा मसला बन गई है। तन और मन के पुराने रोगों के अलावा नए नए नाम से बहुत से रोग सामने आ रहे हैं। डॉक्टर और अस्पतालों की बढ़ती संख्या के साथ बीमारों और दवाओं की संख्या भी बढ़ रही है।
दिल, गुर्दे और लिवर की फ़ेल होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। नामर्दी और बांझपन के केसेज़ बढ़ रहे हैं। जुर्म और ज़ुल्म के वाक़यात बढ़ रहे हैं।
अमीरी और ग़रीबी के बीच फ़ासला बढ़ रहा है। जिनके पास दुनिया की ऐश के सारे सामान हैं वे भी उसी तरह निराश और दुखी हैं जैसे कि वे, जिनके पास ‘नहीं’ है।
इस सबके बीच एक सबसे अच्छी बात यह हुई कि मॉडर्न साईन्स ने यह साबित कर दिया है कि बीमारियाँ अपनी नेचर में मनोदैहिक यानि सायकोसोमैटिक होती हैं। तन और मन का आपस में सम्बन्ध है।
मनुष्य का रक्त अपनी नेचर में अल्कलाईन है। जब ग़लत खान पान से इसमें एसिड बढ़ जाता है तो इसमें ऑक्सीजन का लेवल डाउन हो जाता है।

मनुष्य का शरीर ख़ुशी की मनोदशा में सबसे अच्छा काम करता है। जब ग़लत तरह से सोचने के नतीजे में मन में चिन्ता और डर समा जाते हैं तो ख़ुशी ख़त्म हो जाती है। इससे ऊर्जा का लेवल डाउन हो जाता है।
जब इन्सान अपनी तन और मन की नेचर को बदल देता है तब उसके तन और मन में बिगाड़ आना शुरू हो जाता है। इसके बाद वह बीमारी, झगड़े, क़जऱ् और ग़रीबी के हालात का शिकार होने लगता है। ये हालात बहुत हो सकते हैं। इन सब हालात को गिना नहीं जा सकता लेकिन इन सबको सिर्फ़ एक चीज़ से मिटाया जा सकता है।
इन्सान अपनी नेचर को पहचाने, जिस पर उसे रब ने पैदा किया है और उसकी तरफ़ पलट कर आए। यही रब की तरफ़ पलटकर आना यानि तौबा करना कहलाता है।
जिन कामों से मन को शाँति मिलती है, उनमें रब के साथ होने और उसके मेहरबान और मददगार होने जैसे गुणों को याद करना भी है। नमाज़ का मक़सद ही रब को याद करना ही है। यह पाँच समय तो अनिवार्य है ही, इनके अलावा पचास तरह की नफि़ल नमाज़ और भी हैं।
खाने पीने में हलाल और हराम तय करने और रोज़ों का फ़ायदा भी शरीर को मिलता है। शरीर से एसिड कम होता चला जाता है।
तिब्बे नबवी की सादा और पौष्टिक डाइट से सारे टॉक्सिन्स शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जो कि सब रोगों का कारण बनते हैं।
पानी और शहद का काफ़ी इस्तेमाल और क़ुरआन का बहुत ज़्यादा पढ़ना तन और मन को शुद्ध और निरोगी करने का यक़ीनी तरीक़ा है।
जो लोग क़ुरआन पढ़ नहीं सकते, वे ईयर फ़ोन के ज़रिये सुनते रहें तो भी उनके मन को शाँति मिलेगी, जो कि भौतिक जगत का सत्य बनकर प्रकट होगी।
यह सबसे आसान और नेचुरल तरीक़ा है। इसे साईन्स प्रमाणित करती है।
इसे सीखकर आप सेहतमन्द रह सकते हैं। किसी इन्सान को आप किसी ऐसे रोग से पीडि़त पाएं, जिसे एलोपैथी में लाइलाज माना जाता है तो आप उसे कहें कि वह अपना एलोपैथिक इलाज जारी रखे और हमारा बताया हुआ तरीक़ा भी शुरू कर दे। जिससे उसके शरीर और मन से ज़हर दूर हो जाएगा। वह ठीक हो जाएगा।
मन के ज़हर को दूर कीजिए, शरीर से ज़हर को निकालिए।
जो विचार मन की शांति का नष्ट करते हैं, वे मन के लिए ज़हर का काम करते हैं।
जो तत्व शरीर को नुक्सान पहुंचाते हैं। वे शरीर का कचरा हैं।
यह कचरा शरीर की कोशिकाओं से केवल तब निकलता है जबकि मन शाँत हो। क़ुरआन मन को शाँति देता है। इसके साथ जब आप शहद और पानी पीते हैं तो शरीर का सारा कचरा बाहर आ जाता है।
यह बार बार का आज़माया हुआ साईन्टिफि़क फ़ैक्ट है।

इस एक काम से आप सब रोगों की जड़ काट देते हैं। अपनी और अपने परिवार की सेहत के लिए आप इसे आज़मा कर देखिए। यह बिल्कुल फ़्री सिखा रहे हैं और वह भी घर बैठे। किसी को और ज़्यादा पूछना हो तो हमसे पूछ ले।
हम आपके शुक्रगुज़ार हैं। इस ज्ञान को दूसरों को शेयर कीजिए। वे भी आपके शुक्रगुज़ार होंगे।
आने वाले समय में ज़्यादातर लोग मन की शक्ति से निरोग होना सीख लेंगे। इन शा अल्लाह!
-डॉ. अनवर जमाल
My Email:hiremoti@gmail.com

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Positive Mind, Positive Life

दोस्तों! यह साल अच्छा है और अपना हाल भी अच्छा है.
सबकी भलाई की नीयत से हम अच्छे काम कर रहे हैं.
सबका भला हो, आप भी ऐसे ही कामों को अंजाम दे रहे होंगे. ऐसी आशा है.

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नया साल 2016 आप सबको मुबारक हो

आप सबको नया साल २०१६ मुबारक हो.
रब की रहमत सबके काम बनाती आ रही है और वही हमें अपनी रहमत से कामयाबी दे. आमीन.

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Golden World यक़ीनन आपका कल सुनहरा है

प्रश्नः अनवर साहब, आज जो विश्व में हो रहा है, उसका उपसंहार क्या होगा? आप एक क़ाबिल इंसान हैं, आप कल को कैसा पाते हैं?
हमारे ब्लाॅग के एक क़ाबिल पाठक भाई दशरथ दुबे जी ने यह सवाल हमसेपिछली ब्लाॅग पोस्ट पर किया है।
इसके जवाब में यह पोस्ट हाजि़र है।
उत्तरः जो कुछ विश्व में कल हुआ था, उससे आज के हालात बने और ये बहुत अच्छे हालात हैं, इनमें कुछ हालतें जीवन के खि़लाफ़ हैं लेकिन यही हालतें वास्तव मे जीवन को सपोर्ट करती हैं जैसे कि रात का अंधेरा दिन के उजाले के ठीक उलट दिखता है लेकिन रात का अंधेरा हमारे जीवन के लिए उतना ही ज़रूरी है, जितना कि दिन का उजाला।
तनाव, दंगे और जंगें, जो आज दुनिया में दिखाई दे रही हैं, ये सब शांति की शदीद ज़रूरत का एहसास करवा रही हैं।
यहां ‘डिमांड एंड सप्लाई’ का नियम काम कर रहा है। शांति की मांग का मतलब है कि शांति की सप्लाई यक़ीनी है। यह प्रकृति का नियम है। यह हर हाल में हो कर रहने वाली बात है।
आप देखेंगे कि आज विश्व में पहले से कहीं ज़्यादा संस्थाएं विश्व शांति के लिए काम कर रही हैं।
उन सबकी नीयत और मेहनत हमें यक़ीन दिलाती है कि हमारा कल सुरक्षित है और वह सुनहरा भी है।
हक़ीक़त यह है कि हमें दुनिया ठीक नज़र आएगी, अगर हम उसे ठीक नज़रिए से देखना चाहें।
दुनिया की घटनाओं से हमारा विश्वास हरगिज़ प्रभावित न होना चाहिए बल्कि हमें उससे उसकी ज़रूरत को समझकर उसके साॅल्यूशन तक पहुंचना चाहिए और फिर पूरे विश्वास के साथ उस साॅल्यूशन को दुनिया में वुजूद में लाने की कोशिश करनी चाहिए।
हमारी आज की नीयतें और अमल ही हमारे कल को तय करती हैं।
...और हरेक व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने कल के लिए क्या भेजा है?
पवित्र क़ुरआन 59:18
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आतंकवाद:मीडिया के कट पेस्ट का कमाल

आतंकवाद को दुनिया का मीडिया कैसे दिखाता है और उसे समझदार लोग कैसे देखते हैं, इसका पता आज अचानक तब चला, जब जल्दी की वजह से ब्लाॅगर की स्पेलिंग टाईप यह हो गईं-
http://blogg.com/
...और नज़र आए यह कार्टून-



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पतंजलि के योग दर्शन में सूर्य नमस्कार नहीं है

पतंजलि के योग दर्शन में सूर्य नमस्कार नहीं है। सूर्य नमस्कार तो क्या उसमें सुखासन के सिवा और कोई दूसरा आसन ही नहीं है। योग करने के लिए सुखासन काफ़ी है। योग है चित्त की नकारात्मक वृत्ति का निरोध करना। सुखासन में बैठो और अपने चित्त की वृत्ति का निरोध करते रहो। इसमें किसी मुसलमान को कोई आपत्ति नहीं होगी लेकिन जब योग के नाम पर शिर्क और कुफ्र (मिश्रकपन और नास्तिकता) थोपा जाएगा तो उसे वही क़ुबूल करेगा जिसे सत्य, तथ्य और अध्यात्म का ख़ाक पता नहीं है। ऐसे ही गुरू आज विश्व में योग के प्रचारक बने घूम रहे हैं।
हमने योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में डिप्लोमा किया है, जो इस बात का सुबूत है कि मुसलमानों योग का नहीं बल्कि कूटनीतिक हथकंडों का विरोध करते हैं।
आओ सब मिलकर नमाज़ अदा करें, जो कि संतुलित और पूर्ण योग है, सरल है।

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क़ुदरती आफ़तें हमें एक होने का अहसास कराती हैं

नेपाल से चले भूकम्प में बहुत इन्सान मरे हैं। वे सभी हमारे भाई-बहन थे और उनके पीछे जितने लोग जि़न्दा बचे हैं, वे भी हमारे भाई-बहन ही हैं। हमारी मान्यताएं और हमारी परम्पराएं अलग हो सकते हैं लेकिन हमारे दुख-दर्द अलग नहीं होते। ऐसे समय में भी एक साहब मुसलमानों को बुरा भला कह रहे हैं और दूसरे बहुत से उनसे सहमत हो रहे हैं। ऐसी शिक्षा हिन्दू धर्म नहीं देता। इन्सानियत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखना इन्सानियत से गिरना है।
कहीं पानी का सैलाब आता है या जंगल में आग लगती है तब भेडि़ए और बकरे भी एक साथ जान बचाने की कोशिश करते हैं। ऐसे समय में वह भी शिकार नहीं करते। हम सबकी भलाई और तरक़्क़ी की दुआ करते हैं। हमारी चेतना पवित्र और कल्याणमयी होगी तो हम सब ज़लज़ले जैसी प्राकृतिक आफ़तों को निमन्त्रित नहीं करेंगे। ये सब हमारे सूक्ष्म चिन्तन और कर्मों के असन्तुलन का भौतिक रूप है। हम सभी ईश्वर की इन चेतावनियों पर ध्यान देकर अपने चिन्तन और कर्मों को शुद्ध और कल्याणकारी बनाएं। यही हमारा मक़सद होना चाहिए।
हम सबका दुख-दर्द और उसका अहसास एक है। हम सब एक हैं। हमारा कल्याण भी एक ही बात से, सत्य से होता आया है और इसी से अब होगा।


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शिव जी थे पहले मुस्लिमःMufti Ilyas

इस बयान को नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर ‘अभी अभी’ काॅलम के तहत प्रकाशित किया गया है। देखिए पूरी ख़बर-

शिव थे मुस्लिमों के पहले पैगंबर: जमीयत उलेमा

मनोज पांडेय, फैजाबाद 
जमीयत उलेमा के मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने अयोध्या में चौंकाने वाला बयान देते हुए कहा कि भगवान शंकर मुस्लिमों के पहले पैगंबर हैं। उन्होंने कहा कि इस बात को मानने में मुसलमानों को कोई गुरेज नहीं है।

Jamiat Ulema's Mufti Muhammad Ilyas

जमीयत उलेमा का एक डेलिगेशन बुधवार को अयोध्या आया था। जमीयत उलेमा 27 फरवरी को बलरामपुर में कौमी एकता का कार्यक्रम करने जा रहा है। इसी सिलसिले में वह अयोध्या के साधु-संतों को कार्यक्रम में हिस्सा लेने की अपील करने आए थे। मौलाना ने कहा कि मुसलमान भी सनातन धर्मी है और हिंदुओं के देवता शंकर और पार्वती हमारे भी मां-बाप है। उन्होंने आरएसएस के हिंदू राष्ट्र वाली बात पर कहा कि मुस्लिम हिंदू राष्ट्र के विरोधी नहीं हैं।
मुफ्ती मोहम्मद इलियास ने कहा कि जिस तरह से चीन में रहने वाला चीनी, अमेरिका में रहने वाला अमेरिकी है, उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। यह तो हमारा मुल्की नाम है। उन्होंने कहा कि जब हमारे मां-बाप, खून और मुल्क एक है तो इस लिहाज से हमारा धर्म भी एक है। इस दौरान मुस्लिम डेलिगेशन ने राम जन्मभूमि के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास और शनि धाम के महंत हरदयाल शास्त्री के साथ मिलकर आतंकवाद का पुतला फूंका।
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इस बयान में मुफ़्ती इलियास साहब ने जो कहा है, उसका अर्थ यह है कि कुछ ऐसे महापुरूष हुए हैं जिन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही मानते हैं। हिन्दू भाई-बहन उन्हें अपनी भाषा में अलग नाम से याद रखे हुए हैं और उन्हीं महापुरूषों को मुस्लिम अलग भाषा में अलग नाम से जानते हैं। इस बयान के देने वााले मुफ़्ती साहब ने बरसों के तुलनात्मक अध्ययन किया है।
उनके इस बयान पर एक दूसरी जगह यह रद्दे-अमल ज़ाहिर किया गया है-
Mufti Mukarram Ahmed, Imam of Fatehpuri Masjid, rejected Ilyas’s statements.
“We don’t accept what he said, it’s completely wrong. It’s no where written in Quran. This could be his political statement,” Mukarram said.
फ़तेहपुरी मस्जिद के इमाम मुफ़्ती मुकर्रम साहब के द्वारा इस बयान को नकारे जाने का कारण यह है कि उन्होंने हिन्दू भाईयों के धर्मग्रन्थों को नहीं पढ़ा है। पहले पैग़म्बर का नाम क़ुरआन में आदम आया है जो कि आदिम् का बदला हुआ रूप है और यह शब्द संस्कृत की धातु ‘आद्य’ से बना है। आदम अ. की कथा भविष्य पुराण में आई है, जिसे सभी मुफ़्ती-मौलवियों को पढ़ना चाहिए। इससे दूरियां कम होंगी और एक मां-बाप की सारी औलाद ख़ुद को एक परिवार के रूप में देखने लगेगी।
विद्वानों ने माना है कि पुराण कथाओं में समय समय पर वृद्धि और क्षेपक हुए हैं लेकिन आज भी उनमें सच्चाई को तलाश किया जाता है तो वह मिल जाती है। सभी धर्मों विद्वानों को मिलकर यह कोशिश करनी चाहिए कि समान बातों को सामने लाया जाए।
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को ईसाई लोग क्राइस्ट के नाम से और अय्यूब को जाॅब के नाम से मानते हैं जबकि क़ुरआन में क्राइस्ट और जाॅब नाम नहीं आए है। इसके बावजूद मुस्लिम आलिम समझ लेते हैं कि ईसाई क्राइस्ट और जाॅब किसे कह रहे हैं क्योंकि उनकी किताबों सैकड़ों साल तक पढा है। हिन्दू धर्मग्रन्थों को भी जानने समझने की कोशिश की गई होती तो दोनों समुदायों को ऐसे कई महापुरूष मिल जाते, जिन्हें दोनों ही आदर देते हैं। इस विषय पर हम दिनांक 22 मार्च 2010 को एक लेख लिख चुके हैं-

क्या काबा सनातन शिव मंदिर है ? Is kaba an ancient sacred hindu temple?

अच्छी ख़बर यह है कि आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी साहब की कोशश से इस तरफ़ पहल की जा चुकी है। मुफ़्ती इलियास साहब का बयान उसी की एक बानमी है।

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ओरिजिनल कारण केजरी की जीत का और केसरी की हार का

क्या भाजपा यह रियालाइज़ कर पायेगी कि दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल जी को ख़ुद भाजपा ने ही जिताया है. कैसे? अरविन्द केजरीवाल जी को मुसलमानों ने एकमुश्त वोट डाला, जिसकी वजह से वह ऐतिहासिक जीत हासिल कर सके. मुसलमानों को ऐसी वोटिंग करने के लिए मजबूर किया आगरा में मुसलमानों का धर्मान्तरण करवाने और हिन्दुत्वियों की बयानबाज़ी ने. भाजपा के केन्द्र में आते ही वे दावे कर रहे थे कि सन 2021 तक भारत के सब लोगों को हिन्दू बना लिया जाएगा. लिहाज़ा जिसे मुस्लिम ही रहना पसन्द था उसके लिये अरविन्द को जिताना उसकी मजबूरी बना दिया ताकि भाजपा की जीत पर और हिन्दुत्वियों की जीभ पर विराम लग सके ...और तुरंत ही लग भी गया है. अपना दांव उल्टा पड गया है. अब आगे आगे देखिये कि अति उत्साही और अदूरदर्शी ह़िन्दुतवी भाजपा के लिये क्या करते है? फिलहाल तो केजरीवाल जी को गुजरात में मिलने का समय न देने वाले मोदी जी को हमने आज के अखबार में साथ साथ बैठे बतियाते देखा है, बहुत बढिया मुद्रा में. मालिक सबका भला करता है और सबके प्रयास का फल अवश्य देता है.
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वीर अब्दुल हमीद जैसों की शहादत को भूल जाने वालों के लिए कोई भला अपनी जान क्यों देगा?

वीरों की शहादत को भूल जाने वालों के लिए कोई भला अपनी जान क्यों देगा?  वीर अब्दुल हमीद शहीद के घर वाले जानते हैं या फिर थोड़े से और लोग कि आज 4th बटालियन, ग्रेनेडियर में तैनात हवालदार अब्दुल हमीद की शहादत दिन है। 1965 युद्ध में पाकिस्तानी सेना का सीना चीर कर उस समय के अपराजेय माने जाने वाले उसके "पैटन टैंकों" को तबाह कर देने वाले 32 वर्षीय वीर अब्दुल हमीद आज ही के दिन खेमकरण सेक्टर, तरन तारण में शहीद हुए थे.
क्या इस देश में कहीं सार्वजनिक रूप से वीर अब्दुल हमीद को याद किया गया? अगर नहीं तो हरेक को चाहिए कि वह बेईमान हाकिम कि शिकायत करने के बजाय अपने चेहरे धूल साफ़ करे. इसी से हालात बदलेंगे.

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जंगे-आज़ादी के नायक अशफाक उल्ला खान

इंसान को अपनी बेहतरी के लिये खुद ही संघर्ष करना पड़ता है.
हरेक इंसान को जानना चाहिये कि उसके लिये क्या बेहतर है ?
आज़ादी की सालगिरह मुबारक.
देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे।अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह-तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहाकि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजादहोकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था,तुम लोग हिन्दू-मुसलमानो में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते।उनके इस जवाब से अंग्रेज दंग रह गये उन्होने कहा भारतमाँ अगर हिँदुओ की माँ है तो हम मुस्लमान भी इसी माँ के लाल है अब हिन्दुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा। 22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्लाखान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
अशफाक पर गांधी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। जो कि अशफाक के बचपन के मित्र थे । बिस्मिल औरचंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी,ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। एक-एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई।
अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिएबाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया।
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हुमायूं और कर्मावती के बीच का प्रगाढ़ रिश्ता और राखी का मर्म


भारतीय नारी का एक रूप ‘बहन‘ भी है और भारतीय पर्व और त्यौहारों की सूची में एक त्यौहार का नाम ‘रक्षा बंधन‘ भी है। जहां होली का हुड़दंग और दीवाली पर पटाख़ों का शोर शराबा लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है और उनके पीछे की मूल भावना दब जाती है वहीं रक्षा बंधन का त्यौहार आज भी दिलों को सुकून देता है। यह त्यौहार मुझे सदा से ही प्यारा लगता आया है।

यह पर्व भाई-बहन के बीच पवित्र स्नेह का द्योतक भी है। बहन भाई की कलाई पर रेशम की डोरी यानी राखी बांधती है आरती उतार कर भाई के माथे पर टीका लगाती है तथा सुख एवं समृद्धि हेतु नारियल एवं रूमाल भाई को भेंट स्वरूप देती है। भाई भी बहन की रक्षा के संकल्प को दोहराते हुए भेंट स्वरूप कुछ रुपये अथवा वस्तुएं प्रदान करता है।
इतिहास में एक अध्याय कर्मावती व हुमायूं के बीच प्रगाढ़ रिश्ते और राखी की लाज से जुड़ा है। कर्मावती ने हुमायूं को पत्रा भेज कर सहायता मांगी थी। बादशाह हुमायूं ने राखी की लाज निभाते हुए अपनी राजपूत बहन कर्मावती की मदद की थी। अतः रक्षाबंधन हमारे लिए विजय कामना का भी पर्व है।

हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए। 
इस त्यौहार के पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है, जो इस प्रकार है : 
उस दिन श्रावणमास शुक्ल की चतुर्थी थी। दूसरे दिन प्रातः इंद्र देवता की पत्नी ने गुरू बृहस्पति की आज्ञा से यज्ञ किया और यज्ञ की समाप्ति पर इंद्र की दाई कलाई पर ‘रक्षा‘-सूत्रा’ बांधा। तत्पश्चात देव-दानव युद्ध में देवताओं को जीत की प्राप्ति हुई। कहा जाता है तभी से श्रावणी की पूर्णिमा को रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
प्राचीन काल में शिष्य अपने गुरूओं के हाथ में सूत का धागा बांधकर उनसे आशीष प्राप्त करते थे। ब्राह्मण भी हाथ में सूत का धागा बांध कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। रक्षाबंधन भले ही हिंदुओं का पावन पर्व है किंतु दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी स्वेच्छा से रक्षा बंधन पर्व में अपनी आस्था व्यक्त की है।

समयानुसार सभी पर्व प्रभावित हुए हैं। रक्षाबंधन भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाया। रेशम की डोरी की जगह फैंसी राखियां चलन में आ गई। हमारी अर्थव्यवस्था में रक्षाबंधन पर्व के महत्त्वपूर्ण योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। करोड़ों रूपयों का कारोबार लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान कर रहा है।
ज्वैलरी मार्केट में भी रक्षाबंधन के दौरान उछाल आ जाता है। मिठाइयां, ड्रायफ्रुटस्, चाॅकलेटस की भी अच्छी खासी बिक्री होती है। डाक विभाग और कूरियर कारोबारी भी रक्षाबंधन के दौरान विशेष सेवाएं प्रदान करते हैं। रक्षा बंधन के पर्व को कुछ लोगों ने अपनी हरकतों से नुक्सान भी पहुंचाया है। पश्चिमी सभ्यता से रेशम की डोरी भी प्रभावित हुई है। फ्रैण्डशिप डे’ के दिन स्कूल और कालेज के विद्यार्थी एक-दूसरे की कलाइयों में फ्रैण्डशिप बेल्ट बांधते हैं नये दोस्त बनाने के लिए लड़के उन लड़कियों को भी बेल्ट बांधने से नही चूकते जिनसे जान थी और न ही पहचान।
रक्षाबंधन को भी कान्वेंट स्कूलों ने उसी तर्ज पर मनाने की परंपरा स्थापित कर नुक्सान ही पहुंचाया है। माना कि खून के रिश्ते से भी ज्यादा मायने मानवीय रिश्तों में छुपे हैं। मुंहबोली बहन अथवा भाई बनाने का फैशन ही भाई-बहन के पवित्रा रिश्ते को संदेहास्पद बनाता है। बहनों और भाइयों दोनों को रिश्तों की नाजुकता को ध्यान में रखना चाहिए। नई पीढ़ी को शायद यह नहीं पता कि भावनाओं का अनादर एवं विश्वास के साथ घात अशोभनीय है।
फिर यह भी प्रश्न उठता है कि रिश्ते तो और भी हैं, क्या उनमें भी कर्त्तव्य बोध जागृत करने के लिए कोई त्योहार मनाया जाता है? क्या पिता अपने बच्चों की पालना करे, इसके लिए कोई त्योहार है? मां अपने बच्चों को खुशी दे, इसके लिए कोई त्योहार है? फिर भाई, बहन की रक्षा करे, इसी के लिए त्योहार क्यों?
वास्तव में यह त्योहार एक बहुत ही ऊंची भावना के साथ शुरू हुआ था, जो समय के अंतराल में धूमिल हो गया और इस त्योहार का अर्थ संकुचित हो गया। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करती है। इसका अर्थ है कि सारा विश्व ही एक परिवार है। भाई-बहन का नाता ऐसा नाता है जो कहीं भी, कभी भी बनाया जा सकता है।
आप किसी भी नारी को बहन के रूप में निसंकोच संबोधित कर सकते हैं। बहुत छोटी आयु वाली को , हो सकता है , माता न कह सकें , पर बहन तो बच्ची , बूढ़ी हरेक को कह सकते हैं। वसुधैव कुटुंबकम् हमें यही सिखाता है कि संसार की हर नारी को बहन मानकर और हर नर को भाई मानकर निष्पाप नजरों से देखो।
आपकी सगी बहन सब नारियों की प्रतिनिधि है - इस निष्पाप वैश्विक संबंध की याद दिलाने यह त्योहार आता है और इसके लिए निमित्त बनती है सगी बहन , क्योंकि बहन - भाई के नाते में लौकिक बहन का नाता स्वाभाविक रूप से पवित्रता लिए रहता है। बहन जब अपने लौकिक भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो यही संकल्प देती है कि भाई , जैसे तुम अपनी इस बहन को पवित्र नजर से देखते हो , दुनिया की सभी नारियों को , कन्याओं को ऐसी ही नजर से निहारना। संसार की सारी नारियां तुझे राखी नहीं बांध सकतीं , पर मैं उन सबकी तरफ से बांध रही हूं। वो सब मुझमें समाई हुई हैं , उन सबका प्रतिनिधि बनकर मैं आपसे निवेदन करती हूं , आपको प्रतिज्ञाबद्ध करती हूं कि आप निष्पाप बनें।

भारतीय नारी का एक रूप ‘बहन‘ भी है और भारतीय पर्व और त्यौहारों की सूची में एक त्यौहार का नाम ‘रक्षा बंधन‘ भी है। जहां होली का हुड़दंग और दीवाली पर पटाख़ों का शोर शराबा लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है और उनके पीछे की मूल भावना दब जाती है वहीं रक्षा बंधन का त्यौहार आज भी दिलों को सुकून देता है। यह त्यौहार मुझे सदा से ही प्यारा लगता आया है।
यह पर्व भाई-बहन के बीच पवित्र स्नेह का द्योतक भी है। बहन भाई की कलाई पर रेशम की डोरी यानी राखी बांधती है आरती उतार कर भाई के माथे पर टीका लगाती है तथा सुख एवं समृद्धि हेतु नारियल एवं रूमाल भाई को भेंट स्वरूप देती है। भाई भी बहन की रक्षा के संकल्प को दोहराते हुए भेंट स्वरूप कुछ रुपये अथवा वस्तुएं प्रदान करता है।
इतिहास में एक अध्याय कर्मावती व हुमायूं के बीच प्रगाढ़ रिश्ते और राखी की लाज से जुड़ा है। कर्मावती ने हुमायूं को पत्रा भेज कर सहायता मांगी थी। बादशाह हुमायूं ने राखी की लाज निभाते हुए अपनी राजपूत बहन कर्मावती की मदद की थी। अतः रक्षाबंधन हमारे लिए विजय कामना का भी पर्व है।
हमें कर्मावती और हुमायूं की वह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के फ़र्क़ के बावजूद भी बनाए जा सकते हैं।पवित्र रिश्तों का सम्मान करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य भी है।
आओ और पेड़ों को राखी बांधो और उनके रक्षार्थ सामूहिक प्रयास करो। शायद यह प्रयास वृ़क्षों की अनावश्यक कटाई की रोकथाम में कारगर सिद्ध हो जाए।
इस त्यौहार के पीछे एक पौराणिक कथा भी बताई जाती है, जो इस प्रकार है : 
उस दिन श्रावणमास शुक्ल की चतुर्थी थी। दूसरे दिन प्रातः इंद्र देवता की पत्नी ने गुरू बृहस्पति की आज्ञा से यज्ञ किया और यज्ञ की समाप्ति पर इंद्र की दाई कलाई पर ‘रक्षा‘-सूत्रा’ बांधा। तत्पश्चात देव-दानव युद्ध में देवताओं को जीत की प्राप्ति हुई। कहा जाता है तभी से श्रावणी की पूर्णिमा को रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।
प्राचीन काल में शिष्य अपने गुरूओं के हाथ में सूत का धागा बांधकर उनसे आशीष प्राप्त करते थे। ब्राह्मण भी हाथ में सूत का धागा बांध कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। रक्षाबंधन भले ही हिंदुओं का पावन पर्व है किंतु दूसरे धर्म के अनुयायियों ने भी स्वेच्छा से रक्षा बंधन पर्व में अपनी आस्था व्यक्त की है।
समयानुसार सभी पर्व प्रभावित हुए हैं। रक्षाबंधन भी प्रभावित हुए बगैर नहीं रह पाया। रेशम की डोरी की जगह फैंसी राखियां चलन में आ गई। हमारी अर्थव्यवस्था में रक्षाबंधन पर्व के महत्त्वपूर्ण योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। करोड़ों रूपयों का कारोबार लाखों परिवारों को आजीविका प्रदान कर रहा है।
भैया और बहन के पावन रिश्ते को बांधने वाली रेशम की डोर का रंग और ढंग भी बदलते दौर में बदल गया है। अब इस रेशम की डोर पर फैशन का रंग चढ़ गया है। कारोबारी इस प्रेम के पर्व को अपने तरीके से कैश कर रहे हैं। बाजार में सोने और चांदी से जड़ी राखी उतारकर बहनों को आकर्षित किया जा रहा है। इसकी कीमत भी काफी हाई-फाई है। दूसरी तरफ बहनें भी अपने भैया के लिए महंगी राखी खरीदने को तवज्जो दे रही हैं। सोना-चांदी से जडि़त राखी के स्वर्णकारों के पास स्पेशल आर्डर भी आ रहे हैं। बाजार में 20 हजार रुपए कीमत वाली राखी आ गई है। बदलते दौर में स्वर्णकारों को भी भाई बहन के प्यार के पर्व पर चांदी कूटने का मौका मिल गया है। आशा शर्मा, मीना धीमान, पूजा राणा, मंजू कविता, आमना और रेखा धीमान का कहना है कि भाई की कलाई को सजाने के लिए हजारों रुपए भी कम पड़ जाते हैं।
धर्मशाला के वर्मा ज्यूलर शाप के मालिक राजेश वर्मा का कहना है कि इस राखी के पर्व पर सोने चांदी से जडि़त राखियों के अलावा मोती जडि़त राखी के आर्डर भी आ रहे हैं। सोने और चांदी से जडि़त राखी के आर्डर धर्मशाला ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में बुक किए जा रहे हैं। सोने का भाव आसमान पर है, बावजूद इसके बहनें अपने भाई की कलाई को सजाने के लिए इसकी परवाह नहीं कर रही हैं।

ब्रह्माकुमारी दादी हृदयमोहिनी कहती हैं कि
हम हर वर्ष रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं। हर बार हमें समझाया जाता है कि बहन, भाई को इसलिए राखी बांधती है कि वह उसकी रक्षा करेगा। लेकिन यदि बहन राखी नहीं बांधेगी, तो क्या भाई उसकी रक्षा नहीं करेगा? हिंदुओं को छोड़कर बाकी किसी संस्कृति -बौद्ध, क्रिश्चियन, मुस्लिम आदि संप्रदायों में राखी नहीं बांधी जाती, परंतु भाइयों द्वारा अपनी लौकिक बहनों की रक्षा तो वहां भी की जाती है। ऐसे कर्त्तव्य बोध के लिए कोई और त्योहार क्यों नहीं मनाया जाता? यदि कोई कहे कि यह त्योहार भाई-बहन के बीच प्रेम बढ़ने का प्रतीक है, तो भी प्रश्न उठता है कि क्या राखी न बांधी जाए तो बहन-भाई का प्रेम समाप्त हो जाएगा?
भाई-बहन को सहोदर-सहोदरी कहा जाता है, यानी एक ही उदर (पेट) से जन्म लेने वाले। जो एक उदर से जन्म लें, एक ही गोद में पलें, उनमें आपस में स्नेह न हो, यह कैसे हो सकता है। सफर के दौरान किसी यात्री के साथ दो-चार घंटे एक ही गाड़ी में सफर करने से भी कई बार इतना स्नेह हो जाता है कि हम उसका पता लेते हैं, पुन: मिलने का वायदा भी कर लेते हैं। तो क्या सहोदर-सहोदरी में स्वाभाविक स्नेह नहीं होगा, जो उन्हें आपस के प्रेम की याद दिलाने के लिए राखी का सहारा लेना पड़े।
मेरी सुरक्षा भी तभी होगी जब आप औरों की बहनों की सुरक्षा करेंगे। यदि आपके किसी कर्म से संसार की कोई भी बहन असुरक्षित हो गई , तो आपकी यह बहन भी किसी के नीच कर्म से असुरक्षित हो सकती है। आपसे कोई अन्य बहन न डरे और अन्य किसी भाई से आपकी इस बहन को कोई डर न हो , यही राखी का मर्म है।
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'जब मैंने हिन्दी बोली' -एक क़हक़हेदार पोस्ट

महंगाई बढ़ने की खबरें हिन्दी बोलने वालों को भी डरा रही हैं लेकिन फिर भी लोग हिन्दी बोल रहे हैं और बहुत अच्छी बोल रहे हैं. आप भी अपने जीवन में हिन्दी बोलकर अपना और समाज का बहुत भला कर सकते हैं. आज भारी भरकम मुद्दों को उठाती हुई पोस्ट्स के दरम्यान एक क़हक़हेदार पोस्ट पढी तो उसे यहाँ देने की तबियत हुई.
फ़ेसबुक पर एक बहन ने लिखा है कि

मुझे भी आज हिंदी बोलने का शौक हुआ, होटल से निकली और एक ऑटो वाले से पूछा,
"त्री चक्रीय चालक पूरे जयपुर नगर के परिभ्रमण में कितनी मुद्रायें व्यय होंगी"?
ऑटो वाले ने कहा, "अरे हिंदी में बोलो न..."
मैंने कहा, "श्रीमान मै हिंदी में ही वार्तालाप कर रही हूँ ।"
ऑटो वाले ने कहा, "मोदी जी पागल करके ही मानेंगे ।" चलो बैठो कहाँ चलोगी ?
मैंने कहा, "परिसदन चलो ।"
ऑटो वाला फिर चकराया !!
"अब ये परिसदन क्या है.? बगल वाले श्रीमान ने कहा, "अरे सर्किट हाउस जाएगा ।।"
ऑटो वाले ने सर खुजाया बोला,
"बैठिये मैडम ।।"
रास्ते में मैंने पूछा, "इस नगर में कितने छवि गृह हैं.??"
ऑटो वाले ने कहा, "छवि गृह मतलब..??"
मैंने कहा, "चलचित्र मंदिर ।"
उसने कहा, "यहाँ बहुत मंदिर हैं राम मंदिर, हनुमान मंदिर, जग्गनाथ मंदिर, शिव मंदिर ।।"
मैंने कहा, "मै तो चलचित्र मंदिर की बात कर रही हूँ जिसमें
नायक तथा नायिका प्रेमालाप करते हैं ।।"
ऑटो वाला फिर चकराया, "ये चलचित्र मंदिर क्या होता है..??"
यही सोचते सोचते उसने सामने वाली गाडी में टक्कर मार दी ।
ऑटो का अगला चक्का टेढ़ा हो गया ।
मैंने कहा, "त्री चक्रीय चालक तुम्हारा अग्र चक्र तो वक्र हो गया ।।"
ऑटो वाले ने मुझे घूर कर देखा और कहा, "उतरो जल्दी उतरो !!
चलो भागो यहाँ से ।"
तब से यही सोच रही हूँ अब और हिंदी बोलूं या नहीं !!!

June 26,2014 at 06:48 PM IST
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प्रिय ब्लॉगर भाई डॉ अनवर जमाल जी, वाकई पोस्ट पढ़ते ही हंसी से लोटपोट हो गए. बहुत साल पहले का एक चुट्कुला याद आ गया. एक व्यक्ति ने ऑटो वाले से पूछा, " भाई, केंद्रीय सचिवालय चलोगे?'' ऑटो वाला बोला, "हमने तो इस जगह का नाम ही नहीं सुना!'' उस व्यक्ति ने कहा, "सैंट्रल सेक्रेटियेरेट चलोगे?'' व्यक्ति बोला, "मैं पहले भी तो यही कह रहा था.'' ऑटो वाला बोला, "अब के हिंदी में बोला तो, समझ में आ गया.''
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(leela tewani को जवाब )- डा. अनवर जमाल
June 26,2014 at 06:51 PM IST
जी हाँ, बहन लीला तिवानी जी ! सोचा डरे हुए लोगों को क़हक़हा लगाने का एक मौक़ा मिल जायेगा और उनका तनाव ज़रा सा कम हो जायेगा.
शुक्रिया अपना तजुर्बा शेयर करने के लिये.

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नरेन्द्र भाई मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत में आए बड़े बदलाव का प्रमाण

कल 26 मई 2014 को नरेन्द्र भाई मोदी साहब ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें पिछड़ी जाति का सदस्य माना जाता है। उनका व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा जो भी हो लेकिन पिछड़ी जाति के व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना और हज़ारों साल से अपना वर्चस्व बनाए रखने वाली जातियों के सदस्यों का उनके अधीन काम करना एक बड़ा बदलाव है। यह बदलाव एक दिन में और किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं आया। 
आदरणीय गौतम बुद्ध ने, महावीर जैन ने, चार्वाक ने और बहुत से दूसरे सुधारकों ने सामाजिक न्याय के लिए वर्ण व्यवस्था को उखाड़ने का काम किया। उनके प्रयासों को विफल करने के लिए वर्ण व्यवस्था के रक्षकों ने उन्हें या तो बेअसर कर दिया या फिर उन्हें अपने अधीन ही कर लिया। जैन-बौद्धों के बेअसर होने के बाद जैसे ही वर्ण व्यवस्था ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं, तभी मानव की न्याय चेतना में समानता और आध्यात्मिकता के भाव को पुष्ट करने के लिए भारत में मुसलिम सूफ़ियों का आगमन हो गया। वर्ण व्यवस्था के समाानान्तर इसलाम भी हिन्दुंस्तान में अपनी पकड़ बनाता गया। मुसलिम शासकों की ग़ैर ज़िम्मेदारी और उनकी आपसी लड़ाई झगड़ों ने अंग्रेज़ों को भारत में शासन का अवसर दिया। अंग्रेज़ों ने वर्ण व्यवस्था, छूत-छात और ऊंच-नीच जैसी अमानवीय प्रथाओं को रोकने के लिए गंभीर प्रयास किए और इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज में से ही लोगों को खड़ा किया।
वर्ण व्यवस्था के रक्षक भी इन सुधारकों के प्रयास विफल करने के लिए कमर कस कर खड़े हो गए। स्वामी दयानन्द जी और स्वामी विवेकानन्द जी जैसे बहुत से लोगों ने और हिन्दू रजवाड़ों ने शास्त्रीय वर्ण व्यवस्था की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया लेकिन फिर भी वर्ण व्यवस्था ढह ही गई और ऐसी ढह गई कि वर्ण व्यवस्था के रक्षकों के उत्तराधिकारी अब समता और समरसता के लिए ख़ुशी ख़ुशी काम करते देखे जा सकते हैं। उन्हीं के एकजुट समन्वित प्रयासों के नतीजे में कल पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति को सत्ता मिली और वेउसे ख़ुशी ख़ुशाी देखते रहने के लिए मजबूर थे.
भारत में आए इस बड़े बदलाव को देखकर हम भी ख़ुश हैं। वर्ण व्यवस्था ढह चुकी है। अब हरेक जाति का व्यक्ति योग्यता का विकास कर सकता है और अपनी योग्यता से वह सत्ता के किसी भी पद पर पहुंचकर समाज को अपनी सेवाएं दे सकता है। नरेन्द्र भाई मोदी साहब के शपथ ग्रहण को भारत के कायान्तरण के रूप में देखा जाना चाहिए। संकीर्ण सांप्रदायिक तत्व भारत के बदलाव को रोक नहीं सकते, फलतः अब वे इसके साथ बहकर ही कुछ लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जो लोग जो कुछ लाभ उठाएंगे, वह सब सामने आता ही रहेगा। ये अपनी चाल चल रहे हैं और ज़माना अपनी चाल चल रहा है और हम साक्षी भाव से दोनों को देख रहे हैं। 
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वालिद साहब की मौत पर सभी भाई बहनों से दुआ की दरख्वास्त है

कुल्लु नफ्सिन ज़ायक़तुल मौत -आल-क़ुर्'आन
हर जान को मौत का ज़ायक़ा चखना है.
हमारे वालिद जनाब मसूद अनवर ख़ान यूसुफ़ ज़ई साहब का इंतेक़ाल (देहावसान) हो गया है जुमा (26 अप्रैल 2014) और शनिवार (27 अप्रैल 2014)की दरमियानी रात मे 7:25 PM पर. उनकी उम्र तक़रीबन 69 साल थी. सब लोगों से दुआ और इसाले सवाब की दरख्वास्त है. उनकी नमाज़े जनाज़ा असगरिया मदरसा (न्यू बिल्डिंग) में मैने अदा करवाई जिसमे तक़रीबन 500 लोगों ने दुआ ए मगफ़िरत की 27 अप्रैल 2014 को 10:15 अम पर. उनकी तद्फीन हमारे ख़ानदानी क़ब्रिस्तान मे 10:30 AM पर हुई. 
इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैहि राजिऊन.
हम सब अल्लाह के हैं और हमें उसी की तरफ लौट जाना है.
उन्होंने एक अच्छे बाप की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाई हैं. हम अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं कि उसने हमें इतना अच्छा बाप दिया जिसने हमें शहज़ादों की तरह पाला और अपनी ताक़त की हद तक कभी किसी चीज़ की कमी महसूस न होने दी. इसी के साथ उन्होंने हमें हक़ीक़ी दुनिया में जिद्दोजहद करना भी सिखाया जो कि बेहतर मुस्तक़बिल के लिये एक लाज़िमी चीज़ है.
अल्लाह हमारे वालिद साहब की मगफ़िरत फ़रमाये और उन्हें अपने दीदार से नवाज़े और हमारे नेक आमाल को उनकी राहत का सामान बनाये.
हम अल्लाह से अल्लाह की रिज़ा चाहते है. हमारे वालिद साहब की तालीमो तरबियत जो उन्होंने अपने बेटे बेटियों को दी है, उसका नफ़ा सारी इंसानियत को पहुंचे. सबको मुहब्बत और अम्नो अमान नसीब हो, जिसके लिये हमारे वालिद साहब ज़िंदगी भर मेहनत करते रहे.

आमीन.

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भारत की ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ परंपरा-हरि मोहन

लिव इन रिलेशनशिप भारतीय समाज में हमेशा चर्चा का विषय रहा है। सामाजिक रूप से इसे आज भी स्वीकार नहीं किया जाता है। स्त्री का शादी के बगैर पुरुष के साथ रहना सामाजिक दृष्टि से पाप समझा जाता है। घर-परिवार और समाज में लिव इन रिलेशनशिप की बात उठाते ही इसे पश्चिमी देशों की नकल कह कर दरकिनार कर दिया जाता है।

समाजिक ढांचा आज भी यहीं मानता है कि जोड़ियां स्वर्ग से बनकर आती हैं। समाज में गहरी जड़ें जमा चुका यह बह्म सत्य शायद ही कभी टूट पाए! लेकिन, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारतीय समाज में लिव इन रिलेशनशिप( सहजीवन) से मिलती-जुलती परंपरा काफी पुराने वक्त से चली आ रही है। यह आज भी उसी रूप में समाज में विद्यमान है।

लिव इन रिलेशनशिप से मिलने-जुलने वाली यह परंपरा राजस्थान में आज भी कायम है। इस प्रथा का नाम है ‘नाता प्रथा’। राजस्थान की इस इस प्रथा के मुताबिक, कोई शादीशुदा पुरुष या महिला अगर किसी दूसरे पुरुष और महिला के साथ  अपनी इच्छा से रहना चाहती है तो वो अपने पति या पत्नी से तलाक लेकर रह सकती है। इसके लिए उन्हें एक निश्चित राशि चुकानी पड़ती है।

इस प्रथा में महिला और पुरुष के बच्चों और दूसरे मुद्दों का निपटारा पंचायत करती है। उन्हीं के निर्णय के हिसाब से तय किया जाता है कि बच्चे किसके साथ रहेंगे। ये इसलिए किया जाता है कि ताकि बाद में महिला या पुरुष के बिच किसी चीज़ को लेकर मतभेद न हो। वो अपनी जिंदगी अपनी पंसद के व्यक्ति या स्त्री के साथ आराम से काट सके।

राजस्थान में इस प्रथा का चलन ब्राह्मण, राजपूत और जैन को छोड़कर बाकी की जातियों में देखा जा सकता है। गुर्जरों में यह परंपरा यहां खासकर लोकप्रिय है। इस प्रथा से यहां के पुरुष और महिलाओं को तलाक के कानूनी झंझटों से छुटकारा तो मिलता ही है साथ  ही में अपनी पसंद का जीवन साथी के साथ रहने का हक भी मिल जाता है।

हालांकि, बदलते वक्त के साथ इस प्रथा में भी कई विसंगतियां आई हैं। इसका स्वरूप भी बदला है। कई बार तो इस प्रथा की आड़ में महिलाओं को दलालों के हाथों बेचने का घिनौना खेल भी खेला जाता है।

कलर्स चैनल के बहुचर्चित सीरियल ‘बालिका वधू’ में भी इस प्रथा को दिखाया गया है। इस नाटक में आनंदी की सहेली फूली का विवाह इसी नाती प्रथा के तहत उसके देवर के साथ होता है। इस नाटक में दिखाया गया है कि कैसे यह नाता प्रथा जो उजड़ चुके लोगों को फिर से सामाजिक रूप में जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है।

अगर किसी स्त्री या पुरुष को किसी दूसरे स्त्री या पुरुष से प्यार है तो नाता प्रथा उसके लिए बेहतर विकल्प है। घर वाले अगर किसी लड़की की जबर्दस्ती कहीं और शादी करवा भी देते हैं तो वो लड़की नाता प्रथा का यूज अपने प्रेमी के साथ रहने के लिए कर सकती है।

इसके लिए उसे निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। शादी के बाद भी अगर कोई स्त्री किसी दूसरे पुरुष से प्यार करने लगती है और उसके साथ रहना चाहती है तो वो नाता प्रथा के तहत उसके साथ अपनी इच्छा से रह सकती है।
साभार : http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/How-to-choose-candidate-for-the-PM-of-India/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95-live-in-relationship-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B01
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