ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या के संदर्भ में नास्तिक दार्शनिकों और आम नागरिकों की थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक विश्लेषण

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  • Tuesday, March 5, 2013
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • राजा भैया के इलाक़े प्रतापगढ़ जिले के बलीपुर गांव में कुछ ग़ुंडों ने ज़िया उल हक़ सीओ, यू. पी. पुलिस को शनिवार की रात ( 2 फ़रवरी 2013) बड़ी बेरहमी से मार डाला। वह जवान थे, जोशीले थे और ईमानदार भी। वे ग़ुंडों से भिड़ गए। उन्होंने अपनी नई नवेली दुल्हन और अपने बूढ़े माँ बाप का ख़याल भी न किया। हरेक ऐसा नहीं कर सकता। दूसरे भी ऐसा न कर सके। वे पहले देखते रहे और फिर उन्हें बदमाशों के क़ब्ज़े में देखकर भाग लिए। उनमें से कुछ को भागने की सज़ा भी मिल गई। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। इस तरह के मामले में यही सज़ा मिलती है। सस्पेंड होने वाले जानते हैं कि वे कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे। इसमें ख़र्च भी कम आएगा।
    अगर वे गोली चला देते तो कई बदमाश मारे जाते। उनके परिवार वाले मानवाधिकार आयोग में जाते और तब इन पुलिस वालों पर मासूम नागरिकों के क़त्ल का केस चलता। जांच में ज़्यादा रूपया ख़र्च हो जाता। केस की पैरवी में भी ख़र्च होता और अगर सज़ा हो जाती तो जेल में कई साल भी ख़र्च हो जाते और नौकरी भी हाथ से चली जाती। मैदान से भागने वाले उम्रदराज़ और व्यवहारिक मालूम होते हैं। उन्होंने गोली नहीं चलाई तो केवल एक मारा गया और अगर वे गोली चला देते तो कई लोग मारे जाते और ख़ुद भी सज़ा पाते और हो सकता है कि फ़ायर मिस हो जाते तो उनके हाथों ख़ुद भी मारे जाते।
    कोई पूछ रहा है कि मैदान से भागने वाले ये पुलिसकर्मी वर्दी पहनते हुए आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?
    पूछने वाले भाई ब्लॉगर प्रवीण शाह जी हैं। वह रिटायर्ड फ़ौजी भी हैं और नास्तिक भी। फ़ौज में नास्तिक हैं तो पुलिस में भी होंगे। नास्तिक मौत के बाद किसी क़ुरबानी का बदला मिलने में यक़ीन नहीं रखते। हो सकता है कि कायर भगोड़े भी नास्तिक ही हों। उनकी मान्यता को सामने रखकर कोई उनसे पूछे तो वे क्या जवाब दे पाएंगे ?
    कि अगर वे भगोड़े भागने के बजाय वहां शांति व्यवस्था क़ायम करने की कोशिश में मारे जाते तो वे अपना चेहरा कैसे देख पाते क्योंकि परलोक तो होता नहीं है और मरकर वे महज़ मिट्टी का ढेर रह जाते ?
    वे यही बता दें कि अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जाने वाले ज़िया उल हक़ मरने के बाद अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?,
    भागने वाले आईने में अपना चेहरा न देख पाएं तो भी उनके बीवी-बच्चे और मां बाप तो उनके चेहरे देख पाएंगे।
    ज़िया उल हक़ के परिवार वाले क्या उनका चेहरा देख पाएंगे ?
    साल भर में ही विधवा होने वाली उनकी बीवी परवीन उनका चेहरा कैसे देख पाएगी ?
    भागने वालों ने जीवन पाया, अपना परिवार बचाया। 
    मरने वाले ने क्या पाया ?
    यह सवाल उनसे किया जा रहा है जो कि दिन रात यही कहते हैं कि ईश्वर और परलोक नहीं है।
    ईश्वर और परलोक को मानने वाले तो फ़र्ज़ के लिए अपनी जान दे सकते हैं कि उनकी क़ुरबानी का बदला समाज दे या न दे लेकिन ईश्वर ज़रूर देगा। वह उन्हें हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत देगा। उसके परिवार उसके बाद दुख उठा भी लेंगे तो क्या, मरने के बाद वे भी उससे वहीं आ मिलेंगे। मोमिन अर्थात आस्तिक ऐसा माानते हैं लेकिन नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। अगर हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा तो फिर कोई दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान भला क्यों देगा ?
    नास्तिकता लोगों को अच्छाई का फल मिलने से निराश करती है क्योंकि दुनिया में अच्छाई करने वाले सभी लोगों को उनके जीते जी भी अच्छा बदला नहीं मिलता। मरने के बाद वह क्या दे पाएगी ? 
    इससे पहले भी बहुत लोग अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जा चुके हैं और उन्हें भुलाया भी जा चुका है। अगर लोगों से उसकी सुरक्षा करते हुए जान देने वाले 10 जांबाज़ पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम पूछे जाएं तो वे 5 नाम भी न बता पाएंगे। इस हश्र के लिए कौन मरना चाहेगा ?
    लोग अक्सर पुलिस की कार्यशैली की आलोचना करते हैं कि कहीं दंगा फ़साद हो जाए तो वे देर से आते हैं और आकर भी वे अपना फ़र्ज़ ढंग से नहीं निभाते। भीड़ बेक़ाबू हो और वे कम हों तो अपनी जान बचाकर भाग जाते हैं। 
    आपकी नास्तिकता ने उन्हें ऐसा बना दिया है। समाज की संगदिली और नाशुक्री ने उन्हें ऐसा बना दिया है। वे समाज से ही आते हैं। समाज के लोगों को देखना चाहिए कि वे जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं, उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?
    मरने वाले अपनी जान से गए और राजनीति और समाज में कोई परिवर्तन न आया। क़ातिल माफ़िया बदस्तूर हावी हैं। जनता इन्हीं को चुनती है। देश का क़ानून यही बनाते हैं। ऐसा लग रहा है कि थोड़ा बहुत जो भी मिल रहा है, इनकी दया से मिल रहा है। जो इनसे भिड़ेगा, वह अपनी जान से जाएगा। अगर भागकर अपनी जान बच सकती है तो कोई अपनी जान क्यों गवांए ?
    जान गंवाकर उसे क्या मिलेगा ?
    सिर्फ़ यही कि वह अपना चेहरा बिना किसी शर्मिंदगी के देख पाएगा ?
    जब शहीदों को जनता भुला देती है तो इन भगोड़ों को शर्मिंदगी का अहसास भी नहीं होता बल्कि उन्हें अपने फ़ैसले पर गर्व होता है कि हम अक्लमंद थे, हमारा फ़ैसला सही था। वह हमारी बात मानता तो वह भी बच सकता था।
    इस तरह के भगोड़े जगह जगह अपनी अक्लमंदी के फ़ैसलों को बड़े गर्व से बयान करते हैं और उनकी हराम की कमाई पर चाय-दारू पीने वाले उनकी वाह वाह करते हैं।
    शहीदों के घरों में हाय, हाय और मातम है और भगोड़ों के घरों में वाह वाह और जान बचने की ख़ुशी का। उनके घरों में से कोई एक भी उन्हें शर्म नहीं दिलाता। यह हमारे समाज की तस्वीर है। इसीलिए कोई भगोड़ा यह फ़िक्र क्यों करे कि 
    या 
    अपने ही जैसे बाक़ी साथियों का सामना वह कैसे करेगा ?

    21 comments:

    रविकर said...

    मार्मिक -
    ईश्वर परिवार को सहन शक्ति दे-

    हरकत यह अच्छी नहीं, छोड़ सिपहसालार |
    करे हवाले मौत के, होवें साथी पार |
    होवें साथी पार, लड़ाई आर-पार की |
    वर्दी को धिक्कार, जिंदगी ले उधार की -
    होकर के सस्पेंड, दुबारा होगी शिरकत |
    लेकिन अफसर अन्य, सहे ना इनकी हरकत ||

    रविकर said...

    आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ शुक्रिया रविकर जी !!!

    शालिनी कौशिक said...

    .एक एक बात सही कही है आपने आभार सौतेली माँ की ही बुराई :सौतेले बाप का जिक्र नहीं आज की मांग यही मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ .

    महेन्द्र श्रीवास्तव said...

    सार्थक और सही विश्लेषण

    परिवारजनों के ये कष्ट सहने की शक्ति दे ईश्वर

    प्रवीण शाह said...

    .
    .
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    आदरणीय व प्रिय डॉ० साहब,

    आभार आपका... पर यह समझ नहीं आया कि मेरी पोस्ट संबंधी चर्चा में आप मेरी ईश्वर-धर्म संबंधी मान्तयताओं को क्यों विज्ञापित कर रहे हैं... क्या इनसे मेरी बात का वजन बढ़ जाता है... :)


    ...

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ आदरणीय व प्रिय विचारक बंधु प्रवीण शाह जी ! आपके प्रश्न के बाद हमने लेख को एडिट कर दिया है ताकि यह साफ़ हो जाए कि पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी समाज से ही आते हैं। समाज के लोग जो कुछ कहते हैं और जो कुछ करते हैं। उसका उन पर सीधा असर पड़ता है।
    आपने इस विषय पर सवाल पूछा है, सो आपका हक़ था कि आपको जवाब दिया जाए। आपकी मान्यताओं का ज़िक्र न किया जाए तो दूसरे पाठक नहीं समझ सकते कि जिसे जवाब दिया जा रहा है, उसे यही जवाब क्यों दिया जा रहा है ?
    एक पोस्ट में आपने नास्तिक होने के फ़ायदे गिनाए थे। हमने इस पोस्ट में नास्तिक होने के नुक्सान बताए हैं।
    आप अपनी नास्तिक मान्यता को वैज्ञानिक मानते हैं। आप अपनी वैज्ञानिक मान्यता के आधार पर बता दीजिए कि ज़िया उल हक़ को अपनी जान देकर क्या फ़ायदा हुआ ?
    और
    उनके भगोड़े साथियों को जान बचाकर भागने से क्या नुक्सान हुआ ?
    इससे आपकी वैज्ञानिक मान्यता के मानव मन पर प्रभाव को समझने में आसानी होगी।

    धन्यवाद !

    Virendra Kumar Sharma said...

    डॉ ज़माल अनवर !जीवन में कुछ ज़ज्बा भी होता है कर्मठता भी होती है .भारत उन पांच फीसद लोगों की वजह से ही चल रहा है जो कर्तव्य निष्ठ हैं .९ ५ % हरामखोरों की वजह से नहीं जो जो वर्दी

    समेत पूंछ दबा भाग रहे हैं .और यही दुम राजनीति के धंधे बाजों राजा चोरों के सामने हिला रहे हैं (भैया कैसा साला ).

    पूरण खण्डेलवाल said...

    भगौड़ों का नास्तिकता और आस्तिकता से कोई संबंध नहीं बल्कि उनके जमीर से इसका संबध है !!

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ वीरेन्द्र शर्मा ! अगर आप अपनी नास्तिकता को वैज्ञानिक मानते हैं तो आप अपनी वैज्ञानिक मान्यता के आधार पर बता दीजिए कि
    1- ज़िया उल हक़ को अपनी जान देकर क्या फ़ायदा हुआ ?
    और
    2- उनके भगोड़े साथियों को जान बचाकर भागने से क्या नुक्सान हुआ ?

    इससे आपकी वैज्ञानिक मान्यता के मानव मन पर प्रभाव को समझने में आसानी होगी।

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ पूरण खंडेलवाल जी ! हरेक का ज़मीर अलग बात कहता है . मुक़ाबले के मैदान में खड़े सिपाही का ज़मीर जो कहता है, वही बात उसके बीवी बच्चों का नहीं कहता.
    मैदान में भी बहादुर का ज़मीर अलग बात कहता है और कायर का अलग बात कहता है.
    इन सबके ज़मीर पर इनके माहौल के विचारों और हालात पड़ता है. इसीलिये इनमें इतना अंतर दिखाई देता है.
    खैर बात यह पूछी जा रही है कि
    ईश्वर और परलोक को मानने वाले तो फ़र्ज़ के लिए अपनी जान दे सकते हैं कि उनकी क़ुरबानी का बदला समाज दे या न दे लेकिन ईश्वर ज़रूर देगा। वह उन्हें हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत देगा। उसके परिवार उसके बाद दुख उठा भी लेंगे तो क्या, मरने के बाद वे भी उससे वहीं आ मिलेंगे। मोमिन अर्थात आस्तिक ऐसा मानते हैं लेकिन नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद ऐसा कुछ नहीं मिलेगा।
    अगर हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा तो फिर कोई दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान भला क्यों देगा ?

    Arvind Mishra said...

    इस मामले में आपकी बातें निश्चय रूप से विचारणीय हैं !

    सुशील said...

    हाँ अब परिवार के पास सहने के अलावा बचता ही क्या है ! जब सिस्टम बेशर्म हो जाये तो क्या किया जाये ! कुछ ईमानदार जान से मार दिये जाते है !
    जहाँ मारे नहीं जा स्कते घेर घेर कर प्रताडि़त किये जाते हैं ताकि छोड़ दें ईमानदारी का रास्ता !

    प्रवीण शाह said...

    .
    .
    .
    प्रिय व आदरणीय डॉक्टर जमाल साहब,

    पूरण खन्डेलवाल जी सही कहते हैं कि 'भगौड़ों का नास्तिकता और आस्तिकता से कोई संबंध नहीं बल्कि उनके जमीर से इसका संबध है !!'... ज़मीर माने conscience = motivation deriving logically from ethical or moral principles that govern a person's thoughts and actions.

    पर मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप ऊपर लिखा ज़मीर का सही अर्थ कभी नहीं समझ पायेंगे क्योंकि आप उसे समझने की काबलियत ही नहीं रखते, धर्म ने आपके आँख-कान-दिमाग और सोच को बंद किया हुआ है... आप तो इन्सान के किये हर काम का बदला (ईनाम) चाहते हैं हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत के रूप में... जबकि जमीर धर्म-मजहब से बिल्कुल जुदा चीज है...


    ...

    DR. ANWER JAMAL said...

    नास्तिकता मनोविज्ञान और सामाजिक सत्य को समझने में नाकाम क्यों है ?
    @ प्रिय प्रवीण जी ! पूरण खंडेलवाल जी की यह बात सही है कि भगौड़ों का संबंध ज़मीर से है।
    सवाल यह है कि उनके ज़मीर ने उनसे भागने के लिए क्यों कहा ?
    हमने इस पोस्ट में इसी बात का जवाब तलाश करने की कोशिश की है। हम समझते हैं कि इंसान के ज़मीर या मन पर उसके माहौल का बड़ा असर पड़ता है। यही वजह है कि पुलिस में से कोई रिश्वत नहीं लेता और कोई लेता है। कोई ज़ालिमों से भिड़ जाता है और कोई भागकर जान बचाने में अपनी भलाई समझता है।
    सुश्री मायावती जी के शासनकाल में राजा भैया के निवास पर पुलिस अधिकारी श्री आर. एस. पांडेय जी ने छापा मारा था। उसके बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां दी गईं और फिर एक दिन उन्हें सड़क पर किसी वाहन से कुचल कर मार दिया गया। सन 2004 से उस केस की जांच सीबीआई कर रही है। जांच अभी चल ही रही है।
    पुलिस अधिकारी मारे जा रहे हैं और क़ातिल माफ़िया सत्ता संभाले हुए हैं।
    क्या इस तरह की बातों का इंसान के ज़मीर और उसके मन पर कोई असर नहीं पड़ता ?
    हमारे व्यक्तित्व के बारे में आपकी व्यक्तिगत राय जानकर ख़ुशी हुई।
    हम कैसे हैं ?,
    यह पोस्ट का विषय नहीं है। हमने आपके व्यक्तित्व के बारे में हमेशा अच्छा ही कहा है, कभी बुरा नहीं कहा। वह हमारा विषय नहीं है। हम विचारधारा और मनुष्य के व्यक्तित्व पर उसके प्रभाव को जानने समझने की कोशिश कर रहे हैं।
    आदमी अपने कर्म का बदला चाहता है और उसे स्वयं भोगना चाहता है। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। दुनिया के हरेक समाज में सारे कामों का आधार यही इंसानी मिज़ाज है। इसे किसी ने बदलना भी चाहा तो बदल न पाया। लोगों से काम लेने के लिए हमें उनकी सहज प्रवृत्ति को समझना ज़रूरी है। इसे धर्म-मज़हब समझता है। सेना, पुलिस, राजनीति और समाज, हरेक समझता है। केवल नास्तिकता नहीं समझती।
    आप नास्तिकता के प्रचारक हैं। इसीलिए नास्तिकों से पूछे जा रहे इन सवालों का जवाब देने में अब तक नाकाम हैं कि
    1- ज़िया उल हक़ को अपनी जान देकर क्या फ़ायदा हुआ ?
    और
    2- उनके भगोड़े साथियों को जान बचाकर भागने से क्या नुक्सान हुआ ?


    कृप्या व्यक्तिगत आरोप लगाकर चर्चा का रूख़ मोड़ने के बजाय अपनी वैज्ञानिक विचारधारा के आधार पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर दें।
    विज्ञान और मनोविज्ञान भगोड़ों के कर्म को विज्ञानविरूद्ध मानता हो तो उसका हवाला भी दें।
    यहां आकर आप स्वयं को बेबस और लाचार महज़ महसूस करेंगे।
    ऐतराज़ करना और राय दे देना आसान हुआ करता है और सही जवाब देना मुश्किल। आज तक आप आप आसान काम करते आए हैं। आज ज़रा मुश्किल काम कर लीजिए।

    Dr. Ayaz Ahmad said...

    अच्छे बहस मुबाहिसे ब्लॉगिस्तान में कम देखने में आ रहे हैं। हम भी अपने काम में मशग़ूल हो गए हैं। दीन यही कहता है कि दुनिया की ज़िंदगी इम्तेहान है। दूसरों का भला करना सबसे बड़ी नेकी है। यह हरेक इंसान का फ़र्ज़ है, चाहे वह वर्दी में हो या न हो। इस फ़र्ज़ को अदा करने में जान चली जाए तो यह शहादत कहलाती है। इसलाम में शहादत का दर्जा पाना कामयाबी की बात है। दूसरे धर्मों में इसे अच्छा माना जाता है और मरने के बाद की ज़िंदगी में राहत और ऐश मिलना बताया जाता है। इससे फ़र्ज़ की राह में मरना आसान हो जाता है और उसके बाद के रिश्तेदारों के दिलों को भी तसल्ली मिलती है कि हमारा आदमी अच्छे हाल में है।
    दहरिये यानि नास्तिक लोग तो यही बताते हैं कि मरने के बाद ऐसी कोई ज़िंदगी नहीं है। लिहाज़ा कोई समझदार तब तक अपना फ़र्ज़ अदा करेगा जब तक कि उसकी ज़िंदगी को ख़तरा न हो। अपने ऊपर ख़तरा पड़ते देखते ही वह भाग खड़ा होगा। साईंस भी इसे नेचुरल बताती है।
    देखते हैं कि प्रवीन जी की तरफ़ से क्या जवाब आता है ?

    दिनेश पारीक said...

    सच और सिर्फ सच इस हालत को तो सोच के भी रोना आता है

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    प्रवीण शाह said...

    .
    .
    .
    मैंने लिखा था...

    पूरण खन्डेलवाल जी सही कहते हैं कि 'भगौड़ों का नास्तिकता और आस्तिकता से कोई संबंध नहीं बल्कि उनके जमीर से इसका संबध है !!'... ज़मीर माने conscience = motivation deriving logically from ethical or moral principles that govern a person's thoughts and actions.

    पर मुझे दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप ऊपर लिखा ज़मीर का सही अर्थ कभी नहीं समझ पायेंगे क्योंकि आप उसे समझने की काबलियत ही नहीं रखते, धर्म ने आपके आँख-कान-दिमाग और सोच को बंद किया हुआ है... आप तो इन्सान के किये हर काम का बदला (ईनाम) चाहते हैं हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत के रूप में... जबकि जमीर धर्म-मजहब से बिल्कुल जुदा चीज है...


    और मेरा सोचना सही था... आप अपने ज़मीर के कारण कर्तव्य की राह पर जान देने वाले का जज्बा नहीं समझे... और अयाज अहमद साहब ने 'सोने में सुहागा' पर मेरे जवाब का इंतजार शुरू कर दिया और आप अपने नवभारत टाइम्स ब्लॉग 'बुनियाद' पर खुद ही गाने लगे 'आखि़र नास्तिकों को निरूत्तर होना ही पड़ा'... अब आप ही देखिये 'बुनियाद' पर पहली टीप क्या है...

    Ganesh Kumar का कहना है:
    March 07,2013 at 07:04 PM IST
    डाक्टर साहब,
    आस्तिकता और नास्तिकता को शहादत से जोड़ कर देखना ठीक नही. लोग कहते हैं भगत सिंह एक नास्तिक थे लेकिन उनसे बड़ी श्‍हादत किसी ने नही दी. न ही उन्होने अपने किसी फायदे के लिये श्‍हादत दी. कितने आस्तिक मैदान छोड़ कर भाग गये थे उस समय. शहादत मनुष्य की अपनी बुद्धि विवेक का मामला है.
    किसी फायदे नुकसान का लोभ कर के की गयी शहादत को शहादत नही सौदा कहेंगे.


    मेरी बात पहले भी स्पष्ट थी दोबारा फिर दोहरा देता हूँ... ' कर्तव्य की राह पर बलिदान कोई भी आदमी अपने ज़मीर के चलते करता है और यही होना भी चाहिये, किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के लालच/फायदे के चलते तो कोई बलिदान की सोचना एक किस्म का सौदा होगा और सौदा करने वाला एक लालची इंसान भी... ऐसे लालची को बेवक्त जान गंवाने की बजाय कुछ दिन उपवास करना और दिन में कुछ बार प्रार्थना कर लेना एक बेहतर तरीका लगेगा स्वर्ग में सीट पक्की करने का ... :)

    अब लगे हाथों दोनों सवालों के जवाब भी लीजिये...

    1- ज़िया उल हक़ को अपनी जान देकर क्या फ़ायदा हुआ ?

    कोई फायदा नहीं हुआ, उन्होंने अपने ज़मीर और जज्बे के चलते कर्तव्य की राह पकड़ी, कोई सौदा नहीं किया... इतना जरूर है कि वह मुझ जैसे अनेकों की आँखें नम कर गये और भविष्य की नस्लें उनकी मिसाल देंगी...

    2- उनके भगोड़े साथियों को जान बचाकर भागने से क्या नुक्सान हुआ ?

    अभी तक तो कुछ खास नुक्सान नहीं हुआ... यदि वह फौज में होते और ज़मीर रखने वाला उनका कमांडर होता तो उनको आर्मी एक्ट के तहत सजा-ए-मौत देता... मैंने अपनी पोस्ट में कम से कम उनकी वर्दी उतरवाने (बर्खास्तगी) की मांग की थी... उन्हें वर्दी की इज्जत तार-तार कर जान बचा भागने की सजा हमारे तंत्र को ही देनी होगी... यहाँ पर भी हम किसी ऊपर वाले के इंसाफ का भरोसा और इंतजार नहीं कर सकते... क्या पता वे भी कुछ ज्यादा उपासना, उपवास और तीर्थयात्राऐं कर किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के काबिल बना लें खुद को... :)

    अभी भी कुछ शक-शुबहा रह गये हों तो मेरी नयी पोस्ट में स्वागत है आपका... :)



    ...

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ प्रिय प्रवीण जी ! गणेश कुमार जी को हमने यह जवाब दिया है। बराय करम आप भी मुलाहिज़ा फ़रमा लें-

    # गणेश कुमार जी ! आपने कहा है कि
    ‘किसी फ़ायदे नुक्सान का लोभ करके दी गई शहादत को शहादत नहीं बल्कि सौदा कहेंगे।‘

    हां, बिल्कुल इसे सौदा ही कहेंगे और सौदा अर्थात व्यापार करना कोई बुरी बात नहीं है। अगर सबको यह नफ़े का सौदा नज़र आने लगे तो फिर सच्चाई के लिए शहादत देने वालों की तादाद बढ़ सकती है और अगर लोगों को शहादत नुक्सान का सौदा लगने लगे तो फिर लोग शहादत के मौक़े से भाग खड़े होंगे जैसे कि ज़िया उल हक़ के साथी भाग खड़े हुए।

    कोई एकाध आदमी नफ़े नुक्सान के ख़याल से ऊपर उठकर अपनी जान दे देता है। यह एक बड़े ऊंचे दर्जे की बात है। यह एक अच्छी बात है बल्कि बहुत अच्छी बात है। यह तो मरने वाले के अंदरूनी जज़्बात थे। जो उसकी मौत के साथ ही रूख़सत हो गए। नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद किसी भी रूप में कोई जीवन नहीं है। उनकी थ्योरी के मुताबिक़ मरने के बाद शहीद को कोई नफ़ा नहीं होता। वह ख़त्म हो जाता है।
    यह ठीक है कि शहीद ने कोई सौदा नहीं किया। उसने किसी लाभ के लिए शहादत नहीं दी लेकिन ऐसा क्यों हुआ कि उसकी शहादत उसके लिए नुक्सान का सौदा साबित हुई ?
    हमारा सवाल यही है।

    हर साल 26 जनवरी को बहादुर बच्चों को उनकी बहादुरी के लिए ईनाम दिया जाता है। उन्होंने ये बहादुरी के काम किसी ईनाम के लालच में नहीं किए थे। इसके बावजूद उन्हें ईनाम दिए जाते हैं। उन्हें हर तरफ़ सराहना मिलती है। हरेक उन्हें इज़्ज़त देता है और वे इससे ख़ुश भी होते हैं।
    ...क्योंकि समाज मानता है कि अच्छे लोगों को उनकी बहादुरी के बदले में उनके न चाहते हुए भी कुछ ज़रूर मिलना चाहिए। मर चुके लोगों को समाज कुछ भी देने में मजबूर है। तब समाज ईश्वर से उन्हें दूसरी दुनिया में उनकी शहादत का अच्छा बदला देने की प्रार्थना करता है।
    ...क्योंकि समाज चाहता है कि शहीदों के दिल में भले ही किसी ईनाम की ख्वाहिश न हो तो भी उनके लिए शहादत नुक्सान का सौदा न बने।
    व्यक्ति ‘सौदे‘ की भावना से ऊपर उठ सकता है, पूरा समाज नहीं। सौदे की भावना बुरी है भी नहीं। हरेक समाज में सौदा करना एक अच्छी बात है। नुक्सान का सौदा करना बुरी बात है और नफ़े का सौदा करना अक्लमंदी की बात है। यही वजह है कि शहीद होने वाले सैनिक और सिपाही भी अपनी शहादत से पहले हर महीने बाक़ायदा अपनी सैलरी वसूल करते हैं और अपनी सर्विस बुक में यह तक दर्ज करते हैं कि उनकी मौत के बाद मिलने वाले लाभ उनके परिवार में किस किस को मिलने चाहिएं ?

    शहीदों का अमल अपनी शहादत से पहले यह होता है। सियाचिन की ड्यूटी पर भेजे जाने वाले सैनिकों को दूसरे सैनिकों से कुछ ज़्यादा लाभ दिया जाता है। उनकी तरक्क़ी करके भी उन्हें नफ़ा पहुंचाया जाता है। रिटायरमेंट के बाद वे पेंशन भी लेते हैं। नास्तिक भी लेते हैं और उनका ज़मीर उन्हें ज़रा नहीं कचोटता क्योंकि सौदा कोई बुरी चीज़ नहीं है। इसीलिए तो समाज देश की सेवा करने वालों को और शहीदों के परिवारों को दौलत और इज़्ज़त से नवाज़ता है। फ़ायदे का सौदा देखकर ही लोग इनकी तरफ़ लपकते हैं। बुद्धि और विवेक नफ़ा नुक्सान देखकर ही फ़ैसला करते हैं।
    यह तो हुई सौदे की बात।

    देश के लिए क़ुरबानी देने वाले भगत सिंह अकेले नहीं थे। यह तय करना बड़ा मुश्किल है कि भगत की क़ुरबानी ज़्यादा बड़ी है या रानी लक्ष्मीबाई की या फिर किसी और की ?

    Read entire story on this link:
    http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/ziya-ul-haq

    DR. ANWER JAMAL said...

    धर्म से आशा और नास्तिकता से सिर्फ़ निराशा मिलती है
    @ प्रिय प्रवीण जी ! आपने दोहराया है कि
    ' कर्तव्य की राह पर बलिदान कोई भी आदमी अपने ज़मीर के चलते करता है और यही होना भी चाहिये, किसी अन्देखे-अनजाने की बनायी एक दूसरी काल्पनिक दुनिया में जम कर ऐशोआराम के लालच/फायदे के चलते तो कोई बलिदान की सोचना एक किस्म का सौदा होगा और सौदा करने वाला एक लालची इंसान भी... ऐसे लालची को बेवक्त जान गंवाने की बजाय कुछ दिन उपवास करना और दिन में कुछ बार प्रार्थना कर लेना एक बेहतर तरीका लगेगा स्वर्ग में सीट पक्की करने का ... :)'

    आप शहादत को केवल ज़मीर से जोड़कर देख रहे हैं। कई बार आदमी इसलिए नहीं भाग पाता क्योंकि भगोड़ा बनने की सज़ा भी मौत ही होती है। ऐसे में वह मैदान में दुश्मन से लड़कर इज़्ज़त की मौत मरना पसंद करता है। सेना ने भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत मुक़र्रर करके सैनिक को शहादत की मौत चुनने में ही भलाई समझाई है।
    सेना का क़ानून पुलिस में भी लगा दिया जाए तो भगोड़ों की तादाद बहुत कम हो जाएगी। ऐसा इसलिए नहीं होगा कि क़ानून की वजह से लोगों का ज़मीर जाग जाएगा। नहीं, बल्कि ऐसा इसलिए होगा कि अब मैदान से भागना नफ़े की बात है और तब मैदान से भागना नुक्सान की बात होगी।
    पता नहीं, आप इंसानी साइकोलॉजी की यह मामूली सी बात क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि इंसान उस काम से बचता है। जिसमें वह अपना नुक्सान देखता है और नुक्सान का काम करने वाला समाज में मूर्ख समझा जाता है।

    ज़मीर की आवाज़ पर काम करने वाले भी अपना नफ़ा देखकर ही काम करते हैं। वे अपने ज़मीर के खि़लाफ़ काम करते हैं तो उनके अंदर बेचैनी पैदा हो जाती है। अपने ज़मीर के मुताबिक़ काम करके उन्हें अपने अंदर बेपनाह ख़ुशी का अहसास होता है। बेचैनी से बचने के लिए और ख़ुशी महसूस करने के लिए ही वे ज़मीर की आवाज़ पर अपनी जान दे देते हैं। जिन्हें ज़मीर की आवाज़ पर क़ुरबानी देने के ख़याल से ही ख़ुशी महसूस होती है, वही शहादत की राह में ख़ुशी ख़ुशी क़दम बढ़ाते हैं।
    जिन्हें अपने अंदर यह ख़ुशी महसूस नहीं होती। वे दूसरे भौतिक लाभ पाने के लिए या सज़ा ए मौत और बदनामी से बचने के लिए अपनी जान देने के लिए खुद को मजबूर पाते हैं। जहां दूसरे भौतिक लाभ पर कोई आंच न आती हो और सज़ाए मौत या बदनामी भी न होती हो। वहां उन्हें उनकी अक्ल जान देने से रोकती है। वे अपने ज़मीर के बजाय अपनी अक्ल की बात मानते हैं और भाग खड़े होते हैं।

    ज़मीर की आवाज़ पर कम, बहुत कम लोग चलते हैं। ज़्यादातर लोग भौतिक नफ़े-नुक्सान का गणित देखकर फ़ैसला करते हैं। अक्ल सही हो तो मरना कोई भी न चाहेगा।
    आज समाज की रक्षा और सेवा वही लोग कर रहे हैं। जो अपने ज़मीर की आवाज़ पर काम कर रहे हैं। ये लोग बहुत कम हैं। इसीलिए न तो समाज की रक्षा ढंग से हो पा रही है और न ही उसकी सेवा। भौतिक नफ़े नुक्सान को सामने रखकर फ़ैसले करने वाले अक्सर लोगों को उनके फ़र्ज़ की अदायगी में शहादत के जज़्बे तक ले जाने से ही समाज की रक्षा व उसकी सेवा ढंग से हो पाएगी और ऐसा करने के लिए वे तभी तैयार होंगे जबकि उन्हें अपने फ़र्ज़ की अदायगी में नफ़ा और लापरवाही में सख्त सज़ा का नुक्सान नज़र आने लगेगा।
    सेना में यही नज़र आता है लेकिन दूसरे विभागों में भी यही नज़र आने की ज़रूरत है। सेना में भगोड़े के लिए सज़ा ए मौत की जानकारी ख़ुद आपने ही दी है। सेना में ड्यूटी की अदायगी और शहादत को सैनिकों के ज़मीर के भरोसे नहीं छोड़ा गया है क्योंकि किसी का कुछ भरोसा नहीं है कि वह ज़मीर की आवाज़ सुनकर उसका पालन करेगा या नहीं ?

    सैनिक अपने रिटायरमेंट के बाद कंपनियों को सिक्योरिटी गार्ड देने जैसा कोई न कोई काम कर लेते हैं। नास्तिक सैनिक भी यही करते हैं। अपने गुज़र बसर के लायक़ कमाने के बावजूद वे अपनी पेंशन भी लेते रहते हैं। नास्तिक भी पेंशन लेते रहते हैं।
    जो नास्तिक अपनी पेंशन के चंद रूपयों का लालच न छोड़ पाए। वह दूसरों को परलोक के बड़े ईनाम की चाहत पर लालची होने का दोष कैसे दे सकता है ?
    (जारी ...)

    DR. ANWER JAMAL said...

    ...धर्म में परलोक के जीवन की सफलता इसी बात में बताई गई है कि जिस वक्त इंसान के सिर पर जो फ़र्ज़ आयद हो, वह उसे ज़रूर अंजाम दे।
    वह बच्चा हो तो पढ़े और जब वह जवान हो जाए तो विवाह करे। माँ-बाप हों तो उनकी सेवा करे। अतिथि आ जाए तो उनकी भी करे और बच्चे हो जाएं तो उनकी परवरिश भी करे। नित्यकर्म के समय पर नित्यकर्म करे और उपासना के समय उपासना करे। भोजन के समय भोजन करे और उपवास के निश्चित काल में उपवास भी करे। ख़ुद शांति से खेती बाड़ी और दूसरे कारोबार करे और अगर दूसरे शांति व्यवस्था को भंग करें तो उन्हें बातचीत से या बल प्रयोग से रोके। फिर भी वे न मानें तो समूह का मुखिया जो कहे, उसे पूरा करे। वे हमला करें तो उनसे युद्ध करे।
    सभी फ़र्ज़ उम्र और हालात के साथ वाबस्ता हैं। शांतिकाल में हिंसा और युद्धक्षेत्र में अहिंसा धर्म नहीं सिखाता। प्रार्थना और उपवास के समय यही करना धर्म है और युद्ध अपरिहार्य हो जाए तो फिर युद्ध ही धर्म है। जो युद्ध से भाग जाए, उसे धर्म से भागा हुआ समझा जाता है और समाज में उसे जो अपयश मिलता है। वह न लड़ने वालों को भी धनुष उठाने पर मजबूर कर देता है।
    आप धर्म को ठीक से समझ लेते तो नास्तिक न होते।
    आपका नास्तिक होना, आपकी कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि धर्म के सच्चे बोध की उपलब्धि से वंचित रह जाना है। अक्सर नास्तिकता के पीछे यही कारण होता है।
    धर्म इंसान के ज़मीर के साथ उसके बुद्धि विवेक को भी अपील करता है। वह बताता है कि ‘ऐ इंसान ! अगर तू लड़ने बाद भी ज़िंदा रहा तो दूसरों की तरह तू भी दुनिया के सुख भोगेगा और अगर मर गया तो तू उनसे ज़्यादा अच्छे सुख भोगेगा और हमेशा भोगेगा।‘
    धर्म मनुष्य को आशा का संबल देता और नास्तिकता उसे निराश करती है। नास्तिकता बताती है कि जो कुछ है, बस यही जीवन है। मौत के साथ ही तू हमेशा के लिए ख़त्म है। तेरा ज़मीर भी ख़त्म हो जाएगा। सब कुछ गवां देने का नाम है नास्तिकता है जबकि सब कुछ पा लेने की आशा का नाम धर्म है।
    सनातन काल से आज तक हरेक भाषा में यही धर्म है और नास्तिकता भी यही है।
    आपकी नज़र में ज़िया उल हक़ जैसे आदमी को कुछ नहीं मिला। आपका यह उत्तर लोगों को निराश ही करेगा।

    धन्यवाद !

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