मुसलमानों की समस्याओं को बढ़ा रहे हैं बुख़ारी साहब जैसे मुस्लिम रहनुमा

कल जुमातुल-विदा की नमाज़ मुल्क भर में अमन के साथ अदा की गई और मुल्क भर के मुसलमानों ने अपनी और अपने मुल्क की ख़ुशहाली के साथ पूरी दुनिया में अम्नो-अमान की दुआएं मांगी।
राष्ट्रीय सहारा उर्दू (दिनांक 27 अगस्त 2011) के मुताबिक़ दिल्ली की जामा मस्जिद में भी दो लाख मुसलमानों ने अलविदा जुमा की नमाज़ अदा की। इस मौक़े पर शाही इमाम सय्यद अहमद बुख़ारी साहब ने मुसलमानों से खि़ताब भी किया।

अपने खि़ताब में मौलाना बुख़ारी साहब ने कहा कि मुसलमानों में मज़हब के बारे में जागरूकता और तालीम के मैदान में आगे बढ़ने की वजह से इस्लाम दुश्मन ताक़तें परेशान हैं और वे मुसलमानों को परेशान करने और उन्हें तरह तरह के मसाएल में उलझाने की साज़िशों में मसरूफ़ हैं। उन्होंने मुसलमानों को ताकीद की कि वे आपस में एकता क़ायम करें और दीन की रस्सी को मज़बूती से थामे रहें।
वे यही बातें कहकर रूक जाते तो हम भी टाल जाते लेकिन उन्होंने इस खि़ताब में अन्ना हज़ारे के आंदोलन का विरोध भी किया। उन्होंने कहा कि सड़क पर बनाए गए क़ानून को धौंस और ज़बर्दस्ती के ज़रिए मुल्क पर लागू नहीं किया जा सकता और हमें हर हाल में पार्लियामेंट की बालादस्ती क़ायम रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अन्ना के आंदोलन को फ़िरक़ापरस्तों का समर्थन भी हासिल है और अगर एक बार सरकार इस आंदोलन के सामने झुक गई तो फिर फ़िरक़ापरस्त ताक़तें भी ऐसे ही आंदोलन के ज़रिए राम मंदिर बनवाने का क़ानून पास करवा सकती है।
मौलाना बुख़ारी साहब ने यह भी कहा कि दिल्ली, उड़ीसा और गुजरात में सिख, ईसाई और मुसलमानों पर ज़ुल्म हुए लेकिन अन्ना ने कोई आंदोलन क्यों नहीं किया ?
मज़हबी रहनुमाओं की तक़रीर का सबसे प्यारा विषय है ‘तुम्हारे दुश्मन तुम्हारे खि़लाफ़ साज़िशें कर रहे हैं।‘
मैं बचपन से ये बातें पढ़ते पढ़ते जवान हो गया लेकिन अभी तक तो किसी दुश्मन की कोई साज़िश मुसलमानों का सफ़ाया कर न सकी। इसलिए अब यह यक़ीन पैदा हो गया है कि किसी की कोई साज़िश मुसलमानों को मिटा न सकेगी। अलबत्ता आपसी एकता और भाईचारे की बहुत ज़रूरत है और इसके सबसे बड़े दुश्मन यही थोड़े से ख़ुदग़र्ज़ मौलाना लोग हैं, जिन्हें इस्लामी शब्दावली में ‘उलमा ए सू‘ अर्थात बुरे आलिम की उपाधि दी गई है।
हक़ीक़त यह है कि मदरसे में जो कोई भी एक ख़ास कोर्स कर लेता है वह मौलवी कहलाने लगता है और उन्हीं को लोग आदर से मौलाना कहने लगते हैं। अच्छे दीनदार आलिम सियासतबाज़ी और जोड़ तोड़ से दूर रहते हैं जबकि इस हुनर के माहिर लोग मस्जिद और मदरसों पर क़ाबिज़ हो जाते हैं।
अच्छा आलिम वह होता है जो ख़ुदा से डरता है, गुनाह से बचता है और लोगों को सही बात बताता है। सच्चाई की ख़ातिर अपनी जान और अपना माल ख़र्च करता है। अच्छा आलिम उसूल के लिए ख़ुद को क़ुर्बान करता है।
बुरा आलिम वह होता है जो कि ख़ुद के लिए उसूलों को क़ुर्बान कर देता है। वही बात कहता है जिसमें उसका अपना कोई फ़ायदा हो। माल और शोहरत के लिए वह ग़लत लोगों की हिमायत करने से भी बाज़ नहीं आता और क़ौम को भी टुकड़े टुकड़े ऐसे ही लोग करते हैं।
कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक को ख़ुद मौलाना बुख़ारी साहब समर्थन दे चुके हैं। ऐसे में फिर किस दुश्मन से मुसलमानों को बच कर रहना चाहिए ?

क्या अन्ना से ?
मुसलमानों को फ़िरक़ों में बांटने वाले भी यही ख़ुदग़र्ज़ मौलवी हैं।
ये मतलबपरस्त मौलवी हैं तो थोड़े से लेकिन अपने जोड़ तोड़ की वजह से हैं बहुत पॉवरफ़ुल।
अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। ठीक ऐसे ही बुरे मौलवी अच्छे मौलवी को क़ौम का इमाम और पेशवा ही नहीं बनने देते।
इस्लाम में पुरोहितवाद नहीं है। इस्लाम में किसी जाति या किसी वंश के हाथ में मुसलमानों की मुक्ति निहित नहीं है और न ही यह है कि बाप के बाद बेटा ही मस्जिद का इमाम बनेगा। इस्लामी ख़लीफ़ा हज़रत अबूबक्र और हज़रत उमर रज़ि. ने अपने बाद खि़लाफ़त अपने किसी बेटे को दी भी नहीं जबकि उनके बेटे बड़े दीनदार और नेक थे।
इस्लाम का उसूल यह है कि जो आदमी अपने लिए किसी ओहदे का ख्वाहिशमंद हो तो वह उस ओहदे के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है।
ओहदे का ख्वाहिशमंद आदमी जब ओहदे पर बैठता है तो यह एक ग़ैर इस्लामी काम होता है और यह ग़ैर इस्लामी काम मौलाना बुख़ारी साहब के ख़ानदान में पिछली कई नस्लों से होता आ रहा है।
इस्लाम में तो क़ब्र पक्की करना ही मना है। उस पर इमारत बनाना भी मना है और उस पर नाच गाना करना, मेले लगाना और वहां औरतों का जमा होना भी मना है लेकिन हिंदुस्तान में हज़ारों जगह यही सब हो रहा है और मौलाना बुख़ारी ख़ामोश हैं।
अन्ना से उनकी ख़ामोशी का हिसाब मांगने वाले मौलाना बुख़ारी ख़ुद ख़ामोश क्यों हैं ?
इन हज़ारों मज़ारों के मुजाविर अपने बाद अपनी औलाद को उस क़ब्र की देखरेख सौंपता रहते हैं और उन क़ब्रों पर आने वाले दर्शनार्थियों से मिलने वाली रक़मों से ये मुजाविर ख़ानदान बिना कुछ किए ही नवाबों जैसी ज़िंदगी बसर करते हैं जबकि पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सत्संगी सहाबा की भी मौत हुई और उनकी औलाद ने उनकी क़ब्रों को अपनी इन्कम का ज़रिया नहीं बनाया। वे आजीवन मेहनत मज़दूरी, किसानी और कारोबार के ज़रिये ही अपनी रोज़ी हासिल करते रहे।
मौलाना बुख़ारी लोगों को ग़लती पर जमे देखकर महज़ इसलिए चुप हैं कि चुप रहने में ही उनकी भलाई है और यही काम अन्ना ने किया। अन्ना ने महाराष्ट्र में बिहारियों को पिटते हुए देखा लेकिन ख़ामोश रहे क्योंकि इसी में उनकी भलाई थी। हरेक आदमी अपनी ताक़त के मुताबिक़ ही काम अंजाम दे सकता है।
बात यह नहीं है कि अन्ना ने कब कब आंदोलन नहीं किया बल्कि असल बात यह है कि जब जब उन्होंने आंदोलन किया तो क्या तब तब वह ग़लत थे ?

इमाम साहब ने इससे पहले यह भी कहा था कि अन्ना की सभा में लोग वंदे मातरम् के नारे लगाते हैं , इसलिए मुसलमानों को उनकी सभा से दूर रहना चाहिए लेकिन वंदे मातरम् के नारे तो लोग महात्मा गांधी की सभा में भी लगाते थे और कांग्रेस की सभाओं में भी लगा देते हैं तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और मौलाना हुसैन अहमद मदनी जैसे आलिम उनकी सभा में जाने से और उन्हें समर्थन देने से क्यों न रूके और ख़ुद बुख़ारी साहब कांग्रेस को समर्थन क्यों देते आए हैं ?
वंदे मातरम् बीजेपी का प्रिय इश्यू है। बीजेपी के लिए भी मौलाना बुख़ारी साहब मुसलमानों से समर्थन की अपील कर चुके हैं। जो जो आदमी मौलाना को नवाज़ सकता था, उसके हक़ में मौलाना ने दीन से हटकर भी समर्थन की अपील की लेकिन अन्ना बेचारे मौलाना को कुछ दे नहीं सकते तो फिर मौलाना का समर्थन उन्हें क्यों मिलने लगा भला ?
मुसलमान मस्जिद जाता है नमाज़ अदा करने के लिए और उन्हें वहां मिल जाते हैं मौलाना अहमद बुख़ारी साहब जैसे रहनुमा जो अपनी ग़र्ज़ की वजह से उन्हें ग़लत रहनुमाई देकर भटका रहे हैं।
मुसलमानों में तालीम के बढ़ते रूझान से इस्लाम के दुश्मनों से ज़्यादा मुसलमानों के यही रहनुमा परेशान हैं क्योंकि उनके लिए मुसलमानों को बेवक़ूफ़ बनाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा है।
अलविदा जुमा के मौक़े पर मौलाना का बयान मुसलमानों की किसी भी समस्या का हल नहीं है बल्कि इस्लाम की असल भावना से दूर करने वाला है और इस्लाम की भावना यह है कि नेकी के हरेक काम में सबको सहयोग दीजिए चाहे वह तुम्हारे वर्ग से हो या उसके बाहर से हो, चाहे वह तुम्हारे समान धार्मिक मान्यता रखता हो या फिर उनसे अलग या उनके विपरीत रखता हो।
अन्ना की सभा में सभी मान्यताओं के लोग शामिल हो रहे हैं और वे अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार नारे लगाने के लिए आज़ाद हैं। मुसलमानों को भी आज़ादी है कि वे उर्दू , फ़ारसी और अरबी में जिस ज़बान में चाहें अपने नारे लगा लें।
अल्लाह मुसलमानों से रोज़े क़ियामत यह सवाल नहीं करेगा कि दूसरों ने क्या नारे लगाए थे ?
लेकिन वह यह सवाल ज़रूर करेगा कि ‘ऐ मुसलमानों ! तुमने इस ज़मीन से ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी के ख़ात्मे के लिए क्या किया ?
मुसलमानों को अपने फ़र्ज़ की अदायगी पर ध्यान देना चाहिए, जिसके बारे में आखि़रत (परलोक) में पूछताछ होगी और दुनिया में सरबुलंद बनाने वाली बात भी दरअसल यही है।
जिस दिन मुसलमान अपने ग़लत रहनुमाओं को किनारे कर देंगे, उसी दिन मुसलमानों की फ़िरक़ेबंदी भी दूर हो जाएगी और उनकी सारी कमज़ोरियां भी दूर हो जाएंगी और तब दुश्मन की हरेक साज़िश नाकाम होकर रह जाएगी।
मौलाना बुख़ारी को भी यह देखना चाहिए कि वे इस्लामी ख़लीफ़ाओं के नक्शे क़दम पर हैं या उनसे हटकर चल रहे हैं ?
अन्ना के आमाल का जायज़ा लेने के बजाय वे ख़ुद देखें कि आज तक बयान देने के अलावा उन्होंने मुसलमानों के लिए क्या किया है और ख़ुद के लिए क्या किया है ?
...और इस्लाम के लिए उन्होंने क्या किया है ?
उन्हें देखना चाहिए कि वे इस्लाम के लिए ख़ुद को क़ुर्बान कर रहे हैं या कि ख़ुद के लिए इस्लामी उसूलों की बलि चढ़ा रहे हैं ?
इसी विषय पर हमारा यह लेख भी देखने लायक़ है

बुख़ारी का बयान इस्लाम के खि़लाफ़

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दिल्ली दूर है अन्ना जी.......

बेचारे अन्ना बुरे फंस गए। संसदीय प्रक्रिया को वो समझते नहीं और उनकी टीम में जो लोग समझते हैं, उनसे सरकार बात ही नहीं करना चाहती। वैसे तो मेरे पिछले लेख को आप पढें तो मैने साफ कर दिया था कि जिस तरह से ये आंदोलन चलाया जा रहा है, उससे अन्ना को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। अन्ना रामराज्य की बात कर रहे हैं, वो देश को पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त करने चाहते हैं, लेकिन ये काम जिसे करना है, वो दागदार है। ऐसे में उनसे ज्यादा उम्मीद करनी ही नहीं चाहिए। ठीक उसी तरह जैसे सिविल सोसायटी में अगर अन्ना को छोड़ दें तो बाकी लोगों का दामन भी साफ है, ये पूरे विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। जहां से आंदोलन शुरु हुआ था, हम वही आज भी वहीं खडे हैं, ये चर्चा पूरी तरह बेमानी है। इसका बिल ड्राप्ट होने में कोई महत्व नहीं है।
बाकी बातें हम बाद में करते रहेंगे, आज बिना भूमिका के मैं ये समझाने की कोशिश करुंगा कि सरकार कैसे मूर्ख बना रही है अन्ना को। अन्ना जी चाहते थे उनके जनलोकपाल बिल को तत्काल संसद में पेश किया जाए, और ना सिर्फ पेश किया जाए, बल्कि उसे पास करके कानून बनाया जाए। इस मामले में सरकार ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि एक बिल इस मामले में पेश किया जा चुका है और वो स्थाई समिति के पास है, लिहाजा दूसरा बिल पेश नहीं किया जा सकता। लेकिन ये बात अन्ना टीम को समझ में नहीं आई, फिर सरकार ने माथापच्ची शुरू की।
कई दौर की बातचीत के बाद तय हुआ कि उनके बिल के कुछ खास बिंदुओं को एक प्रस्ताव के रुप में संसद में रखा जाएगा और इस पर चर्चा की जाएगी। अब पेच फंसा कि संसद में किस नियम के तहत ये चर्चा की जाए। सरकार नियम 193 के तहत चर्चा चाहती थी, जिसमें चर्चा के बाद कोई वोटिंग नहीं होती है, सिर्फ एक प्रस्ताव तैयार होता है। विपक्ष इस पर नियम 184 के तरह चर्चा चाहता था, जिसमें चर्चा के बाद वोटिंग होती है, इसके बाद प्रस्ताव स्थाई समिति को भेजा जा सकता है। इस बात को लेकर सरकार और विपक्ष में ठन गई और कहा गया कि ये चर्चा किसी नियम के तहत नहीं होगी। सरकार के मंत्री एक प्रस्ताव लाएंगे और उसी के आधार पर एक प्रस्ताव काम मजमून अन्ना के पास भेज कर उनसे अनशन खत्म करने का आग्रह किया जाएगा। आपको बता दूं कि ऐसी चर्चा आमतौर पर संसद के नियम 342 के तहत होती है, जिसमें संसद की भावना क्या है, इसकी जानकारी की जाती है।
यहां यह बताना जरूरी है कि जब किसी मसले पर एक बिल संसद में पेश किया जा चुका हो, तो उस पर संसद में किसी तरह की चर्चा नहीं की जा सकती। इससे स्थाई समिति जो एक संवैधानिक संस्था है, उसकी गरिमा गिरती है। गरिमा को छोड भी दें तो ऐसे प्रस्ताव का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि बिल को अंतिम रूप देने का अधिकार स्थाई समिति को ही है। बहरहाल इस चर्चा से इतना साफ हो गया है कि ज्यादातर लोग जनलोकपाल बिल का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन प्रस्ताव का समर्थन करने का यह मतलब कत्तई नहीं की, ये लोकपाल बिल का भी समर्थन करेंगे। यहां एक लाइन मे लालू का जिक्र करना जरूरी है, जो स्थाई समिति के सदस्य हैं। उनका साफ कहना है कि सभी दल संविधान के तहत काम करने की बात कर रहे हैं, लेकिन संविधान के तहत तो यह चर्चा ही नहीं हो सकती।
वैसे सरकार और सिविल सोसायटी दोनों ही जानते हैं कि इस चर्चा का कोई मतलब नहीं है। स्थाई समिति में इससे जु़डे चार बिल और हैं, इसलिए समिति को सभी बिलों को चर्चा के लिए सामने रखना होगा। इसके अलावा स्थाई समिति में आम आदमी भी अपना सुझाव दे सकता है। यहां सभी सुझावों पर गुण दोष के आधार पर फैसला होता है। ऐसे में सदन में की ये चर्चा सिर्फ समय की बर्बादी भर है, इसका कोई मायने नहीं है।
इससे जुडे कुछ और मसलों पर के बारे में आपको बताना चाहता हूं। दरअसल सरकार में शामिल कुछ लोग सरकार के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसकी वजह भी आपको मालूम होनी चाहिए। आपको पता है कि सोनिया गांधी गंभीर रुप से बीमार हैं और अमेरिका में इलाज करा रही हैं। जानकार कहते हैं कि तीन चार महीने वो पार्टी के काम में सक्रिय नहीं रह सकती। अपनी अनुपस्थिति में पार्टी का कामकाज चलाने के लिए उन्होंने एक चार सदस्यीय कमेटी बनाई। इसमे राहुल गांधी, जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल और ए के एंटोनी को शामिल किया है। इस टीम को लेकर सरकार और पार्टी में शामिल तमाम नेता पार्टी से सख्त नाराज हैं।
अन्ना ने जब आंदोलन की धमकी दी तो पहले ही बातचीत करके मसले का कुछ हल निकाला जा सकता था। लेकिन सोनिया की बनाई टीम को लोग उसकी औकात बताना चाहते थे, लिहाजा किसी ने कोई पहल ही नहीं की। जो कोई आगे आया भी तो वो बाबा रामदेव के तर्ज पर अन्ना से भी निपटने का सुझाव देते रहे। वो ऐसे सुझाव देते रहे, जिससे सरकार की किरकिरी हो। इसी के तहत पहले अन्ना को गिरफ्तार कराया गया, सरकार की किरकिरी हुई, फिर अन्ना को छोडने का फरमान सुनाया गया तो सरकार की किरकिरी हुई, अन्ना ने जेल से बाहर आने से इनकार कर दिया, फिर सरकार की किरकिरी हुई। अनशन के लिए जगह देने में जिस तरह का ड्राम सरकार की ओर से किया गया, उससे भी सरकार की किरकिरी हुई। अब सरकार ने संसद में इस मामले में पूरे दिन चर्चा की, लेकिन बिना किसी नियम के हुई इस चर्चा से वो किसे बेवकूफ बना रहे हैं। ये समझ से परे है। सरकार में तो आपस में मतभेद और संवादहीनता रही है है, टीम अन्ना सही तरह से आंदोलन चलाने में नाकाम रही है।
बेचारे अन्ना की अंग्रेजी जानते नहीं और हिंदी कम समझते हैं। टीम अन्ना के सदस्य उन्हें जिस तरह से बात समझाते हैं, वो उन्हें समझ में ही नहीं आती। कई बार देखा गया है कि मंत्रियों से बात कुछ हुई और रामलीला मैदान तक पहुंचते पहुंचते बात कुछ और हो जाती है। हालत ये हुई कि सरकार को अन्ना के नुमाइंदों से किनारा करना पडा और एक ऐसे मंत्री को अन्ना से बात करने की जिम्मेदारी दी गई जो महाराष्ट्र से आते हैं। जिससे अन्ना से सीधे मराठी में बात करके उन्हें समझाया जा सके और उनके चंगू मंगू को दूर किया जा सके। बहरहाल सरकार को ये काम पहले करना चाहिए था, जो उसने बाद में किया। वैसे भी अन्ना की टीम से दो महत्वपूर्ण सदस्य खासे नाराज हैं और वो यहां से जा चुके हैं।
बहरहाल अब अन्ना को एक प्रस्ताव थमाने की तैयारी है और हो सकता है वो अपना अनशन भी समाप्त कर दें। लेकिन मित्रों अन्ना को तीन दिन त उनकी टीम ने सिर्फ अपनी "फेस सेविंग" के लिए भूखा रखा। अन्ना को उस दिन ग्रेसफुल तरीके से अपना अनशन खत्म कर देना चाहिए था, जिस दिन संसद ने उनसे अपील की थी। लेकिन जिस संसद से उन्हें अपने बिल की उम्मीद है, उसकी गरिमा को अन्ना ने तार तार कर दिया।
आज मैं पूछना चाहता हूं अन्ना के नुमाइंदों से उस दिन और आज में अनशन तोडने मे क्या फर्क है। क्या कुछ नया हासिल कर लिया आपने। बिना किसी नियम के हुई इस चर्चा के बाद ये मसला भी स्थाई समिति में ही जाएगा। वहीं से इस बिल को ड्राफ्ट किया जाएगा। अगर बिल को स्थाई समिति से ही ड्राफ्ट होना था, तो ये बात तो प्रधानमंत्री बहुत पहले ही कह चुके थे , आप खुद उनसे मिल कर अपना बिल सौंप चुके थे। फिर इतने दिन अनशन से क्या हासिल हुआ। लेकिन हां आपकी टीम ने बहुत कुछ हासिल किया है, इन्हें कोई नहीं जानता था, अब इन लोगों की इतनी पहचान हो गई है कि वो चुनाव लड़ सकते हैं। अन्ना जी प्लीज अबकी बार आंदोलन शुरु कीजिए, तो पहले जान लीजिए कि हम किसलिए आंदोलन कर रहे हैं, और कहां तक बात माने जाने पर समझौता कर सकते हैं। ये दिल्ली है अन्ना जी और दिल्ली अभी भी आमआदमी से बहुत दूर है।


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दुष्टों के विनाश के लिए ‘अवतार तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (31)

अवतार तकनीक
भारतीय मिथक में एक कल्पना ‘अवतार‘ की भी है। जो गुण हातिम ताई में पाए जाते हैं, वे सभी अच्छे गुण अवतार में भी पाए जाते हैं और कुछ गुण अवतार में और भी अधिक होते हैं।
अवतार भी बुरे लोगों का ख़ात्मा करके भले लोगों की सुरक्षा करता है। अवतार भी मदद करता है लेकिन इसकी मदद में संघर्ष और युद्ध का गुण प्रधान होता है। अवतार होगा तो वह लड़ेगा ज़रूर और मारेगा ज़रूर। न लड़े और न मारे तो समझ लीजिए कि यह पात्र अवतार भी नहीं है। आम तौर से राजपूत, गूजर, जाट और पठान आदि जातियों के सदस्य इस तकनीक का अच्छा इस्तेमाल अनायास ही करते देखे गए हैं।
यह तकनीक एक बहुत भारी तकनीक है क्योंकि लड़ना असल काम नहीं है बल्कि यह असल बात है कि किस मक़सद के लिए लड़ा जा रहा है ?
अवतार की लड़ाई मात्र एक लड़ाई नहीं होती बल्कि वह सब लड़ाईयों का अंत करती है। अवतार कभी अपने आप नहीं लड़ता और न ही उसे लड़ने की कोई इच्छा होती है लेकिन दुखी और परेशान हाल सज्जन लोग उसके पास आते हैं और बताते हैं कि बुरे लोग किस किस तरह उन्हें टॉर्चर कर रहे हैं ?
किस तरह वे ईश्वर और धर्म का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं ?
किस तरह वे नैतिकता की धज्जियां उड़ा रहे हैं ?

अवतार का मक़सद इन्हीं गुणों की रक्षा करना होता है। इन गुणों की रक्षा के लिए वह बुरे लोगों को उपदेश देता है लेकिन अगर बुरे लोगों को उपदेश से ही सुधरना होता तो उपदेश तो वे उससे पहले भी सुन रहे थे। वे उसका भी मज़ाक़ उड़ाते हैं। पापी लोग समझते हैं कि यह भी उपदेश देने के सिवा कुछ और नहीं कर पाएगा और ऐसा सोचकर वे उसे भी घेर लेते हैं और उससे भिड़ जाते हैं।
उपदेश को बेकार जाता देखकर और ख़ुद को घिरा देखकर अवतार के पास अब कोई और उपाय शेष ही कब रहता है ?
अब एक भयानक रण होता है जिसे हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में महाभारत का नाम दिया जा सकता है।
पापी वे होते हैं जो युद्ध के बाद लुंज पुंज और हताश-निराश से नज़र आएं जबकि युद्ध के बाद अवतार पहले से ज़्यादा तेजोमय और बलशाली होकर उभरता है।
एक नया ब्लॉगर भी इस ‘अवतार तकनीक‘ का इस्तेमाल कर सकता है लेकिन इसकी बुनियादी शर्तों में से यह है कि शुरूआत लड़ाई से न हो बल्कि उपदेश से हो और मसला बातचीत से सुलझ जाए तो फिर लड़ाई की कोई गुंजाइश ही नहीं है। दूसरी बात यह है कि यह उपदेश और यह लड़ाई सब कुछ नेकी को क़ायम रखने के लिए होनी चाहिए, अपने स्वार्थ के लिए नहीं।
जो अवतार है उसकी जीत निश्चित है चाहे वह अकेला ही लड़े और उसके खि़लाफ़ हज़ारों ब्लॉगर भी एकत्र क्यों न हो जाएं !
जीत वास्तव में सत्य के लिए निश्चित है।
‘सत्यमेव जयते‘
यानि जीत सत्य की होती है और अवतार सत्य के लिए ही लड़ता है तो फिर उसे कौन हरा सकता है ?
सत्य के लिए खड़े होने वाला ब्लॉगर चाहे कितना ही नया क्यों न हो, वह अवश्य जीतेगा। उसी की जीत से पता चलेगा कि हारने वाले ब्लॉगर दुष्ट, पापी और राक्षस हैं। आज की दुनिया में रावण, कंस, मारीच और पूतना यही हैं।
जो लोग इन्हें ऐतिहासिक मानने से इंकार करते हैं उनसे भी हम यही कहेंगे कि ठीक है आप इन्हें ज्यों का त्यों ऐतिहासिक न मानें और ये ऐतिहासिक हैं भी नहीं बल्कि उससे बहुत काल पहले की बातें हैं लेकिन जो जो प्रवृत्तियां इन पात्रों की बताई गई हैं क्या वे प्रवृत्तियां इंसान में मिलती हैं या नहीं ?
क्या हमेशा से इंसान के अंदर और इंसानी समाज के अंदर, दोनों ही जगह सत्य और असत्य का संघर्ष चलता आ रहा है या नहीं ?
अगर सत्य और असत्य का संघर्ष निरंतर चल ही रहा है, अगर भले और बुरे लोगों का वैचारिक युद्ध चल ही रहा है तो वह यहां ब्लॉग जगत में भी अनिवार्य रूप से चलेगा ही और तब आप उस युद्ध से चाहकर भी बच नहीं पाएंगे।
ऐसे मजबूरी के हालात में आपके हाथ में केवल अपनी पोज़िशन तय करना ही होता है कि आप किस ओर से लड़ रहे हैं ?
असत्य की भारी भीड़ की ओर से या सत्य पक्ष के मुठ्ठी भर लोगों की ओर से ?
राक्षसों का दल हमेशा से बड़ा और शक्तिशाली ही रहा है और आज भी ऐसा ही है।
राम जी गए , किशन जी भी चले गए लेकिन यह युद्ध आज भी वर्तमान है। दोनों पक्ष आज भी वर्तमान हैं और आप इन्हीं दोनों में से किसी एक पक्ष का हिस्सा हैं, चाहे आपको पता हो या न हो।
इंसान वही है जो सत्य पक्ष की ओर हो, बाक़ी तो राक्षस हैं या फिर बुद्धिहीन पशु। पशु स्तर की बुद्धि रखने वाले लोग भी अवतार का ही साथ देते हैं और जो अवतार का साथ नहीं देते वे पशुओं से भी गए बीते हैं। दुश्मन के कैंप से भी कुछ ब्लॉगर चोट खाकर या चोट देकर निकल खड़े होते हैं। अवतार उनका भी अच्छा प्रयोग करता है। यही लोग बताते हैं कि पापी का कमज़ोर स्थल कौन सा है ?
एक ज़ुल्म जो अवतार के साथ किया जाता है, वह यह है कि उसके चरित्र पर झूठे लांछन लगाए जाते हैं। लांछन लगाने वाले नीचता की हरेक हद तक गिरकर लांछन लगाते हैं।
इसके बावजूद उसकी लोकप्रियता और मान्यता में कोई अंतर नहीं आता और दुश्मनों का जी जलाने के लिए इतना ही पर्याप्त है।
अवतार को आप एक प्रवृत्ति भी मान सकते हैं, एक ऐसी प्रवृत्ति जो हर ज़माने में रही है और हरेक के अंदर रही है। जो इस प्रवृत्ति को परवान चढ़ाता है उसके उत्कृष्ट गुण पर्दे से निकलकर सामने आ जाते हैं। ये गुण जब साधारण मानवों के सामने आते हैं तो उन्हें ऐसा लगता है जैसे कि वे किसी इंसान को नहीं बल्कि ईश्वर को देख रहे हैं लेकिन हक़ीक़त यह है कि जब मनुष्य के बारे में लोगों को ऐसा लगने लगे तो तभी यह समझना चाहिए कि मनुष्य ने अब अपनी मनुष्यता को प्राप्त कर लिया है। योग्यता और अवसर ईश्वर ने सबको दे रखा है, जो इंसान अपनी हक़ीक़त को पाना चाहे, पा सकता है।
अवतार कभी डरता नहीं, थकता नहीं, भागता नहीं, हारता नहीं और मरता नहीं।
अवतार हमेशा अपना मक़सद पूरा करता है और वह मक़सद होता है सज्जनता की रक्षा करना और धर्म की स्थापना करना।
अवतार का मक़सद ही पवित्र नहीं होता बल्कि उसके वे साधन भी पवित्र होते हैं जिनके ज़रिये वह अपने मक़सद को हासिल करता है।
जो ब्लॉगर इन उसूलों की पाबंदी के साथ ब्लॉगिंग करता है और दुष्टों का विनाश कर देता है, वह वास्तव में मानवता की सच्ची सेवा करता है।
‘अवतार तकनीक‘ का सहारा लेकर एक डिज़ायनर ब्लॉगर सफलतापूर्वक राक्षस ब्लॉगर्स का मान मर्दन करता है और ज़िंदगी भर उन्हें फिर किसी और से टकराने के लायक़ नहीं छोड़ता। किसी युद्ध के विजेता की तरह ही उसे हमेशा याद रखा जाता है। भले लोग उसे भलाई से याद रखते हैं और राक्षस पक्ष के लोग उसे नफ़रत के साथ और चिढ़ते हुए याद रखते हैं। उसे भुलाना मुमकिन नहीं रह जाता।
यही सफलता है।
सफलता की गारंटी सत्य देता है और अवतार तकनीक में सत्य का ही प्रयोग होता है। इसीलिए हिंदी ब्लॉगिंग में अवतार तकनीक को सफलता के लिए रामबाण की तरह अचूक माना जाता है।
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संसद पर हमला है ये आंदोलन.....


दोपहर में एक जरूरी मीटिंग निपटाने के बाद दिल्ली से नोएडा आफिस लौट रहा था। कार संसद भवन के सामने से निकल रही थी, आज ना जाने क्यों मेरी निगाह संसद भवन से हट ही नहीं रही थी, जबकि कार को ड्राईवर संसद भवन से राजपथ पर काफी दूर तक ला चुका था। लेकिन मैं पीछे इसी ऐतिहासिक इमारत को देखता रहा। अचानक मुझे ना जाने क्या हुआ, मैने ड्राईवर से कहा कि इंडिया गेट से वापस मुझे फिर संसद भवन आना है। हालाकि ड्राईवर ने मुझे याद दिलाया कि आपको वैसे ही आफिस पहुंचने में देर हो चुकी है, और आप दोबारा संसद भवन जाने को कह रहे हैं। ये बात याद दिलाते हुए ड्राईवर फिर संसद भवन के करीब पहुंच कर कार रोक दी।
आपको बता दूं कि पिछले पांच छह महीनों को छोड़ दें तो इसके पहले कई साल तक ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो, जब हम अपने पत्रकार मित्रों के साथ एक दो घंटे संसद भवन के सामने विजय चौक पर ना बिताते हों। सच तो ये है कि हम सभी पत्रकार साथी सुबह आफिस निकलने के बाद पूरे दिन जहां कहीं से भी कोई रिपोर्ट कर रहे हों, लंच हम सब यहीं विजय चौक पर साथ ही करते रहे हैं। इसलिए ऐसा भी कुछ नहीं कि मैं पहली बार संसद भवन के सामने से गुजर रहा हूं। खैर पांच सात मिनट यहां ख़ड़े रहने के दौरान मैं फिर गाडी में बैठा और आफिस  के लिए रवाना हो गया।
वापस लौटते वक्त सोचता रहा आखिर कितने हमले झेलेगी ये पर्लियामेंट। एक बार 13 दिसंबर 2001 को पांच आतंकी सीमापार हथियारों से लेस होकर यहां घुस आए। वो तो इस संसद को लहुलुहान कर देना चाहते थे और यहां एक ऐसी काली इबारत लिखना चाहते थे, जो धब्बा हम जीवन भर ना भुला सकें। लेकिन हमारे बहादुर सिपाहियों ने उन पांचो को मार गिराया और संसद भवन के भीतर भी घुसने नहीं दिया।
आज 10 साल बाद एक बार फिर संसद पर हमला हो रहा है। आप भले कहें कि ये कोई आतंकी हमला नहीं है। लेकिन मित्रों मैं बताऊं ये उससे भी बड़ा और खतरनाक हमला है। इस हमले में किसी एक व्यक्ति या नेता की हत्या करना मकसद नहीं है। बल्कि इनका मकसद संसदीय परंपराओं और मान्यताओं की हत्या करना है। आज तमाम लोग भावनाओं में बहकर शायद उन पांच आतंकियों को ज्यादा खतरनाक कहें तो हथियार के साथ संसद भवन में घुसे थे, लेकिन मैं उनके मुकाबले सिविल सोसाइटी के पांच लोगों को उनसे ज्यादा खतरनाक मानता हूं। बस दुख तो ये है कि ये सीमापार से नहीं आए हैं, हमारे ही भाई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था से भली भांति परिचित भी हैं, फिर भी देश के लोकतंत्र को कमजोर और खत्म करने पर आमादा हैं।
  आपको ये जानना जरूरी है कि संसद सदस्य पर ये दबाव नहीं बनाया जा सकता कि वो किस बिल का समर्थन करें और किसका नहीं। ये संवैधानिक अधिकार उन्हें बाबा भीमराव अंबेडकर ने दिया है। अगर उन्हें संसद की किसी कार्रवाई के लिए बाध्य किया जाता है तो यह संसद सदस्य के विशेषाधिकार के उलंघन का मामला बनता है। आज  अन्ना जो खुद को गांधी कहे जाने पर गर्व महसूस करते हैं, वो कह रहे हैं कि जो सांसद बिल का समर्थन ना करे, उसके घर के बाहर धरना दो। यहां फिर अन्ना के चेले कहेगें कि सांसद भी तो पैसे लेकर सवाल पूछते हैं, उनका क्या होगा। अरे भाई उन्हें कानून सजा देगा ना। दिल्ली पुलिस ने वोट के बदले नोट कांड में राज्यसभा सदस्य अमर सिंह समेत कई और लोगों के खिलाफ कोर्ट मे चार्जशीट दायर किया है ना। हां आप कह सकते हैं कि इन मामलों के निस्तारण की रफ्तार कम है। इसके लिए स्पेशन कोर्ट बनाकर मामलों की सुनवाई जल्दी की जा सकती है। लेकिन आज सांसदो को मजबूर किया जा रहा है कि वो सिविल सोसाइटी के जनलोकपाल बिल का ही समर्थन करें। वरना उनके घर के बाहर हम हंगामा करेंगे, धरना देंगे।
सिविल सोसायटी घमंड में चूर है। उसे लग रहा है कि आज वो किसी भी तरह का फैसला करा सकते हैं। उनकी भाषा बेअंदाजों जैसी है। उन्हें लग रहा था कि अनशन शुरू होते ही सरकार हिल जाएगी। मंच से चिल्लाने लगे कि सरकार से जो बात होगी वो यहीं रामलीला मैदान के मंच पर होगी। हालत ये हुई कि सरकार ने बात करने से ही इनकार कर दिया। इस पर सभी हैसियत में आ गए। सरकार ने ठीक ढंग से बात की तो कहने लगे, सरकार झुक गई। भूखे अन्ना तो इतने बेलगाम हैं कि उन्होंने सरकार को सीधे धमकी दी कि अगर 30 अगस्त तक बिल पास ना  करा पाए तो गद्दी छोडकर जाएं। अन्ना की बात पर हंसी आती है। दरअसल अन्ना जी ने तमाम लडाइयां जरूर लडी हैं, लेकिन वो छोटे स्तर की थी। मुंबई में नगर पालिका के खिलाफ, प्रदेश सरकार के मंत्री के खिलाफ, कुछ अफसरों को लेकर धरना दिया, और वो कामयाब भी  हुए हैं। लेकिन अन्ना जी अब आपकी लडाई केंद्र से है। खैर इसमें आपकी भी कोई ज्यादा गल्ती नहीं है। आपकी पढाई तीन दर्जे तक हुई है, आपके साथ जो लोग हैं उनके बारे में सबको पता है।
कहा जा रहा है कि एक भुट्टे को पैदा करने के लिए एक दाने को शहीद होना ही पड़ता है। यानि जब एक बीज जमीन में डाला जाता  है, तभी एक पूरा भुट्टा पैदा हो सकता है। तो क्या सिविल सोसाइटी अन्ना जी को शहीद होने का दाना समझ रही है। रामलीला मैदान है, यहां लोग कई साल से तरह तरह की लीलाएं देखने के लिए जमा होते हैं। यह कोई शहीद स्थल तो है नहीं। आपकी लीला भी देश देख रहा है। अन्ना जी आप अपने टीम के मुखौटा हैं। आपके साथी तो आपको मुखौटा बनाकर जंतर मंतर की छोटी मोटी लडाई लड़ना चाहते थे, लेकिन भ्रष्टाचार से परेशान लोग आपके साथ खडे हैं।
प्रधानमंत्री सच्चे आदमी हैं, वो  आपकी तरह झूठी बात जनता के सामने नहीं कह सकते। वजह उनकी बातों की और पद की एक मर्यादा है। आप कुछ भी कह सकते हैं। बताइये जिस देश का प्रधानमंत्री कह रहा हो कि भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो एक दिन में इसे खत्म कर दें। लेकिन अन्ना और टीम जिस तरह से बात कर रही है उससे लगता है कि जनलोकपाल बनते ही भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा।    
वैसे सच सिर्फ इतना भर है कि देश में बडी संख्या में सियासी, नौकरशाह और निचले स्तर पर कर्मचारी बेईमान हो गए हैं। इसकी वजह से आम आदमी की मुश्किलें बढ गई हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 121 करोड़ की आबादी को कानून के दायरे में नहीं बांधा जा सकता। देश में आज किस अपराध के लिए सख्त कानून  नहीं है, फिर भी कौन सा अपराध देश में नहीं हो रहा है। मित्रों मुंबई पर हमला करने वाले कसाब को हम सजा नहीं दे पा रहे हैं। संसद पर हमला करने का षडयंत्र करने वाला अफजल गुरू जेल मे वीआईपी सुविधा ले रहा है। और हम चोरों को फांसी देने की बात कर रहे हैं। अन्ना जी सरकार अपराधियों को न्यायालय से मिली सजा पर अमल भर करने लगे, तो लोगों में कानून के प्रति सम्मान और भय पैदा होगा। बडे बडे भ्रष्टाचारी जेल जाने लगें और उनकी संपत्ति जब्त होने लगे, छोटे कर्मचारी तो ऐसे ही रास्ते पर आ जाएंगे।
 अन्ना जी प्रधानमंत्री ने आज सर्वदलीय बैठक कर आपकी बातों को उनके सामने रख दिया। सर्वदलीय बैठक ने आपके जनलोकपाल को खारिज कर दिया। लेकिन सभी दलों ने आपके प्रति सम्मान व्यक्त किया है, और सलाह दी है कि आप अनशन खत्म करें। प्लीज अन्ना दादा मैं भी आपकी बातों और तरीके से सहमत नही हूं। आप पहले अनशन खत्म करें, फिर सरकार के साथ बात करके मजबूत बिल बनाने के लिए सरकारी तंत्र के साथ लडाई लडें।  

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कुछ कलाम पानीपत के मुशायरे से

पानीपत । जामिया दारूल उलूम ट्रस्ट हाली कॉलोनी की में शायर ताहिर सदनपुरी की तरफ़ से टी. वी. कलाकार राजेन्द्र गुप्ता के सम्मान में एक मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें ख़ास तौर पर ये शेर ज़्यादा पसंद किए गए ।
फ़लक के चांद को मुश्किल में डाल रखा है
ये किसने खिड़की से चेहरा निकाल रखा है
शायर - इक़बाल अहमद ‘इक़बाल‘

तूने जब ख़त्म ही कर डाले हैं रिश्ते सारे
फिर ये सावन तेरी आंखों से बरसता क्यूं है
शायर - महबूब अली ‘महबूब‘

सीने से दिल निकाल कर क़दमों पे रख दिया
वो कैसे मेरे प्यार से इन्कार करेंगे
शायर - शकील सीतापुरी

वतन के हुक्मरानो , ग़लतफ़हमी में मत रहना
ये बूढ़ी हड्डियां इस मुल्क का चेहरा बदल देंगी
शायर - पंडित शिवकांत ‘विमल‘
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बड़ी देर भई नंदलाला

बड़ी देर भई नंदलाला





बड़ी देर भई नंदलाला
      बड़ी देर भई नंदलाला,कोंन है हमारा रखवाला रे
 आओ देखो नेताओं ने इस देश का क्या हाल कर डाला रे
    नेताओं की हो रही है चाँदी
    सारे देश की हो रही है बर्बादी
 हर तरफ फैल रहा है भ्रस्टाचार
  बढ़ रहा है चोरबाजारी,मक्कारी ,बलात्कार 
अब यहाँ गुंडों मवालिओं का बोलबाला रे 
बड़ी देर भई नंदलाला,कोंन है हमारा रखवाला रे
  इस आजादी के लिए वीरों ने अपनी जान दी
   अपने आन और शान की कुर्बानी दी
              आजादी और उनकी कुर्बानी हो गई ब्यर्थ                                     
कहीं कोई नहीं सुनवाई ना कोई सुननेवाला रे
         बड़ी देर भई नंदलाला, अब कोंन है हमारा रखवाला रे
                        द्वापर युग में आपने एक कंश को मारा था

                   
अर्जुन को भगवत-गीता का पाठ समझाया था
   अपनों द्वारा किये गए जुल्मों का अंत करना सिखाया था                       
कलयुग के लाखों कंशों से अब कोंन है मुक्ति दिलानेवाला रे
 बड़ी देर भई नंदलाला,अब कोंन है हमारा रखवाला रे 
देश में  मची है हर तरफ हंगामा और त्राहि-त्राहि
    अन्ना हजारेजी ने इसके खिलाफ आवाज है उठाई 
    सारी जनशक्ति भी उनके समर्थन में सामने आई 
      पर सरकार ने सबकी आवाज दबानी चाहि 
    आओ अब तो तुम्हारा ही सहारा है मुरलीवाला रे
   अब देर ना करो नंदलाला,आकर बनो हमारे रखवाला रे

                       
                        HAPPY JANMAASTMI                          

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आपकी जेब भर सकती है ‘हातिम ताई तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (30)

‘सर्च ए विलेन तकनीक‘ का मक़सद यह है कि जो बुरे लोग हिंदी ब्लॉगिंग में नफ़रत फैला रहे हैं या ग़लत उसूलों का प्रचार कर रहे हैं, उनकी पहचान करके उन्हें सत्य मार्ग पर लाने का प्रयास किया जाए और अगर वे लड़ाई झगड़े पर उतारू हों तो उनकी अक्ल ठिकाने लगा दी जाए। इससे अच्छे लोगों को निर्भय होकर अपना काम करने के लिए साज़गार माहौल मिल जाता है। अच्छे मक़सद के लिए काम करना आदमी को अच्छा बनाता है और अच्छाई पर चलना आदमी को बहुत जल्द लोकप्रिय बना देता है। कामयाबी बहुत जल्द ऐसे आदमी के क़दम चूमती है और ये लोग अपनी सेवा और अपने कारनामों की बदौलत बहुत बाद तक याद किए जाते हैं।
इस तकनीक को समझने के लिए दो हिस्सों में तक़सीम किया जा सकता है।
1. हातिम ताई तकनीक
2. अवतार तकनीक

डिज़ायनर ब्लॉगिंग में जो दो तकनीकें प्रचलित हैं, उन्हें समझने के लिए ये दो नाम बहुत मुनासिब हैं।
हातिम ताई अरब का एक मिथकीय पात्र है और अवतार एक भारतीय मिथक है।
अरब और हिन्द के अंतर के बावजूद दोनों के अंदर बहुत सी समानताएं हैं, जैसे कि दोनों ही जीवन भर लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाने के लिए बुरे लोगों से संघर्ष करते रहे।
इस समानता के बावजूद ज़रा सा अंतर भी है और वह यह कि हातिम ताई को ‘सख़ी‘ अर्थात दानी के नाम से भी जाना जाता है। वह एक ऐसा पात्र है जो कि लोगों का दोस्त और हमदर्द है और वह लोगों की हर तरह से मदद करता है। जिन्हें रूपये पैसे की ज़रूरत होती है तो उन्हें रूपये देता है और जिन्हें हमदर्दी के बोल की ज़रूरत हो तो उनके साथ हमदर्दी की बातें करता है और जिनके लिए भागदौड़ करने की ज़रूरत हो तो उनके लिए भागदौड़ भी करता है, चाहे उसमें उसका कितना ही समय लगे या फिर उसका जीवन ही क्यों न चला जाए ।

जो ब्लॉगर इस रीति से व्यवहार करता है, वह जाने अनजाने सख़ी हातिम ताई तकनीक का इस्तेमाल कर रहा होता है। लोगों के मन में एक मददगार और एक मसीहा की जो छवि अंकित है, वह उसमें पूरी होते देखकर लोग अनायास ही उसे अपनी श्रृद्धा का केन्द्र बना लेते हैं।
जो ब्लॉगर वास्तव में ही ऐसा होता है, वह उनकी श्रृद्धा का हक़दार होता भी है लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि वे ख़ुद को ज़ाहिर तो करते हैं सख़ी हातिम ताई जैसा ही और मुसीबत के मारे हिंदी ब्लॉगर की दो चार हज़ार रूपये से मदद भी करते हैं लेकिन फिर बहुत ही जल्द वे उसकी इज़्ज़त को सरेआम नीलाम भी कर देते हैं। ये लोग वास्तव में केवल हातिम ताई तकनीक को अपनी छवि निर्माण के लिए इस्तेमाल कर रहे होते हैं जबकि इनके जज़्बात बौर्ज़ुआ होते हैं। भेड़ की खाल में छिपा हुआ भेड़िया ऐसे ही लोगों को कहा जाता है।
अपने अमल से ये जल्द ही पहचान लिए जाते हैं लेकिन अपनी बेहतरीन प्रेज़ेन्टेशन के चलते इनका बहिष्कार करना या इन्हें किनारे कर देना मुमकिन नहीं होता।
हातिम ताई तकनीक की यह सबसे बड़ी सफलता है कि इसे इस्तेमाल करने वाला खलनायक भी नायक जैसा ही सम्मान पाता है और मसीहा समझा जाता है।
एक नया ब्लॉगर भी इसे आसानी से आज़मा सकता है।
जो इस तकनीक पर चलना चाहे तो उसे ख़ुद को लोगों के मददगार और मसीहा के रूप में पेश करना होगा। अगर आपके पास ठीक ठाक दौलत है तो आप हिंदी ब्लॉगर की रूपयों पैसों से मदद करने की बात भी अपनी पोस्ट और अपनी टिप्पणियों में कह सकते हैं। यह बात आपको बार बार दोहरानी चाहिए। यह बात इतनी ज़्यादा बार दोहरानी चाहिए कि आप नाम याद आते ही रूपये का ध्यान बेइख्तियार ही आ जाए।
ग़रीबों की मदद करने के लिए आप कोई ट्रस्ट भी बना लें वर्ना बेहतर तो यह है कि अपना ब्लॉग बनाने से पहले एक ट्रस्ट ज़रूर बना लें। जो लोग नाजायज़ तरीक़ों से कमा रहे हैं और अपने नाजायज़ रास्तों में ही ख़र्च कर रहे हैं, उनकी आत्मा पर बहुत बोझ हो जाता है। ऐसे में जब वे कुछ दान करते हैं तो उन्हें अपनी आत्मा पर से कुछ बोझ कम होता हुआ लगता है। अपनी आत्मा की शांति के लिए वे बार बार दान करते रहते हैं। दान करने से एक तरफ़ तो उन्हें शांति मिलती है और दूसरी तरफ़ उनकी शान भी टपकती रहती है। ऐसे लोगों का माल लूटने के लिए तो बहुत से लोग गुरू होने का ढोंग भी रचाए फिर रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे गुरू सभी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। ऐसे लोग आपके ट्रस्ट को चंदा भी देंगे।
अमीर लोगों की दिनचर्या बहुत बिज़ी होती है और ग़रीब का भी सारा दिन रोटी के जुगाड़ में ही निकल जाता है। दोनों ही बिज़ी हैं। अमीर के पास तो फिर भी संडे सैटरडे को या सुबह शाम को घूमने फिरने या क्लब में जाने का समय मिल जाता है लेकिन ग़रीब आदमी के पास तो इतना समय भी नहीं होता। ऐसे में ग़रीब आदमी किसी से मदद मांगने के लिए जाए भी तो किस दिन और किस समय ?
आपका ट्रस्ट ग़रीबों की यही समस्या हल करेगा।
इसके लिए आप भी नियमित रूप से क्लब जाना शुरू कर दीजिए। आपको वहां कुछ काम न हो तो अपनी बेटी को ही उस क्लब का मेंबर बना दीजिए और आप उसके साथ जाने लगिए या फिर ख़ुद मेंबर बन जाइये और उसे साथ ले जाने लगिए। उसे रस्सी कूद कर पेट घटाने पर और लटक लटक कर क़द बढ़ाने पर लगा दीजिए और आप ख़ुद टेनिस खेलिए या फिर तीरंदाज़ी कीजिए। इससे आप बिल्कुल एक अमीर आदमी के माफ़िक लगेगा और अपने जैसे के पास ही आदमी उठता बैठता है।
बस अमीर आदमी आपके पास आने जाने लगेंगे। बातचीत में आप बस यूं ही अपने ट्रस्ट का ज़िक्र कर दीजिएगा। दान देने के लिए उसकी आत्मा जब भी फड़फड़ाएगी , वह आपको ज़रूर याद करेगा। ट्रस्ट के वार्षिक समारोह में उसे चीफ़ गेस्ट बनाएंगे तो वह आपको दान हंड्रेड परसेंट देगा।
ग़र्ज़ यह कि इस तकनीक से आप किसी को देंगे बाद में और आपको मिलेगा पहले और वह भी दें तो दें और न दें तो न दें।
एक रब के सिवा के और कौन देख रहा है ?
लड़की के रिश्ते की समस्या भी यही तकनीक दूर करेगी। लोग अच्छा ससुर उसे मानते हैं जो ज़्यादा दे और आप तो बैठे ही देने के लिए हैं। लड़की का रंग और क़द हल्का हो तो भी चल जाता है लेकिन बाप की जेब हल्की हो तो नहीं चलेगी।
इसलिए आज हरेक आदमी पर लाज़िम है कि वह अमीरी के दो चार उपकरण का जुगाड़ ज़रूर कर ले और एक लग्ज़री कार और एक कुत्ता इनमें सबसे ज़रूरी उपकरण हैं। ब्लड हाउंड, अलसेशियन और बुलडॉग कुत्तों का लुक ‘हातिम ताई तकनीक‘ के पात्र से मैच नहीं करता। सफ़ेद पॉमेरियन इस पात्र की सौम्यता से पूरी तरह मैच करता है।
बहरहाल जब इतनी तैयारी के साथ मय कार के जब आप ब्लॉगिंग शुरू करेंगे तो आप अमीर ग़रीब सभी ब्लॉगर्स को धड़ाधड़ फ़ोलो करते चले जाइये। बदले में वे भी आपको फ़ोलो करेंगे। मुल्क के भुक्खों से लेकर जर्मनी और कनाडा के छके हुए तक, सभी आप से जुड़ते चले जाएंगे।
अब आपका काम यह है कि कोई ग़रीब, तंगदस्त और हालात का मारा अगर अपने ब्लॉग पर बैठा हुआ रोज़गार मांग रहा हो तो उसकी मदद की अपील अपने ब्लॉग से आप भी कीजिए। आपकी अपील से एक तरफ़ तो ग़रीब निहाल हो जाएगा और दूसरी तरफ़ विदेशी धन्ना सेठों को आपके रूप में एक उचित और विश्वसनीय माध्यम मिल जाएगा। यहां भी आमद का सिलसिला शुरू हो जाएगा। अब अगर आप वाक़ई मदद करते हैं तो आप सचमुच हातिम ताई के पदचिन्हों पर हैं।
आपकी कार भी बहुत से हैसियतदार ब्लॉगर्स को आप से जोड़ देगी। मिसाल के तौर पर कोई आदमी कैनेडा से या लखनऊ से या जयपुर से आ रहा है और आप दिल्ली में रहते हैं तो वह ब्लॉगर अपनी कार तो साथ लाएगा नहीं। ऐसे में अगर आप उसे अपनी कार के ज़रिये थोड़ी सी भी सुविधा उपलब्ध करा देते हैं तो वह सदा के लिए आपका हो जाएगा क्योंकि ऐसा करने में ही उसका फ़ायदा है और इसी में आपका फ़ायदा भी है।
इसी कार पर सवार होकर आप अपने आस पास बसे हुए हिंदी ब्लॉगर्स से मिलिए। कभी उनके पास जाइये और कभी उन्हें अपने पास बुलाइये। यही मिलना मिलाना और आना जाना आपके संबंधों को मज़बूत करता है। इसका ध्यान विशेष रूप से रखना चाहिए।
जिन लोगों के पास कार और कुत्ता नहीं है या वे दिल्ली में नहीं रहते हैं या कोई हिंदी ब्लॉगर उनके आस पास नहीं रहता है। वे भी इस तकनीक को इस्तेमाल कर सकते हैं बल्कि उनके लिए यह तकनीक इस्तेमाल करना और भी आसान है। अब उन्हें तो कार और कुत्ते का फ़ोटो मात्र ही अपने ब्लॉग पर डालना है। उसका वेरिफ़िकेशन करने कौन आ रहा है ?
...लेकिन जो सत्यव्रतधारी हों और झूठ की परछाई तक से बचना चाहते हों तो वे उनक फ़ोटो न भी डालें तो भी चलेगा।
ऐसे में उन्हें नेट और ब्लॉगिंग की तकनीक का माहिर होना चाहिए। वे अपना ब्लॉग बनाएं और लोगों की तकनीकी मदद करें। थोड़ी मदद तो मुफ़्त में कर दें और ज़्यादा मदद मांगे तो उससे फ़ीस भी ले सकते हैं। जैसे प्यार की शुरूआत मामूली हंसने मुस्कुराने से होती है, ऐसे ही मामूली और मुफ़्त की मदद हिंदी ब्लॉगर्स को आपका एक दिन आपका ग्राहक बनाकर ही छोड़ेगी और इसमें कोई बुराई भी नहीं है।
जो लोग समझते हैं कि हिंदी ब्लॉगिंग में आमदनी नहीं है तो वे ग़लत समझते हैं। लोग कमा रहे हैं लेकिन उनकी कमाई जगज़ाहिर नहीं हो रही है और नाम तो बहरहाल सब कमा ही रहे हैं और इसी को वे ‘स्वान्त सुखाय‘ बता रहे हैं।
पुराने ब्लॉगर तो इस तकनीक के फ़नकार हैं ही, नए ब्लॉगर भी इससे काम ले सकते हैं, बस आदमी कलाकार होना चाहिए। अगर आदमी कलाकार नहीं है तो फिर वह इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसी तकनीक का क्या वह डिज़ायनर ब्लॉगिंग की किसी भी तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर सकता। 

जादुई ताक़त के मालिकों से भी हातिम ताई को टकराना पड़ता है लेकिन हातिम ताई सीधे जादूगर या जिन्न पर अटैक करने के बजाय उस तोते की गर्दन मरोड़ता है, जिसमें उस जादूगर या उस जिन्न के प्राण सुरक्षित होते हैं।
हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में भी ऐसे तोते पाए जाते हैं जिन्हें ‘हातिम ताई तकनीक‘ बरतने वाला पहचानता है और अलग अलग सबसे लड़ने के बजाय बस एक तोते की गर्दन मरोड़ देता है।

अगर आप हातिम ताई तकनीक इस्तेमाल करने का इरादा कर चुके हैं तो आपके लिए लाज़िम है कि आप पहले ‘सर्च ए विलेन‘ पर अमल करें और फिर उस तोते की तलाश करें जिसमें उस विलेन जादूगर के प्राण छिपाकर रखे गए हों।

हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

...अगली क़िस्त में आप पढ़ेंगे ‘अवतार तकनीक‘
तब तक कुछ और ख़ास तकनीकों की जानकारी आपको मिलेगी निम्न शीर्षक के अंतर्गत
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डा. अमर कुमार जी की ख़ुशी के लिए कम से कम एक दिन सभी लोग अपने ब्लॉग से मॉडरेशन हटा लें

डा. अमर कुमार जी को श्रृद्धांजलि,
डा. अमर कुमार जी आज हमारे बीच नहीं हैं।
मौत एक ऐसा सच है जिसे न तो झुठलाया जा सकता है और न ही बदला जा सकता है। कामयाब वही इंसान है जो एक रब का होकर जिये।
डा. साहब अक्सर टिप्पणी पर मॉडरेशन लगाए जाने के विरोधी थे।
इसके खि़लाफ़ वह अक्सर ही आवाज़ बुलंद किया करते थे।
उनकी ख़ुशी के लिए कम से कम एक दिन सभी लोग अपने ब्लॉग से मॉडरेशन हटा लें तो उनके लिए हमारी तरफ़ से यह एक सम्मान होगा।
वह एक ज्ञानी आदमी थे।
उनकी टिप्पणी उनके ज्ञान का प्रमाण है।
जिसे आप देख सकते हैं इस लिंक पर  
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राजनैतिक संतों की परंपरा

गीता में भी कहा गया है और भारतीय मान्यता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है ईश्वर का अवतार होता है. ईश्वर तो नहीं लेकिन हमने देखा है कि भारत में जब-जब सत्ता निरंकुशता की और बढ़ी है और उसके प्रति जनता का आक्रोश बढ़ा है एक राजनैतिक संत का आगमन हुआ है जिसके पीछे पूरा जन-सैलाब उमड़ पड़ा है. महात्मा गांधी से लेकर अन्ना हजारे तक यह सिलसिला चल रहा है. विनोबा भावे, लोकनायक जय प्रकाश नारायण समेत दर्जनों राजनैतिक संत पिछले छः-सात दशक में सामने आ चुके हैं. इनपर आम लोगों की प्रगाढ़ आस्था रहती है लेकिन सत्ता और पद से उन्हें सख्त विरक्ति होती है. अभी तक के अनुभव बताते हैं कि राजनैतिक संतों की यह विरक्ति अंततः उनकी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है. महात्मा गांधी के प्रति आम भारतीयों में अपार श्रद्धा थी. उनहोंने आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्त्व किया. सत्याग्रह के अमोघ अस्त्र के जरिये आजादी दिलाई लेकिन सत्ता का नेतृत्त्व ऐसे हाथों में सौंप दिया जो जन-आकांक्षाओं की कसौटी पर खरे नहीं उतरे और समाज को जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटकर वोटों का समीकरण बनाने और सत्ता पर काबिज़ रहने की तिकड़मों में व्यस्त हो गए. गद्दी पर बैठने के बाद उन्होंने गांधी को भी अप्रासंगिक मान लिया और उनके नाम का उपयोग सिर्फ अपने कुरूप चेहरे को ढकने के लिए करने लगे. कुछ सुधारवादी संतों के बाद सत्ता को पलट देने वाले संत लोकनायक जयप्रकाश नारायण आये. उन्होंने भी सत्ता की बागडोर ऐसे लोगों के हाथ में सौंप दी जो जन आकांक्षाओं के अनुरूप शासन नहीं दे सके. जिन्होंने अपनी गतिविधियों से जनता को नाराज कर दिया और सत्ता से बहार हो गए. आज भ्रष्टाचार के आरोपियों में उस आन्दोलन से निकले नेताओं की भी अच्छी-खासी तादाद है. अब अन्ना हजारे राजनैतिक संतों की इस श्रृंखला की वर्तमान कड़ी हैं. उनके पीछे पूरा देश उमड़ पड़ा है. जेपी के पीछे तो युवा वर्ग था अन्ना के पीछे बच्चे, बूढ़े, महिलाएं तक उमड़ पड़ी हैं. इतना तय हो चूका है कि उनका आन्दोलन सिर्फ जन-लोकपाल तक सीमित नहीं रहने वाला. यह जन-उभार पूरी व्यवस्था परिवर्तन की निर्णायक जंग का शंखनाद साबित होने जा रही है. सत्ता परिवर्तन होना तय है. एक जनपक्षीय राजनैतिक संस्कृति का आगमन होगा. पूर्व संतों के अनुभवों को देखते हुए अन्ना ने एक सावधानी जरूर बरती है कि अभी तक अपने ईर्द-गिर्द पेशेवर राजनैतिक दलों और नेताओं को नहीं फटकने दिया है. लेकिन सत्ता की बागडोर सौंपने के समय उन्हें बहुत सावधानी बरतनी होगी. गांधी और जेपी की भूल न दुहराई जाये इसका ध्यान रखना होगा.

-देवेंद्र गौतम

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जी हाँ में आज़ाद भारत का नेता हूँ .......


जी हाँ मेरे भारत वासियों
में आज़ाद भारत का नेता हूँ ।
जनता से सिर्फ और सर लेता ही लेता हूँ
कभी वोट लेता हूँ ..तो कभी ट्रांसफर कभी कोई काम कराने के पेसे लेता हूँ
संसद में में अगर पहुंचूं तो बस सवाल पूंछने के भी रूपये लेता हूँ
हां दोस्तों में भारत देश का नेता हूँ
में देश को देश की जनता को
सिर्फ और सिर्फ भ्रस्टाचार , बेईमानी , अनाचार ही देता हूँ
जी हाँ दोस्तों में आज़ाद भारत का नेता हूँ
में कहीं भी किसी भी पार्टी में रहूँ
सरकार किसी की भी हो
बस विपक्ष में रहूँ या सरकार में
आपसी सान्थ्गान्थ कर या तो संसद से वाक् आउट करता हूँ
या संसद ही नहीं जाता हूँ
अगर विश्वास मत के पक्ष में वोट डालना पढ़े
तो रिश्वत लेकर संसद में में कोई भी सरकार हो उसे बचाता हूँ
भ्रष्टाचार की जहां बात हो वहां खुद को गांधीवादी कहलवाता हूँ
संसद हो चाहे हो विधान सभा चाहे हो पंचायत
जब भी चुनाव होते हैं करोड़ों रूपये
पानी की तरह बहाता हूँ
वोट मांगने जाता हूँ तब जनता और वोटर होती है जनार्दन
और जब वोट लेकर नेता बन जाता हूँ
तो बस जनता अगर मिलने आये तो उसे पहचानने से इनकार कर भगाता हूँ
कोई खास जिद्दी मिलने वाला आ भी जाये तो रिश्वत नहीं देने पर
ऐसे आदमी को बिना काम किये नियमों का हवाला देकर टरकाता हूँ ।
अन्ना जेसे कोई ईमानदार आ भी जाएँ तो उन्हें भी
खुद की कुर्सी बचाने के लियें
कभी में उन्हें बेईमान कभी साम्प्रदायिक कभी हिन्दू विरोधी कभी मुस्लिम विरोधी कहकर
जनता को ऐसे लोगों के खिलाफ भड़काता हूँ
जी हाँ दोस्तों में आज़ाद भारत का नेता हूँ ।
देश को दीमक की तरह खा रहा हूँ
देश की योजनाये देश का बजट कमीशन खोरों के हवाले हैं
कभी में ऐ राजा तो कभी में कोमन वेल्थ का घोटालेबाज बन जाता हूँ
लेकिन मेरा आज तक कुछ बिगड़ा नहीं है
कभी बिगड़ेगा भी नहीं क्योंकि में आज़ाद देश का नेता हूँ
देश की भोली भली जनता को ऐसे ही बेवकूफ बनाता हूँ ..........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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बीमारी हो गई दूर , आब ए ज़म ज़म का करिश्मा


आज आब ए ज़म ज़म की एक और ही विशेषता के बारे में जानने का मौक़ा हमें तब मिला जबकि हम देखने के लिए तो गए तो कुछ और मिल गई यह पोस्ट ,
आप भी देखें और इसे अपने मुसलमान दोस्तो को इसकी जानकारी दें।

करिश्माई है आब ए जमजम


 हम आपको रूबरू करवा रहे हैं उस इंजीनियर शख्स से जिसने करीब चालीस साल पहले खुद आब ए जमजम का निरीक्षण किया था। जमजम पानी का सैंपल यूरोपियन लेबोरेट्री में भेजा गया । जांच में जो बातें आई उससे साबित हुआ कि जमजम पानी इंसान के लिए रब की बेहतरीन नियामत है। आम पानी से अलग इसमें इंसानों के लिए बड़े-बड़े फायदे छिपे हैं। इंजीनियर तारिक हुसैन की जुबानी
आबे जमजम पर जापानी वैज्ञानिक का अध्ययन

 

 हज का मौका आने पर मुझे करिश्माई पानी जमजम की याद ताजा हो जाती है। चलिए मै आपको देता हूं मेरे द्वारा किए गए इसके अध्ययन से जुड़ी जानकारी। 1971 की बात है। मिस्र के एक डॉक्टर ने यूरोपियन प्रेस को लिखा कि मक्का का जमजम पानी लोगों के पीने योग्य नहीं है। मैं तुरंत समझा गया था कि मिस्र के इस डॉक्टर का प्रेस को दिया यह बयान मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित है। दरअसल इसके इस बयान का आधार था कि काबा समुद्रतल से नीचे है और यह मक्का शहर के बीचोंबीच स्थित है। इस वजह से मक्का शहर का गंदा पानी नालों से इस कुएं में आकर जमा होता रहता है।
   यह खबर सऊदी शासक किंग फैसल तक पहुंची। उनको यह बहुत ज्यादा अखरी और उन्होंने मिस्र के इस डॉक्टर के इस प्रोपेगण्डे को गलत साबित करने का फैसला किया। उन्होंने तुरंत सऊदिया के कृषि और जलसंसाधन मंत्रालय को इस मामले की जांच करने और जमजम पानी का एक सैंपल चैक करने के लिए यूरोपियन लेबोरेट्री में भी भेजे जाने का आदेश दिया। मंत्रालय ने जेद्दा स्थित पावर डिजॉलेशन प्लांट्स को यह जिम्मेदारी सौंपी। मैं यहां केमिकल इंजीनियर के रूप में कार्यरत था और मेरा काम समुद्र के पानी को पीने काबिल बनाना था। मुझे जमजम पानी को चैक करने की जिम्मेदारी सौपी गई। मुझे याद है उस वक्त मुझे जमजम के बारे में कोई अंदाजा नहीं था। ना यह कि इस कुएं में किस तरह का पानी है। मैं मक्का पहुंचा और मैंने काबा के अधिकारियों को वहां आने का अपना मकसद बताया। उन्होंने मेरी मदद के लिए एक आदमी को लगा दिया। जब हम वहां पहुंचे तो मैंने देखा यह तो पानी का एक छोटा कुण्ड सा था। छोटे पोखर के समान। 18 बाई 14 का यह कुआं हर साल लाखों गैलन पानी हाजियों को देता है। और यह सिलसिला तब से ही चालू है जब से यह अस्तित्व में आया। यानी कई शताब्दियों पहले हजरत इब्राहीम के वक्त से ही।
      मैंने अपनी खोजबीन शुरू की और कुएं के विस्तार को समझने की कोशिश की। मैंने अपने साथ वाले बंदे को कुएं की गहराई मापने को कहा। वह शावर ले गया और पानी में उतरा। वह पानी में सीधा खड़ा हो गया। मैंने देखा पानी का स्तर उसके कंधों से थोड़ा ही ऊपर था। उस शख्स की ऊंचाई लगभग पांच फीट आठ इंच थी। उस शख्स ने सीधा खड़ा रहते हुए उस कुएं में एक कोने से दूसरे कोने की तरफ खोजबीन की कि आखिर इसमें पानी किस तरफ से आ रहा है। पानी की धारा कहां है जहां से पानी निकल रहा है। (उसे पानी में डूबकी लगाने की इजाजत नहीं थी।) उसने बताया कि वह नहीं खोज पाया कि पानी किस जगह से निकलता है।
   पानी आने की जगह ना मिलने पर मैंने दूसरा आइडिया सोचा। हमने उस कुएं से पानी निकालने के लिए बड़े पंप लगा दिए ताकि वहां से तेजी से पानी निकल सके और पानी के स्रोत का पता लग सके। मुझे हैरत हुई कि ऐसा करने पर भी हमें इस कुएं में पानी आने की जगह का पता नहीं चल पाया। लेकिन हमारे पास सिर्फ यही एकमात्र तरीका था जिससे यह जाना जा सकता था कि आखिर इस पानी का प्रवेश किधर से है। इसलिए मैंने पंप से पानी निकालने के तरीके को फिर से दोहराया और मैंने उस शख्स को निर्देश दिया कि वह पानी में खड़े रहकर गौर से उस जगह को पहचानने की कोशिश करे। अच्छी तरह ध्यान दें कि कौनसी जगह हलचल सी दिखाई दे रही है। इस बार कुछ समय बाद ही उसने हाथ उठाया और खुशी से झूम उठा और बोल पड़ा-अलहम्दु लिल्लाह मुझे कुएं में पानी आने की जगह का पता चल गया। मेरे पैरों के नीचे ही यह जगह है जहां से पानी निकल रहा है। पंप से पानी निकालने के दौरान ही उसने कुएं के चारों तरफ चक्कर लगाए और उसने देखा कि ऐसा ही कुएं में दूसरी जगह भी हो रहा है। यानी कुएं में हर हिस्से से पानी के निकलने का क्रम जारी है। दरअसल कुएं में पानी की आवक हर पॉइंट से समान रूप से थी और इसी वजह से जमजम के कुएं के पानी का स्तर लगातार एक सा रहता है। और इस तरह मैंने अपना काम पूरा किया और यूरोपियन लेबोरेट्री में जांच के लिए भेजने के लिए पानी का सैंपल ले आया।
     काबा से रवाना होने से पहले मैंने वहां के अधिकारियों से मक्का के आसपास के कुओं के बारे में जानकारी ली। मुझे बताया गया कि इनमें से ज्यादातर कुएं सूख चुके हैं। मैं जेद्दा स्थित अपने ऑफिस पहुंचा और बॉस को अपनी यह रिपोर्ट सौंपी। बॉस ने बड़ी दिलचस्पी के साथ रिपोर्ट को देखा लेकिन बेतुकी बात कह डाली कि जमजम का यह कुआं अंदर से रेड सी से जुड़ा हो सकता है। मुझे उनकी इस बात पर हैरत हुई कि ऐसे कैसे हो सकता है? मक्का इस समंदर से करीब 75 किलोमीटर दूर है और मक्का शहर के बाहर स्थित कुएं करीब-करीब सूख चुके हैं।
यूरोपियन लेबोरेट्री ने आबे जमजम के नमूने की जांच की और हमारी लेब में भी इस पानी की जांच की गई। दोनो जांचों के नतीजे तकरीबन समान थे।

जमजम पानी में कैल्शियम और मैग्नेशियम   जमजम के पानी और मक्का शहर के अन्य पानी में केल्शियम और मैग्रेशियम साल्ट्स की मात्रा का फर्क था। जमजम में ये दोनों तत्व ज्यादा थे। शायद यही वजह थी कि जमजम का पानी यहां आने वाले कमजोर हाजी को भी उर्जस्वित और तरोताजा बनाए रखता है। 
जमजम पानी में फ्लोराइड महत्वपूर्ण बात यह थी कि जमजम के पानी में पाया जाने वाला फ्लोराइड अपना महत्वपूर्ण प्रभावी असर रखता है। यह फ्लोराइड कीटाणुनाशक होता है।सबसे अहम बात यह है कि यूरोपियन लेबोरेट्री ने अपनी जांच के बाद बताया कि यह पानी पीने के लिए एकदम उपयुक्त है। और इस तरह मिस्र के डॉक्टर का जमजम के बारे में फैलाया गया प्रोपेगण्डा गलत साबित हुआ। इस रिपोर्ट की जानकारी जब शाह फैसल को दी गई तो वे बेहद खुश हुए और उन्होंने यूरोपियन प्रेस को यह जांच रिपोर्ट भिजवाने के आदेश दिए। जमजम पानी की रासायनिक संरचना के अध्ययन से देखने को मिला कि यह तो ईश्वर का अनुपम उपहार है। सच्चाई यह है कि आप जितना अधिक इस पानी को जांचते हैं उतनी नई और महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं और आपके ईमान में बढ़ोतरी होती जाती है।
     आइए मैं आपको जमजम के पानी की चंद खूबियों के बारे में बताता हूं-

         कभी नहीं सूखा- जमजम का यह कुआं कभी भी नहीं सूखा। यही नहीं इस कुएं ने जरूरत के मुताबिक पानी की आपूति की है। जब-जब जितने पानी की जरूरत हुई, यहां पानी उपलब्ध हुआ।
  • एक सी साल्ट संरचना- इस पानी के साल्ट की संरचना हमेशा एक जैसी रही है। इसका स्वाद भी जबसे यह अस्तित्व में आया तब से एक सा ही है।
  •  सभी के लिए फायदेमंद- यह पानी सभी को सूट करने वाला और फायदेमंद साबित हुआ है। इसने अपनी वैश्विक अहमियत को साबित किया है। दुनियाभर से हज और उमरा के लिए मक्का आने वाले लोग इसको पीते हैं और इनको इस पानी को लेकर कोई शिकायत नहीं रही। बल्कि ये इस पानी को बड़े चाव से पीते हैं और खुद को अधिक ऊर्जावान और तरोताजा महसूस करते हैं।
  •  यूनिवर्सल टेस्ट- अक्सर देखा गया है कि अलग-अलग जगह के पानी का स्वाद अलग-अलग होता है लेकिन जमजम पानी का स्वाद यूनिवर्सल है। हर पीने वाले को इस पानी का स्वाद अलग सा महसूस नहीं होता है।
  •  कोई जैविक विकास नहीं- इस पानी को कभी रसायन डालकर शुद्ध करने की जरूरत नहीं होती जैसा कि अन्य पेयजल के मामले में यह तरीका अपनाया जाता है। यह भी देखा गया है कि आमतौर पर कुओं में कई जीव और वनस्पति पनप जाते हैं। कुओं में शैवाल हो जाते हैं जिससे कुएं के पानी में स्वाद और गंध की समस्या पैदा हो जाती है। लेकिन जमजम के कुए में किसी तरह का जैविक विकास का कोई चिह्न भी नहीं मिला।
   शताब्दियों पहले बीबी हाजरा अलै. अपने नवजात बच्चे इस्माइल अलै. की प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश के लिए सफा और मरवा पहाडिय़ों के बीच दौड़ लगाती है। इसी दौरान मासूम इस्माइल अलै. अपनी एडिय़ों को रेत पर रगड़ते हैं। अल्लाह के करम से उस जगह पानी निकलने लगता है। फिर यह जगह कुएं का रूप ले लेती है जो जाना जाता है जमजम का पानी।
रिसर्च- तारिक हुसैन,रियाद    और अब मोरक्को की महिला की एक दिलचस्प स्टोरी आब ए जमजम के करिश्मे की दास्तां सुनिए इस मोरक्को की महिला से जो कैसर से पीडि़त थीं। वे अल्लाह के दर पर पहुंची और शिफा की नीयत से आब ए जमजम का इस्तेमाल किया। अल्लाह ने उसे इस लाइलाज बीमारी से निजात दी। मोरक्को की लैला अल हेल्व खुद बता रही है अपनी स्टोरी-

   नौ साल पहले मुझे मालूम हुआ कि मेरे कैंसर है। सभी जानते है कि इस बीमारी का नाम ही कितना डरावना है और मोरक्को में हम इसे राक्षसी बीमारी के नाम से जानते हैं। अल्लाह पर मेरा यकीन बेहद कमजोर था। मैं अल्लाह की याद से पूरी तरह से गाफिल रहती थी। मैंने सोचा भी नहीं था कि कैंसर जैसी भयंकर बीमारी की चपेट में आ जाऊंगी। मालूम होने पर मुझे गहरा सदमा लगा। मैंने सोचा दुनिया में कौनसी जगह मेरी इस बीमारी का इलाज हो सकता है? मुझे कहां जाना चाहिए? मैं निराश हो गई। मेरे दिमाग में खुदकुशी का खयाल आया लेकिन…..मैं अपने शौहर और बच्चों को बेहद चाहती थी। उस वक्त मेरे दिमाग में यह नहीं था कि अगर मैंने खुदकुशी की तो अल्लाह मुझे सजा देगा। जैसा कि पहले मैंने बताया अल्लाह की याद से मैं गाफिल ही रहती थी। शायद अल्लाह इस बीमारी के बहाने ही मुझे हिदायत देना चाह रहा था।

   मैं बेल्जियम गई और वहां मैंने कई डॉक्टरों को दिखाया। उन्होंने मेरे पति को बताया कि पहले मेरे स्तनों को हटाना पड़ेगा, उसके बाद बीमारी का इलाज शुरू होगा। मैं जानती थी कि इस चिकित्सा पद्धति से मेरे बाल उड़ जाएंगे। मेरी भौंहें और पलकों के बाल जाते रहेंगे और चेहरे पर बाल उग जाएंगे। मैं ऐसी जिंदगी के लिए तैयार नहीं थी। मैंने डॉक्टर को इस तरह के इलाज के लिए साफ इंकार कर दिया और कहा कि किसी दूसरी चिकित्सा पद्धति से मेरा इलाज किया जाए जिसका मेरे बदन पर किसी तरह का दुष्प्रभाव ना हो। डॉक्टर ने दूसरा तरीका ही अपनाया। मुझ पर इस इलाज का कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ। मैं बहुत खुश थी। मैं मोरक्को लौट आई और यह दवा लेती रही। मुझे लगा शायद डॉक्टर गलत समझ बैठे और मुझे कैंसर है ही नहीं।

    तकरीबन छह महीने बाद मेरा वजन तेजी से गिरने लगा। मेरा रंग बदलने लगा और मुझे लगातर दर्द रहने लगा। मेरे मोरक्कन डॉक्टर ने मुझे फिर से बेल्जियम जाने की सलाह दी। मैं बेल्जियम पहुंची। लेकिन अब मेरा दुर्भाग्य था। डॉक्टर ने मेरे शौहर को बताया कि यह बीमारी मेरे पूरे बदन में फैल गई है। फैंफड़े पूरी तरह संक्रमित हो गए और अब उनके पास इसका कोई इलाज नहीं है। डॉक्टरों ने मेरे पति से कहा कि बेहतर यह है कि आप अपनी बीवी को वापस अपने वतन मोरक्को ले जाएं ताकि वहां आराम से उनके प्राण निकल सके। यह सुन मेरे पति को बड़ा सदमा लगा।

   बेल्जियम से लौटते वक्त हम फ्रांस चले गए इस उम्मीद से कि शायद वहां इस बीमारी का इलाज हो जाए। लेकिन फ्रांस में बेल्जियम की चिकित्सा से ज्याद कुछ नहीं मिला। फिर मैंने मजबूरन अस्पताल में भर्ती होकर अपने स्तन हटवाने और सर्जीकल थैरेपी लेने का फैसला किया जिसके बारे में हमें डॉक्टर पहले ही कह चुका था, लेकिन तब मैं तैयार ना थी।

 इस बीच मेरे शौहर को खयाल आया कि हम कुछ भूल रहे हैं। कुछ ऐसा जो हरदम हमारे खयालों से दूर रहा है। अल्लाह ने मेरे शौहर के दिल में खयाल पैदा किया कि वे मुझे मक्का स्थित अल्लाह के घर ले जाएं। जहां जाकर वे अल्लाह से दुआ करें। अल्लाह से उनकी बीमारी को दूर करने की इल्तिजा कर सके।

   अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इलल्लाह (अल्लाह सबसे बड़ा है। अल्लाह के सिवाय कोई इबादत के लायक नहीं) कहते हुए हम पेरिस से मक्का के लिए रवाना हो गए। मैं बेहद खुशी थी क्योंकि मैं पहली बार अल्लाह के घर काबा शरीफ जा रही थी। मैंने पेरिस से पवित्र कुरआन की एक कॉपी खरीद ली थी। हम मक्का पहुंचे। जब मैंने हरम शरीफ में प्रवेश किया और काबा की तरफ मेरी पहली नजर पड़ी तो मैं जोर से रो पड़ी। मैं रो पड़ी क्योंकि मैं शर्मिंदा थी कि मैंने बिना उस मालिक की इबादत के यूं ही अपनी जिंदगी के इतने साल बर्बाद कर दिए। मैंने कहा- ऐ मेरे मालिक मेरा इलाज करने में डॉक्टर असमर्थ हैं। सब बीमारी का इलाज तेरे पास है। तू  ही शिफा देने वाला है। मेरे सामने सारे दरवाजे बंद हो गए हैं, सिवाय तेरे दर के। तेरे दर के अलावा मेरा अब कोई ठिकाना नहीं है। अब तो मुझे तेरे ही दर से उम्मीद है। ऐ मेरे मालिक मेरे लिए तू अपना दरवाजा बंद ना कर। मैं काबा के चारों तरफ चक्कर काटती रही और अल्लाह से यह दुआ करती रही। मैंने कहा- मेरे मौला तू मुझे नाउम्मीद और खाली हाथ मत लौटाना।

   जैसा कि मैं पहले ही बता चुकी हूं कि मैं अल्लाह और उसकी इबादत के मामले में पूरी तरह दूर रही थी इसलिए मैं उलमा के पास गई और इबादत से जुड़ी किताबें हासिल की जिनसे मैं अच्छी तरह समझ सकूं। उन्होंने मुझे ज्यादा से ज्यादा कुरआन पढऩे का मशविरा दिया। उन्होंने मुझे ज्यादा से ज्यादा जमजम का पानी पीने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मैं ज्यादा से ज्यादा अल्लाह का नाम लू और मुहम्मद सल्ल. पर दुरूद भेजूं। मैंने इस मुकाम पर शांति और सुकून महसूस किया। मैंने अपने शौहर से होटल में जाकर ठहरने के बजाय हरम शरीफ में ही रुकने की इजाजत चाही। उन्होंने मुझे हरम शरीफ में ठहरने की इजाजत दे दी।

 हरम शरीफ में मेरे नजदीक ही कुछ मिस्री और तुर्क की महिलाएं थी। जब उन्होंने मुझे इस हालत में देखा तो मुझसे जाना कि मेरे साथ क्या परेशानी है? मैंने अपनी बीमारी के बारे में उनको बताया और बताया कि मैंने जिंदगी में सोचा भी नहीं था कि मैं कभी अल्लाह के घर काबा शरीफ आऊंगी और उससे इतनी करीब हो पाऊंगी। यह जानकर वे महिलाएं मेरे पास रहीं और उन्होंने अपने-अपने शौहर से मेरे साथ हरम शरीफ में ही ठहरने की इजाजत ले ली। इस दौरान हम बहुत कम सोईं और बहुत कम खाया। लेकिन हमने जमजम का पानी खूब पीया। और जैसा कि हमारे प्यारे नबी. सल्ल. ने फरमाया है कि जमजम का पानी जिस नियत से पीया जाए वैसा ही फायदा पहुंचाता है। यदि इस पानी को बीमारी से निजात की नीयत से पीया जाए तो अल्लाह उसको बीमारी से निजात देता है और अगर आप इसको प्यास बुझाने की नीयत से पीते हैं तो यह आपकी प्यास बुझाता है। यही वजह है कि हमने भूख महसूस नहीं की। हम वहीं रुके रहे और तवाफ करते रहे, कुरआन पढ़ते रहे। हम रात और दिन ऐसा ही करते।

    जब मैं हरम आई थी तो बहुत पतली थी। मेरे बदन के उपरी हिस्से में सूजन थी। इस हिस्से में खून और मवाद थी। कैंसर मेरे बदन के ऊपरी हिस्से में पूरी तरह फैल गया था। इस वजह से मेरे साथ वाली बहनें मेरे बदन के ऊपरी हिस्से को जमजम पानी से धोया करती थी। लेकिन मैं बदन के इस हिस्से को छूने से भी डरती थी। अल्लाह की इबादत और उसके प्रति पूरी तरह समर्पण के बावजूद मैं अपनी बीमारी को याद कर भयभीत रहती थी। इसी वजह से मैं अपने बदन को बिना छूए ही साफ करती थी।

      पांचवे दिन मेरे साथ रह रही बहनों ने जोर देकर कहा कि मुझे अपने पूरे बदन को जमजम पानी से धोना चाहिए। शुरुआत में तो मैंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। लेकिन मुझे अहसास हुआ मानो कोई मुझ पर दबाव बनाकर ऐसा ही करने के लिए कह रहा हो। मैं जिन अंगों को धोने से बचती थी उनको जमजम से धोने के लिए कोशिश शुरु की। लेकिन मैं फिर घबरा गई लेकिन मैंने फिर से महसूस किया कि मानो कोई मुझ पर दवाब डालकर इन्हें धोने के लिए कह रहा हो। मैं फिर से झिझक गई। तीसरी बार मैंने जोर देकर अपना हाथ मेरे शरीर के ऊपरी हिस्से पर रख दिया और फिर पूरे शरीर पर फिराया। कुछ अविश्वसनीय सा महसूस हुआ। यह क्या? ना सूजन, ना खून और ना ही मवाद? जो कुछ मैंने महसूस किया मैं उस पर भरोसा नहीं कर पाई। मैंने अपने हाथों से अपने बदन के ऊपरी अंगों को फिर से जांचा। सच्चाई यही थी जो मैंने महसूस किया था। मेरे बदन में कंपकंपी छूट गई। अचानक मेरे दिमाग में आया अल्लाह सुब्हान व तआला तो सबकुछ करने की ताकत रखता है। मैंने अपनी साथ की सहेली को मेरे बदन को छूने और सूजन जांचने के लिए कहा। उसने ऐसा ही किया। वे सब अचानक बोल पड़ीं- अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर। मैं अपने शौहर को बताने के लिए होटल की तरफ दौड़ पड़ी। मैंने उनसे मिलते ही कहा- देखो अल्लाह का करम। मैंने उन्हें बताया कि यह सब कैसे हुआ। वे भरोसा ही नहीं कर पाए। वे रो पड़े, फिर रो पड़े। उन्होंने मुझसे कहा कि क्या तुम्हें पता है कि डॉक्टरों का पक्का यकीन था कि तुम सिर्फ तीन हफ्ते में मर जाओगी? मैंने कहा-सब कुछ अल्लाह के हाथ में है और सब कुछ उसी की रजा से होता है। सिवाय अल्लाह के कोई नहीं जानता कि किसी शख्स के साथ भविष्य में क्या होने वाला है।

      हम एक हफ्ते तक अल्लाह के घर काबा में ठहरे। मैंने अल्लाह का उसके इस बेहद करम के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया। उसके बाद हम पैगंबर मुहम्मद(सल्ल.) की मस्जिद (मस्जिद ए नबवी) के लिए मदीना चले गए। वहां से हम फ्रांस के लिए रवाना हो गए। वहां डॉक्टर्स मुझे देखकर भ्रमित हो गए और उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ। उन्होंने उत्सुकता से मुझसे पूछा-आप वही महिला हैं? मैंने फख्र के साथ कहा- हां, मैं वही हूं और यह रहे मेरे शौहर। हम अपने पालनहार की तरफ लौट आए हैं। और अब हम सिवाय एक अल्लाह के किसी और से नहीं डरते। उसी ने मुझे यह नई जिंदगी दी है। डॉक्टर्स ने मुझे बताया कि मेरा केस उनके लिए बड़ा मुश्किल था। फिर डॉक्टर्स ने कहा कि वे मेरी फिर से जांच करना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने जांच के बाद कुछ भी नहीं पाया। पहले मुझे बदन में सूजन की वजह से सांस लेने में परेशानी होती थी लेकिन जब मैंने काबा पहुंचकर अल्लाह से शिफा की दुआ की तो मेरी यह परेशानी जाती रही।

    मैंने प्यारे नबी (सल्ल.) और उनके साथियों की जीवनियां पढी। यह सब पढ़कर मैं जोर जोर से रो पड़ती- मैंने अपनी अब तक की जिंदगी यूं ही गुजार दी? मैं अब तक अल्लाह और उसके प्यारे रसूल से दूर क्यों रही? यह सब सोच कर कई-कई बार रो पड़ती -मेरे मौला तू मुझे , मेरे शौहर और सारे मुसलमानों को माफ कर दे और मुझे अपनी अच्छी बंदी के रूप में कबूल कर।

                                                                   किताब Those Who Repented To Allah से

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हमारा देश महान

हमारा  देश महान


हमारा देश महान, कहना कितना आसान
चारों तरफ चोरबाजारी ,कालाबाजारी ,भ्रस्टाचारी है पनप रही 
मिलावटी वस्तुओं की बिक्री आराम से हो रही 
इंसान की जिन्दगी से खेलना 
यहाँ कितना आसान 
फिर भी हमारा देश महान 
औरतों को देवी कहते हैं 
पर उसकी इज्जत सरेआम उछाल देतेहैं
बच्चियां ,लडकियां,औरतें घर मैं तक सुरक्षित नहीं जहां
अत्याचार करना,तेज़ाब फेकना,नहीं तो गोली मार देना 
यहाँ कितना आसान 
फिर भी हमारा देश महान 
महंगाई इतनी बढ़ रही 
गरीबों को दाल-रोटी भी खाना मुश्किल पड़ रही 
किसान कर रहे आत्महत्या जहां 
किसी की भी नहीं सुनवाई यहाँ 
जुर्म करनेवाले नेताओं को शान से रहना 
यहाँ कितना आसान 
फिर भी हमारा देश महान 
जो सोच रहें हैं सिर्फ अपनी भलाई 
        देश की सब तरफ से हो रही तबाही
गुंडों,चोरों का साम्राज्य जहां 
नेताओं के लिए नहीं कोई कानून यहाँ 
उनके लिए कोई भी कानून तोड़ना 
यहाँ कितना आसान 
फिर भी हमारा देश महान 
        
 


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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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