Sahitya Surbhi: फैले मुहब्बत करो ये दुआ

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खुशियां बांटने का अवसर है ईद -फ़िरोज़ बख्त अहमद

ईद वास्तव में एक तोहफा होता है, उन सभी के लिए, जिन्होंने 29 या 30 दिन लगातार रोजे रखे हैं। यही कारण है कि रमजा़न से ईद का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। 
 
ईद की शुरुआत तो ईद से एक रोज पहले मगरिग की नमाज के बाद चांद देखने के साथ ही हो जाती है। ईद का यह चांद महीन होने के साथ-साथ थोड़ी ही देर के लिए दिखाई देता है। ईद का चांद देखते ही मुस्लिम लोग खुदा से अमन-शांति की दुआ करते हैं। 
    
ईद का अर्थ समझों तो अरबी में किसी भी चीज के बार-बार आने को ‘ऊद’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि  जिसने रोजे रखे हैं, उसके लिए ईद बार-बार आएगी। इस पर्व का नाम ईद उल फितर क्यों पड़ा? 
ईद के दिन ईद की नमाज से पूर्व सभी मुसलमान फितरा अदा करते हैं। फितरे का अर्थ है कि दान-दीन धर्म भावना के तहत सुबह-सवेरे निर्धन एवं फकीर लोगों को पैसे की शक्ल में फितरे की रकम देना। 
   
...इस्लाम धर्म गुरुओं का मानना है कि ईद वाले दिन खुदा लोगों को अगणित नेकियों से नवाजता है। ईद का अर्थ मात्र यह नहीं कि सभी मुस्लिम भाई-बहन नए एवं साफ-सुथरे कपड़े पहनें, पकवान खाएं या ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ आएं। ईद को समझने के लिए हमें पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल़) से इसका तत्व समझना चाहिए।
हजरत मुहम्मद बड़ी सादगी के साथ ईद मनाया करते थे। एक बार हजरत मुहम्मद ईद के दिन सुबह-सवेरे फज्र की नमाज के बाद बाजार गए। रास्ते में आपको एक छोटा सा यतीम बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया। हजरत मुहम्मद पास गए और कारण पूछा। बच्चों ने बताया कि आज ईद का दिन है और उसके पास नए  कपड़े, जूते और पैसे नहीं हैं। हजरत मुहम्मद ने उसे पुचकारा और घर ले आए। बच्चों से कहा, उनकी पत्नी हजरत आयशा उस बच्चों की मां हैं, बेटी फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसके भाई हैं। इस अनाथ बच्चों को नए कपड़े पहनाए गए, उसे पकवान पेश किए गए, ताकि उसे अपने अकेलेपन का आभास न हो।
इन सबसे बच्चा इतना प्रभावित हुआ कि वह मक्का की गलियों में गीत गाता रहा- आज ईद का दिन है और वह अत्यंत प्रसन्न है। आयशा उसकी मां है, फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसके भाई हैं। ईद की वास्तविक भावना यही होती है। कहने को तो ईद-उल-फितर (मीठी ईद) मुसलमानों का धार्मिक पर्व है, परन्तु इसका सामाजिक महत्त्च भी कम नहीं है। 
ईद वाले दिन लोग ईदगाहों में नमाज़ पढ़ते हैं। नमाज़ के दौरान छोटे-बड़े का अंतर नहीं रहता। एक शायर ने कहा है : एक ही सफ में खड़े हो गये महमूद-ओ-आयाज/न कोई बन्दा रहा, न बन्दा नवाज़। 
ईद सामूहिक प्रसन्नता का दिवस है। इस दिन गले मिलना, लोगों से सलाम दुआ करना अच्छा समझा जाता है। किसी ने खूब कहा है: 
हिलाल-ए- ईद जो देखा तो यह ख्याल हुआ/ उन्हें गले लगाए एक साल हुआ।
Source: http://www.livehindustan.com/news/desh/tayaarinews/article1-story-329-67-187780.html
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