अग़ज़ल-- दिलबाग विर्क


प्रतियोगिता में शामिल अगज़ल , पसंद आए तो LIKE करें 


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कैसे कैसे बुद्धिजीवी ? Easy way for safe sex

नेकी के रास्ते पर सामूहिक रूप से चलना हमेशा से ही कठिन रहा है लेकिन कठिनाइयों से घबरा कर पाप के मार्ग पर तो नहीं चला जा सकता। भारत में भी लोग व्यक्तिगत रूप से ही नेकी के मार्ग पर हैं वर्ना तो अधिकतर लोग दहेज और सूद ले दे रहे हैं जिसकी वजह से भारत में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और पेट में ही कन्या भ्रूण चेक करवा कर मरवा रहे हैं और ये पाप का मार्ग इस लायक नहीं है कि इस पर चला जाए। जो लोग इस पर चल रहे हैं, उन्हें इस पर नहीं चलना चाहिए। हरेक नेकी पर चले, यहां भी चले और वहां भी चले, सबका मार्ग एक ही हो, तभी कल्याण होगा .

हरेक दिशा में और हरेक देश में आदमी नेकी के मार्ग पर चले, बुद्धिजीवियों को ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए, यही उनकी जिम्मेदारी है लेकिन अजीब हाल है दुनिया का, कि जो लोग पाप की प्रेरणा देते हैं, उन्हें बुद्धिजीवी कहा जा रहा है।
ऐसे बुद्धिजीवियों का कोई सामाजिक आधार नहीं होता बल्कि ये टी. वी. - रेडियो पर ही टॉक करते हुए मिलेंगे।
ये फर्जी बुद्धिजीवी समलैंगिकता और आजाद यौन संबंधों की वकालत करते हुए मिलेंगे और सुरक्षित सेक्स के लिए कंडाम और पिल्स की जानकारी देते हुए मिलेंगे।
क्या सचमुच ऐसे लोगों को इंसान भी कहा जा सकता है ?
बुद्धिजीवी कहना बहुत बड़ी बात है।
हमारी बुद्धि तो यह कहती है कि समलैंगिकता का मार्ग मानव जाति के लिए फलदायी नहीं है और सुरक्षित सेक्स का आसान तरीका यह है कि जिससे निकाह-विवाह किया है, उसकी वफादारी को महसूस करो और खुद भी उसके प्रति वफादार रहो।
जो लोग अपने बच्चों की संखया नियंत्रित करना चाहें तो वे भी ऐसा तरीका अखितयार करें जिससे उनके जीवन साथी के तन-मन पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े  और न ही समाज आगे चलकर लिंग अनुपात संबंधी किसी तरह की जटिलता का शिकार हो।
आप क्या कहते हैं ?
और देखिये :
Maulana Wahiduddin Khan has made it his mission to present Islamic teachings in the style and language of the post-scientific era.
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एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी

दोस्तों, उपरोक्त वार्तालाप द्वारा एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी को देखें. आज हुई उपरोक्त वार्तालाप यहाँ डालने का उद्देश्य किसी अपमान करना नहीं है. केवल सिर्फ हिंदी चाहने वालों की "कथनी और करनी" को दर्शाने की मात्र एक छोटी-सी कोशिश है. फिर भी इस प्रतिक्रिया से कोई भी आहत होता है. तब उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. गोपनीयता को देखते हुए एक हिंदी प्रेमी का नाम जाहिर नहीं कर रहा हूँ.
सिरफिरा : नमस्कार जी,क्या आप नाराज है हमसे
एक हिंदी प्रेमी: नहीं जी। नाराज क्यों होंगे? नमस्कार
सिरफिरा : दो दिन वार्तालाप के हमारे सारे प्रयास असफल हो गए थें. आप कैसे है.
एक हिंदी प्रेमी: ठीक हैं। हाँ, इधर फ़ेसबुक से दूर रह रहा हूँ। मैंने खुद को दोनों समूहों* से अलग कर लिया, क्योंकि दो दिन तक मैंने इन्तजार किया. लेकिन किसी ने अपना नाम तक देवनागरी में अपनी प्रोफाइल में नहीं लिखा। मुझे तो पहले से अन्दाजा था कि गम्भीर लोग कम ही आते हैं इन साइटों पर.
सिरफिरा : कोई बात नहीं लोगों को थोड़ा समय देना पड़ता है फिर बच्चा पैदा होते ही बोलने नहीं लग जाता है.बाकी आपकी मर्जी.
एक हिंदी प्रेमी : बच्चे की बात? भाषा पर मैं खूब जानता हूँ लोगों को। लोग गीत हिन्दी के सुनेंगे, फ़िल्म देखेंगे जी। गम्भीर नहीं होंगे। कई दिग्गज ब्लागरों से पाला पड़ा है.रमेश भाई, एक काम करें। रात में बात करते हैं।
सिरफिरा : ठीक है.
 
नोट: हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से बनाये दो समूह "हम है अनपढ़ और गँवार जी" और "अनपढ़ और गँवार" की बात हो रही है.  
यहाँ पर कितने ब्लॉगर अपनी फेसबुक/ऑरकुट/गूगल की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में लिखना पसंद करते/इच्छुक हैं?
1. मुझे हिंदी में लिखने पर खुशी होगी.....
2. हिंदी में लिखना जरुरी नहीं है....
3. हिंदी में लिखने पर परेशानी होती है...
4. हिंदी में लिखने की जानकारी नहीं है....
5. मुझे कुछ नहीं कहना है........
6. हिंदी में नाम लिखने से स्टेट्स घटता है.....
7. हिंदी में नाम लिखने पर लोग हमें "अनपढ़" समझते हैं......

(वैसे फेसबुक की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में नाम लिखने की जानकारी और समस्या का समाधान यहाँ http://www.facebook.com/groups/anpadh/doc/172380636175360/ इस लिंक पर किया हुआ है)

पूरा  लेख यहाँ पर क्लिक करके पढ़ें. एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी 

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मोबाईल टेम्पलेट ऑन करें , पाठकों की संख्या बढ़ायें Hindi Blogging Guide (34)

दोस्तो, आज के हाई टेक युग में ऐसी बहुत बड़ी जमात है जो मोबाईल में इंटरनेट प्रयोग करती है | ऐसे में बहुत कम ब्लॉगर्स को ये पता होता है कि बहुत सारे Third Party Widgets और Links होने की वजह से उनका ब्लॉग बहुत सारे मोबाईल में खुल नहीं पाता और बहुत से पाठक उनसे दूर ही रह जाते हैं |
इसका समाधान भी सरल है | ब्लॉग के SETTINGS में जायें, फिर EMAIL & MOBILE में जाके SHOW MOBILE TEMPLET में YES का चुनाव करें  और इसे Save  कर दीजिये . 
अब आपका ब्लॉग हर मोबाईल में आसानी से खुलेगा . इसका प्रयोग करें और अपने ब्लॉग पर पाठकों की संख्या बढ़ायें |
-प्रदीप कुमार साहनी 
और ज़्यादा जानकारी के लिए देखें यह लिंक 
http://technostreak.com/how-to/blogger-mobile-templates-mobilizing-blogger-site-is-made-easy/
Bloggers using Google’s Blogger (or Blogspot) have a great news here.Blogger has rolled out a new set of mobile templates for your blogs making it easy for users to create mobile friendly version of their blogs in clicks.This was said about earlier and now it is out.
The blogger mobile templates are mobile optimized versions of the 27 default Template Designer templates.If you are using one of these templates, when you enable the mobile template option your blog will begin using the mobile version of the same variant.Even if you are using a custom template,you can enable this mobile feature and your blog will show up  in a generic default mobile template by blogger.
How will the templates look…

Wait a minute….There is a lot to be exited about.They are not just templates.But have many cool features you wouldn’t have imagined of…
  • Blog Preview: Get a glimpse of how your blog will be displayed by clicking on the Mobile Preview button. You can also see it on your smartphone by scanning the QR-code.
  • Automatic redirection: Viewers will see the mobile version of your blog when accessing from WebKit-based mobile browsers.
  • Template support: Blogger now supports all 27 templates. Some gadgets are also supported.
  • Mobile ads: Mobile AdSense ads will be displayed at the top of the post pages and at the bottom of the index page if the blog has an AdSense gadget or in-line blog ads.
  • Comments and videos: Viewers on smartphone devices will be able to make comments and watch videos.

Its time to enable it now…

Enabling the mobile templates is a lot easy! just head to Dashboard > Settings > Email & Mobile tab and enable the mobile template.

Don’t you think it is cool? Bloggers from other platforms will sure be envious on Blogspot bloggers now!(me too!)
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आखिर इस दंगे-फसाद से लाभ होता किसे है ?

हरेक आदमी अच्छी बातों को अच्छा और बुरी बातों को बुरा समझता है। हरेक आदमी को शांति और न्याय को अच्छा और दंगे-फसाद और खून खराबे को बुरा समझता है। इसके बावजूद लोग शांति भंग करते हैं और दंगा करते हैं और खून बहाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि इसने ज्यादा बहाया या उसने ज्यादा बहाया और न ही यह सवाल है कि किसने पहले बहाया और किसने बाद में बहाया ?
असल में सवाल यह है कि जिसने भी बहाया तो क्यों बहाया ?
श्री लंका में तमिलों ने सिंहलियों को मारा या सिंहलियों ने तमिलों को ?
अफगानिस्तान में अमरीका ने पठानों को मारा या पठानों ने अमरीकियों को ?
और फिर यही बात हिंदुस्तान के लिए है कि हिंदुओं को किसने मारा ?
और मुसलमानों को किसने ?
आखिर इस मारामारी से लाभ होता किसे है ?
जनता को तो होता नहीं है।
इसका लाभ राजनीतिक दल ही उठाते हैं।
मुस्लिमों की भलाई में आग उगलने वाले मुस्लिम लीडर भी इसका लाभ उठाते हैं और हिंदुओं की भलाई के लिए जबानी जमा खर्च करने वाले लीडर भी लाभ उठाते हैं।
इनके भड़काए में आकर लड़नेवाले या उसकी चपेट में मरने वाले आम आदमी को तो इन्होंने कभी कुछ दिया ही नहीं, अपनी जान गंवाने वाले अपने कार्यकर्ताओं के परिवारों को भी इन्होंने कभी कुछ न दिया।
दुख की बात यह है कि इन्हें किनारे करने की इच्छा शक्ति जनता में आज भी नहीं है।

आज अपने गिरेबान में झांक कर देखें- अज़ीज़ बर्नी


बुनियाद (NBT)

दंगों में नुक्सान किसका ?

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भारतीय हिन्दी साहित्य मंच( http://bhartiyahindisahityamanch.blogspot.com )

हिन्दी की स्थापना तो बहुत पहले हो गई
थी मगर इसकी पहचान अधूरी अब
भी अधूरी है।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है। मगर
क्या हम सही मायने मेँ हिन्दी का उपयोग
करते हैँ? नहीँ ना?
इस मंच की स्थापना हिन्दी को एक नई
दिशा देना चाहता है।
हम इस मंच के लिए कुछ
कवियोँ,कथाकारोँ एवं साहित्य के हर
विधाओँ से संबन्ध रखने वाले
लोगोँ का चुनाव इस मंच के सदस्योँ के रुप मेँ
करेँगे।
अगर आप इच्छुक होँ तो आप हमेँ कुछ
प्रश्नोँ के जवाब लिखकर
bhartiyahindisahityamanch@gmail.com
पर भेजेँ।
1. आपका नाम
2. आपका ब्लॉग पता (अगर हो)
3. आप साहित्य की किस विधा से संबन्ध
रखते हैँ?
4. आपका मोबाईल नंबर (महिला वर्ग के
लिए आवश्यक नहीँ)
5. और उस विधा का एक उदाहरण (जैसे
अगर आप कवि हैँ तो एक कविता)


सब्जेक्ट मेँ 'भारतीय हिन्दी साहित्य मंच
मे सदस्यता हेतु' लिखेँ।blogspot.com )हिन्दी की स्थापना तो बहुत पहले हो गई
थी मगर इसकी पहचान अधूरी अब
भी अधूरी है।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है। मगर
क्या हम सही मायने मेँ हिन्दी का उपयोग
करते हैँ? नहीँ ना?
इस मंच की स्थापना हिन्दी को एक नई
दिशा देना चाहता है।
हम इस मंच के लिए कुछ
कवियोँ,कथाकारोँ एवं साहित्य के हर
विधाओँ से संबन्ध रखने वाले
लोगोँ का चुनाव इस मंच के सदस्योँ के रुप मेँ
करेँगे।
अगर आप इच्छुक होँ तो आप हमेँ कुछ
प्रश्नोँ के जवाब लिखकर
bhartiyahindisahityamanch@gmail.com
पर भेजेँ।
1. आपका नाम
2. आपका ब्लॉग पता (अगर हो)
3. आप साहित्य की किस विधा से संबन्ध
रखते हैँ?
4. आपका मोबाईल नंबर (महिला वर्ग के
लिए आवश्यक नहीँ)
5. और उस विधा का एक उदाहरण (जैसे
अगर आप कवि हैँ तो एक कविता)


सब्जेक्ट मेँ 'भारतीय हिन्दी साहित्य मंच
मे सदस्यता हेतु' लिखेँ।
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आज अपने गिरेबान में झांक कर देखें- अज़ीज़ बर्नी

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ऐसे काम कीजिए, जिससे आपको दुआ मिले

आज हमने एक रचना पढ़ी जिसमें नजीर अकबराबादी जी बता रहे हैं कि इंसान की जिंदगी नापाएदार है और वह बड़े जतन से जो कुछ जमा कर रहा है, वह सब यही पड़ा रह जाएगा।
इसके बाद दूसरी रचना पढ़ी जिसमें कवि महोदय बता रहे हैं कि भूख में चांद भी रोटी जैसा लगता है। मुझे चांद रोटी जैसा कभी नहीं लगा क्योंकि कभी ऐसे हालात से सामना ही नहीं हुआ लेकिन इसके बावजूद यह बात सच है।
इसके बाद एक तीसरी रचना और पढ़ी जिसमें कवि यह बता रहे हैं कि खाने वाले लोग मेरे हिस्से का सूरज खा गए। इसी कविता में उन्होंने हिंदुस्तान की बहुत सी समस्याओं के साथ गरीबी और भ्रष्टाचार को प्रमुखता से उठाया है।
ये तीनों रचनाएं मैंने पढ़ीं और सोचा कि इसका हल क्या हो ?
तो हल भी पहली रचना में ही नजर आया कि हरेक इंसान यह याद रखे कि एक दिन उसे मौत जरूर आएगी। मौत की याद इंसान के दिल पर ऐसा असर करती है कि उसकी सारी सोच को बदल कर रख देती है। यही वजह है कि हरेक धर्म-मत-दर्शन में मौत का जिक्र जरूर किया गया है।
अब आप पढि ए तीनों रचनाएं, जो हमने आज पढ़ीं -
(1)

गर तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है

ऐ ग़ाफ़िल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा ब्यौपारी है

क्या शक्कर मिसरी क़ंद गरी, क्या सांभर मीठा-खारी है

क्या दाख मुनक़्क़ा सोंठ मिरच, क्या केसर लौंग सुपारी है

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा।
------------------
(2)
जाने क्यों हर गम बड़ा

और हर ख़ुशी छोटी लगे


खुद का दिल जब साफ़ न हो


हर नियत खोटी लगे


हो ज़हन में जो भी


दिखता है वही हर एक जगह


भूख जब हो जोर की


तो चाँद भी रोटी दिखे


---------------------
 
(3)
सुना है इन्सान के दुःख दर्द का इलाज मिला है
क्या बुरा है अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाए

किसी ने सच ही कहा है
वो भूख से मरा था
फ़ुटपाथ पे पड़ा था
चादर उठा के देखा तो पेट पे लिखा था
सारे जहां से अच्छा
सारे जहां से अच्छा
हिन्दुस्तां हमारा
हिन्दुस्तां हमारा

भूख लगे तो चाँद भी रोटी नज़र आता है
आगे है ज़माना फिर भी भूख पीछे पीछे
सारी दुनिया की बातें दो रोटियों के नीचे
किसी ने सच ही कहा ...

माँ पत्थर उबालती रही कड़ाही में रात भर
बच्चे फ़रेब खा कर चटाई पर सो गए
चमड़े की झोपड़िया में आग लगी भैया
बरखा न बुझाए बुझाए रुपैया
किसी ने सच ही कहा ...

वो आदमी नहीं मुक़म्मल बयां है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशां है
इक दिन मिला था मुझको चिथड़ों में वो
मैने जो पूछा नाम कहा हिन्दुस्तान है हिन्दुस्तान है

चंद लोग दुनिया में नसीब लेके आते हैं
बाकी बस आते हैं और यूं ही चले जाते हैं
जाने कब आते हैं और जाने कब जाते हैं
किसी ने सच ही कहा ...

ये बस्ती उन लोगों की बस्ती है
जहां हर गरीब की हस्ती एक एक साँस लेने को तरसती है
इन ऊँची इमारतों में घिर गया आशियाना मेरा
ये अमीर मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए
भूख लगे तो चाँद ...
ऐसा नहीं है कि मौत का जिक्र नहीं किया जाएगा तो मौत नहीं आएगी या देर से आएगी। मौत का जिक्र न करने से इंसान गाफिल रहेगा और मौत की याद से इंसान सजग रहेगा, अपने जीवन को सार्थक कामों में खर्च करेगा और किसी आंख से आंसू पोंछ देना, किसी भूखे के लिए रोटी का इंतेजाम कर देना या सर्दी में ठिठुरते हुए आदमी को कुछ कपड़े दे देना एक सार्थक काम है, जिसे करते ही आप अपने मन में खुशी का अहसास करेंगे।
आपके घर में ऐसे कपड़ों का ढेर लगा हुआ है जो आपके इस्तेमाल में नहीं आते, इन्हें निकालिए और किसी जरूरतमंद को दे दीजिए, उसके वुजूद के अंदर से आपके लिए दुआ निकलेगी, आपको उस दुआ की सखत जरूरत है।
ऐसे काम कीजिए, जिससे आपको दुआ मिले।
इसी पोस्ट को देखिये 'बुनियाद' पर
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%90%E0%A4%B8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%9C-%E0%A4%8F-%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A4%B8-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%86-%E0%A4%AE-%E0%A4%B2http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%90%E0%A4%B8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%9C-%E0%A4%8F-%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A4%B8-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%86-%E0%A4%AE-%E0%A4%B2
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क्या यह विज्ञापन है?

पूरा लेख यहाँ पर क्लिक करके पढ़ें क्या यह विज्ञापन है?

दोस्तों, आज आपको एक हिंदी ब्लॉगर की कथनी और करनी के बारें में बता रहा हूँ. यह श्रीमान जी हिंदी को बहुत महत्व देते हैं. इनके दो ब्लॉग आज ब्लॉग जगत में काफी अच्छी साख रखते हैं. अपनी पोस्टों में हिंदी का पक्ष लेते हुए भी नजर आते हैं. लेकिन मैंने पिछले दिनों हिंदी प्रेमियों की जानकारी के लिए इनके एक ब्लॉग पर निम्नलिखित टिप्पणी छोड़ दी. जिससे फेसबुक के कुछ सदस्य भी अपनी प्रोफाइल में हिंदी को महत्व दे सके, क्योंकि उपरोक्त ब्लॉगर भी फेसबुक के सदस्य है. मेरा ऐसा मानना है कि-कई बार हिंदी प्रेमियों का जानकारी के अभाव में या अन्य किसी प्रकार की समस्या के चलते मज़बूरी में हिंदी को इतना महत्व नहीं दें पाते हैं, क्योंकि मैं खुद भी काफी चीजों को जानकारी के अभाव में कई कार्य हिंदी में नहीं कर पाता था. लेकिन जैसे-जैसे जानकारी होती गई. तब हिंदी का प्रयोग करता गया और दूसरे लोगों भी जानकारी देता हूँ.जिससे वो भी जानकारी का फायदा उठाये. लेकिन कुछ व्यक्ति एक ऐसा "मुखौटा" पहनकर रखते हैं. जिनको पहचाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती हैं. आप आप स्वयं देखें कि-इन ऊँची साख रखने वाले ब्लॉगर के क्या विचार है उपरोक्त टिप्पणी पर. मैंने उनको जवाब भी दे दिया है. आप जवाब देकर मुझे मेरी गलतियों से भी अवगत करवाए. किसी ने कितना सही कहा कि-आज हिंदी की दुर्दशा खुद हिंदी के चाहने वालों के कारण ही है. मैं आपसे पूछता हूँ कि-क्या उपरोक्त टिप्पणी "विज्ञापन" के सभी मापदंड पूरे करती हैं. मुझे सिर्फ इतना पता है कि मेरे द्वारा दी गई उपरोक्त जानकारी से अनेकों फेसबुक के सदस्यों ने अपनी प्रोफाइल में अपना नाम हिंदी में लिख लिया है. अब इसको कोई "विज्ञापन' कहे या स्वयं का प्रचार कहे. बाकी आपकी टिप्पणियाँ मेरा मार्गदर्शन करेंगी.
नोट: मेरे विचार में एक "विज्ञापन" से विज्ञापनदाता को या किसी अन्य का हित होना चाहिए और जिस संदेश से सिर्फ देशहित होता हो. वो कभी विज्ञापन नहीं होता हैं. 
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'ब्लॉग प्रहरी' का रूख अब अंग्रेजी की ओर

आम तौर पर लोग यह शिकायत करते हैं कि सरकार हिंदी के प्रति उपेक्षा का भाव रखती है लेकिन जो लोग इस तरह की चिंताएं जताया करते हैं उनमें से अक्सर खुद हिंदी के प्रति उदासीन हैं। ऐसे लोगों की उदासीनता के चलते ही हिंदी की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट 'ब्लॉग प्रहरी' को अब अंग्रेजी की ओर रूख करना पड  रहा है।
समय समय पर कनिष्क कश्यप जी से हमारी बातें होती रही हैं और उनकी मेहनत और लगन देखकर हमेशा ही एक अहसास हुआ कि आखिर लोग एक रचनात्मक काम में भी उनका साथ क्यों नहीं दे रहे हैं ?
क्या सिर्फ इसलिए कि वे किसी गुट का हिस्सा नहीं हैं ?
इस गुटबंदी ने हिंदी ब्लॉगिंग का बेड़ा गर्क करके रख दिया है।
हरेक सकारात्मक काम इस गुटबंदी की भेंट चढ  गया है लेकिन ये गुटबाज  अपनी हरकतों से बाज नहीं आते और दुख की बात यह है कि ये बड़े  ब्लॉगर भी कहलाते हैं।
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क्यों पड़ा इसका नाम गूगल ?

आज विश्व के करोड़ों लोगों को ईमेल, क्लाउड कंप्यूटिंग, अनुवाद, ऑरकुट, यू ट्यूब और ब्लागस्पॉट जैसी ब्लागिंग सुविधा उपलब्ध कराने वाली गूगल के नाम के पीछे एक बेहद रोचक कहानी है।
दुनिया भर के लाखों उपभोक्ताओं को प्रतिदिन बहुउपयोगी इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी गूगल मंगलवार को बचपन की दहलीज को लांघते हुए 13वें वर्ष में कदम रखा। गूगल के जन्मिदन के अवसर पर इसके मुखपृष्ठ को भी खास तरीके से सजाया गया था। उस पर डाली गई तस्वीर में गूगल को किसी बच्चों की तर्ज पर जन्मिदन की टोपियों पहने हुए बर्थडे केक के पास खडा़ दिखाया गया था। गुब्बारों से सजाए गए और तोहफों से अटे पडे़ एक कमरे के इस चित्र को देखकर सचमुच में किसी बच्चों के जन्मिदवस पर दी जाने वाली पार्टी की अनुभूति होती थी।

गूगल ने 04 सितंबर 1998 को खुद को एक कंपनी के रूप में दर्ज कराने के लिए आवेदन दाखिल किया था। इसने 15 सितंबर को अपना लोकिप्रय डोमेन गूगल डाट कॉम दर्ज कराया। कंपनी 27 सितंबर को आधिकारिक रूप से अपने जन्म की तारीख मानती है।
इन 14 वर्षों में गूगल ने बहुत से उतार-चढा़व देखे और इंटरनेट सर्च उपलब्ध कराने वाले एक छोटे से सर्च इंजन के तौर पर शुरू हुई इस सेवा ने जल्द ही इंटरनेट सेवाओं के पूरे बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया। आज के समय में गूगल विश्व भर के लाखों उपभोक्ताओं को ईमेल, क्लाउड कंप्यूटिंग, अनुवाद जैसी सुविधाएं तो उपलब्ध करा ही रहा है, साथ ही ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट और यूट्यूब जैसी लोकिप्रय वीडियो शेयरिंग वेबसाइट और ब्लागस्पॉट जैसी ब्लागिंग सुविधा भी मुफ्त में उपलब्ध कराता है।

लैरी पेज और सेर्गेई ब्रिन नामक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी के दो छात्रों ने 1996 में बैकरब कहलाने वाले एक सर्च इंजन प्रोग्राम पर काम करना शुरू किया था। बैकरब में मिली शुरुआती कामयाबी से पेज और ब्रिन ने गूगल पर काम करना शुरू किया। शुरुआत में इन्हें काफी निराशा का सामना करना पडा़ और अपने जेबखर्च से मिले पैसों वगैरह से वे गूगल में निरंतर सुधार करते रहे।

जल्द ही उन्होंने उस बिल्कुल ही नए किस्म के सर्च इंजन को बनाने में कामयाबी पा ली जो इंटरनेट पर कुछ भी खोजने के लिए मानवीय दृष्टिकोण से काम करता था। गूगल किसी भी विषय पर सामग्री को इकट्ठा करके लोगों के आगे पेश नहीं करता था, बिल्क यह समझदारी से काम लेते हुए सबसे पहले यह पता करने की कोशिश करता था कि अमुक पेज को अब तक कितने लोगों ने सबसे अधिक बार पढा या फिर देखा है। इसके आधार पर ही यह पेज की लोकिप्रयता तय करता था और सबसे ज्यादा प्रासंगिक सामग्री ही उपभोक्ता को उपलब्ध कराता था।
गूगल के नाम के पीछे भी एक बेहद रोचक कहानी है। गणितज्ञों ने खरबों से भी अधिक बडी़ संख्या वाले अंक को 'गूगोल' शब्द की संज्ञा दी है। अब चूंकि पेज और ब्रिन का सर्च इंजन भी इंटरनेट पर पडी़ खरबों वेबसाइटों को खंगालने का काम करता था, इसिलए इसके लिए गूगोल नाम का चुनाव किया गया। लेकिन यह नाम बोलने में कुछ-कुछ अटपटा सा लगता था। इसिलए नए सर्च इंजन के लिए अंतिम तौर पर गूगल नाम का चुनाव किया गया।
गूगल का पहली बार इस्तेमाल करने के बाद सन माइक्रोसिस्टम्स कंपनी के संस्थापक एंडी बैक्टलशेम इतने उत्साहित हुए थे कि उन्होंने पेज और ब्रिन को गूगल पर काम करते रहने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप एक लाख डॉलर का अनुदान दिया था। कुछ समय बाद ही नौ लाख डॉलर अतिरिक्त धन की व्यवस्था करने के बाद 1998 में गूगल कंपनी की कैलिफोर्निया के मेनेलो पार्क से शुरुआत हो गई।

गूगल की शुरुआत होने के कुछ समय बाद ही माइक्रोसाफ्ट कंपनी ने भी अपनी सर्च सेवा एमएसएन सर्च की शुरुआत की। इसे आजकल बिंग सर्च इंजन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा सैकड़ों दूसरे तरह के सर्च इंजन भी इन दिनों इंटरनेट पर अपनी पकड़ बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। लेकिन इस सबके बावजूद दुनिया के किसी भी कोने में जब भी किसी को अपनी पसंदीदा जानकारी इंटरनेट के संजाल में खोजनी होती है तो उसे गूगल का नाम ही सबसे पहले सूझता है।
स्रोत :
http://www.livehindustan.com/news/desh/mustread/article1-Google-332-332-192814.html
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क्या इंसान की सेक्स लाइफ़ का कोई सम्बन्ध रोग और अपराध से भी होता है ?

क्या इंसान की सेक्स लाइफ़ का कोई सम्बन्ध रोग और अपराध से भी होता है ?
इस बात पर रौशनी डालती हुई दो ख़बरें पढ़नेमें आई हैं . आप भी देखिये और सोचिये .
(1)
नपुंसक पुरूषों को ज्यादा होती हैं दिल की बीमारियां
हाल में हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि नपुंसक पुरूषों को संतान वाले लोगों की तुलना में दिल की बीमारियां होने का खतरा ज्यादा होता है।
   
कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक दल ने लगभग एक दशक तक 1,35,000 वृद्ध लोगों पर नजर रखी और पाया कि जिन लोगों को जीवन में कभी संतान नहीं हुई, उन्हें दिल की बीमारियों से मरने का खतरा अधिक था।
   
डेली टेलीग्राफ के अनुसार, एक सिद्धांत यह है कि पिता बनने वाले लोग नपुंसक लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ जीवन बिताते हैं जबकि दूसरे सिद्धांत के अनुसार, टेस्टोस्टीरोन के उच्च स्तर के कारण दीर्घ अवधि में दिल की बीमारियों के होने का खतरा कम होता है।
   
स्टैनफोर्ड में मूत्र विज्ञान के प्रोफेसर डॉ़ माइकल इजनबर्ग ने इस अध्ययन को शुरू किया और उन्होंने लगभग एक दशक तक सेवानिवृत्त लोगों की अमेरिकी ऐसोसिएशन के आंकड़ों पर गौर किया। अनुसंधानियों ने पाया कि दस साल की अवधि में लगभग दस प्रतिशत लोगों की मौत हो गयी और इनमें से 20 प्रतिशत लोगों की मौत दिल की बीमारियों से हुई थी।
यह खबर यहाँ से ली गयी है :
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/jeevenjizyasa/article1-story-50-51-192824.html

(2)
आपके अंदर के अपराधी को मार सकती है शादी
विवाह आपके अंदर के अपराधी को मार सकता है। विवाह के बाद व्यक्ति का आत्म-नियंत्रण बढ़ जाता है।

मोनाश विश्वविद्यालय के अपराधविज्ञानी वाल्टर फॉरेस्ट व फ्लोरिडा स्टेट विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर कार्टर हेय ने एक अध्ययन में पाया कि गांजे का इस्तेमाल करने वाले युवाओं ने विवाह के बाद अविवाहितों की तुलना में इसका इस्तेमाल कम कर दिया।

शोध में लोगों में होने वाले इस बदलाव की प्रमुख वजह भी खोज ली गई है। विवाह से लोगों के आत्म-नियंत्रण में महत्वपूर्ण सुधार होता है।

'क्रिमनोलॉजी एंड क्रिमिनल जस्टिस' जर्नल के मुताबिक फॉरेस्ट कहते हैं कि अपराध में सक्रिय लोगों में आने वाले बदलावों में आत्म-नियंत्रण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि विवाह के बाद लोग जोखिम लेने से बचना चाहते हैं और अपने आवेगों पर नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं।
यह खबर यहाँ से ली गयी है :
http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/jeevenjizyasa/article1-story-50-51-192821.html
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रावण दहन


खुद ही बनाते हैं, खुद ही जलाते हैं,
यूँ कहें कि हम अपनी भड़ास मिटाते हैं |

समाज में रावण फैले कई रूप में यारों,
पर उनसे तो कभी न पार हम पाते हैं |

रावण दहन के रूप में एक रोष हम जताते हैं,
समाज के रावण का खुन्नस पुतले पे दिखाते हैं |

उसी रावण की तरह होता है हर एक रावण,
पुतले की तरह हर रावण को हम ही उपजाते हैं |

हर भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी एक रावण ही तो है,
यहाँ तक कि हम सब अपने अंदर एक रावण छुपाते हैं |

इन सब से मुक्ति शायद बस की अब बात नहीं,
इसलिए रावण दहन कर अपनी भड़ास हम मिटाते हैं |
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आदरणीय महेंद्र श्रीवास्तव जी के पत्र का जवाब

आदरणीय महेंद्र जी, आपने मुझे मना किया था कि मैं आपको आदरणीय कहकर संबोधित न करूं क्योंकि आपको यकीन है कि मेरे दिल में आपके लिए आदर है।
इसके बावजूद आज आपको आदरणीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है ताकि आपको यकीन आ जाए कि आप आज भी हमारे लिए आदरणीय ही हैं।
वेश्याओं को पुलिस द्वारा पकड़े जाने की खबर हमने इस फोरम पर दी तो आपने ऐतराज जताया था और हमने आपसे सहमत न होने के बावजूद भी इस फोरम पर फिर वैसी कोई खबर दोबारा नहीं दी।
इसका मतलब यह है कि हम आपका केवल जबानी आदर नहीं करते बल्कि आप की बात यहां मानी भी जाती है।
ब्लॉगर्स मीट वीकली की कुछ किस्तों को तैयार करने के लिए मुझे कई बार पूरी पूरी रात जागना पड़ा है, शुरूआती मीट में लिंक्स की भरमार देख कर आप यह जान सकते हैं कि उन्हें संकलित करने में वाकई बहुत समय और मेहनत चाहिए।
इतनी मेहनत के बावजूद भी मैंने देखा कि लोग किन्हीं पूर्वाग्रहों या मजबूरियों के चलते ब्लॉगर्स मीट वीकली को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं यहां तक कि वे लोग भी, जो इस मंच के सदस्य हैं और सक्रिय भी हैं, वे भी इस सकारात्मक कार्यक्रम को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं, उन्हें ३ बार से ज्यादा मेरे द्वारा निजी और सार्वजनिक स्तर पर आमंत्रित किया गया लेकिन एक दो लोगों को छोड कर अधिकतर पर कोई असर नहीं हुआ।
लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं कि कोई मेरा हौसला तोड़े और मैं हिम्मत हार जाऊं। लोगों का विरोध या उनकी उपेक्षा मेरे हौसले को और ज्यादा बढ़ा देती है।
मैं लगातार काम करता रहा और धीरे धीरे प्रेरणा जी की महारत बढ ती रही।
प्रेरणा जी अपनी तरफ से जिस लिंक को चुनना चाहती हैं, वह चुन लेती हैं।
कभी उनसे कई लिंक रह गए या कभी लिंक बनाने में कोई कमी रह गई तो लोगों की शिकायत आने पर मैंने उन्हें एडिट करके सही कर दिया।
इस बार की मीटिंग में भी आपके दोनों लेख रह गए, आपके ही नहीं बल्कि खुद मेरे कई लेख रह गए थे और रमेश जी और दिलबाग जी के लेख के लिंक भी रह गए थे। मैंने अपने, रमेश जी के और दिलबाग जी के लिंक तो लगा दिए लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आपके लेख के लिंक रह गए हैं।
आपने कमेंट किया तो आपने बताया कि 'इस मीट में किसी का एजेंडा दिखाई नहीं दे रहा है।'
हमारा दिमाग चकरा गया कि 'इलाही माजरा क्या है ? , हमने तो रात रात भर जाग कर मीट तैयार की और उनमें आप एजेंडा देखते रहे।' सार्वजनिक मंच से ऐसी बात कही जाए तो उसकी सफाई देना जरूरी होता है, आपने एक बात कही तो हमने उसकी सफाई दे दी और जब लिखा तो चाहे संबोधन आपसे था लेकिन बात उन सबसे कही जा रही थी जो डेढ़ साल से मुझसे टकराते आ रहे हैं और अपने मुंह की खाते आ रहे हैं।
आप को आए हुए मात्र ६ माह ही हुए हैं और आप नहीं जानते कि आपके यहां आने से पहले एक तरफ तो एक हजार से ज्यादा ब्लॉगर मेरे विरोध में थे और दूसरी तरफ मैं अकेला था और बाकी ब्लॉगर न्यूट्रल थे, यानि वे मेरे विरोध में खुलकर नहीं बोल रहे थे लेकिन मेरे समर्थन में भी उनकी तरफ से कुछ नहीं कहा जा रहा था। उन एक हजार से ज्यादा ब्लॉगर्स ने 'ब्लॉगवाणी' से मेरा ब्लॉग कैंसिल करने के लिए उसके संचालकों पर नाजायज दबाव डाला और उनके साथ बदतमीजी तक की, नतीजा यह हुआ कि ब्लॉगवाणी ने उनका कहना मानकर मेरा रजिस्ट्रेशन रदद नहीं किया बल्कि खुद को अपडेट करना छोड  दिया और इस तरह उन सबके पंजीकरण रदद कर दिए। बाद में वे सब पछताए और उन्होंने ब्लॉगवाणी की रिरिया कर मिन्नतें भी कीं लेकिन उनकी काफी बेइज्जती हो चुकी थी, वे दोबारा बेइज्जती कराने के लिए तैयार न हुए और इस तरह मेरे अनुचित विरोध ने मेरा तो कुछ न बिगाड़ा  लेकिन इन मठाधीशों के घुटने टूटकर रह गए।
यह एक लंबी दास्तान है, जिसे मुखतसर तौर पर बताया गया ताकि आप जान लें कि मैंने कहा था कि कुछ लोग तो मुझे भी पसंद नहीं करते और मेरे धर्म पर नुक्ताचीनी करते रहते हैं लेकिन मैं उनकी परवाह नहीं करता क्योंकि मैं लोगों की पसंद नापसंद की वजह से अपनी राह और अपना अमल नहीं बदलता।
आज भी लोग मेरे धर्म पर बेवजह नुक्ताचीनी करते हैं, नीचे दिए गए लिंक पर आप देख भी सकते हैं।

आज़ाद फिलिस्तीन की संभावना कितनी है ?

इन सब हालात को मैं अपने मालिक के भरोसे अकेला ही फेस कर रहा हूं और लगातार हिंदी ब्लॉग जगत को गुटबाजी और अज्ञानता से निकालने की कोशिश कर रहा हूं।
हिंदी ब्लॉगिंग गाइड भी इसी सिलसिले की एक कड़ी है। दस पांच साथियों के अलावा पूरे हिंदी ब्लॉग जगत ने इस महान सकारात्मक काम को कितना सराहा ?
कुछ भी नहीं ।
जो लोग मामूली बातों तक पर पोस्ट लिखते हैं और बड़ा ब्लॉगर कहलाते हैं, उन्होंने भी इस गाइड का कोई नोटिस नहीं लिया बल्कि बड़े कहलाए जाने वाले एक हमारे प्रिय नास्तिक ब्लॉगर ने तो यह तक कह दिया कि इसकी कोई जरूरत ही नहीं है और न ही इससे कोई फायदा होगा।
इन विपरीत हालात में ही हम ब्लॉगर्स मीट वीकली के कॉन्सेप्ट को लेकर चल रहे थे, ऐसे में ही हमारी दादी साहिबा (उम्र ९५ साल) की टांग टूट गई, जिसकी सूचना दो हफ्‌ते पहले हमने ब्लॉगर्स मीट वीकली 8  में (अंत में) दी लेकिन किसी ने कोई नोटिस तक न लिया .
इसे किस कॉलम में डाला जाए ?
अभी हम यही सोच रहे थे कि पता चला कि पित्ताशय के साथ साथ हमारे गुर्दे में भी पत्थरी हो गई है।
खैर, ये दोनों पत्थरियां भी चिंता का विषय नहीं हैं क्योंकि दोनों ही इंशा अल्लाह बिना आप्रेशन के निकल जाएंगी, इसके अलावा बच्चों के मार्क्स कम आने लगे क्योंकि हमारी तवज्जो तो बच्चों के बजाय ब्लॉगिंग पर हो गई न।
ये सब हो रहा है और साथ के लोग बता रहे हैं कि इस मीट में किसी का एजेंडा नजर नहीं आ रहा है और वह भी ऐसे समय में जबकि विरोधियों ने भी इल्जाम देना बंद कर दिया है।
ऐसे में आपको जवाब देना जरूरी था और मैंने दिया, बिना किसी कड़े और कड़वे शब्द के दिया। किसी को अपमानित करने के भाव के बिना दिया।
जब मैंने मीट में आपके ऐतराज के जवाब में टिप्पणी की तब भी मैंने न देखा कि आपका लेख इस मीट में नहीं है क्योंकि ऐसा तो दो बार हुआ कि आपका कमेंट ब्लॉगर्स मीट वीकली में नहीं आया लेकिन तब भी आपकी पोस्ट मीट में मौजूद थी।
आपके बात कहने के अंदाज से लगा ही नहीं कि आप व्यंग्य या शिकायत कर रहे हैं। आप सीधे अंदाज में बात कह देते जैसे कि महेश बारमाटे जी ने कहा कि उनका लिंक रह गया है और हमने एडिट करके उनके एक के बजाय ३ लिंक लगा दिए। ऐसा ही एक बार साधना वैद जी के साथ हुआ था तब हमने उनका लिंक भी लगाया और एक और पोस्ट बनाकर 'ब्लॉग की खबरें' पर भी लगाई।
ब्लॉगर्स मीट वीकली लिंक के लिए ही है, इसमें किसी को छोड़ा नहीं जाता लेकिन भूल से कोई भी रह सकता है।
आप गौर से देखिए,
इस बार मासूम साहब का लिंक भी नहीं है और सलीम भाई, जीशान जैदी और सफत आलम तैमी साहब का लिंक भी नहीं है और हिंदी ब्लॉगिंग में मेरे गुरू जनाब मुहम्मद उमर कैरानवी साहब का भी कोई लिंक पिछली कई मीट से ही नहीं है। मैं चाहता तो इन सबके लिंक ला सकता था लेकिन नहीं लाया। इनकी तरफ से कोई इल्जाम भी नहीं आया क्योंकि ये सब जानते हैं कि मैंने अगर जान बूझकर भी इन्हें छोड ा है तो वक्त की तंगी जैसी कोई बात रही होगी, मेरे दिल में इनके लिए कोई बुराई नहीं है।
जो मुझे गालियां देते हैं और आये दिन मुझे मूर्ख और मेरी बातों को चंडूखाने की गप्प्प कहते हैं, ऐसे लोगों को भी मैंने इस मंच का सदस्य बनाया है, डा. श्याम गुप्त जी इसकी जिंदा मिसाल हैं,
हिंदी ब्लॉग जगत का यह शायद अकेला साझा ब्लॉग है जहां यह आजादी है कि साझा ब्लॉग के संचालक की आलोचना की जा सकती है।
आलोचना से आगे बढ़कर गालियां देना है।
एक ब्लॉगर ने 'अहसास की परतें-समीक्षा' के नाम से मेरे विरोध में लिखना शुरू किया और मुझे अश्लील गालियां अपने ब्लॉग पर देना शुरू कर दीं। मैंने बुरा मानने के बजाय तुरंत उन्हें इस ब्लॉग का सदस्य बनाया। उन्होंने इसी मंच पर मेरे विरोध में लिखा और मैंने उन्हें मंच से निष्कासित नहीं किया। तारकेश्वर गिरी जी और विभावरी रंजन जी भी मेरे विरोध में स्वर उठाते रहते हैं लेकिन वे भी इस मंच के सदस्य बदस्तूर हैं और ऐसा केवल इसी मंच पर है। लिखने की ऐसी आजादी आपको कहीं और न मिलेगी।
सम्मान का मतलब यह नहीं है कि आप एक ऐतराज करें तो हम चुप रह जाएं तो आपका सम्मान है और अगर आपको वस्तुस्थिति से अवगत करा दें तो आपका अपमान हो गया।
आपने एक बात रखी तो हमने अपना पक्ष रख दिया, बस।
हमारी तरफ से तो बात इतनी ही है और आप भी इसे इतना ही समझें।
उम्मीद है कि ये बातें दिलों में दूरियां पैदा करने का सबब नहीं बनेंगी।

शुक्रिया !
जनाब महेंद्र जी के पत्र को तफ़सीली तौर पर मुलाहिज़ा कीजिए निम्न लिंक पर

एक पत्र: अनवर भाई के नाम...

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एक पत्र: अनवर भाई के नाम...


अनवर भाई आपको पता है कि मुझे साप्ताहिक ब्लागर्स मीट का बेसब्री से इंतजार रहता है, इसका अहसास आपको इसी बात से हो जाना चाहिए कि आप जैसे ही रात 12 बजे के करीब इसे पोस्ट करते हैं, अगले पांच मिनट में मै वहां मौजूद होता हूं। आप और प्रेरणा जी ने जितने कम समय में इस साप्ताहिक उत्सव को एक मुकाम तक पहुचाया है, मैं इसका वाकई कायल हूं।
लेकिन आज मुझे काफी पीडा हुई, क्योंकि आपने मेरी बातों को तोड मरोड कर गलत दिशा देने की कोशिश की। मैं ये समझता था कि किसी भी साझा ब्लाग में कोई हिंदू, मुसलमान, बडा या छोटा,गरीब अमीर नहीं होता है। सब एक परिवार के सदस्य होते हैं। कोई परिवार भी तभी संयुक्त रूप से आगे बढता है, जब वहां छोटे को भी उतना ही सम्मान मिले, जितना बडे को मिलता है। मुझे नहीं पता कि आपने ये बात क्यों कही कि  " मैं एक मुसलमान हूं और आजकल लोग मुसलमान को पसंद नहीं करते, तो क्या उनकी पसंद की खातिर मैं कुछ और बन जाऊं ?  
मैं आपकी इस बात से काफी आहत हूं। इतनी कडी टिप्पणी करने के पहले आपने मेरे बारे में जानने की बिल्कुल कोशिश नहीं की, काश आप मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते। खैर...। अगर आप इस साझा ब्लाग के कर्ताधर्ता हैं, और मुझे किसी बात से दुख पहुंचा है तो क्या मुझे उस दुख को व्यक्त करने के अधिकार पर भी आपने पाबंदी लगा दी है। आप मेरी टिप्पणी को एक बार फिर से पढें और क्या वहां कुछ ऐसा है जिससे कोई व्यक्तिगत रूप से आहत हो। हां मेरी पीडा वहां जरूर है।
अगर आपको मेरा दर्द से कोई वास्ता नहीं है, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन आप उसे सच में गंभीरता से सुनना चाहते हैं तो मै बताता हूं। पिछले सप्ताह मेरे दो लेख हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेशनल पर हैं। पहला "बहन में भी होता है मां का दर्द" और "तिहाड़ में शुरू हो गई तैयारी" । इन दोनों को आपने अपने साप्ताहिक मीट में शामिल नहीं किया। मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन तकलीफ ये है कि अगर आपके ब्लाग के Popular Posts Weekly में मेरा लेख " बहन में भी होता है मां का दर्द " शामिल है तो ऐसी क्या वजह है कि उसे आप साप्ताहिक मीट में शामिल नहीं कर सकते।
और अगर इस बात से दुखी होकर मैं सिर्फ अपनी पीडा का अहसास दिलाने की कोशिश करुं तो आपने कमेंट के जरिए जिस तरह से मुझे नीचा दिखाने की कोशिश की वो मेरे ही नहीं किसी के लिए भी आहत करने वाला होगा। अनवर भाई रात में मैने जब ब्लागर्स मीट को देखा और मेरे किसी भी लेख को आपने इसमें शामिल नहीं किया तो मुझे सच में यही लगा कि शायद आपने कोई मानदंड बनाया होगा कि अगर किसी लेख को कोई भी पसंद नहीं करता है तो उसे वीकली मीट में शामिल नहीं किया जाएगा। चूंकि मेरे दोनों लेख पर आपके साझा मंच पर किसी ने पसंद नहीं किया था, इसलिए मुझे लगा कि आपने इसी वजह से शामिल नहीं किया होगा।
मेरी ओर से तो बात यहीं खत्म हो गई थी, लेकिन आज सुबह जब मैने आपका लंबा चौडा कमेंट पढा तो ऐसा लगा कि पहले आप किसी को मारते पीटते हैं और फिर रोने पर उसके मुंह को बंद करते हैं। बहरहाल मैं ब्लागिंग में बहुत कुछ हासिल करने के लिए नहीं आया हूं। यहां मेरी उपस्थिति की सिर्फ एक वजह है वो ये कि मैं जो कुछ देखता हूं, उसे सबके सामने लाना चाहता हूं। आप कह सकते हैं कि मैं मीडिया में हूं तो मुझे क्या दिक्कत है, ये सब उसके जरिए ला सकता हूं, लेकिन ऐसा नहीं है, हर मीडिया हाउस की एक लक्ष्मण रेखा है, जिसके तहत ही आपको काम करना होता है। उस लक्ष्मण रेखा के बाहर की बातों को मैं कोशिश करता हूं कि आप तक पहुंचाऊं।
ब्लागिंग परिवार के मुखिया श्री शास्त्री जी की सरपरस्ती में ये वीकली मीट की चर्चा होती है, लिहाजा मुझे पक्का यकीन है कि सभी लोग मेरी बातों पर बिना किसी राग द्वेष के गौर करेंगे। मुझे आपसे और प्रेरणा जी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन इसके पहले आप मुझे और असम्मानित करके एचबीएफआई से बाहर करें, मैं बेहतर समझता हूं सभी से माफी मांगते हुए खुद को अपने तक समेट लूं। सभी को मेरा नमस्कार और शुभकामनाएं...

महेन्द्र
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क्या है न्यूट्रीनो ?

दुनिया की सबसे बड़ी भौतिक प्रयोगशाला यूरोपियन ऑर्गेनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) के नए प्रयोग के निष्कर्ष इस तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं कि परमाणु से छोटे कण न्यूट्रीनो प्रकाश से भी तेज गति से चल सकते हैं। हालांकि प्रकाश और न्यूट्रीनो की गति में इस अंतर को लेकर अभी और अध्ययन की दरकार है, पर इस नतीजे ने महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती दे दी है, जिसमें यह साबित किया गया है कि प्रकाश से अधिक किसी की गति नहीं होती।

न्यूट्रीनो विद्युत उदासीन कण है, जिसका घनत्व परमाणु से कम होता है, पर यह भारहीन नहीं होता है। इसी गुण की वजह से यह सामान्य पदार्थ के आर-पार हो जाता है। इसे यूनानी अक्षर 1 से निरुपित करते हैं। चूंकि यह विद्युत का अवशोषण नहीं करता, इसलिए यह इलेक्ट्रॉन से अलग है। इस वजह से यह विद्युत चुंबकीय प्रभाव से भी दूर रहता है, पर कमजोर सब-एटमिक फोर्स इसे प्रभावित कर सकते हैं, जिसकी सीमाएं विद्युत चुंबकत्व की अपेक्षा कम होती है। गुरुत्वाकर्षण की वजह से दूसरे पदार्थों से जुड़ने की क्षमता भी इसमें होती है।

न्यूट्रीनो की सर्वप्रथम जानकारी ऑस्ट्रेलियाई भौतिकविद् वोल्फगैंग अर्नस्ट पाउली ने 1930 में दी, और 1942 में कान-चांग वैंग ने बीटा का इस्तेमाल कर पहली बार इसका परीक्षण किया। पर इसे खोजने का दावा 20 जुलाई, 1956 को साइंस पत्रिका के अंक में क्लाइड कोवान, फ्रेडरिक रिंस, एफ बी हैरिसन, एच डब्ल्यू क्रूसे और ए डी मैकग्यूरी ने किया, जिस आधार पर फ्रेडरिक रिंस को 1995 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। 1962 में इसके अन्य प्रकार के खोजने संबंधी दावे भी किए गए। आज नाभिकीय रिएक्टरों में कृत्रिम न्यूट्रीनों का निर्माण भी किया जा रहा है, जबकि प्राकृतिक रूप से यह कॉस्मिक किरण और परमाणु नाभिक के संयोग से, नाभिकीय संलयन से, सुपरनोवा से और बिग बैंग सिद्धांत के आधार पर बनता है।
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ब्लॉगर्स मीट वीकली (10) Stop Complaining

ब्लॉगर्स मीट वीकली (10)
सबसे पहले मेरे सारे ब्लोगर साथियों को प्रेरणा अर्गल का प्रणाम और सलाम .
आदरणीय श्री रूपचंद शास्त्री मंयक जी का इस 10वीं महफ़िल में  अपने सभापति  के रूप  में स्वागत करते हैं और आप सभी हिंदी ब्लॉगर्स का भी  दिल से स्वागत है .

आज सबसे पहले मंच की पोस्ट्स 

 अनवर जमाल जी की रचनाएँ 

यह कैसा अन्याय है ? (Read entire story)

हिन्दू और मुसलमान, दोनों में लोकप्रिय थे बाबा फ़रीद

 मान अपमान से ऊपर उठ चुके श्री चन्द्रभूषण तिवारी का जीवन वृक्ष लगाने एवं गरीब मजबूर व मजदूरों के बच्चों के लिये समर्पित है होम्योपैथी की तासीर बेजोड़ है करकरे के हत्यारे कौन ?

हरेक शास्त्र में हैं सत्य के सूत्र और संकेत






समाज सुधारक बनना कोई हंसी खेल नहीं है
अटल-मोदी युगल नीति के प्रभाव

मुसलमानों के संदर्भ में








खास हैं ये बच्चे

Cerebral-Palsy.jpg









चिश्ती साबरी दरवेश गेरूआ रंग भी इस्तेमाल करते हैं

ब्लॉगर्स मीट वीकली (9) Against Female Feticide


  अख्तर  खान  "अकेला जी "   की रचनाएँ

कोन कहता है हमारे देश में ३२ रूपये में दो वक्त पेट भर कहा नहीं सकते अरे इन गरीबों को संसद में तो जाकर देखोअयाज अहमद जी  की रचना देश में औरत-मर्द का गड़बड़ अनुपात भविष्य में बहुत से ख़ून-ख़राबे और बहुत सी तबाहियों की वजह बनेगाप्रदीप साहनी जी की रचना दो पल की खुशियाँडी.पी.मिश्रा जी की रचना LOVE is LIFE: लुप्तप्राय प्रजातियों की सूची में भारतहमारे मंच के नए ब्लोगर साथी हकीम युनुस खान जी  की रचना 

क्या हमारी आत्मा में बसा है भ्रष्टाचार ?

संतरे के छिल्के को तेल में बदल देगा माइक्रोवेवबटला हाउस जैसी मुठभेड़ों के ख़िलाफ एक संयुक्त मोर्चा


अनपढ़ और गंवारों के समूह में शामिल होने का आमंत्रण पत्र



  • रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"




  • मंच के बाहर की पोस्ट   

     शिकायतों का रिवाज  पूजा जी 

     

    कुत्ते की याद में बना मंदिर...मनीष तिवारी जी 

    ये मन ये पागल मन मेरा ---डॉ.टी.एस.दराल जी

    अरसों के बाद घोंसलों में..सत्यम शिवम जी




    आँखें राजेश कुमारी जी 



    आँखें

    तलाश खुद की कैलाश .सी.शर्मा जी 



    ख़्वाबों में मत तराश  बबली जी 



    प्लास्टिक-पॉलीथीन पर दोहे . कुंवर कुसुमेश जी 



    आतंक की जननी....नीलकमल  वैष्णव जी  



    कशमकश  आशा जी 


    बी एस पाबला जी का जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई......संजय भास्कर जी 



     स्पर्श: समझो गर तुम दीप्ती शर्मा जी 





     तरूण जोशी " नारद" मोहब्बत का अंजाम
     -
    गीत है मन  डॉ.श्याम गुप्त 
    अब मेरी रचना 
    भूकंप 

    और चलते चलते ...
    चंद लिंक्स अनवर जमाल की तरफ़ से
     टोपी न लेना क्या 'ताज' गंवा देना है ?

    मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी Suicide due to facebook 

     बंग समाज : परंपरा और परिवर्तन

     -------------------------------------------------------------
    कुछ तो घरेलू मसरूफ़ियत  की वजह से और कुछ ब्लॉगिंग में चल रही राजनीति की वजह से नेट के लिए वक़्त कम करना पड़ा, 
    इसी वजह से इस बार कुछ लिंक पेश होने से रह गए थे, जिन्हें अब पेश किया जाता है . मज़े की बात यह है कि जब आज चेक किया तो कई लिंक ख़ुद हमारे भी  निकल आये , 
    हा हा हा ...
    हम लिखते ही इतना ज्यादा हैं कि लिख कर याद भी नहीं रहता कि इस हफ्ते कुल कितने लेख लिखे है ?
    और कौन सा लेख किस ब्लॉग पर लिखा है ?
    हमारे ब्लॉग भी तो पचास से ज्यादा हैं .
    खैर , आप लेख देखें , 
    (सभी लेखक गण से क्षमा याचना सहित .)

    मालिनी मुर्मु की ख़ुदकुशी

    होम्योपैथी सबके लिए

    अनवर जमाल 

    अंदाज ए मेरा: जब जानवर कोई इंसान को मारे.... वहशी उसे कहते हैं सारे ...

    अतुल श्रीवास्तव जी 

    आयोजन

    अफसर पठान

     

    बहन में भी होता है मां का दर्द....

    तिहाड़ में शुरु हो गई तैयारी !

    महेंद्र श्रीवास्तव जी

    सूखे नैन

    ई. प्रदीप कुमार साहनी

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    लखनऊ के शिक्षा सम्मेलन में सलीम ख़ान को और डा. अनवर जमाल को 'Best Blogger' के ईनाम से नवाज़ा गया

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    गर्मियों की छुट्टियां

    अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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    विशेष सूचना पोस्ट पब्लिश करने के विषय में

    कृप्या ध्यान दें कि
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    के लोकार्पण का सिलसिला शुरू हो चुका है। इस विशेष आयोजन के मौक़े पर सभी से सहयोग की आशा की जाती है और अनुरोध किया जाता है कि जब तक यह विशेष लेखमाला पेश की जा रही है तब तक यह ध्यान रखा जाए कि ‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ के लेख को पेश किए जाने के 8 घंटे बाद ही कोई अन्य लेख इस मंच पर प्रकाशित किया जाए।
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    यह प्रत्यके सोमवार के दिन आयोजित होगी। मंच के सभी सदस्य इस पारिवारिक समारोह को सफल बनाने का पूरा प्रयास करें। इस दिन भी इस गोष्ठी के 8 घंटे बाद ही कोई दूसरा लेख प्रकाशित किया जाए ताकि आयोजन सफल हो और मंच के सदस्यों को ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मिल सकें। सभी सदस्य अपने लेख का लिंक रविवार तक ज़रूर भेज दें ताकि उन्हें साप्ताहिक चर्चा में शामिल किया जा सके। धन्यवाद !

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