क्यों पड़ा इसका नाम गूगल ?

आज विश्व के करोड़ों लोगों को ईमेल, क्लाउड कंप्यूटिंग, अनुवाद, ऑरकुट, यू ट्यूब और ब्लागस्पॉट जैसी ब्लागिंग सुविधा उपलब्ध कराने वाली गूगल के नाम के पीछे एक बेहद रोचक कहानी है।
दुनिया भर के लाखों उपभोक्ताओं को प्रतिदिन बहुउपयोगी इंटरनेट सेवा उपलब्ध कराने वाली कंपनी गूगल मंगलवार को बचपन की दहलीज को लांघते हुए 13वें वर्ष में कदम रखा। गूगल के जन्मिदन के अवसर पर इसके मुखपृष्ठ को भी खास तरीके से सजाया गया था। उस पर डाली गई तस्वीर में गूगल को किसी बच्चों की तर्ज पर जन्मिदन की टोपियों पहने हुए बर्थडे केक के पास खडा़ दिखाया गया था। गुब्बारों से सजाए गए और तोहफों से अटे पडे़ एक कमरे के इस चित्र को देखकर सचमुच में किसी बच्चों के जन्मिदवस पर दी जाने वाली पार्टी की अनुभूति होती थी।

गूगल ने 04 सितंबर 1998 को खुद को एक कंपनी के रूप में दर्ज कराने के लिए आवेदन दाखिल किया था। इसने 15 सितंबर को अपना लोकिप्रय डोमेन गूगल डाट कॉम दर्ज कराया। कंपनी 27 सितंबर को आधिकारिक रूप से अपने जन्म की तारीख मानती है।
इन 14 वर्षों में गूगल ने बहुत से उतार-चढा़व देखे और इंटरनेट सर्च उपलब्ध कराने वाले एक छोटे से सर्च इंजन के तौर पर शुरू हुई इस सेवा ने जल्द ही इंटरनेट सेवाओं के पूरे बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया। आज के समय में गूगल विश्व भर के लाखों उपभोक्ताओं को ईमेल, क्लाउड कंप्यूटिंग, अनुवाद जैसी सुविधाएं तो उपलब्ध करा ही रहा है, साथ ही ऑरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट और यूट्यूब जैसी लोकिप्रय वीडियो शेयरिंग वेबसाइट और ब्लागस्पॉट जैसी ब्लागिंग सुविधा भी मुफ्त में उपलब्ध कराता है।

लैरी पेज और सेर्गेई ब्रिन नामक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी के दो छात्रों ने 1996 में बैकरब कहलाने वाले एक सर्च इंजन प्रोग्राम पर काम करना शुरू किया था। बैकरब में मिली शुरुआती कामयाबी से पेज और ब्रिन ने गूगल पर काम करना शुरू किया। शुरुआत में इन्हें काफी निराशा का सामना करना पडा़ और अपने जेबखर्च से मिले पैसों वगैरह से वे गूगल में निरंतर सुधार करते रहे।

जल्द ही उन्होंने उस बिल्कुल ही नए किस्म के सर्च इंजन को बनाने में कामयाबी पा ली जो इंटरनेट पर कुछ भी खोजने के लिए मानवीय दृष्टिकोण से काम करता था। गूगल किसी भी विषय पर सामग्री को इकट्ठा करके लोगों के आगे पेश नहीं करता था, बिल्क यह समझदारी से काम लेते हुए सबसे पहले यह पता करने की कोशिश करता था कि अमुक पेज को अब तक कितने लोगों ने सबसे अधिक बार पढा या फिर देखा है। इसके आधार पर ही यह पेज की लोकिप्रयता तय करता था और सबसे ज्यादा प्रासंगिक सामग्री ही उपभोक्ता को उपलब्ध कराता था।
गूगल के नाम के पीछे भी एक बेहद रोचक कहानी है। गणितज्ञों ने खरबों से भी अधिक बडी़ संख्या वाले अंक को 'गूगोल' शब्द की संज्ञा दी है। अब चूंकि पेज और ब्रिन का सर्च इंजन भी इंटरनेट पर पडी़ खरबों वेबसाइटों को खंगालने का काम करता था, इसिलए इसके लिए गूगोल नाम का चुनाव किया गया। लेकिन यह नाम बोलने में कुछ-कुछ अटपटा सा लगता था। इसिलए नए सर्च इंजन के लिए अंतिम तौर पर गूगल नाम का चुनाव किया गया।
गूगल का पहली बार इस्तेमाल करने के बाद सन माइक्रोसिस्टम्स कंपनी के संस्थापक एंडी बैक्टलशेम इतने उत्साहित हुए थे कि उन्होंने पेज और ब्रिन को गूगल पर काम करते रहने के लिए प्रोत्साहन स्वरूप एक लाख डॉलर का अनुदान दिया था। कुछ समय बाद ही नौ लाख डॉलर अतिरिक्त धन की व्यवस्था करने के बाद 1998 में गूगल कंपनी की कैलिफोर्निया के मेनेलो पार्क से शुरुआत हो गई।

गूगल की शुरुआत होने के कुछ समय बाद ही माइक्रोसाफ्ट कंपनी ने भी अपनी सर्च सेवा एमएसएन सर्च की शुरुआत की। इसे आजकल बिंग सर्च इंजन के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा सैकड़ों दूसरे तरह के सर्च इंजन भी इन दिनों इंटरनेट पर अपनी पकड़ बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। लेकिन इस सबके बावजूद दुनिया के किसी भी कोने में जब भी किसी को अपनी पसंदीदा जानकारी इंटरनेट के संजाल में खोजनी होती है तो उसे गूगल का नाम ही सबसे पहले सूझता है।
स्रोत :
http://www.livehindustan.com/news/desh/mustread/article1-Google-332-332-192814.html

4 comments:

Anita said...

गूगल के बारे में रोचक जानकारी देती सार्थक पोस्ट!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 30/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रोचक जानकारी

रेखा said...

बढ़िया जानकारी दी है आपने

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