एक पत्र: अनवर भाई के नाम...

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  • Tuesday, September 27, 2011
  • by
  • महेन्द्र श्रीवास्तव
  • in

  • अनवर भाई आपको पता है कि मुझे साप्ताहिक ब्लागर्स मीट का बेसब्री से इंतजार रहता है, इसका अहसास आपको इसी बात से हो जाना चाहिए कि आप जैसे ही रात 12 बजे के करीब इसे पोस्ट करते हैं, अगले पांच मिनट में मै वहां मौजूद होता हूं। आप और प्रेरणा जी ने जितने कम समय में इस साप्ताहिक उत्सव को एक मुकाम तक पहुचाया है, मैं इसका वाकई कायल हूं।
    लेकिन आज मुझे काफी पीडा हुई, क्योंकि आपने मेरी बातों को तोड मरोड कर गलत दिशा देने की कोशिश की। मैं ये समझता था कि किसी भी साझा ब्लाग में कोई हिंदू, मुसलमान, बडा या छोटा,गरीब अमीर नहीं होता है। सब एक परिवार के सदस्य होते हैं। कोई परिवार भी तभी संयुक्त रूप से आगे बढता है, जब वहां छोटे को भी उतना ही सम्मान मिले, जितना बडे को मिलता है। मुझे नहीं पता कि आपने ये बात क्यों कही कि  " मैं एक मुसलमान हूं और आजकल लोग मुसलमान को पसंद नहीं करते, तो क्या उनकी पसंद की खातिर मैं कुछ और बन जाऊं ?  
    मैं आपकी इस बात से काफी आहत हूं। इतनी कडी टिप्पणी करने के पहले आपने मेरे बारे में जानने की बिल्कुल कोशिश नहीं की, काश आप मुझे व्यक्तिगत रूप से जानते। खैर...। अगर आप इस साझा ब्लाग के कर्ताधर्ता हैं, और मुझे किसी बात से दुख पहुंचा है तो क्या मुझे उस दुख को व्यक्त करने के अधिकार पर भी आपने पाबंदी लगा दी है। आप मेरी टिप्पणी को एक बार फिर से पढें और क्या वहां कुछ ऐसा है जिससे कोई व्यक्तिगत रूप से आहत हो। हां मेरी पीडा वहां जरूर है।
    अगर आपको मेरा दर्द से कोई वास्ता नहीं है, तो मुझे कुछ नहीं कहना है। लेकिन आप उसे सच में गंभीरता से सुनना चाहते हैं तो मै बताता हूं। पिछले सप्ताह मेरे दो लेख हिंदी ब्लागर्स फोरम इंटरनेशनल पर हैं। पहला "बहन में भी होता है मां का दर्द" और "तिहाड़ में शुरू हो गई तैयारी" । इन दोनों को आपने अपने साप्ताहिक मीट में शामिल नहीं किया। मुझे इससे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन तकलीफ ये है कि अगर आपके ब्लाग के Popular Posts Weekly में मेरा लेख " बहन में भी होता है मां का दर्द " शामिल है तो ऐसी क्या वजह है कि उसे आप साप्ताहिक मीट में शामिल नहीं कर सकते।
    और अगर इस बात से दुखी होकर मैं सिर्फ अपनी पीडा का अहसास दिलाने की कोशिश करुं तो आपने कमेंट के जरिए जिस तरह से मुझे नीचा दिखाने की कोशिश की वो मेरे ही नहीं किसी के लिए भी आहत करने वाला होगा। अनवर भाई रात में मैने जब ब्लागर्स मीट को देखा और मेरे किसी भी लेख को आपने इसमें शामिल नहीं किया तो मुझे सच में यही लगा कि शायद आपने कोई मानदंड बनाया होगा कि अगर किसी लेख को कोई भी पसंद नहीं करता है तो उसे वीकली मीट में शामिल नहीं किया जाएगा। चूंकि मेरे दोनों लेख पर आपके साझा मंच पर किसी ने पसंद नहीं किया था, इसलिए मुझे लगा कि आपने इसी वजह से शामिल नहीं किया होगा।
    मेरी ओर से तो बात यहीं खत्म हो गई थी, लेकिन आज सुबह जब मैने आपका लंबा चौडा कमेंट पढा तो ऐसा लगा कि पहले आप किसी को मारते पीटते हैं और फिर रोने पर उसके मुंह को बंद करते हैं। बहरहाल मैं ब्लागिंग में बहुत कुछ हासिल करने के लिए नहीं आया हूं। यहां मेरी उपस्थिति की सिर्फ एक वजह है वो ये कि मैं जो कुछ देखता हूं, उसे सबके सामने लाना चाहता हूं। आप कह सकते हैं कि मैं मीडिया में हूं तो मुझे क्या दिक्कत है, ये सब उसके जरिए ला सकता हूं, लेकिन ऐसा नहीं है, हर मीडिया हाउस की एक लक्ष्मण रेखा है, जिसके तहत ही आपको काम करना होता है। उस लक्ष्मण रेखा के बाहर की बातों को मैं कोशिश करता हूं कि आप तक पहुंचाऊं।
    ब्लागिंग परिवार के मुखिया श्री शास्त्री जी की सरपरस्ती में ये वीकली मीट की चर्चा होती है, लिहाजा मुझे पक्का यकीन है कि सभी लोग मेरी बातों पर बिना किसी राग द्वेष के गौर करेंगे। मुझे आपसे और प्रेरणा जी से कोई शिकायत नहीं है। लेकिन इसके पहले आप मुझे और असम्मानित करके एचबीएफआई से बाहर करें, मैं बेहतर समझता हूं सभी से माफी मांगते हुए खुद को अपने तक समेट लूं। सभी को मेरा नमस्कार और शुभकामनाएं...

    महेन्द्र

    3 comments:

    रविकर said...

    dukhad ||

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    DR. ANWER JAMAL said...

    आदरणीय महेंद्र जी, आपने मुझे मना किया था कि मैं आपको आदरणीय कहकर संबोधित न करूं क्योंकि आपको यकीन है कि मेरे दिल में आपके लिए आदर है।
    इसके बावजूद आज आपको आदरणीय कहकर संबोधित करना पड़ रहा है ताकि आपको यकीन आ जाए कि आप आज भी हमारे लिए आदरणीय ही हैं।
    वेश्याओं को पुलिस द्वारा पकड़े जाने की खबर हमने इस फोरम पर दी तो आपने ऐतराज जताया था और हमने आपसे सहमत न होने के बावजूद भी इस फोरम पर फिर वैसी कोई खबर दोबारा नहीं दी।
    इसका मतलब यह है कि हम आपका केवल जबानी आदर नहीं करते बल्कि आप की बात यहां मानी भी जाती है।
    इस बार की मीटिंग में भी आपके दोनों लेख रह गए, आपके ही नहीं बल्कि खुद मेरे कई लेख रह गए थे और रमेश जी और दिलबाग जी के लेख के लिंक भी रह गए थे। मैंने अपने, रमेश जी के और दिलबाग जी के लिंक तो लगा दिए लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि आपके लेख के लिंक रह गए हैं।
    आपने कमेंट किया तो आपने बताया कि 'इस मीट में किसी का एजेंडा दिखाई नहीं दे रहा है।'
    हमारा दिमाग चकरा गया कि 'इलाही माजरा क्या है ? , हमने तो रात रात भर जाग कर मीट तैयार की और उनमें आप एजेंडा देखते रहे।'
    सार्वजनिक मंच से ऐसी बात कही जाए तो उसकी सफाई देना जरूरी होता है, आपने एक बात कही तो हमने उसकी सफाई दे दी.
    सम्मान का मतलब यह नहीं है कि आप एक ऐतराज करें तो हम चुप रह जाएं तो आपका सम्मान है और अगर आपको वस्तुस्थिति से अवगत करा दें तो आपका अपमान हो गया।
    आपने एक बात रखी तो हमने अपना पक्ष रख दिया, बस।
    हमारी तरफ से तो बात इतनी ही है और आप भी इसे इतना ही समझें।
    उम्मीद है कि ये बातें दिलों में दूरियां पैदा करने का सबब नहीं बनेंगी।

    शुक्रिया !

    पूरे तफ़सीली जवाब को मुलाहिज़ा कीजिए निम्न लिंक पर
    आदरणीय महेंद्र श्रीवास्तव जी के पत्र का जवाब

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