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कांग्रेस की दिग्विजयी भाषा

पिछले दो आम चुनावों में लगातार कांग्रेस और मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में जोड़-तोड के सरकार क्या बन गयी, कांग्रेस के कई नेताओं को भ्रम हो गया है कि उन्होंने शायद "दिग्विजय" कर लिया है सदा के लिए और बहुतेरे ऐसे हैं जिनकी भाषा लगातार तल्ख होती जा रही है। जबकि हकीकत यह है कि तो अभी पूर्ण बहुमत है अकेले कांग्रेस को ही पिछली बार।

अपने छात्र जीवन को याद करता हूँ तो इमरजेन्सी से पहले भी कुछ महत्वपूर्ण कांग्रसियों की भाषा में भी तल्खी आ गयी थी। परिणाम कांग्रेसजनों के साथ साथ पूरे देश ने देखा। किसी को यह भी शिकायत हो सकती है कि मैं किसी से प्रभावित होकर किसी के "पक्ष" या "विपक्ष" में लिख रहा हूँ। एक सच्चा रचनाकार का नैतिक धर्म है कि सही और गलत दोनों को समय पर "आईना" दिखाये। सदा से मेरी यही कोशिश रही है और आगे भी रहेगी। अतः किसी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त है मेरा यह आलेख।

"विनाश काले विपरीत बुद्धि" वाली कहावत हम सभी जानते हैं और कई बार महसूसते भी हैं अपनी अपनी जिन्दगी में। अलग अलग प्रसंग में दिए गए विगत कई दिनों के कांग्रसी कथोपकथन की जब याद आती है तो कई बार सोचने के लिए विवश हो जाता हूँ कि कहीं यह सनातन कहावत फिर से "चरितार्थ" तो नहीं होने जा रही है इस सवा सौ बर्षीय कांग्रेस पार्टी के साथ?

लादेन की मृत्यु के बाद एक इन्टरव्यू में आदरणीय दिग्विजय सिंह जी का लादेन जैसे विश्व प्रसिद्ध आतंकवादी के प्रति "ओसामा जी" जैसे आदर सूचक सम्बोधन कई लोगों को बहुत अखरा और देश के कई महत्वपूर्ण लोगों ने अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया भी व्यक्त की उनके इस सम्बोधन पर। लेकिन इसके विपरीत मुझे कोई दुख नहीं हुआ। बल्कि खुशी हुई चलो आतंकवादी ही सही, लेकिन एक मृतात्मा के प्रति भारत में प्रत्यक्षतः सम्मान सूचक शब्दों के अभिव्यक्ति की जो परम्परा है, कम से कम उसका निर्वाह दिग्विजय जी ने तो किया?

मैं रहूँ न रहूँ, दिग्विजय जी रहें न रहें, लेकिन रामदेव बाबा ने जो काम "आम भारतवासी" के लिये किया है उसे यहाँ की जनता कभी नहीं भूल पायेगी। एक शब्द में कहें तो बाबा रामदेव अपने कृत्यों से आम भारतीयों के दिल में बस गए हैं। "योग द्वारा रोग मुक्ति", के साथ साथ जन-जागरण में उनकी भूमिका को नकारना मुश्किल होगा किसी के लिए भी। बाबा राम देव करोड़ों भारतीय समेत वैश्विक स्तर पर भी लोगों के दिलों पर स्वाभाविक रूप से आज राज करते हैं। ऐेसा सम्मान बिना कुछ "खास योगदान" के किसी को नहीं मिलता।

दिग्विजय उवाच - "रामदेव महाठग है, न तो कोई आयुर्वेद की डिग्री और न ही योग की और चले हैं लोगों को ठीक करने" इत्यादि अनेक "आर्ष-वचनों" द्वारा उन्होंने रामदेव जी के सतकृत्यों के प्रति अपना "भावोद्गार" प्रगट किया जिसे सारे देश ने सुना। यूँ तो उन्होंने बहुत कुछ कहा यदि सारी बातें लिखी जाय तो यह आलेख उसी से भर जाएगा क्योंकि उनके पास "नीति-वचनों" की कमी तो है नहीं और रामदेव के प्रति उनके हृदय में कब "बिशेष-प्रेम" छलक पड़े कौन जानता?

मैं कोई बाबा रामदेव का वकील नहीं हूँ। लेकिन उनके लिए या किसी भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त व्यक्ति के प्रति ऐसे दुर्व्यवहार की कौन सराहना कर सकता है। रामदेव जी अपने आन्दोलन के क्रम में "अपरिपक्व निर्णय" ले सकते हैं, कुछ गलतियाँ उनसे हो सकतीं हैं लेकिन सिर्फ इस बात के लिए उनके जैसे "जन-प्रेमी" के खिलाफ इतना कठोर निर्णय वर्तमान सरकार के दिवालियेपन की ओर ही इशारा करता है। उस पर तुर्रा ये कि दिग्विजय जी को वाक्-युद्ध में "दिग्विजय" करने के लिए छोड़ दिया गया हो। अच्छा संकेत नहीं है। सरकारी महकमे सहित कांग्रेस के बुद्धिजीवियों को इस पर विचार करने की जरूरत है कम से कम भबिष्य में कांग्रेस के "राजनैतिक स्वास्थ्य" के लिए।

जहाँ तक मुझे पता है कि गुरूदेव टैगोर ने अपने पठन-पाठन का कार्य घर पर ही किया इसलिए उनके पास भी कोई खास "स्कूली डिग्री" नहीं थी। फिर भी उन्हें "नोबेल पुरस्कार" मिला। लेकिन ऊपर में वर्णित दिग्विजय जी की डिग्री वाली बात को आधार माना जाय तो गुरुदेव को विश्व समुदाय ने नोबेल पुरस्कार देकर जरूर "गलती" की? एक बिना डिग्री वाले आदमी को नोबेल पुरस्कार? लेकिन ये सच है जिसे पूरा विश्व जानता है। फिर रामदेव जी की "डिग्री" के लिए दिग्विजय जी को इतनी चिन्ता क्यों? जबकि आम भारतीयों ने उनके कार्यों सहर्ष स्वीकार किया है।

आदरणीय दिग्विजय जी भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है संसद और हमारे सैकड़ों सांसदों को "राष्ट्र-गान" तक पूरी तरह से नहीं आता है। तो क्या उन्हें सांसद नहीं माना जाय क्या? आप ही गहनता से विचार कर के बतायें देशवासियों को उचित दिशा-निर्देश दें। और ऐसे ही हालात में मेरे जैसे कवि के कलम से ये पंक्तियाँ स्वतः निकलतीं हैं कि -

राष्ट्र-गान आये ना जिनको, वो संसद के पहरेदार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

(नोट - पूरी रचना पढ़ने और सुनने का लिन्क क्रमशः http://manoramsuman।blogspot।com/2011/04/blog-post_29।html और http://www.youtube.com/watch?v=c4qhAKmfON0 है।}

"अन्ना" - आज एक नाम न होकर एक "संस्था" बन गए हैं अपनी निष्ठा और "जन-पक्षीय" कार्यों के कारण। अन्ना एक गाँधीवादी संत हैं सच्चे अर्थों में। उन्होंने भी जन-जागरण किया। आन्दोलन चलाया। लोकपाल पर पहले सरकारी सहमति बनी अब कुछ कारणों से असहमति भी सामने है। फिर अन्ना ने 16 अगस्त से अनशन और आन्दोलन की बात की। यह सब लोकतंत्र में चलता रहता है। सरकार में भी समझदार लोग हैं। जरूर इसका समाधान तलाशेगे, अन्ना से आगे भी बात करेंगे। अभी नहीं जबतक भारत में प्रजातंत्र है ये सब चलता रहेगा। यह "लोकतंत्रीय स्वास्थ" के लिए महत्वपूर्ण भी है।

लेकिन दिग्विजय जी कैसे चुप रह सकते हैं? तुरत बयान आया उनकी तरफ से कि यदि अन्ना आन्दोलन करेंगे तो उनके साथ भी "वही" होगा जो रामदेव के साथ हुआ। क्या मतलब इसका? क्यों बार बार एक ही व्यक्ति इस तरह की बातें कर रहा है? क्यों ये इस तरह के फालतू और भड़काऊ बातों की लगातार उल्टी कर रहे हैं? कहाँ से इन्हें ताकत मिल रही है? कहीं दिग्विजय जी की "मानसिक स्थिति" को जाँच करवाने की जरूरत तो नहीं? मैं एक अदना सा कलम-घिस्सू क्या जानूँ इस "गूढ़ रहस्य" को लेकिन ये सवाल सिर्फ मेरे नहीं, आम लोगों के दिल में पनप रहे हैं जो आने वाले समय में ठीक नहीं होगा कांग्रेस के लिए। कांग्रेस में भी काफी समझदार लोग हैं। मेरा आशय सिर्फ "ध्यानाकर्षण" है वैसे कांग्रेसियों के लिए जो ऐसी बेतुकी बातों पर अंकुश लगा सकें।

करीब तीन दशक पहले मेरे मन भी संगीत सीखने की ललक जगी। कुछ प्रयास भी किया लेकिन वो शिक्षा पूरी नहीं कर पाया। उसी क्रम में अन्य रागों के अतिरिक्त मेरा परिचय "राग-दरबारी" से भी हुआ। यह "राग-दरबारी" जिन्दगी में भी बड़े काम की चीज है जिसे आजकल चलतऊ भाषा में अज्ञानी लोग "चमचागिरी" कहते हैं। यदि हम में से कोई इस राग के "मर्मज्ञ" हो जाए तो कोई भी "ऊँचाई" पाना नामुमकिन नहीं। आज के समय की नब्ज पकड़ कर ये बात आसानी से कोई भी कहा सकता है।

प्रिय राहुल जी का 41वाँ जन्म दिवस आया और कांग्रेसजनों ने इसे पूरे देश में "हर्षोल्लास" से मनाया। किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? और हर्षोल्लास से मनायें। लेकिन आदरणीय दिग्विजय जी भला चुप कैसे रह सकते? संसार का शायद ही कोई ऐसा बिषय हो जिसके वे "ज्ञाता" नहीं हैं। तपाक से राहुल जी की इसी साल शादी की चिन्ता के साथ साथ उन्हें "प्रधानमंत्री" के रूप में देखने की अपने "अन्तर्मन की ख्वाहिश" को भी सार्वजनिक करने में उन्होंने देरी नहीं दिखायी। क्या इसे राग-दरबारी कहना अनुचित होगा? अब जरा सोचिये वर्तमान प्रधानमंत्री की क्या मनःस्थिति होगी? वे क्या सोचते होंगे?

मजे की बात है कि दिग्विजय जी इतने पुराने कंग्रेसी हैं। मंत्री, मुख्यमंत्री बनने के साथ साथ लम्बा राजनैतिक अनुभव है उनके पास। उनके वनिस्पत तो राहुल तो कल के कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। लेकिन उन्हें अपनी "वरीयता" की फिक्र कहाँ? वे तो बस अपने "राग" को निरन्तर और निर्भाध गति से "दरबार" तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि उनकी "दिग्विजयी-भाषा" पर कोई लगाम न लगा सके। काश! मैं भी "राग-दरबारी" सीखकर अपनी तीन दशक पुरानी गलती को सुधार पाता?
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जगत-गुरु इन्डिया

बचपन से ही सुनते पढ़ते आया हूँ कि भारत "जगत-गुरु" है। सभ्यता, संसकृति, ज्ञान, विज्ञान के प्रकाश वितरणके साथ साथ गणित के शून्य से लेकर नौ तक के अंकों का जन्मदाता भारत ही तो है। कमोवेश यही स्थिति आजकल भी है। हमें आज भी "जगत-गुरु" होने का गौरव है। मेरी बातों से आप सहमत हो सकते हैं, असहमत हो सकते हैं, आश्चर्यचकित हो सकते हैं। आपका असहमत और आश्चर्यचकित होना एकदम लाजिमी है, क्योंकि आप देख रहे हैं कि विगत दशकों में पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के पीछे पीछे लगातार चलने वाला भारत, भला जगत-गुरु कैसे हो सकता है? जबकि हमारे अन्दरूनी फैसले भी "व्हाइट हाऊस" के फैसले से निरन्तर प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन आपके आश्चर्य करने से क्या होगा? सच्चाई तो आखिर सच्चाई है। सोलह आने चौबीस कैरेट सच यही है कि हम "जगत-गुरु" थे, हैं और आगे भी रहेंगे। यकीन नहीं आता तो इसके समर्थन में नीचे कुछ दमदार तर्क दिये जा रहे हैं। उसे देखें और यकीन करने को विवश हो जायें।

सबसे पहले व्याकरण के उस नियम के बारे में बात करें जिसमें कहा गया है कि व्यक्तिवाचक संज्ञा का अनुवाद नहीं होता। सच भी है व्यक्ति, स्थान, देश आदि का नाम अन्य भाषाओं में भी ज्यों का त्यों लिखा जाता है। लेकिन भारत का अनुवाद "इन्डिया" किया जाता है। दुनिया के किसी भी देश को यह गौरव प्राप्त है क्या? शायद नहीं। यहाँ तक कि हमारे संविधान की शुरुआत ही "भारत दैट इज इन्डिया---------" से होती है। ऐसा लिखने के पीछे भी भारतीयों का अपना मनोविज्ञान है। अपने पूर्व के शासक के प्रति आज भी हमलोग काफी श्रद्धावान हैं और उनके सम्मान में कोई कमी नहीं आने देना चाहते हैं। प्रमाण स्वरूप देख लें आजादी हासिल करने के दशकों बाद भी हम "भारत" से अधिक "इन्डिया" को मान देते हैं। है एक अनोखी बात? जो हमें सबसे अलग करता है?

दयालुता हमारी पूँजी है। हम दूसरे के दुख को देखकर अपना दुख भूल जाते हैं। अब देखिये पिछले दशक में विश्व के कई भागों सहित भारत, सॅारी, इन्डिया में भी खतरनाक आतंकवादी हमले हुए। यहाँ तक कि भारतीय संसद, विधान सभाओं सहित मुम्बई का ताज होटल काण्ड भी हुआ। सारा देश दहल गया। लेकिन हमारे बुद्धजीवियों, मीडिया कर्मियों सहित देश की जनता को भी ११ सितम्बर २००१ को अमेरीकी "वर्ड ट्रेड सेंटर" पर हुए आतंकवादी हमले की तकलीफ अधिक है वनिस्पत अपने देश में हुए खतरनाक हमलों के। अपने देश पर हुए आतंकी कार्यवाही को भूलकर हमलोग "वर्ड ट्रेड सेंटर" हुए हमले की "बरसी" को हर साल श्रद्धा पूर्वक याद करते हैं। विश्व में शायद हीइस तरह का कोई दूसरा उदाहरण हो? एक बिशिष्टता और हुई हमारी "जगत-गुरु" होने की।

"अतिथि देवो भव" का सिद्धान्त हमारी संस्कृति का मूल है। विदेशों में जाने के लिए सुरक्षा जाँच के नाम पर हमारे रक्षा मंत्री तक के कपड़े क्यों उतरवा लिए जाएँ, लेकिन अमेरिकन राष्ट्रपति बुश के आगमन के पूर्व ही उनके "कुत्ते" तक के लिए भारत में "फाइव स्टार" होटल
" के कमरे आरक्षित करा दिये जाते हैं। है इस तरह की कोई मिसाल विश्व में? उसपर मान आदर इतना कि उन कुत्तों को राजघाट में राष्ट्रपिता गाँधी की समाधि तक घूमने की छूट दे दी जाती है। अभी आदरणीय "कसाब जी" की शासकीय तामीरदारी के बारे में तो हम सभी जान ही रहे हैं हमारा यही "आतिथ्य भाव" विश्व में हमें सर्वश्रेष्ठ बनाता है।

हमारी सहनशीलता के क्या कहने? हमारा पड़ोसी मुल्क, जिसे अगर भारत ठीक से देख भी दे तो मुश्किल में पड़ जाता है, हमें कई तरह से परेशान किये हुए है। हम कई बार "आर-पार की लड़ाई" की की बात भी कर चुके हैं, सीमा पर सेना भेजकर भी लड़ाई नहीं किए और तबतक नहीं करेंगे जबतक "व्हाइट हाऊस" से ग्रीन सिग्नल नहीं मिलेगा।सहनशीलता की यह पराकाष्ठा है जो अन्यत्र शायद ही देखने को मिले। अतः इस "इन्डिया" की एक और बिशेषता मानी जानी चाहिए।

संसद, शासन का बड़ा और विधान सभा छोटा मंदिर माना जाता है। इन मंदिरों के संचालन के लिए हमलोगों ने "वोट" देकर कुछ ऐसी बिशिष्ट आत्माओं को भेज दिया है जिनका हाल ही में "अपराधी" से "नेता" के रूप में "रासायनिक परिवर्तन" हुआ है। मजे की बात है कि कल तक देश की पुलिस जिन्हें गिरफ्तार करने के लिए भटक रही थी, आज वही पुलिस उन्हें "सुरक्षा" प्रदान करने को भटक रही है। इन्डिया की इस बिशेषता पर कौन मर जाय?

इसके अतिरिक्त और भी कई ऐसी बिशिष्टताओं से भरपूर इस इन्डिया के शान में और बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है, लेकिन कथ्य के लम्बा होने के डर से विराम दे रहा हूँ। कोई शंका होने पर उसकी भी चर्चा भबिष्य में करूँगा।लेकिन आप मान लें कि आज भी इन्डिया "जगत-गुरु" है, पहले भी था और निरन्तर उन्नति को देखते हुए आगे की संभावना बरकरार है
क्योंकि कल की ही तो बात है जब हमारे शासकों ने एक संत को सबक सिखाया और हजारों सोये निहत्थे अनशनकारियों के प्रति रामलीला मैदान में पुलिसिया "दयालुता" दिखाने में जो भूमिका निभायी है वह विश्व में सबके लिए अनुकरणीय है और अन्त में-

जगत-गुरु इन्डिया है अबतक बदले चाहे रूप हजार।
ज्ञान योग सिखलाया पहले आज मंत्र है भ्रष्टाचार।।
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धर्म का बाजार या बाजार का धर्म

कई बर्षों का अभ्यास है कि रोज सबेरे सबेरे उठकर कुछ पढ़ा लिखा जाय क्योंकि यह समय मुझे सबसे शांत और महफूज लगता है। लेकिन जब कुछ पढ़ने लिखने के लिए तत्पर होता हूँ तो अक्सर मुझे दो अलग अलग स्थितियों का सामना अनिवार्य रूप से करना पड़ता हैं।

पहला - टी०वी० के कई चैनलों में धार्मिक प्रवचन सुनना जिसमें विभिन्न प्रकार के "धार्मिकता का चोला पहने" लोगों के "अस्वादिष्ट" प्रवचनों को सुनना शामिल है। इसके अतिरिक्त कसरत (योग भी कह सकते), हमेशा एक दूसरे के विपरीत भबिष्य फल बताने वाली "तीन देवियों" द्वारा राशिफल से लेकर शनि का भय दिखाते हुए लगभग "शनि" (मेरी कल्पना) जैसे ही डरावने वेश-भूषा धारण किए महात्मा की "संत-वाणी" भी सुननी पड़ती है, जिनके बारे में अभी तक नहीं समझ पाया हूँ कि वो कुछ समझा रहे हैं या धमकी दे रहे हैं। वो भी ऊँची आवाज में। अगर टी०वी० का "भोल्युम" कम करूँ तो सुमन (श्रीमती) जी कब "शनि-सा" व्यवहार करने लगे, अनुमान लगाना कठिन है।

और दूसरा काम - बाजार खुलते खुलते मुझे दुकान पर पहुँच जाना पड़ता है क्योंकि पहले से कोई न कोई काम मेरे लिए "गृह-स्वामिनी" द्वारा निर्धारित किया जाता है ताकि मैं लेखन जैसे "बेकार" काम से अधिक से अधिक दूर रह सकूँ। दुकान में भी पहुँते ही वही देखता हूँ कि सेठ जी "मुनाफा" कमाने से पूर्व भगवान को खुश करने लिए "निजी धार्मिक अनुष्ठान" में कुछ देर तल्लीन रहते हैं। निस्सहाय खड़ा होकर सारे कृत्यों को देखना मेरी मजबूरी है क्योंकि पूजा के बाद जबतक दुकान से कोई नगदी खरीदारी न हो, उधार वाले को प्रायः ऐसे ही खड़ा रहना पड़ता है। कभी कभी तो नगदी खरीददारी वाले ग्राहक का भी इन्तजार करना मेरी विवशता बन जाती है और आज मेरी यही विवशता मेरे इस लेख के लिए एक आधार भी है।

देश में कई प्रकार के उद्योग पहले से स्थापित हैं जो अपनी नियमित उत्पादकता के कारण हमारे देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ बने हुए है और जिसकी वजह से हमारी सुख-सुविधा एवं समृद्धि में लगातारिता बनी हुई है। हाल के कुछ बर्षों कई नए प्रकार के "अनुत्पादक उद्योगों" के नाम उभर कर बहुत तेजी और मजबूती से देशवासी के सामने आये हैं एवं जो लगातार समाज को बुरी तरह से खोखला कर रहा है। उदाहरण के लिए - अपहरण-उद्योग, नक्सल-उद्योग, राजनीति-उद्योग इत्यादि। इसी कड़ी में एक और उद्योग की ठोस और "सनातनी उपस्थिति" से इन्कार करना मुश्किल है और वो है "धर्म का उद्योग"

अभी तक जितने भी ज्ञात-अज्ञात मुनाफा कमाने के संसाधन और क्रिया कलाप हैं उसमें धर्म सर्वोपरि है। साईं बाबा के साथ साथ कई कई बाबाओं के "बिना श्रम के अर्जित" सम्पत्तियों का मीडिया द्वारा उपलब्ध कराये गए ब्योरे के आधार पर यह कहना किसी के लिए भी कठिन नहीं है। इस उद्योग की बिशेषता यह है कि इसको स्थापित करने में कोई खास शुरुआती खर्च नहीं है - बस फायदा ही फायदा। केवल आपके वस्त्र "धार्मिकता" के आस पास दिखते हों। कभी कभी "लच्छेदार-भाषा" और लोक लुभावन "व्यावसायिक-मुस्कान" के साथ पाप-पुण्य का "भय" दिखाते हुए चुटकुलेबाजी करने का भी हुनर आप में होना चाहिए और इन सब के लिए कोई खास "प्रारम्भिक पूँजी" की आवश्यकता तो पड़ती नहीं है।

बाला जी का मंदिर हो या चिश्ती का दरगाह, आप जहाँ भी जाइये तो उस स्थल से बहुत पहले ही आपके आस पास किसी न किसी तरह "धार्मिक एजेन्टों" का अस्वाभाविक अवतार हो जाता है जो आपके पीछे हाथ धो कर पड़ जाते हैं और अपने को उस "सर्वशक्तिमान" का सच्चा दूत बताते हुए उनसे "डाइरेक्ट साक्षात्कार" या "पैरवी" कराने का वादा तब तक करते रहते हैं जब तक आप उसके "वश" में न हो जाएं या डाँट न पिलावें। फिर शुरु होता है पैसा ऐंठने का एक से एक "चतुराई भरा कुचक्र" जिससे निकलना एक साधारण आदमी के लिए मुशकिल ही होता है। सबेरे सबेरे भगवान की आराधना करने के बाद ये एजेन्ट भगवान के ही नाम पर खुलेआम "मुनाफा" कमाने के लिए कई प्रकार के जायज(?) नाजायज जुगत में तल्लीन हो जाते हैं जिसके शिकार अक्सर वे सीधे-सादे साधारण इन्सान होते हैं जो बड़ी कठिनाई से पैसे का जुगाड़ करके अपने आराध्य का दर्शन करने आते हैं।

और बाजार में क्या होता है? बिल्कुल यही दृश्य, यही कारोबार। सारे के सारे दुकानदार अपना दुकान खोलते ही अपने अपने आराध्य की आराधना करते हैं और फिर शुरू हो जाता है अधिक से अधिक मुनाफा कमाने का जुगाड़। एक लक्ष्य मुनाफा बटोरना है चाहे जो करना पड़े। इनके भी मुख्य शिकार वही "आम आदमी" हैं जो अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मुश्किल से बाजार का रूख कर पाते हैं वो भी सिर्फ जीने भर की जरूरतों के लिए।

कोई धर्म-सथल हो या बाजार, सब जगह की "नीति और रीति" एक है। यदि चलतऊ भाषा में कहा जाय तो अधिक से अधिक अपने ग्राहकों को "छीलना" अर्थात मुनाफा कमाना। इसके लिए वे आमतौर पर वाकचातुर्यता की चासनी में लपेट कर झूठ और कई प्रकार के तिकड़म का सहारा लेते हैं। मजे की बात है कि दोनों (धर्म-स्थल और बाजार)जगहों में ये सारे फरेब भगवान की "आराधना" के बाद ही शुरू होता है मानो भगवान से "इजाजत" लेकर। और "बेचारे" भगवान का क्या दोष? वे तो पत्थर के हैं। क्या कर सकते हैं? सब चुपचाप देखते रहते हैं सारे अन्याय को। आखिर उन्हीं के "परमिशन" से तो शुरू किया जाता है यह कातिल खेल।

वैश्वीकरण के बाद अपने देश में बाजारवाद पर बहुत चर्चाएं हुईं। इसकी अच्छाई और बुराई पर भी। लेकिन मेरे जैसा मूरख यह अभी तक नहीं समझ पाया कि बाजार अपना धर्म निभा रहा है या धर्म ही एक बाजार बन गया है और हठात् ये पंक्तियाँ निकल आतीं हैं कि-

बाजार और प्रभु का दरबार एक जैसा
सब खेल मुनाफे का आराधना ये कैसी?

पूरी गज़ल का लिन्क ये http://manoramsuman.blogspot.com/2011/05/blog-post_09.html है
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"योगासन" नहीं "वोटासन"

जब से कलम घिसने "सारी" - अब तो कहना होगा "की बोर्ड" घिसने का रोग लगा है, सबेरे बजे उठ जाता हूँ। ठीक उसी समय "पत्नी- कृपा" से वो चैनल खुल जाता है जहाँ रामदेव बाबा योगासन की बात पूरे जोश में बता रहे होते हैं। टी०वी० को "फुल वाल्यूम" के साथ खोला जाता है ताकि वो दूसर कमरे में भी काम करें तो उन्हें सुनने में कोई कठिनाई हो। आदरणीय रामदेव जी के प्रति उनकी असीम भक्ति मेरे परिचतों के बीच भी सर्वविदित है। मुझे भी लाचारी में सुनना ही पड़ता है क्योंकि "आई हैव नो अदर च्वाईश एट आल" वैसे मुझे भी बाबा रामदेव के प्रति कोई विकर्षण तो है नहीं

मेरी पत्नी बहुत पान खाती है और बाबाजी प्रतिदिन "विदाउट फेल" इन बुराईयों से कोसों दूर रहने की ताकीद करते रहते हैं। पत्नीकी "रामदेवीय भक्ति" से प्रभावित होकर बहुत विनम्रता मैंने उनसे पूछने का दुस्साहस किया कि जब बाबा पान, गुटखा आदि खाने से इतने जोर से मना करते हैं और आप इतने श्रद्धाभाव और प्रभावी (शोर करके) ढंग से उन्हें रोज सुनतीं हैं, फिर ये पान क्यों खातीं हैं? मेरे सौभाग्य से उन्हें उस दिन गुस्सा नहीं आया और उनके पास कोई उचित जवाब भी नहीं था अपनी आदत की विवशता के अतिरक्त।

जिस तरह से एक चावल की जाँच से पूरी हाँडी में भात बनने या बनने का पता चल जाता है, ठीक उसी तर्ज पर मैं क्या कोई भी सोचने पर विवश हो जायेगा कि बाबा की सभाओं में उनकी बातों को समर्थन करने वाले क्या ऐसे ही लोग अधिक हैं? जो पान, गुटखा, शराब, खैनी, कोल्ड ड्रींक्स आदि छोड़ने की प्रतिदिन शपथ लेते हैं और योगासन करने के वादे के साथ हाथ उठाकर रामदेव जी के आह्वान का प्रत्यक्षतः समर्थन तो करते हैं पर व्यवहार में नहीं।

फिर याद आती है विगत दिनों भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके द्वारा चलाए गए "भारत स्वाभिमान आन्दोलन" तहत उनके हुंकार की। वही भीड़ और वही समर्थन की जिसके दम पर उन्होंने रामलीला मैदान में अनशन के नाम पर हजारों की भीड़ इकट्ठा कर ली। फिर शासक वर्ग की मिमियाहट, बाद में रात में अचानक उसी शासकीय पक्ष के आक्रामक रूख की भी याद आती है जिसे "मीडिया" के सौजन्य से पूरे देश ने देखा और सुना।

लोगों ने यह भी देखा सुना कि जो बाबा सबेरे में स्वयं "राह कुर्बानियों की न वीरान हो - तुम सजाते ही रहना नये काफिले" जोर जोर से गा रहे थे, वही रात में जान बचाने के लिए एक बिशेष "रक्षा घेरा" बनबा कर मंच से कूदे और लोगों में "कूदासन" की होड़ लग गयी इसी क्रम में उन्हें "स्त्री-वस्त्र" तक भी धारण करना पड़ा देखते ही देखते "राह कुर्बानियों" की एकाएक वीरान हो गयी। खैर----

शासकीय पक्ष के व्यवहार के क्या कहने? दिन में "पुष्प" से स्वागत और रात में "कटार" से वार। वाह क्या सीन था? "क्षणे रूष्टा - क्षणे तुष्टा" क्या कहा जाय इस नाटकीय मोड़ को? शायद पाकिस्तानी तानाशाह भी इतनी जल्दी, वो भी एकदम विपरीत दिशा में, अपना विचार बदलने में शर्म महसूस करेंगे। एकाएक सत्ता पक्ष के लोगों को महाभारत के संजय की तरह "दिव्य दृष्टि" मिली और बाबा रामदेव "आदरणीय" से "महाठग" के रूप में अवतरित हो गए। सत्ता पक्ष ने "दिग्विजयी मुद्रा" में इसकी घोषणा भी शुरू कर दी और यह क्रम अब भी चल ही रहा है। पता नहीं कब तक चलेगा?

चाहे अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव - दोनों ने देश की नब्ज को पहचाना और ज्वलन्त मुद्दे भी उठाये जिसका कुल लब्बोलुआब भ्रष्टाचार ही रहा। पता नहीं "भ्रष्टाचार का मुद्दा" अब कहाँ चला गया? अब तो मुद्दा "सरकार बनाम रामदेव और अन्ना" के अहम् की टकराहट की ओर मुड़ गया है जो देश के स्वस्थ वातावरण के लिए किसी भी हालमें ठीक नहीं। गाँव की पान दुकान से लेकर दिल्ली तक जिसे देखो सब बहस में भिड़े हुए हैं। मजे की बात है कि सब भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं मगर भ्रष्टाचार अंगद के पाँव की तरह अडिग है।

जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत समझदारी है वर्तमान सरकार के वर्तमान रुख को मैं अंग्रेजी हुकूमत की "फोटोकापी" से कम नहीं देख पाता। जब हालात ऐसे हैं तब क्या गाँधीवादी कदम और क्या आध्यामिक योगासन? क्या सरकार पर कोई असर पड़ेगा? "सत्ता सुन्दरी" की आगोश में जकड़े ये मदहोश लोग क्या जानेंगे आम आदमी की पीड़ा और विवशता? वैसे भी वातानुकूलित कमरे में दुख कम दिखाई पड़ते होंगे। तो फिर सवाल उठता है कि क्या यूँ ही चुप रहा जाय? नहीं बिल्कुल नहीं। ये अंग्रेज भी नहीं हैं जो इन्हें मार-पीट के भगाया जा सके। फिर उपाय क्या है?

योगासन की दिशा में बाबा रामदेव के द्वारा किये गए कार्य को देश कभी नहीं भुला सकता। उन्होंने जन जागरणका जो काम किया है वह अतुलनीय है। लेकिन ये सत्ताधारी "गाँधीवाद" और "योग - आध्यात्म" की भाषा कहाँ समझ रहे हैं। ये तो सिर्फ "वोट" की भाषा समझते हैं और अन्ना और रामदेव के पास जबरदस्त जन-समर्थन भी है।

अतः बाबा जी आपने बहुत योगासन सिखाया और आगे भी सिखायें। लेकिन एक सलाह है कि उसके साथ साथ यहाँ की सीधी सादी जनता को "वोटासन" के "रहस्य" और "उपयोगिता"भी उसी तरह से सिखायें जिस तरह से योग सिखा रहे हैं ताकि इन बेलगाम सत्ताधीशों के होश अगले चुनाव तक ठिकाने जाए। वैसे मुझे यह भी मालूम है बाबा - मेरे जैसे कम "घास-पानी" वाले लोगों की बात पर कौन तबज्जो देगा। जय-हिन्द।
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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हिंदी ब्लॉगिंग गाइड Hindi Blogging Guide

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