ओसामा और तालिबान को यूएसएसआर के खि़लाफ़ जंग के मैदान में उतारने वाला और हथियार देने वाला अमेरिका था। यूएसएसआर को अपने देश से बेदख़ल करने के बाद उन्होंने अमेरिका से भी अरब मुल्कों से अपना क़ब्ज़ा हटाने की मांग की। यही मांग अमेरिका की नाराज़गी का कारण बन गई। कल तक प्रिय ओसामा और तालिबान पर उसने आतंकवादी का ठप्पा लगा दिया। इनके संघर्ष में दुनिया भर के कमज़ोर पिस कर रह गए। समय गुज़रा और अमेरिका ने अरबों डालर ख़र्च करके यह सबक़ हासिल किया कि आतंकवादी कहकर मासूमों को मारने समस्या हल होने वाली नहीं है। अमेरिकी हितों को नुक्सान होते देखकर अब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 14 तालिबान नेताओं के नाम प्रतिबंध सूची से हटा दिए हैं। आज के अख़बार की अहम ख़बर है यह। इनके घर की खेती है। जिसे चाहते हैं, आतंकवादी घोषित करते हैं। जिसका नाम चाहे सूची में ‘इन‘ कर दिया और जब उसमें अपना नुक्सान नज़र आया तो उसे सूची से ‘आउट‘ कर दिया। अगर आप अपने देश के प्राकृतिक संसाधन इन पश्चिमी देशों को आराम से लूट लेने दें तो फिर आपसे अच्छा कोई भी नहीं है। सऊदी अरब से इसीलिए अमेरिका ख़ुश है और इसीलिए सद्दाम से नाराज़ हुआ और अब चीन और ईरान से भी इसीलिए नाराज़ है। पर्दानशीन औरतों पर जुर्मान आयद करना क्या सांस्कृतिक आतंकवाद नहीं है। लीबिया और अफ़ग़ान शहरियों पर बमबारी करने पर भी लोग अमेरिका को कुछ नहीं कहते लेकिन उनका विरोध करने वालों पर लेख लिखकर ख़ुद को सत्यान्वेषी और तटस्थ सा दिखाने की कोशिश करते हैं।
जब भी ज़ुल्म होगा तो फिर उसके खि़लाफ़ आक्रोश के स्वर ज़रूर उभरेंगे और फिर बहुत से हालात पैदा होंगे। अपनी रक्षा में उठा हुआ कमज़ोर का हाथ आतंकवादी का हाथ कह दिया जाता है और ताक़तवर यही काम करता है तो उसे न्याय और शान्ति व्यवस्था की बहाली कह दिया जाता है।
इस पर विचार कीजिए और गवाही सत्य की दीजिए ताकि दुनिया में हरेक को उसका वाजिब हक़ मिले और शांति सचमुच आए।
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जब भी ज़ुल्म होगा तो फिर उसके खि़लाफ़ आक्रोश के स्वर ज़रूर उभरेंगे और फिर बहुत से हालात पैदा होंगे। अपनी रक्षा में उठा हुआ कमज़ोर का हाथ आतंकवादी का हाथ कह दिया जाता है और ताक़तवर यही काम करता है तो उसे न्याय और शान्ति व्यवस्था की बहाली कह दिया जाता है।
इस पर विचार कीजिए और गवाही सत्य की दीजिए ताकि दुनिया में हरेक को उसका वाजिब हक़ मिले और शांति सचमुच आए।
