एक नुस्ख़ा, जोड़ों का दर्द दूर करने के लिए

जनाब सुशील  बाकलीवाल जी ने जोड़ों का दर्द दूर करने के लिए एक नुस्ख़ा बताया है .
१ लीटर सरसों के तेल में २५० लहसुन की छिली हुई कलियाँ और १०० ग्राम अजवायन पकानी है और फिर इसे लाल रंग की कांच की शीशी में सुरक्षित रखना है .
पूरा नुस्ख़ा और उसे बनाने का तरीक़ा आप यहाँ देखें -

यह नुस्ख़ा दुरूस्त है, दर्द में आराम देता है, अनुभूत है।
जो लोग बेरोजगार हैं, वे इसके जरिये रोजगार भी पा सकते हैं लेकिन मुकम्मल आराम तब होगा जब कि खाने की दवा भी साथ ली जाए।
बहरहाल इससे आराम मिलता ही है।
मालिश जरा ढंग से करनी चाहिए।
...और तेल पकाते समय एक सावधानी यह भी बरतनी चाहिए कि जिस बर्तन में तेल पका रहे हैं उसके ऊपर कोई वजनदार ढक्कन ढकें क्योंकि लहसुन की कलियां पकने के बाद जोर से छिटकेंगी तो हल्का ढक्कन उडकर कहीं का कहीं पहुंचता है।

हा हा हा ...
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जय जवान ! जय किसान



" जय जवान ! जय किसान " यह नारा दिया था हमारे स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ! शास्त्री जी, जिनकी सादगी, निष्ठा एवं संघर्षशीलता के बारे में जितना भी कहा जाये शब्द कम पड़ जायेंगे !

बचपन में उनके अभावग्रस्त जीवन के बारे में हर व्यक्ति जानता है ! कैसे वे मीलों दूर नंगे पैर पैदल चल कर विद्या ग्रहण करने के लिये स्कूल जाया करते थे ! कई बार तो नाव के पैसे ना चुका पाने की स्थिति में उन्होंने तैर कर भी नदी पार की है ! आज के बच्चे कार, बाइक, बस या स्कूटर्स पर सवार होकर स्कूल जाते हैं फिर चाहे स्कूल फर्लांग भर दूर ही क्यों न हो ! शास्त्री जी के बचपन के इन संघर्षों से भरे दिनों के किस्सों को सब कहानी की तरह पढ़ कर भूल भी जाते हैं ! शायद इसीलिये कि उनके जीवन के प्रसंगों को ना तो किसी पाठ्य पुस्तक में स्थान मिलता है, ना ही उनके ऊपर किसी फिल्मकार को कोई फिल्म बनाने की प्रेरणा हुई है कदाचित इसलिए कि कहीं यह घाटे का सौदा ना बन जाये ! उनके व्यक्तित्व के ऊपर कभी कोई सार्वजनिक चर्चा भी आयोजित नहीं की गयी ! आज शास्त्री जी के बारे में बहुत कम बच्चे जानते हैं ! जिन व्यक्तियों के जीवन के प्रसंग युवा पीढ़ी के लिये प्रेरक हो सकते हैं , उनके जीवन को प्रभावित कर सकते हैं और उनकी सोच को एक नयी सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ सकते हैं उन्हें हमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग ने भी भुला दिया है ! बस उनके जन्मदिन एवं निर्वाण दिवस पर चंद पलों के लिये उन्हें याद कर एक रस्म सी अदा कर दी जाती है और फिर उनके अध्याय को साल भर के लिये बंद कर दिया जाता है !

शास्त्री जी एक ऐसे नेता थे जब वे रेल मंत्री थे एक छोटी सी रेल दुर्घटना हो जाने पर उन्होंने स्वयं नैतिक जिम्मेदारी ले अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ! जब वे गृहमंत्री थे और देश भीषण खाद्य समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने प्रत्येक सोमवार की रात एक समय का भोजन त्यागने की अपील देशवासियों से की थी ताकि भूखे व्यक्तियों के मुख को चंद निवाले मिल सकें ! वे स्वयं इस पर अमल करते थे ! उनके इस आह्वान पर तमाम भारतवासियों ने सोमवार की शाम का भोजन त्याग दिया था ! ऐसे करिश्माई नेता थे शास्त्री जी ! क्या आज के नेताओं से उनकी तुलना की जा सकती है जो भूखी जनता के मुख से निवाले छीन कर अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाने में लगे हैं ! देश में कुछ ऐसे भी नेता हैं जो निजी हेलीकोप्टर में बैठ कर घर से ऑफिस जाते हैं और दोपहर के भोजन के लिये घर आने के लिये हेलीकोप्टर का ही प्रयोग करते हैं ! ऐसे नेताओं से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वे देश की निर्धन जनता का ध्यान रख एक समय का अपना भोजन त्याग देंगे ? शास्त्री जी के समय में ही देश को पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करना पड़ा था ! और इसी युद्ध के निराकरण के लिये जब वे कोसीजिन के आमंत्रण पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान के साथ बात करने रूस गये तो वहाँ हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया ! देश हित में देश के वीर सपूत ने अपने प्राणों की आहुति दे दी !
शास्त्री जी का मानना था कि देश की आतंरिक खाद्य समस्या का समाधान खेतिहर किसान ही कर सकते हैं और देश की सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी हमारे सेना के जवानों के फौलादी कन्धों पर रहती है ! शास्त्री जी इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे ! वे जानते थे खेतों में जब किसानों की मेहनत से फसलों का सोना उगेगा तभी देश की खाद्य समस्या का निराकरण हो सकेगा और देश की सीमाओं पर तैनात जवान जब तक सतर्क और चौकस रहेंगे देशवासी अपने अपने घरों में चैन की नींद सो सकेंगे ! इसीलिये उन्होंने यह नारा दिया था , " जय जवान ! जय किसान " !
आज उनके जन्म दिन पर हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि उन्हें समर्पित है ! आज देश को ऐसे ही नेताओं की ज़रूरत है जो अपनी सोच में खुद से ऊपरदेश को रखें और विश्व फलक पर देश के परचम को सबसे ऊँचे फहराने की इच्छा रखें ! शास्त्री जी को हमारा नमन !

साधना वैद
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अग़ज़ल-- दिलबाग विर्क


प्रतियोगिता में शामिल अगज़ल , पसंद आए तो LIKE करें 


                            * * * * *
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कैसे कैसे बुद्धिजीवी ? Easy way for safe sex

नेकी के रास्ते पर सामूहिक रूप से चलना हमेशा से ही कठिन रहा है लेकिन कठिनाइयों से घबरा कर पाप के मार्ग पर तो नहीं चला जा सकता। भारत में भी लोग व्यक्तिगत रूप से ही नेकी के मार्ग पर हैं वर्ना तो अधिकतर लोग दहेज और सूद ले दे रहे हैं जिसकी वजह से भारत में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और पेट में ही कन्या भ्रूण चेक करवा कर मरवा रहे हैं और ये पाप का मार्ग इस लायक नहीं है कि इस पर चला जाए। जो लोग इस पर चल रहे हैं, उन्हें इस पर नहीं चलना चाहिए। हरेक नेकी पर चले, यहां भी चले और वहां भी चले, सबका मार्ग एक ही हो, तभी कल्याण होगा .

हरेक दिशा में और हरेक देश में आदमी नेकी के मार्ग पर चले, बुद्धिजीवियों को ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए, यही उनकी जिम्मेदारी है लेकिन अजीब हाल है दुनिया का, कि जो लोग पाप की प्रेरणा देते हैं, उन्हें बुद्धिजीवी कहा जा रहा है।
ऐसे बुद्धिजीवियों का कोई सामाजिक आधार नहीं होता बल्कि ये टी. वी. - रेडियो पर ही टॉक करते हुए मिलेंगे।
ये फर्जी बुद्धिजीवी समलैंगिकता और आजाद यौन संबंधों की वकालत करते हुए मिलेंगे और सुरक्षित सेक्स के लिए कंडाम और पिल्स की जानकारी देते हुए मिलेंगे।
क्या सचमुच ऐसे लोगों को इंसान भी कहा जा सकता है ?
बुद्धिजीवी कहना बहुत बड़ी बात है।
हमारी बुद्धि तो यह कहती है कि समलैंगिकता का मार्ग मानव जाति के लिए फलदायी नहीं है और सुरक्षित सेक्स का आसान तरीका यह है कि जिससे निकाह-विवाह किया है, उसकी वफादारी को महसूस करो और खुद भी उसके प्रति वफादार रहो।
जो लोग अपने बच्चों की संखया नियंत्रित करना चाहें तो वे भी ऐसा तरीका अखितयार करें जिससे उनके जीवन साथी के तन-मन पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े  और न ही समाज आगे चलकर लिंग अनुपात संबंधी किसी तरह की जटिलता का शिकार हो।
आप क्या कहते हैं ?
और देखिये :
Maulana Wahiduddin Khan has made it his mission to present Islamic teachings in the style and language of the post-scientific era.
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एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी

दोस्तों, उपरोक्त वार्तालाप द्वारा एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी को देखें. आज हुई उपरोक्त वार्तालाप यहाँ डालने का उद्देश्य किसी अपमान करना नहीं है. केवल सिर्फ हिंदी चाहने वालों की "कथनी और करनी" को दर्शाने की मात्र एक छोटी-सी कोशिश है. फिर भी इस प्रतिक्रिया से कोई भी आहत होता है. तब उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. गोपनीयता को देखते हुए एक हिंदी प्रेमी का नाम जाहिर नहीं कर रहा हूँ.
सिरफिरा : नमस्कार जी,क्या आप नाराज है हमसे
एक हिंदी प्रेमी: नहीं जी। नाराज क्यों होंगे? नमस्कार
सिरफिरा : दो दिन वार्तालाप के हमारे सारे प्रयास असफल हो गए थें. आप कैसे है.
एक हिंदी प्रेमी: ठीक हैं। हाँ, इधर फ़ेसबुक से दूर रह रहा हूँ। मैंने खुद को दोनों समूहों* से अलग कर लिया, क्योंकि दो दिन तक मैंने इन्तजार किया. लेकिन किसी ने अपना नाम तक देवनागरी में अपनी प्रोफाइल में नहीं लिखा। मुझे तो पहले से अन्दाजा था कि गम्भीर लोग कम ही आते हैं इन साइटों पर.
सिरफिरा : कोई बात नहीं लोगों को थोड़ा समय देना पड़ता है फिर बच्चा पैदा होते ही बोलने नहीं लग जाता है.बाकी आपकी मर्जी.
एक हिंदी प्रेमी : बच्चे की बात? भाषा पर मैं खूब जानता हूँ लोगों को। लोग गीत हिन्दी के सुनेंगे, फ़िल्म देखेंगे जी। गम्भीर नहीं होंगे। कई दिग्गज ब्लागरों से पाला पड़ा है.रमेश भाई, एक काम करें। रात में बात करते हैं।
सिरफिरा : ठीक है.
 
नोट: हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से बनाये दो समूह "हम है अनपढ़ और गँवार जी" और "अनपढ़ और गँवार" की बात हो रही है.  
यहाँ पर कितने ब्लॉगर अपनी फेसबुक/ऑरकुट/गूगल की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में लिखना पसंद करते/इच्छुक हैं?
1. मुझे हिंदी में लिखने पर खुशी होगी.....
2. हिंदी में लिखना जरुरी नहीं है....
3. हिंदी में लिखने पर परेशानी होती है...
4. हिंदी में लिखने की जानकारी नहीं है....
5. मुझे कुछ नहीं कहना है........
6. हिंदी में नाम लिखने से स्टेट्स घटता है.....
7. हिंदी में नाम लिखने पर लोग हमें "अनपढ़" समझते हैं......

(वैसे फेसबुक की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में नाम लिखने की जानकारी और समस्या का समाधान यहाँ http://www.facebook.com/groups/anpadh/doc/172380636175360/ इस लिंक पर किया हुआ है)

पूरा  लेख यहाँ पर क्लिक करके पढ़ें. एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी 

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मोबाईल टेम्पलेट ऑन करें , पाठकों की संख्या बढ़ायें Hindi Blogging Guide (34)

दोस्तो, आज के हाई टेक युग में ऐसी बहुत बड़ी जमात है जो मोबाईल में इंटरनेट प्रयोग करती है | ऐसे में बहुत कम ब्लॉगर्स को ये पता होता है कि बहुत सारे Third Party Widgets और Links होने की वजह से उनका ब्लॉग बहुत सारे मोबाईल में खुल नहीं पाता और बहुत से पाठक उनसे दूर ही रह जाते हैं |
इसका समाधान भी सरल है | ब्लॉग के SETTINGS में जायें, फिर EMAIL & MOBILE में जाके SHOW MOBILE TEMPLET में YES का चुनाव करें  और इसे Save  कर दीजिये . 
अब आपका ब्लॉग हर मोबाईल में आसानी से खुलेगा . इसका प्रयोग करें और अपने ब्लॉग पर पाठकों की संख्या बढ़ायें |
-प्रदीप कुमार साहनी 
और ज़्यादा जानकारी के लिए देखें यह लिंक 
http://technostreak.com/how-to/blogger-mobile-templates-mobilizing-blogger-site-is-made-easy/
Bloggers using Google’s Blogger (or Blogspot) have a great news here.Blogger has rolled out a new set of mobile templates for your blogs making it easy for users to create mobile friendly version of their blogs in clicks.This was said about earlier and now it is out.
The blogger mobile templates are mobile optimized versions of the 27 default Template Designer templates.If you are using one of these templates, when you enable the mobile template option your blog will begin using the mobile version of the same variant.Even if you are using a custom template,you can enable this mobile feature and your blog will show up  in a generic default mobile template by blogger.
How will the templates look…

Wait a minute….There is a lot to be exited about.They are not just templates.But have many cool features you wouldn’t have imagined of…
  • Blog Preview: Get a glimpse of how your blog will be displayed by clicking on the Mobile Preview button. You can also see it on your smartphone by scanning the QR-code.
  • Automatic redirection: Viewers will see the mobile version of your blog when accessing from WebKit-based mobile browsers.
  • Template support: Blogger now supports all 27 templates. Some gadgets are also supported.
  • Mobile ads: Mobile AdSense ads will be displayed at the top of the post pages and at the bottom of the index page if the blog has an AdSense gadget or in-line blog ads.
  • Comments and videos: Viewers on smartphone devices will be able to make comments and watch videos.

Its time to enable it now…

Enabling the mobile templates is a lot easy! just head to Dashboard > Settings > Email & Mobile tab and enable the mobile template.

Don’t you think it is cool? Bloggers from other platforms will sure be envious on Blogspot bloggers now!(me too!)
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आखिर इस दंगे-फसाद से लाभ होता किसे है ?

हरेक आदमी अच्छी बातों को अच्छा और बुरी बातों को बुरा समझता है। हरेक आदमी को शांति और न्याय को अच्छा और दंगे-फसाद और खून खराबे को बुरा समझता है। इसके बावजूद लोग शांति भंग करते हैं और दंगा करते हैं और खून बहाते हैं।
सवाल यह नहीं है कि इसने ज्यादा बहाया या उसने ज्यादा बहाया और न ही यह सवाल है कि किसने पहले बहाया और किसने बाद में बहाया ?
असल में सवाल यह है कि जिसने भी बहाया तो क्यों बहाया ?
श्री लंका में तमिलों ने सिंहलियों को मारा या सिंहलियों ने तमिलों को ?
अफगानिस्तान में अमरीका ने पठानों को मारा या पठानों ने अमरीकियों को ?
और फिर यही बात हिंदुस्तान के लिए है कि हिंदुओं को किसने मारा ?
और मुसलमानों को किसने ?
आखिर इस मारामारी से लाभ होता किसे है ?
जनता को तो होता नहीं है।
इसका लाभ राजनीतिक दल ही उठाते हैं।
मुस्लिमों की भलाई में आग उगलने वाले मुस्लिम लीडर भी इसका लाभ उठाते हैं और हिंदुओं की भलाई के लिए जबानी जमा खर्च करने वाले लीडर भी लाभ उठाते हैं।
इनके भड़काए में आकर लड़नेवाले या उसकी चपेट में मरने वाले आम आदमी को तो इन्होंने कभी कुछ दिया ही नहीं, अपनी जान गंवाने वाले अपने कार्यकर्ताओं के परिवारों को भी इन्होंने कभी कुछ न दिया।
दुख की बात यह है कि इन्हें किनारे करने की इच्छा शक्ति जनता में आज भी नहीं है।

आज अपने गिरेबान में झांक कर देखें- अज़ीज़ बर्नी


बुनियाद (NBT)

दंगों में नुक्सान किसका ?

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भारतीय हिन्दी साहित्य मंच( http://bhartiyahindisahityamanch.blogspot.com )

हिन्दी की स्थापना तो बहुत पहले हो गई
थी मगर इसकी पहचान अधूरी अब
भी अधूरी है।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है। मगर
क्या हम सही मायने मेँ हिन्दी का उपयोग
करते हैँ? नहीँ ना?
इस मंच की स्थापना हिन्दी को एक नई
दिशा देना चाहता है।
हम इस मंच के लिए कुछ
कवियोँ,कथाकारोँ एवं साहित्य के हर
विधाओँ से संबन्ध रखने वाले
लोगोँ का चुनाव इस मंच के सदस्योँ के रुप मेँ
करेँगे।
अगर आप इच्छुक होँ तो आप हमेँ कुछ
प्रश्नोँ के जवाब लिखकर
bhartiyahindisahityamanch@gmail.com
पर भेजेँ।
1. आपका नाम
2. आपका ब्लॉग पता (अगर हो)
3. आप साहित्य की किस विधा से संबन्ध
रखते हैँ?
4. आपका मोबाईल नंबर (महिला वर्ग के
लिए आवश्यक नहीँ)
5. और उस विधा का एक उदाहरण (जैसे
अगर आप कवि हैँ तो एक कविता)


सब्जेक्ट मेँ 'भारतीय हिन्दी साहित्य मंच
मे सदस्यता हेतु' लिखेँ।blogspot.com )हिन्दी की स्थापना तो बहुत पहले हो गई
थी मगर इसकी पहचान अधूरी अब
भी अधूरी है।
हिन्दी हमारी मातृभाषा है। मगर
क्या हम सही मायने मेँ हिन्दी का उपयोग
करते हैँ? नहीँ ना?
इस मंच की स्थापना हिन्दी को एक नई
दिशा देना चाहता है।
हम इस मंच के लिए कुछ
कवियोँ,कथाकारोँ एवं साहित्य के हर
विधाओँ से संबन्ध रखने वाले
लोगोँ का चुनाव इस मंच के सदस्योँ के रुप मेँ
करेँगे।
अगर आप इच्छुक होँ तो आप हमेँ कुछ
प्रश्नोँ के जवाब लिखकर
bhartiyahindisahityamanch@gmail.com
पर भेजेँ।
1. आपका नाम
2. आपका ब्लॉग पता (अगर हो)
3. आप साहित्य की किस विधा से संबन्ध
रखते हैँ?
4. आपका मोबाईल नंबर (महिला वर्ग के
लिए आवश्यक नहीँ)
5. और उस विधा का एक उदाहरण (जैसे
अगर आप कवि हैँ तो एक कविता)


सब्जेक्ट मेँ 'भारतीय हिन्दी साहित्य मंच
मे सदस्यता हेतु' लिखेँ।
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आज अपने गिरेबान में झांक कर देखें- अज़ीज़ बर्नी

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ऐसे काम कीजिए, जिससे आपको दुआ मिले

आज हमने एक रचना पढ़ी जिसमें नजीर अकबराबादी जी बता रहे हैं कि इंसान की जिंदगी नापाएदार है और वह बड़े जतन से जो कुछ जमा कर रहा है, वह सब यही पड़ा रह जाएगा।
इसके बाद दूसरी रचना पढ़ी जिसमें कवि महोदय बता रहे हैं कि भूख में चांद भी रोटी जैसा लगता है। मुझे चांद रोटी जैसा कभी नहीं लगा क्योंकि कभी ऐसे हालात से सामना ही नहीं हुआ लेकिन इसके बावजूद यह बात सच है।
इसके बाद एक तीसरी रचना और पढ़ी जिसमें कवि यह बता रहे हैं कि खाने वाले लोग मेरे हिस्से का सूरज खा गए। इसी कविता में उन्होंने हिंदुस्तान की बहुत सी समस्याओं के साथ गरीबी और भ्रष्टाचार को प्रमुखता से उठाया है।
ये तीनों रचनाएं मैंने पढ़ीं और सोचा कि इसका हल क्या हो ?
तो हल भी पहली रचना में ही नजर आया कि हरेक इंसान यह याद रखे कि एक दिन उसे मौत जरूर आएगी। मौत की याद इंसान के दिल पर ऐसा असर करती है कि उसकी सारी सोच को बदल कर रख देती है। यही वजह है कि हरेक धर्म-मत-दर्शन में मौत का जिक्र जरूर किया गया है।
अब आप पढि ए तीनों रचनाएं, जो हमने आज पढ़ीं -
(1)

गर तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है

ऐ ग़ाफ़िल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा ब्यौपारी है

क्या शक्कर मिसरी क़ंद गरी, क्या सांभर मीठा-खारी है

क्या दाख मुनक़्क़ा सोंठ मिरच, क्या केसर लौंग सुपारी है

सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा।
------------------
(2)
जाने क्यों हर गम बड़ा

और हर ख़ुशी छोटी लगे


खुद का दिल जब साफ़ न हो


हर नियत खोटी लगे


हो ज़हन में जो भी


दिखता है वही हर एक जगह


भूख जब हो जोर की


तो चाँद भी रोटी दिखे


---------------------
 
(3)
सुना है इन्सान के दुःख दर्द का इलाज मिला है
क्या बुरा है अगर ये अफ़वाह उड़ा दी जाए

किसी ने सच ही कहा है
वो भूख से मरा था
फ़ुटपाथ पे पड़ा था
चादर उठा के देखा तो पेट पे लिखा था
सारे जहां से अच्छा
सारे जहां से अच्छा
हिन्दुस्तां हमारा
हिन्दुस्तां हमारा

भूख लगे तो चाँद भी रोटी नज़र आता है
आगे है ज़माना फिर भी भूख पीछे पीछे
सारी दुनिया की बातें दो रोटियों के नीचे
किसी ने सच ही कहा ...

माँ पत्थर उबालती रही कड़ाही में रात भर
बच्चे फ़रेब खा कर चटाई पर सो गए
चमड़े की झोपड़िया में आग लगी भैया
बरखा न बुझाए बुझाए रुपैया
किसी ने सच ही कहा ...

वो आदमी नहीं मुक़म्मल बयां है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशां है
इक दिन मिला था मुझको चिथड़ों में वो
मैने जो पूछा नाम कहा हिन्दुस्तान है हिन्दुस्तान है

चंद लोग दुनिया में नसीब लेके आते हैं
बाकी बस आते हैं और यूं ही चले जाते हैं
जाने कब आते हैं और जाने कब जाते हैं
किसी ने सच ही कहा ...

ये बस्ती उन लोगों की बस्ती है
जहां हर गरीब की हस्ती एक एक साँस लेने को तरसती है
इन ऊँची इमारतों में घिर गया आशियाना मेरा
ये अमीर मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए
भूख लगे तो चाँद ...
ऐसा नहीं है कि मौत का जिक्र नहीं किया जाएगा तो मौत नहीं आएगी या देर से आएगी। मौत का जिक्र न करने से इंसान गाफिल रहेगा और मौत की याद से इंसान सजग रहेगा, अपने जीवन को सार्थक कामों में खर्च करेगा और किसी आंख से आंसू पोंछ देना, किसी भूखे के लिए रोटी का इंतेजाम कर देना या सर्दी में ठिठुरते हुए आदमी को कुछ कपड़े दे देना एक सार्थक काम है, जिसे करते ही आप अपने मन में खुशी का अहसास करेंगे।
आपके घर में ऐसे कपड़ों का ढेर लगा हुआ है जो आपके इस्तेमाल में नहीं आते, इन्हें निकालिए और किसी जरूरतमंद को दे दीजिए, उसके वुजूद के अंदर से आपके लिए दुआ निकलेगी, आपको उस दुआ की सखत जरूरत है।
ऐसे काम कीजिए, जिससे आपको दुआ मिले।
इसी पोस्ट को देखिये 'बुनियाद' पर
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%90%E0%A4%B8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%9C-%E0%A4%8F-%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A4%B8-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%86-%E0%A4%AE-%E0%A4%B2http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%90%E0%A4%B8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE-%E0%A4%95-%E0%A4%9C-%E0%A4%8F-%E0%A4%9C-%E0%A4%B8%E0%A4%B8-%E0%A4%86%E0%A4%AA%E0%A4%95-%E0%A4%A6-%E0%A4%86-%E0%A4%AE-%E0%A4%B2
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क्या यह विज्ञापन है?

पूरा लेख यहाँ पर क्लिक करके पढ़ें क्या यह विज्ञापन है?

दोस्तों, आज आपको एक हिंदी ब्लॉगर की कथनी और करनी के बारें में बता रहा हूँ. यह श्रीमान जी हिंदी को बहुत महत्व देते हैं. इनके दो ब्लॉग आज ब्लॉग जगत में काफी अच्छी साख रखते हैं. अपनी पोस्टों में हिंदी का पक्ष लेते हुए भी नजर आते हैं. लेकिन मैंने पिछले दिनों हिंदी प्रेमियों की जानकारी के लिए इनके एक ब्लॉग पर निम्नलिखित टिप्पणी छोड़ दी. जिससे फेसबुक के कुछ सदस्य भी अपनी प्रोफाइल में हिंदी को महत्व दे सके, क्योंकि उपरोक्त ब्लॉगर भी फेसबुक के सदस्य है. मेरा ऐसा मानना है कि-कई बार हिंदी प्रेमियों का जानकारी के अभाव में या अन्य किसी प्रकार की समस्या के चलते मज़बूरी में हिंदी को इतना महत्व नहीं दें पाते हैं, क्योंकि मैं खुद भी काफी चीजों को जानकारी के अभाव में कई कार्य हिंदी में नहीं कर पाता था. लेकिन जैसे-जैसे जानकारी होती गई. तब हिंदी का प्रयोग करता गया और दूसरे लोगों भी जानकारी देता हूँ.जिससे वो भी जानकारी का फायदा उठाये. लेकिन कुछ व्यक्ति एक ऐसा "मुखौटा" पहनकर रखते हैं. जिनको पहचाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती हैं. आप आप स्वयं देखें कि-इन ऊँची साख रखने वाले ब्लॉगर के क्या विचार है उपरोक्त टिप्पणी पर. मैंने उनको जवाब भी दे दिया है. आप जवाब देकर मुझे मेरी गलतियों से भी अवगत करवाए. किसी ने कितना सही कहा कि-आज हिंदी की दुर्दशा खुद हिंदी के चाहने वालों के कारण ही है. मैं आपसे पूछता हूँ कि-क्या उपरोक्त टिप्पणी "विज्ञापन" के सभी मापदंड पूरे करती हैं. मुझे सिर्फ इतना पता है कि मेरे द्वारा दी गई उपरोक्त जानकारी से अनेकों फेसबुक के सदस्यों ने अपनी प्रोफाइल में अपना नाम हिंदी में लिख लिया है. अब इसको कोई "विज्ञापन' कहे या स्वयं का प्रचार कहे. बाकी आपकी टिप्पणियाँ मेरा मार्गदर्शन करेंगी.
नोट: मेरे विचार में एक "विज्ञापन" से विज्ञापनदाता को या किसी अन्य का हित होना चाहिए और जिस संदेश से सिर्फ देशहित होता हो. वो कभी विज्ञापन नहीं होता हैं. 
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'ब्लॉग प्रहरी' का रूख अब अंग्रेजी की ओर

आम तौर पर लोग यह शिकायत करते हैं कि सरकार हिंदी के प्रति उपेक्षा का भाव रखती है लेकिन जो लोग इस तरह की चिंताएं जताया करते हैं उनमें से अक्सर खुद हिंदी के प्रति उदासीन हैं। ऐसे लोगों की उदासीनता के चलते ही हिंदी की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट 'ब्लॉग प्रहरी' को अब अंग्रेजी की ओर रूख करना पड  रहा है।
समय समय पर कनिष्क कश्यप जी से हमारी बातें होती रही हैं और उनकी मेहनत और लगन देखकर हमेशा ही एक अहसास हुआ कि आखिर लोग एक रचनात्मक काम में भी उनका साथ क्यों नहीं दे रहे हैं ?
क्या सिर्फ इसलिए कि वे किसी गुट का हिस्सा नहीं हैं ?
इस गुटबंदी ने हिंदी ब्लॉगिंग का बेड़ा गर्क करके रख दिया है।
हरेक सकारात्मक काम इस गुटबंदी की भेंट चढ  गया है लेकिन ये गुटबाज  अपनी हरकतों से बाज नहीं आते और दुख की बात यह है कि ये बड़े  ब्लॉगर भी कहलाते हैं।
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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    14 years ago

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