सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कहना ग़लत है samradayik danga

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  • Saturday, October 26, 2013
  • by
  • DR. ANWER JAMAL
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  • मनुष्य सुख और सफलता चाहता है। यह उसके अंदर की एक नेचुरल डिमांड है। इस डिमांड को पूरा करने का एकमात्र मार्ग यह है कि वह अनुशासन के साथ अपनी योग्यता और अपनी क्षमता के अनुसार अपने कर्तव्य को पूरा करे। इसी का नाम धर्म है। धर्म से ही कल्याण है।
    धर्म एक है लेकिन एक धर्म के हरेक भाषा में अलग अलग नाम हैं। मनुष्य के लिए धर्म का निर्धारण वही कर सकता है जिसने उसे पैदा किया है और धर्म का निर्धारण उसी ने किया भी है। मनुष्य ने अपने रचयिता को कभी भुलाया नहीं है। उसने उसे हर ज़माने में और हरेक भाषा में बहुत से सुंदर नामों के साथ हमेशा याद रखा है।
    धर्म के पालन का मतलब केवल पूजा-पाठ या तीर्थ पर घूमना मात्र ही नहीं है। धर्म का मतलब यह भी नहीं है कि कष्ट के समय अपने पालनहार से प्रार्थना कर ली जाए। धर्म के पालन का मतलब है जीवन के हरेक पहलू में अपने क्रिएटर की गाइडेंस में चलना। परिवार, समाज, बिज़नेस से लेकर राजनीति तक हरेक पहलू में सही और संतुलित रहने के लिए उस पालनहार के दिव्य मार्गदर्शन में चलना ज़रूरी है। जब तक मनुष्य ऐसा करता रहता है। तब तक वह भटकता नहीं है और न ही वह किसी दुराचारी शैतान को अपना गुरू या नेता मानता है। इसके लिए मनुष्य को सजग रहना पड़ता है, जागरूक रहना पड़ता है। जागरण की हक़ीक़त यही है। रातों को जागने का मक़सद एकान्त में चिंतन करना है। समूह के साथ रात को जागने का मक़सद अपनी नॉलिज को शेयर करना है। आज धर्म जितने नामों से जाना जाता है, उन सबमें ईश्वर की आज्ञा मानने और रात को जागने का ज़िक्र ज़रूर मिलेगा। यह धर्म का मूल लक्षण है। धर्म का पालन करने वाले परोपकारियों में यह मूल लक्षण ज़रूर मिलेगा।
    आदरणीय विश्वामित्र जी के दिल में गायत्री मंत्र का स्फुरण हुआ तो उसके पीछे यह मूल लक्षण आपको मिलेगा। विश्वामित्र पृथ्वी की नाभि पर बने तीर्थराज आदि पुष्कर तीर्थ की पवित्र भूमि पर ब्रह्मा जी के निर्देशन में भूः भुवः और स्वः अर्थात भूमि, अंतरिक्ष और स्वर्ग में चिंतन कर रहे थे। चिंतन करने के लिए रात की तन्हाई सबसे अच्छी होती है, ख़ासकर आख़री तिहाई रात। इसमें शोर मचाने वाले लोगों की भीड़ सोई पड़ी होती है और ज़िन्दगी की हक़ीक़त का राज़ जानने वाले जाग रहे होते हैं। इसी पहर में ब्रह्म मुहूर्त आता है। हज़ारों बरस की इबादत के बाद भी जो फल न मिले, इसमें कभी कभी उससे बड़ा फल देने वाला ज्ञान मिल जाता है। वह ज्ञान विश्वामित्र को मिला भी है और फिर वह ज्ञान उनसे चलते हुए हम तक आया है। उस ज्ञान को आज भी वही समझते हैं जो रातों को जागकर चिंतन करते हैं। जो लोग ऐसा नहीं करते। उनकी बुद्धियां सोई पड़ी रहती हैं। उन्हें कोई जगाए तो उन्हें बुरा लगता है। कोई उनसे ज़्यादा आग्रह करे तो ये जगाने वाले से ही लड़ने लगते हैं, उसकी मज़ाक़ उड़ाते हैं। इससे भी आगे बढ़कर ये उसके धर्म और ईश्वर को भी बुरा कहने लगते हैं। जबकि उनका भी धर्म और ईश्वर वही होता है लेकिन वे जानते नहीं हैं।
    जगाने वाले जानते हैं कि जब ये जाग जाएंगे तो इनका व्यवहार नॉर्मल हो जाएगा। जागना धर्म है तो जगाना भी धर्म है। दया, धैर्य और अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना भी धर्म के लक्षण हैं। दूसरों को जगाने का काम वही करते हैं। जिनमें ये गुण होते हैं। दूसरों को जगाना भी ईश्वर की आज्ञा का पालन करना है। इसके पीछे सब इनसानों से प्यार की भावना काम करती है।
    सबको सुख मिले और सभी सफल हों। धार्मिक मनुष्य इस मक़सद के लिए काम करता है। नास्तिक, पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक लोग केवल अपने सुख और अपनी सफलता के लिए काम करते हैं। ये केवल अपने लिए सामाने ऐश जुटाते रहते हैं जबकि धार्मिक लोग अपना कमाया माल दूसरों की भलाई में लुटाते रहते हैं।
    नास्तिक तो अपने कर्मों से अलग पहचाने ही जाते हैं लेकिन पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक मनुष्यों को देखकर सोई हुई बुद्धियों वाले उन्हें धार्मिक व्यक्ति समझ लेते हैं।
    धार्मिक व्यक्तियों को पहचानने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि कौन अपने लिए जायज़ और नाजायज़ तरीक़ों से सामाने ऐश जुटा रहा है और कौन जायज़ तरीक़े से कमाया हुआ अपना माल दूसरों पर लुटा रहा है?

    इस तरह धार्मिक व्यक्ति का स्वरूप हमारे सामने एक ऐसे आदमी के रूप में सामने आता है धरती और आकाश में चिंतन करता है। इस चिंतन से उसे जो ज्ञान मिलता है, उसे वह बांटता है। जो कुछ उसने कमाया होता है, उस दुनियावी सामान को भी वह लोगों में बांटता है। ख़ुद जागता है और दूसरों को जगाता है। इस काम के बदले वह उनसे कोई मेहनताना नहीं मांगता। इस परोपकार के बदले में लोग उसका दिल दुखाते हैं या उसे जो भी नुक्सान पहुंचाते हैं, उस पर वह धैर्य से काम लेता है। दया, धैर्य, क्षमा, ज्ञान, दान और परोपकार जैसे गुण केवल धार्मिक व्यक्ति में ही मिलते हैं। ईश्वर की आज्ञा का पालन ऐसे लोग ही करते हैं।
    धार्मिक लोग कभी नकारात्मक चिंतन नहीं करते और न ही कोई ऐसा काम करते हैं जिससे निर्दोष लोग मारे जाएं। धार्मिक लोग कभी दंगा नहीं करते। दंगा सदैव पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक लोग करते हैं। सोई हुई बुद्धियों के लोग सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कह देते हैं। दंगा कभी धार्मिक नहीं होता। इसलिए धार्मिक लोग कभी दंगा नहीं करते।
    अतः सिद्ध होता है कि सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कहना ग़लत है।
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    1 comments:

    रविकर said...

    सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आदरणीय-

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