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खुदा

लोग मंदिर,
मस्जिद में मुझे ढूंढते
धर्म के ठेकेदारों से
पता मेरा पूंछते
निरंतर नए तरीकों से
मुझे खोजते
फिर भी मुझे पाते नहीं
मैं इंसान के दिल में रहता
ईमान और इंसानियत में
बसता
लालच से नफरत मुझे
सूरज बन
उजाला दिन में करता
रात को
चाँद बन कर निकलता
जो दिल से ढूंढता,
सिर्फ उसे मिलता
17-04-2011
696-120-04-11
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क्यों सोचते तुम हो अकेले

क्यों सोचते
तुम हो अकेले 
वो भी साथ तुम्हारे
जो नाम तुम्हारा
नफरत से लेते
दिन रात तुम्हें कोसते
चर्चे शहर में करते
चाहते नहीं तो क्या
निरंतर याद तो करते
जो भी  है दिल में
साफ़ साफ़ बताते 
बेहतर हैं उनसे
जो अपना तो कहते
दिल में जहर रखते 
भूले से याद ना करते
देख कर मुस्काराते
पीछे से मुंह चिडाते
इधर हाथ मिलाते
उधर खंजर मारते
24-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर4
497—167-03-11
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मेरी खुशी में शामिल हो जाओ,आज दिल की दीवाली है

मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
चिट्ठी उनकी आयी ,
आज बात मतवाली है
पैमाना सब्र का भर 
गया था
छलकने से पहले ही
याद उनको आयी है
बहुत ज़ख्म दिए उन्होंने
अब मलहम लगाने की 
ख्वाइश है 
बहुत रो लिए थे हम
अब आंसू पोंछने की बारी है
निरंतर इंतज़ार करते थे हम
अब मिलने की बारी है
मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
482—152-03-11
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उनकी किसी चीज़ को नहीं छेड़ता


वो अब
नहीं दुनिया में
फिर भी हैं पास मेरे
कमरे में जिस्म से नहीं
मगर अहसास से साथ मेरे
पर्दों से लेकर दीवारों में 
बसतीं 
बिस्तर की सलवटें,
तकिये पर कुछ बाल उनके
अब भी साथ मेरे
पहने अनपहने कपडे,
सौन्दर्य प्रसाधन
उन्हें मुझ से दूर ना 
होने देते
उनका चश्मा,पसंदीदा 

किताबें
अब भी उनकी चाहत 

दर्शाती
लगता कोई पसंद 

की पंक्ति
अब सुनाने वाली
चाबियों का झुमका,
बड़ा सा पर्स,सुन्दर 
चप्पलें
बाहर चलने का आमंत्रण 

देती
उनकी बातें कानों में 

गूंजती
हर चीज़ उनकी खुशबू से
महकती
कभी प्यार जताना
कभी प्यार से झिडकना
कहाँ भूलता
कमरे में रहना मुझे 

अच्छा लगता
हर तरफ उन्हें पाता
जिस्म से तो दूर हुयीं
रूह से दूर ना जाएँ
निरंतर कामना करता
जो चीज़ जैसी रख कर गयीं
 वैसे ही रहने देता
डरता हूँ, छेड़ने पर 
नाराज़ हो
कमरे से ना चले जाएँ
इस लिए उनकी
किसी चीज़ को नहीं
छेड़ता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
476—146-03-11
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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