जब तुम ही नहीं ज़माने से मुझे क्या ?


428—98-03-11

जब तुम ही नहीं ज़माने से मुझे क्या ?

किसी और के लिए वो जज्बात कहाँ ?

दिल टूट गया किसी को मतलब क्या ?

अश्क आँखों से बहते,अब रुकते कहाँ ?

खुदा के पास रहते हो,उस से मुझे क्या ?

ज़मीन पर लौट कर,अब आओगे कहाँ ?

निरंतर  ज़िन्दगी  यूँ  ही कटेगी क्या ?

रास्ता अब दूसरा मेरे पास बचा कहाँ ?
14—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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आहार को औषधि बनाइए और कमज़ोरी दूर भगाइए The power

हमारे वालिद साहब बताते हैं कि ज़ैतून का तेल 120 बीमारियों से शिफ़ा है । यह बात सही है। इसे आप भी आसानी से जान सकते हैं। अगर आप जवान और सेहतमंद मर्दों जैसी ताक़त पाना चाहते हैं तो आप ज़ैतून के तेल में अंडों का ऑमलेट बनाकर रोज़ाना खाएं । बहुत आसान प्रयोग है ।
मेरे ब्लॉग 'आर्य भोजन' पर भी आप
'भारतीय वैद्य और हकीमों के अचूक नुस्ख़े घोड़े जैसी ताक़त के लिए '
देखकर अपने वैवाहिक जीवन को सफल और सुखी बना सकते हैं । आपका लाइफ़ पार्टनर आपसे संतुष्ट रहेगा और आप जीवन का सच्चा आनंद ले सकेंगे।
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दिल को चुप करोगे कैसे, जो रोयेगा याद कर के हमको



तुम याद रखो ना रखो
लब्जों से कहो ना कहो

हकीकत कैसे मिटाओगे
वो लम्हे कैसे भुलाओगे

उन आँखों से कैसे बचोगे
जिन्होंने देखा साथ हमको

खतों को झुठलाओगे कैसे
जो  लिखे तुमने  हमको

वो तसवीरें कैसे बदलोगे
जो खिंचवाई साथ हमने

निरंतर
दिल को चुप करोगे कैसे
जो रोयेगा याद करके हमको

ख़्वाबों
में आने से रोकोगे कैसे
जिन्हें
देखने की आदत हमको

ख्यालों
को काबू में करोगे कैसे

परेशाँ तुम्हें
करेंगे,याद कर के हमको

13—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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शून्य में खुद को खोजती नारी


 अगर महिला आरक्षण विधेयक व घरेलु हिंसा निरोधक कानून के लागू होने से, नारी सशक्तिकरण का राग अलापने से या सड़क पर उतर कर अधिकारॊं का डंका ठोकने से नारी का उत्थान हो सकता तो शायद हमारे देश की नारी कब की बिना टिकट ही चांद पर पहूंच जाती ! अरे आप तो सोचने लगे कि मैं नारी विरोधी बात कर रहा हूं ! जी नहीं, आप बिल्कुल गलत है और मैं सोलह आने ठीक ! जरा सोचिए आप ने अपने अपने घरों मैं अपनि पत्नी, बहिन, बेटी को कितनी भागीदारी, आज़ादी व अधिकार दिए हैं ! कहीं ऐसा तो नहीं कि आप गलियों मैं नारी सम्मान की डींग मारते हो और अपने घर में पत्नी, बहिन, बेटी इन तीनों पर अपने मर्द होंने की धौंस ठोकते हो अगर वाकई आप अपने घरों में भी नारी का सम्मान कर पाते हो तो महिला आरक्षण विधेयक व घरेलु हिंसा निरोधक कानून की आवश्यकता ही नहीं न ही नारी को सड़क पर नारे ठोकने की जरूरत है !

वास्तव में पुरुष को ज़हनी तौर से नारी को उसका स्थान देना होगा और नारी को हाथ पसार कर नहीं बल्कि अपनी शक्ति को स्वयं पहचानना होगा ! इसके लिए शिक्षित होने के साथ नारी सचेतना की आवश्यकता है ! 
अब तो लेखक भी नारी की व्यथा लिखते लिखते थक गये हैं ! लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात ! कह्ना गलत न होगा कि हम नारी को सशक्त बनाने के नाम पर हमेशा उसे यही एहसास दिलाते हैं कि वह आज भी अबला है ! आधुनिकता के इस दॊर में भी हमरे देश की नारी अपने हिस्से का आसमां खोज रही है !

कानून कितने ही बना लिये जायें, पर लगाम मर्द आसानी से छोड्ने वाला नहीं ! ऐसा नहीं है कि आज की नारी को मौका नहीं मिल रहा ! देखना होगा की नारी को यह सब कुछ मिलने के बाद भी क्या वह अपने अधिकरों का प्रयोग करने में आज़ाद है ! स्थानीय निकायों में कितनी ही महिलायें चुनी जाती हैं ! पर वे या तो निष्क्रीय हैं या उनकी डोर पति या रिश्तेदारों के हाथ में ही रह्ती है ! आवश्यकता इस बात की है कि नारी सश्क्तिकरण के लिये चलाये जा रहे अभियान व कानून के परिणामों की समिक्षा हो ! 

मेरा ज़रा भी यह मतलब नहीं है कि हमारे देश की नारी किसी से पीछे है ! वास्तव में कलपना चावला का अन्तरिक्ष में जाना, सुष्मा स्वराज, शीला दिक्षित का संसद में गर्जना, किरन बेदी का दम खम, सानिया मिरज़ा की टेनिस में चुनॊती जॆसे कई उदहरण हैं जो यही सिद्ध करते हैं कि महिलाएं अपने बल बूते अपने आप को बुलंदियों पर स्थापित कर सक्ती है ! ये किसी आरक्ष्ण की मोह्ताज नहीं !

परन्तु हमारे नारी समाज का एक बहुत बडा वर्ग ऎसा है जो कोने में दुबक कर एक शून्य की जिन्दगी जी रहा है ! वह पुरूष प्रधान समाज की रूढिवादी सोच को या तो अपन भाग्य मान बॆठी है य पती की सेवा-पालन को अपना धर्म ! ज़ुल्म होने पर भी शिकायत नहीं करती ! इस नारी को इस शून्य से बाहर कॆसे लाया जाये ? यह एक यक्ष प्रश्न है !

नारी समाज से एक शिकायत जरूर रहेगी ! आज़ादी को नकारात्मक रुप दे कर नारी ने मर्यादायों का उल्लंघन किया है ! स्वतंत्रता की अंधी दॊड में अपने आत्मसम्मान व बॊधिक विकास को दरकिनार कर नारी व्यव्साय की वस्तु बनती जा रही है ! पारिवारिक जीवन में वह बंधना नहीं चाह्ती ! ममत्व से ज्यादा वह निजि ज़िन्दगी को अहमियत देती है ! क्ल्बों मे जा कर नशे में धुत हो कर बांहों मे बांहें डाल कर कामुक डांस करना आज़ादी है, तो शायद यह हमारा दुर्भागय है ! पुरूष की ऎसी नकल कर नारी ने पुरुष की घटिया मानसिकता को जवाब नहीं बल्कि मंजूरी दी है और वात्सल्य के बजाय पुरूष की कामुकता को हवा ही दी है ! ऎसे मे एक तनावग्रस्त समाज की कल्पना की जा सकती है, एक सभ्य समाज की नहीं ! 

नि:सन्देह आज के बदलते परिवेश में नारी "ताड्न की अधिकारी" नहीं ! य़ह भी आवश्यक नहीं कि वह "श्रद्धा" बन कर पुरूष के "निर्जन आंगन" में "पीयूष स्रोत सी" बहती रहे ! वास्तव में नारी को स्वयं को अंधयारे से बाहर लाना होगा ताकि वह किसी आरक्षण विधेयक या हिंसा निरोधक कानून की मोहताज न रहे ! अहम बात ये भी है कि पुरुष को भी नारी की आजादी को स्वीकारना होगा ! नहीं तो कानून बनते जायेंगे और जिसके "आंचल में दूध" है, उसकी "आंखों में पानी" ही रहेगा ! वास्तव में नारी को भी अपने हिस्से की धूप चाहिए, एक आसमां चाहिए जहां वह भी पुरुष की तरह स्वछःन्द विचारों की उडान भर सके !

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यह नफरत यह झगड़े यह फसादात आखिर कब तक चलेगे

यह नफरत यह झगड़े यह फसादात आखिर कब तक चलेगे इसका जवाब ना आपके पास हे ना मेरे पास , इसके पीछे क्या कारण हे और झगड़े फसादात नफरत क्यूँ फेल रही हे ना आप जानते हें ना में जानता हूँ लेकिन सक यही हे चाहे आप हो चाहे में हूँ कमोबेश कहीं ना कहीं इन सब के लियें ज़िम्मेदार हें और इस पर हमें आपको चिन्तन करना होगा गलती स्वीकार करना होगी नहीं तो बस यह सिलसिला यहं ही चलता रहेगा और मेरे भारत महान को महान बनाने का सपना यूँ ही चकनाचूर होता रहेगा . 
दोस्तों एक सप्ताह पूर्ण एक घटना मेरे सामने एक ऐसा सच बन कर सामने आया जिसकी चिंगारी से देश जल रहा हे ऐसा मेरा अनुमान हे चाहे आप हो चाहे में हूँ सभी इस चिंगारी के शिकार हें और इस चिंगारी से बनी आग में हाथ तापने के सपने लगाये बेठे हें भाइयों में एक सप्ताह से असमंजस में था के इस सच का आपके सामने खोलूं या नहीं क्योंकि सच तो सच होता हे और सच जब भी बोला जाता हे लिखा जाता हे एक बढ़ा तबका उसके खिलाफ हो जाता हे लोग बुरा मान जाते हें नाराज़ हो जाते हें और में जानता हूँ मेरे इस सच बोलने को  को कई लोग साहसिक कदम नहीं मानेगे इसे बेवकूफी या फिर साम्प्र्तदयिकता करार देंगे लेकिन मेरे दिल ने कहा के इस सच को दबाया तो थोड़ा एहसास भी लोगों को नहीं हो पायेगा और अगर में थोड़ा असास करवाने में भी लोगों को कामयाब हुआ नफरत के इस माहोल से एक परिवार को भी में बचा सका तो में समझूंगा के मेरा भारतीय होने का फर्ज़ मेने पूरा कर दिया हे . 
दोस्तों इस लफ्फाजी के बाद अब में आपको इस सच से अवगत कराने जा रहा हूँ में पहले भी कह चुका हूँ भोर समाज के लोगों के साथ हम पिछले दिनों गुजरात के सुरत गये थे वहां एक नजारा ऐसा देखा जिसने मेरी सोच ही बदल दी  सभी साथियों को  पता था के शहर काजी अनवर अहमद भी जा रहे हें और यह जानकारी एक मोलाना अलाउद्दीन साहब को भी थी वोह भी हमारे साथ जाने वाले थे पिछले दिनों कुछ  लोगों ने खुद को सो कोल्ड काजी घोषित किया फिर जनता ने जब उन लोगों को सबक सिखाया तो फिर चंदे बाज़ी ,तन्त्र मन्त्र विद्या , कुरान की आयतों की सोदेबाज़ी  मजहब को रोज़गार बनाने का सिलसिला कुछ लोगों ने बना लिया यहाँ तक के कुछ मोलाना अपनी मोलाना गिरी छोड़ कर सरकारी मदद और पद लोलुपता में सरकार और सरकार के मंत्रियों के तलवे चाटने लगे कोटा के शहर काजी एक मात्र दुनिवावी शिक्षा के साथ साथ इस्लाम के ज्ञाता हे उनका कोटा में ही नहीं राजस्थान में ही नही पुरे देश में एक  अपना मुकाम हे बस इसीलियें कुछ मोलानाओं ने सुन्नी जमती और ना जाने क्या क्या के सो कोल्ड जमातें बना ली और काजी साहब के खिलाफ साजिशें शुरू की जो लगातार नाकाम हो रही हे तो जनाब इन काजी साहब के साथ कथित खिलाफ गुट के मोलाना अलाउद्दीन जाने के लियें घर से स्टेशन प्लेटफोर्म तक आ गये ट्रेन के आने का वक्त था के किसी ने इन जनाब मोलाना अलाउद्दीन साहब को फोन किया डांट पिलाई और शहर काजी के साथ जाने से इंकार किया बस फिर क्या था मोलाना अलाउद्दीन साहब रेलवे प्लेटफोर्म से बेग उठा कर सरपट भागे और ओटो में बेठ कर रवाना हो गये उनका आने जाने का टिकिट बेकार गया तो जान एक नफरत एक ही समाज एक ही धर्म के लोगों को कितना जुदा कितना अलग कर देती हे और यह हर जाती हर समाज हर धर्म में लगातार हो रहा हे उंच नीच का पाठ हो, धर्म का विवाद हो  य्हना तक तो ठीक हे लेकिन पीडियों में इस जहर को घोलने के लियें हम सब बराबर के हिस्सेदार हे आपके माता पिता हों चाहे  मेरे माता पिता हो बुज़ुर्ग हों सभी ने कभी हिन्दू मुसलमानों को साथ रहने का पाठ अपने बच्चों को नहीं पढाया सामने दिखावे के तोर पर यह चाहे कितने ही धर्म निरपेक्ष बनते हो लेकिन अन्दर कहीं ना कहीं अपने बच्चों को अपने धर्म की सिख के साथ साथ दुसरे के धर्म के खिलाफ नेगेटिव सिख देते रहे हें और यही नफरत का कारण रहा हे इतिहास के किस्सों को तोड़ मरोड़ कर सुनाना भविष्य में बदला लेने का अभाव एक दुसरे के दिल में पैदा करना इस बढती हुई पीडी के दिमाग में भरा जाता हे वोह तो शुक्र हे आज के माहोल की जो बहुत कुछ इस शिक्षा का असर समाज पर नहीं पढ़ रहा हे . 
अभी हम सुरत यात्रा पर गये बोहरे समाज का प्यार स्वागत के तोर तरीके देख कर मुझे बचपन के हमारे बुजुर्गों द्वारा सुनाया गया एक किस्सा याद आ गया जिसे मेने तो कमसेकम अपने बच्चों को नहीं सुनाया और कुछ ने सुनाने का प्रयास भी किया तो मेने टोक दिया हमें बचपन में बोहरा समाज के लियें कहा गया के इनके घर की तरफ भूले से भी मत जाता इनकी किसी भी मीठी बैटन में ना आना हम से कहा गया के यह लोग बच्चों को उठा कर ले जाते हें चांवल बनाते हें और फिर उन चावलों पर बच्चे को लटका क्र चाकुओं से गोद गोद कर खून के फव्वारे निकालते हें और जब चांवल खून से लाल हो जाते हें और बच्चे की मोट हो जाती हे तो उसका मॉस यह बोहरे लोग खा जाते हें यह किस्से बुजुर्गों ने सुनाये थे लेकिन सब जानते हें इसमें कोई सच्चाई नहीं थी बस पीडी ने सुनाया इस लियें इस पीडी को भी सूना दिया और इसके खिलाफ व्यवहारिक तोर पर जब हमने बोरे समाज के अखलाक जीवनशेली तोर तरीकों को देखा तो हमें उस झूंठ और हंसी आ गयी जिससे हमें अनावश्यक ही बोहरो से दूर रखा गया . 
ऐसा ही सच यह भी हे के दुसरे समाजों के खिलाफ भी बुज़ुर्ग लोग काल्पनिक कहानिया सुनते हें और फिर उनका खाली दिमाग उसे ही सच समझने लगता हे और नफरत की इस बुनियाद पर जिसका आधार झूंठ और सिर्फ झूंठ हम भारत को महान बनाना चाहते हें कई किस्से हे जहां एक भाई से भी ज़्यादा हिन्दू की मदद मुसलमान ने और एक मुसलमान की मदद हिन्दू भाई ने की हे बुजुर्गों द्वारा बहकाया जाता रहा हे के इस धर्म के लोग खतरनाक हे उस धर्म के लोग खतरनाक हे इतना तक चल रहा था लेकिन अब इस आग को राजनेतिक संगठनों ने हवा दी हे इस आग को कथित सो कोल्ड धार्मिक संगठनों ने हवा दी हे देश के अपनेपन को देश के प्यार को देश के अमन चेन को इस विचारधारा ने नफरत ,दर और खोफ में बदल दिया एक दुसरे के प्रति शंकाएं पैदा कर दी हें इतिहास चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन आज सच यही हे के मजहब की विचारधारा की दीवारें गिरा कर लोगों को अपने अपने घरों से एक दुसरे से गले मिलने बाहर निकलाना होगा और सभी भाइयों को देश का राष्ट्र का भारत का नवनिर्माण करना होगा आज चोर ,लुटेरे , बेईमान . हत्यारे सब ने अपना अलग धर्म बना लिया हे वोह अपना व्यापार या अपराध करते वक्त कभी यह  नहीं सोचते के यह हमारे धर्म का आदमी हे और हिन्दू हिन्दू को लुटता हे मरता हे और मुसलमान मुसलमान को लुटता हे मारता हे लेकिन फिर भी देश नहीं सुधरता हे तो दोस्तों इस सोच बदलने के लियें मेरा यह निवेदन हे के कमसे कम अब अपनी पीडी को तो वोह नफरत की पुरानी कहानिया सुनना बंद करें और नई कहानिया जो प्यार की हे भाईचारे की हें सद्भावना की हे अपनेपन की हे मदद की हे एक भारतीय की हे वोह सूना सुना कर बच्चों को बढ़ा किया जाए धर्म जिया जाता हे और इसके अपने नियम हे सभी धर्मों में एक बात कोमन हे इमादार रहो , मदद करो , भाईचारा भाव , भ्रस्ताचार मत फेलाओं ,गरीबों की मदद करो , समाज सेवा करों शांति स्थापित करों लेकिन यह सब क्या हम कर रहे हें अगर नहीं तो फिर हम कोनसे धर्म को मानने वाले हे खुद ही समझ लेना चाहिए तो आओ दोस्तों हम भी अपना काम करें जिसे मेरे इन सुझावों को दरकिनार करना हे इनसे नफरत कर देश को बांटने और देश में अराजकता फेलाने के लियें धर्म के नाम पर नफरत फेलाना हे वोह वेसा ही करे और जो लोग प्यार बाटना चाहते हें दिलों में प्यार और हिन्दुस्तान रखते हें वोह तो कमसेकम अपनी इस गलती को सुधारे और दुरे परिवारों में जहां अपनी चलती हो वहां भी इसकी हिदायत करें क्योंकि बच्चे मन के सच्चे होते हे और वोह उनसे कहा जाता हे उसे ही दिल दिमाग में सच मानकर जीते हें तो जनाब पक्का हे ना ,वायदा करो के आज से ही नहीं अभी से नफरत की,अफवाहों की ,झूंठ  फरेब की बेईमानी औरभ्रष्टाचार को छोड़ कर अपनेपन का पाठ शुरू करेंगे ताकि मेरे इस देश का मेरे इस भारत का नव निर्माण हो सके और मेरा भारत महान हो सके ............................................ अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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विश्व कप अभियान को झटका ----- दिलबाग विर्क

भारतीय टीम बेशक क्वार्टर फाइनल में पहुंच चुकी है लेकिन मजबूत टीमों से उसने दो मैच खेले हैं और एक भी नहीं जीता है . एक में उसे हार का सामना करना पड़ा तो दूसरा टाई रहा . द.अफ्रीका से हार बेहद निराशजनक है . अच्छी शुरुआत के बाद जिस तरीके से पारी सिमटी उस पर विचार करना ही होगा . पावर प्ले लेना गलत नहीं था क्योंकि सचिन-गंभीर अच्छा खेल रहे थे लेकिन विकेट गिरने के बाद नए बल्लेबाजों ने आते ही धूम-धडाका करना चाहा जो नहीं हो पाया , वो गलत था .आप कितने भी बड़े बल्लेबाज़ क्यों न हों बड़ी हिट लगाने के लिए पिच पर कुछ समय बिताना जरूरी होता है , इस बात को सभी खिलाडियों को समझना होगा .
         गेंदबाज़ी में द.अफ्रीका के खिलाफ भारत के पास श्रेष्ट आक्रमण था लेकिन वो तीन सौ  के लगभग स्कोर का भी बचाव नहीं कर पाए . आखिर मैच जीतने के लिए कितना बड़ा स्कोर सुरक्षित होगा ? बल्लेबाज़ हर बार चार सौ का स्कोर नहीं बना सकते , इस बात को ध्यान में रखना ही होगा . उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी लेनी ही होगी .
         भारत का अगला मैच वेस्ट इंडीज से है . यह मैच भी आसन नहीं होगा . गेंदबाजों को लय में आने का     अंतिम अवसर होगा . इस मैच में अश्विन को भी आजमा लिया जाना चाहिए , हो सकता है उसके आने से कोई परिवर्तन हो जाए . अगर गेंदबाज़ी इस मैच में भी पटरी  पर न लौटी तो विश्व कप जीतने का सपना सपना ही रह जाएगा . हालाँकि बल्लेबाजों को भी सबक लेने की जरूरत है लेकिन गेंदबाज़ी इस समय सबसे ज्यादा चिंता का विषय है . कमजोर गेंदबाज़ी ही उन पर बहुत बड़ा स्कोर बनाने का दवाब डालती है और परिणाम वही होता है जो द.अफ्रीका के खिलाफ हुआ . द.अफ्रीका के खिलाफ बल्लेबाज़ 370 का स्कोर मानकर चले होंगे इसी से गडबड पैदा हुई . इस गलती को दोबारा दोहराने से बचना होगा . अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा . असली विश्व कप शुरू होने से पहले उन्हें एक मैच और खेलना है . देखना है टीम इण्डिया इस हार से क्या सबक सीखती है . 
                    
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             ----- dilbagvirk.blogspot.com   
             
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सापों की संख्या दिन रात बढ़ती रहती,स्रष्टि अनवरत चलती रहती



किताब पढ़ रहा था
चिड़िया के जोर से
चहचाहाने की आवाज़ ने
ध्यान बरामदे के कोने की ओर
आकर्षित किया
उठ कर देखा कोने में
बिजली के मीटर के पास
चिड़िया घोंसले में
सहमी हुयी बैठी थी
मुझे देख चुप हुयी
कातर दृष्टी से देखने लगी
सामने दीवार एक सांप
चिड़िया को निवाला
बनाने की तैयारी में जुटा,
लपलपाती दृष्टी गढ़ाए बैठा था
मैंने कोने में पडी लकड़ी उठायी
सांप को भगाया 
तभी एक मित्र का आना हुआ
वहाँ खड़े होने का कारण पूंछा
सारा वाकया उसे बताया
वो हंस कर कहने लगा
निरंतर कई सांप दुनिया में घूमते
अबलाओं पर गिद्ध सी दृष्टी रखते
कब निवाला बनाए मौक़ा ढूंढते
कितनी अबलाएँ इन सापों के
चुंगुल में फंसती,छटपटाती,चिल्लाती
किसी को उनकी आवाज़ सुनायी नहीं देती
कुछ अस्मत खोती
कुछ जान से हाथ धोती
चिडया सी भाग्यशाली बहुत कम होती
फिर भी किसी कान पर जूँ
नहीं रेंगती
जनता मूक दृष्टी से देखती रहती
सरकार सोती रहती
सापों की संख्या दिन रात बढ़ती रहती
स्रष्टि अनवरत चलती रहती
13—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर


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ब्लॉग सजावट की प्रतिभा हे शाहनवाज़

जो अहम छोड़ कर  मधुरता के सुवचन बोलता हे वाही विश्व विजेता होता हे और यही विचारधारा लिए भाई शाहनवाज़ सिद्दीकी अपना जीवन जी रहे हे इसी अपने पण की विचारधारा लियें वोह इस ब्लोगिंग की दुनिया मने आये और आज सभी के खास बन गये .
शाहनवाज़ सिद्दीकी देहली में पाले बढ़े हरिद्वार की हवा खाई और फिर दिल्ली में पत्रकारिता की दुनिया में तहलका मचाने के बाद सजावट की कला ने इन्हें आज विज्ञापन की दुनिया में बहतरीन सजावटी विज्ञापन तय्यार कर जनता के सामने परोसने वाला प्रमुख कलाकार बना दिया , शाहनवाज़ सिद्दीकी के मन में पत्रकार जिंदा हे वोह एक कलाकार के साथ साथ जिंदगी और जिंदगी की घटनाओं को अपने हिसाब से देखते हे सोचते हें समझते हें और इन अनुभवों को कलम के माद्यम से अपनों के साथ बांटना चाहते हें और इसीलियें  वर्ष २०१० में वोह ब्लोगिंग की दुनिया में आये उन्होंने अपने नाना से यह प्रेरणा ली और वोह आज दिल्ली की विज्ञापन दनिया में डिजायनर के रूप में अपने झंडे गाड़े हुए हें शाहनवाज़ के अप तक ६९ प्रशंसक बन गये हें और इनकी कला और लगन के कारण ही शाहनवाज़ आज ब्लोग्वानी के पेनल में हें वोह बात और हे के कुछ मामलों में वोह अपने परायों का दर्द नहीं समझ पाए हे और इससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हे लेकिन उनका मकसद शायद ब्लोग्वानी की गाइड लाइन के बन्धनों में बंध कर काम करना रहा हो .
शाहनवाज़ सिद्दीकी कहते हें के अहम छोड़े और मधुरता के सुवचन बोलेन खुद बा खुद दुशम भी दोस्त हो जायेंगे और वोह काफी हद तक कामयाब ही हुए हे उनकी  सोच हे के इंसान जो कोशिश करे तो जिंदगी में बहार हे , जीत में भी हार हे सही कहा अगर इंसानियत से हट कर जीत भी जाओ तो ऐसी जीत किसी काम की नही रहती हे और हार से भी बदतर हो जाती हे शाहनवाज़ भाई ने अपनी इसी विचारधारा को जन जन तक पहुँचने के लियें अपना ब्लॉग छोटी बात,प्रेमरस,मधुर सन्देश , प्रेमरस शुरू किये और एक ब्लॉग शाह की कलम भी बनाया लेकिन वोह बिना पोस्ट के अभी सहज कर रखा हे इसलियें उसमें फोलोवार्स में सिर्फ मेने अपना नाम इस उम्मीद में पहले नम्बर पर दर्ज कराया हे के उसकी पहली पोस्ट मुझे ही पढने को मिले तो ऐसे हें हमारे शाहनवाज़ भाई जो प्यार बाटना चाहते हें प्यार से रहना चाहते हें उनका मानना हे इंसान जो कोशिश करे तो जिंदगी में बहार हे और इसी आशावाद के साथ ब्लोगिंग की इस दुनिया को शाहनवाज़ भाई से सभी को उम्मीदें हें और वोह कुच्छ कड़े फ़सलों पर पुनर्विचार करें ऐसी उम्मीद भी उनसे हे . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान सहयोग और मार्ग दर्शन जनाब एस एस मासूम साहब
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आधुनिक पाठशाला जहां इंसान तय्यार होते हें

गुजरात में सुरत एक व्यापारिक शहर जहां पुराने सूरत  में बोहरा समाज के आदरणीय गुरु डोक्टर सय्यदना बुरहानुद्दीन साहब ने एक ऐसा मदरसा महाद अल ज़ाहरा तय्यार करवाया हे जहां बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ साथ मानवता का पाठ अनुशासीत तरीके से पढाया जाता हे . 
सूरत में पिछले एपिसोड में मेने लिखा था के कोटा के बोहरा समाज के प्रमुख जनाब अब्बास भाई, सफदर भाई , मंसूर भाई, अकबर भाई अब्बास अली के साथ में अख्तर खान अकेला , लियाकत अली ,शहर काजी अनवार अहमद , नायब काजी जुबेर भाई , खलील इंजिनीयर , शेख वकील मोहम्मद और समाज सेवक प्रमुख रक्त दाता जनाब जाकिर अहमद रिज़वी गुजरात में सूरत स्थित एक आधुनिक मदरसे के तोर तरीकों का अध्ययन करने गये और इस दोरान हम बस  इसी मदरसे के होकर रह गये , पहेल एपिसोड में मेने कुरान हिफ्ज़ की आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित पाठशाला का विवरण दिया था हम इस जन्नत के नजारे से बाहर निकल कर दुनियावी शिक्षा केंद्र में गये जहां घुसते ही आधुनिक साज सज्जा और सुख सुविधाओं युक्त इस मदरसे को देख कर खुद बा खुद मुंह से निकल पढ़ा के अगर मदरसा ऐसा होता हे तो फिर विश्व यूनिवर्सिटी केसी होगी , हमें सबसे पहले दुनियावी शिक्षा के इस मकतब के गेस्ट रूम में बताया गया इस गेस्ट रूम की सजावट रख रखाव देखते बनता था फिर वहां मदरसे के प्रभारी प्रोफ़ेसर ने सभी आगंतुकों का शुक्रिया अदा किया थोड़ा सुस्ताने के बाद हम सभी को जन सम्पर्क अधिकारी के साथ मदरसे की इस आधुनिकता का नजारा देखने के लियें भेजा गया बढ़ी बढ़ी आलिशान किलासें , बच्चों को पढाने के लियें आधुनिक हाईटेक तकनीक कम्प्यूटर ,लेबटोब, कमरे , बढ़े स्क्रीन , सुविधायुक्त प्रयोगशालाएं , बच्चों के कार्यों की नुमाइश के लियें प्रदर्शन केंद्र , चार मंजिला लाइब्रेरी किताबों पर सेंसर क्गाये गये हें ताके कम्प्यूटर पर लगते ही किताब का नाम चढ़ जाएगा खुबसुरत लाइब्रेरी होल में इंग्लिश और अरबी की सभी महत्वपूर्ण पुस्तकें आर्ट,कोमर्स .विज्ञानं सहित सभी विषयों का यहाँ प्रमुख अध्ययन केंद्र बनाया गया हे तकनीकी शिक्षा सहित नेतिक और फिजिकल शिक्षा भी यहाँ देने का प्रावधान रखा गया मदरसे में मस्जिद हे जहां सभी एक साथ नमाज़ अदा करते हें जबकि पास में ही डाइनिंग होल हे जहां एक वक्त पर सभी छात्र बैठकर एक साथ बढ़े ख्वान लगा कर मनचाहा बहतरीन खाना खाते हें खाने की रसोई में सभी आधुनिक उपकरण लगे हें खाना सर्व करने के लियें ट्रोलियाँ और दूसरी व्यवस्थाएं हें , मदरसे में एक परीक्षा होल हे जहां परीक्षार्थी की परीक्षा कभी खुद सय्यादना साहब लेते हें उन्हें हिम्मत दिलाते हें इस होल में खाना इ काबा का गिलाफ का एक चोकोर टुकडा फ्रेम कर अदब से लगाया गया हे जो सय्यादना साहब को भेंट में दिया गया था पास ही एक खुबसुरत पत्थर सजाकर क्ल्गाया गया हे यह पत्थर हुसेन अलेह अस्सलाम के मजार का पाक पत्थर बताया गया हे जिसका लोग बोसा लेकर इज्जत बख्शते हें इसी होल में फोटो प्रदर्शनी हे और बहुमंजिली इस इमारत में ८५० बच्चों में ३५० के लगभग छात्राए और बाक़ी छात्र हें जिनमे १५० से भी अधिक विदेशी हे मदरसे में पढने वालों को १२ वर्ष के इस सफर में केसे पढ़ें पढाई का उपयोग केसे करें क्या अच्छा हे क्या बुरा हे बढ़े छोटे का अदब किया होता हे खेल कूद , खाना प्रबन्धन ,जनरल नोलेज क्या होती हे कुल मिलाकर एक अच्छे इंसान की सभी खुबिया इन बाराह साल में हर बच्चे में कूट कूट कर भर दी जाती हे इन १२ साल में  हर बच्चे को दुनिया की हकीकत समझ में आ जाती हे और वोह नोकरी नहीं करने के संकल्प के साथ या तो समाज के इदारों में लग जाता हे या फिर व्यवसाय में लग जाता हे . इस मदरसे में छात्राओं के लियें बेठने पढने रहने की अलग व्यवस्था हें यहाँ उन्हें पर्देदारी और शर्मसारी के सारे आदाब सिखाये जाते हें इन छात्राओं को होम साइंस के नाम पर खाने के सभी व्यंजन बनाना सिखाये जाते हें , इंसानियत की इस पाठशाला में सभी काम बच्चों से करवाया जाता हे उन्हें होस्टल में रहने के लियें नाम नहीं नम्बर दिया आजाता हे और इसी नम्बर से उन्हें पुकारा जाता हे यहाँ स्वीमिंग पुल, कसरत के लियें जिम, खेलकूद के लियें इनडोर आउट डोर खेल के मैदान हें बच्चों को फ़िज़ूल खर्ची से रोकने के लियें एक माह में २०० रूपये से अतिरिक्त खर्च करने की अनुमति नहीं हे इन बच्चों को मदरसे में एक वर्ष पलंग पर एक वर्ष फर्श पर सुलाया जाता हे प्रेस खुद को करना सिखाते हें नाश्ता लडके खुद बनाते हें ताके वोह थोडा बहुत ओपचारिक नाश्ता बनाना सिख लें होस्टल में लाइब्रेरी , स्टडी रूम , डिस्पेंसरी बनी हे जहां अपने सुविधानुसार बच्चे अपना काम करते हें . 
मदरसे में हमें जब इस आलिशान बहुमंजिली इमारत में घुमाया जा रहा था तो हमारे दिमाग में इस सात सितारा व्यवस्था के आगे सब फीके नजर आ रहे थे हमें वहीं बोहरा समाज के अंदाज़ में विभिन्न व्यंजन खिलाये गये मस्जिद में सबने अपनी अपनी नमाज़ अदा की , मदरसे में एक ऑडिटोरियम जो अति आधुनिक स्टाइल में बना हे इस ऑडिटोरियम में पार्टिशन लगे हें जो इसे क्लासों में तब्दील कर देते हें और जब आवश्यकता होती हे तो रिमोट और चकरी चाबी से पार्टीशन पल भर में गायब  कर इस क्लास रूम को एक विशाल ऑडिटोरियम का रूप दे दिया जाता हे , इस मदरसे में ८५० बच्चों को पढ़ने और रख रखाव के लियें १७० लोगों का स्टाफ हे और एक वर्ष में यहाँ ८ से १० करोड़ का बजट स्वीक्रत किया जाता हे .
बीएस जनाब इस मदरसे इस मकतब इस आधुनिक पाठशाला को देख कर यही कहा जा सकता हे के आओ एक ऐसा मदरसा बनाये हें जहां कमाई की मशीन नहीं केवल और केवल इंसान बनाये इस मदरसे को देख कर हमारी स्थिति यह थी के सबक ऐसा पढ़ा दिया तुने जिसे पढकर सब कुछ भुला दिया तूने,  अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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तेरा नाम लिखा हे

मेने 
हर जगह 
सिर्फ 
तेरा नाम 
लिखा हे 
फिर ऐसा क्या हुआ 
जो तुझे 
मेरे साथ 
तेरा नाम नहीं 
दिखा हे , 
तुझे बता दूँ 
एक बार तो 
मेने तेरा नाम 
रेत पर लिखा था 
जिसे आँधियों ने 
उढ़ा दिया ,
तेरा नाम 
फिर हवा पर लिखा 
जो तुझे 
ना जाने क्यूँ नहीं दिखा 
अब फिर मेने 
तेरा नाम 
पानी पर लिख दिया हे 
यह नाम भी 
तूने लहरों में 
बहा दिया हे 
अब बता 
तेरा नाम 
कहाँ लिखूं 
एक दिल हे 
यहाँ तो बस 
खुदा का नाम लिखा हे ........  . . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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इंसान फिर क्यों सब करता रहता,मर मर कर जीता रहता




दिन
बीत गया,रात आयी
लगा जैसे रोज़ के
झंझावत से मुक्ती मिल गयी
मगर रात अभी बाकी है
कल क्या करना
याद करना ज़रूरी है
फेहरिश्त
कल के कामों की
बन गयी
अब सोना भी ज़रूरी है
मगर नींद नहीं आ रही
कई बातें ख्यालों में आ रही
कब आँख लगी खबर
नहीं हुयी
सुबह आँख खुली
वो ही कहानी दोहरायी गयी
रोज़ की रेलम पेल
चालू हुयी
कुछ बातें ठीक हुयी,
कुछ ठीक ना हुयी
दिन भर ज़द्दोज़हद
चलती रही
निरंतर दिन ऐसे ही
कटता
सुबह शाम का पता
ना चलता
इंसान यूँ ही ज़िन्दगी
काटता रहता
सवाल मन में आता
इंसान फिर क्यों सब
करता रहता
मर मर कर जीता
रहता
13—03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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