अन्ना के बारे में सबसे हटकर एक चिंतन

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  • Tuesday, August 30, 2011
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • अन्ना ने 13 दिन तक अनशन किया। 13 के अंक को मनहूस माना जाता है और हमारे क़ाबिल नेताओं के लिए वाक़ई यह अंक मनहूस ही साबित हुआ। वे तो यह समझते थे कि एक बार माल ख़र्च करके इलेक्शन में खड़े हो जाओ, अब कोई न कोई तो ज़रूर ही जीतेगा। जनता में दम ही नहीं है कि वह सबको हरा सके। अब जब एक बार संसद में घुस गए तो चाहे आतंकवाद, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुददे पर बहस करने के लिए सदन में न भी पहुंचो तो कोई कुछ कहने वाला नहीं है और पहुंच जाओ तो वहां भी अध्यक्ष के आसन तक जा चढ़ो और कुर्सी उछालो या एक दूसरे पर माइक से हमला कर दो। सब चलता है।
    जब अन्ना ने हल्ला मचाया तो ये सब कहने लगे कि यह आदमी संसद की गरिमा से खेल रहा है। आप लोग जो वहां आपस में एक दूसरे के कपड़े फाड़ते हो भई, उससे संसद गौरवान्वित होती है क्या ?
    ख़ैर बड़ी तरकीब से सरकार और विपक्ष ने अन्ना का बोरिया बिस्तर लिपटवाया वर्ना तो संसद के हमाम में दोनों ही नंगे नज़र आने लगे थे।
    अब आगे क्या होगा ?
    सरकार भी यही सोच रही है और विपक्ष भी यही सोच रहा है और ख़ुद अन्ना भी यही सोच रहे हैं।
    अन्ना अमर होने का पूरा मूड बना चुके हैं।
    जनता के हित में काम करते हुए अगर दम निकल जाए जो जज़्बाती जनता ऐसे आदमी को अमर घोषित कर देती है और उसकी घोषणा के सामने सरकार भी कुछ नहीं कर पाती। मिसाल के तौर पर सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह को सरकार ने आज तक शहीद और अमर घोषित नहीं किया लेकिन जनता है कि उन्हें आज तक आतंकवादी मानने के लिए तैयार नहीं है जैसा कि अंग्रेज़ चाहते हैं।
    अंग्रेज़ हमेशा जनता से इसीलिए परेशान रहे कि एक तो यह अधिकार मांगती है और दूसरे कहना नहीं मानती।
    अंग्रेज़ों ने अपने देस में पढ़ाकर जिन लोगों को अपने पैटर्न पर हुकूमत चलाने की ट्रेनिंग दी थी , उन लोगों को भी जनता से यही शिकायतें हैं।
    जनता है ही नामाक़ूल, अपने चुने हुए प्रतिनिधियों की भी नहीं सुनती।
    और उससे भी ज़्यादा नामाक़ूल यह तब साबित होगी कि अगर अन्ना महाराष्ट्र छोड़कर किसी ऐसे प्रदेश से खड़े हो गए जहां उनकी भाषा और उनकी जाति के लोग न हों तो जनता इन्हें वोट ही न देगी।
    अब चुनाव आएंगे, जनता फिर उन्हीं को वोट देगी जो पूंजीपतियों से सैटिंग करके महंगाई को बढ़वाते रहते हैं और खाद्यान्न को बारिश में डालकर सड़वाते रहते हैं।
    इस समय सब एक दूसरे के लिए जान का अज़ाब बने हुए हैं। नेता जनता को तकलीफ़ें दे रहे हैं और जनता नेताओं की मुर्दाबाद के नारे लगा रही है और उनके पुतले जला रही है।
    ऐसा लगता है जैसे कि नरक ज़मीन पर ही उतर आया हो।
    फिर भी लोग हैं कि मानते ही नहीं कि स्वर्ग-नर्क होता है।
    ख़ुद को चेक कीजिए कि आप क्या पा रहे हैं ?
    सुख या दुख ?
    सुख और दुख की सप्लाई स्वर्ग-नर्क से ही होती है।
    जब सप्लाई है तो एजेंसी भी है और मरकर तो हरेक देख ही लेगा।
    अन्ना मरने के मूड में आ चुके हैं और ऐसे लोगों से हमारे चुने हुए प्रतिनिधि और हमारा प्रशासन, दोनों ही घबराते हैं।
    यह भी आत्मघात का ही एक प्रकार है।
    भारत भी अजीब देश है। यहां अहिंसा के ज़रिये जंग लड़ी जाती है और उसकी बुनियाद आत्मघात पर रखी जाती है।
    ख़ैर अगर आदमी मरने पर उतारू हो जाए तो फिर हरेक चीज़ उसके सामने झुक जाती है। अफ़ग़ानिस्तान के आत्मघाती हमलावरों के सामने तो अमेरिका भी घुटने टेक चुका है।
    अन्ना का प्रभाव तो उनसे कहीं ज़्यादा व्यापक है क्योंकि उनकी मरने की धमकी की शैली गांधी शैली है।
    लोग अफ़गान आत्मघातियों को बुरा कह सकते हैं लेकिन गांधी शैली को नहीं।
    भारत व्यक्ति पूजक लोगों का समूह है, यहां ऐसे ही होता है। वह करे तो ग़लत और हम करें तो महान।
    बहरहाल अब जब तक अन्ना जिएगा, उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि सरकार की गर्दन में गांधी शैली का फंदा टाइट ही रखे।
    उन्हें हमारा समर्थन इसी बात के लिए है।

    4 comments:

    शालिनी कौशिक said...

    भारत भी अजीब देश है। यहां अहिंसा के ज़रिये जंग लड़ी जाती है और उसकी बुनियाद आत्मघात पर रखी जाती है।
    सही कहा है आपने और देश के हितार्थ इन पर रोक लगनी ही चाहिए.

    रेखा said...

    अभी तो आगे बहुत कुछ होना है ....

    रेखा said...
    This comment has been removed by the author.
    डॉ. जेन्नी शबनम said...

    anna ka samarthan mahaz is baat ke liye ki bhrashtaachaar ka khaatma ho. paksh vipaksh aur tamaam janta bhrashtaachar se tabaah hai, fir bhi ye khatm na hokar badht ahin ja raha hai. ab anna ka andolan kis had tak pariwartan lata hai waqt batayega. achchha likha hai aapne. shubhkaamnaayen.

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