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कुछ लोग हर धर्म में गंदे होते

हर धर्म के उसूल
अच्छे होते
धर्म के नाम पर
हर धर्म में धंधे होते
कुछ लोग हर धर्म में
गंदे होते
धर्म के नाम पर
मतलब साधते
भोले भालों लोगों को
बरगलाते
निरंतर धर्म के नाम पर
सियासत करते
ऐसे लोगों को पहचानों
इनके जाल में ना फंसो   
खुद भी बचो
औरों को भी बचाओ
22-04-2011
731-153-04-11
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खुदा

लोग मंदिर,
मस्जिद में मुझे ढूंढते
धर्म के ठेकेदारों से
पता मेरा पूंछते
निरंतर नए तरीकों से
मुझे खोजते
फिर भी मुझे पाते नहीं
मैं इंसान के दिल में रहता
ईमान और इंसानियत में
बसता
लालच से नफरत मुझे
सूरज बन
उजाला दिन में करता
रात को
चाँद बन कर निकलता
जो दिल से ढूंढता,
सिर्फ उसे मिलता
17-04-2011
696-120-04-11
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महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है Indian Cricket Team

क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है World Cup 2011

क्रिकेट से खुन्नस रखने के पीछे मेरे निजी अनुभव हैं जो कि अच्छे नहीं हैं। जब मैं बच्चा था तो मुहल्ले भर के चाचा और तमाम तरह के दूर नज़्दीक के रिश्तेदार घर में क्रिकेट मैच देखने के लिए जमा हो जाया करते थे क्योंकि तब तक कम घरों में टी. वी. था। उनके घरों में पैसे की तंगी की वजह से टी. वी. नहीं था, ऐसी बात नहीं है। सभी लोग काफ़ी रिच हैं लेकिन तब तक घरों पर उन बड़े बूढ़ों का होल्ड था जो घर में टी. वी. आने की इजाज़त नहीं देते थे।
घर में जमावड़े से हमारे लिए कई तरह की दिक्क़तें खड़ी हो जाती थीं और घर का सारा दूध चाय बनाने में ही ख़र्च हो जाता था। हम सबको चाय सप्लाई करते रहते थे और बाज़ार से दूध और नाश्ते का सामान ही लाते रहते थे। ज़मींदार लोग थे, किसी को कोई काम अपने हाथ से करना नहीं था। नौकर खेतों पर काम करते रहते थे।
सबकी ऐश आ जाती थी और हमारी आफ़त। सबसे ज़्यादा दुख हमें अपनी वालिदा साहिबा को ढेर के ढेर कप धोते हुए देखकर होती थी। वालिद साहब के सामने कोई चूं भी नहीं कर सकता था। जिसने उन्हें न देखा हो वह सनम बेवफ़ा के डैनी या प्राण को देख ले। शलवार कमीज़ , सर पर पगड़ी और एक पठानी खंजर भी। अल्लाह का शुक्र है कि उस पर किसी का खून नहीं लगा। जिसका हमारे वालिद को आज तक मलाल है। कभी कभी सोचता हूं कि अगर सूरज इंसानी शक्ल में हमारे सामने आए तो उसे हमारे वालिद साहब का रूप रंग पूरी तरह मैच करेगा। चेहरा सुर्ख़ और आँखें अंगार, हर समय।
आम दिनों में जब वालिद साहब घर में होते थे तो हम इधर उधर टल जाया करते थे। क्रिकेट के दिनों में वालिद साहब की मौजूदगी का वक्त भी बढ़ जाता था और हम उनकी नज़र के सामने से हट भी नहीं सकते थे। चाय और पान की खि़दमत हमारे सुपुर्द जो हो जाया करती थी। इन सब बातों की वजह से हमें बचपन से ही क्रिकेट से नफ़रत हो गई थी। थोड़ा बड़े हुए तो पता चला कि कई बार इस क्रिकेट की वजह से देश में दंगे हो गए और बेवजह ही लोग मारे गए। इस खेल से हमारी नफ़रत में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया।
एम. ए. में पहुंचे तो हमें सोशियोलॉजी में बताया गया कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए शासक लोग जनता को खेल और मनोरंजन में लगा देते हैं। इससे उनका ध्यान जीवन के अहम मुद्दों से हट जाता है। यूनानी शासक यही करते थे।
हमने पाया कि जैसे-जैसे देश और दुनिया में समस्याओं का अंबार लगता जा रहा है, वैसे वैसे खेल और मनोरंजन के साधन भी जनता को ज़्यादा से ज़्यादा उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मीडिया ने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन खेलों में प्रतिवर्ष खरबों रूपया ख़र्च करती हैं और उससे कई गुना ज़्यादा कमाती भी हैं। देश का पैसा खिंचकर विदेश में जाता है। पहले से ही कंगाल जनता कुछ और बदहाल हो जाती है और फिर यह भी सामने आ गया कि सट्टा किंग पहले से ही यह तक तय कर देते हैं कि जीतना किसे है ?
बहुत बड़ा गोरखधंधा है यह कप और विश्व कप। जो इसे समझता है, वह न किसी की हार से दुखी होता है और न ही किसी की जीत से खुश। जो नादान हैं वे समझते हैं कि हाय ! हम हार गए या हुर्रे ! हम जीत गए।
अफ़सोस होता है यह देखकर कि देश के 22 नौजवान 8 मई 2010 से सोमालियाई लुटेरों की क़ैद में हैं। जाने उनमें से कौन अब ज़िंदा होगा ?
हम एक एटमी पॉवर हैं और हमसे डरते नहीं हैं समुद्री लुटेरे भी। हमारे आदमी उन्होंने पकड़ लिए। इस बात पर अफ़सोस करने के लिए जो देश एक न हो सका, जो ब्लॉग जगत एक न हो सका और कोई सशक्त आंदोलन न चला सका। वह हिप हिप हुर्रे हुर्रे करके कह रहा है अहा, हम जीत गए।
क्या सचमुच हम जीत गए ?
यह सच है कि हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया है । तमाम बातों के बावजूद इसे एक उपलब्धि भी माना जा सकता है लेकिन हरेक चीज़ अपनी उपयोगिता के कारण ही सार्थक या निरर्थक मानी जाती है। आखि़र देश की जनता के लिए इस कप का उपयोग क्या किया जा सकता है ?
जिन देशों की सिरे से ही कोई क्रिकेट टीम नहीं है, क्या वे बेकार देश हैं ?
जिस देश में आज भी लोग मलेरिया के हाथों लाखों की तादाद में मर जाते हैं। जहां करोड़ों माएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। जहां नशे के कारोबार को सरकारी आश्रय प्राप्त है और नशे की वजह से कितने ही रोड एक्सीडेंट रोज़ होते हैं या फिर कलह के कारण करोड़ों परिवारों का सुख चैन बर्बाद है सदा के लिए।
जहां गुरबत है और ऐसी गुरबत है कि मात्र एक रूपये में इस देश की औरत अपनी आबरू बेच रही है। मैं ऐसे फ़ौजियों से मिला हूं जिन्होंने यह सब खुद देखा है और उस इलाक़े का नाम मुझे बताया है। कश्मीर में भी मुझे यही पता चला। देश का कोई इलाक़ा शायद ऐसा न हो जहां ज़रूरतें इंसान की शर्म और ग़ैरत को न चाट रही हों। जहां ज़रूरतें और मजबूरियां नहीं हैं वहां भी यही सब हो रहा है। वहां वजह बन रही है दौलत की हवस। पति-पत्नी का रिश्ता एक पवित्र संबंध है लेकिन दौलत की हवस यहां भी पैर पसारे आपको मिल जाएगी और दहेज की इसी हवस में कहीं बहुएं जलाई जा रही हैं और कहीं लड़कियां या तो बेमेल ब्याही जा रही हैं या फिर कुंवारी ही बूढ़ी हो रही हैं या फिर गर्भ में ही मारी जा रही हैं। माएं आज बेसहारा हैं और विधवाएं तो हमेशा से हैं ही। जिन समस्याओं को हमें हल करना था, उन्हें हम हल नहीं कर पाए।
ग़रीबी और कुपोषण की वजह से बच्चे बचपन में ही या तो मर जाते हैं या फिर मज़दूरी करते हैं। किसान मज़दूर सूदख़ोर महाजन के ब्याज के फंदे में झूलकर आए दिन आत्महत्या करते हैं। कुछ बाबा और महात्मा ग़रीबों की सेवा पहले भी करते थे और आज भी करते हैं लेकिन इन्हीं का रूप बनाकर पहले भी ठग जनता को ठगते थे और आज भी ठग रहे हैं बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं। आशीर्वाद और योग को ये लोग कारोबार बना चुके हैं। भारत एक धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और आस्था इसकी पहचान है लेकिन आज देश की जनता के सामने केवल अधिक से अधिक सुविधा और ऐश बटोरना ही एक मात्र मक़सद है। कभी जनता हड़ताल करती है तो कभी वकील और कभी डाक्टर।
देश का क़ानून टूटता हो तो टूटे , कोई मरता हो तो मरे, इनकी बला से इनके अधिकार कम न हों, इनकी सैलरी बढ़ा दी जाए। ये बुद्धिहीन लोग बुद्धिजीवी कहलाते हैं, यह देश की त्रासदी है। बस केवल सांसद ही कभी हड़ताल नहीं करते। उन्हें जो कुछ सुविधाएं लेनी होती हैं, अपने लिए खुद ही मंजूर कर लेते हैं।
इस आंतरिक मज़बूत एकता के बावजूद ये नेता बाहर से खुद को बंटा हुआ दिखाते हैं ताकि जनता यह समझे कि यह वामपंथी है और वह दक्षिणपंथी, यह समाजवादी है और वह निर्दलीय। यह अमीरों का पिठ्ठू है और वह ग़रीबों का मसीहा है। ये गुट बनाकर आमने सामने डटे रहते हैं और जब भी कोई पार्टी जीतती है तो पब्लिक समझती है कि ‘अहा ! हम जीत गए।‘
लेकिन जब वह पार्टी काम काज संभालती है तो वह भी पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है जिससे जनता की केवल मुसीबतें बढ़ती हैं और उनसे ध्यान बंटाने के लिए उसके लिए खेल और मनोरंजन के साधन बढ़ा दिए जाते हैं।
आज चैराहों पर ढोल बज रहे हैं, पटाख़े छोड़े जा रहे हैं, मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हर तरफ़ एक जुनून है, एक खुशी की लहर छाई हुई है। राष्ट्रवादी लोग भी मगन हैं। जो सारा माजरा समझते हैं वे चुप हैं। वे जानते हैं कि दीवानेपन और जुनून की कैफ़ियत में उनकी सही बात सुनेगा ही कौन ?
लेकिन ऐसा नहीं है।
सुनने वाले लोग भी इन्हीं के दरम्यान हैं। सोचने-समझने वाले लोग भी इन्हीं के बीच मौजूद हैं। आप कहेंगे तो बात उन तक ज़रूर पहुँचेगी जिन्हें मार्ग और मंज़िल की तलाश है।
जिन खेलों से सीधे तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है या फिर हमारे पूंजीपतियों और निकम्मे हाकिमों को, उनका प्रभाव लाज़िमन हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही करता है।
समस्याओं से त्रस्त लोगों के बीच खड़े होकर कहना कि ‘हम जीत गए।‘
सिर्फ़ यह बताता है कि उन्हें देशवासियों की समस्याओं से वास्तव में कुछ लेना-देना ही नहीं है। उनके लिए तो बस मनोरंजन ही प्रधान है। हमारे हाकिम भी यही चाहते हैं कि हमें होश न रहे। हरेक गली-नुक्कड़ पर नित नए खुलते हुए शराब के ठेके इसी बात की पुष्टि करते हैं। जिस देश में कभी गंगा शुद्ध बहती थी। उसी देश में आज शराब की नदियां बहाई जाएंगी और यह सब होगा राष्ट्रवाद के नाम पर। जो चीज़ राष्ट्र को खोखला करती है उसका इस्तेमाल राष्ट्रवादियों में आम क्यों है ?
महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है।
जो देख सकते हैं, वे हालात को सही एंगल से देखने का कष्ट करें मुल्क की भलाई की ख़ातिर, ऐसी हमारी विनती है।
बचपन में तो हम अपने वालिद साहब के सामने कह नहीं सकते थे लेकिन आप लोगों से तो हम कह ही सकते हैं कि क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है।
हरेक सोचे कि इस धरती पर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है ?
इसके लिए वह अपने गुरूओं और ग्रंथों की सहायता ले और फिर देखे कि क्रिकेट के ज़रिए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है या कि उससे दूर होता जा रहा है ?
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कैसी यह मुहब्बत है और कैसा यह त्यौहार है ? Holi 2011

बच्चे ज़्यादा समझदार हैं बड़ों से, इस होली पर मुझे ऐसा ही लगा।
Dr. Anwer Jamal
Dr. Anwer Jamal
शनिवार को मुझे अपने पेट में दर्द महसूस हुआ। दवाई ले ली। रविवार को सोचा कि अल्ट्रासाउंड करा लिया जाए ताकि पित्ताशय की पत्थरी के साइज़ का भी पता चल जाए। होली की वजह से सभी सेंटर्स मुझे बंद मिले। लौटते हुए एक मशहूर चैराहे पर मुझे कुछ  बच्चों ने अपनी पिचकारी दिखाई, मैंने कहा, बेटे ! हरेक आदमी पर रंग नहीं डालते।
मेरे इतना कहते ही वे मान गए।
आज सुबह मैं अपने घर से निकल कर चंद क़दम ही गया था कि हमारे पड़ोसी पं. प्रेमनारायण शर्मा जी हाथ में रंग की बाल्टी और गुलाल लेकर मेरी तरफ़ बढ़े। मैं घबराया नहीं। मुझे उम्मीद थी कि मैं उन्हें बताऊंगा कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है, हल्का सा बुख़ार भी है और मैं अल्ट्रासाउंड कराने जा रहा हूं तो वह मान जाएंगे।
वह मेरे पास आए और मेरे मना करने के बाद भी और मुझसे मेरी परेशानी जानने के बावजूद भी उन्होंने मेरा मुंह गुलाल से हरा कर दिया और फिर जब उनका दिल इससे भी नहीं भरा तो उन्होंने दो मग भरकर रंगीन पानी डाल दिया।
Pandit Premnarayan Sharma
Pandit Premnarayan Sharma

उनकी इस हरकत से मुझे तकलीफ़ तो हुई लेकिन मैंने उन्हें बुरा भला इसलिए नहीं कहा क्योंकि अपनी तरफ़ से वे अपनी मुहब्बत का इज़्हार कर रहे थे
क्या मुहब्बत में अपने प्यारों की तकलीफ़ को भी नज़रअंदाज़ कर देना मुनासिब है ?
मैं घर लौटा और कपड़े बदले और दोबारा फिर घटिया से कपड़े पहने ताकि फिर से कोई अपनी मुहब्बत का इज़्हार करने वाला मिले कम से कम कपड़े तो बच जाएं।
कैसी यह मुहब्बत है और कैसा यह त्यौहार है ?
बच्चे फिर भी ग़नीमत हैं।
बड़े लोग अगर बच्चों की तरह हो जाएं तो काफ़ी दिक्क़तें दूर हो जाएं।
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