आजाद होके खूब बरसतीँ हैँ गोलियाँ ,
लोगोँ को मार मारके हंसतीँ हैँ गोलियाँ ।
निर्दोष जिंदगी के घरोँ को उझाड़ कर ,
बस्ति मेँ बिना खौफ के बसतीँ हैँ गोलियाँ ।
संवेदनाएँ भूनती बस से उतार कर ,
सच्चाई ढूढ़ ढूढ़ कर डँसतीँ हैँ गोलियाँ ।
भूखोँ तड़प तड़प कर कोई दम ना तोड़ना ,
मँहगाई के भी दौर मेँ सस्तीँ हैँ गोलियाँ ।