मानवता को इमाम हुसैन की बेमिसाल देन Imam Husain

सांप्रदायिकता आतंकवाद की जननी है। सत्ता पाने के इच्छुक तत्व लोगों का समर्थन पाने के लिए सांप्रदायिकता का सहारा लेते हैं। वे सांप्रदायिकता के घिनौने चेहरे पर राष्ट्रवाद और क़ौमियत का पर्दा डाल देते हैं। अब वे अपने विरोधियों को राष्ट्र-विरोधी कहते हैं और उन्हें मार डालते हैं। इस तरह जो आतंकवाद मानवता के प्रति बदतरीन जुर्म है, उसे राष्ट्र की सेवा के रूप में पेश किया जाता है।
आतंक फैलाने के लिए जन और धन की ज़रूरत होती है। पूंजीपतियों और ज़मींदारों की मदद से राजनेता उन्हें ये दोनों मुहैया कराते हैं। आतंकवाद राजनैतिक संरक्षण के बिना पल ही नहीं सकता। दुनिया में जितने भी आतंकवादी हुए हैं या आज हैं, वे किसी न किसी राजनैतिक शक्ति के द्वारा खड़े किए गए हैं। आतंकवाद का लाभ इन राजनेताओं को ही मिलता है और वे पूंजीपतियों और ज़मींदारों को भरपूर लाभ पहुंचाते हैं। आम जनता के हिस्से मे हमेशा सिर्फ़ नुक्सान आता है।
धर्म पर चलने वाले लोग सांप्रदायिकता (अरबी में असबियत) को ख़त्म करते हैं। सांप्रदायिकता पर चलने वाले ऐसे धार्मिक लोगों को अपने रास्ते की रूकावट मानते हैं और हटा देते हैं। सांप्रदायिकता का परवान चढ़ना धर्म का नष्ट होते चले जाना है। सांप्रदायिकता धर्म की दया, प्रेम और परोपकार की भावना का लोप करती है और वह जनमानस के रूझान और उनकी रूचि को बदल देती है।
इसकी एक मिसासल यज़ीद है। उसके सैनिकों ने हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु का क़त्ल कर दिया, उनके परिवार के दर्जनों लोगों को क़त्ल कर दिया। उनके बच्चों तक को क़त्ल कर दिया। उनके घर की जिन औरतों को सब मुसलमान माँ कहकर पुकारते थे। उन्हें क़ैद कर लिया। यह सब उसने हुकूमत के लिए किया और यह सब उसने लोगों के सामने किया और लोगों के सपोर्ट से किया। यह सब उसने अपने लोगों से ही करवाया। लोगों ने उसके लिए यह सब क़बीलाई असबियत (क़बीला आधारित सांप्रदायिकता) की बुनियाद पर किया। इमाम हुसैन रज़ि. के क़त्ल के बाद उनका सिर काट कर यज़ीद के दरबार में लाया गया। उस मुबारक सिर को देखकर यज़ीद ने जो कहा, वह उसकी असबियत (सांप्रदायिकता) साबित करने के लिए काफ़ी है-
‘...और क़त्ले हुसैन और उनके साथियों के क़त्ल के बाद उसने मुंह से निकाला कि मैंने (हुसैन वग़ैरह से) बदला ले लिया है जो उन्होंने मेरे बुज़ुर्गों और रईसों के साथ बदर में किया था।’
-शहीदे करबला और यज़ीद, पृष्ठ 109, लेखकः मौलाना क़ारी तैयब साहब रह., पूर्व मोहतमिम दारूल उलूम देवबन्द
The place where Husayn's head is kept, Umayyad Mosque, Damascus

यज़ीद के सामने धार्मिक शक्तियाँ कमज़ोर पड़ चुकी थीं। वे उससे मुक़ाबला नहीं कर सकती थीं लेकिन फिर भी उसके ज़ुल्म को ज़ुल्म कहने से वे न रूके। हज़रत ज़ैद बिन अरक़म एक ऐसे ही धार्मिक शख्स थे। वह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथियों में से थे। यज़ीद के वक़्त तक वह बूढ़े हो चुके थे। उन्होंने जो कहा, वह भी सांप्रदायिक शक्तियों के चाल, चरित्र और चेहरे को बेनक़ाब करता है-
‘तो ज़ैद (बिन अरक़म) रोने लगे तो इब्ने ज़ियाद ने कहा ख़ुदा तेरी आंखों को रोता हुआ ही रखे। ख़ुदा की क़सम अगर तू  बुड्ढा न होता जो सठिया गया हो और अक्ल तेरी मारी गई न होती तो मैं तेरी गर्दन उड़ा देता, तो ज़ैद बिन अरक़म खड़े हो गए और यहां से निकल गए, तो मैंने लोगों को यह कहते हुए सुना। वे कह रहे थे अल्लाह, ज़ैद बिन अरक़म ने एक ऐसा कलिमा कहा कि अगर इब्ने ज़ियाद उसे सुन लेता तो उन्हें ज़रूर क़त्ल कर देता। तो मैंने कहा, क्या कलिमा है जो ज़ैद बिन अरक़म ने फ़रमाया। तो कहा कि ज़ैद बिन अरक़म जब हम पर गुज़रे तो कह रहे थे कि ऐ अरब समाज! आज के बाद समझ लो कि तुम ग़ुलाम बन गए हो। तुमने फ़ातिमा के बेटे को क़त्ल कर दिया और सरदार बना लिया इब्ने मरजाना (इब्ने ज़ैद) को। जो तुम में के बेहतरीन लोगों को क़त्ल करेगा और बदतरीन लोगों को पनाह देगा।’
-शहीदे करबला और यज़ीद, पृष्ठ 101
हज़रत ज़ैद बिन अरक़म रज़ि. ने जो कहा था। वह हरफ़ ब हरफ़ सच साबित हुआ। इसी किताब के पृष्ठ 106 पर मशहूर अरबी किताब ‘अल-बदाया वन्-निहाया’ जिल्द 8 पृष्ठ 191 के हवाले से क़ारी तैयब साहब ने लिखा है कि जब इमाम हुसैन रज़ि. के क़त्ल पर इब्ने ज़ियाद ख़ुश हो रहा था। तब उसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन अफ़ीफ़ अज़दी ने टोक दिया। इब्ने ज़ियाद ने उसे वहीं फांसी दिलवा दी।
यज़ीद में एक सांप्रदायिक व्यक्ति के सभी लक्षण पूरी तरह से देखे जा सकते हैं। वह एक नमूना है। यज़ीद मर गया लेकिन सांप्रदायिक प्रवृत्ति नहीं मरी। यज़ीद के बाद भी हुकूमत हथियाने के लिए सांप्रदायिकता का सहारा लिया गया और उसे राष्ट्रवाद का चोला ओढ़ाया गया।
वर्तमान पाकिस्तान सांप्रदायिक मुसलिम नेताओं की देन है। इसलाम के नाम पर पाकिस्तान मांगा गया और किसी मुसलिम धार्मिक हस्ती को पाकिस्तान सौंपने के बजाय उस पर सांप्रदायिक शक्तियां क़ाबिज़ हो गईं।
पाकिस्तानी राजनेता भारत में आतंकवादी भेजते हैं। वे भारत के सैनिकों के सिर काट कर ले जाते हैं। सिर काटने का काम केवल यज़ीदी सोच के ज़ालिम ही कर सकते हैं। इससे इस क्षेत्र में अशान्ति और अस्थिरता पैदा होती है। नेताओं को सुरक्षा के लिए हथियार ख़रीदने का बहाना मिलता है। पाकिस्तानी और भारतीय नेता, दोनों अमेरिका आदि देशों से हथियार ख़रीदते हैं। इसमें इन्हें लाभ के रूप में मोटा कमीशन मिल जाता है।
तमाम आतंकवादी घटनाओं के बाद भी भारत के नेता कहते हैं कि भारत पाकिस्तान को आतंकवाद के मामले में संदेह का लाभ देने के लिए तैयार है। आज आतंकवाद एक इंडस्ट्री बन चुकी है। इसका लाभ हथियार बेचने वाले देश उठा रहे हैं।
सांप्रदायिकता से सांप्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है। पाकिस्तानी आतंकवादियों की चर्चा भारत के सांप्रदायिक तत्वों का पौष्टिक आहार है। ये हर दम पाकिस्तान के सांप्रदायिक नेताओं और आतंकवादियों की चर्चा करते रहते हैं। राष्ट्रवादी कहलाने वाले एक संगठन के प्रशिक्षित सांप्रदायिक विचारक और प्रचारक पाकिस्तान को संदेह का लाभ नहीं देना चाहते। ये उस पर हमला करना चाहते हैं। इससे भी इस क्षेत्र में अशान्ति और अस्थिरता पैदा होगी। इसका लाभ भी यहां के पूंजीपतियों, जमाख़ोरों, कालाबाज़ारी करने वाले ब्याजख़ोरों को ही मिलेगा, आम जनता को नहीं। ये लोग बिना जंग के भी आलू-प्याज़ से लेकर नमक तक महंगा किये हुए हैं। कोई युद्ध हो जाए तो ये खाना, पानी और दवा को मुंह मांगी क़ीमत पर बेच कर कई नस्लों की ऐश का इंतेज़ाम कर लेंगे।
सांप्रदायिक व्यक्ति निजि स्वार्थ के लिए आतंकवाद का सहारा लेकर धार्मिक हस्तियों का क़त्ल करते हैं क्योंकि वे सामूहिक हित और सामाजिक न्याय के लिए काम करते हैं। जिसकी आज्ञा परमेश्वर ने दी है।
परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही धर्म कहलाता है। ‘इसलाम’ शब्द का यही अर्थ है। सांप्रदायिक व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता। वह अपने कुकर्मों को राष्ट्रवाद के आवरण से ढक लेता है। आम जनता उन्हें पहचान नहीं पाती लेकिन धार्मिक व्यक्ति उन्हें पहचानता है। मुजरिम उन लोगों को ज़रूर क़त्ल करते हैं, जो उन्हें जुर्म करते हुए देख ले, पहचान ले और उनके खि़लाफ़ गवाही दे। मारने और बचाने के इसी काम को सत्य-असत्य का संघर्ष कहा जाता है। सत्य और असत्य का संघर्ष इमाम हुसैन रज़ि. से पहले भी हुआ है और उनके बाद आज भी हो रहा है।
हम इसे टाल नहीं सकते लेकिन चुनाव हमारे अपने हाथ में है कि हम किस पक्ष का साथ देंगे ?
इमाम हुसैन रज़ि. केवल शियाओं के ही इमाम नहीं हैं बल्कि वे सुन्नियों के भी हैं। ‘शहीदे करबला और यज़ीद’ नामक किताब एक सुन्नी आलिम की लिखी हुई किताब है। दारूल उलूम देवबन्द के संस्थापक मौलाना क़ासिम नानौतवी साहब रह. का क़ौल भी इसके पृष्ठ 85 पर दर्ज है। जो उनके एक ख़त (क़ासिमुल उलूम, जिल्द 4 मक्तूब 9 पृष्ठ 14 व 15) से लिया गया है। इसमें मौलाना क़ासिम साहब रह. ने ‘यज़ीद पलीद’ लिखा है।
आलिमों की अक्सरियत ने यज़ीद को फ़ासिक़ माना है और जिन आलिमों पर यज़ीद की नीयत भी खुल गई। उन्होंने उसे काफ़िर माना है। इमाम अहमद बिन हम्बल रहमतुल्लाह अलैहि एक ऐसे ही आलिम हैं। सुन्नी समुदाय में उनका बहुत बड़ा रूतबा है। इस किताब के पृष्ठ 109 पर इस बात का भी तज़्करा है।
इमाम हुसैन शिया और सुन्नी के लिए ही इमाम (मार्गदर्शक) नहीं हैं बल्कि हरेक इंसान के लिए मार्गदर्शक हैं। जो सत्य का मार्ग देखना चाहे, वह उनकी जीवनी पढ़े और ग़ौर व फ़िक्र करे कि ऐसे महान मार्गदर्शक से हम कितना लाभ उठा पाए हैं और कितना लाभ उठा सकते हैं?
आतंकवाद को समाप्त करना है तो इमाम हुसैन रज़ि. की ज़िन्दगी को जाने बिना चारा ही नहीं है वर्ना आतंकवाद को ख़त्म करने के नाम पर उन कमज़ोरों और ग़रीबों को ख़त्म किया जाता रहेगा जिनका आतंकवाद से कोई रिश्ता ही नहीं है। इससे आतंकवाद पहले से ज़्यादा भीषण रूप लेता चला जाएगा।
आज यही हो रहा है और यह सब जानबूझ कर किया जा रहा है।
इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के क़िस्से का ज़िक्र कोई धार्मिक रस्म महज़ नहीं है बल्कि यह ज़माने की एक ज़रूरत है। यह एक आईना है। जिसमें हर शख्स अपना और अपने लीडरों को चेहरा देख सकता है। चाहे उसे कितने ही ख़ूबसूरत नक़ाब से क्यों न ढक दिया हो!
इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु इंसानियत के दुश्मनों को पहचानने की नज़र रखते थे। उन्होंने अपनी शहादत के ज़रिये हमें अपनी नज़र (दृष्टि) और अपना नज़रिया सब कुछ अता कर दिया है। अब कोई अंधा न रहेगा सिवाय उसके जिसे सत्य का विरोध ही करना है।
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धार्मिक निशानियों का ग़लत इस्तेमाल, एक साज़िश

जोगेन्द्र ने अपने पिता चन्द्रपाल सिंह को गोली मार कर वहां टोपी और तहमद डाल दी ताकि लोग यह समझें कि उन्हें टोपी तहमद वालों ने मारा है। उसने अपने पूर्व फ़ौजी पिता के साथ बटाईदार सौराज की भी हत्या उस समय की जबकि वे दोनों अपने खेतों को पानी दे रहे थे। उसके इस कुकर्म की वजह से गांव के दर्जनों लोगों को पुलिस की पूछताछ का कष्ट झेलना पड़ा और अगर कोई दंगा भड़क जाता तो कितनी ही जानें अलग चली जातीं। यह घटना ज़िला सहारनपुर के थाना बड़गांव के गांव खुदाबक्शपुर माजरा में एक महीने पहले हुई थी। दैनिक जागरण के अनुसार बुधवार दिनांक 6 नवंबर 2013 को पुलिस ने इस जुर्म के हक़ीक़ी मुल्ज़िम को गिरफ़्तार करके उससे आला ए क़त्ल भी बरामद कर लिया है। मज़ीद तफ़सील के लिए देखिए अख़बार की कटिंग।
आदमी नफ़रत और लालच में कितना भी गिर सकता है और कितना भी घिनौना जुर्म कर सकता है। हमारे समाज में होने वाले दंगों के पीछे भी नफ़रत और लालच जैसे जज़्बात ही काम करते हैं। दंगाई इंसानियत से गिरे हुए लोग हैं। सत्ता के लालची नेता लोगों के दरम्यान नफ़रत फैलाते हैं। वे ऐसा न करें तो दंगा नहीं हो सकता।
जोगेन्द्र ने एक आम आदमी की हैसियत से यह जुर्म किया है। इसलिए वह पकड़ लिया गया लेकिन जो लोग नेता की हैसियत से इससे बड़े जुर्म करते हैं। उन्हें पकड़ना आसान नहीं है तो ऐसे मुजरिमों को सज़ा मिलने की बात क्या की जाए?
जोगेन्द्र टोपी और तहमद ख़रीद लाया और ख़बर आ रही है कि कोई हज़ारों बुरक़े ख़रीदे बैठा है। लोगों की अक्ल चकरा जाए, ऐसी साज़िशें रची जा रही हैं। इन साज़िशों से वही बच सकता है जो कि लालच और नफ़रत के नकारात्मक भाव पर क़ाबू पा चुका हो।



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सभी दीवाली मनाने वालों को शुभ दीवाली! Happy Diwali 2013

दीवाली हर साल आती है। इस साल भी आ रही है। दीवाली क्यों मनाई जाती है?
इस बात को लेकर कई बातें कही जाती हैं। दीवाली मनाने का कारण जो भी हो, हमें उसकी आलोचना नहीं करनी है।
दीवाली को रौशनी का त्यौहार कहा जाता है। इस त्यौहार को मनाने वाले अपने घरों से पुराना कचरा साफ़ करते हैं। नया रंग-रोग़न करते हैं। उसे नए सामान से सजाते हैं और फूलों से महकाते हैं।
घर के साथ अपने मन का ध्यान भी रखना ज़रूरी है। इसमें भी रौशनी हो। यह रौशनी ज्ञान की रौशनी होनी चाहिए। अपने मन से भी कचरा विचार को निकाल देना चाहिए। इसमें नए विचार हों और फिर उन्हें दूसरों तक पहुंचाना चाहिए जैसे कि फूलों की महक दूसरों तक पहुंचती है।
त्यौहार की बाहरी रस्में जो भी हों लेकिन इस मौक़े पर उनकी हक़ीक़त को भी अपने अंदर जगाने की ज़रूरत है।
त्यौहार की बाहरी रस्मों को चाहे केवल हिन्दू भाई मनाएं लेकिन अपने मन की सफ़ाई सुथराई सब साथ मिलकर कर सकते हैं।
इस साल दीवाली ऐसे मनाई जाए तो यह सबके लिए शुभ होगी।
सभी दीवाली मनाने वालों को शुभ दीवाली!
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शेर और भेड़ियों के बीच अन्डरस्टैंडिन्ग Politics

शेर और भेड़ियों के बीच अन्डरस्टैंडिन्ग
जहां भेड़ हो वहां भेड़िए आते ही हैं ठीक वैसे ही जैसे कि लोकतंत्र में जनता के पास नेता आते हैं लेकिन अब शेर भी आने लगे हैं। नेता अब भेड़िए ही नहीं रहे, उनमें अब शेर भी होने लगे हैं।
वह नेता है मगर शेर है। उसके पास शेर जैसा दिल है। वह नेता है। इसलिए उसके पास लोमड़ी जैसी अक्ल भी है। इसके बावजूद उसका शरीर इनसानी है लेकिन उसमें इनसानों जैसी कोई बात नहीं है। मिसाल के तौर पर इनसानों को डर लगता है लेकिन इस नेता को डर नहीं लगता। किसी नेता की रैली में फ़ायरिंग हो जाए तो सबसे पहले जो दुबकता है वह उस रैली का सबसे बड़ा नेता होता है लेकिन इसकी ‘फुंकार रैली’ में बम फटते रहे और यह धमाकों के बीच भी हुंकारता रहा। लाशें गिर रही थीं। इनसानों के छीछड़े, मांस और ख़ून फ़िज़ा में बिखर रहे थे। तब भी वह भाषण दे रहे थे।
आम तौर पर नेता ऐसे हालात में अपनी रैली रद्द कर देते हैं लेकिन इसने रैली रद्द नहीं की। इसमें डर नाम की कोई चीज़ नहीं है। बम धमाकों से इस नेता की इमेज मज़बूत हुई है। वह जिस मंच पर खड़े होकर बोल रहे थे। उस मंच के नीचे भी एक बम मिला है जो फटा नहीं है। जिसे फटना भी नहीं था क्योंकि बम इन्डियन मुलहिदीन ने रखा था। शेरदिल नेता को भी इन्डियन मुलहिदीन पर पूरा भरोसा है। इसीलिए भरोसे वह बम पर खड़ा रहा और बोलता रहा। इस शेर को इन्डियन मुलहिदीन पर इतना भरोसा क्यों है?
शायद इसलिए कि वह एक राष्ट्रवादी है और जहां भी ‘इन्डियन’ शब्द देखता है उसके अंदर राष्ट्रवाद हिलोरें लेने लगता है। अगर राष्ट्रवादी बम रख दें तो वह उस पर भी खड़ा रहेगा और खड़ा रहा। इन्डियन मुलहिदीन के आतंकियों को भी इस पर पूरा भरोसा है कि वह उन्हें नहीं पकड़वाएगा। वह भी इनके भरोसे पर पूरा उतरता है। इन्डियन मुलहिदीन के नाम पर उन लोगों को पकड़ लिया जाता है जो कि इसे वोट नहीं देते।
इन्डियन मुलहिदीन की स्थापना किसी राष्ट्रवादी की करतूत है। उसने आतंकवाद जैसे घोर घृणित काम के लिए नाम रखते वक्त भी भारत का नाम नहीं छोड़ा लेकिन बदनामी के लिए अंग्रेज़ी और अरबी के शब्द ले लिए। इस तरह उसने देश के प्रति निष्ठा भी ज़ाहिर कर दी और देश की भाषाओं को बदनामी से भी बचा दिया।
इन्डियन मुलहिदीन ने वोटर तो कई मार दिए लेकिन वोट लेने वाला नेता एक भी नहीं मारा। इससे इन्डियन मुलहिदीन की हमारे नेताओं की सुरक्षा के प्रति चिंता का पता चलता है। देसी बमों के इस्तेमाल से स्वदेसी में उनकी आस्था को भी भली प्रकार पहचाना जा सकता है। इसके बावुजूद इन आतंकियों को भेड़िया कहा जा सकता है।
शेर और भेड़ियों के बीच जो अन्डरस्टैंडिन्ग चल रही है। उससे भेड़ें अन्जान हैं। वे यही सोच रही हैं कि भेड़ियों से बचाने के लिए ही शेर आया है।
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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