ब्लोगिंग के हर दिल अज़ीज़ हरीश सिंह छा रहे हें इन दिनों

दोस्तों सबसे पहले तो में सभी भाइयों से क्षमा प्रार्थी हूँ ,क्षमा प्रार्थी इस लियें के मेरा अपना स्व्भाव हे अपनी सोच हे और मेरी संस्क्रती मेरी शिक्षा यही हे के किसी के बारे में अगर कोई आदर्श कोई अच्छाई  देखो तो उसे उजागर करो और कोई कमी देखो तो उसे छुपा कर रखो . इसी आदत इसी शिक्षा से में मजबूर हूँ , पिछले दिनों  ब्लोगिंग में खूब उलट पुलट आरोप प्रत्यारोप का दोर चला किसी की खूबियाँ अगर गिनाई गयीं तो उसे चापलूसी और चम्चेवाद  का दोर कहा गया, लेकिन दोस्तों किसी से कुछ अर्जित करने के लियें किसी नालायक की तारीफ हो तो शायद चमचागिरी उसी का नाम हे ,जबकि हमारी ब्लोगर दुनिया में एक से एक हीरो एक से एक पारंगत अज़ीम हस्तियाँ हें जिनके बारे में सच लिखना हर ब्लोगर की मजबूरी होना चाहिए और इसीलियें कुछ दिन ठिठकने के बाद फिर से में भाई हरीश सिंह जी की लेखनी ,मिलनसारी,और अपनेपन से प्रभावित होकर यह पोस्ट लिखने पर मजबूर हुआ हूँ और में यह क्रम जारी रखूंगा . 
दोस्तों उत्तरप्रदेश की काशी प्रयाग लवकुश नगरी यानी लवकुश की जन्म स्थली भदोही में भाई हरीश ने १५ मार्च १९६९ को जन्म लिया और इनका प्रारम्भिक अध्ययन का कार्य भदोही में ही रहा वहां इस धार्मिक नगरी लवकुश जन्मस्थली ने भाई  हरीश सिंह को ऐसे संस्कार दिए के सच का सामना करना, पीड़ितों को न्याय दिलाना ,सच बोलना और सच लिखना ,समाजसेवा करना इनकी आदत में आ गया और यही वजह रही के भाई हरीश जी ने पढाई के साथ साथ ही समाजसेवा और पत्रकारिता का काम शुरू कर दिया था .
हरीश जी १९९० में पत्रकारिता से जुड़ गये कई लेख दुसरे छोटे बढ़े समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए खोजी पत्रकारिता में हरीश जी ने काफी नाम कमाया और १९९४ में हरीश जी पाक्षिक समाचार से जुड़े फिर देनिक समाचार पत्रों से लगातार जुड़े रहने के बाद इन अख़बारों की और मालिकों की हकीक़त जब हरीश जी ने समझी तो यह अख़बारों से अलग हो गये और खुद का एक पाक्षिक अख़बार निकाल लिया, इन दिनों हरीश जी देनिक आज अख़बार में क्राइम रिपोर्टिंग भी कर रहे हें , पत्रकारिता के  जूनून ने हरीश जी को सच का सामना करने ,सच के लियें लढने का साहस  दिया और फिर हरीश जी ब्लोगिंग की दुनिया के अँधेरे को दूर करने आ गये ,
हरीश जी ने ब्लोगिंग की दुनिया में खुद को आलू की तरह एडजस्ट किया  हालात यह रहे के जेसे आलू सभी सब्जियों के साथ अच्छा लगता हे ऐसे ही भाई हरीश सभी ब्लोगरों के साथ सम्बन्ध स्थापित करते रहे इनका स्वभाव रहा, सभी से दोस्ती करो किसी से दुश्मनी या नाराजगी इनके स्वभाव में शामिल नहीं हे और इसीलियें यह दोस्त के भी दोस्त और दुश्मन के भी दोस्त बनते चले गये आज भाई हरीश जी के लेखनी के सभी तलबगार हे और यह जनाब हें के ब्लोगिंग के इस अखाड़े में जब कुछ लोग एक दुसरे को चुनोती दे रहे हें एक दुसरे को पछाड़ने  की तय्यारी में हे तब यह जनाब सभी गुट के मुखियाओं के साथ खड़े मुस्कुराते हें उनकी इस मुस्कुराहट में एक प्यार का संदेश अपनेपन का संदेश छुपा होता हे और इसीलियें भाई सलीम ब्लोगर ने हरीश सिंह को लखनऊ ब्लोगरएसोसिएशन    का गुरु  हनुमान  कहा हे और खुबसुरत मधुर अल्फाजों में उन्हें अपने ब्लॉग पर नवाज़ा भी हे,हरीश सिंह अपनी पत्रकारिता की रूचि के चलते पूर्वांचल प्रेसक्लब के अध्यक्ष भी हे और इसीलियें यह सभी ब्लोगों पर अपने पराये का भेद मिटाकर कोई न कोई टिप्पणी छोड़ने की कोशिश जरुर करते हें और इनके इसी स्वभाव के कारण वोह  आज ब्लोगिंग की दुनिया में अखाड़ेबाजी के बाद भी सभी दिशाओं ,सभी विपरीत विचारधाराओं के ब्लोगरों के आपसी मतभेद होने पर भी सभी ब्लोगर्स  के हर दिल अज़ीज़ बन गये हें . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है Indian Cricket Team

क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है World Cup 2011

क्रिकेट से खुन्नस रखने के पीछे मेरे निजी अनुभव हैं जो कि अच्छे नहीं हैं। जब मैं बच्चा था तो मुहल्ले भर के चाचा और तमाम तरह के दूर नज़्दीक के रिश्तेदार घर में क्रिकेट मैच देखने के लिए जमा हो जाया करते थे क्योंकि तब तक कम घरों में टी. वी. था। उनके घरों में पैसे की तंगी की वजह से टी. वी. नहीं था, ऐसी बात नहीं है। सभी लोग काफ़ी रिच हैं लेकिन तब तक घरों पर उन बड़े बूढ़ों का होल्ड था जो घर में टी. वी. आने की इजाज़त नहीं देते थे।
घर में जमावड़े से हमारे लिए कई तरह की दिक्क़तें खड़ी हो जाती थीं और घर का सारा दूध चाय बनाने में ही ख़र्च हो जाता था। हम सबको चाय सप्लाई करते रहते थे और बाज़ार से दूध और नाश्ते का सामान ही लाते रहते थे। ज़मींदार लोग थे, किसी को कोई काम अपने हाथ से करना नहीं था। नौकर खेतों पर काम करते रहते थे।
सबकी ऐश आ जाती थी और हमारी आफ़त। सबसे ज़्यादा दुख हमें अपनी वालिदा साहिबा को ढेर के ढेर कप धोते हुए देखकर होती थी। वालिद साहब के सामने कोई चूं भी नहीं कर सकता था। जिसने उन्हें न देखा हो वह सनम बेवफ़ा के डैनी या प्राण को देख ले। शलवार कमीज़ , सर पर पगड़ी और एक पठानी खंजर भी। अल्लाह का शुक्र है कि उस पर किसी का खून नहीं लगा। जिसका हमारे वालिद को आज तक मलाल है। कभी कभी सोचता हूं कि अगर सूरज इंसानी शक्ल में हमारे सामने आए तो उसे हमारे वालिद साहब का रूप रंग पूरी तरह मैच करेगा। चेहरा सुर्ख़ और आँखें अंगार, हर समय।
आम दिनों में जब वालिद साहब घर में होते थे तो हम इधर उधर टल जाया करते थे। क्रिकेट के दिनों में वालिद साहब की मौजूदगी का वक्त भी बढ़ जाता था और हम उनकी नज़र के सामने से हट भी नहीं सकते थे। चाय और पान की खि़दमत हमारे सुपुर्द जो हो जाया करती थी। इन सब बातों की वजह से हमें बचपन से ही क्रिकेट से नफ़रत हो गई थी। थोड़ा बड़े हुए तो पता चला कि कई बार इस क्रिकेट की वजह से देश में दंगे हो गए और बेवजह ही लोग मारे गए। इस खेल से हमारी नफ़रत में और ज़्यादा इज़ाफ़ा हो गया।
एम. ए. में पहुंचे तो हमें सोशियोलॉजी में बताया गया कि अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए शासक लोग जनता को खेल और मनोरंजन में लगा देते हैं। इससे उनका ध्यान जीवन के अहम मुद्दों से हट जाता है। यूनानी शासक यही करते थे।
हमने पाया कि जैसे-जैसे देश और दुनिया में समस्याओं का अंबार लगता जा रहा है, वैसे वैसे खेल और मनोरंजन के साधन भी जनता को ज़्यादा से ज़्यादा उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
मीडिया ने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन खेलों में प्रतिवर्ष खरबों रूपया ख़र्च करती हैं और उससे कई गुना ज़्यादा कमाती भी हैं। देश का पैसा खिंचकर विदेश में जाता है। पहले से ही कंगाल जनता कुछ और बदहाल हो जाती है और फिर यह भी सामने आ गया कि सट्टा किंग पहले से ही यह तक तय कर देते हैं कि जीतना किसे है ?
बहुत बड़ा गोरखधंधा है यह कप और विश्व कप। जो इसे समझता है, वह न किसी की हार से दुखी होता है और न ही किसी की जीत से खुश। जो नादान हैं वे समझते हैं कि हाय ! हम हार गए या हुर्रे ! हम जीत गए।
अफ़सोस होता है यह देखकर कि देश के 22 नौजवान 8 मई 2010 से सोमालियाई लुटेरों की क़ैद में हैं। जाने उनमें से कौन अब ज़िंदा होगा ?
हम एक एटमी पॉवर हैं और हमसे डरते नहीं हैं समुद्री लुटेरे भी। हमारे आदमी उन्होंने पकड़ लिए। इस बात पर अफ़सोस करने के लिए जो देश एक न हो सका, जो ब्लॉग जगत एक न हो सका और कोई सशक्त आंदोलन न चला सका। वह हिप हिप हुर्रे हुर्रे करके कह रहा है अहा, हम जीत गए।
क्या सचमुच हम जीत गए ?
यह सच है कि हमारी क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीत लिया है । तमाम बातों के बावजूद इसे एक उपलब्धि भी माना जा सकता है लेकिन हरेक चीज़ अपनी उपयोगिता के कारण ही सार्थक या निरर्थक मानी जाती है। आखि़र देश की जनता के लिए इस कप का उपयोग क्या किया जा सकता है ?
जिन देशों की सिरे से ही कोई क्रिकेट टीम नहीं है, क्या वे बेकार देश हैं ?
जिस देश में आज भी लोग मलेरिया के हाथों लाखों की तादाद में मर जाते हैं। जहां करोड़ों माएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं। जहां नशे के कारोबार को सरकारी आश्रय प्राप्त है और नशे की वजह से कितने ही रोड एक्सीडेंट रोज़ होते हैं या फिर कलह के कारण करोड़ों परिवारों का सुख चैन बर्बाद है सदा के लिए।
जहां गुरबत है और ऐसी गुरबत है कि मात्र एक रूपये में इस देश की औरत अपनी आबरू बेच रही है। मैं ऐसे फ़ौजियों से मिला हूं जिन्होंने यह सब खुद देखा है और उस इलाक़े का नाम मुझे बताया है। कश्मीर में भी मुझे यही पता चला। देश का कोई इलाक़ा शायद ऐसा न हो जहां ज़रूरतें इंसान की शर्म और ग़ैरत को न चाट रही हों। जहां ज़रूरतें और मजबूरियां नहीं हैं वहां भी यही सब हो रहा है। वहां वजह बन रही है दौलत की हवस। पति-पत्नी का रिश्ता एक पवित्र संबंध है लेकिन दौलत की हवस यहां भी पैर पसारे आपको मिल जाएगी और दहेज की इसी हवस में कहीं बहुएं जलाई जा रही हैं और कहीं लड़कियां या तो बेमेल ब्याही जा रही हैं या फिर कुंवारी ही बूढ़ी हो रही हैं या फिर गर्भ में ही मारी जा रही हैं। माएं आज बेसहारा हैं और विधवाएं तो हमेशा से हैं ही। जिन समस्याओं को हमें हल करना था, उन्हें हम हल नहीं कर पाए।
ग़रीबी और कुपोषण की वजह से बच्चे बचपन में ही या तो मर जाते हैं या फिर मज़दूरी करते हैं। किसान मज़दूर सूदख़ोर महाजन के ब्याज के फंदे में झूलकर आए दिन आत्महत्या करते हैं। कुछ बाबा और महात्मा ग़रीबों की सेवा पहले भी करते थे और आज भी करते हैं लेकिन इन्हीं का रूप बनाकर पहले भी ठग जनता को ठगते थे और आज भी ठग रहे हैं बल्कि मंत्री और मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं। आशीर्वाद और योग को ये लोग कारोबार बना चुके हैं। भारत एक धर्म-अध्यात्म प्रधान देश है और आस्था इसकी पहचान है लेकिन आज देश की जनता के सामने केवल अधिक से अधिक सुविधा और ऐश बटोरना ही एक मात्र मक़सद है। कभी जनता हड़ताल करती है तो कभी वकील और कभी डाक्टर।
देश का क़ानून टूटता हो तो टूटे , कोई मरता हो तो मरे, इनकी बला से इनके अधिकार कम न हों, इनकी सैलरी बढ़ा दी जाए। ये बुद्धिहीन लोग बुद्धिजीवी कहलाते हैं, यह देश की त्रासदी है। बस केवल सांसद ही कभी हड़ताल नहीं करते। उन्हें जो कुछ सुविधाएं लेनी होती हैं, अपने लिए खुद ही मंजूर कर लेते हैं।
इस आंतरिक मज़बूत एकता के बावजूद ये नेता बाहर से खुद को बंटा हुआ दिखाते हैं ताकि जनता यह समझे कि यह वामपंथी है और वह दक्षिणपंथी, यह समाजवादी है और वह निर्दलीय। यह अमीरों का पिठ्ठू है और वह ग़रीबों का मसीहा है। ये गुट बनाकर आमने सामने डटे रहते हैं और जब भी कोई पार्टी जीतती है तो पब्लिक समझती है कि ‘अहा ! हम जीत गए।‘
लेकिन जब वह पार्टी काम काज संभालती है तो वह भी पुराने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती है जिससे जनता की केवल मुसीबतें बढ़ती हैं और उनसे ध्यान बंटाने के लिए उसके लिए खेल और मनोरंजन के साधन बढ़ा दिए जाते हैं।
आज चैराहों पर ढोल बज रहे हैं, पटाख़े छोड़े जा रहे हैं, मिठाईयां बांटी जा रही हैं। हर तरफ़ एक जुनून है, एक खुशी की लहर छाई हुई है। राष्ट्रवादी लोग भी मगन हैं। जो सारा माजरा समझते हैं वे चुप हैं। वे जानते हैं कि दीवानेपन और जुनून की कैफ़ियत में उनकी सही बात सुनेगा ही कौन ?
लेकिन ऐसा नहीं है।
सुनने वाले लोग भी इन्हीं के दरम्यान हैं। सोचने-समझने वाले लोग भी इन्हीं के बीच मौजूद हैं। आप कहेंगे तो बात उन तक ज़रूर पहुँचेगी जिन्हें मार्ग और मंज़िल की तलाश है।
जिन खेलों से सीधे तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता है या फिर हमारे पूंजीपतियों और निकम्मे हाकिमों को, उनका प्रभाव लाज़िमन हमारे राष्ट्र को कमज़ोर ही करता है।
समस्याओं से त्रस्त लोगों के बीच खड़े होकर कहना कि ‘हम जीत गए।‘
सिर्फ़ यह बताता है कि उन्हें देशवासियों की समस्याओं से वास्तव में कुछ लेना-देना ही नहीं है। उनके लिए तो बस मनोरंजन ही प्रधान है। हमारे हाकिम भी यही चाहते हैं कि हमें होश न रहे। हरेक गली-नुक्कड़ पर नित नए खुलते हुए शराब के ठेके इसी बात की पुष्टि करते हैं। जिस देश में कभी गंगा शुद्ध बहती थी। उसी देश में आज शराब की नदियां बहाई जाएंगी और यह सब होगा राष्ट्रवाद के नाम पर। जो चीज़ राष्ट्र को खोखला करती है उसका इस्तेमाल राष्ट्रवादियों में आम क्यों है ?
महंगाई, मिलावट और नक्सलवाद से लेकर हरेक समस्या ले लीजिए, हम हर मोर्चे पर हार रहे हैं, ऐसे हालात में क्रिकेट के जुनून में दीवाना हो जाना मर्ज़ को और बढ़ा रहा है।
जो देख सकते हैं, वे हालात को सही एंगल से देखने का कष्ट करें मुल्क की भलाई की ख़ातिर, ऐसी हमारी विनती है।
बचपन में तो हम अपने वालिद साहब के सामने कह नहीं सकते थे लेकिन आप लोगों से तो हम कह ही सकते हैं कि क्रिकेट के नाम पर हमारा ध्यान असल समस्याओं से हटाया जा रहा है।
हरेक सोचे कि इस धरती पर उसके जन्म का उद्देश्य क्या है ?
इसके लिए वह अपने गुरूओं और ग्रंथों की सहायता ले और फिर देखे कि क्रिकेट के ज़रिए वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है या कि उससे दूर होता जा रहा है ?
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जीत लिया विश्व कप ----- दिलबाग विर्क



28 वर्ष बाद वो ऐतिहासिक खड़ी आ ही गई , जब भारत ने दोबारा विश्व कप को चूमा . टीम इंडिया इसके लिए बधाई की पात्र है . उन्होंने जिस तरीके से आस्ट्रेलिया , पाकिस्तान और श्रीलंका को हराया वो सामूहिक प्रयास का ही नतीजा था .फाइनल की जीत तो लाजवाब थी  बल्लेबाज़ी में असफल चल रहे कप्तान धोनी ने भी फार्म में लौटने के लिए सही दिन चुना और कप्तानी पारी खेलकर टीम को चैम्पियन बनाया . गंभीर ने भी इस मैच में शानदार 97 रन बनाए . भारतीय टीम का फाइनल में क्षेत्ररक्षण का स्तर भी बहुत ऊँचा रहा . सहवाग -सचिन के जल्दी आउट होने के बाद कोहली ,गंभीर ,धोनी , युवराज ने जीत सुनिश्चित करके ही दम लिया .
            पूरे टूर्नामैंट को देखें तो सभी खिलाडियों ने अपना शत-प्रतिशत योगदान दिया . युवराज़ का श्रेष्ट खिलाडी चुना जाना उसके उपयोगी खिलाडी होने का सबूत है . सचिन सर्वाधिक रन बनाने वालों में दूसरे स्थान पर रहे . जहीर ने सर्वाधिक विकेट चटखाए .हरभजन , मुनाफ , अश्विन , नेहरा ने उपयोगी गेंदबाज़ी की , सारे बल्लेबाज़ तो रंग में थे ही . कुलमिलाकर पन्द्रह सदस्यी दल में कोई भी खिलाडी कमजोर कड़ी साबित नहीं हुआ . सभी खिलाडी पूरे टूर्नामैंट में फिट रहे यह भी बड़ी बात है . 
                 खिलाडियों के साथ कोच और अन्य स्टाफ के योगदान को भी नहीं भूला जाना चाहिए . कोच गैरी को बिखरी हुई टीम मिली थी , जिसे उसने पर्दे के पीछे रहकर संवारा . उन्होंने कभी भी ग्रेग चैपल की तरह सुर्ख़ियों में आने की कोशिश नहीं की , यही कारण है कि वे विवादों से बचे रहे और टीम और कप्तान के साथ उनका तालमेल बना रहा . गैरी का यह भारतीय टीम के साथ अंतिम मैच था . भारतीय टीम ने उसे शानदार विदाई दी है .
           इस मैच के साथ ही क्रिकेट के एक युग का भी अंत हुआ . मुरलीधरन की फिरकी अब अंतर्राष्ट्रीय मैचों में नहीं दिखेगी . हालाँकि उनकी विदाई विश्व कप के साथ नहीं हो पाई , फिर भी इस महान खिलाडी को सलाम किया जाना चाहिए . मुरली की तरह ही शायद यह सचिन का भी अंतिम विश्व कप माना जा रहा है . इस आखरी मैच में सचिन-मुरली की भिडंत तो नहीं हो पाई लेकिन सचिन का सपना जरूर पूरा हुआ .सचिन अभी खेल रहे हैं और क्रिकेट प्रेमी उनसे एकदिवसीय मैचों में पचास शतक और बीस हजार रन बनाए जाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं .यह पड़ाव बहुत दूर भी नहीं है , लेकिन इतना सच है कि सचिन बहुत लम्बा नहीं खेल पाएंगे . टीम इंडिया का भविष्य युवा खिलाडी हैं .और भारत का विश्व चैम्पियन बनना और इसमें युवाओं का योगदान देखते हुए लग रहा है कि भारतीय क्रिकेट का भविष्य उज्ज्वल है .भारत के विश्व चैम्पियन बनने पर पूरे देश को बधाई .  

                     * * * * *
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लो जीत ली हे दुनिया मेने

जी हाँ दोस्तों हिन्दुस्तान जिंदाबाद ,मेरा भारत महान ,मेरे भारत के क्रिकेटर महान जिन्होंने हिन्दुस्तान की जनता के होसले से आज क्रिकेट पर फतह हासिल कर जीत का झंडा गाढ़ दिया हे , इस कामयाबी के लियें इण्डिया टीम को बधाई . 

दोस्तों एक हफ्ते से भी अधिक समय से मुझ सहित मेरे जेसे १२१ करोड़ लोग मेरे इस देश की जीत के लियें मन्दिर ,मस्जिद,गिरजा में दुआएं कर रहे थे और थेंक्स गोंड खुदा ने हमारी सुन ली आज हमें विश्व कप क्रिकेट का विजेता बना दिया . क्रिकेट के इस मैदान में श्रीलंका की भारत को कड़ी चुनोती थी लेकिन कहते हें माँ की दुआ और भाइयों का आशीर्वाद जिसके साथ रहे वोह अविजित रहता हे और इसीलियें आज भारत ने श्रीलंका को जीत लिया भारत की यह जीत ऐतिहासिक कामयाब जीत हे और इस जीत ने देश के करोड़ों करोड़ लोगों की आँखों में ख़ुशी के आंसू छलका दिए इस जीत के लियें मेरे इस देश को मेरे इस देश के खिलाड़ियों को मेरे इस देश की जनता को मेरे ब्लोगर भाइयों बहनों को मुबारकबाद आप लोगों की दुआओं से ही आज जीत ली हे दुनिया हमने ..................... अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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जीतो इंडिया, जीतो!

गो इंडिया गो!




हवाएं जोर कितना ही लगायें आंधियां बनकर
मगर जो घिर के आता है वो बदल छा ही जाता है

आप दुआ करें कि आज भारत विश्व कप जीते।
भारत जीतेगा, देश जीतेगा, हम जीतेंगे।
जय हिंद!
एम अफसर खान सागर
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कैसी यह मुहब्बत है और कैसा यह त्यौहार है ? Holi 2011

बच्चे ज़्यादा समझदार हैं बड़ों से, इस होली पर मुझे ऐसा ही लगा।
Dr. Anwer Jamal
Dr. Anwer Jamal
शनिवार को मुझे अपने पेट में दर्द महसूस हुआ। दवाई ले ली। रविवार को सोचा कि अल्ट्रासाउंड करा लिया जाए ताकि पित्ताशय की पत्थरी के साइज़ का भी पता चल जाए। होली की वजह से सभी सेंटर्स मुझे बंद मिले। लौटते हुए एक मशहूर चैराहे पर मुझे कुछ  बच्चों ने अपनी पिचकारी दिखाई, मैंने कहा, बेटे ! हरेक आदमी पर रंग नहीं डालते।
मेरे इतना कहते ही वे मान गए।
आज सुबह मैं अपने घर से निकल कर चंद क़दम ही गया था कि हमारे पड़ोसी पं. प्रेमनारायण शर्मा जी हाथ में रंग की बाल्टी और गुलाल लेकर मेरी तरफ़ बढ़े। मैं घबराया नहीं। मुझे उम्मीद थी कि मैं उन्हें बताऊंगा कि मेरे पेट में दर्द हो रहा है, हल्का सा बुख़ार भी है और मैं अल्ट्रासाउंड कराने जा रहा हूं तो वह मान जाएंगे।
वह मेरे पास आए और मेरे मना करने के बाद भी और मुझसे मेरी परेशानी जानने के बावजूद भी उन्होंने मेरा मुंह गुलाल से हरा कर दिया और फिर जब उनका दिल इससे भी नहीं भरा तो उन्होंने दो मग भरकर रंगीन पानी डाल दिया।
Pandit Premnarayan Sharma
Pandit Premnarayan Sharma

उनकी इस हरकत से मुझे तकलीफ़ तो हुई लेकिन मैंने उन्हें बुरा भला इसलिए नहीं कहा क्योंकि अपनी तरफ़ से वे अपनी मुहब्बत का इज़्हार कर रहे थे
क्या मुहब्बत में अपने प्यारों की तकलीफ़ को भी नज़रअंदाज़ कर देना मुनासिब है ?
मैं घर लौटा और कपड़े बदले और दोबारा फिर घटिया से कपड़े पहने ताकि फिर से कोई अपनी मुहब्बत का इज़्हार करने वाला मिले कम से कम कपड़े तो बच जाएं।
कैसी यह मुहब्बत है और कैसा यह त्यौहार है ?
बच्चे फिर भी ग़नीमत हैं।
बड़े लोग अगर बच्चों की तरह हो जाएं तो काफ़ी दिक्क़तें दूर हो जाएं।
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ये क्‍या होने जा रहा है....

अतुल श्रीवास्तव 
तस्वीर आपको नज़र आएगी निम्न लिंक पर.
http://www.atulshrivastavaa.blogspot.com/


सबसे पहले मैं माफी चाहता हूं, इस तस्‍वीर को अपने ब्‍लाग में लगाने के लिए, लेकिन क्‍या करूं लगाना पडा। फिल्‍मों में हिरोईन कम कपडों में दिखाई देती हैं और अंतरंग दृश्‍य देती हैं, बाद में यह कहकर अपना पल्‍ला झाड लेती हैं कि कहानी की यह मांग थी। मैं भी शायद इसी सोच के साथ इस तस्‍वीर का प्रयोग कर रहा हूं। अब वे हिरोईनें कितना सच बोल रही होती हैं, यह तो मैं नहीं जानता पर मैं यहां सोलह आने सच बोल रहा हूं यह मैं आपको यकीन दिलाता हूं। (इसीलिए मैंने इस तस्‍वीर को निंगेटिव शेड दे दिया है।)  
अब आता हूं मुददे  की बात पर। भारत विश्‍व कप के फायनल में पहुंच गया है। दो अप्रैल को उसका श्रीलंका से मुकाबला है। क्रिकेट पर सटटा लग रहा है, क्रिकेट को लेकर जुनून चरम पर है। कोई व्रत रख रहा है  तो कोई हवन कर रहा है, इस उम्‍मीद में कि भारत विश्‍वकप जीत जाए। 1983 का इतिहास दोहरा दिया जाए। कुल मिलाकर जुनून पूरे चरम पर है। विश्‍वकप में भारत जीते यह हर भारतीय की इच्‍छा है और हर भारतीय विश्‍व कप को इस बार अपने देश में ही रखने की तमन्‍ना रखता है लेकिन इसी बीच एक माडल ने जो बात कही है वह अपने आप में न सिर्फ आपत्तिजनक है बल्कि भारतीय परंपरा के बिल्‍कुल विपरीत भी है।
अब फिर से इस तस्‍वीर पर आता हूं। यह तस्‍वीर है, एक उभरती हुई माडल पूनम पांडे की। किंगफिशर जैसी कंपनियों के लिए विज्ञापन करने वाली पूनम का कहना है कि भारत के विश्‍वकप जीतने पर वह न्‍यूड  होकर अपनी खुशी का इजहार करेगी। वह कहती है कि वह ऐसा टीम इंडिया के हौसले को बढाने के लिए करना चाहती है। अब यह तो पूनम पांडे ही जाने कि यदि टीम विश्‍वकप जीत जाती है तो उसकी इस ‘हरकत’ से टीम का हौसला किस तरह बढ जाएगा। खैर अपनी धुन में मगन पूनम यह भी कहती है कि वह ड्रेसिंग रूप में खिलाडियों के सामने न्‍यूड होगी और यदि सरकार और बीसीसीआई उसे इजाजत दे तो वह स्‍टडियम में भी ऐसा कर सकती है।
विदेशों में इस तरह की घटनाएं आम हैं लेकिन भारत में इस तरह की घोषणा अपने आप में नई बात है और आश्‍चर्यजनक भी। पूनम की इस घोषणा ने यह तो दर्शाया  है कि भारत में क्रिकेट को लेकर दीवानगी किस हद तक है लेकिन क्‍या पूनम की इस तरह की घोषणा भारतीय संस्‍कृति के अनुकूल है। क्‍या किसी को अपनी दीवानगी दिखाने का यही एक तरीका सूझ सकता है।
इस खबर को जब मैंने पढा तो ऐसा लगा कि यह महज क्रिकेट के प्रति दीवानगी की बात  नहीं, कहीं न कहीं प्रचार पाने का तरीका है और मानसिक दीवालिएपन का भी परिचायक है। आप इस बारे में क्‍या सोचते हैं। हर भारतीय चाहता है कि भारत विश्‍वकप जीते लेकिन क्‍या एक भी भारतवासी ऐसा होगा जो यह सोचता होगा कि इसके बाद पूनम की इच्‍छा पूरी हो। ईश्‍वर से यही कामना कि भारत को विश्‍व विजेता बनाए और पूनम को सदबुध्दि दे।

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        बाबाजी खाना तैयार है, खा लीजिये, चलिये। पोते आराध्य की आवाज़ सुनकर मैंने पढ़ने की मेज से सिर उठाया। बेटा ! पापा गये, मैंने पूछा तो आराध्य  ने बताया कि पापा तो बिज़ी हैं, देर से आयेंगे।
मैं सोचने लगा, बेटे के पास तो समय ही नहीं होता पिता से बात करने का। मैं सोचता गया कि जैसे स्त्रियों को सदैव सहारा-सराहना चाहिये; बचपन में माता, पिता, भाई, तदुपरान्त पति-पुत्र; इसी प्रकार पुरुष को भी तो सहारा चाहिये होता है। बचपन में असहाय बालक के लिये मां-बहन, बाद में पत्नी-बेटी, वृद्धावस्था में बेटी-बहू आदि।
          सेवानिवृत्ति के पश्चात मुझे लगता है मैं पुनः बचपन में गया हूं। जैसे बचपन में अपने कमरे में कुर्सी पर बैठकर सोचते रहना, पढ़तेलिखते रहना, कभी-कभी गृहकार्य में हाथ बंटा देना, खाना-पीना या कुछ सामाजिक कार्य कर देना। उसी तरह मैं अब भी अपनी कुर्सी पर बैठकर सोचता, पढ़ता, लिखता रहता हूं, कभी कोई समाज का कार्य कभी-कभी गृहकार्य में हाथ बंटा देता हूं। पहले खाने-पीने, सहारे के लिये मां-बहन थीं, तदुपरान्त पत्नी बेटी और अब वही कार्य पुत्रवधू, नाती-पोते कर रहे हैं। मूलतः परिवार का मुखिया ( जो उस समय पिता की भूमिका में होता है ) तो सदैव ही परिवार के पालन-पोषण की व्यवस्था में ही व्यस्त रहता है, इन सब से असम्पृक्त। वह तो अपने पारिवारिक निर्वहन के रूप में, आर्थिक व्यवस्था में व्यस्त रहकर ही समाज, देश, राष्ट्र की सेवा में रत होता है। उसे कब समय होता है दादी-बाबा से संवाद करने का। संबाद तो प्रायः दादी-बाबा, पोते-पोती ही आपस में करते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि प्रायः पोता ही बाबा के पद चिन्हों पर चलता है, पुत्र की अपेक्षा। जैसे पहले मेरे पिता इस भूमिका में थे, बाद में मैं स्वयं और अब वही दायित्व कृतित्व मेरे पुत्र द्वारा निभाया जा रहा है। यह तो जग-रीति चक्र है, विष्णु का चक्र है, पालन,पोषण चक्र; संसार चक्र है, जीवन चक्र, वंश चक्र,---भव चक्र है। यह परिवर्ती-क्रमिक चक्र सामाजिक क्रम है। यही तो मानव का नित्य याथार्थिक, सार्थक जीवन क्रम है, जिससे वंश, जाति संसार उन्नति-प्रगति को प्राप्त होता है। ---

परिवर्तिन संसारे को मृत वा जायते।
जातो, येन जातेन याति वंश समुन्नितम॥
          यद्यपि आजकल आणविक ( मौलेक्यूलर) परिवार में दादी-बाबा का महत्व घटता जा रहा है। पितामाता के दायित्व वहु-विधात्मक होने से पुत्र-पुत्रियों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जा रहा फ़लतः परिवार के पुत्र-पुत्री, भावी पीढ़ी प्रायः दिशा विहीन होती जा रही है……
       अभी भी सोच ही रहे हैं बाबाजी….खाना ठंडा हो रहा है। मुझे भी भूख लग रही है……. आराध्य  की अधीरता भरी आवाज़ से मे्री तन्द्रा भंग हुई। मैंने मुस्कुराकर आराध्य की ओर देखा…..हां..हां चलो……हाथ धो लिये या नहीं।
------डॉ. श्याम गुप्त

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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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  • - कहीं भी अपनी भाषा में टंकण (Typing) करें - Google Input Toolsप्रयोगकर्ता को मात्र अंग्रेजी वर्णों में लिखना है जिसप्रकार से वह शब्द बोला जाता है और गूगल इन...
    14 years ago

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Prerna Argal, Host : Bloggers' Meet Weekly, प्रत्येक सोमवार
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