प्रमोशन के लिए नेवी ऑफिसर ने बीवी को किया सीनियरों के साथ सोने पर मजबूर ?

Source : http://navbharattimes.indiatimes.com/india/south-india/navy-officers-wife-alleges-husband-forced-her-to-sleep-with-colleagues/articleshow/19488717.cms#gads

नेवी ऑफिसर की पत्नी ने लगाया यौन शोषण का आरोप

नेवी ऑफिसर की पत्नी ने लगाया यौन शोषण का आरोप

कोच्चि।। पहले ही करप्शन और घोटालों से दागदार भारतीय सेना के दामन पर इस बार गंभीर दाग लगा है। यौन शोषण का दाग। भारतीय नौसेना में तैनात एक लेफ्टिनेंट की पत्नी ने सीनियर ऑफिसरों पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। महिला ने कहा है कि यह सब उसके पति की रजामंदी से से हुआ। महिला की शिकायत के बाद कोच्चि पुलिस ने उसके पति सहित नेवी के 10 ऑफिसरों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। हालांकि, नौसेना ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है।

हार्बर पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई शिकायत में महिला ने आरोप लगाए हैं कि पिछले 2 महीने से उसके पति ने प्रमोशन और कुछ अन्य फायदों के लिए अपने सीनियर्स के साथ सोने के लिए मजबूर किया। महिला का कहना था कि जब मैंने इन सबका विरोध किया तो मरे पति ने जमकर पिटाई की और घंटों कमरे में बंद रखा।

महिला की शिकायत पर पुलिस ने उसके पति सहित नौसेना के 10 ऑफिसरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498 के तहत मामला दर्ज किया है। इस मामले में आरोपियों ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी लागई है। हाई कोर्ट ने पुलिस से इस मामले की विस्तृत जानकारी देने को कहा है।
  • नौसेना इन आरोपों से इनकार किया है। बयान में कहा गया है कि जिन ऑफिसरों पर आरोप लगाए गए हैं, उन्होंने अपनी-अपनी पत्नियों के साथ मिलकर इस कपल के निजी जीवन के मतभेद सुलझाने की कोशिश की थी, जो नाकाम रही। दुर्भाग्यवश महिला ने मदद करने वालों पर ही आरोप लगा दिए। नौसेना का कहना है कि इस मामले में वह पूरा सहयोग करेगी।
  • कॉमेंट्स :
siyasharan sharma , kaman bharatpur का कहना है :
11/04/2013 at 06:04 PM
एक नारी शादी के बाद अपने पति से प्यार,सहयोग,रक्षा,ओर स्वाभिमान चाहती है लेकिन जब असे नालायक पति को जीवन साथी बना लिया जाये तो नारी बेचारी क्या करे,नारी एक प्यार ओर ममता का फूल है जो पति ही नही वरण सम्पूर्ण समाज को प्यार ओर ममता देती है नारी मे एक प्राक्रतिक खुदा ने शारीरिक कमी दे दी लेकिन ए मर्द जाट इसे प्यार सरक्षण नही देती ओर नही इस नारी के स्वाभिमान की रक्षा ही करती है,नारी की इस शारीरिक कमी के करण ही शादी की रस्म रखी गयी लेकिन फिर भी डोलत के भूखे पति इस नारी की असमत को सारेबाज़ार बेच देते है बहुत ही शर्मनाक बात है एसा मर्द मर्द जाती पर ओर मानवता पर कलनक हैजय हिन्द
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rs, ptn का कहना है :11/04/2013 at 05:59 PM
यह सिर्फ सेना में ही नहीं, सारे सरकारी विभाग में लागू है।
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raajan, uttrakhand का कहना है :
11/04/2013 at 02:25 PM
.जब पहली बार पति ने किसी अफसर के पास भेजा था अरे तभी क्यों नही विद्रोह किया इसने............! तभी तो कहा हैं....................:- क्रिपनश्य वित्तं नृपस्य चित्तं मनोरथा च दुरजन मानवानां त्रिया चारित्रां पुरुषो भागम देवो ना जनशी कुतो मनुष्यं.................................!
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Raj, USA का कहना है :
11/04/2013 at 11:22 AM
सेना मे एसा होता है लकिन बहुत ही कम बाते बाहर आती हैं ..... ए तो बीवी ने आरोप लगाया है इस से पेहले कितनी बार तो खुद महीला सैनिक इस तरह का आरोप लगा चुकी हैं...... मगर ए हिन्दुस्तान है यहाँ कुत्च नही होता ...... एक अमेरिका है जहां बिल क्लिंटन को मोनिका के केस मे अदालत मे बुला लिया गया था दुनिया की सबसे पवरफुल सीट के आदमी को ...... हमारे देश मे तो अदालत सलमान खान तक को नही बुला पायी हर बार वकील बहाना लेके पहुंच जाते हैं .......
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Hat ke, .............. का कहना है :
11 Apr, 2013 11:20 AM
ये आपका अपना अनुभव है? सवाल ये है की आपके लिये क्या महत्यपूर्ण है- आपका करियर या आपकी इज़्ज़त? 

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पाठकों की राय के बाद अब आप हमारी राय पढ़ें .
बात चाहे सच ही क्यों न होलेफ्टिनेंट की पत्नी ने ने १० लोगों पर इल्ज़ाम  लगाकर अपना केस कमज़ोर कर लिया है.  
हमने एक केस में यही नुकसान उठाया है. 
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डा. अनवर जमाल को सराहा गया जर्मनी में



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क़ाबिले क़द्र भाई ख़ुशदीप की पोस्ट के ज़रिये ब्लॉगर्स को पता चला कि दुनिया की 14 ज़बानों में 4 हज़ार से ज़्यादा ब्लॉग्स में से जब हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ 10 ब्लॉग चुने गए तो जर्मनी वालों ने उनमें डा. अनवर जमाल के ब्लॉग ‘औरत की हक़ीक़त‘ को भी चुना।
फ़ोलो करने लायक़ 10 ब्लॉग में ‘हलाल मीट‘ को देखकर यह यक़ीन हो गया कि चुनाव करने वाले किसी गुट से ताल्लुक़ नहीं रखते। इस ब्लॉग का संचालनकर्ता कौन है ?, यह तक क्लियर नहीं है लेकिन फिर भी इसे इज़्ज़त बख्शी गई। 
राजनीति, विज्ञान और समाज पर लिखने वाले दूसरे ब्लॉग भी इसमें शामिल हैं। उन सबकी लिस्ट भाई ख़ुशदीप के ब्लॉग से कॉपी की जा रही है। 
कौन-कौन से ब्लॉग इन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए नामांकित हुए हैं...

हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग...

अन्ना हज़ारे


आधारभूत ब्रह्मांड
विज्ञान

हिंदी में फॉलो करने लायक बेहतरीन ब्लॉग...


कोई भी हिन्दी ब्लॉगर ईनाम पाये लेकिन वह जर्मनी जाए और वहां हिन्दी का नाम रौशन करे। इसके लिए अपने पसंद के ब्लॉग को वोट दीजिए। पसंद का ब्लॉग न हो तो उनमें पढ़कर किसी को पसंद कीजिए। इस तरह के ईनाम देने का मक़सद यही होता है कि जिस ब्लॉग को नफ़रत या घटिया राजनीति के चलते पीछे धकेलने की कोशिश की गई हो। उसकी बेहतरी को मन्ज़रे आम पर क़ुबूल किया जाए और यहां तो आलमी सतह पर तसलीम किया गया है कि डा. अनवर जमाल हिन्दी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर्स में से एक हैं।
डा. अनवर जमाल समेत चुने गए सभी हिन्दी ब्लॉगरों को मुबारकबाद, सिर्फ़ इसलिए कि इस चुनाव में गुटबाज़ी और धांधली नहीं है।
‘औरत की हक़ीक़त‘ ब्लॉग पर कुल 21 पोस्ट्स देखी जा रही हैं। उनके 50 से ज़्यादा ब्लॉग्स में इस पर सबसे कम एक्टिविटी देखी गई है। अगर उनके एक्टिव ब्लॉग्स ‘ब्लॉग की ख़बरें‘ या ‘वेद क़ुरआन‘ या‘बुनियाद‘ वग़ैरह में से किसी को नॉमिनेट किया जाता तो ज़्यादा अच्छा रहता। 
बहरहाल हिन्दी ब्लॉगर्स की आवाज़ दुनिया के दूसरे कोने तक जा रही है। डा. अनवर जमाल के ज्ञान से दुनिया नफ़ा उठा रही है। यह एक अच्छा बदलाव है। यह एक अच्छी शुरूआत है।
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वृन्दावन के आश्रमों में टुकड़े कर फेंके जाते हैं विधवाओं के शव


साभार: फ़ेसबुक 
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एक प्राचीन प्रेत का देशी उपदेश

'बुनियाद' ब्लॉग पर हमारी पेशकश 


यह तब की बात है जब आकाश को भी धरती वालों ने बाँट लिया था। आकाश शून्य है परंतु जब सब बाँटा जा चुका तो शून्य को कैसे बख्श दिया जाता। शून्य आकाश का यह खण्ड काले चोरों के देश के ऊपर पड़ता था। रात घुप्प अंधेरी थी। चमगादड़ों का शासन काल चल रहा था। उनका समूह उड़ता तो उनके बड़े बड़े बाज़ू फड़फड़ाते। तब वे चारों ओर देखते। उन्हें बहुत गर्व होता। वे समझते कि उनके बाज़ूओं का साया फैला तो रात फैल गई। जब तक वे न चाहेंगे, सवेरा न होगा। हर तरफ़ पसरा हुआ अंधेरा देखकर वे विजय भाव से भर उठते। अंधेरा ही उनकी शक्ति थी। स्याह रात में उनकी चीख़ें बड़ी भयानक मालूम होती थीं। किसी झोंपड़ी से सबके भले के लिए दुआ की कोई आवाज़ उठती तो वह भी उनके मकरूह शोर में दब सी जाती थी। धीरे धीरे पौ फटने लगी तो चमगादड़ एक एक करके उस पेड़ पर आकर ख़ुद ही उल्टे लटक गए, जिस पर प्रेत उल्टे लटके रहते थे। इस पेड़ की जड़ें गहरी, तना मोटा और पत्ता बहुत हल्का होता है। इसकी विशाल भुजाओं को देखकर किसी ने इसे परमेश्वर घोषित कर दिया। यह पेड़ वहाँ खड़ा था जहाँ आदमी को पड़ा हुआ लाया जाता है।
यह काले चोरों का देश है। हर तरफ़ से इसे लूटने के लिए इतने टाइप के चोर लुटेरे आए कि मूल निवासी लुट पिटकर कहीं जंगलों में जा चढ़े और नगरों में वही चोर लुटेरे बस गए। चोरों के इस देश में पुलिस भी है। लोग कहते हैं कि पुलिस वाले भी जिनमें से आते हैं, उन्हीं के लिए काम करते हैं और उन्हीं जैसे काम करते हैं। जो उनमें से नहीं थे, उन्हें पुलिस में आने से रोक दिया जाता है। कम ही सही, उनमें कोई फिर भी आ जाता है। वह अकेला ही इन सबको दौड़ा लेता है।
इस रात भी काले चोरों की एक लाल टोली को मासूम लोगों की टोह में देखा तो ऐसे ही किसी सिपाही ने उन्हें ललकारा। उन्होंने दुम दबाकर भागना चाहा तो उन्हें अपनी दुम भी न मिली। उनकी दुम किसी ने काट ली थी या बिना काटे ही जला दी थी। यह याद करने का असवर नहीं था सो उन्होंने कल्पना में ही अपनी दुम दबाई और हक़ीक़त में दौड़ लगा दी। ये भी उसी पेड़ के नीचे आकर रूके। जिसका नाम न लो तो भावनाएं आहत नहीं होतीं। चोरों की भी भावनाएं होती हैं। आखि़र चोरी भी एक कला है। कलाकार बड़े संवेदनशील होते हैं। कुछ अलग ही सही लेकिन इनकी भी संस्कृति होती है। इनका भी समाज होता है। इनका भी विचार होता है।
कुछ साँस आया तो इन चोरों में से जिसका रंग काला नहीं था, वह बोला-‘यह सिपाही अपने आप को हमसे श्रेष्ठ क्यों समझता है?‘
‘इसके संस्कार विदेशी जो ठहरे।‘-उनमें से दूसरे ने जवाब दिया। इसका रंग भी काला नहीं था।
‘हमने हरेक संस्कृति को पचा लिया तो इसकी बिरादरी बच कैसे गई?‘-तीसरे ने आश्चर्य जताया। इसका रंग भी काला नहीं था।
‘इसका हल क्या है?‘-किसी ने पूछा। उसका रंग गेहुंआ था।
‘जो पच जाए, उसे अपना लो और जो बच जाए, उसे बदनाम कर दो।‘-किसी ने कहा। इसका रंग गेहुंआ था और माथा भी चौड़ा था।
‘क्या आरोप लगाएं और क्या लोग विश्वास करेंगे?‘-पूछने वाले की नाक सवालिया निशान की तरह खड़ी थी।
‘विश्वास न भी करें तो संदेह तो करेंगे न। इतना भी बहुत है।‘-सबसे पीछे वाले ने समर्थन किया। उसका रंग और नाक नक्शा भी इन्हीं जैसा था।
यह निश्चय होते ही उस बूढ़े पेड़ पर लटके हुए प्रेतों के पाप का बोझ थोड़ा और बढ़ गया। सत्य को संदिग्ध बनाने की शुरूआत करने वाले वही थे। ये चोर उन्हीं की कूटनीति पर चल रहे थे। सहसा आकाश में कड़कती हुई बिजली प्रेतों के सूक्ष्म शरीर को छूकर लौट गई तो प्रेतों की चीख़ें निकल गई। जिस प्रकृति को वे जीवन भर पूजते रहे, अब वही उन्हें यातना दे रही थी। हवा के बगूले में धूल का बवंडर उठा तो एक पुराने प्रेत ने अपनी इच्छा शक्ति से उस धूल को अपने प्रेत शरीर के चारों ओर इकठ्ठा कर लिया। अब वह धुंधला सा दिख सकता था। आदमी मर जाता है लेकिन उसकी इच्छा नहीं मरती। मनुष्य की शक्ति उसकी इच्छा में निहित है। अच्छी इच्छा वाला यहाँ नहीं लटकाया जाता।
दूसरे प्रेतों ने भी यही किया तो वे भी धुंधले धुंधले से नज़र आने लगे। विशाल वृक्ष पर ये प्रेत उसके पत्तों से भी कई गुना ज़्यादा थे। वे सब प्रेत नज़र आए तो चोरों की चीख़ें निकल गईं। दुम पहले ही नहीं थी और अब दम भी निकलता सा लग रहा था।
‘तुम कौ..कौ...कौन हो?‘-चौड़े माथे वाले ने हकलाते हुए पूछा।
‘हम तुम्हारे पितर हैं।‘-प्रेत ने कहा।
‘हमारे पितर तो पितृ लोक में हैं। तुम कौन हो?‘-खड़ी नाक वाले ने अपनी नाक जैसा सवाल किया।
‘सब एक ही जगह हैं लेकिन आयाम और आवृत्ति भिन्न होने से लोक का नाम बदल जाता है। शरीर हो तो मृत्युलोक है और शरीर न हो तो वही जगह प्रेत लोक हो जाती है। संबंध के आधार पर नामकरण किया जाए तो पितृ लोक कहलाता है।‘-पुराने प्रेत के निराकरण से लगा कि वह अपने जीवन में दार्शनिक रहा होगा। इतने घोर कष्ट में भी उसकी मुद्रा गंभीर थी।
काले चोरों ने देखा तो उनमें कोई ‘हृदय सम्राट‘ था और कोई उससे भी बड़ा। सभी चेहरों से वे परिचित थे।
‘हम तो समझ रहे थे कि हमारे पितरों की मुक्ति हो गई होगी।‘-सहसा दो चोर एक साथ बोले।
‘बेटा, हमारी मुक्ति तुम्हारे समझने से नहीं हो सकती, हमारे समझने से हो सकती थी।‘-प्राचीन प्रेत बोला।
‘आप क्या नहीं समझे?‘-किसी ने पूछा।
‘यही कि जो जिस को पूजता है, वह उसी को प्राप्त होता है। हम इस पेड़ को पूजते थे। इस पेड़ को प्राप्त हो गए। हमने परमेश्वर को पूजा होता तो हम उसे प्राप्त होते।‘-प्राचीन प्रेत ने कहा।
‘हम तो परमेश्वर का ही नाम लेते हैं जी।‘-एक चोर इत्मीनान से बोला।
‘केवल नाम से काम नहीं होता। उसका कहा माना जाए तभी कल्याण होता है।‘-इस बार प्राचीन प्रेत के साइड में लटका हुआ प्रेत बोला। शायद वह कोई राजनीतिक लीडर रहा होगा।
‘यही बात वह सिपाही कहता है?‘-चोरों में से जाने कौन बोला।
‘सिपाही सच कहता है। वह सच का सिपाही है।‘-सब प्रेतों ने समवेत स्वर में गवाही दी तो धूल का बवंडर पेड़ के पत्तों से टकराकर अजीब सा शोर करने लगा। प्रेतों को इस गवाही के बाद लगा कि उनके मन से बड़ा बोझ उतर गया।
‘...परंतु वह विदेशी भाषा में कहता है। विदेशी भाषा को कैसे अपनाएं?‘-एक ने कहा।
‘तेरी आत्मा देशी है या विदेशी?‘-प्रेत ने यक्ष की भांति सवाल किया।
‘क्या मतलब?‘-चोर ने हैरत जताई।
‘आत्मा इस देश की माटी पानी से नहीं उपजी तो क्या उसे त्याग दोगे?‘-प्रेत ने पूछा।
‘नहीं, कभी नहीं। आत्मा चाहे देशी न हो परंतु वह हमारी अपनी तो है।‘-चोर ने जवाब दिया।
‘सत्य भी तुम्हारा अपना ही है। वह जिस तीर्थ को मानता है। वह तक तुम्हारा अपना है। यह बात वे भी जानते हैं, जो कुछ नहीं जानते।‘-प्रेत ने पुरानी बात याद दिलाई।
‘सत्य क्या है?‘-
‘जो परिधि से पृथ्वी के केन्द्र तक मान्य है। वही सत्य है। जो सनातन काल से आधुनिक काल तक चला आ रहा है। वही सत्य है। सत्य अजर है। उसमें कुछ बढ़ता नहीं है। सत्य अक्षर है। उसमें से कुछ घटता नहीं है। सत्य एक है। एक सत्य है।‘-प्रेत ने सत्य के लक्षण बताए।
‘...और जो उसके विपरीत विचार है, उसका क्या करें?‘-
‘सत्य को मान लोगे तो उसके विपरीत विचार तुम्हारे लिए नहीं रह जाएंगे। वे बाद की उपज हैं। वे पहले नहीं थे और बाद में भी नहीं रहेंगे।‘-प्रेत ने समस्या का समाधान कर दिया।
‘आपको यह सब ज्ञान किसने दिया?‘-चौड़े माथे वाले ने अपने माथे पर बल डालते हुए कहा।
‘हमारे पितरों ने।‘-प्रेत ने कहा।
‘क्या वे भी तुम्हारे साथ इसी पेड़ पर हैं?‘-यह बेवक़ूफ़ी भरा सवाल उस चोर ने किया, जिसका रंग काला ही था और उसके पूर्वजों के कानों में पिघलाकर कुछ डाला जाता था। यह सब जानकर भी आजकल वह उनके साथ हिला-मिला रहता था, जिन्होंने उसके बाप दादाओं पर सदियों तक भयानक अहसान किये थे। डीएनए की गुणवत्ता सुधरने में समय लगता है। हीन भावना और लालच से जल्दी पीछा नहीं छूटता।
‘नहीं, हमारे पितर यहां नहीं हैं। वे परम पद के अधिकारी थे। वे उच्च लोक को सिधार चुके हैं।‘-प्रेत ने थोड़ा गर्वित भाव से बताया।
‘तुम्हारे कल्याण के लिए हम क्या कर सकते हैं?‘-खड़ी नाक वाले ने अहम सवाल पूछा।
‘हमारी शिक्षा पर चलना छोड़ दो और हमारे पितरों के ज्ञान का अनुसरण करो।‘-प्रेत ने विनती के स्वर में कहा तो सभी प्रेतों ने हां, हां का स्वर उत्पन्न किया।
‘तुम्हारा कल्याण होगा तो हमारा कल्याण स्वयं हो जाएगा। संतान के शुभ कर्म उसके पितरों के खाते में भी लिखे जाते हैं।‘-प्रेत ने अंतिम सूत्र बताया और इसके बाद हवा अपने साथ सारी धूल लेकर एक तरफ़ को निकल गई। वहां अब कोई दिखाई न देता था। काले चोर विचार करने के लिए उसी पेड़ के नीचे बैठ गए। उन्हें सत्य का बोध हो चुका था। उनके सामने अब यह मुश्किल थी कि वे अपने जाति बंधुओं को कैसे बताएं कि आदि मूल सत्य क्या था, जिसका पालन पितरों के पितर करते थे ?
पीछा करते करते सिपाही भी पेड़ तक आ पहुंचा था। उन्हें अब सिपाही से बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था। वे जान गए थे कि सिपाही की श्रेष्ठता उस सत्य में निहित है। जिसे वह मानता है। उगते हुए सूरज में उन्होंने पहचान लिया कि यह उनका अपना ही भाई है। बस मान्यता का अंतर था। सो, आज वह भी बाक़ी न था। आज सदियों के बिछुड़े दो भाई गले मिलने वाले थे।
काले चोर, काले तो पहले ही न थे और आज वे चोर भी न रह गए थे। उन्होंने परम पद पाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। वे सभी श्रेष्ठ हो चले थे। काले रंग वाला भी उनके अनुसरण के लिए तैयार था। जिस मार्ग पर महाजन चलते हैं, छोटे उसी पर चलने में गर्व का अनुभव करते हैं। यह स्वाभाविक ही है।
इस पोस्ट में व्यक्त विचार ब्लॉगर के अपने विचार है। यदि आपको इस पोस्ट में कही गई किसी भी बात पर आपत्ति हो तो कृपया यहाँ क्लिक करें|
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PKS
April 03,2013 at 06:20 PM IST
जमाल साहब सिपाही खुद को सिपाही मानने को तैय्यार नहीं..
जो टॉर्च उन्हें डी गयी थी दूसरों को रास्ता क्या बताते खुद ही उससे प्रकाशित हो रास्ता ढूंढ़ना भूल गये...
उधर काले गेहुएँ लबादे ओढ़े चोरों से व्यवहार करने वाले लोगों के देश में वक्त की धूल और पुरानी सी लालटेन की मद्धिम रोशनी ने उन्हें अपनी मूल और वास्तविक चीज़ों से ज़ुदा कर दिया हज़ारों सालों के समय ने अपने से 1 फुट दूर की चीज़ को ही अपना मानने की मज़बूरी काले लबादे की तरह ओढ़ा दी..
जो सुबह उन चारों को और सिपाही को नसीब हुई यहाँ तो दूर तक उसके निशानात नज़र नहीं आते...
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PKS
April 02,2013 at 04:17 PM IST
जमाल भई क्या यह आपने ही लिखा है?
मेरा मतलब इसका स्त्रोत?
आपका यह लेख आपको लेखकों की अग्रणी पंक्ति में खड़ा करता है...
मेरी दावत आपको और लिखने की और पुस्तक प्रकाशित करने की.....
जवाब दें
(PKS को जवाब )- डा. अनवर जमाल
April 02,2013 at 05:09 PM IST
शुक्रिया जनाब.
इसे हमने ही लिखा है.
हालात आपके सामने ही हैं.
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कोई तो है...


मुझे परेशां करने का
हर रोज वो रास्ता ढूँढ लेते हैं।
मैं छुप जाता हूँ अंधेरों में अक्सर,
फिर भी जाने किससे
वो मेरा पता पूछ लेते हैं।

कभी उनकी आवाज मुझे सताया करती थी,
आज ख़ामोशी से अपनी,
वो मेरा सीना चीर लेते हैं।

मैं कुछ भी नहीं बिन तेरे
इस जहां में माही !
फिर भी
"कोई तो है"....
ये कह के वो मुझसे मेरा
वजूद भी छीन लेते हैं ...

- महेश बारमाटे "माही"


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:                                   Distribution of    Saris at Old Age Home Ranchi : The team of Parasmani Foundation a Social Organiz...
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प्रशन ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया ?

पिछले कुछ वर्ष मे भारतीय समाज में आए खुलेपन, मीडिया और फिल्मों के प्रभाव के कारण युवाओं विशेषकर किशोरों मे सेक्स की प्रवृत्ति बढ़ी है.......बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 15 से 24 साल की उम्र में प्यार करने वाले लड़के-लड़कियों में से 42 फीसदी लड़कों और 26 फीसदी लड़कियों ने अपने साथी के साथ सेक्स किया होता है........आज इंटरनेट और टीवी चैनलों के कारण युवाओं को सेक्स के बारे में जानकारियां पहले की अपेक्षा ज्यादा आसानी से मिल रही हैं. यही वजह है कि 18 की उम्र के पहले ही युवाओं में सेक्स का चलन बढ़ा है........सरकार का मानना है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है........पर प्रशन ये है की सहमति से सेक्स की उम्र कम करने का मकसद यौन अपराधों पर लगाम लगाना है तो शादी/विवाह की उम्र को ही क्यों ना कम किया गया......विवाह पूर्व सेक्स की मान्यता देना कहाँ की बुद्धिमता है......जब विवाह पूर्व सेक्स जायज कर दिए आप ने तो ये भी बता दीजिए के इस जायज सेक्स के बाद जन्मे नाजायज का क्या होगा......??
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Baawri Piya Ki - Sonu Nigam - Baabul

Song: Baawri piya ki
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Movie: Baabul
Year: 2006
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पाकिस्तान में ईसाईयों के घर क्यों जला दिए ?

पाकिस्तान के लाहौर में कथित ईशनिंदा के आरोप में लोगों ने ईसाईयों की कॉलोनी पर हमला बोल दिया। हमलावरों ने इनके घरों में जमकर तोड़फोड़ की और घर जला दिए। इसके विरोध में ईसाई समुदाय के लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया। तस्वीरों में देखते हैं कैसे घरों पर हुआ हमला और कैसे छलका ईसाईयों का दर्द। अपना घर जलाए जाने के बाद महिलाएं यहां पहुंची और रो पड़ीं।
इस घटना के विरोध में इसाई समुदाय के लोगों ने लाहौर में विरोध-प्रदर्शन किया। पुलिस ने दो हमलावरों को गिरफ्तार भी किया।

दीन की जानकारी न होने या उसकी जानकारी ग़लत होने से ही ज़ुल्म वुजूद में आता है। इसलाम का अर्थ है शांति। मुसलिम वह है जिसके अमल से शांति क़ायम हो और वह बनी रहे। मुसलिम बनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। दूसरों को उनका हक़ देना पड़ता है लेकिन राजनीति इसके खि़लाफ़ चलती है।  
क़त्ल और ख़ून ख़राबा शैतानी अमल है। किसी समुदाय की बात पर मुसलमानों को ऐतराज़ हो तो वे सिर्फ़ हाकिमों से शिकायत कर सकते हैं। उन्हें किसी के घर जलाने का कोई हक़ नहीं है। मुसलमानों को कुछ भी करने से पहले यह ज़रूर देखना चाहिए कि इस मामले में अल्लाह का हुक्म और उसके नबी स. का तरीक़ा क्या है ?
इसलामी हुकूमत में अगर किसी ग़ैर मुस्लिम ज़िम्मी (जिसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा सरकार पर हो) को सताया जाता है तो पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. ने फ़रमाया है कि
 ‘‘जिसने किसी मुआहिद (यानी ज़िम्मी) का क़त्ल किया वह जन्नत की ख़ुशबू तक न सूंघ सकेगा।’’
ज़ालिम मुसलमानों को अपने अंजाम से डराने के लिए यह हदीस काफ़ी है। 
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इरादा मज़बूत हो तो औरत को ख़ुशहाली मयस्सर आ सकती है Mahila Diwas

दुनिया सलामत है। दीन भी सलामत है। दीन धर्म से अलग हटकर रास्ते बनाने वाले भी अपने अपने काम कर रहे हैं। 8 मार्च का दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के तौर पर मनाया जाता है। किसी के लिए साल में एक दिन मुक़र्रर करने का मतलब होता है, पूरे साल में हमने उसके प्रति जो किया है, उसका हिसाब किताब लगाना और अपना गुण दोष जांचना। आज हम देख रहे हैं कि औरत पिछले साल जहां थी, कुछ मैदानों में उससे आगे बढ़ी है तो सेहत और हिफ़ाज़त के मैदानों में उसे चोट खानी पड़ी है। उसे ख़रीदा और बेचा भी गया, उसका जबरन अपहरण भी किया गया, उसे उसकी पसंद के युवक से शादी करने के एवज़ में क़त्ल भी किया गया और अपने मां-बाप की इज़्ज़त की ख़ातिर निगाहें झुका कर चलने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया गया। औरत की आबरू को बुरी तरह तार तार किया गया। छोटी छोटी बच्चियों को दरिंदों ने अपनी हवस का निशाना बनाया।
दीन धर्म को मानने वालों के रहते हुए यह सब हुआ। आधुनिक बुद्धिजीवियों की सतर्क निगरानी के बावजूद यह सब हुआ। अगले साल जब यह दिन आएगा, तब भी हम यही सब कह रहे होंगे।
यह सब नहीं होना चाहिए।
आदमी ठान ले तो यह सब नहीं हो सकता। आदमी पहाड़ को काटकर मैदान बना सकता है। आदमी पहाड़ पर ट्रेन चला सकता है। आदमी चांद को छू सकता है और वह मंगल को खोदकर ज़मीन पर ला सकता है। अगर यही आदमी चाहे तो वह अपनी मां, बहन और बेटियों को हिफ़ाज़त और इज़्ज़त भी दे सकता है।
अगर आज औरत को यह सब मयस्सर नहीं है तो यह हमारे इरादे की कमज़ोरी का सुबूत है।
किसी शायर ने कहा भी है -
कहिये तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएं
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

कितना अच्छा हो, अगर साल 2013 में यह नज़ारा देखने को मिले कि परंपरागत और आधुनिक समाज में यह होड़ लगे कि देखें कौन औरत को हिफ़ाज़त और सम्मान देने में दूसरे को पछाड़ता है ?
मज़बूत इरादे और सकारात्मक प्रतियोगिता के ज़रिये हम औरतों को वह सब दे सकते हैं, जो उनका वाजिब हक़ है।
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आखिर कानून के राज का वो परिन्दा है कहां ?

कहीं आंसुओं में ना बह जाये सपनों का महल!

उत्तर प्रदेश में गुण्डाराज सभी न्यूज चैनलों पर यही खबर प्रमुखता से चल रही है! तमाम बहस, बयान आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सूप-चलनी तक का नेता मिशाल देते फिर रहे हैं। सपा के एक बड़े नेता ने तो यू0पी0 में बिगडते कानून व्यवस्था के लिए विरोधी दलों पर ठिकरा फोड डाला। यू0पी0 के कुण्डा में पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी  सी0 0 जियाउल हक की हत्या कर दी जाती है। उसके साथ गये हमराही उसे मरता छोड भाग जाते हैं। हत्या के साजिश का आरोप प्रदेश सरकार के एक बाहुबली मंत्री पर लगता है। मंत्री जी हत्या के तीसरे दिन बडी ईमानदरी से अपना इस्तीफा प्रदेश सरकार के मुखिया को सौंपते है, सदन में अपने उपर लगे आरोपों पर सफाई देते हैं। उसके बाद मीडिया से मुखातिब होते हैं... सी0 0 से अच्छे सम्बंध होने का हवाला देते हैं, साथ ही कहते हैं अगर हत्या की नौबत आती तो मैं सरकार में था तबादला नहीं करा देता! एक तरफ तो सरकार के मुखिया बेहतर कानून व्यवस्था की बात करते हैं और कहते हैं कानून के नजर में सब बराबर है चाहे वह मंत्री, विधायक हो या आम आदमी, दूसरी तरफ उन्ही के सरकार का बाहुबली मंत्री मीडिया में कहता है कि दिक्कत होती तो तबादला नहीं करा देता! अब यहां सवाल खड़ा होना लाजमी है कि दिक्कत होने या कोई नौबत आने पर तबादला करवा दिया जाता! तो इसके क्या मायने हो सकते हैं? इसके तो यही मायने निकाला जा सकता है कि ईमानदारी से काम करना, जिससे किसी शासित दल के नेता, मंत्री या विधायक पर अंगुली उठे। या तो उसे मोड दिया जाए या तोड दिया जाए!
 

बात यहीं खत्म नहीं होती है सी0 0 के हत्या का एफ. आई. आर. तब दर्ज होता है जब उसके पत्नी के द्वारा शव लेने से इंकार कर दिया जाता है! पुलिस महकमा के लिए इससे बड़ी शर्मिंदगी की क्या बात हो सकती है कि उसके एक जांबाज ईमानदार अधिकारी की हत्या होती है और उसके हत्या का मामला तब दर्ज होता है जब उसकी पत्नी द्वारा शव लेने से इंकार कर दिया जाता है! बावजूद इसके प्रदेश के मुखिया प्रदेश में कानून का राज होने का दंभ भरते हैं। आखिर कानून के राज का वो परिन्दा है कहां? जिसके होने का दावा बारहा प्रदेश के मुखिया द्वारा किया जा रहा है? अगर सपा के तकरीबन साल भर के राज में कानून व्यवस्था पर गौर फरमाया जाए तो बकौल सी0एम0 वो भी सदन में भारतीय जनता पार्टी के सतीश महाना और पीस पार्टी के मोहम्मद अयूब और एक अन्य सदस्य लोकेन्द्र सिंह के सवाल के लिखित जवाब में कहा कि पिछले साल मार्च से दिसंबर 2012 तक राज्य मे 27 साम्प्रदायिक दंगे हुए। सी0एम0 ने पिछले 15 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह चन्द रोज बाद अपनी सरकार का पहला साल पूरा करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मथुरा, बरेली और फैजाबाद में बड़े दंगे हुए। बरेली और फैजाबाद में धार्मिक असहिष्णुता के कारण और मथुरा में विविध कारणों से दंगे हुए। 
अब सवाल ये खड़ा होता है कि इन सभी हंगामा खेज हालात के बावजूद किस कानून व्यवस्था के राज ही बात की जा रही है? सी0एम0 साहब को पता होना चाहिए कि सरकार में जब तक आपराधि प्रवित्ती के लोग रहेंगे तब तक कानून व्यवस्था की बात करना बेमानी होगा! आप खुद देख सकते हैं कि किस तरफ पशु तस्कर का स्टिंग आपरेशन करने पर एक एस0 पी0 को पैदल कर दिया जाता है, सी0एम0ओ0 का अपहरण करने के आपरोप से बरी कर फिर एक आपराधिक चरित्र वाले नेता को मंत्री का ताज पहनाया जाता है! आखिर क्या जरूरत आन पड़ी है कि आपराधि छवि के लोगों को मंत्रीमण्डल में शामिल किया जाए? सी0एम0 साहब प्रदेश की जनता ने आपको बहुमत बड़े आस व उम्मीद से दिया है। ताकि उसके हर कदम पर आपकी सरकार साथ खड़ी दिखाई दे। वर्ना अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है बसपा को सकार से बेदखल किए हुए जनता को। आखिर इस लचर कानून व्यवस्था के बल पर किस मुंह से आप दिल्ली जाने का समर्थन हासिल कीजिएगा? आपके शासन का यह रवैया कहीं नेता जी के सपनों को ना तोड़ दे? वही सपना जो दिल्ली का है, पी0एम0 का!
-एम. अफसर खां सागर
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