सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कहना ग़लत है samradayik danga

मनुष्य सुख और सफलता चाहता है। यह उसके अंदर की एक नेचुरल डिमांड है। इस डिमांड को पूरा करने का एकमात्र मार्ग यह है कि वह अनुशासन के साथ अपनी योग्यता और अपनी क्षमता के अनुसार अपने कर्तव्य को पूरा करे। इसी का नाम धर्म है। धर्म से ही कल्याण है।
धर्म एक है लेकिन एक धर्म के हरेक भाषा में अलग अलग नाम हैं। मनुष्य के लिए धर्म का निर्धारण वही कर सकता है जिसने उसे पैदा किया है और धर्म का निर्धारण उसी ने किया भी है। मनुष्य ने अपने रचयिता को कभी भुलाया नहीं है। उसने उसे हर ज़माने में और हरेक भाषा में बहुत से सुंदर नामों के साथ हमेशा याद रखा है।
धर्म के पालन का मतलब केवल पूजा-पाठ या तीर्थ पर घूमना मात्र ही नहीं है। धर्म का मतलब यह भी नहीं है कि कष्ट के समय अपने पालनहार से प्रार्थना कर ली जाए। धर्म के पालन का मतलब है जीवन के हरेक पहलू में अपने क्रिएटर की गाइडेंस में चलना। परिवार, समाज, बिज़नेस से लेकर राजनीति तक हरेक पहलू में सही और संतुलित रहने के लिए उस पालनहार के दिव्य मार्गदर्शन में चलना ज़रूरी है। जब तक मनुष्य ऐसा करता रहता है। तब तक वह भटकता नहीं है और न ही वह किसी दुराचारी शैतान को अपना गुरू या नेता मानता है। इसके लिए मनुष्य को सजग रहना पड़ता है, जागरूक रहना पड़ता है। जागरण की हक़ीक़त यही है। रातों को जागने का मक़सद एकान्त में चिंतन करना है। समूह के साथ रात को जागने का मक़सद अपनी नॉलिज को शेयर करना है। आज धर्म जितने नामों से जाना जाता है, उन सबमें ईश्वर की आज्ञा मानने और रात को जागने का ज़िक्र ज़रूर मिलेगा। यह धर्म का मूल लक्षण है। धर्म का पालन करने वाले परोपकारियों में यह मूल लक्षण ज़रूर मिलेगा।
आदरणीय विश्वामित्र जी के दिल में गायत्री मंत्र का स्फुरण हुआ तो उसके पीछे यह मूल लक्षण आपको मिलेगा। विश्वामित्र पृथ्वी की नाभि पर बने तीर्थराज आदि पुष्कर तीर्थ की पवित्र भूमि पर ब्रह्मा जी के निर्देशन में भूः भुवः और स्वः अर्थात भूमि, अंतरिक्ष और स्वर्ग में चिंतन कर रहे थे। चिंतन करने के लिए रात की तन्हाई सबसे अच्छी होती है, ख़ासकर आख़री तिहाई रात। इसमें शोर मचाने वाले लोगों की भीड़ सोई पड़ी होती है और ज़िन्दगी की हक़ीक़त का राज़ जानने वाले जाग रहे होते हैं। इसी पहर में ब्रह्म मुहूर्त आता है। हज़ारों बरस की इबादत के बाद भी जो फल न मिले, इसमें कभी कभी उससे बड़ा फल देने वाला ज्ञान मिल जाता है। वह ज्ञान विश्वामित्र को मिला भी है और फिर वह ज्ञान उनसे चलते हुए हम तक आया है। उस ज्ञान को आज भी वही समझते हैं जो रातों को जागकर चिंतन करते हैं। जो लोग ऐसा नहीं करते। उनकी बुद्धियां सोई पड़ी रहती हैं। उन्हें कोई जगाए तो उन्हें बुरा लगता है। कोई उनसे ज़्यादा आग्रह करे तो ये जगाने वाले से ही लड़ने लगते हैं, उसकी मज़ाक़ उड़ाते हैं। इससे भी आगे बढ़कर ये उसके धर्म और ईश्वर को भी बुरा कहने लगते हैं। जबकि उनका भी धर्म और ईश्वर वही होता है लेकिन वे जानते नहीं हैं।
जगाने वाले जानते हैं कि जब ये जाग जाएंगे तो इनका व्यवहार नॉर्मल हो जाएगा। जागना धर्म है तो जगाना भी धर्म है। दया, धैर्य और अपने जज़्बात पर क़ाबू रखना भी धर्म के लक्षण हैं। दूसरों को जगाने का काम वही करते हैं। जिनमें ये गुण होते हैं। दूसरों को जगाना भी ईश्वर की आज्ञा का पालन करना है। इसके पीछे सब इनसानों से प्यार की भावना काम करती है।
सबको सुख मिले और सभी सफल हों। धार्मिक मनुष्य इस मक़सद के लिए काम करता है। नास्तिक, पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक लोग केवल अपने सुख और अपनी सफलता के लिए काम करते हैं। ये केवल अपने लिए सामाने ऐश जुटाते रहते हैं जबकि धार्मिक लोग अपना कमाया माल दूसरों की भलाई में लुटाते रहते हैं।
नास्तिक तो अपने कर्मों से अलग पहचाने ही जाते हैं लेकिन पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक मनुष्यों को देखकर सोई हुई बुद्धियों वाले उन्हें धार्मिक व्यक्ति समझ लेते हैं।
धार्मिक व्यक्तियों को पहचानने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि कौन अपने लिए जायज़ और नाजायज़ तरीक़ों से सामाने ऐश जुटा रहा है और कौन जायज़ तरीक़े से कमाया हुआ अपना माल दूसरों पर लुटा रहा है?

इस तरह धार्मिक व्यक्ति का स्वरूप हमारे सामने एक ऐसे आदमी के रूप में सामने आता है धरती और आकाश में चिंतन करता है। इस चिंतन से उसे जो ज्ञान मिलता है, उसे वह बांटता है। जो कुछ उसने कमाया होता है, उस दुनियावी सामान को भी वह लोगों में बांटता है। ख़ुद जागता है और दूसरों को जगाता है। इस काम के बदले वह उनसे कोई मेहनताना नहीं मांगता। इस परोपकार के बदले में लोग उसका दिल दुखाते हैं या उसे जो भी नुक्सान पहुंचाते हैं, उस पर वह धैर्य से काम लेता है। दया, धैर्य, क्षमा, ज्ञान, दान और परोपकार जैसे गुण केवल धार्मिक व्यक्ति में ही मिलते हैं। ईश्वर की आज्ञा का पालन ऐसे लोग ही करते हैं।
धार्मिक लोग कभी नकारात्मक चिंतन नहीं करते और न ही कोई ऐसा काम करते हैं जिससे निर्दोष लोग मारे जाएं। धार्मिक लोग कभी दंगा नहीं करते। दंगा सदैव पाखंडी और संकीर्ण सांप्रदायिक लोग करते हैं। सोई हुई बुद्धियों के लोग सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कह देते हैं। दंगा कभी धार्मिक नहीं होता। इसलिए धार्मिक लोग कभी दंगा नहीं करते।
अतः सिद्ध होता है कि सांप्रदायिक दंगों को धार्मिक दंगा कहना ग़लत है।
-----
इस लेख पर विचारोत्तेजक कमेंट्स पढ़ने के लिए क्लिक कीजिए-
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/sampradayik_dange
Read More...

कोउ होय नृप हमे का हानि ? Modi for P.M.

        भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र भाई मोदी जी के नाम पर मुहर लगा कर एक सही काम किया है। इससे अटकलों को विराम लग जाएगा। जो लोग मोदी जी के समर्थक हैं वे एकाग्र हो कर उनके समर्थन प्रचार कर पाएंगे और जो उनके विरोधी हैं, वे भी उनके विरोध में जो करना होगा, करना शुरू कर देंगे। भाजपा के इस क़दम से वृद्ध नेता एल. के. आडवाणी जी भी अपने लिए उपयुक्त भूमिका तय कर पाएंगे। भाजपा के इस क़दम से छोटों को बड़ा काम मिल गया और बड़े छोटे मोटे काम पर लग जाएंगे। 
       भाजपा आरएसएस का पॉलिटिकल विंग है और मोदी जी आरएसएस के चहेते हैं। उन्होंने गुजरात में जो कुछ किया है। वही आरएसएस एक लंबे अर्से से करना चाहता था और देश भर में भी वह ऐसा करना चाहता है। मोदी जी इसे विकास कहते हैं। अब मोदी जी इसी तर्ज़ पर पूरे देश का विकास करना चाहते हैं। जिन्हें उनके द्वारा किया गया विकास पसंद है वे उन्हें वोट देंगे। जिन्हें नहीं पसंद है वे उन्हें वोट नहीं देंगे।
       कोई उन्हें वोट दे या न दे लेकिन यह तय है कि मोदी जी का चेहरा सामने आते ही आरएसएस का पूरा परिचय सामने आ जाता है। बीजेपी का असली परिचय भी यही है। मोदी जी का चेहरा बीजेपी का असली चेहरा है। उन्हें देखकर कोई खुश हो जाता है और कोई डर जाता है। जो डर जाता है वह अपने बचाव के लिए हाथ पैर मारने लगता है। मोदी जी का डर उनके विरोधियों को अपने वुजूद और अपनी विचारधारा के बचाव के लिए सक्रिय कर देता है। जबकि ये लोग कथित धर्म निरपेक्ष पार्टी के राज में सोए और पड़े रहते हैं। इन्हें जगाने के लिए मोदी जी की ज़रूरत है जबकि मोदी जी का मक़सद इन्हें जगाना नहीं है। इस तरह मोदी जी अपने लोगों से ज़्यादा अपने विरोधियों के काम आ चुके हैं। आज उनके विरोधी जाग्रत हैं तो इसका एक श्रेय मोदी जी को भी है। चाहे नकारात्मक रूप से ही सही।
      जब कोई नरम चेहरा सामने हो तो लोग उस पर आसानी से सहमत हो जाते हैं और उस नरम चेहरे की आड़ में जिसे जो करना होता है। वह आसानी से कर लेता है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी का काल इसका उदाहरण है। अब भी अगर सुषमा स्वराज जैसी किसी लीडर को सामने रखा जाता और उनके साए में मोदी जी अपना चिर परिचित विकास कार्यक्रम चलाते तो वह ज़्यादा सफलतापूर्वक ऐसा कर पाते लेकिन जल्दबाज़ी में वह ख़ुद ही फ्रंट पर आ गए। भारतीय जनता प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी जी को नहीं स्वीकार कर पाई। ऐसे में वह उनसे भी कठोर छवि वाले दक्षिणपंथी नेता को स्वीकार कैसे कर पाएगी ?
     हम अपने लिए और अपने आरएसएस और बीजेपी के कार्यकर्ता भाईयों के लिए नेक हिदायत की दुआ करते हैं। हम मुसलमानों से कहना चाहेंगे कि वे भी इन सबके लिए दुआ किया करें। बहुत मुसलमान ऐसे हैं जो कि नमाज़ ही नहीं पढ़ते। वे अपने लिए ही भलाई की दुआ नहीं करते। ऐसे में वे दूसरों के लिए कैसे दुआ कर सकते हैं ? जो नमाज़ पढ़ते हैं वे भी अक्सर अपने लिए और मुसलमानों के लिए ही हिदायत और सलामती की दुआ करते हैं। दूसरों के लिए दुआ करने में भी मुसलमान पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत से हट गए हैं। ऐसे में दूसरों को सही ग़लत की पहचान कराने के अपने फ़र्ज़ को निभाने में वे और ज़्यादा लापरवाह हो गए हैं। मुसलमानों को सब औलादे आदम को उनके बाप का परिचय देना होगा। जैसे जैसे हम सब यह पहचान लेंगे कि हम सब एक मनु की औलाद हैं तो फिर दिलों से बहुत सी दूरियांख़त्म हो जाएंगी। आदम और स्वयंभू मनु एक ही शख्सियत के दो नाम हैं।
    बाप को याद रखेंगे तो भाई बहन सब एक हो जाएंगे। सबके बाप मनु का चरित्र दुनिया के सामने लाना भी एक बड़ा काम है और यह काम वे नहीं करते जो चुनाव लड़ते हैं। इसलिए यह काम हमें और आपको करना चाहिए। यह काम हो जाए तो हमारे देश के राजनेता हमें एक दूसरे नहीं लड़ा पाएंगे और न ही वे लड़ाना चाहेंगे।
लोकसभा 2014 के चुनाव में मोदी जी जीतें या फिर उनका विरोधी, जो भी जीते। उसका जीतना हम सब भारतवासियों के हक़ में शुभ हो। इसके लिए हमें यानि जनता को भी अच्छा बनना होगा। तभी हम अपने लिए अच्छा नेता चुन पाएंगे। 

इस पोस्ट पर कुछ कमेंट्स यहाँ देखें-
Read More...

वकीलों से सवाल

अगर गुनहगार का साथ देना भी गुनाह है तो गुनाह साबित हो जाने पर वकीलों को सजा देने का प्रावधान क्यों नहीं है, जो सबकुछ जानते हुए भी अपने मुवक्किल को बेगुनाह बताता है और गुनाह साबित हो जाने पर तरह तरह के बहाने बनाके सजा न देने की भीख माँगता है । अगर ये उनके प्रोफेशन का हिस्सा है तो ये कैसा प्रोफेशन है-चंद फीस के लिए गुनाह का साथ दो ?

क्या ज़मीर नाम की जो चीज़ होती है वो वकीलों के लिए नहीं है ? उनका दिल ये कैसे गवाही देता है कि सबकुछ जानते हुए भी वो अंतिम समय तक गुनहगार को बचाने का प्रयास करते रहते हैं ?

आप भी सोचे ? अपराध दिन ब दिन इतना बढ़ता क्यों जा रहा है क्योंकि कानून को लेके किसी के मन में कुछ भय नहीं है | सब सोचते हैं कि कुछ भी कर लो, अगर पकड़े गए तो पैसों के दम पे अच्छा से अच्छा वकील रख लो; वो कानून को तोड़-मरोड़ कर, झूठ को सही साबित करके बचा ही लेगा | अगर कुछ ऐसा प्रावधान हो जाए कि मुजरिम साबित हो जाने पर मुजरिम के साथ-साथ उसका केस लड़ रहे वकील को भी सजा मिलेगी तो डर से वकील जान कर गलत लोगों का केस लेना बंद कर देंगे और इस से अपराध करने वाले के मन में भी भय बैठ जाएगा और आधे से ज्यादा जुर्म ऐसे ही कम हो जाएंगे |


(संदर्भ-दिल्ली में गैंग रेप के आरोपियों का केस लड़ रहे वकील ने गुनाह साबित हो जाने के बाद भी मांग की है कि कम से कम सजा मिले)
Read More...

"बैन" (प्रतिबंध) के मायने

क्या हमारे देश में हर बात का उल्टा अर्थ होता है ? जहां लिखा हो "थूकना माना है" वहीं सबसे ज्यादा थूका जाता है | "यहाँ पेशाब करना माना है" यह लिखा हुआ भी प्रायः दिख जाता है, पर कोई पालन नहीं करता | हाँ, कुछ बुद्धिजीवी इसका हल निकाल लेते हैं | सीधे शब्दों में लिखने के बजाय ये लिख देते हैं -"देखो कुत्ता पेशाब कर रहा है" | और इसका असर भी होता है |

खैर, मेरे इस पोस्ट का केंद्र कई पदार्थों पर आए दिन लगने वाले "बैन या प्रतिबंध" है | आखिर इस बैन के मायने है क्या ? हमारे झारखण्ड में तंबाकू, गुटखा आदि अन्य तरह के तंबाकू उत्पादों पर बैन लगे एक वर्ष से ज्यादा का समय बीत चुका है पर वास्तविक तौर पे आज तक कहीं ये तथाकथित बैन दिखा नहीं | हाँ शुरू शुरू में कई जगह छापे मारे गए, इन उत्पादों को जप्त किया गया, जलाया गया, जुर्माना लगाया गया  | पर क्या इतना ही काफी था ? सरकार की ज़िम्मेदारी क्या बैन घोषित करके समाप्त हो गई ? आज हर चौक चौराहे पे ये "बैन्ड" चीज़ें खुलेआम बिक रही हैं | खुद कानून के पालक भी चाव से खाते देखे जा सकते हैं | इस बैन का इतना ही प्रभाव पड़ा कि इन उत्पादों के दाम तिगुने हो गए और इन बैन्ड पदार्थों का कारोबार तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ गया | जब बैन की आधिकारिक घोषणा हुई थी तब कई समाचार पत्र इसका क्रेडिट लेते दिखे | सबने यह दावा किया कि उनके रिपोर्ट या प्रयास के प्रभाव से ह यह हुआ | आज वो समाचार पत्र वाले भी इस विषय में कुछ भी छापने से झिझकते हैं | आखिर झिझकें भी क्यों न, शर्म आती होगी | वो तो उस चीज़ का क्रेडिट पहले ही ले चुके हैं जो आज तक हुआ ही नहीं है |

मिला-जुला कर यही बात सामने आती है कि ऊपर में जो मैंने हम भारतीयों के गुण की चर्चा की वो सेम है, और सबके लिए लागू है | चाहे सरकार हो, पुलिस-प्रशासन हो, बनाने वाले हो या खाने वाले हो | हर किसी को उल्टा अर्थ लेने का पूरा अधिकार है |
अतः इस "बैन" (प्रतिबंध) के मायने भी यही है कि ज्यादा बनाओ, ज्यादा खाओ, ज्यादा दाम बढ़ाओ, ज्यादा कमाओ |
Read More...

'इस्लाम' के बारे में श्री सर्वपल्लि राधाकृष्णन जी के विचार Teacher's day

कल टीचर्स डे था. हमारे बच्चे बहुत खुश थे कि आज स्कूल में पार्टी होगी. वे नमकीन, बिस्किट और ठंडे मशरूब (कोल्ड ड्रिंक्स) की बोतलें लेकर अपने स्कूल की तरफ चल दिये. आज उनके क़दम बड़े उत्साह से उठ रहे थे. वे स्कूल से लौटे तो उनके ग्रीटिंग कार्ड्स पर टीचर्स के दस्तख़त और दुआएँ दर्ज तीन. उनमें एक टीचर ने सर्वपल्लि राधाकृष्णन जी का नाम लिख कर बताया था कि वह 5 सितंबर 1888 को पैदा हुए थे इसलिये 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. वह 1962 से 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति भी रहे हैं. उन्हें भारत में एक आदर्श शिक्षक के रूप में देखा गया लेकिन उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गय है जबकि आज उनके विचारों की प्रासंगिकता पहले से ज़्यादा है. आज हिन्दुस्तान में 'हिन्दू धर्म और इस्लाम' का मुद्दा चर्चा का विषय है. इस विषय पर उनके विचार आज भी हमारे लिये मायने रखते हैं.
देखिये श्री दुलीचन्द्र जैन जी का लेख :
Introduction:
During an informal discussion at a meeting of the Jain Study Circle, a participant pointed out that all religions have essentially the same code of ethics. On hearing this, another participant remarked: what about Islam and forgiveness? This is similar to questioning the teaching of non-possessiveness (APARIGRAH) of the Jain religion by looking at the activities of Jain individuals and institutions. Siddhantacharya Pt. Phool Chandra Shastri has observed, (2) "The community of self-reliants (SHRAMAN SANGH) has discarded the concept of non-possessiveness (APARIGRAHA). ... If the self-reliant (SHRAMAN) monks and their disciples realize that promoting improper practices does not constitute religion and that religion involves discarding such practices, then it will be possible to reverse this trend."
Religious tolerance is rooted in the Jain concept of rationalism. However, the comment about Islam and forgiveness implies a total disregard for rationalism and tolerance.
Jain scriptures teach us to be pragmatic. SUTRAKRITAANG, the second earliest Jain scripture (second century B.C.), states: (3)
SAYAM SAYAM PASAMSAMTA, GARAHANTA PARAM VAYAM |
JE U TATTH VIYUSSANTI, SAMSAARAM TE VIYUSSIYA |
Those who praise their own faith, disparage their opponents', and possess malice against them will remain confined to the cycle of birth and death.
Rationalism entails rational perception, rational knowledge and rational conduct. Ascertaining reality through study and observation without any preconceived notions is rational perception. This is the way to acquire rational knowledge. Actions guided by rational perception and rational knowledge constitute rational conduct. We need to adopt such rational approach to discern the true spirit of any religion. In this context, it is important to remember the following:
"As is usual, a mantle of aberrations, myths and legends envelops the fundamental tenets of Jainism. For this reason, an individual has to look deep to get a glimpse of the pristine spirit of Jainism. Further, an individual has the liberty to select what conforms to his/her experience and common sense."(4)
Such insightful study will lead us to believe that the virtues taught by all religions are similar in essence. Dr. Radhakrishnan writes, (5) "When we take our stand on the 'experience' side of religion, we realize that the truly religious men of all faiths are nearer each other than they imagine."
We should adopt such approach to appraise the tenets of Islam and all other religions.
Teachings of Islam: (6)
Like all religions, Islam is a religion that emphasizes truth and virtuous conduct. Dr. Radhakrishnan states, (7) "With him (Mohammad), religion was an effort to know the truth and live it. ... Mohammad ... lays down no restrictions likely to keep enchained the conscience of advancing humanity." Dr. Radhakrishnan continues, (8) "The Prophet did not inculcate the subjection of human reason to blind authority. A religion which is so strictly limited by common sense on all sides cannot be made to support the inhuman practices of today." This concept is akin to the Jain concept of rationalism.
Islam, the religion founded by Prophet Mohammed, means submission to the will of God. It is a religion of self-surrender, acceptance of the revelations and following the commands of God. Islam establishes a universal brotherhood of man. Islam teaches that "No man is a true believer unless he desires for his brother that which he desires for himself. God will not be affectionate to that man who is not affectionate to God's creatures. He is the most favored of God from whom the greatest good comes to His creatures."
In Islam, abuse, anger, avarice, back-biting, blood-shedding, bribery, dishonesty, drinking, envy, flattery, greed, hypocrisy, lying, miserliness, pride, suicide, violence, wickedness, warfare, etc., are deprecated and virtues such as brotherhood, charity, cleanliness, chastity, forgiveness, friendship, gratitude, humility, justice, kindness, love, mercy, moderation, modesty, purity of heart, righteousness, truth and trust are enjoined. (9)
The Qur'an states: (10) Those who abstain from vanities and the indulgence of their passions, give alms, offer prayers, and tend well their trusts and their covenants, they shall be the heirs of eternal happiness.
Forced Conversions and Islam:
Dr. Radhakrishnan has stated, (11) "It is not possible for a thinker like Mohammad to advocate forced conversions. We cannot compel men to change their beliefs." The following Ayat from the Qur'an supports this fact:
"Let there be no compulsion in religion." (Surah II, Ayat 256)
Further, the following Surah CIX, entitled 'The Unbelievers' presents the crescendo of religious tolerance:
1. Say: O unbelievers!
2. I do not serve that which you serve,
3. Nor do you serve Him Whom I serve:
4. Nor am I going to serve that which you serve,
5. Nor are you going to serve Him Whom I serve:
6. You shall have your religion and I shall have my religion.
Forgiveness and Islam:
The Qur'an contains the following Ayats on forgiveness among others:
Take to forgiveness and enjoin good and turn aside from the ignorant.
(Surah VII, Ayat 199)
And those who shun the great sins and indecencies, and whenever they are angry they forgive.
And the recompense of evil is punishment like it, but whoever forgives and amends, he shall have his reward from Allah; surely He does not love the unjust.
And whoever is patient and forgiving, these most surely are actions due to courage.
(Surah XLII, Ayats 37, 40, 43)
One is responsible for one's deeds:
The following Ayat from the Qur'an emphasizes the fact that one is responsible for one's thoughts and actions:
Say: O people! indeed there has come to you the truth from your Lord, therefore whoever goes aright, he goes aright for the good of his own soul, and whoever goes astray, he goes astray only to the detriment of it, and I am not a custodian over you. (Surah X, Ayats 108)
Genuine Religious Tolerance:
Dr. Radhakrishnan summarizes, (12) "We must also learn to democratize our institutions and do away with the wrangling creeds, unintelligible dogmas and oppressive institutions under which the soul of man is literally crushed. Both Islam and Hinduism at their best teach that true religion is to serve God in truth and purity and obey His laws reverently in all the affairs of life."
We Jains should follow the advice of this great Indian thinker of modern times.
Footnotes:
1. For similar articles on Hinduism, Buddhism and Sikhism, please see
'Hinduism: In All Aspects' by Anisha Tandon, JSC, April 1983;
'An Introduction To Buddhism' by Dr. Chandrakant P. Shah, JSC, July 1996;
'A Religious Song Of Guru Nanak', JSC, April 1991;
'Some Aspects of Indian Religions and Philosophy' by Dr. Jagdish Chandra Jain, JSC, April 1999. Back up
2. Hindi exposition of TATTVAARTHA SUTRA, page 336. Back up
3. SUTRAKRITAANG, Book 1, lecture 1, chapter 2, verse 23. Back up
4. Jainism: An Introduction (Reality Based Ethics) by Duli Chandra Jain,included in "Religious Ethics: A Sourcebook", edited by Dr. Arthur B. Dobrin, published by Hindi Granth Karyalaya, Mumbai, 2004.Back up
5. Islam and Indian Thought, included in 'The Heart of Hindustan' by Dr. S. Radhakrishnan, published by G. A. Natesan & Co., Madras, 1945, page 57. Back up
6. Based on "Glimpses of World Religions" published by Jaico Publishing House, Bombay, 1983, pages 187-188. Back up
7. The Heart of Hindustan, page 56. Back up
8. The Heart of Hindustan, page 67. Back up
9. It is time for us, including those of us who boast of being progressive, enlightened and self-righteous, to examine our conduct in the light of these universal virtues that are common to all religions. Back up
10. The Qur'an, translated by M. H. Shakir, published by Tahrike Tarsile Qur'an, Inc., Elmhurst NY 2003, Surah XXIII, Ayats 8-11. Back up
11. The Heart of Hindustan, page 61. Back up
12. The Heart of Hindustan, page 72. Back up
Source: http://www.jainstudy.org/jsc7.05-islam.htm
हमें उम्मीद है कि हमारे पाठक उनसे ज़्रूर कुछ अच्छा सीखेंगे और उनकी परंपरा को आगे बढाएंगे.
Read More...

भाई को राखी बांधने पाकिस्तान से आई बहन -हरदा (मप्र), एजेंसी

भारत-पाक के बीच सीमा पर तनाव को लेकर भले ही खटास हो पर भाई का प्रेम एक बहन को पाक से हिन्दुस्तान ले आया जो अपने हिन्दू भाई को राखी बांधने हरदा आई है।
Image Loading
पाकिस्तान से 15 दिन के वीजा पर आई शाहिदा खलील ने अपने भाई पंकज बाफना को बुधवार को रक्षाबंधन के दिन राखी बांधी। राखी बांधते हुए शाहिदा की आंखे नम हो गयीं। पाक के कराची में रहने वाली शाहिदा खलील ने बताया कि हमारा परिवार मूलत: हरदा का रहने वाला है, लेकिन बाद में हम पाकिस्तान चले गये थे।
उन्होंने कहा कि हमारे परिवार के लोग आज भी हरदा में रहते हैं। मैं बचपन से पंकज बाफना को राखी बांधती थी। उसके बाद मेरा हिन्दुस्तान आना नहीं हुआ। शाहिदा ने बताया कि वह यहां आने के लिए वीजा मांगती थी, पर नहीं मिला। पांच वर्षों की मेहनत के बाद वीजा मिला, जिसके चलते वह तीन दिन पहले हरदा आयी। मेरी तमन्ना थी कि राखी पर मेरा हिन्दुस्तान जाना हो और मेरी तमन्ना पूरी हुई।
शाहिदा ने कहा कि आज वर्षों बाद मैंने भाई पंकज बाफना को राखी बांधी। मैं आज बहुत खुश हूं, अल्लाह से दुआ है मेरे भाई और उसके परिवार को खुश रखे तथा दोनों मुल्कों में अमन और भाईचारा रहे। पंकज बाफना ने राखी बंधवाते हुए कहा कि आज बचपन की याद ताजा हो गयी। वर्षों बाद मेरी बहन शाहिदा घर आई और उसने राखी बांधी, मुझे तोहफे में गणेश की प्रतिमा भी दी।
शाहिदा का मानना है कि भगवान गणेश हर दुखों को दूर करने वाले हैं। हमारे परिवार में सुख शांति रहे यही शाहिदा की दुआ है। पंकज बाफना की मां इन्दु बाला बाफना ने बताया कि आज का दिन मैं कभी नही भुला पाऊंगी। मेरे बेटे पंकज और बेटी शाहिदा का यह भाई-बहन का प्रेम समाज के लिए मिसाल है। ऐसा ही प्रेम दोनों देशों में बना रहना चाहिए।
Source: http://www.livehindustan.com/news/desh/mustread/article1-India-Pakistan-Sister-Rakshabandhan-332-332-356858.html
Read More...

देसी राखी से मनाएं रक्षा बन्धन Raksha Bandhan 2013

हम अपने सभी भाई बहनों को रक्षा बन्धन के मौक़े पर मुबारकबाद पेश करते हैं. आज हमारे बेटे ने हमें बताया कि उनके स्कूल में बच्चों ने राखी बनाई, एक्टीविटी के तौर पर. हमारे बेटे की बनाई राखी को उनकी क्लास के टीचर के अलावा दूसरी क्लास के टीचर्स ने भी सराहा. अपनी राखी बनाने में एक प्यार का ख़ास अहसास है लेकिन आजकल बाज़ार का चलन है और रिश्तों का अहसास ग़ायब सा हो चला है. लोग बाज़ार में जाकर यह भी नहीं देखते कि कौन सी राखी भारत में बनी है और कौन सी राखी चीन से आई है, जो हमारी सीमा पर क़ब्ज़ा किये बैठा है. ऐसे अवसरों पर सामूहिक रूप से चीनी माल का बहिष्कार किया जाये तो चीन कुछ दबाव महसूस करे. हमारा खयाल अच्छा लगे तो इस पर भी अमल करें.
बाज़ार हमारा है और वह चीनी राखियों से अटा पड़ा है. उन्हें वे दुकानदार बेच रहे हैं जो वंदे मातरम् कहते हैं और अक्सर दूसरों की देशभक्ति पर सवाल खड़े करते रहते हैं. ऐसे लोग देश का कोई भला नहीं कर सकते.
अपने बाज़ार से अपने देस का माल ही खरीदें.
देसी राखी से रक्षा बन्धन मनाएं.
बहन की रक्षा के साथ देश की रक्षा का फ़र्ज़ भी अदा करें.
Read More...

जंगे-आज़ादी के नायक अशफाक उल्ला खान


इंसान को अपनी बेहतरी के लिये खुद ही संघर्ष करना पड़ता है.
हरेक इंसान को जानना चाहिये कि उसके लिये क्या बेहतर है ?
आज़ादी की सालगिरह मुबारक.
देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे।अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह-तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहाकि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजादहोकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था,तुम लोग हिन्दू-मुसलमानो में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते।उनके इस जवाब से अंग्रेज दंग रह गये उन्होने कहा भारतमाँ अगर हिँदुओ की माँ है तो हम मुस्लमान भी इसी माँ के लाल है अब हिन्दुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा। 22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्लाखान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
अशफाक पर गांधी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। जो कि अशफाक के बचपन के मित्र थे । बिस्मिल औरचंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था। 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिडी,ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। एक-एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई।
अशफाक शाहजहांपुर छोड़कर बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिएबाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया।
साभार फेसबुक 
Read More...

शबे क़द्र और क़ुर्'आन के नुज़ूल (अवतरण) का मक़सद ramazan & zakat-Fitra

शीर्षक के अंतर्गत इस रात के बारे में कुछ जानकारी दी गयी है.
इस विषय पर कुछ वीडियो भी यू-ट्यूब पर उपलब्ध हैं. उनमें से एक यह है-
आज 29 वीं रात है. रमज़ान विदा हो रहा है. हमें अहद करना चाहिये कि हम साल भर बुराइयों से परहेज़ करेंगे और भलाईयों के कामों में सबका सहयोग करेंगे बल्कि दूसरे सब लोगों से आगे निकलने की कोशिश करेंगे. अगर ऐसा किया गया तो रमज़ान के रोज़ों का मक़सद हासिल हो गया ऐसा समझना चाहिये वर्ना रोज़े सिर्फ एक रस्म थे . मोमिन का अमल हक और हक़ीक़त होता है और दूसरों का सिर्फ दिखावा या भुलावा.
हम किसी भुलावे में न पड़ें और किसी का दिखावा हमें धोखे में न डाले. इसलिये हमेशा आप यह देखें कि इस रोज़े या नमाज़ के बाद आप अपने जानकारों और अजनबियों के लिये कितने ज़्यादा कल्याणकारी बन पाये. जो भी इबादत आप उसकी रूह और आत्मा के साथ संपन्न करेंगे वह आपको ईश्वर अल्लाह से जोड़ेगी और अल्लाह से जुड़ा होने की यह पहचान है कि वह खुद दुख उठाकार भी दूसरों के दुख दूर कर रहा होगा. यही अल्लाह का फरमान है. क़ुर्'आन में उसने यही कहा है. इस्लाम यही है. इंसान का रास्ता यही है. इंसानों को भलाई का यही रास्ता दिखाने के लिये शबे क़द्र में यह क़ुर्'आन नाज़िल किया गया है.
यह बात समझ में आ जाये तो लोगों के दुख बहुत कम हो जायेंगे.
 
अगर आप साहिबे निसाब हैं तो आप देख लें कि आपने ज़कात दे दी है या नहीं ?
ईद की नमाज़ को जाने से पहले गरीब और ज़रूरतमंदों को फ़ितरा ज़रूर दें . अगर आपके पड़ोस में कोई गरीब है , बीमार है या किसी भी तरह से ज़रूरतमंद है और आप उसके काम आ सकते हैं तो आप अपने जान , माल और वक़्त से उसके काम ज़रूर आयें चाहे उसका धर्म और उसकी जाति आपसे मुख़्तलिफ़ ही क्यों न हो .
आखिरकार सब एक खुदा के बंदे हैं और सब एक बाप 'आदम' की औलाद हैं. सब एक परिवार ही हैं. नफरत की कोई जायज़ वजह किसी के पास नहीं है.
सबकी भलाई के लिये अल्लाह से दुआ करें तो हमें भी याद रखें.
अल्लाह सबकी जायज़ मुराद पूरी करे , 
आमीन.
Read More...

Sahitya Surbhi: फैले मुहब्बत करो ये दुआ

Sahitya Surbhi: फैले मुहब्बत करो ये दुआ:                  दर्द देगी यहाँ साफगोई सदा                 सीख लो बात को तुम घुमाना जरा ।                          तुम गलत मानते, ब...
Read More...

खुशियां बांटने का अवसर है ईद -फ़िरोज़ बख्त अहमद

ईद वास्तव में एक तोहफा होता है, उन सभी के लिए, जिन्होंने 29 या 30 दिन लगातार रोजे रखे हैं। यही कारण है कि रमजा़न से ईद का बड़ा घनिष्ठ संबंध है। 
 
ईद की शुरुआत तो ईद से एक रोज पहले मगरिग की नमाज के बाद चांद देखने के साथ ही हो जाती है। ईद का यह चांद महीन होने के साथ-साथ थोड़ी ही देर के लिए दिखाई देता है। ईद का चांद देखते ही मुस्लिम लोग खुदा से अमन-शांति की दुआ करते हैं। 
    
ईद का अर्थ समझों तो अरबी में किसी भी चीज के बार-बार आने को ‘ऊद’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि  जिसने रोजे रखे हैं, उसके लिए ईद बार-बार आएगी। इस पर्व का नाम ईद उल फितर क्यों पड़ा? 
ईद के दिन ईद की नमाज से पूर्व सभी मुसलमान फितरा अदा करते हैं। फितरे का अर्थ है कि दान-दीन धर्म भावना के तहत सुबह-सवेरे निर्धन एवं फकीर लोगों को पैसे की शक्ल में फितरे की रकम देना। 
   
...इस्लाम धर्म गुरुओं का मानना है कि ईद वाले दिन खुदा लोगों को अगणित नेकियों से नवाजता है। ईद का अर्थ मात्र यह नहीं कि सभी मुस्लिम भाई-बहन नए एवं साफ-सुथरे कपड़े पहनें, पकवान खाएं या ईदगाह जाकर ईद की नमाज पढ़ आएं। ईद को समझने के लिए हमें पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल़) से इसका तत्व समझना चाहिए।
हजरत मुहम्मद बड़ी सादगी के साथ ईद मनाया करते थे। एक बार हजरत मुहम्मद ईद के दिन सुबह-सवेरे फज्र की नमाज के बाद बाजार गए। रास्ते में आपको एक छोटा सा यतीम बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया। हजरत मुहम्मद पास गए और कारण पूछा। बच्चों ने बताया कि आज ईद का दिन है और उसके पास नए  कपड़े, जूते और पैसे नहीं हैं। हजरत मुहम्मद ने उसे पुचकारा और घर ले आए। बच्चों से कहा, उनकी पत्नी हजरत आयशा उस बच्चों की मां हैं, बेटी फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसके भाई हैं। इस अनाथ बच्चों को नए कपड़े पहनाए गए, उसे पकवान पेश किए गए, ताकि उसे अपने अकेलेपन का आभास न हो।
इन सबसे बच्चा इतना प्रभावित हुआ कि वह मक्का की गलियों में गीत गाता रहा- आज ईद का दिन है और वह अत्यंत प्रसन्न है। आयशा उसकी मां है, फातिमा उसकी बहन है और हसनैन उसके भाई हैं। ईद की वास्तविक भावना यही होती है। कहने को तो ईद-उल-फितर (मीठी ईद) मुसलमानों का धार्मिक पर्व है, परन्तु इसका सामाजिक महत्त्च भी कम नहीं है। 
ईद वाले दिन लोग ईदगाहों में नमाज़ पढ़ते हैं। नमाज़ के दौरान छोटे-बड़े का अंतर नहीं रहता। एक शायर ने कहा है : एक ही सफ में खड़े हो गये महमूद-ओ-आयाज/न कोई बन्दा रहा, न बन्दा नवाज़। 
ईद सामूहिक प्रसन्नता का दिवस है। इस दिन गले मिलना, लोगों से सलाम दुआ करना अच्छा समझा जाता है। किसी ने खूब कहा है: 
हिलाल-ए- ईद जो देखा तो यह ख्याल हुआ/ उन्हें गले लगाए एक साल हुआ।
Source: http://www.livehindustan.com/news/desh/tayaarinews/article1-story-329-67-187780.html
Read More...

मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण और मौलाना आजाद की शिक्षा

-इरफान इंजीनियर
 मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन का सच्चर समिति ने अत्यन्त गहन अध्ययन किया है। समिति ने पाया है कि मुसलमान, शिक्षा के मामले में लगभग हर स्तर पर पिछड़े हैं। उनकी साक्षरता दर, राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के पहले स्कूल छोड़ने वाले मुसलमान बच्चों का प्रतिशत काफी अधिक है और इसलिये, स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में भर्ती होने वाले मुसलमान विद्यार्थियों की संख्या, उनकी आबादी के अनुपात में बहुत कम है। मुसलमानों के इस शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिये कई अलग-अलग कारणों को जिम्मेदार बताया जा जाता है। मूलतः, दो प्रकार की बातें कही जाती हैं। पहली यह कि इस स्थिति के लिये इस्लाम जिम्मेदार है क्योंकि वह धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के खिलाफ है। कुछ अन्य लोग, इस्लाम को दोषी ठहराने की बजाय, मुसलमानों को कटघरे में खड़ा करते हैं। उनका कहना है कि मुसलमानों की अपने बच्चों को स्कूल भेजने में रूचि ही नहीं है। दूसरे कारण को सही मानने वाले लोग हमारी शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन और विवेचन कर यह पता लगाना चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों, दलितों व आदिवासियों को इस व्यवस्था में पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिल रही है। इसके विपरीत, पहले कारण को सही मानने वालों में से बहुसंख्यक या तो साम्प्रदायिक सोच रखते हैं या फिर बिना सोच-समझे, जल्दबाजी में अपनी राय बनाने के आदि हैं। दूसरे कारण में विश्वास रखने वालों में शिक्षाविदों की खासी संख्या है और विशेषकर ऐसे शिक्षाविदों की, जो शैक्षणिक पिछड़ेपन की समस्या से जूझ रहे हैं।
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण
मुसलमानों में शैक्षणिक पिछड़ेपन के पीछे सबसे बड़ा कारण है गरीबी। मुसलमानों में भाषाई और क्षेत्रीय आधारों पर व जाति-बिरादरियों के कारण बहुत विविधता है। वे मुस्लिम बिरादरियां, जिनकी अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी है, शैक्षणिक रूप से भी आगे हैं। उदाहरणार्थ बोहरा, खोजा और मेमन; मेहतरों, बागवानों और तेलियों से शिक्षा के मामले में कहीं आगे हैं। अंसारी और कुरैशी जैसी बिरादरियाँ भी अपने बच्चों को शिक्षा दिलवाने में रूचि ले रही हैं और उनके कई सदस्य, व्यावासायिक पाठ्यक्रमों में भी दाखिला ले रहे हैं। मुसलमानों में शिक्षा की प्यास और उसके महत्व का अहसास, बाबरी ध्वंस और उसके बाद हुये दंगों के समय से तेजी से बढ़ा है। शिक्षा को एक ऐसी कुंजी के रूप में देखा जा रहा है जो आपको इस तरह की सुरक्षित नौकरियाँ और रोजगार दिलवा सकती है, जो दंगों के दौरान नष्ट नहीं होती। दसवीं और बारहवीं कक्षाओं की परीक्षाओं में मुस्लिम लड़कियाँ मेरिट लिस्ट में स्थान पा रही हैं। हाल में एक तथ्यान्वेषण मिशन के दौरान जब हम एक कॉन्वेंट स्कूल में पहुँचे तो हमने देखा कि घरेलू कामकाज कर अपनी जीविका चलाने वाली एक मुस्लिम महिला, स्कूल के प्राचार्य से बहस में जुटी है। प्रिंसिपल का कहना था कि स्कूल की फीस इतनी अधिक है कि वह उसे चुका न सकेगी परन्तु महिला का तर्क था कि उसे चाहे एक वक्त भूखा ही क्यों न रहना पड़े या और घरों में काम क्यों ना करना पड़े, परन्तु वह अपने बच्चे को उसी स्कूल में पढ़ायेगी।
गरीब मुस्लिम परिवारों को, आमदनी की खातिर, अपने छोटे बच्चों को काम-धंधों में लगा देना पड़ता है। ज़रदोसी, कालीन, चूड़ियां और कई अन्य उद्योगों में काम करने वाले बाल श्रमिकों में मुसलमान बच्चों की संख्या खासी है। कई मुस्लिम बच्चों का कौशल का स्तर काफी ऊँचा होता है परन्तु किसी औपचारिक प्रशिक्षण व प्रमाणपत्र के अभाव में, उन्हें अच्छी आमदनी वाले काम नहीं मिल पाते। कम आय का असर अगली पीढ़ी पर भी पड़ता है। एक पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी के लिये आय के कोई स्थायी स्त्रोत नहीं छोड़ जाती और नतीजे में गरीबी का दुष्चक्र चलता रहता है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान अपनी कड़ी मेहनत से जुटाई गई थोड़ी-बहुत सम्पत्ति भी मुस्लिम परिवार खो बैठते हैं। उन्हें न पर्याप्त मुआवजा मिलता है और ना ही उनका पुनर्वास होता है। मुसलमानों के छोटे से मध्यम वर्ग में से भी कई परिवार निम्न वर्ग में खिसक गये हैं क्योंकि दंगों में उनके छोटे-मोटे व्यवसाय नष्ट हो गये। लगभग 75 से 80 प्रतिशत मुसलमान, शारीरिक श्रम या हस्तकौशल से अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
अक्सर मुसलमान अपने ही मोहल्लों में रहते हैं, जो शहरों या गाँव के बाहरी इलाकों में बसाये जाते हैं। इन मोहल्लों में सड़क, पानी व बिजली की सुविधाओं और बैंकिंग व शैक्षणिक संस्थाओं का अभाव रहता है। चूँकि ऐसे मोहल्लों में अक्सर स्कूल नहीं होते इसलिये बच्चों को दूर के स्कूलों में पढ़ने जाना पड़ता है। इससे शिक्षा का खर्च बढ़ जाता है। दूर के स्कूलों में बच्चों, विशेषकर लड़कियों, को भेजने से माँ-बाप डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि साम्प्रदायिक हिंसा भड़कने की स्थिति में उनके बच्चों को नुकसान पहुँचाया जा सकता है। यही कारण है कि मुस्लिम अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही स्कूल से निकाल लेते हैं। सच्चर समिति की रपट के अनुसार, किसी इलाके की आबादी में मुसलमानों का अनुपात जितना ज्यादा होता है, उस इलाके में मूलभूत सुविधाओं की उतनी ही कमी होती है।
एक अन्य कारण है मुस्लिम बच्चों के प्रति स्कूल प्रबन्धनों का भेदभावपूर्ण रवैया। हमारे दिमाग में भी पूर्वाग्रह होते हैं। हम में से कई को लगता है कि मुस्लिम बच्चों को उर्दू माध्यम से पढ़ना चाहिये भले ही उर्दू उनकी मातृभाषा न हो। यह मानकर चला जाता है कि वे पढ़ाई-लिखाई में फिसड्डी होंगे। इसके अलावा, स्कूलों का अजनबी वातावरण, वहाँ सरस्वती वंदना, गीता की पढ़ाई, सूर्य नमस्कार और इसी तरह की अन्य गतिविधियों के कारण भी मुस्लिम बच्चे अपनी शिक्षा जारी नहीं रखते।
मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन का एक अन्य कारण है राजनैतिक ढाँचे में उनका कम प्रतिनिधित्व। अधिकाँश प्रजातांत्रिक, राजनैतिक संस्थाओं में उनकी उपस्थिति, उनकी आबादी के अनुपात के एक-तिहाई से भी कम है। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों को कोई ऐसा व्यक्ति नजर नहीं आता जिससे वे कोई जानकारी हासिल कर सकें या प्रमाणपत्र आदि प्राप्त कर सकें। मुस्लिम प्रबन्धन वाले अच्छे स्कूल बहुत कम हैं। कई ऐसे मुस्लिम ट्रस्ट हैं जो शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करना चाहते हैं परन्तु सरकारें अक्सर उनकी मदद नहीं करतीं। उन्हें जमीन नही दी जाती, उन्हें अनुदान नहीं मिलता और यहाँ तक कि उन्हें मान्यता देने में भी आनाकानी की जाती है।
राजनैतिक नेतृत्व में मुसलमानों की संख्या कम तो है ही, उनके नेताओं की सोच के कारण भी कई समस्याएयें उभर रही हैं। समुदाय का राजनैतिक नेतृत्व अक्सर उच्च जाति के धर्मपरिवर्तित मुसलमानों, जिन्हें अशरफ कहा जाता है, के हितों की रक्षा करता है। यह नेतृत्व केवल पहचान से जुड़े मुद्दे उछालता रहता है और कुरान की चहारदीवारी में रहते हुये भी, शरीयत कानूनों में किसी प्रकार के बदलाव की  मुखालिफत करता है। सत्ताधारी वर्ग भी यह चाहता है कि शरीयत कानूनों और इस्लामिक विधिशास्त्र की मध्यकालीन विवेचना को ही स्वीकृति मिली रहे। यह विवेचना न केवल महिलाओं के साथ भेदभाव करती है वरन् कुरान की मूल आत्मा की खिलाफ भी है। मुस्लिम पर्सनल ला के मुद्दे पर शोर मचाकर राजनैतिक नेतृत्व यह सोचता है कि उसने अपने कर्तव्य का पालन कर दिया। चन्द अपवादों को छोड़कर, ऐसे मुसलमान नेताओं की संख्या गिनी चुनी है, जो मुसलमानों की शिक्षा और उनकी रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दे उठाते हों।
भारत में अच्छे प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों की भारी कमी है। ये स्कूल मुख्यतः शहरी इलाकों में हैं और इनमें मुसलमानो को आसानी से प्रवेश नहीं मिलता। भारतीय राज्य को यह अहसास हो गया है कि अगर देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, पिछड़ा और अशिक्षित बना रहेगा तो देश प्रगति नहीं कर सकेगा। इसलिये सच्चर समिति की नियुक्ति की गई और प्रधानमन्त्री के नये पन्द्रह सूत्रीय कार्यक्रम जैसे कुछ कदम उठाये गये। ये कार्यक्रम मुसलमानों की समस्याओं में से सिर्फ एक-गरीबी-पर केन्द्रित हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल हैं मुस्लिम बच्चों के लिये वजीफे, होस्टल की सुविधायें, शैक्षणिक ऋण और कई अन्य चीजें। परन्तु इस कार्यक्रम के साथ कई समस्याएयें हैं-पर्याप्त धनराशि का अभाव, नौकरशाही में इच्छाशक्ति की कमी और समुदाय की असली समस्याओं से निपटने के लिये उचित नीतियों का अभाव। स्थान की कमी के कारण हम यहाँ मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन देने वाले कार्यक्रमों की विफलता के कारणों पर चर्चा नहीं करेंगे। गरीबी इसके कई कारणों में से सिर्फ एक है और इससे मुकाबला करने की सरकार द्वारा, आधे-अधूरे मन से ही सही, कुछ कोशिश की जा रही है परन्तु विभिन्न कारणों से सफलता का प्रतिशत काफी कम है।

मौलाना आजाद की शिक्षा के सम्बंध में सोच

अगर मौलाना आजाद भारत सरकार को शिक्षा सम्बंधी अपनी नीतियों को लागू करने के लिये राजी करने में सफल हो जाते तो आज का परिदृश्य कुछ अलग ही होता। उनके लिये भारत सरकार की शिक्षा नीति, उसकी उद्योग नीति से भी अधिक महत्वपूर्ण थी। स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षा मन्त्री की हैसियत से मौलाना आजाद हमारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूती देना और उसका प्रजातान्त्रिकीकरण करना चाहते थे। वे चाहते थे कि शिक्षा का इस तरह से प्रजातान्त्रिकीकरण किया जाये कि उच्च जातियों और वर्गों का उस पर कसा शिकंजा ढीला पड़ सके।
उनके चार लक्ष्य थे:
1) प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के लोकव्यापीकरण के जरिए निरक्षरता पर प्रहार। प्रौढ़ शिक्षा व महिलाओं की शिक्षा पर जोर।
2) बिना जाति, समुदाय या वर्ग के भेदभाव के, पूरे भारतीय समाज में शिक्षा के अवसरों की समानता सुनिश्चित करना।
3) त्रिभाषा फार्मूला एवम्
4) पूरे राष्ट्र में मजबूत प्राथमिक शिक्षा तन्त्र की स्थापना।
मौलाना आजाद का यह मत था कि ‘‘हर व्यक्ति को ऐसी शिक्षा पाने का हक है जो उसे उसकी क्षमताओं का पूरा विकास करने और मानव जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जीने का अवसर प्रदान करे। ऐसी शिक्षा पाना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। राज्य तब तक यह दावा नहीं कर सकता कि उसने अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर दिया है जब तक कि वह प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने और स्वयं का विकास करने के आवश्यक साधन उपलब्ध नहीं करवा देता’’… ‘‘रोजगार का मुद्दा अलग है। राज्य को अपने सभी नागरिकों को माध्यमिक स्तर तक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करवानी चाहिये।’’
मौलाना आजाद का यह मानना था कि कुछ ही समय पहले विदेशी शासन से मुक्त हुये भारतीयों में एक अच्छे नागरिक के गुण विकसित करने और उन्हें जाति और लैंगिक भेदभाव की प्रवृति से मुक्ति दिलाने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनकी मान्यता थी कि नागरिकों को समानता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिये और उन्हें भारत की धार्मिक, नस्लीय और भाषायी विविधता के संबन्ध में संवेदनशील बनाया जाना चाहिये। मौलाना आजाद का मानना था कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिये भारत को अपने कुल बजट का कम से कम दस फीसदी हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना होगा। हमारे देश में अब तक शिक्षा के लिये कभी भी छः प्रतिशत से अधिक बजट का आवंटन नहीं किया गया और सामान्यतः तो दो से तीन प्रतिशत बजट ही शिक्षा पर खर्च किया जाता है। मौलाना चाहते थे कि शिक्षा के बजट को मुख्यतः प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा और महिला व प्रौढ़ शिक्षा पर खर्च किया जाये। इसके लिये गाँव और कस्बों में स्कूलों के ढाँचे को मजबूती देना आवश्यक होगा और हिन्दुओं, ईसाइयों और मुसलमानों की इन स्कूलों तक बराबर पहुँच को सुनिश्चित करना होगा। भारत के स्कूल, बच्चों को समानता और न्याय के मूल्यों से परिचित करवायेंगे और उन्हें भारत की विविधता का सम्मान करना सिखायेंगे। मौलाना आजाद का जोर सभी धर्मों के मूल्यों को स्कूलों के पाठ्यक्रमों में शामिल करने पर था।
असल में हुआ यह कि भारतीय राज्य ने न केवल शिक्षा पर काफी कम खर्च किया अपितु बजट का बहुत बड़ा हिस्सा आई.आई.टी., आई.आई.एम., एम्स व जे.एन.यू. जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थापना पर खर्च कर दिया गया। इनमें से अधिकाँश संस्थान महानगरों में हैं और इनमें वे ही विद्यार्थी प्रवेश पा सकते हैं जो कि महँगे निजी स्कूलों में पढ़ने के बाद अँग्रेजी में होने वाली इन संस्थानों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिये महँगी कोचिंग ले सकते हैं। इन प्रतिष्ठित संस्थानों के दरवाजे गरीबों और कमजोरों के लिये बन्द हैं। अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़ों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को इन संस्थानों में प्रवेश पाने में खासी दिक्कत पेश आती हैं। उच्च शिक्षा के इन चन्द उच्च-स्तरीय द्वीपों की स्थापना, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की कीमत पर की गई है। एक आईआईटी याआईआईएम की स्थापना पर जितना खर्च होता है, उससे हजारों नहीं तो सैंकड़ों प्राथमिक शालाएं खोली जा सकती हैं।
निष्कर्ष
इस्लाम शिक्षा पर बहुत जोर देता है। तीय निधि व इब्नमज़ा के अनुसार इब्ने अब्बास ने बताया कि अल्लाह के पैगम्बर ने कहा ‘‘धर्मशास्त्र का एक विद्वानशैतान पर एक हजार श्रृद्धालुओं से ज्यादा भारी पड़ता है।’’ मुसलमानों का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य यह है कि वे ज्ञान हासिल करें, इस ज्ञान का उपयोग अपने जीवन में करें और इस ज्ञान का प्रकाश पूरे समाज में फैलाएं। कोई व्यक्ति तब तक सच्चा मुसलमान कहलाने के काबिल नहीं है तब तक कि वह इस्लाम का असली अर्थ न समझ ले। कोई व्यक्ति केवल मुस्लिम परिवार में जन्म लेने से मुसलमान नहीं बनता बल्कि वह अपने ज्ञान और कर्मों से मुसलमान बनता है। इस्लाम का तार्किकता पर बहुत जोर है। परन्तु मुस्लिम धार्मिक और राजनैतिक नेताओं ने इस्लाम के इस पक्ष पर कभी जोर नहीं दिया। शायद मौलाना आजाद इस्लाम की अपनी समझ से प्रेरित होकर ही ज्ञान और शिक्षा फैलाने की बात कर रहे थे।
शिक्षा वह अस्त्र है जो किसी भी समुदाय के सदस्यों को सामूहिक सामाजिक जीवन में हिस्सा लेने और उसमें अर्थपूर्ण योगदान देने की क्षमता प्रदान करता है। शिक्षा हमें वह मूल्य देती है जो शान्तिपूर्ण सामूहिक जीवन, पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा, ज्ञान का विकास और बेहतर समझ पैदा करने में हमारी मदद करते हैं। शिक्षा हमें वह कौशल या ज्ञान भी देती है जिसके जरिए हम अपनी रोजी-रोटी कमा सकते हैं।
शिक्षा एक अनवरत प्रक्रिया है। हम जीवन के अपने संघर्ष से, अन्य व्यक्तियों के सम्पर्क में आने से और अपने विभिन्न अनुभवों से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। हम अपने परिवार और समुदाय से भी ज्ञान प्राप्त करते हैं। परन्तु अर्थपूर्ण शिक्षा केवल ज्ञान के केन्द्रों अर्थात् स्कूल, कालेज, अनुसंधान संस्थान, विश्वविद्यालय व अन्य शिक्षा संस्थान हैं। उच्च स्तर की व्यावसायिक शिक्षा तक पहुँच, उच्च वर्ग तक सीमित  है। भारत में मुसलमानों को इन संस्थाओं में बहुत कम संख्या में प्रवेश मिला पाता है। मजे की बात यह है कि मुसलमानों के शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिये उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है। अगर हम मौलाना आजाद के बताये रास्ते पर चले होते तो सारे राष्ट्र को इससे लाभ होता। अभी भी बहुत देर नहीं हुयी है। हम अब भी मौलाना आजाद के सपनों को साकार करने के काम में जुट सकते हैं।
(मूल अँग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)
Read More...

Read Qur'an in Hindi

Read Qur'an in Hindi
Translation

Followers

Wievers

join india

गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

Check Page Rank of your blog

This page rank checking tool is powered by Page Rank Checker service

Promote Your Blog

Hindu Rituals and Practices

Technical Help

  • - कहीं भी अपनी भाषा में टंकण (Typing) करें - Google Input Toolsप्रयोगकर्ता को मात्र अंग्रेजी वर्णों में लिखना है जिसप्रकार से वह शब्द बोला जाता है और गूगल इन...
    13 years ago

हिन्दी लिखने के लिए

Transliteration by Microsoft

Host

Host
Prerna Argal, Host : Bloggers' Meet Weekly, प्रत्येक सोमवार
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Popular Posts Weekly

Popular Posts

हिंदी ब्लॉगिंग गाइड Hindi Blogging Guide

हिंदी ब्लॉगिंग गाइड Hindi Blogging Guide
नए ब्लॉगर मैदान में आएंगे तो हिंदी ब्लॉगिंग को एक नई ऊर्जा मिलेगी।
Powered by Blogger.
 
Copyright (c) 2010 प्यारी माँ. All rights reserved.