सामाजिक रुढिवाद की देन है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष-Jagadishwar Chaturvedi


इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रति अलगाव को दूर किया जाए। मुसलमानों को दोस्त बनाया जाए। उनके साथ रोटी-बेटी के संबंध स्थापित किए जाएं। उन्हें अछूत न समझा जाए। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को निर्मित करने लिए जमीनी स्तर पर विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों के बीच में सांस्कृतिक -सामाजिक आदान-प्रदान पर जोर दिया जाए। अन्तर्धार्मिक समारोहों के आयोजन किए जाएं। मुसलमानों और हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक अलगाव को दूर करने के लिए आपसी मेलजोल,प्रेम-मुहब्बत पर जोर दिया जाए। इससे समाज का सांस्कृतिक खोखलापन दूर होगा,रूढ़िवाद टूटेगा और सामाजिक परायापन घटेगा।
भारत में करोड़ों मुसलमान रहते हैं लेकिन गैर मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम कि मुसलमान कैसे रहते हैं,कैसे खाते हैं, उनकी क्या मान्यताएं, रीति-रिवाज हैं। अधिकांश लोगों को मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना मालूम है कि दूसरे वे धर्म के मानने वाले हैं । उन्हें जानने से हमें क्या लाभ है। इस मानसिकता ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सामाजिक अंतराल को बढ़ाया है। इस अंतराल ने संशय,घृणा और बेगानेपन को पुख्ता किया है।
मुसलमानों के बारे में एक मिथ है कि उनका खान-पान और हमारा खान-पान अलग है, उनका धर्म और हमारा धर्म अलग है। वे मांस खाते हैं, गौ मांस खाते हैं। इसलिए वे हमारे दोस्त नहीं हो सकते। मजेदार बात यह है कि ये सारी दिमागी गड़बड़ियां कारपोरेट संस्कृति उद्योग के प्रचार के गर्भ से पैदा हुई हैं।
सच यह है कि मांस अनेक हिन्दू भी खाते हैं,गाय का मांस सारा यूरोप खाता है। मैकडोनाल्ड और ऐसी दूसरी विश्वव्यापी खाद्य कंपनियां हमारे शहरों में वे ही लोग लेकर आए हैं जो यहां पर बड़े पैमाने पर मुसलमानों से मेलजोल का विरोध करते हैं। मीडिया के प्रचार की खूबी है कि उसने मैकडोनाल्ड का मांस बेचना, उसकी दुकान में मांस खाना, यहां तक कि गौमांस खाना तो पवित्र बना दिया है, लेकिन मुसलमान यदि ऐसा करता है तो वह पापी है,शैतान है ,हिन्दू धर्म विरोधी है।
आश्चर्य की बात है जिन्हें पराएपन के कारण मुसलमानों से परहेज है उन्हें पराए देश की बनी वस्तुओं, खाद्य पदार्थों , पश्चिमी रहन-सहन,वेशभूषा, जीवनशैली आदि से कोई परहेज नहीं है। यानी जो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर फैलाते हैं वे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अंधभक्तों की तरह प्रचार करते रहते हैं। उस समय उन्हें अपना देश,अपनी संस्कृति,देशी दुकानदार,देशी माल,देशी खानपान आदि कुछ भी नजर नहीं आता। अनेक अवसरों पर यह भी देखा गया है कि मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने वाले पढ़े लिखे लोग ऐसी बेतुकी बातें करते हैं जिन्हें सुनकर आश्चर्य होता है। वे कहते हैं मुसलमान कट्टर होता है। रूढ़िवादी होता है। भारत की परंपरा और संस्कृति में मुसलमान कभी घुलमिल नहीं पाए,वे विदेशी हैं।
मुसलमानों में कट्टरपंथी लोग यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान तो भारत के विजेता रहे हैं।वे मुहम्मद बिन कासिम,मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी की संतान हैं। उनकी संस्कृति का स्रोत ईरान और अरब में है। उसका भारत की संस्कृति और सभ्यता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सच यह नहीं है।
सच यह है कि 15वीं शताब्दी से लेकर आज तक भारत के सांस्कृतिक -राजनीतिक-आर्थिक निर्माण में मुसलमानों की सक्रिय भूमिका रही है। पन्द्रहवीं से लेकर 18वीं शताब्दी तक उत्तरभारत की प्रत्येक भाषा में मुसलमानों ने शानदार साहित्य रचा है। भारत में तुर्क,पठान अरब आदि जातीयताओं से आने शासकों को अपनी मातृभाषा की भारत में जरूरत ही नहीं पड़ी,वे भारत में जहां पर भी गए उन्होंने वहां की भाषा सीखी और स्थानीय संस्कृति को अपनाया। स्थानीय भाषा में साहित्य रचा। अपनी संस्कृति और सभ्यता को छोड़कर यहीं के होकर रह गए। लेकिन जो यहां के रहने वाले थे और जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया था उनको अपनी भाषा बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। जो बाहर से आए थे वे स्थानीय भाषा और संस्कृति का हिस्सा बनकर रह गए।
हिन्दी आलोचक रामविलास शर्मा ने लिखा है मुसलमानों के रचे साहित्य की एक विशेषता धार्मिक कट्टरता की आलोचना, हिन्दू धर्म के प्रति सहिष्णुता,हिन्दू देवताओं की महिमा का वर्णन है। दूसरी विशेषता यहाँ की लोक संस्कृति,उत्सवों-त्यौहारों आदि का वर्णन है। तीसरी विशेषता सूफी-मत का प्रभाव और वेदान्त से उनकी विचारधारा का सामीप्य है।
उल्लेखनीय है दिल्ली सल्तनत की भाषा फारसी थी लेकिन मुसलमान कवियों की भाषाएँ भारत की प्रादेशिक भाषाएँ थीं। अकबर से लेकर औरंगजेब तक कट्टरपंथी मुल्लाओं ने सूफियों का जमकर विरोध किया। औरंगजेब के जमाने में उनका यह प्रयास सफल रहा और साहित्य और जीवन से सूफी गायब होने लगे। फारसीयत का जोर बढ़ा। 
भारत में ऐसी ताकतें हैं जो मुसलमानों को गुलाम बनाकर रखने ,उन्हें दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखने में हिन्दू धर्म का गौरव समझती हैं। ऐसे संगठन भी हैं जो मुसलमानों के प्रति अहर्निश घृणा फैलाते रहते हैं। इन संगठनों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव का ही दुष्परिणाम है कि आज मुसलमान भारत में अपने को उपेक्षित,पराया और असुरक्षित महसूस करते हैं।
जिस तरह हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन सक्रिय हैं वैसे ही मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन भी सक्रिय हैं। ये एक ही किस्म की विचारधारा यानी साम्प्रदायिकता के दो रंग हैं।
हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को नष्ट करने के लिए जो रास्ता सुझाया है वह क़ाबिले ग़ौर । उन्होंने लिखा-‘‘ भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है ,वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों,दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से प्रसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिन्दुओं को संकोच न होगा। इसके बिना,दृढ़ बंधुत्व के बिना ,दोनों की गुलामी के पाश नहीं कट सकते,खासकर ऐसे समय ,जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है।’’ 
भारत में मुसलमान विरोध का सामाजिक और वैचारिक आधार है जातिप्रथा,वर्णाश्रम व्यवस्था। इसी के गर्भ से खोखली भारतीयता का जन्म हुआ है जिसे अनेक हिन्दुत्ववादी संगठन प्रचारित करते रहते हैं। जातिप्रथा के बने रहने के कारण धार्मिक रूढ़ियां और धार्मिक विद्वेष भी बना हुआ है।
भारत में धार्मिक विद्वेष का आधार है सामाजिक रूढ़ियाँ। इसके कारण हिन्दू और मुसलमानों दोनों में ही सामाजिक रूढ़ियों को किसी न किसी शक्ल में बनाए रखने पर कट्टरपंथी लोग जोर दे रहे हैं। इसके कारण हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष बढ़ा है। सामाजिक एकता और भाईचारा टूटा है। हिन्दू-मुसलमान एक हों इसके लिए जरूरी है धार्मिक -सामाजिक रूढ़ियों का दोनों ही समुदाय अपने स्तर पर यहां विरोध करें।
हिन्दू-मुस्लिम समस्या हमारी पराधीनता की समस्या है। अंग्रेजी शासन इसे हमें विरासत में दे गया है। इस प्रसंग में निराला ने बड़ी मार्के की बात कही है। निराला का मानना है हिन्दू मुसलमानों के हाथ का छुआ पानी पिएं,पहले यह प्राथमिक साधारण व्यवहार जारी करना चाहिए। इसके बाद एकीकरण के दूसरे प्रश्न हल होंगे।
निराला के शब्दों में हिन्दू-मुसलमानों में एकता पैदा करने के लिए इन समुदायों को ‘‘वर्तमान वैज्ञानिकों की तरह विचारों की ऊँची भूमि’’ पर ले जाने की जरूरत है। इससे ही वे सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होंगे। 

Jagadishwar Chaturvedi

: साभार फ़ेसबुक


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होली का भाव और प्रभाव holi 2014

होली के अवसर पर सभी पाठकों को शुभकामनायें. होली आती है और भक्त प्रह्लाद की याद दिलाती है. हालात कितने ही विपरीत हों और शत्रु कितना ही बलशाली क्यों न हो लेकिन अगर आपका विश्वास है कि आपका पालनहार आपका रक्षक और सहायक है तो फिर उसकी मदद आयेगी और हर जगह आयेगी. हज़रत इब्राहीम अलैहिस-सलाम को भी अल्लाह के नाशुक्रे और मुनकिर बादशाह ने बहुत तेज़ आग जलवा कर उसमें फिकवा दिया था लेकिन अल्लाह ने उन्हें बचा लिया. होली महज़ रंगों का त्यौहार ही नहीं है बल्कि यह इस बात को जानने और जांचने का भी अवसर है कि हम ईश्वर-अल्लाह पर कितना भरोसा रखते हैं?
इस बात का पता इससे चलेगा कि जब हमारे सामने कठिनाईयाँ आती है तब हम उस दयालु डाटा से शिकवा तो नहीं करने लगते या फिर मायूसी का शिकार तो नहीं हो जाते ?
होली की यह मूल भावना मन में न रहे तो हुडदंगी लोग होली को अनुशासन और संयम के बन्धन तोड डालने का दिन बनकर रख देते हैं जोकि धर्म और अध्यात्म दोनों के खिलाफ है. धर्म और नैतिकता जिन लोगों का स्वभाव है, उनके लिये होली पुरानी स्मृति को ताज़ा करती है और उनका नैतिक उत्थान करती है.
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गोडसे और गांधी, तमसो मा ज्योतिर्गमय Nathuram Godse and Gandhi

मोहनदास कर्मचन्द गांधी को कल हिन्दुस्तानियों ने याद किया। वह एक राष्ट्रवादी नेता थे। 30 जनवरी 1948 को उन्हें नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी थी। वह भी एक राष्ट्रवादी था। गांधी और गोडसे दोनों ही राष्ट्रवादी थे लेकिन दोनों में अंतर था। गांधी जी को उदारता, शांति और सकारात्मकता के लिए जाना चाहता है जबकि गोडसे को संकीर्णता, आतंक और नकारात्मकता के लिए। 
आज हमारे बीच न गांधी जी हैं और न ही गोडसे लेकिन सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्ति वाले लोग आज भी हमारे बीच हैं और हम ख़ुद भी इनमें से किसी एक टाइप के इंसान हैं। सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्ति के बीच संघर्ष और रस्साकशी आज भी जारी है। सकारात्मकता विचारधारा के अंतर को उदारता के साथ स्वीकार करती है और भिन्न मत वालों को उनकी मान्यताओं के साथ जीने का हक़ देती है जबकि नकारात्मकता न अंतर को स्वीकार करती है और न ही विरोध को बर्दाश्त करती है। इसी संकीर्णता की अंतिम परिणति हत्या में होती है। सो नाथूराम गोडसे ने मोहनदास कर्मचन्द गांधी को क़त्ल कर दिया। गांधी जी को आज भी दुनिया उनके विचारों के कारण याद करती है। उनके विचार ग़लत हो सकते हैं, तब भी उनसे जीने का हक़ छीन लेना किसी नागरिक के लिए जायज़ नहीं है।
गोडसे को जायज़ ठहराने वाले कुछ लोग भी समाज में पाए जाते हैं लेकिन ये भी उसी की तरह नकारात्मक से भरे हुए लोग हैं। ये बीमार ज़हनियत के लोग हैं। समय आ रहा है जबकि ये भी सबके लिए जीने के हक़ को मान ही लेंगे जैसे कि इन्होंने जातीय पवित्रता और श्रेष्ठता को त्यागकर समानता और समरसता को अपना लिया है। समय अपने तेज़ धारे में बहाए ले जा रहा है और इनके नारे, नेता और नीतियां लगातार बदलती जा रही हैं।
यह सब हम और आप देख ही रहे हैं। फ़िलहाल यह लेख देखिए-
महात्मा को भूल गई है आज की राजनीति
महात्मा गांधी को लेकर भारतीय समाज और राजनीति ने कई तरह से विमर्श किया है। लेकिन अजीब बात यह है कि भारत की कट्टर सांप्रदायिक राजनीति के दो परस्पर विरोधी ध्रुवों की महात्मा गांधी के बारे में धारणा एक-सी है। दोनों गांधी को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में उन्हें मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन कहा जाने लगा था। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने तो यहां तक कहा था कि गांधी ने कांग्रेस को हिंदू पुनरोत्थान का औजार बना दिया है। दूसरी तरफ, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के पहले प्रवर्तक वीर सावरकर ने जून 1944 में गांधीजी पर आरोप लगाया कि वह भारत में मुस्लिम राज कायम करना चाहते हैं, भले ही यह अफगान राज हो। सावरकर ने लिखा था- क्या खुद गांधी ने अली बंधुओं के साथ मिलकर पठानों द्वारा अफगानिस्तान पर हमले की साजिश नहीं रची थी? दूसरे हिंदू विचारक बालकृष्ण शिवराज मुंजे ने 1938 में लिखा था- जब से महात्मा का उदय हुआ और उनकी तानाशाही कांग्रेस में बढ़ी है, कांग्रेस ने ऐसा रवैया अपना लिया है, जिसे हिंदुओं के हितों की कीमत पर मुस्लिम समर्थक मानसिकता कहा जा सकता है।
इस सांप्रदायिक वैचारिक ढोल को लगातार पीटने से ही वह माहौल बना, जो असल में गांधीजी की हत्या के लिए जिम्मेदार था। यही बात सम्यक ढंग से सरदार पटेल ने एक पत्र में लिखी थी- उनके (आरएसएस) सारे भाषणों में सांप्रदायिक जहर भरा है और इसी जहरीले वातावरण में एक स्थिति ऐसी बनी, जिससे यह भयानक दुर्घटना (गांधीजी की हत्या) हो सकी। 1947 से पहले मुस्लिम सांप्रदायिकता ने देश की एकता को तोड़ने का निंदनीय प्रयास किया था और आजादी के बाद हिंदू सांप्रदायिकता ने भारतीय राष्ट्रीयता के सामने चुनौतियों के पहाड़ खड़े कर दिए। सांप्रदायिकता का यह जहर वहीं रुका नहीं। गांधीजी की मृत्यु 30 जनवरी, 1948 को हुई थी, पर उनकी आत्मा को तो हमने कई बार छलनी किया। भागलपुर, मलियाना, हाशिमपुरा से लेकर 1992 के बाबरी विध्वंस और 2002 के गुजरात दगों तक इसकी सूची बहुत लंबी है। हाल में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के वक्त वहां कोई गांधीवादी नेता विस्थापितों के बीच बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, मगर महात्मा गांधी ने आजादी मिलने के तुरंत बाद इसके समारोहों में शामिल होने से जरूरी यह समझा कि नोआखली जाकर दंगों की आग को फैलने से रोका जाए।
गांधी के जाने के बाद उनके सत्याग्रह और आंदोलनों का जैसे चरित्र भी बदल गया। जहां चौरीचौरा में हिंसा के बाद उन्होंने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था, वहीं आज के दौर के आंदोलन और सत्याग्रहों की शुरुआत हिंसा व आक्रामक शैली से हो रही है। गांधी हमेशा साधन और मन की पवित्रता की बात करते थे, महात्मा को सच्ची श्रद्धांजलि इस राह को अपनाना ही है।
- के सी त्यागी, राज्यसभा सदस्य
एक बात यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि नाथूराम गोडसे अंग्रेज़ी ड्रेस में है जबकि गांधी जी भारतीय संस्कृति का परिचय देने वाले कपड़ों में खड़े हैं। नाथूराम गोडसे और उसके समर्थकों द्वारा अंग्रेज़ी लिबास पहनकर भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता में विश्वास जताना छल-फ़रेब के सिवा कुछ भी नहीं है। यह धोखा वह दूसरों से ज़्यादा ख़ुद को देते आ रहे हैं और ख़ुद से ख़ुद ही धोखा खाते आ रहे हैं।
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ख़ुशी की कलियों की खेती कैसे करें ? Happiness

हम जब चाहे तब ख़ुश हो सकते हैं, जितना चाहे उतना ख़ुश हो सकते हैं और जब तक चाहे तब तक ख़ुश रह सकते हैं। 
हमें ख़ुश करने वाला अगर कोई है तो वह हम ख़ुद हैं।
हमें कोई हादसा दुख नहीं दे सकता। हमें कोई आदमी दुखी नहीं कर सकता। अगर हमें कोई दुखी कर सकता है तो वह हम ख़ुद ही हैं।
हम अपने आप को नहीं जानते। हम अपने मन को और अपने मन की भावनाओं को नहीं जानते। हम अपने मन के काम करने के तरीक़े को नहीं जानते। इसीलिए हम दुख पाते हैं।
हम बार बार दुख पाते हैं। बार बार दुख पाने से दुखी रहना हमारी आदत बन जाती है और फिर जिस चीज़ की हमें आदत होती है, वही चीज़ हमारी तरफ़ आकर्षित होती रहती है। दुख हमें पहचान लेते हैं और ख़ुशियां हमसे रूठ जाती हैं।
हम अपने भाग्य के लिए कभी ईश्वर को और कभी अपनी सरकारों को दोष देते रहते हैं लेकिन हक़ीक़त इसके खि़लाफ़ है। हमारे दुख का कारण हमारे बाहर नहीं है बल्कि हमारे अंदर है, हमारे मन में है। अरबी में मन को ‘नफ़्स‘ कहते हैं।
हमें 30 साल से ज़्यादा अर्सा हो गया है इस मन यानि नफ़्स पर रिसर्च करते हुए और इसके करिश्मे देखते हुए। अब भी देख रहे हैं।
आप भी देख रहे हैं और जो चाहे वह देख सकता है कि जब एक आदमी को अफ़ीम, चरस, भांग या शराब की आदत पड़ जाती है तो वह जिस शहर में जाता है। उसे वह चीज़ उसी शहर में उपलब्ध हो जाती है।
अगर आपको दुख प्राप्त हो रहे हैं तो इससे आपके सोचने के पैटर्न का पता चलता है।
अगर आप ख़ुशी चाहते हैं तो आपको अपने सोचने के पैटर्न को चेंज करना पड़ेगा। आपको ख़ुश रहने की प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। बार बार की प्रैक्टिस से ख़ुश रहना आपकी आदत बन जाएगी और तब ख़ुशियां आपकी तरफ़ आकर्षित होंगी और दुख आपसे रूठ जाएगा।
आप ख़ुश रहेंगे तभी आपके जीवन में ख़ुशी का अहसास कराने वाली घटनाएं होंगी और आप हरेक हादसे से सलामत रहेंगे।
आप सोचते हैं कि पहले ख़ुशी की घटनाएं हों तब मैं ख़ुश होऊंगा। जबकि तत्वज्ञानी आरिफ़ बन्दे जानते हैं कि ख़ुशी की घटनाएं तब होंगी और पै दर पै होंगी जब आप ख़ुश रहने के आदी हो जाएंगे।
अक्सर लोग यह नहीं जानते और जो जान लेते हैं, उनमें से भी बहुत कम लोग ख़ुश रहने का अभ्यास कर पाते हैं। जो कर लेते हैं, वे ख़ुश रहते हैं।
ख़ुशी का अभाव होते ही दुख आ धमकता है। यहां प्रकृति ख़ाली जगह को भरती रहती है।
आप दुख को दूर करना चाहते हैं तो पल भर में कर सकते हैं। आप अपने दिल को ख़ुशी से भर लीजिए। आपका दुख दूर हो जाएगा। यह सहज है।
हम ऐसे ही करते हैं। आप भी ऐसे ही कर लीजिए।
अक्सर लोग कहते हैं कि हम ख़ुश कैसे रह सकते हैं जबकि हमारी आमदनी कम है, हमारे ख़र्चे ज़्यादा हैं, हमारा घर बंटकर पहले से छोटा हो गया है, हमारे घर का एक मेम्बर बीमार है, हमारी जान को मुक़द्दमा लगा हुआ है।
ये सब तो हमारे साथ भी लगे हुए हैं। इसके बावुजूद हम ख़ुश हैं क्योंकि हम जान गए हैं कि यह सब हमारी ग़लत सोच के नतीजे में हुआ है और जब हमने उसे सुधार लिया है तो अब ये सारे हालात भी बदल जाएंगे। हालात बहुत बदल चुके हैं और लगातार बदलते जा रहे हैं।
यहां अल्लाह पर ईमान काम आता है। यहां दुआ काम आती है।
हम निर्बल हैं लेकिन हमारा रब सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। हम उससे अपने भले की दुआ कर सकते हैं और उसे पूरी कर सकता है।
अल्लाह हमारी दुआओं को हमेशा से पूरा करता आ रहा है। अल्लाह हमारे साथ है। हमारे ख़ुश रहने की यह वजह सबसे बड़ी वजह है।
अपनी ग़लतियों, अपनी नादानियों और दुश्मनों की कारगुज़ारियों की वजह से जब हम परेशानियों से घिर से गए और हमारे दिल में ऐसे विचार आने लगे कि यह जीना भी कोई जीना है। इससे तो अच्छा है कि मर जाएं।
तब भी हम मर नहीं पाए क्योंकि अल्लाह को आत्महत्या नापसंद है।
जब हमने अपनी बीवी को तलाक़ देने का पक्का इरादा कर लिया तब भी हम उसे तलाक़ नहीं दे पाए क्योंकि अल्लाह को जायज़ कामों से सबसे ज़्यादा नापसंद तलाक़ देना है।
जो काम अल्लाह को नापसंद है, वह हम कर नहीं सकते। हमारा जीना-मरना उसी की ख़ुशी के लिए है।
अल्लाह हमें राह दिखाता है। अल्लाह बुराई से हमारी हिफ़ाज़त करता है। अल्लाह हमारे दिल को बुरे इरादों और बुरी सोच से पाक करता है। निराशा, अवसाद और नकारात्मकता अल्लाह के बंदे के दिल में आ नहीं सकती और अगर कभी किसी के दिल में आ जाए तो वह ठहर नहीं सकती।
हम अल्लाह के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ते रहे और वह हमारा कल्याण करता रहा, हमारा भला करता रहा।
हमने जितनी दौलत उससे मांगी उसने दी। हमने उससे जो चीज़ मांगी, उसने दी। उसने माध्यम बनाकर भी चीजें दीं और उसने ग़ैब से भी दीं बिना किसी ज़ाहिरी ज़रिये के। उसने रात के अंधेरे में हमें ग़ैब से ‘गैस का ग़ुब्बारा‘ दिया। यह बचपन की घटना है जब हम तक़रीबन चार साल के थे और सर्दी की रात में ज़िद कर रहे थे।
बचपन की ही दूसरी घटना वह है जब हमारी दादी के पैसे खोए गए। उन्होंने कुरआन की सूरत ‘अश्-शम्स‘ पढ़कर दुआ की तो हमने हवा में से पैसे फ़र्श पर गिरते हुए देखे और फिर यही हमारे बेटे के साथ हुआ। उनके साथ दो बार हुआ जब कि ग़ैब से उनके मांगने पर पैसे हवा से गिरे।
चलती हुई आंधियों को जब हम रोकना चाहते हैं तो दुआ करते हैं। वे रूक जाती हैं। वे हमारे बचपन में भी रूक जाती थीं और आज भी रूक जाती हैं।
अगर आप चमत्कार की दुआ करेंगे तो आपके साथ चमत्कार ही होगा।
हमं निर्बल हैं लेकिन हमारा रब समर्थ है। उसकी सामर्थ्य अनंत है। आप अनंत सामर्थ्य वाले का ध्यान कीजिए। आपको ख़ुशी मिलेगी और ख़ुशी मिलते ही आपके दुखों का अंत हो जाएगा।
यह सरल है। यह तुरंत हो सकता है। अगर आपका दुख दूर हो जाता है तो आपके लिए इससे बड़ा चमत्कार क्या होगा ?
यह सबसे बड़ा चमत्कार आप ख़ुद कर सकते हैं।
आप जीतने के लिए पैदा हुए हैं। आप जीत सकते हैं।
‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘
अगर आप जीत सकते हैं तो फिर आप जीतते क्यों नहीं हैं ?
आप ख़ुद भी जीतिए और अपने परिवार को भी जीतना सिखाईये।
इसके बाद किसी रोज़ हम आपको ‘दौलत की खेती‘ करना सिखाएंगे। तब तक आप अपने मन की भूमि पर ख़ुशी की कलियां खिलाईये, ख़ुशी के फूलों की खेती कीजिए। जब आपका मन हरा भरा हो जाएगा तो ख़ुशहाली आपकी तरफ़ ख़ुद ही दौड़ी चली आएगी।
 
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महात्मा गांधी से भी ऊंचा एक व्यक्तित्व khan abdul gaffar khan

जब भी संघर्ष और वह भी जेल में रहकर संघर्ष करने की बात आती है, तो हम या तो महात्मा गांधी को याद करते हैं या नेल्सन मंडेला को या फिर आंग सान सू की को। गांधी को छह-सात वर्ष तक जेल में रहना पड़ा, सू की को 15 वर्ष तक और नेल्सन मंडेला को 27 वर्ष तक। लेकिन यह सब खान अब्दुल गफ्फार खान के संघर्ष के सामने कुछ नहीं, जिन्होंने अपने जीवन के पूरे 42 साल ब्रिटिश राज और फिर पाकिस्तान की जेलों में गुजार दिए। जेल में उनके समान कष्ट और यातनाएं भी किसी ने नहीं झेलीं। सरहदी सूबे की जेलों में तो अक्सर पैरों में लोहे की बेड़ी बंधी रहती थी। बादशाह खां और सीमांत गांधी जैसी उपाधियों से नवाजे गए खान अब्दुल गफ्फार खां ने अपने भाई के साथ मिलकर कभी पठान सीमा प्रांत में खुदाई खिदमतगारों की एक बड़ी अहिंसक फौज खड़ी की थी। 1942 के आंदोलन में जब गांधी के नेतृत्व के बावजूद हिन्दुस्तानी अहिंसक नहीं रह सके, तब पठानों ने अपनी अहिंसा कायम रखी। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुजदिलों का नहीं और पठान एक बहादुर कौम है, वह अहिंसा का पालन करने में समर्थ हो सकी।
अहिंसा की शिक्षा बादशाह खां ने गांधी से नहीं, कुरान से ग्रहण की थी। वह उस दौर के बाकी लोगों से ज्यादा राष्ट्रवादी थे। राजेंद्र प्रसाद जब संविधान सभा के अध्यक्ष बने, तो उनके स्वागत में आठ भाषण दिए गए। इनमें सें सात ने अंग्रेजी में बोलना उचित समझा। अकेले बादशाह खान ही थे, जो हिन्दुस्तानी में बोले। बादशाह खान ने जीवन भर कांग्रेस का साथ दिया था। आजादी की लड़ाई में पठानों ने कांग्रेस को शक्तिशाली बनाया। पठान कांग्रेस के साथ इस वायदे पर थे कि हिन्दुस्तान के आजाद होने के साथ-साथ पठानों को भी आजादी मिलेगी। पर जब समय आया, तो पठानों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान के साथ कर दिया गया। मुस्लिम लीग को वे चुनावी शिकस्त पहले ही दे चुके थे। पठानों के सामने विकल्प, हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के बीच का नहीं, बल्कि पाकिस्तान और पख्तूनिस्तान के बीच रखा जाना चाहिए था। जो नहीं हुआ। कांग्रेस के नेताओं का मानना था कि वे परिस्थितियों के अधीन थे।

बादशाह खान का सवाल था कि ये परिस्थितियां किसने पैदा कीं। एक तरफ बादशाह खान पूरी तरह से विभाजन के विरोधी थे, तो दूसरी ओर सभी राष्ट्रीय नेताओं को विभाजन स्वीकार्य था। गांधी जैसे व्यक्ति भी इसे मूक-दर्शक बनकर देखते रहे। बादशाह खान अकेले पड़ गए थे। सच तो यह है कि स्वतंत्रता की लड़ाई के आखिरी दौर में बादशाह खान ही सत्य, अहिंसा और भाईचारे के एकमात्र प्रतिनिधि थे। यहां वे गांधी से भी ऊपर उठ जाते हैं। इंदिरा गांधी ने तो उनके लिए यहां तक कहा, ‘बादशाह खान के दयालु व्यक्तित्व से आशा की जा सकती है कि वे हमारी विफलताओं को क्षमा कर पाएंगे।’
-उदय प्रकाश अरोड़ा, ग्रीक चेयर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
हिन्दुस्तान दिनांक 20-01-2014, पेज 10 से साभार
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उर्दू अदब को समझना किया आसान संजीव सराफ़ ने


नई दिल्ली। उर्दू शायरी के नाम वेबसाइट 'रेख्ता' ने एक साल में ही लोगों के बीच खास जगह बना ली है। उन लोगों के लिए यह खास है जो उर्दू के ज्यादा जानकार नहीं, मगर उर्दू की मिठास के कायल हैं। शनिवार को रेख्ता की सालगिरह के मौके कई नामी शायर और उर्दू के कद्रदां इकट्ठा हुए। 
'रेख्ता', उर्दू शायरी की एक बड़ी वेबसाइट है। उर्दू से गहरा लगाव रखने वाले उद्योगपति संजीव सराफ इसके फाउंडर हैं। इस जश्न के मौके पर केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद बतौर चीफ गेस्ट मौजूद थे। साथ ही सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन यू.के. सिन्हा, फिल्मकार मुजफ्फर अली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व वाइस चांसलर सय्यद शाहिद मेहदी, लेखक शम्सुरर्हमान फारूकी, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नायर, प्रो. शमीम हनफी, उद्योगपति कमल मोरारका, दिल्ली उर्दू अकादमी के चेयरमैन अख्तरउल वासे भी प्रोग्राम में शामिल हुए। 
एक साल पूरे होने के मौके पर वेबसाइट को नया लुक भी दिया गया है। साथ ही, नया कलेक्शन भी अपडेट किया गया है। सादत हसन मंटो के फैंस को यहां उनकी सभी कहानियां मिलेंगी। वेबसाइट में 651 उर्दू शायरों की सात हजार गजलें और नज्में हैं। इस वेबसाइट का सबसे नायाब पहलू यह है कि इसमें उर्दू शायरी को देवनागरी और रोमन लिपियों में भी पेश किया गया है। वेबसाइट को अब तक 154 देशों के करीब ढाई लाख लोग देख चुके हैं।
एक रिपोर्ट साभार
नोट: नई बात यह है कि किसी भी शब्द का अर्थ जानने के लिए बस उस पर क्लिक करना काफ़ी है. देखें-
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2014 नया साल मुबारक हो

सभी प्यारे भाई बहनों को नया साल मुबारक हो. आज डा. राही साहब ने नये साल की मुबारकबाद क़ुबूल करने के बाद एक बहुत अच्छा शेर सुनाया था. जिसे यहाँ अर्ज़ करना था लेकिन डायरी पास नहीं है सो इन अल्फ़ाज़ में हम अपने जज़्बात यहाँ साभार रख रहे हैं-
नये साल में सबको.! ज़िंदगी की हर खुशी मिले.!! यारों की सलामती रहे.! मन चाही दुनियाँ मिले.!! हो हर काम वो पूरा, जो बीते बरस था अधूरा.! ख़याल हो जाए ना खवाब, हक़ीक़त उसे बना देना.!! नये साल का स्वागत है, बुरा वक़्त भुला देना.! हुई जो खता भूले से, खुदा-रा माफ़ कर देना.!! दोस्तो को तो क्या, दुशमन को भी हिदायत देना.! नये साल में ए खुदा, हम पर ये इनायत करना.!! इक चाँद की तमन्ना, इस दिल ने भी की है.! इस साल मेरे आँगन, चाँदनी ज़रूर बिखरा देना.!!
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भारतीय नारी का चीरहरण अमेरिका में, कब तक? Devyani Khobragade

कल टी. वी. पर देखा कि अमेरिका ने फिर से एक भारतीय देवयानी खोबरागाडे का अपमान कर दिया है। वह अमेरिका में भारत की एक राजनयिक हैं। इस तरह की ख़बरें देखने के हम आदी हो चुके हैं लेकिन हमें यह उम्मीद बिल्कुल नहीं थी कि भारत उनके इस अपमान पर इतना सख्त रद्दे-अमल ज़ाहिर करेगा। बहरहाल भारत का यह काम वाक़ई तारीफ़ के क़ाबिल है। इस विषय पर आज (18 दिसंबर 2013) हिन्दुस्तान में छपा में यह लेख छपा है जिसमें अमेरिका की नीयत और नीति का ख़ुलासा किया गया है-
राजनयिक का अपमान
अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी और उनके साथ बदसलूकी पर भारतीय समाज और सरकार की सख्त प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। देवयानी खोबरागडे पर जो आरोप हैं, वे गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा रवैया न सिर्फ राजनयिक नजरिये से गलत है, बल्कि अमानवीय भी है। राजनयिकों के साथ व्यवहार के बारे में वियना समझौते के नियमों के मुताबिक भी उनकी गिरफ्तारी और उन्हें हथकड़ी लगाना कहीं से जायज नहीं ठहराया जा सकता। किसी अमेरिकी नागरिक पर भी ऐसे आरोप होते, तो शायद उसके साथ ऐसा नहीं किया जाता, लेकिन एक मित्र देश की राजनयिक के साथ ऐसा सुलूक करना अमेरिकी अहंकार और असंवेदनशीलता को दिखाता है। लेकिन यह पहला मौका नहीं है कि विदेशी राजनयिकों के साथ अमेरिका में आम अपराधी जैसा सुलूक किया गया है।
इसके पहले भी ऐसी घटनाएं भारत या अन्य देशों के राजनयिकों के साथ होती रही हैं। अमेरिका दुनिया की एकमात्र महाशक्ति है, इसलिए दूसरे देश सिर्फ औपचारिक विरोध करके रह जाते हैं। मगर भारत सरकार ने बदले में सख्त कार्रवाई करके जो संदेश दिया है, वह शायद दूसरे ऐसे देशों का हौसला भी बढमएगा। अमेरिका का यह कहना है कि वियना समझौते के तहत प्राप्त सुरक्षा सिर्फ राजनयिक कामकाज के लिए है, और अगर कोई राजनयिक किसी अराजनयिक मामले में फंसता है, तो उसके साथ आम अपराधी की तरह की सलूक किया जाएगा। कुछ साल पहले एक यूरोपीय देश के राजनयिक को एक सड़क दुर्घटना के सिलसिले में अमेरिका में जेल भेज दिया गया था। लेकिन अमेरिका दूसरे देशों में अपने राजनयिक ही नहीं, अन्य लोगों के लिए भी विशेष सुविधाएं चाहता है, भले ही वे संदेहास्पद चरित्र के लोग हों।
कुछ वक्त पहले अमेरिकी दूतावास के लिए काम कर रहे एक अमेरिकी ठेकेदार ने पाकिस्तान में कुछ लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। उसे राजनयिक सुरक्षा नहीं मिली हुई थी, लेकिन अमेरिका ने दबाव डालकर उसे पाकिस्तान से छुड़वाकर अमेरिका पहुंचा दिया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। मुंबई में 26/11 के आतंकवादी हमलों का आरोपी डेविड हेडली अमेरिकी जेल में बंद है, लेकिन अमेरिका उसे भारत को सौंपने को तैयार नहीं है। डेविड हेडली अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के लिए काम करता था और उसकी हरकतों की जानकारी होते हुए भी अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने उसे वक्त रहते नहीं पकड़ था, न भारत को उसकी हरकतों की जानकारी दी थी। अगर ऐसा किया जाता, तो शायद 26/11 का हमला रोका जा सकता था। इससे जाहिर होता है कि अमेरिका का दूसरे देशों से व्यवहार परस्पर सम्मान और अंतरराष्ट्रीय परंपराओं के मुताबिक नहीं, बल्कि ताकत के तर्क से तय होता है। इस मामले में भी भारत का यही कहना है कि सामान्य मानवीय शिष्टाचार का खयाल तो रखा जाना चाहिए था। 
भारत में राजनयिकों के विशेषाधिकारों का खयाल रखा जाता है। कुछ तो यह राजनयिक शिष्टाचार की वजह से है, और कुछ भारत की वीआईपी संस्कृति की वजह से। अगर भारत ने अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकारों में कटौती की है, तो यह वक्त है कि हम अपने रवैये में कुछ स्थायी बदलाव लाएं। ऐसे देशों के राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दें, जो हमारे नागरिकों के सम्मान का खयाल नहीं रखते। अगर हम सिर्फ राजनयिकों या विदेशी नागरिकों ही नहीं, हमारे अपने विशेषाधिकार प्राप्त नागरिकों को भी आम नागरिकों की तरह समझना सीख जाएंगे, तो हमारी नाराजगी का भी असर ज्यादा पडेगा।
इस लेख के बाद यह सवाल उठता है कि आखि़र अमेरिकी हाथों से क्यों उतर रहे हैं भारतीयों के कपड़े ?
इसका जवाब यही है कि एशियाई देशों की शक्ति बिखरी हुई है। जब तक ये देश अपने साझा हित के लिए एक नहीं होंगे तब तक भारतीयों के कपड़े उतरते ही रहेंगे। आगे से चाहे राजनियकों के कपड़े न भी उतारे जाएं तब भी आम भारतीयों को तो ज़िल्लत बर्दाश्त करनी ही पड़ेगी।
बहरहाल संशोधित लोकपाल मुबारक हो।
सुना है कि यह संसद में पास हो गया है और अन्ना ने अपना अनशन तोड़ दिया है। उनके मंच पर उनके साथ खड़े बीजेपी और कांग्रेस के समर्थक भी ख़ुशी से तिरंगा फहरा रहे हैं।
अब सरकार को इस लोकपाल से दो चार मंत्रियों को पकड़वाना ही पड़ेगा वर्ना अरविंद केजरीवाल का आरोप सच साबित हो जाएगा कि इस क़ानून से तो एक चूहा भी जेल नहीं जाएगा।
धन्यवाद अरविंद केजरीवाल, इतने अच्छे कमेंट के लिए कि लोकपाल के शिकंजे में भ्रष्टाचारी को फंसना ही पड़ गया।
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फिर वही ढाक के तीन पात



चार राज्यों में चुनाव के परिणामों ने आज सच में भारत में महोत्सव का माहौल बना दिया है ! वर्षों की मायूसी, मोह भंग एवँ जद्दोजहद की ज़िंदगी जीने के बाद आज भारत की जनता के मुख पर अरसे के बाद एक सच्ची मुस्कान दिखाई दी है ! सत्ता परिवर्तन के साथ देश में राहत का वातावरण भी तैयार हो सकेगा जनता इसके लिये आशान्वित हो उठी है ! अन्याय, अराजकता, भ्रष्टाचार, मँहगाई, असुरक्षा और आतंक की चक्की में पिसते-पिसते आम जनता की मनोदशा इतनी दुर्बल हो गयी थी कि उसके लिये आस्था, विश्वास, निष्ठा, भरोसा जैसे शब्द अपना अर्थ खो चुके थे ! इतने वर्षों तक आकण्ठ भर चुका पाप का घड़ा एक दिन तो फूटना ही था ! आज के चुनाव परिणाम के साथ यह शुभ दिन भी आ गया ! आज सच में उत्सव मनाने का दिन है !
इन चुनावों में कॉंग्रेस पार्टी की हार होगी और भारतीय जनता पार्टी की जीत होगी इसके लिये तो जनता मानसिक रूप से तैयार थी ही लेकिन अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी इतने ज़ोरदार तरीके से अपनी आमद दर्ज करायेगी यह अवश्य ही अप्रत्याशित था ! सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई एवँ शुभकामनायें !
जिस तरह से दिल्ली में सीटों के आँकड़े सामने आये हैं उनके अनुसार दिल्ली में पुन: त्रिशंकु विधान सभा बनने के आसार दिखाई दे रहे हैं ! ३१ सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत ना मिलने के कारण सरकार बनाने के लिये ना तो भारतीय जनता पार्टी ही उत्सुक दिखाई दे रही है ना ही २८ सीटें जीतने के बाद आम आदमी पार्टी ! बदलाव होना चाहिये लेकिन इस तरह का जनादेश जनता का कोई भला नहीं कर सकता यह भी विचारणीय है ! जनता ने अपना समर्थन देकर कॉंग्रेस पार्टी को करारी हार दिलाई सिर्फ इसी आशा में कि अब साफ़ सुथरी सरकार सत्ता सम्हालेगी और आम जनता की चिंताओं और फिक्रों को विराम लग जायेगा ! लेकिन जो परिणाम सामने आये उसमें कोई भी पार्टी अकेली सरकार बनाने के लिये समर्थ नहीं ! और आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों मिल कर सरकार बनाने के लिये तैयार नहीं ! दोनों ही विपक्ष में बैठने की बात कर रहे हैं जिसका सीधा अर्थ है राष्ट्रपति शासन अर्थात परदे के पीछे से फिर कॉंग्रेस का ही शासन ! यानी कि फिर वही ढाक के तीन पात ! यदि ऐसा होता है तो जनता फिर छली जायेगी ! चुनाव खाली हार जीत का ही खेल नहीं है यह जनता द्वारा सरकार बनाये जाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया है ! चुनाव में खड़े होना का अर्थ देश के प्रति अपने समर्पण एवं त्याग को स्थापित करना है यह मात्र अहम तुष्टि का साधन नहीं है ! इन परिणामों ने फिर से चिंतित कर दिया है ! तो क्या अब भी दिल्ली के भविष्य पर अनिश्चय के बादल ही मँडराते रहेंगे ?
जनता ने चुनाव में मतदान करके अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया ! अब फ़र्ज़ अदायगी का नंबर नेताओं का है कि वे आपसी मतभेद भूल कर अपने अपने प्रदेशों को साफ़ सुथरी, निष्ठावान एवँ कर्तव्यपरायण सरकार दें जो आम आदमी की दिक्कतों को समझे, उन्हें दूर करने के लिये प्रयासरत रहे और भ्रष्टाचार, स्वार्थ और अकर्मण्यता की पुरानी प्रचलित परम्पराओं को तोड़ कर अपनी साफ़ सुथरी छवि जनता के सामने स्थापित करे !

साधना वैद  

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लिफ़्ट (कहानी)

        आलीशान होटल की लिफ़्ट ऊपर से नीचे आकर रूकी तो अंदर से एक एक करके सभी निकले और चले गए। मैं इत्मीनान से उसमें दाखि़ल हो गया। मेरे पीछे पीछे लम्बे क़द की एक ख़ूबसूरत लड़की भी लिफ़्ट में आ गई। वह उम्र में मेरी छोटी बेटी जैसी थी लेकिन उसका लिबास मेरी बेटियों जैसा न था। उसने मिनी स्कर्ट से भी छोटा कुछ पहन रखा था और टॉप के नाम पर जो था, वह स्किन कलर में भी था और स्किन टाइट भी। अलबत्ता उसका गला ढीला था, जो उसकी छातियों पर पड़ा दायें बायें झूल रहा था। मुख्तसर यह कि उसका अन्दाज़ पूरी तरह अमेरिकन था। एक औरत जो कुछ छिपाना चाहती है, वह सब यह दिखा रही थी।
       शायद उसने क़ानून के सम्मान के लिए ही कपड़े पहन रखे थे क्योंकि सार्वजनिक जगहों पर नंगा घूमना क़ानूनी तौर पर मना है। लिफ़्ट का बटन दबाने के लिए उसने अपना हाथ बढ़ाया तो मैंने घबरा कर अपना हाथ रोक लिया। उसने अपनी मंज़िल का बटन दबाकर अपना सनग्लास माथे पर अटका लिया और फिर मेरी तरफ़ देखा। वह मेरे घबराए हुए चेहरे का बग़ौर मुआयना कर रही थी। 
उसके बाल, बदन और लिबास से जो मुरक्कब ख़ुश्बू (मिश्रित सुगंध) उड़कर मेरी नाक में आ रही थी। वही मेरे बूढ़े दिल की धड़कनें बढ़ा रही थीं। इस पर यह कि उसने अपने पर्स से एक छोटी सी बॉटल निकाल कर एक घूंट भी पी ली। अब उसके मुंह से व्हिस्की की गंध भी आ रही थी। शराबी नशे में किसी भी हद तक जा सकता है और इसकी हद तो बेहद लग रही थी। मुझ पर बदहवासी तारी हो गई। ए.सी. के बावुजूद मेरी पेशानी पर पसीने के क़तरे नुमूदार हो गए। मैंने जेब से रूमाल निकाल कर अपना माथा साफ़ किया तो उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैरने लगी।
उसकी मंज़िल आने में अभी कुछ वक्त और था। उसने वक्तगुज़ारी के लिए अपना पर्स खोलकर कुछ तलाश किया। इस तलाश में हर बार वह कोई न कोई चीज़ हाथ में लेकर बाहर निकालती। जिनकी बनावट देखकर और इस्तेमाल की कल्पना करके ही मेरी धड़कनें बेक़ाबू हो रही थीं। इस तलाश में उसने अपने काम की सारी चीज़ें एक एक करके मुझे दिखा दीं। शायद यही उसका मक़सद था। 
उसका पर्सं भी इम्पोर्टेड था और उसकी चीज़ें भी। पर्स बंद करके उसने एक बार फिर मुझे मुस्कुरा कर देखा। मैं समझ गया कि वह मेरी हालत से लुत्फ़अन्दोज़ हो रही है। कभी कभी लम्हे कैसे सदियां बन जाते हैं, इसका अंदाज़ा मुझे आज हो रहा था।
उसकी मंज़िल पर लिफ़्ट रूकी तो मैं भी उसके पीछे पीछे ही लिफ़्ट से निकल आया। इस जैसी क़ातिल हसीना किसी भी मंज़िल से लिफ़्ट में फिर से दाखि़ल हो सकती थी। मैं दोबारा रिस्क नहीं लेना चाहता था। मैं उसके बराबर से निकला तो उसने बड़ी अदा के साथ अपने बाल समेटे और खुलकर एक क़हक़हा लगाया। मुझे अभी 5 मंज़िल और ऊपर जाना था। मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गया। होटल की सीढ़ियां लिफ़्ट के मुक़ाबले ज़्यादा सेफ़ होती हैं।  
मैं बूढ़ा हूँ, दिल का मरीज़ हूँ। सीढ़िया चढ़ना मेरे लिए जानलेवा हो सकता है लेकिन फिर भी इज़्ज़त बचाने का यही एक तरीक़ा मुझे नज़र आया। वह मुझे सीढ़ियों पर चढ़ते देखकर और ज़्यादा ज़ोर से हंस रही है। उसकी नज़र के दायरे से निकलने के लिए मैं घबराकर तेज़ तेज़ क़दम उठा रहा हूँ। अचानक मुझे अपना दिल बैठता हुआ सा लग रहा है और मेरी चेतना डूबती जा रही है। पता नहीं अब कभी आंख खुलेगी या नहीं लेकिन मेरी इज़्ज़त बच गई है। मुझे ख़ुशी है कि मैं अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और घरवालों की नज़र में शर्मिन्दा होने से बच गया हूँ।
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भारतीय नारी ब्लॉग पर हिन्दी ब्लॉगर शिखा कौशिक जी की लघुकथा ‘पुरूष हुए शर्मिन्दा’ पढ़कर हमें यह लघुकथा लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई है जो एक दूसरा पहलू भी सामने लाती है। इससे पता चलता है कि हमारे समाज में कितने रंग-बिरंगे व्यक्ति रहते हैं और यह कि न सभी पुरूष एक जैसे हैं और न ही सारी औरतें एक जैसी हो सकती हैं।
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जमाली चाय दे स्वर्गिक आनंद का अहसास Best Herbal Tea

कहते हैं कि शराब इनसान को उसकी अपनी ही नज़र में गिरा देती है। अख़बारी दुनिया के टी. टी. बहादुर अपनी नज़र में गिरे या नहीं, इसका तो पता नहीं है लेकिन वह अपने दुश्मनों की नज़र में ज़रूर चढ़ गए हैं। टी के बजाय उन्होंने शराब पी ली और अपने दोस्त की लड़की को कुछ ऐसा दिखा दिया कि वह सीसीटीवी फ़ुटेज में लिफ़्ट से निकल कर तेज़ तेज़ भागती सी दिखाई दी। शराब इनसान को बदनामी और जि़ल्लत के सिवाय और दे ही क्या सकती है?
अक्लमंद आदमी तो आजकल चाय पीने से भी बचते हैं। इसके ज़रिये बिला वजह  बॉडी में शुगर जाती रहती है और फिर अपने ही हाथों करेले निचोडकर पीने पड़ते हैं। चाय पीने से शरीर में तेज़ाब बनता है और वीर्य भी पतला पड़ जाता है। इसी के चलते एक बड़े लीडर को अपनी घरवाली को छोड़कर भागना पड़ गया। पहले वह चाय बेचा करता था। 
लोगों ने खोजबीन की तो उसने बहाना बनाया कि दरअसल उसके माता पिता ने उसकी मर्ज़ी  के बिना उसका विवाह कर दिया था। इसलिए उसने अपनी पत्नी को छोड़ दिया था। वह एक स्वयंसेवी संस्था का मेम्बर बन गया। जो माता पिता की सेवा न कर पाया वह देश की सेवा में जुट गया। बीवी का फ़रार मुजरिम टी. वी. पर छाता चला गया। कर्तव्य  और नैतिकता से डिगा हुआ वह चाय वाला अपने भाषणों में भी तेज़ाब के सिवा कुछ और न उगल सका। बदले में उसे मोटी मलाई मिलने लगी। मलाई मिली तो चाय के साइड इफ़ेक्ट भी दूर होते चले गए।
आज (24 नवंबर 2013 को) चाय वाले के बारे में टी. वी. पर यह ताज़ा ख़बर मिल रही है कि बीवी को छोड़ने के बाद उसने बरसों से एक बाहरवाली को एंगेज कर रखा है। उस बाहरवाली के परिवार वालों को उस चायवाले ने बहुत नवाज़ा है। इससे मलाई की तासीर का पता चलता है। चाय वाले ने मलाई खिलाई तो बाहरवाली ने आज तक यौन शोषण की शिकायत नहीं की।
आज भलाई का ज़माना हो या न हो लेकिन मलाई का ज़माना ज़रूर है। शराब के नशे में अपने टी. टी. बहादुर यह हक़ीक़त भी फ़रामोश कर बैठे। बिना मलाई के तो शिकायत ही होनी थी सो हुई। टी. टी. बहादुर परेशान हैं। पुलिस किसी भी वक्त उनके घर की बेल बजा सकती है। जो प्रशिक्षित कार्यकर्ता चायवाले की बाहरवाली पर आंखें बन्द किये बैठे हैं, वे टी. टी. पर त्यौरियां चढ़ा रहे हैं। अन्याय सांप्रदायिकता का मूल लक्षण है। प्रतिशोध ही उनका राष्ट्रवाद है।
वे न्याय की बात कभी नहीं कह सकते। वे चायवाले से कभी नहीं कह सकते कि भाई साहब! जिस पत्नी का जीवन ख़राब किया है, उससे माफ़ी मांगो। बाहर जो नैतिकता, मर्यादा और क़ानून का उल्लंघन कर रहे हो, उसकी सज़ा भुगतो। अलबत्ता ये लोग टी. टी. बहादुर को जेल भिजवाने की जी जान से कोशिश कर रहे हैं।
जब आदमी अपनी न्याय चेतना को खो दे तो समझ लीजिए कि वह इंसान कहलाने का हक़ खो चुका है। इंसान वही है जो न्याय को पहचाने और अपने कर्तव्य को पूरा करे। इसके बदले में इंसान को कोई मालो-शोहरत भले ही न मिले लेकिन वह ‘स्व में स्थित’ रहता है, अपने आपे में क़ायम रहता है। जो बड़ी साधनाओं से नहीं हो पाता। वह सहज ही हो सकता है। यह सबसे बड़ी दौलत है। परलोक में यही दौलत काम आएगी। इसके लिए बार बार अपने माईन्ड को डी-कन्डीशंड करते रहने की ज़रूरत है। 
किसी की हिमायत में या किसी के विरोध में बोलते समय बार बार अपने मन में यह सवाल पूछो कि मैं इसकी हिमायत या इसका विरोध क्यों कर रहा हूं?
फ़ौरन ही आपको जवाब मिल जाएगा। या तो आप कुछ दुनियावी चीज़ पाने के लिए ऐसा कर रहे होंगे या फिर कुछ खोने के डर से। यह पशुवृत्ति है।
आप इसे नकार दीजिए। थोड़ी सी कोशिश करने के बाद आपके कर्म न्याय और कर्तव्य की भावना से होने लगेंगे। यही आपके जन्म लेने का मक़सद है। ऐसे लोगों के लिए मौत नहीं है। इनके लिए मौत अनन्त जीवन के अनन्त सुख में प्रवेश का माध्यम है। योग के बाद अब बात हो जाए आयुर्वेद की।
बहरहाल जब तक जीवन है। तब तक शराब न पिएं। चाहें तो चाय पी लें। चाय एसिड बनाए तो बाद में मलाई का सेवन कर लें। चाय में ही दूध और मलाई डाल लें तो आपका वक्त बच जाएगा।
हम एक निराली चाय का सेवन करते हैं। एक बड़े कप के बराबर पानी में 10 दाने सौंफ़, 10 अजवायन, 1 ग्राम अदरक, 1 लौंग, 2 काली मिर्च फोड़कर, एक छोटी इलायची, 5-7 तुलसी के पत्ते, 1 छुहारा व 1 बादाम मोटा कतरकर हल्की आंच पर चन्द मिनट पका लेते हैं। इसे छानकर कप में निकाल लेते हैं। छलनी में से बादाम और छुहारे के पीस चम्मच से चुन चुन कर उठाकर कप में डाल लेते हैं। मिठास के लिए एक-दो चम्मच शहद मिलाते हैं। इस चाय को पीने के साथ हम बीच बीच में छुहारे और बादाम के पीस भी चम्मच से निकाल कर खाते रहते हैं। यह निराली चाय हमारे द्वारा विकसित किये जाने के कारण जमाली चाय के नाम से याद की जा सकती है।
जमाली चाय के फ़ायदेः 
इसका ज़ायक़ा बेनज़ीर और फ़ायदे बे-मिसाल हैं। कहां तक इसके फ़ायदे बताएं। यह चाय घर को स्वर्ग बना देती है। जो स्वर्ग और जन्नत के इनकारी हैं। वे इसका सेवन करके नमूने के तौर पर दुनिया में ही स्वर्ग का आनंद और जन्नत का लुत्फ़ का अहसास कर सकते हैं। जो नियमित रूप से इसे पीता है। वह घरवाली को छोड़कर नहीं भाग सकता और घरवाली उसे छोड़कर नहीं भाग सकती। आंत, लिवर, मन और माईन्ड पर भी इसके लाजवाब असरात पड़ते हैं। डिप्रेशन पास नहीं आता, आ जाए तो टिक नहीं पाता। आत्महत्या का विचार मन को नहीं भाएगा और जवानी में बुढ़ापा नहीं आएगा। बुढ़ापे में सुस्ती और थकावट नहीं आएगी। आप ख़ुद को हर दम घोड़े पर सवार महसूस करेंगे। अगर आज के ज़माने में आपके पास घोड़ा है तो वास्तव में आप एक राजा हैं। आप राजा हैं तो आपकी पत्नी रानी है। आपके पास घोड़ा (अश्व) भी है और रानी भी है। अश्वमेघ यज्ञ का पुण्य पाना अब आपके अपने हाथ में है। इस चाय से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सबकी सिद्धि सहज ही हो जाएगी। ऋषियों ने आयुर्वेद से भी जीवन का मक़सद ही पूरा किया है।
दूध और मलाई हम नाश्ते में ले लेते हैं। आप दूध-मलाई न लेना चाहें तो भी किसी न किसी रूप में कैल्शियम की निश्चित मात्रा नियमित रूप से लेते रहें। हड्डियां मज़बूत हों तो आदमी बहुत कुछ झेल सकता है।
टी. टी. बहादुर के कंधे देखकर लगता है कि उनकी हड्डियां भी काफ़ी मज़बूत हैं। राजनीति के महा-मगरमच्छों के जबड़े उनकी हड्डियों की डेन्सिटी कैसे नापते हैं?
चाय पीते हुए हम देख ही रहे हैं। आप भी देखते रहिए।

डिस्क्लेमरः 

  • यह लेख किसी अख़बार वाले की हिमायत में या किसी चाय वाले के विरोध में नहीं है। 
  • इस पोस्ट को समझने के लिए पिछली पोस्ट ‘यौन उत्पीड़न किसे कहते हैं?’ पढ़ना ज़रूरी नहीं है।
 Source: http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/ayurvedic-tea
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यौन उत्पीड़न किसे कहते हैं? yaun shoshan

तरूण तेजपाल ने बड़ी हिम्मत के साथ स्वीकार किया है कि हां, उन्होंने अपनी सहकर्मी महिला पत्रकार के साथ वह किया है जिसे वह यौन उत्पीड़न बता रही है।
वह सहकर्मी महिला पत्रकार भी बहुत बहादुर निकली। उसनेभी अपना उत्पीड़न भले ही करवा लिया लेकिन उसे बर्दाश्त बिल्कुल नहीं किया। उसने चिठ्ठी लिखकर तहलका पत्रिका की प्रबंध संपदिका शोमा सिंह को सारा माजरा बता दिया और सच्चाईदुनिया के सामने आ गई। पत्रकार का फ़र्ज़ यही तो होता है कि दुनिया के सामने सच्चाई ले आए।
देखिए, मॉडर्न एजुकेशन हमारे देश को कैसे कैसे बहादुर दे रही है।
उधर शोमा सिंह कह रही हैं कि मेरी पहली तरजीह महिला पत्रकार को अच्छा फ़ील कराना है और वह करा भी रही हैं।
अगर उत्पीड़िता ने अच्छा फ़ील कर लिया तो मामला आपसी सहमति से निपट भी सकता था लेकिन तरूण तेजपाल की सताई हुई पार्टियों को बैठे बिठाए मौक़ा मिल गया। वे तरूण तेजपाल को लम्बा नापने की फ़िराक़ में हैं। अगर ऐसे आड़े वक्त के लिए तरूण तेजपाल ने कोई सीडी बचाकर नहीं रखी है तो वह चौड़े में मारे जाएंगे। इसमें कोई शक नहीं है। जल में रहकर मगरमच्छों से इसीलिए तो कोई बैर नहीं करते।
बहरहाल ताज़ा ख़बर यह है कि गोवा पुलिस के उपमहानिरीक्षक ओ. पी. मिश्रा जी ने बताया है कि तरूण तेजपाल के खि़लाफ़ एफ़आईआर दर्ज कर ली गई है।
इस कांड के बाद एजुकेटिड पुरूषोंमें सहकर्मी महिलाओं के प्रति अविश्वास उत्पन्न होने का ख़तरा भी पैदा हो गया है। आनन्द के पलों का लुत्फ़ उठाते हुए कौन यह जान सकता है कि कल इसी लुत्फ़ को उत्पीड़न क़रार दिया जा सकता है।
तमाम अंदेशों के बावजूद होटलों में सम्मेलन और सेमिनार चलते रहेंगे और औरत और मर्द तरक्क़ी करते रहेंगे। यह भी सच है।
इस तरह की घटनाएं हमें कन्फ़्यूज़ कर देती हैं कि आखि़र यौन उत्पीड़न क्या है?
एक पढ़ी लिखी और बालिग़ लड़की को क्या चीज़ मजबूर करती है कि वह अपने आप को यौन शोषण के लिए अर्पित करने के लिए होटल के कमरे में ख़ुद ही चल कर जाए और फिर शोर मचाए।
क्या इसे मर्द का यौन उत्पीड़न न माना जाए?
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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