इस्लाम धर्म का रोजा सिर्फ भूखे या प्यासे रहने की परंपरा मात्र नहीं है

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  • Thursday, July 26, 2012
  • by
  • ayaz ahmad
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  • हिजरी कैलेंडर का नवां महीना रमज़ान होता है। पूरी दुनिया में फैले इस्लाम के अनुयायियों के लिए रमज़ान का पवित्र महीना एक उत्सव होता है। इस्लाम धर्म की परंपराओं में रमज़ान में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरुरी फर्ज होता है, उसी तरह जैसे 5 बार की नमाज अदा करना जरुरी है। इस बार रमज़ान के पाक महीने की शुरुआत 21 जुलाई, शनिवार (यदि 20 जुलाई को चांद नहीं दिखा तो रमज़ान 22 से शुरु होगा) से हो रही है।




    इस्लाम धर्म में रमज़ान के महीने में रोजा गहरी आस्था के साथ रखे जाते हैं। किंतु इस्लाम धर्म का रोजा सिर्फ भूखे या प्यासे रहने की परंपरा मात्र नहीं है बल्कि रोजे के दौरान कुछ मानसिक और व्यावहारिक बंधन भी जरुरी बताए गए हैं। जानते हैं रोजे के दौरान पालन किए जाने वाले नियमों को -

    1- रोजे के दौरान सिर्फ  भूखे-प्यासे ही न रहें बल्कि आंख, कान और जीभ का भी गलत इस्तेमाल न करें यानी न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न ही बुरा कहें।

    - हर मुसलमान के लिए जरुरी है कि वह रोजे के दौरान सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के बीच के समय में खान-पान न करे। यहां तक कि कुछ गलत सोचे भी नहीं। 

    - रोजे की सबसे अहम परंपराओं में सेहरी बहुत लोकप्रिय है। सेहरी शब्द सेहर से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है सुबह। जिसका नियम है कि सूर्य के उदय होने से पहले उठकर रोजेदार सेहरी खाते हैं। इसमें वह खाने और पीने योग्य पदार्थ लेते हैं। सेहरी करने के बाद सूर्य अस्त होने तक खान-पान छोड़ दिया जाता है। इसके साथ-साथ मानसिक आचरण भी शुद्ध रखते हुए पांच बार की नमाज और कुरान पढ़ी जाती है। सूर्यास्त के समय इफ्तार की परंपरा है।

    - इस्लाम धर्म में बताए नियमों के अनुसार पांच बातें करने पर रोजा टूट जाता है- पहला झूठ बोलना, दूसरा बदनामी करना, तीसरा किसी के पीछे बुराई करना,चौथा झूठी कसम खाना और पांचवां लालच करना।
    माखज़ - http://religion.bhaskar.com/article/utsav--ramzan-the-month-of-lords-prayer-keep-these-things-in-mind-3547126-NOR.html

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