आतंकवादी शहीद नहीं होता atankwad

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  • Thursday, May 9, 2013
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • राजनैतिक स्वार्थ के लिए आम जनता को भड़काना और ख़ून ख़राबे के लिए उनका इस्तेमाल करना राजनेताओं की पुरानी चाल है। नौजवानों में जोश ज़्यादा होता है और अनुभव कम। ऐसे में वे शातिर बूढ़े नेताओं के भड़काने के बाद दंगे से लेकर आतंकवादी घटनाएं तक अंजाम देते रहते हैं।
           ऐसे कामों से इंसान का ज़मीर रोकता है। ऐसे कामों से धर्म और समाज रोकता है। इस रूकावट को दूर करने का तरीक़ा इंसानियत के दुश्मनों ने यह निकाला है कि ऐसे ज़ुल्म को धर्म का काम बताया जाए और ऐसे बुरे काम को अंजाम देने वाले ज़ालिम को शहीद बताया जाए। उसके मरने के बाद उसे सम्मान दिया जाए, उसके परिवार को ईनाम में बहुत कुछ दिया जाए।
    एक आतंकवादी किसी बाज़ार में बम विस्फोट करके मासूम औरतों और बच्चों समेत बहुतों की जान ले लेता है। उसे शहीद कहना सच्चे शहीदों का अपमान करना है। आतंकवादी चाहे अपने देश में आतंक फैलाएं या विदेश में। आखि़रकार उनके आतंकवाद से आम नागरिक ही तो मरते हैं, हमारे जैसे ही इंसान मरते हैं।
    इन्हें शहीद कहना लोगों को ‘शहादत‘ के सही अर्थ के बारे में भ्रम पैदा करना है। 


    शान्ति मनुष्य का स्वभाव और उसका धर्म है। अगर कभी कोई इंसान किसी दूसरे इंसाने से ज़बान से भी लड़ लेता है तो उसके दिल का चैन ख़त्म हो जाता है। जब तक कि वह दूसरे पक्ष से अपने ताल्लुक़ात सामान्य नहीं कर लेता। दंगे और आतंकवाद करने वालों का भी दिल का चैन ख़त्म हो जाता है और कभी कभी तो इनकी ज़िन्दगी इनके अपनों के ही हाथों ख़त्म हो जाती है जैसा कि बोस्टन की आतंकवादी घटना में देखने में आया है।
    ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार मासूम इंसानों की जानें बचाने के लिए और शान्ति की स्थापना के लिए जो बहादुर लोग आतंकवादियों से लड़ते हुए मारे जाते हैं। वास्तव में केवल वही शहीद होते हैं।
    शातिर राजनेताओं के द्वारा ईश्वर और धर्म के बारे में आम जनता को कन्फ़्यूज़ करने के बावजूद भी दुनिया की सरकारें उन्हीं बहादुरों को शहीद का दर्जा देती हैं जो कि मासूम इंसानों की जानें बचाने के लिए और शान्ति की स्थापना के लिए आतंकवादियों से लड़ते हुए मारे जाते हैं।
    समाज में शहीद की इज़्ज़त होती है और आतंकवादी को ज़िल्लत की निगाह से देखा जाता है। यह चीज़ नौजवानों को आतंकवाद से रोकने में अहम भूमिका रखती है।
    पिछले कुछ समय से यह देखने में आ रहा है कि नौजवानों को आतंकवादी घटनाओं की प्रेरणा देने वाले लीडर उनके मरने के बाद उन्हें शहीद घोषित कर देते हैं। इससे समाज में उनके काम से जो नफ़रत पैदा होनी चाहिए थी। वह पैदा होने के बजाय उनके लिए दिलों में सम्मान पैदा होता है। उन्हें मिलने वाले सम्मान और नक़द ईनाम को देखकर दूसरे नौजवान भी करोड़ों में खेलने के लिए आतंकवाद को एक करियर के रूप में चुन सकते हैं।
    क़ौमियत या राष्ट्रवाद ने इंसानियत को बांट दिया है और एक इंसान को ही दूसरे इंसान की जान का दुश्मन बना दिया है।
    राजनैतिक स्वार्थ के लिए किसी भी देश के राजनेता अपने आतंकवादियों को चाहे शहीद कह लें लेकिन रात उनके कहने से अगर दिन नहीं हो सकती तो फिर उनके कहने से कोई आतंकवादी भी शहीद नहीं हो सकता।
    इसके बावजूद आतंकवादी के परिवार को आर्थिक अभाव से ज़रूर बचाना चाहिए ताकि उनका अभाव उनके भटकाव का कारण न बने। इसके अलावा भी उनके साथ इंसानी हमदर्दी से पेश आना चाहिए।
    आतंकवादियों को भी अदालतें जो सज़ा दें, उसके अलावा उन्हें दूसरे ज़ुल्म का निशाना न बनाया जाए। वे तो केवल शाख़ें हैं। जड़ें तो कहीं दूर होती हैं और वे राष्ट्र का अध्यक्ष बनकर दुनिया से सम्मान पा रहे होते हैं।
    राजनीति के शातिर खिलाड़ियों की अपनी डिप्लोमेसी होती है। इन्हें इनके जुर्मों के लिए दुनिया में कभी पूरी सज़ा नहीं मिल पाई है लेकिन आखि़रत यानि परलोक में ये बच नहीं पाएंगे।
    सच्चे शहीदों को अपनी क़ुरबानियों को असल ईनाम भी उसी दिन मिलेगा।
    दुनिया में तो बहुत से सच्चे शहीदों की क़ुरबानियां भी सामने नहीं आ पाई हैं।
    यह सब इसलिए लिखा गया है ताकि इंसानियत के रखवालों और ज़ालिमों के दरम्यान अंतर की पहचान बाक़ी रहे।
    इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि 
    ‘आतंकवादी शहीद नहीं हो सकता‘

    1 comments:

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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