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जड़ना वही नगीना सीखा

जिसने दुःख में जीना सीखा
जड़ना वही नगीना सीखा

फटेहाल जीवन की गाथा
चिथड़ों को भी सीना सीखा

जीवन को भवसागर कहते
कैसे चले सफीना सीखा

जीवित रहना कम साधन में
सालों साल महीना सीखा

कितने कम हैं खुशियों के पल 
जहर ग़मों का पीना सीखा

बिना परिश्रम भोग, रोग है
निकले सदा पसीना सीखा

चाल अघोषित है जीवन की
नूतन सुमन करीना सीखा
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सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं

लेखन में प्रतिबंध मुझे स्वीकार नहीं
प्रायोजित रचना से कोई प्यार नहीं

बच के रहना साहित्यिक दुकानों से
जी कर लिखता हूँ कोई बीमार नहीं

मठाधीश की आज यहाँ बन आई है
कितने डर से करते हैं तकरार नहीं

धन प्रभाव के बल पर उनकी धूम मची
कोई जिनको साहित्यक आधार नहीं

रचना में ना दम आती विज्ञापन से
ऐसे जो हैं लिखने का अधिकार नहीं

उठे कलम जब दिल में मस्ती आ जाए
खुशबू रचना में होगी इनकार नहीं

खुशबू होगी तो मधुकर भी आयेंगे
सेवा है साहित्य सुमन व्यापार नहीं
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राम तुम्हें वनवास मिलेगा

दुहराता इतिहास मिलेगा
राम तुम्हें वनवास मिलेगा

हर युग में हैं लोग बदलते
रावण खासमखास मिलेगा

मिल सकते सुग्रीव परन्तु
दुश्मन का आभास मिलेगा

भले मिलेंगे कई विभीषण
वैसा नहीं समास मिलेगा

शायद नाव बिठाये केवट
बदले में संत्रास मिलेगा

लक्ष्मण, सीता साथ चलेंगे
क्या वैसा एहसास मिलेगा

राम नहीं चूको तुम फिर भी
सुमन सदा उपहास मिलेगा
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सलीब ढोते हैं

सुलगती रोज चिताओं पर लोग रोते हैं
जमीर बेच के जिन्दा जो, लाश होते हैं

कुदाल बन के भी जीना क्या, जिन्दगी होती
चमक में भूल के नीयत की, सलीब ढोते हैं

शुकून कल से मिलेगा ये, चाहतें सब की
मिले क्यों आम भला उनको, नीम बोते हैं

लगी है आग पड़ोसी के घर में क्यों सोचें
मिलेंगे ऐसे हजारों जो, चैन सोते हैं

नहीं सुमन को निराशा है, भोर आने तक
जगेंगे लोग वही फिर से, जमीर खोते हैं
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ऐसे रचनाकार कई

कहते हम सब भाई भाई, ऐसे रचनाकार कई
आपस में छीटें रोशनाई, ऐसे रचनाकार कई

समझाने के वो काबिल हैं, जिसने समझा रिश्तों को
इनको अबतक समझ न आई, ऐसे रचनाकार कई

बोझ ज्ञान का ढोना कैसा, फ़ेंक उसे उन्मुक्त रहो
कहते, होती है कठिनाई, ऐसे रचनाकार कई

इधर उधर से शब्द उड़ाकर, कहते हैं रचना मेरी
कविता पे होती कविताई, ऐसे रचनाकार कई

अलग अलग दल बने हए हैं, राजनीति और लेखन में
अपनी अपनी राम दुहाई, ऐसे रचनाकार कई

लेखन की नूतन प्रतिभाएँ, किस दुकान पर जायेंगे
खो जातीं हैं यूँ तरुणाई, ऐसे रचनाकार कई

लिखते हैं जिसके विरोध में, वही आचरण अपनाते
यही सुमन की है चतुराई, ऐसे रचनाकार कई
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खार में भी प्यार है

वक्त के संग चल सके तो, जिन्दगी श्रृंगार है
वक्त से मिलती खुशी भी, वक्त ही दीवार है

वक्त कितना वक्त देता, वक्त की पहचान हो
वक्त मरहम जो समय पर, वक्त ही अंगार है

वक्त से आगे निकलकर, सोचते जो वक्त पर
वक्त के इस रास्ते पर, हर जगह तलवार है

क्या है कीमत वक्त की, जो चूकते, वो जानते
वक्त उलझन जिन्दगी की, वक्त से उद्धार है

वक्त होता क्या किसी का, चाल अपनी वक्त की
उस रिदम में चल सुमन तो, खार में भी प्यार है
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कुछ लोगों की फितरत है

मान बढ़ाकर, मान घटाना, कुछ लोगों की फितरत है
कारण तो बस अपना मतलब, जो काबिले नफ़रत है

गलती का कठपुतला मानव, भूल सभी से हो सकती
गौर नहीं करते कुछ इस पर, कुछ की खातिर इबरत है

आज सदारत जो करते हैं, दूर सदाकत से दिखते
बढ़ती मँहगाई को कहते, गठबन्धन की उजरत है

कुछ पानी बिन प्यासे रहते, कुछ पानी में डूब रहे
किसे फिक्र है इन बातों की, ये पेशानी कुदरत है

जागो सुमन सभी मिलकर के, बदलेंगे हालात तभी
फिर आगे ऐसा करने की, नहीं किसी की जुर्रत है

इबरत - नसीहत, बुरे काम से शिक्षा
उजरत - बदला, एवज में
पेशानी - किस्मत
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खुदा भी क्या मौसम देते हैं

खुशियाँ जिनको हम देते हैं
वो बदले में गम देते हैं

जख्म मिले हैं उनसे अक्सर
हम जिनको मरहम देते हैं

हैं नफरत के काबिल फिर भी
प्रीत उन्हें हरदम देते हैं

देहरी उनके दीप जलाया
जो लोगों को तम देते हैं

जिनकी वाणी में अंगारा
व्यर्थ उन्हें शबनम देते हैं

बरसातों में प्यासी धरती
खुदा भी क्या मौसम देते हैं

सबकुछ सुमन दिया अपनों को
फिर भी कहते कम देते हैं
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सीख लिया

रो कर मैंने हँसना सीखा, गिरकर उठना सीख लिया
आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया

महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं
सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया

दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने
धन को ही परमेश्वर माना, अवसर चुनना सीख लिया

रिश्ते भी बाज़ार से बनते, मोल नहीं अपनापन का
हर उसूल अब है बेमानी, हटकर सटना सीख लिया

फुर्सत नहीं किसी को देखें, सुमन असल या कागज का
जब से भेद समझ में आया, जमकर लिखना सीख लिया
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चाहत

लगे चुराने सपन हमारे, सुनहरे सपने सजाये रखना
ख़तम तीरगी कभी तो होगी, चिराग दिल में जलाये रखना

खोज रहा हूँ बाजारों में, वो आशियाँ जो कभी था मेरा
अपना घर फिर से एक होगा, इसी आस को बचाये रखना

मजहब के रखवालों ने मिल, लूट लिया है इंसानों को
बर्षों हमने झुकाया सर को, आज जरूरी उठाये रखना

नहीं शेष अब सहनशीलता, ह्रदय में शोले सुलग रहे हैं
हाथ मिले आपस में तबतक, उन शोलों को दबाये रखना

आग लगी है कई तरह की, हमें बचाना है उपवन को
सभी सुमन के मान बराबर, चाहत ऐसी बचाये रखना
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अश्क बनकर बह गए

भाव प्रायः जिन्दगी के, गीत मेरे कह गए
अनकहे जो रह गए, वो अश्क बनकर बह गए

ख्वाब का सुन्दर महल हर आदमी का शौक है
वैसे महलों की हकीकत, वक्त के संग ढह गए

लोग खुश होते हैं अक्सर, दिन बुलंदी के तभी
आदमी वो कीमती जो हँस के गम को सह गए

वक्त के संग हर कदम को जो बढ़ाते वक्त पर
लोग अक्सर वे बढ़े और शेष पीछे रह गए

छूट जाते प्राण जब महबूब जाते दूर को
है गलतफहमी सुमन को, यह गए कि वह गए
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बात वो लिखना ज़रा

भावना का जोश दिल में सीख लो रूकना ज़रा
हो नजाकत वक्त की तो वक्त पे झुकना ज़रा

जो उठाते जिन्दगी में हर कदम को सोच कर
जिन्दगी आसान बनकर तब लगे अपना ज़रा

लोग तो मजबूर होकर मुस्कुराते आज कल
है सहज मुस्कान पाना क्यों कठिन कहना ज़रा

टूटते तो टूट जाएँ पर सपन जिन्दा रहे
जिन्दगी है तबतलक ही देख फिर सपना ज़रा

दूरियाँ अपनों से प्रायः गैर से नजदीकियाँ
स्वार्थ अपनापन में हो तो दूर ही रहना ज़रा

खेल शब्दों का नहीं अनुभूतियों के संग में
बात लोगों तक जो पहुंचे बात वो लिखना ज़रा

जिन्दगी से रूठ कर के क्या करे हासिल सुमन
अबतलक खुशियाँ मिली
वो याद कर चलना ज़रा
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और काबा में राम देखिये

और काबा में राम देखिये

विश्व बना है ग्राम देखिये
है साजिश, परिणाम देखिये

होती खुद की जहाँ जरूरत
छू कर पैर प्रणाम देखिये

सेवक ही शासक बन बैठा
पिसता रोज अवाम देखिये

दिखते हैं गद्दी पर कोई
किसके हाथ लगाम देखिये

और कमण्डल चोर हाथ में
लिए तपस्वी जाम देखिये

बीते कल के अखबारों सा
रिश्तों का अन्जाम देखिये

वफा, मुहब्बत भी बाजारू
मुस्कानों का दाम देखिये

धीरे धीरे देश के अन्दर
सुलग रहा संग्राम देखिये

चाह सुमन की पुरी में अल्ला
और काबा में राम देखिये
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अलग अलग है

अलग नहीं है किसी की दुनिया मगर जिन्दगी अलग अलग है
भले हैं खोये वो रौनकों में मगर सादगी अलग अलग है

यूँ मुस्कुराते मिलेंगे चेहरे कहीं खुलापन कहीं पे पहरे
कई जो दिखते हैं मुतमईन पर वहाँ तिश्नगी
अलग अलग है

वो रोज मिलते हैं मुझसे आ के चले भी जाते हैं दिल जला के
बहुत ही नाजुक खिंचाव उस पे नई ताज़गी
अलग अलग है

मकान जितने बड़े बड़े हैं बिना प्यार बेज़ान खड़े हैं
इधर है कोशिश दिलों को जोड़ें उधर बानगी
अलग अलग है

धरम अलग पर है साथ जीना कभी खुशी और ग़मों को पीना
हैं एक मालिक सभी सुमन के मगर बंदगी
अलग अलग है





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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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