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देश तुम्हारे साथ है अन्ना



भ्रष्टाचार पर तीर की भाँति,
अन्ना आँधी चल निकली है।
भ्रष्टाचारियों!! सावधान अब,
जनता भी जगने चली है।

लोकपाल बिल हो मंजूर,
जनता की भी भागेदारी हो।
सख्त नियम और सख्त कदम हो,
भ्रष्टों की न साझेदारी हो।

हाथ से हाथ जुड़ते ही रहे,
देशहित में सब साथ हो चलें।
यह आँधी बस कामयाब हो,
हम अन्ना के हाथ बन चलें।

देशभक्ति के भाव को दिल में,
फिर से अब जगाना होगा।
गोरों को गाँधी ने खदेड़ा,
हमे अपनो को भगाना होगा।

अन्ना ने जो दी है ज्वाला,
इसे अग्नि बनाना होगा।
अन्ना के संग सर उठाकर,
भ्रटाचार जलाना होगा।

क्रांति की अगणित मशालें,
अब हमारे हाथ है अन्ना।
तुम अकेले नहीं हो यहाँ,
देश तुम्हारे साथ है अन्ना।

भारत माता की जय।



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मेरा ब्लॉग-मेरी कविता
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गर्जना

न कुचलो हमारी स्वाधीनता को इस तरह,
कि इसके लिए हमने बहुत कुछ सहा है,
खैरात में नहीं मिली है हमे ये आजादी,
कितने कुर्बान हुए हैं और कितनो का लहू बहा है |

प्राणों से भी प्यारी है हमे ये स्वतंत्रता,
रक्षा को इसकी हम जान तक लुटा देंगे,
कोशिश न करना इसे छीनने की हमसे,
सरफिरे हैं तेरा वजूद तक मिटा देंगे |

देश के ठेकेदारों ! वक्त है संभलो,
आँच आये आजादी को वो काम मत करना,
गोरे अंगरेजो को सन ४७ मे भगाया,
साहस न करना,गेहुँए अंगरेज मत बनना |

सवा अरब जनता अगर सनक गई काफिर,
यातनाओ के जवाब मे हम भी दिखा देंगे,
उनको तो हमने बस खदेड़ के था छोड़ा,
गर्जना सुन तेरा नामोनिशान डूबा देंगे |
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संभल जाओ पकिस्तान

कितना समझाया कितना मनाया ,
तरह तरह से शांति का मार्ग दिखाया,
कभी लाहोर गए तो कभी आगरा बुलाय,
पर मोटी बुद्धि कुछ समझ न पाया,
हमारी सहिष्णुता को कमजोरी समझ
कर दिया युद्ध की पहल,
उलटे मुह की खानी पड़ी
शरम से मुह छुपानी पड़ी;
हो आई याद उनको सन ७१ की,
समझ गया शक्ति वो भारत की;
न लेंगे पंगा फिर वो कसम खाया,
खुदा को अपना गवाह बनाया;
इतना होने पर भी वो बाज न आया,
वापस घुसपैठ का राह अपनाया;
कश्मीर को अपनी जागीर बताया और
इसपे अपना अधिकार जताया;
तो ले अब मैं तुम्हे बताता हूँ,
तुम्हारा भरम मिटाता हूँ;
न था यह कभी तुम्हारा,
ये तो नितांत से है हमारा;
छोड़ कर साथ तू जिद का,
हाथ बढ़ा दे दोस्ती का;
हम ख़ुशी से तुम्हे अपनाएंगे,
सारे गिले शिकवे भूल जायेंगे,
पर तू जो फिर न माना,
वापस इसे कमजोरी जाना,
तो समझोता नहीं;
फिर रण होग,
जीवन जय होगा,और फिर मरण होगा .

(यह रचना मेरे एक मित्र द्वारा लिखी गयी है उसने किसी से साझा नहीं किया पर मैं चाहता हूँ सब पढ़े उसकी ये रचना .-प्रदीप )
 
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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