भाजपा विधायक आशा सिन्हा की गाड़ी से 9 हत्यारोपी गिरफ्तार

पटना के दानापुर से भाजपा की विधायक आशा सिन्हा की स्कॉर्पियो गाड़ी में सवार हत्या के नौ संदिग्ध आरोपियों के पकड़े जाने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। मृतक की मां का आरोप है कि विधायक ने ही उनके बेटे को मरवाया है जबकि विधायक ने खुद पर लगे आरोपों से इंकार किया है।
खगौल थाना क्षेत्र के गाड़ीखाना इलाके में हरीश पासवान की शनिवार को हत्या हुई थी। हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी। इसी दौरान रविवार तड़के एक स्कॉर्पियो गाड़ी से नौ अपराधियों को धर दबोचा गया। स्कॉर्पियो पर विधानसभा का स्टीकर चिपका हुआ था और इसके सभी कागजात आशा सिन्हा के नाम से थे। इसे उनका निजी चालक वीरेंद्र कुमार चला रहा था। उधर, पासवान की मां उमा देवी ने अपने पहले के बयान से पलटते हुए रविवार को कहा कि विधायक ने ही हरीश की हत्या करवाई है। उनके अनुसार, वह हरीश को रंगदारी वसूलने और हत्या करने के लिए कहती थीं। लेकिन हरीश ने ऐसा करने से इंकार कर दिया, जिसके कारण विधायक ने उसकी हत्या करवा दी। वहीं, विधायक आशा सिन्हा ने खुद पर लगे आरोपों से इंकार करते हुए कहा कि यह सब उन्हें बदनाम करने की साजिश है। उनके अनुसार, वह हरीश को पहचानती भी नहीं हैं। उनका वाहन चालक शनिवार को उन्हें धोखे में रखकर गाड़ी ले गया था। उधर, दानापुर की सहायक पुलिस अधीक्षक हरप्रीत कौर ने सोमवार को बताया कि हरीश की हत्या के मामले में प्राथमिकी शनिवार को ही दर्ज की जा चुकी है। विधायक पर लगे आरोपों तथा उनके वाहन से सम्बंधित मामले की जांच की जा रही है। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके आधार पर कार्रवाई की जाएगी। गौरतलब है कि हरीश की हत्या के मामले में पुलिस अब तक भाजपा के एक स्थानीय नेता मनोज केसरी सहित 10 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है।
Source : http://www.livehindustan.com/news/location/rajwarkhabre/article1-story-248-0-179958.html&locatiopnvalue=10
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खबरगंगा: झारखंड: विलुप्त हो चली हैं ये आदिम जनजातियां

झारखंड के अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आये 11 साल हो गए. इस बीच जितनी भी सरकारें बनीं उनमें मुख्यमंत्री का पद आदिवासियों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित रखा गया. लेकिन सरकार की कृपादृष्टि उन्हीं जजतियों की और रही जो वोट बैंक बनने की हैसियत रखते थे. झारखंड की उन नौ आदिम जनजातियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया जिनका अस्तित्व आज खतरे में है. उनकी जनसंख्या में ह्रास होता जा रहा है. मृत्यु दर में वृद्धि और जन्म दर में कमी के कारण ऐसा हो रहा है. भूख, कुपोषण और संक्रामक रोगों के कारण उनके यहां अकाल मौत के साये मंडराते रहते हैं. अशिक्षा, गरीबी और रोजगार के अवसरों का अभाव उनकी नियति बन चुकी है. वे आज भी जंगलों पहाड़ों के बीच पर्णकुटी बनाकर आदिम युग की मान्यताओं के बीच रह रहे हैं. भूत-प्रेत, ओझा-डायन बिसाही में अभी भी उनका गहरा विश्वास है. बीमार होने पर वे अस्पताल में नहीं बल्कि अपने इलाके के ओझा-सोखा की शरण में जाते हैं.
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Main aur Mera Idol


Navbharat Youth World Ne
12 Julye ke ank me Mujhe
Main aur Mera Idol
Ratan Tata ji ke saath Chuna hai.
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अरे भई साधो......: छठे तहखाने का रहस्यलोक

तिरुअनंतपूरम के पद्मनाभ स्वामी मंदिर के पांच तहखानों की दौलत आराम से निकल आई. परिसंपत्तियों की सूची भी बन गयी लेकिन जब छठे तहखाने को खोलने की बारी आई तो उसमें तिलस्मी इंतजामात की बात सामने आने लगी. कोलकाता के एक दैनिक अखबार ने 1930 में किसी दैनिक अखबार में प्रकाशित एमिली गिलक्रिस्ट हैच नामक लेखक के लेख का हवाला देते हुए एक दिलचस्प रिपोर्ट प्रकाशित की है. लेख के मुताबिक 1908 में कुछ लोगों ने छठे तहखाने का दरवाजा खोला तो उन्हें साँपों की फौज के साथ कई सिरों वाला किंग कोबरा नज़र आया. वे जान बचाकर भाग निकले. ऐसी किंवदंती है कि कई सिरों वाला और कांटेदार जिह्वा बाला एक विशाल किंग कोबरा सांप मंदिर के खजाने का रक्षक है.

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पासवर्ड की सुरक्षा के लिए सावधानियां Hindi Blogging Guide (10)

श्री महेश बारमाटे ‘माही‘
श्री महेश बारमाटे ‘माही‘ जी एक नौजवान ब्लॉगर हैं। बहुत कम समय में उन्होंने हिंदी ब्लॉग जगत में अपनी एक पहचान बना ली है। फ़ेसबुक, आरकुट और गूगल प्लस जैसी बहुत सी साइट्स पर सैकड़ों बुद्धिजीवी उनके मित्र हैं। सभी जगह उन्होंने ‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ का ग्रुप बना रखा है और नए नए लोगों को हिंदी ब्लॉगिंग की ओर आकर्षित कर रहे हैं। नेट यूज़र्स को ‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ से परिचित कराने के लिए जो कुछ वह कर रहे हैं, वह अतुलनीय है। हमारे प्रिय महेश बारमटे ‘माही‘ जी हिंदी ब्लॉगर्स को सुरक्षित पासवर्ड के लिए आज कुछ उपयोगी सुझाव दे रहे हैं!
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हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 79 % इन्टरनेट उपभोक्ता ऐसे पाए गए जो सुरक्षा की दृष्टी से बहुत ही खतरनाक पासवर्ड, जैसे कि उनकी व्यक्तिगत जानकारी या कुछ सामान्य व सार्वजानिक शब्दों का उपयोग करते हैं. कुछ सामान्य पासवर्ड जो सामान्यतया हर बार उपयोग किये जाते हैं - 
  1. 123456
  2. 12345
  3. 123456789
  4. Password
  5. iloveyou
  6. princess
  7. rockyou
  8. 1234567
  9. 12345678
  10. abc123
  11. Nicole
  12. Daniel
  13. babygirl 
  14. monkey
  15. Jessica
  16. Lovely
  17. michael
  18. Ashley
  19. 654321
  20. Qwerty
कुछ प्रमुख तथ्य  - 
  1. करीब 4% इन्टरनेट उपभोक्ता "password" शब्द के अक्षरों में फेरबदल कर के अपने पासवर्ड के रूप में उपयोग करते हैं.
  2. शीर्ष २० खतरनाक पासवर्ड में से २५% पासवर्ड ऐसे होते हैं जो कि उपभोक्ता के प्रथम नाम (first name) होते हैं.
  3. सारे पासवर्ड का १६% हिस्सा वो होता है जिनमे इन्टरनेट उपभोक्ता किसी व्यक्ति विशेष का प्रथम नाम उपयोग करता है.
आपका पासवर्ड कितना लम्बा है ?
सामान्यतया पासवर्ड की लम्बाई 6 अक्षरों की ही रखी जाती है. यह लम्बाई सबसे अच्छी मानी जाती है किसी पासवर्ड के लिए.
आइये जानते हैं कि सारे विश्व में कितने प्रतिशत लोग कितने अक्षरों वाला पासवर्ड इस्तमाल करते हैं.
  • 13 अक्षरों वाला पासवर्ड - 1 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 12 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 2 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 11 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 4 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 5 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 4 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 10 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 9 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 9 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 12 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 7 अक्षरों वाला पासवर्ड - 19 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 8 अक्षरों वाला पासवर्ड  - 20 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
  • 6 अक्षरों वाला पासवर्ड - 26 % व्यक्ति इस्तमाल करते हैं.
सुरक्षित पासवर्ड के लिए जरूरी सुझाव :
  1. जितना हो सके हमेशा कम से कम १४ अक्षरों या उससे ज्यादा अक्षरों वाला पासवर्ड ही इस्तमाल करें और नहीं तो न्यूनतम ८ अक्षर का उपयोग जरूर करें.
  2. अक्षरों में भिन्नता का होना सबसे बेहतर उपाय है - जैसे कि अंग्रेजी के upper case (A,B,C...), lover case (a,b,c...), numbers (1234567890) तथा special characters (!@#$%^&*()_+":{|}][?></.,`~) इन सभी अक्षरों से मिला जुला कोई पासवर्ड सबसे बेहतर उपाय है.
  3. की - बोर्ड का पूरा इस्तमाल करें ना कि केवल उन अक्षरों का इन्हें आप सबसे ज्यादा इस्तमाल करते हैं. 
  4. हमेशा पासवर्ड बनाते वक्त पासवर्ड चैकर से अपना पासवर्ड जरूर जांचें. 
  5. अपना पासवर्ड ऐसा बनायें जो जल्दी से याद करने योग्य हो. जैसे कि आप अपने किसी पसंदीदा गाने, या नीति वाक्य के हर शब्द के पहले अक्षर का उपयोग कर सकते हैं और साथ ही साथ सुझाव नम्बर २ का उपयोग भी करें... और अपने पासवर्ड में नम्बर्स व स्पेशल कैरेक्टर्स का भी समावेश करें...
  6. उदाहरण के लिए - अगर आपका पसंदीदा नीति वाक्य “Dream as if you'll live forever, live as if you'll die today.” है तो आप इसे अपने पासवर्ड के रूप में लिख सकते हैं - 
  • "DaIFulfla48IFuD2day*
किस तरह के पासवर्ड इस्तमाल ना करें - 
साइबर क्राइम करने वाले लोग आज कल नए तरह के सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं जिससे बहुत जल्दी ही किसी का भी पासवर्ड पता लगाया जा सकता है इसीलिए -
  • डिक्शनरी के शब्दों का चयन ना करें.
  • ऐसे शब्द जिनको पीछे से (उदाहरण के लिए - mahesh को hseham), सामान्य मिसस्पेल्लिंग (misspelling) या किसी प्रमुख संस्था वगैरह के छोटे रूप का नाम (short forms, abbreviations) का उपयोग ना करें.
  • अपनी व्यक्तिगत सूचना जैसे कि आपका नाम, जन्मदिन, मोबाइल नम्बर, स्कूल, कॉलेज का नाम इत्यादि का भी उपयोग ना करें. 
साभार - zoneAlarm.com, Microsoft.com, i.bnet.com, imperva.com
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विश्व का अकेला संस्कृत भाषा का अखबार 42 साल का हुआ Sanskrit Language

मैसूर। एक ओर जहां अंग्रेजी व अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं के समाचार पत्र फल-फूल रहे हैं वहीं संस्कृत का दुनिया का अकेला समाचार पत्र 'सुधर्मा' अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। 'सुधर्मा' अगले सप्ताह अपने 42वें साल में प्रवेश कर रहा है।
मैसूर से प्रकाशित होने वाले इस समाचार पत्र के सम्पादक के वी सम्पत कुमार ने कहा कि कोई भी प्रादेशिक या केंद्रीय निकाय हमारी मदद के लिए आगे नहीं आया और निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों का हाल भी अलग नहीं है। इस समाचार पत्र के 2,000 ग्राहक हैं।
जब उनसे पूछा गया कि वह बिना किसी मदद के एक 'मृत भाषा' में समाचार पत्र क्यों निकाल रहे हैं तो इस पर कुमार की पत्नी जयालक्ष्मी ने कहा कि कौन कहता है संस्कृत मर गई है। हर सुबह लोग श्लोकों का उच्चारण करते हैं, पूजा करते हैं, विवाह, बच्चे के जन्म और मृत्यु सहित सारे संस्कार संस्कृत में सम्पन्न होते हैं। संस्कृत की वजह से ही भारत एकजुट है। यह हमारी मातृभाषा है जो अपने में कई भाषाओं को समेटे है। इसका विकास हो रहा है और अब तो आईटी व्यवसायी भी कहते हैं कि यह भाषा उपयोगी है। जयालक्ष्मी हिंदी, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी व संस्कृत भाषाओं की जानकार हैं।
कुमार कहते हैं कि उनके पिता पंडित वरदराज आयंगर ने 15 जुलाई, 1970 को इस समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था। उन्होंने बताया कि जब 1990 में उनकी मृत्यु हुई तो उससे पहले उन्होंने मुझसे वादा लिया था कि मैं किसी भी तरह से उनके मिशन को जारी रखूंगा। अब यह दैनिक एक मिशन की तरह उसी जुनून और समर्पण के साथ जारी है। मैं अपने आखिरी वक्त तक इसका प्रकाशन करता रहूंगा।
एक रुपये मूल्य में मिलने वाले इस समाचार पत्र में ज्यादातर लेख वेदों, योग, धर्म पर केंद्रित होते हैं। इसके साथ राजनीति, संस्कृति व अन्य विषयों पर भी लेख होते हैं।
कुमार और उनकी पत्नी ही इस समाचार पत्र के वितरकों व प्रकाशकों की भूमिका निभा रहे हैं।
कुमार बताते हैं कि आकाशवाणी पर संस्कृत में समाचारों का प्रसारण शुरू होने का श्रेय मेरे पिता को जाता है। उन्होंने ही सूचना और प्रसारण मंत्री आई के गुजराल को इसके लिए मनाया था।
शुरुआत में 'सुधर्मा' की छपाई हाथ से होती थी। बाद में आधुनिक कम्प्युटरीकृत मुद्रण तकनीक अपनाई गई। अब इसका एक ई-पेपर भी है, जिसके चलते अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहुंच है।
Source : http://www.24dunia.com/hindi-news/shownews/0/42-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%A4-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%85%E0%A4%96%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0/6129416.html
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मीडिया के सभी लोगों का साथ मिले

मीडिया के लोगों का साथ मिले


हिन्दी जर्नलिस्ट असोसिएशन ने मुझे उत्तर प्रदेश का संयोजक मनोनीत किया है। मैं कोशिश  करूंगा कि सभी मीडिया के लोगों का साथ मिले और हम अपने अधिकार को पा सकें।
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हिंदी लिखने का बिल्कुल आसान उपाय Hindi Blogging Guide (9)

यह एक लिंक है जिसे आप अपनी एड्रेस बार में पेस्ट करके Enter करने के बाद आराम से हिंदी से लिख सकते हैं, कहीं भी और कभी भी लेकिन आनलाइन. यह काम  बिल्कुल नया ब्लॉगर भी कर सकता है :
javascript:(t13nb=window.t13nb||function(l){var%20t=t13nb,d=document,o=d.body,c="createElement",a="appendChild",w="clientWidth",i=d[c]("span"),s=i.style,x=o[a](d[c]("script"));if(o){if(!t.l){t.l=x.id="t13ns";o[a](i).id="t13n";i.innerHTML="Loading%20Transliteration";s.cssText="z-index:99;font-size:18px;background:#FFF1A8;top:0";s.position=d.all?"absolute":"fixed";s.left=((o[w]-i[w])/2)+"px";x.src="http://t13n.googlecode.com/svn/trunk/blet/rt13n.js?l="+l}}else%20setTimeout(t,500)})('hi')

...और जो जानकारी रखते हैं वे बुकमार्क मैथड से हिंदी लिख सकते हैं . 
बुकमार्क कैसे करें ?
इसकी जानकारी के लिए आप निम्न लिंक पर जाएं :
http://www.hindi2tech.com/2011/06/blog-post_18.html
अब आप हिंदी में चैट भी कर सकते हैं।
है न मज़े का टूल ?
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कोंग्रेस का टार्गेट २०१३ अभियान शांति धारीवाल ने कोटा से शुरू किया

कोंग्रेस का टार्गेट २०१३ अभियान शांति धारीवाल ने कोटा से शुरू किया

हाडोती का एक ही लाल , शांति कुमार धारीवाल जिंदाबाद , अशोक गहलोत जिंदाबाद , सोनिया गाँधी जिंदाबाद , राहुल गाँधी जिंदाबाद के बीच आज कोटा जिला कोंग्रेस के ऐतिहासिक कार्यभार ग्रहण समारोह में राजस्थान सरकार के काबिना मंत्री शांति कुमार धारीवाल ने वर्ष २०१३ में फिर से सत्ता में आने के लियें टार्गेट २०१३ का शुभारम्भ कर कार्यकर्ताओं इस कार्य के लियें जी जान से जुट जाने का आह्वान किया .......राजस्थान के काबिना मंत्री और कोटा जिला कोंग्रेस के तात्कालिक दिग्गज अध्यक्ष आज जिला कोंग्रेस कार्यालय में नव निर्वाचित अध्यक्ष पंडित गोविन्द शर्मा के कार्यभार ग्रहण समारोह में बोल रहे थे ..शांति धारीवाल जी ने कहा के विकास और भ्रष्टाचार मुक्त शासन केवल कोंग्रेस ही दे सकती है उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा के राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा सिंधिया ने कोटा में आकर आनन फानन में २४ कार्यों का शिलान्यास किया था आज उन कामों में से केवल दो ही काम हो पाए हैं ..जबकि जिन कार्यों का शिलान्यास एक ही दिन में किया गया था उनकी प्रशासनिक,तकनिकी और वित्तीय स्वीक्रति भी नहीं थी उन्होंने कहा के कोटा नगर विकास न्यास ने भाजपा शासन में सात सो करोड़ रूपये की ज़मीं बेचीं लेकिन उस रूपये का क्या करा आज तक कोई हिसाब नहीं है ..धारीवाल ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा के कोंग्रेस की सोनिया जी किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में थोड़ी भी खबर छपने पर उसे मुख्यमंत्री पद से हटा देती है ..मंत्री या कोई भी कोंग्रेस का सांसद भ्रष्टाचार में डूबा हो तो उसे जेल भिजवाने में भी पीछे नहीं रहती है लेकिन भाजपा जो पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी है उसके मध्य प्रदेश और कर्नाटक के मुख्यमंत्री के खिलाफ भार्स्ताचार के प्रमाणित अपराध होने के बाद भी उन्हें नहीं हटाया गया है ..धारीवाल ने कहा के भ्रष्टाचारियों को बचाने के बाद भी भाजपा भ्रष्टाचार की बात करती है ..धारीवाल ने कहा के कोटा में ८५० करोड़ रूपये के कार्य हो रहे हैं तो इससे भाजपा को जलन हो रही है और वोह कोटा विकास नहीं देखना चाहती केवल रोड़े अटकाना चाहती है ..धारीवाल ने कहा के ऐसे में अब कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी आ जाती है के वोह कोंग्रेस के विकास कार्य जनता के सामने गिनाएं और बूथ स्तर पर कार्यकर्ता तय्यार कर कोंग्रेस को मजबूत करें उन्होंने कोंग्रेस के नव निर्वाचित अध्यक्ष को चेताया के उन्हें बनवाने में मेरा कोई हाथ नहीं है कोंग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष , सी पि जोशी और अशोक जी गहलोत की कोशिश है और उन्हें उनके प्रति कोंग्रेस के प्रति कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदार बनना होगा .धारीवाल ने कार्यकर्ताओं से कहा के अगर कार्यकर्ताओं को फिर से मान सम्मान प्रतिष्ठा चाहिए तो वोह आज से ही कोंग्रेस की स्थिति मजबूत करने में जुट जाए और भाजपा की काली करतूतों को जनता के सामने लायें ...........धारीवाल ने कोंग्रेस के पदाधिकारियों से समाज  सेवा कार्य करने के लियें कहा .....आज कोटा जिला कोंग्रेस में पहली बार ऐतिहासिक कार्यक्रम में हजारों कार्यकर्ता उपस्थित थे और कोटा कोंग्रेस कार्यालय कार्यकर्ताओं की भीड़ के आगे छोटा पढ़ गया था .कार्यक्रम में प्रदेश कोंग्रेस प्रवक्ता पंकज मेहता , नव निर्वाचित शहर कोंग्रेस अध्यक्ष गोविन्द जी शर्मा , देहात कोंग्रेस अध्यक्ष श्रीमती रुकमनी शर्मा ,  आनंद पाटनी  ,शिवकांत नंदवाना ,,ललित जी चित्तोड़ा..डोक्टर ज़फर ,नरेश जी विजय वर्गीय सहित पूर्व कोंग्रेस अध्यक्ष और कई पदाधिकारी मोजूद थे ........अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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कांग्रेस की दिग्विजयी भाषा

पिछले दो आम चुनावों में लगातार कांग्रेस और मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में जोड़-तोड के सरकार क्या बन गयी, कांग्रेस के कई नेताओं को भ्रम हो गया है कि उन्होंने शायद "दिग्विजय" कर लिया है सदा के लिए और बहुतेरे ऐसे हैं जिनकी भाषा लगातार तल्ख होती जा रही है। जबकि हकीकत यह है कि न तो अभी पूर्ण बहुमत है अकेले कांग्रेस को न ही पिछली बार।

अपने छात्र जीवन को याद करता हूँ तो इमरजेन्सी से पहले भी कुछ महत्वपूर्ण कांग्रसियों की भाषा में भी तल्खी आ गयी थी। परिणाम कांग्रेसजनों के साथ साथ पूरे देश ने देखा। किसी को यह भी शिकायत हो सकती है कि मैं किसी से प्रभावित होकर किसी के "पक्ष" या "विपक्ष" में लिख रहा हूँ। एक सच्चा रचनाकार का नैतिक धर्म है कि सही और गलत दोनों को समय पर "आईना" दिखाये। सदा से मेरी यही कोशिश रही है और आगे भी रहेगी। अतः किसी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त है मेरा यह आलेख।

"विनाश काले विपरीत बुद्धि" वाली कहावत हम सभी जानते हैं और कई बार महसूसते भी हैं अपनी अपनी जिन्दगी में। अलग अलग प्रसंग में दिए गए विगत कई दिनों के कांग्रसी कथोपकथन की जब याद आती है तो कई बार सोचने के लिए विवश हो जाता हूँ कि कहीं यह सनातन कहावत फिर से "चरितार्थ" तो नहीं होने जा रही है इस सवा सौ बर्षीय कांग्रेस पार्टी के साथ?

लादेन की मृत्यु के बाद एक इन्टरव्यू में आदरणीय दिग्विजय सिंह जी का लादेन जैसे विश्व प्रसिद्ध आतंकवादी के प्रति "ओसामा जी" जैसे आदर सूचक सम्बोधन कई लोगों को बहुत अखरा और देश के कई महत्वपूर्ण लोगों ने अपनी नकारात्मक प्रतिक्रिया भी व्यक्त की उनके इस सम्बोधन पर। लेकिन इसके विपरीत मुझे कोई दुख नहीं हुआ। बल्कि खुशी हुई चलो आतंकवादी ही सही, लेकिन एक मृतात्मा के प्रति भारत में प्रत्यक्षतः सम्मान सूचक शब्दों के अभिव्यक्ति की जो परम्परा है, कम से कम उसका निर्वाह दिग्विजय जी ने तो किया?

मैं रहूँ न रहूँ, दिग्विजय जी रहें न रहें, लेकिन रामदेव बाबा ने जो काम "आम भारतवासी" के लिये किया है उसे यहाँ की जनता कभी नहीं भूल पायेगी। एक शब्द में कहें तो बाबा रामदेव अपने कृत्यों से आम भारतीयों के दिल में बस गए हैं। "योग द्वारा रोग मुक्ति", के साथ साथ जन-जागरण में उनकी भूमिका को नकारना मुश्किल होगा किसी के लिए भी। बाबा राम देव करोड़ों भारतीय समेत वैश्विक स्तर पर भी लोगों के दिलों पर स्वाभाविक रूप से आज राज करते हैं। ऐेसा सम्मान बिना कुछ "खास योगदान" के किसी को नहीं मिलता।

दिग्विजय उवाच - "रामदेव महाठग है, न तो कोई आयुर्वेद की डिग्री और न ही योग की और चले हैं लोगों को ठीक करने" इत्यादि अनेक "आर्ष-वचनों" द्वारा उन्होंने रामदेव जी के सतकृत्यों के प्रति अपना "भावोद्गार" प्रगट किया जिसे सारे देश ने सुना। यूँ तो उन्होंने बहुत कुछ कहा यदि सारी बातें लिखी जाय तो यह आलेख उसी से भर जाएगा क्योंकि उनके पास "नीति-वचनों" की कमी तो है नहीं और रामदेव के प्रति उनके हृदय में कब "बिशेष-प्रेम" छलक पड़े कौन जानता?

मैं कोई बाबा रामदेव का वकील नहीं हूँ। लेकिन उनके लिए या किसी भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान प्राप्त व्यक्ति के प्रति ऐसे दुर्व्यवहार की कौन सराहना कर सकता है। रामदेव जी अपने आन्दोलन के क्रम में "अपरिपक्व निर्णय" ले सकते हैं, कुछ गलतियाँ उनसे हो सकतीं हैं लेकिन सिर्फ इस बात के लिए उनके जैसे "जन-प्रेमी" के खिलाफ इतना कठोर निर्णय वर्तमान सरकार के दिवालियेपन की ओर ही इशारा करता है। उस पर तुर्रा ये कि दिग्विजय जी को वाक्-युद्ध में "दिग्विजय" करने के लिए छोड़ दिया गया हो। अच्छा संकेत नहीं है। सरकारी महकमे सहित कांग्रेस के बुद्धिजीवियों को इस पर विचार करने की जरूरत है कम से कम भबिष्य में कांग्रेस के "राजनैतिक स्वास्थ्य" के लिए।

जहाँ तक मुझे पता है कि गुरूदेव टैगोर ने अपने पठन-पाठन का कार्य घर पर ही किया इसलिए उनके पास भी कोई खास "स्कूली डिग्री" नहीं थी। फिर भी उन्हें "नोबेल पुरस्कार" मिला। लेकिन ऊपर में वर्णित दिग्विजय जी की डिग्री वाली बात को आधार माना जाय तो गुरुदेव को विश्व समुदाय ने नोबेल पुरस्कार देकर जरूर "गलती" की? एक बिना डिग्री वाले आदमी को नोबेल पुरस्कार? लेकिन ये सच है जिसे पूरा विश्व जानता है। फिर रामदेव जी की "डिग्री" के लिए दिग्विजय जी को इतनी चिन्ता क्यों? जबकि आम भारतीयों ने उनके कार्यों सहर्ष स्वीकार किया है।

आदरणीय दिग्विजय जी भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है संसद और हमारे सैकड़ों सांसदों को "राष्ट्र-गान" तक पूरी तरह से नहीं आता है। तो क्या उन्हें सांसद नहीं माना जाय क्या? आप ही गहनता से विचार कर के बतायें देशवासियों को उचित दिशा-निर्देश दें। और ऐसे ही हालात में मेरे जैसे कवि के कलम से ये पंक्तियाँ स्वतः निकलतीं हैं कि -

राष्ट्र-गान आये ना जिनको, वो संसद के पहरेदार।
भारतवासी अब तो चेतो, लोकतंत्र सचमुच बीमार।।

(नोट - पूरी रचना पढ़ने और सुनने का लिन्क क्रमशः http://manoramsuman।blogspot।com/2011/04/blog-post_29।html और http://www.youtube.com/watch?v=c4qhAKmfON0 है।}

"अन्ना" - आज एक नाम न होकर एक "संस्था" बन गए हैं अपनी निष्ठा और "जन-पक्षीय" कार्यों के कारण। अन्ना एक गाँधीवादी संत हैं सच्चे अर्थों में। उन्होंने भी जन-जागरण किया। आन्दोलन चलाया। लोकपाल पर पहले सरकारी सहमति बनी अब कुछ कारणों से असहमति भी सामने है। फिर अन्ना ने 16 अगस्त से अनशन और आन्दोलन की बात की। यह सब लोकतंत्र में चलता रहता है। सरकार में भी समझदार लोग हैं। जरूर इसका समाधान तलाशेगे, अन्ना से आगे भी बात करेंगे। अभी नहीं जबतक भारत में प्रजातंत्र है ये सब चलता रहेगा। यह "लोकतंत्रीय स्वास्थ" के लिए महत्वपूर्ण भी है।

लेकिन दिग्विजय जी कैसे चुप रह सकते हैं? तुरत बयान आया उनकी तरफ से कि यदि अन्ना आन्दोलन करेंगे तो उनके साथ भी "वही" होगा जो रामदेव के साथ हुआ। क्या मतलब इसका? क्यों बार बार एक ही व्यक्ति इस तरह की बातें कर रहा है? क्यों ये इस तरह के फालतू और भड़काऊ बातों की लगातार उल्टी कर रहे हैं? कहाँ से इन्हें ताकत मिल रही है? कहीं दिग्विजय जी की "मानसिक स्थिति" को जाँच करवाने की जरूरत तो नहीं? मैं एक अदना सा कलम-घिस्सू क्या जानूँ इस "गूढ़ रहस्य" को लेकिन ये सवाल सिर्फ मेरे नहीं, आम लोगों के दिल में पनप रहे हैं जो आने वाले समय में ठीक नहीं होगा कांग्रेस के लिए। कांग्रेस में भी काफी समझदार लोग हैं। मेरा आशय सिर्फ "ध्यानाकर्षण" है वैसे कांग्रेसियों के लिए जो ऐसी बेतुकी बातों पर अंकुश लगा सकें।

करीब तीन दशक पहले मेरे मन भी संगीत सीखने की ललक जगी। कुछ प्रयास भी किया लेकिन वो शिक्षा पूरी नहीं कर पाया। उसी क्रम में अन्य रागों के अतिरिक्त मेरा परिचय "राग-दरबारी" से भी हुआ। यह "राग-दरबारी" जिन्दगी में भी बड़े काम की चीज है जिसे आजकल चलतऊ भाषा में अज्ञानी लोग "चमचागिरी" कहते हैं। यदि हम में से कोई इस राग के "मर्मज्ञ" हो जाए तो कोई भी "ऊँचाई" पाना नामुमकिन नहीं। आज के समय की नब्ज पकड़ कर ये बात आसानी से कोई भी कहा सकता है।

प्रिय राहुल जी का 41वाँ जन्म दिवस आया और कांग्रेसजनों ने इसे पूरे देश में "हर्षोल्लास" से मनाया। किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? और हर्षोल्लास से मनायें। लेकिन आदरणीय दिग्विजय जी भला चुप कैसे रह सकते? संसार का शायद ही कोई ऐसा बिषय हो जिसके वे "ज्ञाता" नहीं हैं। तपाक से राहुल जी की इसी साल शादी की चिन्ता के साथ साथ उन्हें "प्रधानमंत्री" के रूप में देखने की अपने "अन्तर्मन की ख्वाहिश" को भी सार्वजनिक करने में उन्होंने देरी नहीं दिखायी। क्या इसे राग-दरबारी कहना अनुचित होगा? अब जरा सोचिये वर्तमान प्रधानमंत्री की क्या मनःस्थिति होगी? वे क्या सोचते होंगे?

मजे की बात है कि दिग्विजय जी इतने पुराने कंग्रेसी हैं। मंत्री, मुख्यमंत्री बनने के साथ साथ लम्बा राजनैतिक अनुभव है उनके पास। उनके वनिस्पत तो राहुल तो कल के कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं। लेकिन उन्हें अपनी "वरीयता" की फिक्र कहाँ? वे तो बस अपने "राग" को निरन्तर और निर्भाध गति से "दरबार" तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि उनकी "दिग्विजयी-भाषा" पर कोई लगाम न लगा सके। काश! मैं भी "राग-दरबारी" सीखकर अपनी तीन दशक पुरानी गलती को सुधार पाता?
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अरे भई साधो......: खजाने की चाबी लुटेरों को...नहीं...बिल्कुल नहीं

पद्मनाभस्वामी मंदिर के तहखानों से निकला खज़ाना सामने आने के बाद अब देश के 550 रियासतों, हजारों मंदिरों-मठों, पुराने किलों और रहस्यमयी गुफाओं में कैद अकूत खजानों की और बरबस ध्यान चला जाता है. गनीमत है कि इनके जनहित में उपयोग की संभावनाओं पर विचार करने का जिम्मा उच्चतम न्यायालय ने लिया है. अभी सत्ता में बैठे लोग घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के कारण आम जनता का विश्वास खो चुके हैं. कई राजघरानों के खजाने सरकार पहले भी ले चुकी है लेकिन उनके उपयोग की कोई जानकारी नहीं है. आमलोगों को इस बात का भरोसा नहीं कि यदि सरकार को खजाने की चाभी सौंप दी जाये तो उसका जनहित में उपयोग होगा ही. पता नहीं उसका कितना हिस्सा मंत्रियों के पेट में समा जायेगा और कितना जनता के कल्याण में खर्च होगा. इस लिहाज से इतिहासकार देवेंद्र हांडा का यह सुझाव व्यावहारिक है कि मंदिरों के मौजूदा ट्रस्ट ही स्कूल, कालेज, अस्पताल और रोजगार का सृजन करने वाली आर्थिक गतिविधियों का संचालन करें. बेहतर होगा कि वे आर्थिक सलाहकारों की नियुक्ति कर इस दिशा में योजनायें बनायें और उन्हें अमली जामा पहनाएं.
इतना तय है कि देश में अभी इतने खजाने हैं कि देश के विकास या जन समस्याओं के निदान के लिए विश्व बैंक या अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का मुंह ताकने की विवशता नहीं है. अब समस्या धन की नहीं एक ईमानदार और पारदर्शी सरकार की, दूरदर्शी नेताओं की है. ऐसा कोई खजाना अभी ज्ञात नहीं जहां इसकी आपूर्ति हो सके. विदेशी बैंकों में जमा काला धन देश के अन्दर मौजूद खजानों के सामने कुछ भी नहीं है. लेकिन जनहित में उसकी वापसी के प्रति अपनी उदासीनता और वापसी की मांग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रति अपनी क्रूरता के जरिये मौजूदा सरकार ने यह अहसास दिला दिया कि उसकी प्रतिबद्धता किसके साथ है. लिहाजा गुप्त खजानों के प्रति नीति बनाते वक़्त इस बात का ध्यान रखना होगा. किसी खजाने की निगहबानी का जिम्मा लुटेरों के हाथ में देना तो कहीं से भी बुद्धिमानी की बात नहीं होगी. इसपर बहुत गहराई से विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेना उचित होगा.

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हिंदी ब्लॉगर्स को ‘अमन का पैग़ाम‘ दे रहे हैं जनाब एस. एम. मासूम साहब

एस. एम. मासूम
सय्यद मुहम्मद मासूम साहब को ब्लॉग जगत में एस. एम. मासूम के नाम से जाना जाता है। वह ख़ुद तो मुंबई में रहते हैं लेकिन उनका दिल जौनपुर में रहता है। जौनपुर से अपना ताल्लुक़ क़ायम रखने के लिए उन्होंने ब्लॉग भी बनाया है और एक वेबसाइट भी बनाई हुई है, जिन पर जौनपुर के मंदिर-मस्जिद से लेकर जौनपुर की मूली और मिठाई तक के बारे में जानकारी मिल जाती है।
इसके बावजूद ब्लॉग जगत में उनकी पहचान ‘अमन के पैग़ाम‘ की वजह से है।
हालांकि ब्लॉग तो उनके कई हैं
1.      हक़ और बातिल
2.      बेज़बान
3.      ब्लॉग संसार
और इसके अलावा कई वेबसाइट्स भी हैं  और यू ट्यूब पर अमन पैग़ाम टी. वी. भी है।
इसके बावजूद जब भी जनाब मासूम साहब का नाम लिया जाता है तो उनके नाम के साथ ‘अमन का पैग़ाम‘ ब्लॉग ही याद आता है।
आखि़र इसकी वजह क्या है ?
वजह सिर्फ़ यह है कि जनाब मासूम साहब की आमद से पहले ईश्वर, धर्म और महापुरूषों की मज़ाक़ उड़ाना यहां आम था। जिसका विरोध करने वाले भी डटकर उनका विरोध कर रहे थे। बुराई का विरोध करने वाले कम थे और कम को आम तौर पर कमज़ोर समझ लिया जाता है। कमज़ोर का साथ देने में किसी को भी अक्लमंदी
नज़र नहीं आती बल्कि आम तौर पर इल्ज़ाम का ठीकरा उनके सिर फोड़ना ज़्यादा सुविधाजनक हुआ करता है। इस तरह बहुमत की आवाज़ को अपने ब्दों में वे लोग बयान करते हैं जो कि बहुमत का चैधरी बनने की ख्वाहिश दिल में पाले रहते हैं। ये लोग राहबर की सूरत में राहज़न और डाकू हुआ करते हैं। आजकल लीडर
यही कर रहे हैं। सत्य और न्याय से इन्हें कोई सरोकार नहीं हुआ करता। ये लोग तो केवल यही देखते हैं कि ज़्यादा लोग किस तरफ़ हैं ?
जनाब मासूम साहब की आमद ऐसे ही समय हुई जबकि ब्लॉगवाणी और चिठ्ठा जगत जैसे एग्रीगेटर अपनी पूरी फ़ॉर्म में थे और लोग ईश्वर और उसके धर्म की मज़ाक़ मात्र टिप्पणियां बटोरने के लिए लिखा करते थे ताकि वे एग्रीगेटर्स की हॉट लिस्ट में अपना नाम देख सकें। वे विवादित और स्तरहीन कमेंट भी मात्र इसीलिए किया करते थे कि एग्रीगेटर्स के कमेंट बोर्ड ऐसे कमेंट को तुरंत पब्लिश किया करता था। वोट और कमेंट के सहारे ही इन दोनों एग्रीगेटर्स में कोई पोस्ट टॉप पर आया करती थी और इसीलिए वोट और कमेंट पाने के लिए बहुत से हिंदी ब्लॉगर्स हद से भी नीचे गिरे हुए थे। नीचे गिरे हुए इन ब्लॉगर्स का नाम तब बहुत बुलंद था और उनमें से कछ का आज भी है।
इन गिरे हुए ब्लॉगर्स को जब कुछ ब्लॉगर्स ने उठाने की कोशिश की तो उनकी भी मज़ाक़ उड़ानी ‘ाुरू कर दी गई। उनकी ही नहीं बल्कि उनके दीन-धर्म की भी मज़ाक़ उड़ाई गई। इससे भी आगे बढ़कर देश के प्रति उनकी वफ़ादारी पर भी सवाल खड़े किए गए और जब ऐतराज़ करने वालों को उन्होंने खरा जवाब दिया तो उन्हें जिहादी और धर्मयोद्धा तक का खि़ताब दे दिया गया। बहुमत की ग़लत नीतियों और विरोध के बाद ब्लॉगवाणी ने ख़ुद को अपडेट करना छोड़ दिया और फिर चिठ्ठाजगत भी बेजान सा हो गया। बहुत से लोगों ने अपना नाम एग्रीगेटर पर चमकता न देखा तो उन्होंने ब्लॉगिंग ही छोड़ दी।
जनाब मासूम साहब ने इन हालात में काम करना शुरू किया और इस पूरे ब्लॉग जगत में अकेले वही ब्लॉगर हैं जिन्होंने सबको ‘अमन का पैग़ाम‘ दिया और सत्य और न्याय की बुनियाद पर दिया और बिल्कुल निष्पक्ष होकर दिया। शुरू में तो उन्हें ‘इग्नोर करो‘ की पॉलिसी का शिकार बनाया गया और बाद में उनकी नीयत और मंशा पर शक ज़ाहिर किया गया। यह सब करने वाले वे ब्लॉगर्स हैं जिन्हें बड़ा समझकर लोग अपना मार्गदर्शक बनाए बैठे हैं। इसके बाद यह भी हुआ कि उनके खान-पान को लेकर कह दिया गया कि जो आदमी
शाकाहारी न हो वह ‘अमन का पैग़ाम‘ कैसे दे सकता है ?
यह हरकत भी बड़े कहलाने वाले ब्लॉगर्स ने ही की।
जनाब मासूम साहब ने यह सब देखा और दिल दुखाने वाली इन सभी बातों पर सब्र किया लेकिन ‘अमन का पैग़ाम‘ देना जारी रखा और हरेक वर्ग के अच्छे लोगों को अपने साथ जोड़ना जारी रखा। उन्होंने कभी यह नहीं देखा कि ‘कौन कह रहा है ?‘ बल्कि उन्होंने हमेशा यही देखा कि ‘क्या कह रहा है ?‘
लोग उनके साथ जुड़ते चले गए और ‘अमन का कारवां‘ बढ़ता ही चला गया और फिर वह वक्त भी आया कि हिंदी ब्लॉग जगत में अमन क़ायम हो गया। लोग एक दूसरे के जज़्बों का भी आदर करने लगे और ईश्वर, धर्म और महापुरूषों की मज़ाक़ उड़ाने से बचने लगे। इस तरह उस दौर का ख़ात्मा हो गया जिसे हिंदी ब्लॉगर्स ने
दंगे-फ़साद और धर्मयुद्ध नाम दे रखा था।
कटु बहसों के अंत का श्रेय जनाब मासूम साहब के ‘अमन के पैग़ाम‘ को ही जाता है। यह बात हरेक जानता है लेकिन कोई कहने के लिए तैयार ही नहीं है। इसी का नाम मैंने ‘वर्चुअल कम्युनलिज़्म‘ रखा है। यह वह कारनामा है जिसे अंजाम देने के लिए उठे तो बहुत से ब्लॉगर्स लेकिन कर कुछ नहीं पाए। पक्षपात और गुटबंदी ने उनकी तमाम कोशिशों को बेअसर कर दिया।
1-हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़ुत्बात का संग्रह ‘नहजुल बलाग़ा‘
और
2- इमाम हुसैन के यादगार उपदेश
दोनों जगह यह हक़ीक़त बिल्कुल साफ़ साफ़ बताई गई है कि सिर्फ़ वही कोशिश कामयाब होती है जिसके पीछे  सच्चाई और ईमानदारी होती है। मुहब्बत और नर्मी के साथ लोगों की भलाई के लिए अच्छाई का संदेश वह पूरी लगन से देते रहे और किसी भी फ़सादी के हमले से वह विचलित न हुए तो इसका कारण केवल यह है कि जो भी आदमी करबला के वाक़ये से अपनी रूहानी ग़िज़ा और आत्मिक शक्ति लेता है, वह कभी विचलित हो ही नहीं सकता। करबला के मैदान में सच्चाई और नेकी को क़ायम रखने की कोशिश में शहीद होने वाले हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु और उनके साथी उनके पूर्वज और उनके बुज़ुर्ग हैं। वे बुज़ुर्ग ऐसे बुज़ुर्ग हैं जिन्हें दुनिया अपना पेशवा और अपना मार्गदर्शक मानती है। दुनिया का कोई देश और कोई नस्ल ऐसी नहीं है जो कि उन्हें आदर न देती हो। हरेक धर्म-मत के लोग उनका ज़िक्र करते हैं। हिन्दुस्तान में भी सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं बल्कि हिन्दू भाई भी उन्हें पूरा सम्मान देते हैं, उनके बारे में जब वे लिखते हैं तो पूरी श्रृद्धा के साथ लिखते हैं।
श्री ज्ञान कुमार जी की लिखी किताब क्रमवार रूप से सामने आ ही रही है और वे भी जौनपुर के ही हैं। श्री ज्ञानचंद जी ने जिस तरह यह किताब जनाब मासूम साहब को सौंपी है उससे मासूम साहब के प्रति उनके विश्वास का पता चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि उनके वतन के लोग उनके प्रति किस तरह के जज़्बात रखते हैं।
इसी क्रम में श्री अरविन्द विद्रोही जी का लेख हिंदी ब्लॉग जगत के लिए एक मील का पत्थर बन कर रह गया है। इस एक अकेले लेख ने यह हक़ीक़त हिंदी दुनिया के सामने वह हक़ीक़त खोलकर रख दी है जिसे जानने के बाद नफ़रत की बुनियाद पर बनाई गई भ्रम की दीवारें ख़ुद ब ख़ुद ही ढह गई हैं।
इसका श्रेय भी जनाब मासूम साहब को ही जाता है। आज उनके वतन के लोग भी उनके साथ हैं और दुनिया भर में फैले हुए हिंदी ब्लॉगर्स में से भी हरेक अमनपसंद उनके साथ है। ये लोग हरेक धर्म-मत से संबंधित हैं।
जो लोग आज उनके साथ नहीं हैं उनमें एक तादाद तो ऐसी है जो कि केवल अपनी ख़ुशी के लिए ब्लॉगिंग करते हैं, सामाजिक मुददों और आम लोगों के दुख-दर्द से उन्हें कोई मतलब ही नहीं है और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कि मासूम साहब से नाराज़ हैं क्योंकि पिछले 5-7 बरसों में उन्होंने नफ़रत की जो फ़ज़ा बनाई थी, वह ‘अमन का पैग़ाम‘ आ जाने से मिट कर रह गई है।
यही वे लोग हैं जो नकारात्मक विचारों को फैलाते हैं क्योंकि ये ‘वर्चुअल कम्युनलिज़्म‘ के शिकार हैं।
‘अमन का पैग़ाम‘ आज एक कसौटी की शक्ल अख्तियार कर चुका है। कोई भी नफ़रत फैलाने वाला इस ब्लॉग पर नहीं आता है और अगर आ भी जाए तो ‘अमन का पैग़ाम‘ के साथ दो क़दम भी नहीं चल पाता। बहुत बड़े समझे जाने वाले बहुत से नाम ऐसे हैं जो कि यहां कभी नज़र ही नहीं आए।
यही संकीर्णता ब्लॉगर्स को जनाब  मासूम साहब के कारनामों को स्वीकारने से रोक रही है। ऐसा नहीं है कि किसी की सराहना से उन्हें कुछ हासिल हो जाएगा बल्कि यह सराहना इसलिए ज़रूरी है ताकि लोग जान लें कि हालात कितने भी बुरे क्यों न हों लेकिन अभी ईमान ज़िंदा है और ऐसे इंसान भी सलामत हैं जो ’शांति संदेश‘ दे रहे हैं और वह रंग भी ला रहा है।
ईश्वर साक्षी है, ख़ुदा गवाह है और अपने बंदों को वह अकेला काफ़ी है। उसकी रज़ा हासिल हो जाए तो यही बंदगी की मैराज और बुलंदी है। जो आज इससे किनारा कर रहा है, वह कल अपने ईश्वर-अल्लाह को क्या जवाब देगा ?
जनाब मासूम साहब अपने ब्लॉग्स और अपनी वेबसाइट्स के ज़रिये इसी बात की फ़िक्र दिला रहे हैं। वह हमारा भला चाहते हैं। किसी एक का भला नहीं बल्कि सबका भला चाहते हैं। इस बात को मैंने उनकी बातचीत से ही जाना है। मैंने कई बार देखा है कि जब उन्हें मेरे लिखने के अंदाज़ में उग्रता नज़र आई तो उन्होंने बिल्कुल साफ़ कहा कि यह तरीक़ा ठीक नहीं है, आपको इसे बदलना चाहिए। हालांकि उन्होंने अपनी नापसंद का इज़्हार किया लेकिन तब भी उनका लहजा नर्म था और उसमें मुहब्बत को महसूस किया जा सकता था। जनाब मासूम साहब हमसे बड़े भी हैं और उनकी समझ भी गहरी है और बात भी सही है क्योंकि हम तो ख़ुद भी जानते हैं कि हां हमारा क़लम यहां उग्र हो गया है। कमेंट में, चैट में, ईमेल में या फिर फ़ोन पर जब भी उन्हें कोई कमी नज़र आई तो उन्होंने मुझे टोका और उन्होंने कमी ही नहीं बताई बल्कि जो बात उन्हें पसंद आई, उसकी तारीफ़ भी की।
उन्होंने ब्लॉगिंग के संबंध में ख़ुद भी कई बार मुझसे पूछा कि आप मुझे सलाह दीजिए कि मुझे क्या करना चाहिए ?
उनका तरीक़ा यही है कि हमेशा बेहतर सलाह देंगे और आपसे भी बेहतर सलाह चाहेंगे। वह सिर्फ़ दूसरों को सिखाते ही नहीं हैं बल्कि ख़ुद भी सीखते हैं।
अपने व्यक्तित्व और अपनी ब्लॉगिंग को इस तरीक़े से वही शख्स बेहतर बनाया करता है जो कि अपने जीवन के सच्चे मक़सद के प्रति गंभीर हुआ करता है। यही गंभीरता ब्लॉगर्स में उनके प्रति विश्वास जगाती है और उन्हें हिंदी ब्लॉग जगत की एक हरदिल अज़ीज़ हस्ती बनाती है।
उनका मिशन ‘अमन का पैग़ाम‘ है और वह अपने मिशन में सफल हैं। जनाब एस. एम. मासूम साहब हिंदी ब्लॉगर्स को लगातार  ‘अमन का पैग़ाम‘ दे रहे हैं।
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