सच का सामना: क्या महिलाओं को पीटना मर्दानगी की निशानी है ?: आज वैसे तो 99.98% लोगों का मीडिया और ऑफ कैमरा के सामने कहना है कि अपनी पत्नी को पीटते रहना चाहिए नहीं तो सिर पर सवार हो जाती है. उन्हें...
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ग़ज़लगंगा.dg: देवता जितने भी थे पत्थर के थे
कुछ ज़मीं के और कुछ अंबर के थे.
अक्स सारे डूबते मंज़र के थे.
कुछ इबादत का सिला मिलता न था
देवता जितने भी थे पत्थर के थे.
दिल में कुछ, होठों पे कुछ, चेहरे पे कुछ
किस कदर मक्कार हम अंदर के थे.
खुल के कुछ कहने की गुंजाइश न थी
हम निशाने पर किसी खंज़र के थे.
मेरी बातें गौर से सुनते थे सब
हम उड़ाते जब तलक बेपर के थे.
आस्मां को नापना मुश्किल न था
फ़िक्र में हमलोग बालो-पर के थे.
उलझनों में इस कदर जकड़े थे हम
हम न दफ्तर के न अपने घर के थे.
तोड़ डाली वक़्त ने सारी अकड़
तेज़ वर्ना हम भी कुछ तेवर के थे.
-----देवेंद्र गौतम
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खुद मिटा देंगे लेकिन "जन लोकपाल बिल" लेकर रहेंगे
दोस्तों ! आखिरकार टीम अन्ना को जंतर-मंतर
पर अनशन करने की अनुमति मिल गई है। मिली जानकारी के मुताबिक, शनिवार को
टीम अन्ना को 25 जुलाई से 8 अगस्त तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन करने के
लिए दिल्ली पुलिस की इजाजत मिल गई है । गौरतलब है कि दो दिन पहले दिल्ली
पुलिस ने मानसून सेशन के हवाला देते हुए टीम अन्ना को अनुमति देने से मना
कर दिया था। टीम
अन्ना के अहम अरविंद केजरीवाल के अनुसार दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से
शनिवार को मुलाकात के बाद यह परमिशन दी गई है। वहीं दिल्ली पुलिस का कहना
है कि कुछ शर्तों के साथ टीम अन्ना को यह अनुमति दी गई है ।
दोस्तों
! आप यह मत सोचो कि- देश ने हमारे लिए क्या किया है, बल्कि यह सोचो हमने
देश के लिए क्या किया है ? इस बार आप यह सोचकर "आर-पार" की लड़ाई के लिए
श्री अन्ना हजारे जी के अनशन में शामिल (अपनी-अपनी योग्यता और सुविधानुसार)
हो. वरना वो दिन दूर नहीं. जब हम और हमारी पीढियां कीड़े-मकोड़ों की तरह से
रेंग-रेंगकर मरेगी. आज हमारे देश को भ्रष्टाचार ने खोखला कर दिया है. माना
आज हम बहुत कमजोर है, लेकिन "एकजुट" होकर लड़ो तब कोई हम सबसे ज्यादा ताकतवर
नहीं है.
इतिहास गवाह रहा कि जब जब जनता ने
एकजुट होकर अपने अधिकारों को लेने के लिए लड़ाई (मांग) की है, तब तब उसको
सफलता मिली है. लड़ो और आखिरी दम तक लड़ों. यह मेरी-तुम्हारी लड़ाई नहीं है.
हम सब की लड़ाई है. मौत आज भी आनी है और मौत कल भी आनी है. मौत से मत डरो.
मौत एक सच्चाई है. इसको दिल से स्वीकार करो.
पूरा आलेख यहाँ सिरफिरा-आजाद पंछी: लड़ो और आखिरी दम तक लड़ों क्लिक करके पढ़ें.
अगर हम अपना-अपना राग और अपनी अपनी डपली बजाते रहे तो हमें कभी कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून नहीं मिलेगा. अब यह तुम्हारे ऊपर है कि गीदड़ की मौत
मरना चाहते हो या शेर की मौत मरना चाहते हो. सब जोर से कहो कि- खुद मिटा
देंगे लेकिन "जन लोकपाल बिल" लेकर रहेंगे. जो हमें जन लोकपाल बिल नहीं देगा
तब हम यहाँ(ससंद) रहने नहीं देंगे.
जानते हैं शादी की सबसे अच्छी बात क्या है ?
पुरानी ब्लागर पुराने लिंक बांट रही है. कल देखा तो 3 पुरानी पोस्ट के लिंक थे. उनमें उसकी फ़ज़ीहत के क़िस्से थे. अक्ल पुरानी हो और उसमें टेंशन भी घुस जाए तो ब्लागर ऐसा कर देता है. किसी ने समझाया होगा तो उसने वे तीनों पोस्ट के लिंक हटा दिए. आज सुबह खोला तो पेज़ एक्ज़िस्ट नहीं था और अब ‘कारण बताओ‘ के शीर्षक पर क्लिक करो तो वहां अब न यह शीर्षक है और न ही वे 3 पुराने लिंक. थोड़ा सा भी ईगो पर चोट लग जाए तो ब्लागर कितना अपसैट हो जाता है ?
वह किसी काम का नहीं रह जाता. बस नए पुराने लिंक ही बांटता रहता है. ख़ुद भी बेचैन रहता है और दूसरों में भी चेतावनियां दे कर बेचैनी फैलाता रहता है. ऐसे ही लोगों ने ब्लागिंग का कबाड़ा करके रख दिया है. आज ही अख़बार में भी आया है-
फ़ेसबुक बढ़ा रहा है बेचैनी
हिंदी ब्लागिंग का हाल देखो तो यह बेचैनी के साथ परेशानी भी बढ़ा रही है.
शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया
दोनों के सिलसिले में ये बेहतर कहा गया
ख़ुददारियों की राह पे जो गामज़न रहे
उनको हमारे शहर में ख़ुदसर कहा गया
इक मुख्तसर सी झील न जो कर सका उबूर
इस दौर में उसी को शनावर कहा गया
उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया
मैं ही वो सख्त जान हूं कि जिसके वास्ते
तपती हुई चट्टान को बिस्तर कहा गया
दोस्तो ! शादी की न हो और सावन आ जाए तो फिर कितना ही कारण पूछते रहो, बताने कोई भी नहीं आता। शादी की सबसे अच्छी बात यह है कि यह इतने सारे नए नए मसले खड़े कर देती है कि पुराने मसले उनके सामने छोटे लगने लगते हैं और तब वह उन्हें नज़र अंदाज़ कर देता है।
कारण पूछ कर जीना भी कोई जीना है, ख़ास तौर से उम्र के आखि़री पड़ाव में।
वैसे शादियां इस उम्र में भी हो जाती हैं और ग़लती तो कभी भी सुधारी जा सकती है।
अपनी शादी न करने कोई कारण न बताओ, बस शादी कर लो। ख़ुद भी चैन से जिओ और दूसरों को भी चैन से जीने दो।
हिंदी ब्लागर किस पोस्ट को ज़्यादा पढ़ते हैं ?-एक सर्वे जनहित में
एक बार एक कवि ने कहा था कि आपको पोस्ट लिखने की ज़रूरत ही नहीं है। बस वक्ष वक्ष वक्ष और ऐसे ही अल्फ़ाज़ लिख दीजिए। लोग पागलों की तरह उसे ऐसे पढ़ने के लिए टूट पड़ेंगे जैसे उन्होंने कभी वक्ष देखा ही न हो।
कुछ शरपसंद ब्लागर ऐसे हैं कि जब उनकी बात नहीं मानी जाती तो वे अपने निजी मुददे को सांप्रदायिकता से जोड़ देते हैं। कहते हैं कि फ़लां ब्लाग पर उस विशेष पार्टी की औरतों के नाम और फ़ोटो हैं और उस ब्लाग की पोस्ट में ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ भी हैं और ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ वाली पोस्ट उस ब्लाग पर सबसे ज़्यादा पसंद की जा रही हैं।
भाई पढ़ने वाले भी तुम्हारी पार्टी के ही हैं। इस तरह तो तुम ख़ुद यह बता रहे हो कि हमारे लोग उन पोस्टों पर टूट कर पड़ते हैं जिनमें ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ हों।
उसी ब्लाग पर सैकड़ों दूसरी पोस्टें भी हैं जिनमें ये अल्फ़ाज़ नहीं हैं। उन्हें पढ़ा होता तो ‘लाइक‘ के कालम में वे दूसरी पोस्टें आ जातीं जिनमें टेक्नीकल जानकारी या दूसरी बातें बताई गई हैं।
‘लाइक‘ कालम में ऐसी वैसी पोस्टों को लाया कौन ?
हिंदी ब्लागर ही लाए हैं और कौन लाया है !!!
इसी विशेष ब्लाग पर नहीं हर ब्लाग पर ऐसी पोस्टों के पाठक सबसे ज़्यादा मिलेंगे।
अपने ब्लाग का स्टैट चेक करो तो पता चलता है कि हिंदी ब्लागर कैसे कैसे घिनौने अल्फ़ाज़ लिखकर पढ़ने का मसौदा तलाश करते हैं।
यह देखा तो कुछ औरतों ने तो औरतपने ही हदें पार करके ही लिखना शुरू कर दिया। बाद में ये ऐसे लजाती हैं जैसे कि , जैसे कि ...
शीर्षक में प्यार, बोल्ड और वासना अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल कीजिए और फिर देखिए कि आपके पाठक कितने ज़्यादा बढ़ जाते हैं। हिंदी ब्लागरों को यही सब पसंद है।
दीन धर्म की बात बताने वाले ब्लाग पर ब्लागर जाते ही कहां हैं ?
ब्लागर अच्छी चीज़ें पढ़ना शुरू करें तो हरेक ब्लाग का ‘लाइक‘ कालम अपने आप बदल जाएगा।
जो भी कविता करने वाली बोल्ड होकर लिखे, उसे पढ़ो ही मत और वह लिखे और ब्लागर पढ़ें तो फिर उछल कूद मत मचाओ कि हाय ! हमारा पढ़ा हुआ सबसे ज़्यादा पढ़ा हुआ क्यों बन गया ?
ज़्यादा उछल कूद मचाओगे तो पर्दा तुम्हारा ही खुलेगा कि तुम इंटरनेट पर बीवी बच्चों को छोड़कर दिन रात पढ़ते क्या हो ?
विज्ञान ने खोजा गॉड पार्टिकल
बह्मांड की उत्पत्ति और जीवन के सृजन संबंधी कई प्रश्नों का जवाब देने में सक्षम गॉड पार्टिकल को बुधवार को खोज लिया गया।
स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित 27 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत सुरंग में हिग्स बोसोन पर वर्ष 2009 से दिन-रात शोध कर रही यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) की दो टीमों (एटलस) और (सीएमएस) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इससे मिलते-जुलते कण के अस्तित्व की बात स्वीकार की।
सर्न की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हमें अपने आंकड़ों में एक नए कण के पाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह हमारे शोध संयंत्र लार्ज हेड्रोन कोलाइडर के 125 और 126 जीईवी क्षेत्र में स्थित है। यह एक अद्भुत क्षण हैं। हमने अब तक मिले सभी बोसोन कणों में से सबसे भारी बोसोन को खोज निकाला है। सर्न ने इन नए आंकड़ों को सिग्मा 05 श्रेणी में स्थान दिया है, जिसके मायने होतें हैं नए पदार्थ की खोज। सेर्न के महानिदेशक राल्फ ह्यूर ने कहा कि प्रकृति को लेकर हमारी समझ में इजाफा करने की दिशा में हमने एक मील का पत्थर हासिल कर लिया। सेर्न के शोध निदेशक सेर्गियो बर्तालुकी ने हिग्स बोसोन के आस्तित्व की दिशा में प्रबल संकेत मिलने पर गहरी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारे लिए इतने अद्भुत नतीजों को लेकर उत्साहित नहीं होना बेहद चुनौतीभरा काम है। हमने पिछले वर्ष ठान लिया था कि 2012 में या तो हम हिग्स बोसोन को खोज निकालेंगे अथवा हिग्स थ्योरी को ही खारिज कर देंगे। हम एक अहम पड़ाव पर पहुंच गए हैं और भविष्य में इन आंकड़ों पर और अधिक प्रकाश पड़ने से हमारी समझ में इजाफा होगा। हिग्स बोसोन पर आए मौजूदा नतीजे वर्ष 2011 के आंकड़ों पर आधारित हैं और इस वर्ष के आंकड़ों पर भी अभी भी अध्ययन चल रहा है। हिग्स बोसोन पर 2011 के आंकड़ों से जुड़ी सेर्न की विस्तृत रिपोर्ट के इस महीने के आखिर तक जारी होने की उम्मीद है। इन नतीजों के जारी होने के साथ ही ब्रह्म कण (गॉड पार्टिकल) अब एक रहस्य या परिकल्पना मात्र नहीं रह गया है। ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने वर्ष 1964 में इस कण की परिकल्पना को जन्म दिया था। इस कण का नाम हिग्स और भारतीय वैग्यानिक सतरूद्रनाथ बसु के नाम पर रखा गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले चार दशकों के दौरान हिग्स बोसोन के आस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर पाए। ऐसा माना जाता है कि 13.7 अरब वर्ष पहले जब बिग बैंग कहलाने वाले महाविस्फोट के जरिए ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई होगी तो हिग्स बोसोन आस्तित्व में आया होगा और इसी से पदार्थ तथा दूसरे कणों की रचना हुई होगी तथा आकाशगंगाओं नक्षत्रों तथा जीवन इत्यादि ने आकार लिया होगा। वैज्ञानिक इसी वजह से इसे ब्रह्माकण (गॉड पार्टिकल) का नाम देते हैं। सृष्टि में हर चीज को कार्य करने के लिए द्रव्यमान की आवश्यकता होती है। अगर इलेक्ट्रानों में द्रव्यमान नहीं होता तो परमाणु नहीं होते और परमाणुओं के बगैर दुनिया में किसी भी चीज का सृजन असंभव था। डा हिग्स ने इसे लेकर सिद्धांत की खोज की जिसे आगे चलकर (हिग्स सिद्धांत) के तौर पर जाना गया। इससे कणों का द्रव्यमान सुनिश्चित्त करना संभव हो सका। डा हिग्स ने कहा कि इस माडल को काम करने के लिए एक सबसे भारी कण की आवश्यकता थी जिसे हिग्स बोसोन का नाम दिया गया। हिग्स बोसोन अभी तक एक परिकल्पना मात्र ही था लेकिन वैज्ञानिकों को चूंकि इसके कुछ विशेष लक्षण ज्ञात थे इसलिए उन्हें पता था कि अगर वे इसे खोजने की मुहिम छेड़ते हैं तो यह कैसा दिखाई देगा। हिग्स बोसोन का द्रव्यमान बाकी सभी बोसोन कणों में सबसे अधिक था। सेर्न के वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्म कण की खोज सुपर कणों और डार्क मैटर की खोज का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।
स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित 27 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत सुरंग में हिग्स बोसोन पर वर्ष 2009 से दिन-रात शोध कर रही यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) की दो टीमों (एटलस) और (सीएमएस) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इससे मिलते-जुलते कण के अस्तित्व की बात स्वीकार की।
सर्न की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हमें अपने आंकड़ों में एक नए कण के पाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह हमारे शोध संयंत्र लार्ज हेड्रोन कोलाइडर के 125 और 126 जीईवी क्षेत्र में स्थित है। यह एक अद्भुत क्षण हैं। हमने अब तक मिले सभी बोसोन कणों में से सबसे भारी बोसोन को खोज निकाला है। सर्न ने इन नए आंकड़ों को सिग्मा 05 श्रेणी में स्थान दिया है, जिसके मायने होतें हैं नए पदार्थ की खोज। सेर्न के महानिदेशक राल्फ ह्यूर ने कहा कि प्रकृति को लेकर हमारी समझ में इजाफा करने की दिशा में हमने एक मील का पत्थर हासिल कर लिया। सेर्न के शोध निदेशक सेर्गियो बर्तालुकी ने हिग्स बोसोन के आस्तित्व की दिशा में प्रबल संकेत मिलने पर गहरी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारे लिए इतने अद्भुत नतीजों को लेकर उत्साहित नहीं होना बेहद चुनौतीभरा काम है। हमने पिछले वर्ष ठान लिया था कि 2012 में या तो हम हिग्स बोसोन को खोज निकालेंगे अथवा हिग्स थ्योरी को ही खारिज कर देंगे। हम एक अहम पड़ाव पर पहुंच गए हैं और भविष्य में इन आंकड़ों पर और अधिक प्रकाश पड़ने से हमारी समझ में इजाफा होगा। हिग्स बोसोन पर आए मौजूदा नतीजे वर्ष 2011 के आंकड़ों पर आधारित हैं और इस वर्ष के आंकड़ों पर भी अभी भी अध्ययन चल रहा है। हिग्स बोसोन पर 2011 के आंकड़ों से जुड़ी सेर्न की विस्तृत रिपोर्ट के इस महीने के आखिर तक जारी होने की उम्मीद है। इन नतीजों के जारी होने के साथ ही ब्रह्म कण (गॉड पार्टिकल) अब एक रहस्य या परिकल्पना मात्र नहीं रह गया है। ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने वर्ष 1964 में इस कण की परिकल्पना को जन्म दिया था। इस कण का नाम हिग्स और भारतीय वैग्यानिक सतरूद्रनाथ बसु के नाम पर रखा गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले चार दशकों के दौरान हिग्स बोसोन के आस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर पाए। ऐसा माना जाता है कि 13.7 अरब वर्ष पहले जब बिग बैंग कहलाने वाले महाविस्फोट के जरिए ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई होगी तो हिग्स बोसोन आस्तित्व में आया होगा और इसी से पदार्थ तथा दूसरे कणों की रचना हुई होगी तथा आकाशगंगाओं नक्षत्रों तथा जीवन इत्यादि ने आकार लिया होगा। वैज्ञानिक इसी वजह से इसे ब्रह्माकण (गॉड पार्टिकल) का नाम देते हैं। सृष्टि में हर चीज को कार्य करने के लिए द्रव्यमान की आवश्यकता होती है। अगर इलेक्ट्रानों में द्रव्यमान नहीं होता तो परमाणु नहीं होते और परमाणुओं के बगैर दुनिया में किसी भी चीज का सृजन असंभव था। डा हिग्स ने इसे लेकर सिद्धांत की खोज की जिसे आगे चलकर (हिग्स सिद्धांत) के तौर पर जाना गया। इससे कणों का द्रव्यमान सुनिश्चित्त करना संभव हो सका। डा हिग्स ने कहा कि इस माडल को काम करने के लिए एक सबसे भारी कण की आवश्यकता थी जिसे हिग्स बोसोन का नाम दिया गया। हिग्स बोसोन अभी तक एक परिकल्पना मात्र ही था लेकिन वैज्ञानिकों को चूंकि इसके कुछ विशेष लक्षण ज्ञात थे इसलिए उन्हें पता था कि अगर वे इसे खोजने की मुहिम छेड़ते हैं तो यह कैसा दिखाई देगा। हिग्स बोसोन का द्रव्यमान बाकी सभी बोसोन कणों में सबसे अधिक था। सेर्न के वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्म कण की खोज सुपर कणों और डार्क मैटर की खोज का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।
दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 5 जुलाई 2012 में प्रकाशित
Blog News: धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल
अख्तर खान साहब ने वह पोस्ट ही मिटा डाली
है जो उनके सचिव ने भास्कर डोट कॉम से एक अंश उठाकर उनके ब्लॉग
पर पोस्ट बना दी थी. जिन ब्लॉगर्स ने अख्तर साहब के ब्लॉग पर मात्र एक
अंश पर आपत्ति प्रकट की , उनमें से किसी ने भास्कर डोट कॉम की पूरी पोस्ट
पर भी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की जो कि 8 गुना ज़्यादा है , है न कमाल की
बात ?
कुछ हिंदी ब्लॉगर्स ऐसी दोहरी सोच लेकर भी बुद्धिवादी कहलाते हैं.
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Blog News: धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल
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आत्महत्या, ड्रग्स और परिवार नियोजन
आज भारत में हर चौथे मिनट पर एक नागरिक आत्महत्या कर रहा है. हरेक उम्र के आदमी मर रहे हैं. अमीर ग़रीब सब मर रहे हैं. उत्तर दक्षिण में सब जगह मर रहे हैं। हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सब मर रहे हैं। बच्चे भी मर रहे हैं। जिनके एक दो हैं वे ज्यादा मर रहे हैं और जिनके दस पांच हैं वे कम मर रहे हैं। जिनके एक बच्चा था और वही मर गया तो माँ बाप का परिवार नियोजन सारा रखा रह जाता है। दस पांच में से एक चला जाता है तो भी माँ बाप के जीने के सहारे बाक़ी रहते हैं। जिन्हें दुनिया ने कम करना चाहा वे बढ़ रहे हैं और जो दूसरों का हक़ भी अपनी औलाद के लिए समेट लेना चाहते थे उनके बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं या फिर ड्रग्स लेकर मरने से बदतर जीते रहते हैं।
कोई अक्लमंद अब इन्हें बचा नहीं सकता। ऊपर वाला ही बचाए तो बचाए .
लेकिन वह किसी को क्यों बचाए जब वह उसकी मानता ही नहीं .
जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।
खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी
आज के एक अखबार की लीड खबर का शीर्षक है 'कड़े तेवर दिखायेंगे पीएम'. उप शीर्षक है 'पेट्रोल सस्ता कर डीजल महंगा करने की तैयारी'
संप्रंग सर्कार कठोर फैसले लेने का यह बेहतर मौका मान रही है. अर्थात वह हमेशा ऐसे लेने के लिए मौके की ताक में रहती है जिससे आम आदमी का जीवन और कष्टमय हो जाए. उस आम आदमी का जिसके लिए प्रतिदिन 28 रुपये के खर्च करने की क्षमता को काफी मान रही है यह सरकार. क्योंकि इसी में आबादी के उस हिस्से की भलाई है जिसके बाथरूम की मरम्मत के लिए 35 लाख रुपये भी कम पड़ते हैं. देश का एक बच्चा भी जानता है की तमाम जिंसों की ढुलाई डीजल चालित वाहनों से होता है. डीजल को महंगा करने से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें कैसे कम होंगी कम से कम हमारे जैसे मंद बुद्धि के लोगों की समझ से बाहर है. पीएम अर्थशास्त्री हैं. हो सकता है उनके अर्थशास्त्र में ऐसा कोई गणित हो. या फिर यह भी हो सकता है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का यह सिद्धांत कि अपने चरम पर पहुंचकर हर चीज विलीन हो जाती है काम कर रहा हो. सरकार को यकीन हो कि महंगाई को उसके चरम तक पहुंचा दो वह खुद ही ख़त्म हो जायेगी.
पेट्रोल की कीमत घटने से एलिट क्लास के उन लोगों को राहत मिलेगी.जिनके पास धन है. जिनकी क्रयशक्ति बेहतर है. लेकिन डीजल की कीमत बढ़ने पर निम्न मध्यवर्ग और मजदूर-किसान यानी हर वर्ग के लोग प्रभावित होंगे. इसी तरह रसोई गैस की राशनिंग जैसे कड़े कदम उठाने की तैयारी हो रही है. बाकी कड़े फैसले भी जनता पर कहर ढानेवाले ही हैं. अब भारत की जनता पांच वर्ष के लिए सत्ता की बागडोर थमाने की भूल कर ही बैठी है तो भुगतना तो उसी को पड़ेगा. इसलिए जनाब! आप चिंता मत कीजिये. जो मर्जी हो कर लीजिये. पूरी आबादी का गला घोंट दीजिये. लेकिन भगवान के लिए कुछ तो शर्म कीजिये आखिर आप 2014 में जनता को क्या मुंह दिखायेंगे.
खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी:
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माही ! हमें तुम्हारी चिंता है !
गुडगाँव की माही पिछले कई घंटों से बोरवेल में ज़िंदगी और मौत से संघर्ष कर रही है ! आज से कई साल पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी ! आज भी वह मुझे उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी उस वक्त थी जब मैंने इसे लिखा था ! सोनू और माही के साथ हुए इन हादसों के बीच और भी कई ऐसे ही हादसे हो चुके हैं जिनमें कई मासूम बच्चों ने अपनी जान गँवा दी है ! हर बच्चा प्रिंस की तरह खुशनसीब नहीं निकला जो सेना और प्रशासन की अथक मेहनत के बाद बोरवेल से सकुशल जीवित बाहर निकल आया था ! आज मैं सभी लोगों से यही अपील करना चाहती हूँ अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए किसी और की मुखापेक्षा ना करें ! स्वयं सतर्क रहें और प्रयत्नशील हों !
और सोनू हार गया
साधना वैद
ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है
रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.
पहले खुली हवा में पौधे उगते थे
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.
लाख यहां मन्नत मांगो, मत्था टेको
आस यहां पर किसकी पूरी होती है.
खाली हाथ कहीं कुछ काम नहीं बनता
हर दफ्तर की कुछ दस्तूरी होती है.
किसको नटवरलाल कहें इस दुनिया में
जाने किसकी क्या मजबूरी होती है.
उनका एक लम्हा कटता है जितने में
अपनी दिनभर की मजदूरी होती है.
-----देवेंद्र गौतम
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जरुरत नहीं हिंदी सीखने की??
ऑस्ट्रेलियाई सरकार द्वारा ये बयान दिया जाना की भारत जाने वालें उनके राजनयिकों को वहां की भाषा (हिंदी) सीखने की जरुरत नहीं है, हम सबका, हिंदी का और समूचे भारत का अपमान है | उनका ये मानना है भारत में सारे काम-काज अंग्रेजी में ही होते हैं और भारत एक अंग्रेजी लोकतंत्र है | अन्य कोई भी देश जैसे चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस आदि जाने वाले राजनयिकों को वहां की भाषा सीखना अनिवार्य है पर भारत जाने वालों का काम अंग्रेजी से ही चल जायेगा | भले ही यह कहकर उन्होंने हमारा अपमान किया हो पर उनकी बातें सच ही तो है | एक तरह से ये हमारे और हमारी सरकार के लिए बहुत ही शर्म की बात है और चेहरे पे जूता पड़ने जैसा है | हम और हमारी सरकार जब स्वयं अपनी भाषा की इज्ज़त नहीं कर पाते तो कोई और क्या करेगा ?
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