आतंकवाद का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?

किसी आदमी की हत्या के बाद पुलिस इस बात पर भी विचार करती है कि इस आदमी की हत्या रंजिशन की गयी है या फिर किसी लाभ के लिये की गयी है ?
आतंकवाद का मक़सद राजनीतिक लाभ उठाना होता है. इसलिये आतंकवादी घटनाओं के बाद यह भी देखा जाना चाहिये कि इस आतंकवादी घटना का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?

बम धमाकों का मक़सद लोगों को मारना नहीं होता. बम धमाकों से ज़्यादा लोग तो शराब पीकर मर जाते हैं या ब्याजखोर महाजन के डर से आत्महत्या कर लेते हैं.
ये आतंकवादी दरअसल अमन के दुश्मन हैं। इनके कुछ आक़ा हैं, जिनके कुछ मक़सद हैं। ये लोकल भी हो सकते हैं और विदेशी भी। जो कोई भी हो लेकिन इनके केवल राजनीतिक उद्देश्य हैं। ये लोग चाहते हैं कि भारत के समुदाय एक दूसरे को शक की नज़र से देखें और एक दूसरे को इल्ज़ाम दें। कुछ तत्व नहीं चाहते कि जनता अपनी ग़रीबी और बर्बादी के असल गुनाहगारों को कभी जान पाए। जनता का ध्यान बंटाने और उन्हें बांटकर आपस में लड़ाने की साज़िश है यह किसी की। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, उन तक पहुंचना भी मुश्किल है और उन्हें खोद निकालना भी। कुछ जड़ों से तो लोग श्रृद्धा और समर्पण के रिश्ते से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोई क्या कार्रवाई करेगा ?
इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा !
उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!
और एक नज़र डा०  अनवर जमाल का यह मज़मून भी देखें -
Hindi Bloggers Forum International (HBFI): आतंकवाद के ख़ात्मे का एकमात्र उपाय Aatankwad Free India
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नरेन्द्र मोदी जी के प्रति मौलवी महमूद मदनी के विचारों में नरमी का कारण ? Maulana Mehmood Madni

गुजरात दंगों पर महमूद मदनी नरेन्द्र मोदी जी के अफ़सोस को पर्याप्त मानते हैं। उनकी यह नरमी प्रधानमंत्री बनने की संभावना रखने वाले व्यक्ति से मधुर रिश्ता बनाने की क़वायद है। उनके चाचा अरशद मदनी साहब ने कांग्रेस में उन्हें जमने नहीं दिया। अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए अब महमूद मदनी के पास विकल्प ही क्या है ?
इसी तरकीब से मदनी ख़ानदान ने अरबों रूपये की संपत्ति अर्जित कर ली है। मुसलमानों के ये रहनुमा मुसलमानों को राह तो क्या दिखाते, ये तो उनके जज़्बात की भी नुमाईन्दगी नहीं करते।
नरेन्द्र मोदी जी के विषय में मौलवी महमूद मदनी के बयान को लेकर आज दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ में एक लेख छपा है। देखिए-
कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार

मदनी साहब, आखिर यह माजरा क्या है? कयास पर कयास लग रहे हैं। लोग अपनी-अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा कर पता करने में लगे हैं। बीजेपी खुश है! माफ कीजिएगा, मुझे अचानक ‘रंगा खुश’ याद आ गया। बेचारी सेकुलर पार्टियों का तो मुंह ही उतर गया। सारे देश के मुल्ला-मौलवियों की नींद अचानक टूट गई। दारुल उलूम देवबंद जैसी संस्था से जुड़े और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का दिल अगर नरेंद्र मोदी को लेकर पसीजने लगे, तो धमाका तो होगा ही।

वैसे मदनी साहब का कहना है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में सिर्फ जमीनी हकीकत का जिक्र किया था कि गुजरात में बहुत-से मुसलमानों ने इस बार मोदी को वोट दिया। बिहार में भी नीतीश कुमार के कारण कई जगहों पर मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है। यानी ‘बड़ा चेंज आ रहा है, सिचुएशन चेंज हो रही है और यकीनन गुजरात के लोग (मुसलमान) अलग तरीके से सोच रहे हैं।’ हालांकि, वह आगे साफ करते हैं कि जरूरी नहीं कि जो कुछ गुजरात और बिहार में घटित हो रहा है, उसका प्रतिबिंब पूरे देश में दिखे, लेकिन उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसकी तरफ शायद लोगों का ध्यान नहीं गया। उन्होंने कहा, ‘2002 की दुर्घटना को जितने गर्व के साथ वह (मोदी) लेते आए हैं, वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट है कि हम कह दें कि सब ठीक है।’ जब उनसे पूछा गया कि अब तो मोदी उन सब बातों की कोई चर्चा नहीं करते और सिर्फ विकास की बात करते हैं, तो मदनी साहब का जवाब था,‘कुछ अफसोस (गुजरात दंगों पर) होना चाहिए था। विकास इंसाफ के बगैर कैसे होगा?’ और मदनी ने यह भी साफ किया कि उनकी नजर में सेकुलर पार्टियां मोदी या बीजेपी से बेहतर नहीं हैं!

इसका क्या मतलब निकाला जाए? आखिर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी अटपटी संभावनाओं के स्वप्न क्यों बुनने लगे कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं। और सेकुलर पार्टियों से मौलाना का मोहभंग अभी ही क्यों हुआ? क्या सचमुच मुसलमान सेकुलर पार्टियों से निराश हो चुके हैं और उन्हें नए ठिकाने की तलाश है? या फिर सचमुच मौलाना मोदी को विकास-पुरुष मानने लगे हैं और उन्हें लगता है कि अगर मोदी वाकई प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं, तो फिर देश के मुसलमान अपने गुजराती भाइयों से सीखते हुए क्यों न मोदी से दोस्ती के रिश्ते कायम करें। हो सकता है कि मौलाना को लगा हो कि अगर यूरोपियन यूनियन इतने बरसों के बाद मोदी से फिर संवाद शुरू करता है, तो मुसलमान भी अगर अपना नजरिया बदलने के बारे में सोचें, तो पहाड़ थोड़े ही टूट पड़ेगा। आखिर बिहार और गुजरात के उदाहरण सामने हैं।
पूरे इंटरव्यू में मौलाना मदनी ने एक बार भी नहीं कहा कि मोदी को माफी मांगनी चाहिए। शायद उन्हें मालूम है कि मोदी कतई माफी नहीं मांगेंगे, इसीलिए वह कहते हैं कि मोदी को दंगों पर अफसोस जताना चाहिए। यह सब बहुत चौंकाने वाला है, खासकर तब, जब यह शिगूफा उस देवबंद से आया हो, जिसने अभी डेढ़ साल पहले ही मोदी की तारीफ करने के आरोप में अपने गुजराती कुलपति मौलाना गुलाम वस्तानवी को बरखास्त कर दिया था और उनकी बरखास्तगी में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा हाथ था। तब से अब तक स्थिति में सिर्फ एक बदलाव हुआ है, वह यह कि बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के तगड़े दावेदार हैं और अगर कहीं बाजी मोदी के हाथ लग ही गई, तो ऐसे में उनकी गोटियां सही जगह होनी चाहिए।
बहरहाल, मदनी साहब की दिली ख्वाहिश क्या है, वही जानें। यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। हम तो इस शिगूफे को खुरच-खुरच कर देखना चाहते हैं कि इसका मकसद आखिर क्या हो सकता है? मदनी के इंटरव्यू पर जिस तरह दनादन मुस्लिम धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उन्हें देखकर तो नहीं लगता कि मोदी के मामले में आम मुसलमानों के मन में अगले साल-डेढ़ साल में कोई नरमी आएगी। गुजरात का मुसलमान विकल्पहीनता की जिस लाचारी के तले घुट-घुटकर जीने को अभिशप्त है, वैसी कोई स्थिति देश भर में कहीं भी मुसलमानों के सामने नहीं है। उनके सामने विकल्प ही विकल्प हैं। पिछले कई चुनावों को देखें, तो मुस्लिम वोटों में एक खास तरह का पैटर्न दिखता है, वह है, वोटों के नितांत स्थानीय ध्रुवीकरण का, यानी जिस चुनाव क्षेत्र में जो उम्मीदवार बीजेपी को हराने में सबसे ज्यादा सक्षम हो, उसे वोट दिया जाए। मुझे लगता है कि इस बार यह ध्रुवीकरण पहले से और भी ज्यादा मजबूती से होगा।
तो फिर यह शिगूफा क्यों? मोदी भी जानते हैं और मदनी भी कि हमेशा से बीजेपी के विरुद्ध रहे मुस्लिम वोटर को ऐसे रातों-रात बहलाया नहीं जा सकता। लेकिन इस तरह की बातें अगर हवा में तैरती रहें, तो मोदी को दो बड़े फायदे होंगे। पहला यह कि मुसलमानों में उनके समर्थक कुछ ऐसे प्रभावशाली प्रवक्ता निकाल आएंगे, जो आम मुसलमानों के बीच धीरे-धीरे यह संदेश फैलाते रहें कि मोदी से दुश्मनी पालने में नुकसान ही नुकसान है। न गुजरा हुआ समय वापस लाया जा सकता है और न ही पहले हो चुके नुकसान की भरपायी हो सकती है। भलाई इसी में है कि मुसलमान पिछली बातों को भूलकर विकास की गाड़ी में सवार हो लें। ऐसे प्रचार से मुसलमानों के विरोध की धार कुंद होती जाएगी। दूसरा फायदा यह होगा कि मोदी एक तरफ तो दुनिया को यह दिखाने में कामयाब हो जाएंगे कि मुसलमानों में भी उनकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है और दूसरी तरफ वह ‘सेकुलर माइंडसेट’ वाले हिंदू वोटरों के बीच भी अपनी धुली छवि के साथ विकास के अपने झुनझुने की अपील बढ़ा पाएंगे।
मोदी युद्धकला के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं, प्रचार युद्ध में उनका कोई जवाब नहीं। ‘इमेज वॉर’ की बारीकियों को उनसे बेहतर भला और कौन समझता है, इसका सबूत वह पिछले विधानसभा चुनाव में और अभी यूरोपियन यूनियन के मामले में दे चुके हैं। यह नया शिगूफा भी उसी की एक कड़ी है। अभी-अभी अपनी रणनीति में भी उन्होंने व्यापक बदलाव किया है और महाकुंभ में मथी गई ‘हिन्दू लहर’ पर सवार होने की बजाय फिलहाल ‘इन्क्लूसिव डेवलपमेंट’ के मुखौटे को पहनने का फैसला किया है।
Source : http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-310631.html
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सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना ब्लॉग रत्न प्रविष्टि संख्या - 8

सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना ब्लॉग रत्न प्रविष्टि संख्या - 8: ग़ज़ल इस मतलबी जहां के तलबगार हम नहीं  दिल की सुनें सदा, करें व्यापार हम नहीं | चाहा तुझे, पूजा तुझे , माना खुदा तुझे  ये बात...
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वैदिक काल में माधवी का विवाह संस्कार vivah sanskar

इंटरनेट पर एक लेख नज़र से गुज़रा जिसमें कहा गया था कि हमारा विवाह संस्कार है। यह मुसलमानों के निकाह से उत्तम है क्योंकि वह एक क़रार होता है। उन्होंने यह अपील भी की थी कि हिन्दू विवाह को एक संस्कार ही माना जाए। इस विषय को जानने के लिए हमने वैदिक इतिहास में विवाह और स्त्री की स्थिति पर नज़र डाली तो वहां कोई एक निश्चित बात न मिली। इसी दौरान राजा ययाति की कन्या माधवी के विवाह संस्कार पर भी नज़र पड़ी।


संक्षेप में यह कथा ऑनलाइन भारतकोष के अनुसार इस प्रकार है कि गालव ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के शिष्य थे। विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से 800 ऐसे घोड़े मांगे जिनका रंग चन्द्रमा के समान सफ़ेद हो और उनके कान एक ओर से काले हों। गालव निर्धन थे। वह घोड़े जुटाने के लिए राजा ययाति के पास गया। ययाति के पास ऐसे घोड़े नहीं थे जैसे कि विश्वामित्र ने मांगे थे। ययाति ने गालव को अपनी कन्या माधवी दान में दे दी। गालव माधवी को लेकर सबसे पहले अयोध्या के राजा हर्यश्च के पास गया। उसने माधवी से वसुमना नामक राजकुमार प्राप्त किया और गालव को शुल्क के रूप में 200 घोड़े दिए। इसके बाद गालव माधवी को एक एक करके काशी के अधिपति दिवोदास के पास गया। उसने माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र प्राप्त किया और उसके शुल्क में गालव को 200 घोड़े दे दिए। उसके गाद गालव माधवी को लेकर भोजनगर के राजा उशीनार के पास गया। उसने भी माधवी से शिवि नामक पुत्र प्राप्त किया और उसने भी गालव को शुल्क के रूप में 200 घोड़े दिए। इसके बाद गालव और भी जगह गया और हरेक जगह से 200 घोड़े ले लेकर उसने 1000 घोड़े इकठ्ठा कर लिए। वितस्ता नदी पार करते समय उनमें से 400 घोड़े नदी में बह गए। गालव ने बचे हुए 600 घोड़े और माधवी को अपने गुरू विश्वामित्र को दे दिया। उन्होंने भी माधवी से एक बच्चा पैदा किया। उन्होंने गालव को माधवी लौटा दी और ख़ुद जंगल चले गए। गालव गुरूदक्षिणा के भार से मुक्त हो चुका था। उसने राजा ययाति को उसकी कन्या माधवी वापस दे दी और ख़ुद भी वन को प्रस्थान किया।
मशहूर लेखक भीष्म साहनी ने माधवी की कथा पर एक उपन्यास भी लिखा है जिसे राजकमल प्रकाशन से मंगाया जा सकता है।
माधवी की कथा के माध्यम से तत्कालीन वैदिक समाज में विवाह संस्कार की विविधताओं का अच्छा परिचय मिलता है।
किसी की भावनाएं आहत न हों, इसलिए हम अपना कोई नज़रिया पेश नहीं कर रहे हैं। अपना नज़रिया आप ख़ुद तय करें कि आप अपनी बहन-बेटियों का संस्कार करना पसंद करेंगे या कि क़रार ?
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छब्बीस साल के युवक ने रचाया आठवां विवाह 8 patniyan



छठी पत्नी ने खोली पोल
शहडोल : शहडोल जिले में कैशवाही चौकी अंतर्गत पतेरा टोला निवासी छब्बीस वर्षीय एक युवक द्वारा सात शादियां रचाने के बाद गुरुवार को एक नाबालिग के साथ आठवीं शादी करने का मामला सामने आया है.
महिला आयोग की सदस्य वंदना मण्डावी के समक्ष उमेन्द्र की इस करतूत का खुलासा उसकी छठी पत्नी देवकी बाई महरा ने किया.
कैशवाही चौकी के ग्राम कुम्हारी निवासी देवकी महरा ( 24 ) ने महिला आयोग की सदस्य मण्डावी के समक्ष आवेदन देते हुए बताया कि सात सितंबर 2009 को उसका विवाह शपथ-पत्र के माध्यम से जैतपुर थाना के ग्राम पतेरा टोला निवासी उमेंद्र प्रसाद महरा के साथ हुआ था. कुछ समय तक तो सब ठीक-ठाक चला, फिर एक वर्ष पहले पति ने उसे छोड दिया. कई बार वह पति के पास गई, लेकिन वह अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुआ.
आवेदन के अनुसार इस बीच देवकी को पता चला कि उसका पति इससे पहले भी पांच बार विवाह रचा चुका है और वह उसकी छठे नंबर की पत्नी है. पांचों पत्नियों के साथ भी कुछ माह गुजारने के बाद वह सभी को छोडता गया.
देवकी ने महिला आयोग को दी गई शिकायत में बताया कि उमेंद्र ने सात फरवरी को आठवां विवाह कंठी टोला निवासी 16 वर्षीय एक नाबालिग लडकी से रचाया. हालांकि इस बात की जानकारी कैशवाही चौकी एवं जैतपुर थाने में दी गई थी. पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन सिर्फ शादी नहीं करने की सलाह देकर लौट आई. इसका नतीजा यह निकला कि आठवां विवाह संपन्न हो गया.
शिकायतकर्ता के अनुसार आठ शादियां रचाने वाले उमेंद्र का उद्देश्य अय्याशी था. उसने बताया कि उमेंद्र को जब पता चलता कि उसकी पत्नी गर्भवती हो गयी है तो वह उस पर गर्भपात के लिए दबाव डालता. पत्नी के गर्भपात के लिए तैयार नहीं होने पर वह उसे छोड, दूसरा विवाह कर लेता था.
महिला आयोग की सदस्य वंदना मंडावी ने बताया कि देवकी के आवेदन पर आयोग ने संज्ञान लिया है.
source : http://www.prabhatkhabar.com/node/262806
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लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है


लहसुन के सेवन से रक्त में थक्का बनने की प्रवृत्ति बेहद कम हो जाती है, जिससे हृदयाघात का ख़तरा टलता है। यह बिंबागुओं (Platelates) को चिपकने से रोकता है। थक्कों को गलाता है। धमनियों को फैलाकर रक्तचाप घटाता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए यह अमृत के समान है। नियमित लहसुन को दूध में उबालकर लेते रहने से ब्लडप्रेशर कम या ज़्यादा होने की बीमारी नहीं होती।
  • कॉलेस्ट्रोल की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है। जिगर के अंदर मेटाबोलिज्म में सुधार लाकर कोलेस्ट्रॉल कम करता है और एरिथमिया को नियमित करता है। 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन' के एक अध्ययन के मुताबिक लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्रॉल में 10 फीसदी गिरावट आती है। यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।
  • लहसुन की तीक्ष्णता और रोगाणुनाशक विशेषता के कारण यह चिकित्सा जगत में उपयोगी कंद है। मेहनतकश किसान-मजदूर तो लहसुन की चटनी, रोटी खाकर स्वस्थ और कर्मठ बने रहते हैं। षडरस भोजन के 6 रसों में से पाँच रस लहसुन में सदैव विद्यमान रहते हैं। सिर्फ 'अम्ल रस' नहीं रहता। आज षडरस आहार दुर्लभ हो चला है। लहसुन उसकी आपूर्ति के लिए हर कहीं सस्ता, सुलभ है। लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है। वह इसलिए कि इसका लगातार प्रयोग मानव जीवन को स्वास्थ्य संवर्धक स्थितियों में रखता है। हेल्थ एक्सपर्ट हर रोज सुबह-उठकर ख़ाली पेट लहसुन की दो-तीन कलियां गुनगुने पानी से लेने की बात कहते हैं।
  • तेज गंध वाली लहसुन एक संजीवनी है जो कैंसर, एड्स और हृदय रोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच बन सकती है। त्वचा को दाग़-धब्बे रहित बनाने, मुंहासों से बचने और पेट को साफ़ करने में भी लहसुन बढिय़ा है। इसे बादी कम करने वाला माना जाता है, इसीलिए बैंगन या उड़द की दाल जैसी बादी करने वाली चीजों में इसे डालने की सलाह दी जाती है। यह खून को साफ़ कर शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई करता है। अगर आपका वजन अधिक है और इसे कम करना चाहते हैं तो सुबह-शाम लहसुन की दो-दो कलियां खाएं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करने, कैंसर, अल्सर और हैमरॉयड से लडऩे में लहसुन को फ़ायदेमंद बताया गया है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
पूरी इल्मी जानकारी भारत डिस्कवरी पे -

http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8
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अग़ज़ल

Sahitya Surbhi: अग़ज़ल - 50: जीना नहीं आया यारो, मुझको जीना नहीं आया  जिन्दगी क्या थी ? दो घूँट जहर, पीना नहीं आया । जमीं के गुलशन और दिल के चमन में फर्क है यह...
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विवाहित स्त्री होना :दासी होने का परिचायक नहीं

 
आज जैसे जैसे महिला सशक्तिकरण की मांग जोर  पकड़ रही है वैसे ही एक धारणा और भी बलवती होती जा रही है वह यह कि विवाह करने से नारी गुलाम हो जाती है ,पति की दासी हो जाती है और इसका परिचायक है बहुत सी स्वावलंबी महिलाओं का विवाह से दूर रहना .मोहन भागवत जी द्वारा विवाह संस्कार को सौदा बताये जाने पर मेरे द्वारा आक्षेप किया गया तो मुझे भी यह कहा गया कि एक ओर तो मैं अधिवक्ता होते हुए महिला सशक्तिकरण की बातें  करती हूँ और दूसरी ओर विवाह को संस्कार बताये जाने की वकालत कर विरोधाभासी बातें करती हूँ जबकि मेरे अनुसार इसमें कोई विरोधाभास है ही नहीं .
    यदि हम सशक्तिकरण की परिभाषा में जाते हैं तो यही पाते हैं कि ''सशक्त वही है जो स्वयं के लिए क्या सही है ,क्या गलत है का निर्णय स्वयं कर सके और अपने निर्णय को अपने जीवन में कार्य रूप में परिणित कर सके ,फिर इसका विवाहित होने या न होने से कोई मतलब ही नहीं है .हमारे देश का इतिहास इस बात का साक्षी है कि हमारे यहाँ कि महिलाएं सशक्त भी रही हैं और विवाहित भी .उन्होंने जीवन में कर्मक्षेत्र न केवल अपने परिवार को माना बल्कि संसार के रणक्षेत्र में भी पदार्पण किया और अपनी योग्यता का लोहा मनवाया .
     मानव सृष्टि का आरंभ केवल पुरुष के ही कारण नहीं हुआ बल्कि शतरूपा के सहयोग से ही मनु ये कार्य संभव कर पाए .
   वीरांगना झलकारी बाई पहले किसी फ़ौज में नहीं थी .जंगल में रहने के कारण उन्होंने अपने पिता से घुड़सवारी व् अस्त्र -शस्त्र सञ्चालन की शिक्षा ली थी .उनकी शादी महारानी लक्ष्मीबाई  तोपखाने के वीर तोपची पूरण सिंह के साथ हो गयी और यदि स्त्री का विवाहित होना ही उसकी गुलामी का परिचायक मानें तो यहाँ से झलकारी की जिंदगी मात्र  किलकारी से बंधकर रह जानी थी किन्तु नहीं ,अपने पति के माध्यम से वे महारानी की महिला फौज में भर्ती  हो गयी और शीघ्र ही वे फौज के सभी कामों में विशेष योग्यता वाली हो गयी .झाँसी के किले को अंग्रेजों ने जब घेरा तब जनरल ह्यूरोज़ ने उसे तोपची के पास खड़े गोलियां चलाते देख लिया उस पर गोलियों की वर्षा की गयी .तोप का गोला पति के लगने पर झलकारी ने मोर्चा संभाला पर उसे भी गोला लगा और वह ''जय भवानी''कहती हुई शहीद हो गयी उसका बलिदान न केवल महारानी को बचने में सफल हुआ अपितु एक महिला के विवाहित होते हुए उसकी सशक्तता का अनूठा दृष्टान्त सम्पूर्ण विश्व के समक्ष रख गया .
          भारत कोकिला  ''सरोजनी नायडू''ने गोविन्द राजलू नायडू ''से विवाह किया और महात्मा गाँधी द्वारा चलाये गए १९३२ के नमक सत्याग्रह में भी भाग लिया .
        कस्तूरबा गाँधी महात्मा गाँधी जी की धर्मपत्नी भी थी और विवाह को एक संस्कार के रूप में निभाने वाली  होते हुए भी महिला सशक्तिकरण की पहचान भी .उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में महिलाओं में सत्याग्रह का शंख फूंका .
      प्रकाशवती पाल ,जिन्होंने २७ फरवरी १९३१ को चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बाद क्रांति संगठन की सूत्र अपने हाथ में लेकर काम किया १९३४ में दिल्ली में गिरफ्तार हुई .पहले विवाह से अरुचि रखने वाली व् देश सेवा की इच्छुक प्रकाशवती ने बरेली जेल में यशपाल से विवाह किया किन्तु इससे उनके जीवन के लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं आया .यशपाल ने उन्हें क्रन्तिकारी बनाया और प्रकाशवती ने उन्हें एक महान लेखक .
      सुचेता कृपलानी आचार्य कृपलानी  की पत्नी थी और पहले स्वतंत्रता संग्राम से जुडी कर्तव्यनिष्ठ क्रांतिकारी और बाद में उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री .क्या यहाँ ये कहा जा सकता है कि विवाह ने कहीं भी उनके पैरों में बंधन डाले या नारी रूप में उन्हें कमजोर किया .
      प्रसिद्ध समाज सुधारक गोविन्द रानाडे की पत्नी रमाबाई रानाडे पति से पूर्ण सहयोग पाने वाली ,पूना में महिला सेवा सदन की स्थापक ,जिनकी राह में कई बार रोड़े पड़े लेकिन न तो उनके विवाह ने डाले और न पति ने डाले  बल्कि उस समय फ़ैली पर्दा  ,छुआछूत ,बाल विवाह जैसी कुरीतियों ने डाले और इन सबको जबरदस्त टक्कर देते हुए रमाबाई रानाडे ने स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल कायम की .
        देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने फ़िरोज़ गाँधी से अंतरजातीय विवाह भी किया और दो पुत्रों राजीव व् संजय की माँ भी बनी और दिखा दिया भारत ही नहीं सारे विश्व को कि एक नव पल्लवित लोकतंत्र की कमान किस प्रकार कुशलता से संभालकर पाकिस्तान जैसे दुश्मनों के दांत खट्टे किये जाते हैं .क्या यहाँ विवाह को उनका कारागार कहा जा सकता है .पत्नी व् माँ होते हुए भी  बीबीसी की इंटरनेट न्यूज़ सर्विस द्वारा कराये गए एक ऑनलाइन  सर्वेक्षण में उन्हें ''सहस्त्राब्दी की महानतम महिला [woman of the millennium ]घोषित   किया गया .
      भारतीय सिनेमा की  प्रथम अभिनेत्री देविका रानी पहले प्रसिद्ध  निर्माता निर्देशक हिमांशु राय की पत्नी रही और बाद में विश्विख्यात रुसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिक की पत्नी बनी और उनके साथ कला ,संस्कृति तथा पेंटिंग के क्षेत्र में व्यस्त हो गयी कहीं कोई बंदिश नहीं कहीं कोई गुलामी की दशा नहीं दिखाई देती उनके जीवन में कर्णाटक चित्रकला को उभारने में दोनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा .१९६९ में सर्वप्रथम ''दादा साहेब फाल्के '' व् १९५८ में ''पद्मश्री ''महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय स्थान रखते हैं .
     ''बुंदेलों हरबोलों के मुहं हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ''कह राष्ट्रीय आन्दोलन में नवतेज भरने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान ''कर्मवीर'' के संपादक लक्ष्मण सिंह की विवाहिता थी किन्तु साथ ही सफल राष्ट्र सेविका ,कवियत्री ,सुगृहणी व् माँ थी .स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे मध्य प्रदेश विधान सभा की सदस्य भी रही .गुलाम  भारत  की इस राष्ट्र सेविका के जीवन में हमें तो  कहीं भी गुलामी की झलक नहीं मिलती जबकि जीवन में जो जो काम समाज ने, समाज के नियंताओं ने ,भगवान् ने वेद ,पुराण में लिखें हैं वे सब से जुडी थी . 
         बुकर पुरुस्कार प्राप्त करने वाली ,रैली फॉर द वैली  का नेतृत्त्व  कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को सशक्त करने वाली अरुंधती राय फ़िल्मकार प्रदीप कृष्ण से विवाहित हैं .
       पुलित्ज़र पुरुस्कार प्राप्त झुम्पा लाहिड़ी विदेशी पत्रिका के उपसंपादक अल्बर्टो वर्वालियास से विवाहित हैं और अपने जीवन को अपनी मर्जी व् अपनी शर्तों पर जीती हैं .
       वैजयन्ती माला ,सोनिया गाँधी ,सुषमा स्वराज ,शीला  दीक्षित  ,मेनका  गाँधी ,विजय राजे सिंधिया ,वनस्थली विद्या पीठ की संस्थापिका श्रीमती रतन शास्त्री ,क्रेन बेदी के नाम से मशहूर प्रथम महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी ,प्रसिद्ध समाज सेविका शालिनी ताई मोघे, प्रथम भारतीय महिला अन्तरिक्ष यात्री कल्पना चावला ,टैफे की निदेशक मल्लिका आदि आदि आदि बहुत से ऐसे नाम हैं  जो सशक्त हैं ,विवाहित हैं ,प्रेरणा हैं ,सद गृहस्थ हैं तब भी कहीं कोई बंधन नहीं ,कहीं कोई उलझन नहीं .
          अब यदि हम विवाह संस्कार की बात करते हैं तो उसकी सबसे महत्वपूर्ण रस्म है ''सप्तपदी ''जिसके  पूरे होते ही किसी दम्पति का विवाह सम्पूर्ण और पूरी तरह वैधानिक मान लिया जाता है .हिन्दू विवाह कानून के मुताबिक सप्तपदी या सात फेरे इसलिए भी ज़रूरी हैं ताकि दम्पति शादी की हर शर्त को अक्षरशः स्वीकार करें .ये इस प्रकार हैं -
 १- ॐ ईशा एकपदी भवः -हम यह पहला फेरा एक साथ लेते हुए वचन देते हैं कि हम हर काम में एक दूसरे  का ध्यान पूरे प्रेम ,समर्पण ,आदर ,सहयोग के साथ आजीवन करते रहेंगे .
  २- ॐ ऊर्जे द्विपदी भवः -इस दूसरे फेरे में हम यह निश्चय करते हैं कि हम दोनों साथ साथ आगे बढ़ेंगे .हम न केवल एक दूजे को स्वस्थ ,सुदृढ़ व् संतुलित रखने में सहयोग देंगे बल्कि मानसिक व् आत्मिक बल भी प्रदान करते हुए अपने परिवार और इस विश्व के कल्याण में अपनी उर्जा व्यय करेंगे .
 ३-ॐ रायस्पोशय  त्रिपदी भवः -तीसरा फेरा लेकर हम यह वचन देते हैं कि अपनी संपत्ति की रक्षा करते हुए सबके कल्याण के लिए समृद्धि का वातावरण बनायेंगें .हम अपने किसी काम में स्वार्थ नहीं आने देंगे ,बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानेंगें .
 4- ॐ मनोभ्याय चतुष्पदी  भवः -चौथे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि आजन्म एक दूजे के सहयोगी रहेंगे और खासतौर पर हम पति-पत्नी के बीच ख़ुशी और सामंजस्य बनाये रखेंगे .
 ५- ॐ प्रजाभ्यःपंचपदी भवः -पांचवे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि हम स्वस्थ ,दीर्घजीवी संतानों को जन्म  देंगे और इस तरह पालन-पोषण करेंगे ताकि ये परिवार ,समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर साबित हो .
 ६- ॐ रितुभ्य षष्ठपदी  भवः -इस छठे फेरे में हम संकल्प लेते हैं कि प्रत्येक उत्तरदायित्व साथ साथ पूरा करेंगे और एक दूसरे का साथ निभाते हुए सबके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे .
     ७-ॐ सखे सप्तपदी भवः -इस सातवें और अंतिम फेरे में हम वचन देते हैं कि हम आजीवन साथी और सहयोगी बनकर रहेंगे .
   इस प्रकार उपरोक्त ''सप्तपदी ''का ज्ञान विवाह संस्कार की वास्तविकता को हमारे ज्ञान चक्षु खोलने हेतु पर्याप्त है .
          इस प्रकार पति-पत्नी इस जीवन रुपी रथ के दो पहिये हैं जो साथ मिलकर चलें तो मंजिल तक अवश्य पहुँचते हैं और यदि इनमे से एक भी भारी पड़ जाये तो रथ चलता नहीं अपितु घिसटता है और ऐसे में जमीन पर गहरे निशान टूट फूट के रूप में दर्ज कर जाता है फिर  जब विवाहित होने पर पुरुष सशक्त हो सकता है तो नारी गुलाम कैसे ?बंधन यदि नारी के लिए पुरुष है तो पुरुष के लिए नारी मुक्ति पथ कैसे ?वह भी तो उसके लिए बंधन ही कही जाएगी .रामायण तो वैसे भी नारी को माया रूप में चित्रित  किया गया है और माया तो इस  सम्पूर्ण जगत वासियों के लिए बंधन है .
        वास्तव में दोनों एक दूसरे के लिए प्रेरणा हैं ,एक राह के हमसफ़र हैं और दुःख सुख के साथी हैं .रत्नावली ने तुलसीदास को
     ''अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीति,
           ऐसी जो श्री राम में होत न तो भव भीति . ''
       कह प्रभु श्री राम से ऐसा जोड़ा कि उन्हें विश्विख्यात कर दिया वैसे ही भारत की प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनी गांगुली जो कि विवाह के समय निरक्षर थी को उनके पति ने पढ़ा लिखा कर देश समाज से वैर विरोध झेल कर विदेश भेज और भारत की प्रथम महिला चिकित्सक के रूप में प्रतिष्ठित किया .

    इसलिए हम सभी यह कह सकते हैं कि सशक्तिकरण को मुद्दा बना कर नारी को कोई भटका नहीं सकता .अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर जीना सशक्त होना है और विवाह इसमें कोई बाधा नहीं है बाधा है केवल वह सोच जो कभी नारी के तो कभी पुरुष के पांव में बेडी बन जाती है .
              इस धरती पर हर व्यक्ति भले ही वह पुरुष हो या नारी बहुत से रिश्तों से जुड़ा है वह उस रूप में कहीं भी नहीं होता जिसे आवारगी की स्थिति कहा जाता है और कोई उस स्थिति को चाहता भी नहीं है और ऐसे में सहयोग व् अनुशासन की स्थिति तो होती है सही और बाकी सभी स्थितियां काल्पनिक बंधन कहे जाते हैं और वे पतन की ओर ही धकेलते हैं .अन्य सब रिश्तों पर यूँ ही उँगलियाँ नहीं उठती क्योंकि वे जन्म से ही जुड़े होते हैं और क्योंकि ये विवाह का नाता ही ऐसा है जिस हम  स्वयं जोड़ते हैं इसमें हमारी समझ बूझ ही विवादों  को जन्म देती है और इसमें गलतफहमियां इकट्ठी कर देती है .इस रिश्ते के साथ यदि हम सही निर्णय व् समझ बूझ से काम लें तो ये जीवन में कांटे नहीं बोता अपितु जीवन जीना आसान बना देता है .यह पति पत्नी के आपसी सहयोग व् समझ बूझ को बढ़ा एक और एक ग्यारह की हिम्मत लाता  है और उन्हें एक राह का राही बना मंजिल तक पहुंचाता है .
  और फिर अगर एक स्थिति ये है
 Man beating woman,silhouette photo
तो एक स्थिति ये भी  तो है 
 
             
                    शालिनी कौशिक
                             [कौशल]





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जानिये कि राष्ट्र गान का अर्थ क्या है ?

आज 26 जनवरी है। हम सबके लिए एक मुबारक दिन है। इस मंच की तरफ से सबको मुबारकबाद। 

आज़ादी क़ुरबानी देकर मिली है और इसे बाक़ी रखने के लिए भी लगातार क़ुरबानी  दी जा रही है। देश पर बाहर और अन्दर हर तरफ से हमले हो रहे हैं। कहीं ज़रा से मतभेद को बढ़ाकर नाली से खाई बनाई बनायी जा रही है और जहां कोई मतभेद नहीं है, वहाँ मतभेद पैदा किये जा रहे हैं जबकि आज इस सब भेदों और मतभेदों को पहले कम और फिर ख़तम करने की ज़रूरत है।
इस अवसर पर साधना वैद जी का एक लेख प्रस्तुत किया जा रहा है- 

राष्ट्र गान--किसकी जय गाथा

Posted on 


  • Tuesday, August 2, 2011
  • by 
  • Sadhana Vaid
  •  in
  • आजकल ब्लॉग जगत में एक अभियान छिड़ा हुआ है कि हमारा राष्ट्र गान “जन गण मन अधिनायक जय है” वास्तव में भारत माता या भारत वर्ष की महिमा को वर्णित नहीं करता अपितु महा कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने यह गीत किंग जॉर्ज पंचम तथा इंग्लैण्ड की क्वीन के सम्मान में रचा था जिसे हम सभी लोग पिछले ६२-६३ सालों से अज्ञानतावश राष्ट्र गान का मान देते हुए गाते आ रहे हैं और अब यह समय आ गया है कि हमें अपनी भूल का सुधार कर लेना चाहिये और “जन गण मन” को हटा कर “वंदे मातरम” या “सारे जहाँ से अच्छा” गीत को राष्ट्र गान के रूप में स्थापित करने के अभियान को पुरजोर समर्थन देना चाहिये !
    मुद्दा बड़ा संवेदनशील है और इसके साथ करोड़ों भारतीयों की भावनायें जुडी हुई हैं ! इसलिए यह आवश्यक है कि कोई भी ठोस कदम उठाने से पहले इससे जुड़े सभी पहलुओं पर गंभीरता के साथ विचार कर लिया जाये और सभी तथ्यों की भली प्रकार जाँच पड़ताल कर ली जाये !
    आइये सबसे पहले इस गीत के शब्दों को भली प्रकार जाने और समझें ! विकीपीडिया पर इस गीत के पाँचों अंतरों का अंग्रेज़ी अनुवाद जो उपलब्ध है वह इस प्रकार है !
    The lyrics of all 5 stanzas of the complete song "Jana Gana Mana"
    The English translation below has been adapted from one posted by Sitansu Sekhar Mittra many years ago.[1]

    Bengali Transcription
    English Translation
    Stanza 1:-

    Jano Gano Mano Adhinaayako Jayo Hey,Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Panjaabo Sindhu Gujaraato Maraathaa,Draabiro Utkalo Bango
    Bindhyo Himaachalo Jamunaa Gangaa, Uchchhalo Jalodhi Tarango
    Tabo Shubho Naamey Jaagey, Tabo Shubho Aashisho Maagey
    Gaahey Tabo Jayogaathaa
    Jano Gano Mangalo Daayako, Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
    Oh! the ruler of the minds of people, Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
    Punjab, Sindh, Gujarat, Maharashtra,Dravida(South India), Orissa, and Bengal,
    The Vindhya, the Himalayas, the Yamuna, the Ganges,and the oceans with foaming waves all around
    Wake up listening to Your auspicious name, Ask for Your auspicious blessings,
    And sing to Your glorious victory.
    Oh! You who impart well being to the people!
    Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
    Victory to You, victory to You, victory to You, Victory, Victory, Victory, Victory to You!
    (refrain repeated five times)
    Stanza 2:-

    Ohoroho Tobo Aahbaano Prachaarito,Shuni Tabo Udaaro Baani
    Hindu Bauddho Shikho Jaino,Parashiko Musholmaano Christaani
    Purabo Pashchimo Aashey,Tabo Singhaasano Paashey
    Premohaaro Hawye Gaanthaa
    Jano Gano Oikyo Bidhaayako Jayo Hey,Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
    Your call is announced continuously,we heed Your gracious call
    The Hindus, Buddhists, Sikhs, Jains, Parsees, Muslims, and Christians,
    The East and the West come,to the side of Your throne
    And weave the garland of love.
    Oh! You who bring in the unity of the people!
    Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
    Stanza 3:-

    Potono Abhbhudoy Bandhuro Ponthaa,Jugo Jugo Dhaabito Jaatri
    Hey Chiro Saarothi, Tabo Ratha Chakrey Mukhorito Potho Dino Raatri
    Daaruno Biplabo Maajhey,Tabo Shankhodhwoni Bajey
    Sankato Dukkho Traataa
    Jano Gano Potho Parichaayako,Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
    The way of life is somber as it moves through ups and downs,But we, the pilgrims, have followed it through ages.
    Oh! Eternal Charioteer, the wheels of your chariot echo day and night in the path
    In the midst of fierce revolution, your conch shell sounds.
    You save us from fear and misery
    Oh! You who guide the people through tortuous path...
    Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
    Stanza 4:-

    Ghoro Timiro Ghono Nibiro,Nishithey Peerito Murchhito Deshey
    Jagrato Chhilo Tabo Abicholo Mangalo,Noto Nayoney Animeshey
    Duhswapney Aatankey,Rokkhaa Koriley Ankey
    Snehamoyi Tumi Maataaa
    Jano Gano Duhkho Trayako,Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
    During the bleakest of nights,when the whole country was sick and in swoon
    Wakeful remained Your incessant blessings,through Your lowered but winkless eyes
    Through nightmares and fears,You protected us on Your lap
    Oh Loving Mother
    Oh! You who have removed the misery of the people...
    Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
    Stanza 5:-

    Raatri Prabhatilo Udilo Rabichhabi, Purbo Udayo Giri Bhaaley
    Gaahey Bihangamo Punyo Samirano, Nabo Jibano Rasho Dhaley
    Tabo Karunaaruno Ragey,Nidrito Bhaarato Jagey
    Tabo Chorone Noto Maatha
    Jayo Jayo Jayo Hey, Jayo Rajeshwaro, Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
    Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
    The night is over, and the Sun has risen over the hills of the eastern horizon.
    The birds are singing, and a gentle auspicious breeze is pouring the elixir of new life.
    By the halo of Your compassion India that was asleep is now waking
    On your feet we lay our heads
    Victory, Victory, Victory be to You, the Supreme King, the dispenser of the destiny of India!
    इस गीत की रचना दिसंबर १९११ में की गयी थी ! लगभग उसी समय जब किंग जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हुआ था ! यह गीत सबसे पहली बार उस समय की इन्डियन नॅशनल कोंग्रेस के अधिवेशन के दूसरे दिन २६ दिसंबर को गाया गया था ! संयोग से उस दिन के एजेंडा में भारत आगमन पर जॉर्ज पंचम व क्वीन का स्वागत और सम्मान भी शामिल था ! इसीलिये यह भ्रांति फ़ैल गयी कि कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा है और कविता में उद्धृत शब्द ‘अधिनायक’ एवं ‘भाग्यविधाता’ उनके लिये संबोधित हैं ! जबकि वास्विकता यह है कि उनकी शान में एक अन्य गीत ‘बादशाह हमारा’ दूसरे कवि श्री रामभुज चौधरी द्वारा उसी कार्यक्रम में गाया गया था ! ब्रिटिश इन्डियन प्रेस के अखबारों में इस कार्यक्रम की रिपोर्ट कुछ इस तरह छापी गयी !
    "The Bengali poet Babu Rabindranath Tagore sang a song composed by him specially to welcome the Emperor." (Statesman, Dec. 28, 1911)
    "The proceedings began with the singing by Babu Rabindranath Tagore of a song specially composed by him in honour of the Emperor." (Englishman, Dec. 28, 1911)
    "When the proceedings of the Indian National Congress began on Wednesday 27th December 1911, a Bengali song in welcome of the Emperor was sung. A resolution welcoming the Emperor and Empress was also adopted unanimously." (Indian, Dec. 29, 1911)

    नॅशनल इन्डियन प्रेस ने इस कार्यक्रम की रिपोर्ट अपने समाचार पत्रों में कुछ इस तरह से छापी !
    "The proceedings of the Congress party session started with a prayer in Bengali to praise God (song of benediction). This was followed by a resolution expressing loyalty to King George V. Then another song was sung welcoming King George V." (Amrita Bazar Patrika, Dec.28,1911)
    "The annual session of Congress began by singing a song composed by the great Bengali poet Babu Ravindranath Tagore. Then a resolution expressing loyalty to King George V was passed. A song paying a heartfelt homage to King George V was then sung by a group of boys and girls." (The Bengalee, Dec. 28, 1911)

    यहाँ तक कि इन्डियन नॅशनल कोंग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की दिसंबर १९११ की रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के सन्दर्भ में यह लिखा गया था !
    "On the first day of 28th annual session of the Congress, proceedings started after singing Vande Mataram. On the second day the work began after singing a patriotic song by Babu Ravindranath Tagore. Messages from well wishers were then read and a resolution was passed expressing loyalty to King George V. Afterwards the song composed for welcoming King George V and Queen Mary was sung."
    परमपिता परमात्मा एवं अपनी मातृभूमि की स्तुति में रचित अपनी इस रचना पर छिड़े विवाद ने कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी बहुत मर्माहत किया था ! १० नवंबर १९३७ को श्री पुलिन बिहारी दास को लिखे एक पत्र में उन्होंने अपनी पीड़ा को इस तरह व्यक्त किया था !
    "A certain high official in His Majesty's service, who was also my friend, had requested that I write a song of felicitation towards the Emperor. The request simply amazed me. It caused a great stir in my heart. In response to that great mental turmoil, I pronounced the victory in Jana Gana Mana of that Bhagya Vidhata [ed. God of Destiny] of India who has from age after age held steadfast the reins of India's chariot through rise and fall, through the straight path and the curved. That Lord of Destiny, that Reader of the Collective Mind of India, that Perennial Guide, could never be George V, George VI, or any other George. Even my official friend understood this about the song. After all, even if his admiration for the crown was excessive, he was not lacking in simple common sense."
    यह पत्र जो मौलिक रूप से बांग्ला में लिखा गया था श्री प्रभात कुमार मुखर्जी द्वारा रचित रवींद्र नाथ टैगोर की जीवनी ‘रवीन्द्रजीवनी’ के दूसरे वॉल्यूम के पेज ना. ३३९ पर उद्धृत है !
    पुन: १९ मार्च १९३९ के अपने एक पत्र में रवीन्द्र बाबू ने लिखा है –
    "I should only insult myself if I cared to answer those who consider me capable of such unbounded stupidity as to sing in praise of George the Fourth or George the Fifth as the Eternal Charioteer leading the pilgrims on their journey through countless ages of the timeless history of mankind." (Purvasa, Phalgun, 1354, p738.)
    स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर के पत्रों के इन उद्धरणों के बाद मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि किसी भी तरह के संशय की कोई गुंजाइश अब बाकी रह गयी है ! जलियाँवाला बाग के नर संहार के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सम्मान में मिली अपनी ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी ! अपने देश की महिमा में उन्होंने बेमिसाल गीतों की रचना की है ! उनकी रचनाधर्मिता तथा उनके मंतव्यों को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत करना और भ्रामक प्रचार करना किसी भी तरह से उचित नहीं है ! रवीन्द्रनाथ टैगोर हमारा मान हैं, हमारी शान हैंऔर भारत के आकाश के दैदीप्यमान ध्रुव तारे के समान हैं इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकतीं ! हम कभी उनके ॠण से उॠण नहीं हो सकेंगे !
    जय भारत !
    पुराना लिंक -
    http://hbfint.blogspot.in/2011/08/blog-post_02.html
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    संस्कार -सौदा /मोहन -मो/.क्या एक कहे जा सकते हैं भागवत जी?


        Marriage is a social contract : mohan bhagwat
    इंदौर [जागरण न्यूज नेटवर्क]। हाल ही में दुष्कर्म की घटनाओं पर विवादास्पद बयान देकर आलोचना का शिकार हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक और विवादित बयान दिया है। इस बार उन्होंने कहा कि शादी एक कान्ट्रैक्ट यानी सौदा है और इस सौदे के तहत एक महिला पति की देखभाल के लिए बंधी है। उनके इस बयान पर भी लोगों की तीखी प्रक्रिया सामने आई है।
    भागवत ने इंदौर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की रैली के दौरान कहा, 'वैवाहिक संस्कार के तहत महिला और पुरुष एक सौदे से बंधे हैं, जिसके तहत पुरुष कहता है कि तुम्हें मेरे घर की देखभाल करनी चाहिए और तुम्हारी जरूरतों का ध्यान रखूंगा। इसलिए जब तक महिला इस कान्ट्रैक्ट को निभाती है, पुरुष को भी निभाना चाहिए। जब वह इसका उल्लंघन करे तो पुरुष उसे बेदखल कर सकता है। यदि पुरुष इस सौदे का उल्लंघन करता है तो महिला को भी इसे तोड़ देना चाहिए। सब कुछ कान्ट्रैक्ट पर आधारित है।'
    भागवत के मुताबिक, सफल वैवाहिक जीवन के लिए महिला का पत्नी बनकर घर पर रहना और पुरुष का उपार्जन के लिए बाहर निकलने के नियम का पालन किया जाना चाहिए। महिला और पुरुष में एक दूसरे का ख्याल रखने का कांट्रैक्ट होता है। अगर महिला इसका उल्लंघन करती है तो उसे बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए।''

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    @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं .

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    Hindu_wedding : CHENNAI, INDIA - AUGUST 29: Indian (Tamil) Traditional Wedding Ceremony on August 29, 2010 in Chennai, Tamil Nadu, India Stock Photo

      
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    Hindu_wedding : Happy indian adult people couple
    ये है भारतीय विवाह का सुखद स्वरुप 

                         शालिनी कौशिक 
                            ^ कौशल *
                          
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    भारतीय सैनिकों की हत्या के बाद देश के अंदरूनी दुश्मन सक्रिय हो जाएंगे, वे भड़काऊ बयान देंगे


    कल मंगलवार दिनांक 8 जनवरी 2013 को मेंढर सेक्टर में हुई गोलीबारी में 2 भारतीय सैनिकों को पाकिस्तानी फ़ौजियों ने मार दिया। वे 1 सैनिक का सिर काटकर भी ले गए हैं।
    इस तरह की हिंसक घटनाएं राजनैतिक उददेश्य से की जाती हैं।
    इनके ज़रिये देश की जनता का ध्यान असल समस्या से हटाने के लिए फ़र्ज़ी दुश्मन का हौवा खड़ा किया जाता है।
    यह घटना बेशक उकसाने के लिए की गई है। सैनिकों के सिर काटना युद्ध के नियमों के भी खि़लाफ़ है।
    पाकिस्तान के हुक्मरानों को जिस वक्त में भारत से दोस्ती बढ़ाने की ज़रूरत है। वह उस समय में उससे दुश्मनी बढ़ा रहा है। यह संदेह पैदा करता है।
    पाकिस्तान की अपनी कोई सोच नहीं है। वह अमेरिका और चीन से पॉलिसी इम्पोर्ट करता है। इस मामले में अमेरिका का कोई हाथ नहीं है और चीन ?
    चीन के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
    इसलिए भड़कने के बजाय होशियार रहने की ज़रूरत है और इस समस्या के पीछे छिपे असली कारणों की जाँच-पड़ताल करने की ज़रूरत है। इस समस्या को कूटनीतिक स्तर पर हल करना चाहिए।
    हालाँकि जो गहरी सोच नहीं रखते वे तुरंत भड़क जाएंगे। उन्हें लगता है कि भड़काऊ बातें करके वे लोगों पर साबित कर देंगे कि देश की चिंता दूसरों से ज़्यादा उन्हें है। पाकिस्तान के सैनिकों ने 1 का सिर काटा है, ये लोग दंगे भड़का कर लाखों को कटवा देते हैं। दुश्मनों से ज़्यादा नुक्सान पहुंचाने वाले यही हैं, जो एक वर्ग को दूसरे के खि़लाफ़ भड़काते हैं।
    देखिए इस ताज़ा घटना पर हिंदी ब्लॉगर प्रमोद जोशी जी की पोस्ट-

    नियंत्रण रेखा पर हिंसा का निहितार्थ

                            

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    हिंदी ब्लॉगिंग के सामने संकट का एक सच्चा विश्लेषण Blogger's Analysis & Welcome 2013


    हिंदी ब्लॉगिंग का एक साल और गुज़र गया लेकिन  फिर भी 10 साल पूरे नहीं हुए। इसके बावजूद हिंदी ब्लॉगिंग के 10 वर्षीय उत्सव मना डाले गए। हिंदी ब्लॉगिंग की इस प्री-मेच्योर डिलीवरी या भ्रूण हत्या को पूरे ब्लॉग जगत ने देखा और सराहा। संवेदनशील काव्यकारों और बुद्धिकारों ने इसमें सक्रिय सहयोग दिया और बदले में सम्मान आदि पाया। इसमें जो ख़र्च आया, उसे भी सहर्ष स्वीकार किया गया और यह परंपरा आगे भी जारी रहे, इसके लिए वे प्रयासरत हैं। इस तरह नाम और शोहरत के ग्राहकों और सप्लायरों ने हिंदी ब्लॉगिंग का व्यापारीकरण कर दिया। यह एक दुखद घटना है और इससे भी ज़्यादा दुखद यह है कि सब कुछ जानते हुए भी लोग बाग डरे हुए हैं और टुकुर टुकुर चुपचाप देख रहे हैं। किसी को आगे सम्मान की इच्छा है और किसी को यह इच्छा है कि उसकी पोस्ट पर टिप्पणियां देने वाले बने रहें। इन्हीं में वे लोग हैं जो सम्मान की ख़रीद फ़रोख्त करते हैं।
    हिंदी ब्लॉगिंग को नुक्सान पहुंचाने वाली दूसरी वजह गुटबाज़ी और सांप्रदायिक मानसिकता है। किसी विशेष विचारधारा वाले ब्लॉगर का हौसला पस्त करने के लिए हरसंभव तरीक़े इस्तेमाल किए गए और नतीजा कई प्रतिभाशाली ब्लॉगर के पलायन के रूप में सामने आया।
    इन दो मूल कारणों से कई विकार सामने आए। मस्लन मठाधीश बनने की कोशिश की गई और इस चक्कर में मठाधीश ही आपस में टकरा कर अपना सिर फोड़ते रहे। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और कवि आदि सभी ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
    इस चक्कर में वे ब्लॉगर पिस कर रह गए जो कि अच्छा लिखने आए थे और उन्होंने लिखा भी, लेकिन न तो वे किसी को गॉड फ़ादर बना पाए और न ही कमेंट बटोरने की कला में माहिर हो सके। इनसे बेनियाज़ (निरपेक्ष) भी वह न हो पाए क्योंकि अपनी कला का प्रदर्शन और सराहना एक साहित्यकार का पहला मक़सद होता है।
    इसीलिए बहुत से हिंदी ब्लॉगर मैदान छोड़कर भाग गए। कोई चुपचाप निकल गया और ऐलान करके बता कर गया। जो भाग नहीं सकते या भाग नहीं पाए, वे अब भी जमे हुए हैं लेकिन लिखना उन्होंने भी पहले से कम कर दिया है।
    कुछ नए ब्लॉगर भी मैदान में आए हैं, आते रहेंगे और जाते भी रहेंगे क्योंकि हिंदी ब्लॉगिंग से मोह भंग करने के कारण बदस्तूर मौजूद हैं और दूसरों के साथ हम इन घटनाओं के साक्षी हैं। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि वे डरे हुए हैं और चुप हैं जबकि हम बेख़ौफ़ और बेबाक़ हैं।
    हम बचाते ही रहे दीमक से अपना घर
    चंद कीड़े कुर्सियों के मुल्क सारा खा गए

    अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो,
    आमीन !!!

    नया साल 2013 ब्लॉगर्स और ग़ैर-ब्लॉगर्स सबको मुबारक हो !

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