धर्म का बाजार या बाजार का धर्म

कई बर्षों का अभ्यास है कि रोज सबेरे सबेरे उठकर कुछ पढ़ा लिखा जाय क्योंकि यह समय मुझे सबसे शांत और महफूज लगता है। लेकिन जब कुछ पढ़ने लिखने के लिए तत्पर होता हूँ तो अक्सर मुझे दो अलग अलग स्थितियों का सामना अनिवार्य रूप से करना पड़ता हैं।

पहला - टी०वी० के कई चैनलों में धार्मिक प्रवचन सुनना जिसमें विभिन्न प्रकार के "धार्मिकता का चोला पहने" लोगों के "अस्वादिष्ट" प्रवचनों को सुनना शामिल है। इसके अतिरिक्त कसरत (योग भी कह सकते), हमेशा एक दूसरे के विपरीत भबिष्य फल बताने वाली "तीन देवियों" द्वारा राशिफल से लेकर शनि का भय दिखाते हुए लगभग "शनि" (मेरी कल्पना) जैसे ही डरावने वेश-भूषा धारण किए महात्मा की "संत-वाणी" भी सुननी पड़ती है, जिनके बारे में अभी तक नहीं समझ पाया हूँ कि वो कुछ समझा रहे हैं या धमकी दे रहे हैं। वो भी ऊँची आवाज में। अगर टी०वी० का "भोल्युम" कम करूँ तो सुमन (श्रीमती) जी कब "शनि-सा" व्यवहार करने लगे, अनुमान लगाना कठिन है।

और दूसरा काम - बाजार खुलते खुलते मुझे दुकान पर पहुँच जाना पड़ता है क्योंकि पहले से कोई न कोई काम मेरे लिए "गृह-स्वामिनी" द्वारा निर्धारित किया जाता है ताकि मैं लेखन जैसे "बेकार" काम से अधिक से अधिक दूर रह सकूँ। दुकान में भी पहुँते ही वही देखता हूँ कि सेठ जी "मुनाफा" कमाने से पूर्व भगवान को खुश करने लिए "निजी धार्मिक अनुष्ठान" में कुछ देर तल्लीन रहते हैं। निस्सहाय खड़ा होकर सारे कृत्यों को देखना मेरी मजबूरी है क्योंकि पूजा के बाद जबतक दुकान से कोई नगदी खरीदारी न हो, उधार वाले को प्रायः ऐसे ही खड़ा रहना पड़ता है। कभी कभी तो नगदी खरीददारी वाले ग्राहक का भी इन्तजार करना मेरी विवशता बन जाती है और आज मेरी यही विवशता मेरे इस लेख के लिए एक आधार भी है।

देश में कई प्रकार के उद्योग पहले से स्थापित हैं जो अपनी नियमित उत्पादकता के कारण हमारे देश की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ बने हुए है और जिसकी वजह से हमारी सुख-सुविधा एवं समृद्धि में लगातारिता बनी हुई है। हाल के कुछ बर्षों कई नए प्रकार के "अनुत्पादक उद्योगों" के नाम उभर कर बहुत तेजी और मजबूती से देशवासी के सामने आये हैं एवं जो लगातार समाज को बुरी तरह से खोखला कर रहा है। उदाहरण के लिए - अपहरण-उद्योग, नक्सल-उद्योग, राजनीति-उद्योग इत्यादि। इसी कड़ी में एक और उद्योग की ठोस और "सनातनी उपस्थिति" से इन्कार करना मुश्किल है और वो है "धर्म का उद्योग"।

अभी तक जितने भी ज्ञात-अज्ञात मुनाफा कमाने के संसाधन और क्रिया कलाप हैं उसमें धर्म सर्वोपरि है। साईं बाबा के साथ साथ कई कई बाबाओं के "बिना श्रम के अर्जित" सम्पत्तियों का मीडिया द्वारा उपलब्ध कराये गए ब्योरे के आधार पर यह कहना किसी के लिए भी कठिन नहीं है। इस उद्योग की बिशेषता यह है कि इसको स्थापित करने में कोई खास शुरुआती खर्च नहीं है - बस फायदा ही फायदा। केवल आपके वस्त्र "धार्मिकता" के आस पास दिखते हों। कभी कभी "लच्छेदार-भाषा" और लोक लुभावन "व्यावसायिक-मुस्कान" के साथ पाप-पुण्य का "भय" दिखाते हुए चुटकुलेबाजी करने का भी हुनर आप में होना चाहिए और इन सब के लिए कोई खास "प्रारम्भिक पूँजी" की आवश्यकता तो पड़ती नहीं है।

बाला जी का मंदिर हो या चिश्ती का दरगाह, आप जहाँ भी जाइये तो उस स्थल से बहुत पहले ही आपके आस पास किसी न किसी तरह "धार्मिक एजेन्टों" का अस्वाभाविक अवतार हो जाता है जो आपके पीछे हाथ धो कर पड़ जाते हैं और अपने को उस "सर्वशक्तिमान" का सच्चा दूत बताते हुए उनसे "डाइरेक्ट साक्षात्कार" या "पैरवी" कराने का वादा तब तक करते रहते हैं जब तक आप उसके "वश" में न हो जाएं या डाँट न पिलावें। फिर शुरु होता है पैसा ऐंठने का एक से एक "चतुराई भरा कुचक्र" जिससे निकलना एक साधारण आदमी के लिए मुशकिल ही होता है। सबेरे सबेरे भगवान की आराधना करने के बाद ये एजेन्ट भगवान के ही नाम पर खुलेआम "मुनाफा" कमाने के लिए कई प्रकार के जायज(?) नाजायज जुगत में तल्लीन हो जाते हैं जिसके शिकार अक्सर वे सीधे-सादे साधारण इन्सान होते हैं जो बड़ी कठिनाई से पैसे का जुगाड़ करके अपने आराध्य का दर्शन करने आते हैं।

और बाजार में क्या होता है? बिल्कुल यही दृश्य, यही कारोबार। सारे के सारे दुकानदार अपना दुकान खोलते ही अपने अपने आराध्य की आराधना करते हैं और फिर शुरू हो जाता है अधिक से अधिक मुनाफा कमाने का जुगाड़। एक लक्ष्य मुनाफा बटोरना है चाहे जो करना पड़े। इनके भी मुख्य शिकार वही "आम आदमी" हैं जो अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मुश्किल से बाजार का रूख कर पाते हैं वो भी सिर्फ जीने भर की जरूरतों के लिए।

कोई धर्म-सथल हो या बाजार, सब जगह की "नीति और रीति" एक है। यदि चलतऊ भाषा में कहा जाय तो अधिक से अधिक अपने ग्राहकों को "छीलना" अर्थात मुनाफा कमाना। इसके लिए वे आमतौर पर वाकचातुर्यता की चासनी में लपेट कर झूठ और कई प्रकार के तिकड़म का सहारा लेते हैं। मजे की बात है कि दोनों (धर्म-स्थल और बाजार)जगहों में ये सारे फरेब भगवान की "आराधना" के बाद ही शुरू होता है मानो भगवान से "इजाजत" लेकर। और "बेचारे" भगवान का क्या दोष? वे तो पत्थर के हैं। क्या कर सकते हैं? सब चुपचाप देखते रहते हैं सारे अन्याय को। आखिर उन्हीं के "परमिशन" से तो शुरू किया जाता है यह कातिल खेल।

वैश्वीकरण के बाद अपने देश में बाजारवाद पर बहुत चर्चाएं हुईं। इसकी अच्छाई और बुराई पर भी। लेकिन मेरे जैसा मूरख यह अभी तक नहीं समझ पाया कि बाजार अपना धर्म निभा रहा है या धर्म ही एक बाजार बन गया है और हठात् ये पंक्तियाँ निकल आतीं हैं कि-

बाजार और प्रभु का दरबार एक जैसा
सब खेल मुनाफे का आराधना ये कैसी?

पूरी गज़ल का लिन्क ये http://manoramsuman.blogspot.com/2011/05/blog-post_09.html है
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ग़ज़लगंगा.dg: खेल-तमाशे दिखा रहा है......

खेल-तमाशे दिखा रहा है यारब क्या.
हम धरती वालों से तुझको मतलब क्या.

कुछ परदे के पीछे है कुछ परदे पर
उसे पता है दिखलाना है कब-कब क्या.

प्यार से जीना प्यार से मरना है प्यारे!
हम इन्सां हैं और इन्सां का मज़हब क्या.

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ब्लॉगिंग के बुनियादी उसूल Hindi Blogging Guide (4)

‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ के लिए जब हमने मोहतरम जनाब शास्त्री जी से ईमेल के ज़रिए एक लेख भेजने की दरख्वास्त की तो उन्होंने हमारी इल्तेजा को क़ुबूल कर लिया और बहुत ही जल्द लिखकर भी भेज दिया। हमने उनसे कहा कि इस गाइड के लिए हमें आपसे कवितामय संदेश चाहिए तो बोले कि वह भी भेज दूंगा। जनाब के सहयोग का यह आलम है। उनकी सादगी और उनका ख़ुलूस, उनकी बोलचाल से भी और उनके अमल से भी, हर दम छलकता रहता है। वह एक लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। जनाब की बातों पर ध्यान दिया जाए तो बिल्कुल नया ब्लॉगर भी सफलता की सीढ़ियां मज़े से चढ़ सकता है।
पेश है आज उनका लेख, जो कि हक़ीक़त में एक मार्गदीप है  :
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जिस तरह से देश-परिवार या घर को चलाने के लिए कुछ तौर-तरीक़े या क़ायदे और क़ानून अपनाने पड़ते हैं ठीक उसी तरह से ब्लॉगिंग में भी कुछ क़ायदे-क़ानून अपनाना बहुत आवश्यक है।
यदि आप यह चाहते हैं कि आपकी बात पर लोग ध्यान दें और आपको एक मानक के रूप में देखें तो आपको इसके लिए नीचे दिये गये सुझावों को तो अपनाना ही चाहिए। 
1- बड़े-बूढ़ों का कहना है कि पहले मुँह में घोलो, फिर ज़बान खोलो। बस इसी बात को गाँठ बाँध लीजिए न। कहीं पर भी टिप्पणी करने से पहले खूब सोच-विचार कर लीजिए कि आप जो कुछ अपनी टिप्पणी में लिखने जा रहे हैं, उसका क्या प्रभाव होगा। जरा सी बात आपको मित्र बना सकती है और जरा सी बात ही शत्रु भी बना सकती है। क्योंकि दूध के भरे हुए बर्तन में उसको बिगाड़ने के लिए तो नींबू की एक छींट ही काफ़ी होती है।
2-  माना कि अन्तरजाल की दुनिया आभासी होती है लेकिन टिप्पणी पर प्रतिटिप्पणी करने से जहाँ तक हो, बाज़ आये। यदि आपको किसी की बात अच्छी नहीं लग रही है तो या तो उसको नकार दीजिए अन्यथा उसके मेल में जाकर अपनी बात उसके सामने रख दीजिए। बहुत बार मेरे साथ ऐसा हुआ है जबकि मेरे मित्र डॉ. अनवर जमाल ने मुझे मेरी किसी ग़लती को बताने के लिए मुझे मेरी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं की बल्कि मुझे मेल किया है।
3- कभी भी अपने को विद्वान और दूसरों को अपने से कम करके न आंकें। दुनिया बहुत बड़ी है, इसमें एक से बढ़कर एक हीरे जवाहरात मौजूद हैं। हो सकता है कि जिसने आपकी पोस्ट पर अपनी राय दी है वह आपसे भी बड़ा ज्ञानी हो। क्योंकि घमण्ड से आज तक किसी का उत्थान नहीं हुआ है और घमण्ड ही क्रोध का जनक है। आपने अपने आस-पास और घर परिवारों में भी अनुभव किया होगा कि क्रोधी व्यक्ति हमेशा अकेला पड़ जाता है।
4- ईर्ष्या के वशीभूत होकर कोई पोस्ट न लिखें अपितु प्रतिस्पर्धा करें और तार्किक रूप से अपनी बात रखें। विश्वास मानिए, आपकी बात को लोग सबसे अधिक पसंद करेंगे।
5-    नेट पर एक बात जो जो मेरी नज़र में सबसे ख़राब बात है, वह है चोरी। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग दूसरों की रचनाओं से हूबहू कुछ लाइनें चुरा-चुरा कर अपनी रचना गढ़ लेते हैं। कुछ तो इतने शातिर हैं कि पूरी की पूरी रचना या आलेख ही अपने नाम से प्रकाशित कर देते हैं। जिसके पकड़ में आने से बहुत बड़े अपमान का सामना भी करना होता है। स्मरण रखिए कि आपका जो भी इष्ट देवता है वह आपको तभी वरदान देता है जब आप मौलिक सृजन करते हैं।
6-  अपनी रचना को लिखने में जितना श्रम और समय लगता है आपको वह उतनी ही प्यारी लगती है। हो सकता है कि शुरुआती दौर में आप अच्छा न लिखें मगर जैसे-जैसे आप अपनी कलम चलाएँगे वैसे-वैसे ही आपकी लेखनी में निखार आता जाएगा। अगर आपने कभी अच्छा नहीं भी लिखा है तो भी आपको अपने उस लेख या रचना से वैसा ही लगाव होगा जैसा कि एक माँ को अपनी सन्तान से होता है।
7-     महर्षि दयानन्द सरस्वती ने लिखा है 
'सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।' 
 अपनी गलती को मान लेना इन्सान का बड़प्पन ही कहलाता है। क्योंकि मनुष्य तो गलतियों का पुतला है। कदम-कदम पर हमसे भूल होती रहती हैं और उनसे जो सबक लेकर समय रहते सुधार लेता है। वो महान कहलाता है।
8- यदा-कदा नेट पर आचार संहिता बनाने की बात उठती रहती है। आख़िर इसकी आवश्यकता ही क्यों पड़ती है? 
मेरा मानना तो यह है कि हम ऐसी स्थति ही क्यों आने देते हैं कि लोग आचार संहिता की बातें करें। आप ख़ुद ही अनुमान लगाइए कि समझदारी में ही होशियारी है। आप अपना काम नेक नीयत और ईमानदारी से करते जाइए। आपको किसी आचार संहिता को ढोने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।
मैं कोई विद्वान, तपस्वी या साधू-संत नहीं हूँ। एक आम आदमी हूँ। मुझसे भी ग़लतियाँ होती है। यदि आपको मेरे ये सुझाव पसंद आयें तो अमल कीजिए और अगर न पसंद आयें तो अपने सुझाव दीजिएगा। आपके हर सुझाव का मैं स्वागत करूँगा।
सादर- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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आतंकवाद में साम्प्रदायिकता के कारण बढ़ रहा है आतंकवाद

आतंकवाद में साम्प्रदायिकता के कारण बढ़ रहा है आतंकवाद

आतंकवाद में साम्प्रदायिकता के कारण बढ़ रहा है आतंकवाद यह बात चाहे आपको अटपटी से लगे लेकिन हमारे भारत में कुछ साम्प्रदायिक राष्ट्रविरोधी ताकतों ने आतंकवाद को  एक धर्म और एक जाती से जोड़ कर दुष्प्रचार किया है ..हमारा देश अगर इस दुष्प्रचार को छोड़ कर अगर इस देश के आतंकवाद से निपटने की कोशिश करता तो शायद आज हमारा भारत आतंकवाद मुक्त होता ..कोई भी अपराध ..कोई भी आतंकवाद प्रायोजित नहीं होता किसी ना किसी गलती या फिर प्रतिकार का नतीजा होता है पुराने कार्यकाल में बीहड़ और जंगलों में डाकुओं की फसल जागीरदारों और राजा महाराजों महाजनों के अत्याचार ने ही उगाई थी आज उसी का दुसरा आधुनिक रूप आतंकवाद हो गया है ..आतंकवाद से निपटने में हमारी स्थति शतुरमुर्ग की तरह रही है जो रेट के ढेर में अपना मुंह छुपा कर सोचता है के उसने दुश्मन से खुद को बचा लिया है बस इसी तरह से नाथूराम गोडसे के आतंकवाद से ही आतंकवाद का धार्मिक वाद पैदा हो गया और किसी भी घटना के लियें पुरे धर्म पूरी जाती पुरे समाज को प्रताड़ित किया जाने लगा सरकार ने कभी भी आतंकवाद के कारणों की खोज कर उनके निवारण का कोई प्रयास नहीं किया कहीं न कहीं आतंकवाद को राजनितिक शाह भी बनी रही ..धर्म के नाम पर आतंकवाद को पनपाया गया आरोप प्रत्यारोप लगाकर आतंकवाद की समस्या से निपटने से बचा गया आज नतीजा यह के देश में किसी के घर बम फटता है तो अगर वोह हिन्दू होता है तो हिन्दू आतंकवाद का नतीजा बताया जाता है अगर वोह मुस्लिम होता है तो मुस्लिम आतंकवाद का नतीजा बताया जाता है नहीं तो सिक्ख आतंकवाद बता दिया जाता है अगर कुछ समझ में नहीं आये तो आई एस आई और पाकिस्तान , दाउद इब्राहिम का हाथ बता दिया जाता है कुल मिलाकर हम आतंकवाद के कारण और निवारण  की जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं हमारे देश में चिन्तक,विचारक , शोधकर्ता हैं जो इस समस्या की जांच पढ्ताल और खोज कर नयी रिपोर्ट दे सकते हैं ..हमारे देश में आज माओवादी ..नक्सली ..कश्मीरी ...लिट्टे और दुसरे आतंकवादियों की घटनाओं को देख कर यह आवश्यक हो गया है के देश में एक आतंकवाद समीक्षा कारण और निवारण मंत्रालय हो इसका प्रथक से मंत्री हो जो सभी प्रकार के आतंकवाद उसके कारण और निवारण के कारणों का पता लगाकर इसे जड़ से खत्म करने के लियें कार्यवाही करे तब कही इस मामले को गंभीरता से सुलझाया जा सकेगा वरना भाजपा कोंग्रेस हिन्दू मुस्लिम सिक्ख लिट्टे विचारधारा में यह आतंकवाद सदियों तक हमारे देश और देश की सुक्ख शान्ति की साँसें बंद कर देगा यह एक गंभीर प्रश्न है यदि आप भी इस विचार को के देश में आतंकवाद शोध..मामलात कारण और निवारण मंत्रालय स्थापित होना चाहिए जो गंभीरता से कार्य करे से सहमत है तो प्लीज़ राष्ट्रहित में इसे आगे बढ़ाएं इस विचार के पक्ष में मतदान कर इसे जाग्रति अभियान के तहत सरकार तक पहुंचा कर इसकी पालना के लियें सरकार को मजबूर करे और इस देश को बढ़ा ले ..अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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"योगासन" नहीं "वोटासन"

जब से कलम घिसने "सारी" - अब तो कहना होगा "की बोर्ड" घिसने का रोग लगा है, सबेरे ५ बजे उठ जाता हूँ। ठीक उसी समय "पत्नी- कृपा" से वो चैनल खुल जाता है जहाँ रामदेव बाबा योगासन की बात पूरे जोश में बता रहे होते हैं। टी०वी० को "फुल वाल्यूम" के साथ खोला जाता है ताकि वो दूसर कमरे में भी काम करें तो उन्हें सुनने में कोई कठिनाई न हो। आदरणीय रामदेव जी के प्रति उनकी असीम भक्ति मेरे परिचतों के बीच भी सर्वविदित है। मुझे भी लाचारी में सुनना ही पड़ता है क्योंकि "आई हैव नो अदर च्वाईश एट आल"। वैसे मुझे भी बाबा रामदेव के प्रति कोई विकर्षण तो है नहीं।

मेरी पत्नी बहुत पान खाती है और बाबाजी प्रतिदिन "विदाउट फेल" इन बुराईयों से कोसों दूर रहने की ताकीद करते रहते हैं। पत्नीकी "रामदेवीय भक्ति" से प्रभावित होकर बहुत विनम्रता मैंने उनसे पूछने का दुस्साहस किया कि जब बाबा पान, गुटखा आदि खाने से इतने जोर से मना करते हैं और आप इतने श्रद्धाभाव और प्रभावी (शोर करके) ढंग से उन्हें रोज सुनतीं हैं, फिर ये पान क्यों खातीं हैं? मेरे सौभाग्य से उन्हें उस दिन गुस्सा नहीं आया और उनके पास कोई उचित जवाब भी नहीं था अपनी आदत की विवशता के अतिरक्त।

जिस तरह से एक चावल की जाँच से पूरी हाँडी में भात बनने या न बनने का पता चल जाता है, ठीक उसी तर्ज पर मैं क्या कोई भी सोचने पर विवश हो जायेगा कि बाबा की सभाओं में उनकी बातों को समर्थन करने वाले क्या ऐसे ही लोग अधिक हैं? जो पान, गुटखा, शराब, खैनी, कोल्ड ड्रींक्स आदि छोड़ने की प्रतिदिन शपथ लेते हैं और योगासन करने के वादे के साथ हाथ उठाकर रामदेव जी के आह्वान का प्रत्यक्षतः समर्थन तो करते हैं पर व्यवहार में नहीं।

फिर याद आती है विगत दिनों भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए उनके द्वारा चलाए गए "भारत स्वाभिमान आन्दोलन" तहत उनके हुंकार की। वही भीड़ और वही समर्थन की जिसके दम पर उन्होंने रामलीला मैदान में अनशन के नाम पर हजारों की भीड़ इकट्ठा कर ली। फिर शासक वर्ग की मिमियाहट, बाद में रात में अचानक उसी शासकीय पक्ष के आक्रामक रूख की भी याद आती है जिसे "मीडिया" के सौजन्य से पूरे देश ने देखा और सुना।

लोगों ने यह भी देखा सुना कि जो बाबा सबेरे में स्वयं "राह कुर्बानियों की न वीरान हो - तुम सजाते ही रहना नये काफिले" जोर जोर से गा रहे थे, वही रात में जान बचाने के लिए एक बिशेष "रक्षा घेरा" बनबा कर मंच से कूदे और लोगों में "कूदासन" की होड़ लग गयी। इसी क्रम में उन्हें "स्त्री-वस्त्र" तक भी धारण करना पड़ा। देखते ही देखते "राह कुर्बानियों" की एकाएक वीरान हो गयी। खैर----

शासकीय पक्ष के व्यवहार के क्या कहने? दिन में "पुष्प" से स्वागत और रात में "कटार" से वार। वाह क्या सीन था? "क्षणे रूष्टा - क्षणे तुष्टा"। क्या कहा जाय इस नाटकीय मोड़ को? शायद पाकिस्तानी तानाशाह भी इतनी जल्दी, वो भी एकदम विपरीत दिशा में, अपना विचार बदलने में शर्म महसूस करेंगे। एकाएक सत्ता पक्ष के लोगों को महाभारत के संजय की तरह "दिव्य दृष्टि" मिली और बाबा रामदेव "आदरणीय" से "महाठग" के रूप में अवतरित हो गए। सत्ता पक्ष ने "दिग्विजयी मुद्रा" में इसकी घोषणा भी शुरू कर दी और यह क्रम अब भी चल ही रहा है। पता नहीं कब तक चलेगा?

चाहे अन्ना हजारे हों या बाबा रामदेव - दोनों ने देश की नब्ज को पहचाना और ज्वलन्त मुद्दे भी उठाये जिसका कुल लब्बोलुआब भ्रष्टाचार ही रहा। पता नहीं "भ्रष्टाचार का मुद्दा" अब कहाँ चला गया? अब तो मुद्दा "सरकार बनाम रामदेव और अन्ना" के अहम् की टकराहट की ओर मुड़ गया है जो देश के स्वस्थ वातावरण के लिए किसी भी हालमें ठीक नहीं। गाँव की पान दुकान से लेकर दिल्ली तक जिसे देखो सब बहस में भिड़े हुए हैं। मजे की बात है कि सब भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं मगर भ्रष्टाचार अंगद के पाँव की तरह अडिग है।

जहाँ तक मेरी व्यक्तिगत समझदारी है वर्तमान सरकार के वर्तमान रुख को मैं अंग्रेजी हुकूमत की "फोटोकापी" से कम नहीं देख पाता। जब हालात ऐसे हैं तब क्या गाँधीवादी कदम और क्या आध्यामिक योगासन? क्या सरकार पर कोई असर पड़ेगा? "सत्ता सुन्दरी" की आगोश में जकड़े ये मदहोश लोग क्या जानेंगे आम आदमी की पीड़ा और विवशता? वैसे भी वातानुकूलित कमरे में दुख कम दिखाई पड़ते होंगे। तो फिर सवाल उठता है कि क्या यूँ ही चुप रहा जाय? नहीं बिल्कुल नहीं। ये अंग्रेज भी नहीं हैं जो इन्हें मार-पीट के भगाया जा सके। फिर उपाय क्या है?

योगासन की दिशा में बाबा रामदेव के द्वारा किये गए कार्य को देश कभी नहीं भुला सकता। उन्होंने जन जागरणका जो काम किया है वह अतुलनीय है। लेकिन ये सत्ताधारी "गाँधीवाद" और "योग - आध्यात्म" की भाषा कहाँ समझ रहे हैं। ये तो सिर्फ "वोट" की भाषा समझते हैं और अन्ना और रामदेव के पास जबरदस्त जन-समर्थन भी है।

अतः बाबा जी आपने बहुत योगासन सिखाया और आगे भी सिखायें। लेकिन एक सलाह है कि उसके साथ साथ यहाँ की सीधी सादी जनता को "वोटासन" के "रहस्य" और "उपयोगिता"भी उसी तरह से सिखायें जिस तरह से योग सिखा रहे हैं ताकि इन बेलगाम सत्ताधीशों के होश अगले चुनाव तक ठिकाने आ जाए। वैसे मुझे यह भी मालूम है बाबा - मेरे जैसे कम "घास-पानी" वाले लोगों की बात पर कौन तबज्जो देगा। जय-हिन्द।
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अरे भई साधो......: रुपया बना चिल्लर..चिल्लर बना रुपया

आज कचहरी के पास फटे पुराने नोट बदलने वाले के काउंटर पर पुराने सिक्कों के बीच चवन्नी को भी तांबे और अलुमिनियम के पुराने सिक्कों के बीच पूरे सम्मान के साथ प्रदर्शित देखा. जिज्ञासावश पूछ बैठा कि इसकी कीमत क्या है. उसने बताया दो रुपये. उसमें आजादी के बाद बंद हुए और प्रचलन से बाहर हुए सिक्के थे. मुझे ख़ुशी हुई कि भारतीय बैंक जिस सिक्के को उसकी निर्धारित कीमत पर वापस लेने की अंतिम तिथि को पीछे छोड़ आये हैं निजी क्षेत्र में उसकी आठ गुनी कीमत लग रही है. पुराना एक पैसा, दो पैसा, तीन पैसा. एक आना, दो आना, पांच पैसा. दस पैसा के सिक्के दो रुपये में बिक रहे हैं. यानी सरकार ने जिन्हें चिल्लर की हैसियत से ख़ारिज कर दिया वे रुपये में परिणत हो चुके हैं. दूसरी तरफ एक रुपये का सिक्का जिसे कभी बाज़ार में रुपये की हैसियत प्राप्त थी आज चिल्लर में परिणत हो चुका है.

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क़ुरआन किसी इंसान का कलाम नहीं है बल्कि इंसान के पैदा करने वाले का कलाम है (कुरआन और विज्ञान )

इस तरह की अनगिनत निशानियां हैं जो बताती हैं कि क़ुरआन किसी इंसान का कलाम नहीं है बल्कि इंसान के पैदा करने वाले का कलाम है। जो लोग साफ़ दिल रखते हैं वे इसे ऐलानिया मानते भी हैं। नीचे एक ऐसी ही घटना का बयान दिया जा रहा है।
त्वचा में दर्द के अभिग्राहकः Receptors
पहले यह समझा जाता था कि अनुभूतियां और दर्द केवल दिमाग़ पर निर्भर होती है। अलबत्ता हाल के शोध से यह जानकारी मिली है कि त्वचा में दर्द को अनुभूत करने वाले ‘‘अभिग्राहक: Receptors होते हैं। अगर ऐसी कोशिकाएं न हों तो मनुष्य दर्द की अनुभूति (महसूस) करने योग्य नहीं रहता । जब कोई ड़ॉ. किसी रोगी में जलने के कारण पड़ने वाले घावों को इलाज के लिये, परखता है तो वह जलने का तापमान मालूम करने के लिये: जले हुए स्थल पर सूई चुभोकर देखता है अगर सुई चुभने से प्रभावित व्यक्ति को दर्द महसूस होता है, तो चिकित्सक या डॉक्टर को इस पर प्रसन्नता होती है। इसका अर्थ यह होता है कि जलने का घाव केवल त्वचा के बाहरी हद तक है और दर्द महसूस करने वाली केशिकाएं जीवित और सुरक्षित हैं। इसके प्रतिकूल अगर प्रभावित व्यक्ति को सुई चुभने पर दर्द अनुभूत नहीं हो तो यह चिंताजनक स्थिति होती है क्योंकि इसका अर्थ यह है कि जलने के कारण बनने वाले घाव: ज़ख़्म की गहराई अधिक है और दर्द महसूस करने वाली कोशिकाएं भी मर चुकी हैं।
‘‘जिन लोगों ने हमारी आयतों को मानने से इन्कार कर दिया उन्हें निस्संदेह, हम आग में झोंकेंगे और जब उनके शरीर की‘ त्वचा: खाल गल जाएगी तो, उसकी जगह दूसरी त्वचा पैदा कर देंगे ताकि वह खू़ब यातना: अज़ाब का स्वाद चखें अल्लाह बड़ी ‘कु़दरत: प्रभुता‘‘ रखता है और अपने फै़सलों को व्यवहार में लाने का ‘विज्ञान: हिक्मत‘ भली भांति जानता है।(अल-क़ुरआन:सूर: 4 आयत .56 )
थाईलैण्ड में – चियांग माई युनीवर्सिटी के उदर विभागः Department of Anatomy के संचालक प्रोफ़ेसर तीगातात तेजासान ने दर्द कोशिकाओं के संदर्भ में शोध पर बहुत समय खर्च किया पहले तो उन्हे विश्वास ही नहीं हुआ कि पवित्र कु़रआन ने 1400 वर्ष पहले इस वैज्ञानिक यथार्थ का रहस्य उदघाटित कर दिया था। फिर इसके बाद जब उन्होंने उपरोक्त पवित्र आयतों के अनुवाद की बाज़ाब्ता पुष्टि करली तो वह पवित्र क़ुरआन की वैज्ञानिक सम्पूर्णता से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुए। तभी यहां सऊदी अरब के रियाज़ नगर में एक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसका विषय था ‘‘पविन्न क़ुरआन और सुन्नत में वैज्ञानिक निशानियां‘‘ प्रोफ़ेसर तेजासान भी उस सम्मेलन में पहुंचे और सऊदी अरब के शहर रियाज़ में आयोजित ‘‘आठवें सऊदी चिकित्सा सम्मेलन‘‘ के अवसर पर उन्होंने भरी सभा में गर्व और समर्पण के साथ सबसे पहले कहा:
‘‘अल्लाह के सिवा कोई माबूद पूजनीय नहीं, और (मुहम्मद स.अ.व.)उसके रसूल हैं।‘‘
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आम आदमी और बाढ़ का सुख

शीर्षक की सार्थकता रखते हुए पहले "आम आदमी" की बात कर लें। "आम" एक स्वादिष्ट, मँहगा और मौसमी फल है, जिसकी आमद बाढ़ की तरह साल में एक ही बार होती है। मजे की बात है कि आम चाहे जितना भी कीमती क्यों न हो, अगर वह किसी भी शब्द के साथ जुड़ जाय तो उसका भाव गिरा देता है। मसलन- आम आदमी, आम बात, आम घटना, दरबारे आम, आम चुनाव इत्यादि। अंततः हम सभी "आम आदमी" की भौतिक उपस्थिति और उनको मिलने वाले "पंचबर्षीय सम्मान" से पूर्णतः अवगत हैं।



मैं भी उन कुछ सौभाग्यशाली लोगों में से हूँ जिसका जन्म कोसी प्रभावित क्षेत्र में हुआ है। एक लघुकथा की चर्चा किए बिना बात नहीं बनेगी। बाढ़ के समय आकाश से खाद्य - सामग्री के पैकेट गिराए जाते हैं और प्रभावित आम आदमी और उनके बच्चे उसे लूटकर खूब मजे से खाते हैं, क्योंकि आम दिनों में तो गरीबी के कारण इतना भी मयस्सर नहीं होता। बाढ़ का पानी कुछ ही दिनों में नीचे चला जाता है और आकाश से पैकेट का गिरना बंद। तब एक मासूम बच्चा अपनी माँ से बड़ी मासूमियत से सवाल पूछता है कि - " माँ बाढ़ फिर कब आएगी"? अपने आप में असीम दर्द समेटे यह लघुकथा समाप्त। लेकिन बच्चों का अपना मनोविज्ञान होता है और वह पुनः बाढ़ की अपेक्षा करता है एक सुख की कामना के साथ।



मौसम में "सावन-भादों" का अपना एक अलग महत्व है। दंतकथा के अनुसार अकबर भी बीरबल से सवाल करता है कि - एक साल में कितने महीने होते हैं? तो बीरबल उत्तर देता है - दो, यानि सावन-भादो, क्योंकि पूरे साल इसी दो महीनों की बारिश की वजह से फसलें होतीं हैं। बहुत पहले एक फिल्म आयी थी "सावन-भादों" और उससे उत्पन्न दो फिल्मी कलाकार नवीन निश्छल और रेखा आज भी कमा खा रहे हैं। कभी आपने सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा की है? यदि हाँ तो जरूर सुना होगा कि इस एक सौ बीस किलोमीटर की दूरी में बसनेवाले "आम आदमी" मात्र दो महीने अर्थात "सावन- भादो" की कमाई पर ही साल भर गुजारा करते है।



ठीक इसी तरह "कोसी परियोजना" या फिर "बाढ़ नियंत्रण विभाग", "जल-संसाधन विभाग" आदि से जुड़े "सरकारी" लोगों के लिए "सावन-भादों" का अपना महत्व है और उससे उत्पन्न सुख से उनका साल भर बिना "नियमित वेतन" को छुए, बड़े मजे से गुजारा चलता है। यदि बाढ़ आ जाए तो फिर क्या कहने?



भारत भी अजब "राष्ट्र" है जिसके अन्दर "महाराष्ट्र" जैसा राज्य है। ठीक उसी तरह बिहार राज्य के अन्दर एक ही जगह का नाम "बाढ़" है और "बाढ़" को छोड़कर कई जगहों में हर साल बाढ़ आती है। जहाँ पीने के पानी के लिए लोग हमेशा तरसते हैं, वहाँ के लोग आज "पानी-पानी" हो गए है और "रहिमन पानी राखिये" वाली बात को यदि ध्यान में रखें तो प्रभावित लोगों का आज "पानी" ख़तम हो रहा है।



बाढ़ के साथ कई प्रकार के सुख का आगमन स्वतः होता है। जैसे बाँध को टूटने से बचाने के लिए उपयोग लाये जानेवाले बोल्डर, सीमेंट का भौतिक उपयोग चाहे हो या न हो लेकिन खाता-बही इस चतुराई से तैयार किए जाते हैं कि किसी जाँच कमीशन की क्या मजाल जो कोई खोट निकाल दे? रही बात राहत- पुनर्वास के फर्जी रिहर्सल की, वो भी बदस्तूर चलता रहता है। मजे की बात है कि पिछले साल के लाखों बाढ़ प्रभावित लोगों को आज भी राहत पुनर्वास का इन्तजार है।



न्यूज चैनल वालों का भी "सबसे पहले पहुँचने" का एक अलग सुख है। डूबते हुए लोगों से पूछना - आप कैसा महसूस कर रहे हैं? आदि बेतुके और चिरचिराने वाले सवालों का, वीभत्स और अन्दर तक झकझोरने वाले दृश्यों को बार-बार दिखलाने का, राहत पुर्वास के नाम पर नेताओं के बीच नकली "मीडियाई युद्ध" कराने का भी आनंद ये लोग खूब उठाते हैं।



"कटा के अंगुली शहीदों में नाम करते हैं" वाली कहावत यहाँ साक्षात चरितार्थ होती है। "थोडी राहत - थोड़ा दान, महिमा का हो ढ़ेर बखान" - ऐसा दृश्य भी काफी देखने को मिलता है। एक से एक "आम जनता" के तथाकथित "शुभचिंतक" कहाँ से आ जाते हैं, राजनैतिक रोटी सकने के लिए कि क्या कहूँ? बाढ़ के कारण चाहे लाखों एकड़ की फसलें क्यों न बर्बाद हो गईं हों, लेकिन राजनितिक "फसल" लहलहा उठते हैं। राजनीतिज्ञों के "हवाई-सर्वेक्षण" का अपना सुख है। ऊंचाई से देखते हैं कि "आम आदमी कितने पानी" में है? और आकाश से ही तय होता है कि अगले पाँच बरस तक आम आदमी की "भलाई" कौन करेगा।


निष्कर्ष यह कि "आम" और "बाढ़" दोनों राष्ट्रीय धरोहर हैं - एक राष्ट्रीय फल तो एक राष्ट्रीय आपदा। जय-हिंद।।
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ब्लॉगिंग के साइड इफ़ेक्ट (नकारात्मक प्रभाव) Hindi Blogging Guide (3)

शिखा कौशिक जी एक रिसर्च स्कॉलर हैं। इसीलिए उनकी नज़र में भी उनके दिल की तरह गहराई बहुत है। वह हरेक चीज़ के उजले पक्ष के साथ उसके काले पहलू पर भी पूरी तवज्जो देती हैं। यही वह तरीक़ा है जिसके ज़रिए इंसान ख़ुद को नुक्सान से बचा सकता है। नए ब्लॉगर्स को नुक्सान से बचाने के लिए ही उन्होंने ‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ के लिए यह लेख लिखा है। इसके ज़रिए उन्होंने संक्षेप में यह बता दिया है कि ब्लॉगिंग को नशे की लत की तरह न अपनाया जाए बल्कि इसे होशमंदी के साथ बरता जाए और भलाई के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए।
पेश है शिखा कौशिक जी का लेख :
आज सम्पूर्ण विश्व कंप्यूटरमय होने की दिशा में  प्रयासरत है . बैंकिंग क्षेत्र, तकनीकी संस्थान और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान कंप्यूटर के मशीनी दिमाग़ से लाभ उठा रहे हैं ; वहीं लाइफ़  लाइन बने इंटरनेट ने दुनिया भर के कम्प्यूटर्स को जोड़कर सम्पूर्ण विश्व को ग्लोबल फ़ैमिली में बदल दिया है . इसी क्रम में 'वर्ड प्रेस' व 'ब्लॉगर' आदि ने इंटरनेट यूज़र्स को जो सुविधाएंदी हैं उन से लाभ उठाते हुए  आज अंग्रेज़ी  व हिंदी सहित अनेक भाषाओं  में करोड़ों ब्लॉग स्थापित किये जा चुके हैं . ये ब्लॉग साहित्य; तकनीक; कला; राजनीति आदि अनेक क्षेत्रों से सम्बंधित सामग्री उपलब्ध कराते  हैं .
'ब्लॉग' को हिंदी भाषी लोग 'चिट्ठा' भी कहते हैं. सरल शब्दों में यह चिट्ठाकार की निजी डायरी का ही ऑनलाइन  रूप है . चिट्ठाकारी ने जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को यह सुअवसर प्रदान किया है कि वह अपनी रचनाओं को स्वयं प्रकाशित कर पाठकों से उनकी प्रतिक्रियाएं तुरंत प्राप्त कर सकें वहीं दूसरी ओर प्रकाशकों की मनमानी को भी ठेंगा दिखा दिया है .आज हर ब्लॉगर स्वयं ही लेखक है और स्वयं ही प्रकाशक भी .ये है ब्लॉगिंग के सिक्के का एक पहलू . अब ज़रा दूसरे पहलू पर भी विचार करते हैं .  इसके नकारात्मक प्रभाव भी हमारी नज़र के सामने रहने चाहिएं .
क्या हैं ये नकारात्मक प्रभाव ?
इन पर निम्न बिन्दुओं के अंतर्गत विचार किया जा सकता है -

(1) स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव - सबसे पहले ब्लॉगिंग के उन प्रभावों पर विचार करें जो कि स्वास्थ्य पर पड़ते हैं  तो यह तथ्य प्रकट होता है कि ब्लॉगर को ब्लॉगिंग का नशा इस तरह अपनी गिरफ़्त में ले लेता है कि वह अपना ज़्यादा से ज़्यादा समय पी.सी., लैपटौप और मोबाईल पर ख़र्च करने लगता है .ब्लॉगिंग न कर पाए तो वह थकान  महसूस करता है , अनमना सा और चिड़चिड़ा भी हो जाता है . ज़्यादा ब्लॉगिंग करने के कारण उसे  पीठ दर्द, सिरदर्द और थकान जैसी अनेक शारीरिक समस्याएं परेशान करने लगती हैं . ब्लॉगिंग न करने पर आदमी में बेचैनी व  तनाव बढ़ता है, यहाँ तक कि दिमाग़ी गतिविधियों  और ब्लड प्रेशर तक में परिवर्तन होता देखा गया है . ब्लॉगिंग के चक्कर में व्यक्ति खाने व  सोने जैसे अनिवार्य  कामों की  उपेक्षा करता है . जिसका अंजाम  ख़राब स्वास्थ्य के रूप में उसे भुगतना पड़ता है .

(2) परिवार की अनदेखी -   ब्लॉगिंग करने वाला व्यक्ति परिवार की अनदेखी भी करने लगता है .वह अपना ख़ाली समय बच्चों, पत्नी व अन्य परिजनों  के साथ बिताने में ख़र्च  न करके ब्लॉग-पोस्ट लिखने में लगा देता है .जाहिर है कि इससे परिवार के लोगों के आपसी संबंधों में खिचाव आने लगता है .

(3) आउटडोर  गतिविधियों की अनदेखी - ब्लॉगिंग के आदी लोग ब्लॉग-जगत की दुनिया में इतना मग्न हो जाते हैं कि जरूरी काम निपटाकर तुरंत कंप्यूटर पर ब्लॉग गतिविधियों में रम जाते है .इसके चक्कर में वे अपने आस-पास के लोगों से कट जाते हैं और बाहरी गतिविधियों में रुचि लेना बंद कर देते हैं .एक ओर ब्लॉगिंग जहाँ संसार भर के लोगों के बीच दूरियां काम कर रही है वहीं आदमी को उसके सामाजिक दायरे से काट कर एकाकी और तन्हा भी बना रही है -
फ़ासलों की दुनिया में दूरियां नहीं बाक़ी
आदमी जहां भी है दायरों में है
(4) फ़र्ज़ी और काल्पनिक प्रोफ़ाइल  वाले  ब्लॉग भी ढेरों हैं ब्लॉग-जगत में. जिनसे हर पल यह भय बना रहता है कि आपकी रचनाओं की कॉपी कर कोई अन्य इनके लेखन का श्रेय न ले उड़े .कई बार असली परिचय छिपाकर कुछ ब्लौगर अपनी धार्मिक , राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नफरत फैलाने वाले लेख भी लिखते हैं, जिनसे वे तनाव पैदा करने का कुत्सित प्रयास भी करते हैं .

(5) वर्चस्व की लड़ाई से ब्लॉग जगत भी अछूता नहीं है .कुछ ब्लॉगर  धन-बल से समस्त ब्लॉग जगत को अपनी निजी  संपत्ति  बनाने में लगे रहते हैं .वे एक पसंदीदा ब्लॉगर-समूह बना लेते हैं और फिर उन्हें सम्मानित करने के लिए भव्य आयोजन करते हैं . सम्पूर्ण ब्लॉग जगत में वे इसका प्रचार प्रसार भी करते हैं .  स्वयं द्वारा सम्मानित ब्लोगर्स को अन्य ब्लोगर्स कि तुलना में श्रेष्ठ घोषित कर देते हैं, जिससे अच्छा लेखन करने वाले ब्लोगर्स हतोत्साहित होते हैं .

(6) महिला ब्लॉगर्स और भी अधिक सजग रहकर ब्लॉग पोस्ट डालनी होती है .कई बार महिला ब्लोगर्स को ज्वलंत मुद्दे उठाने के लिए वास्तविक पहचान छिपाकर ब्लोगिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ता है .यहाँ एक महिला ब्लोगर द्वारा अपने प्रोफ़ाइल में उद्धृत ये पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं -
'मैं द्रौपदी हूँ और चीर-हरण से डरती हूँ .'

                             ब्लॉगिंग  के नकारात्मक प्रभावों से डरकर ब्लोगिंग छोड़ देना तो उचित नहीं है और न ही संभव है . ज़रुरत है संयमित ,सजग  व  सटीक ब्लॉगिंग की .वास्तव में यह आज के हरेक रचनाशील व्यक्ति के लिए एक वरदान है . आज ब्लॉगिंग ने हमें यह सुअवसर दिया  है कि हम अपने निजी अनुभवों , स्थानीय और  राष्ट्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर निर्भीक होकर विचार प्रस्तुत कर सकें . जहाँ तक मैंने महसूस किया है, महिला ब्लॉगर्स  को प्रोत्साहित ही किया जाता है और यदि कोई अभद्र  टिप्पणियों के द्वारा उन्हें परेशान करता है, तब  मॉडरेशन लागू करने की सुविधा भी मौजूद है. इसके ज़रिये  टिप्पणियों का निरिक्षण  पहले ब्लॉगर स्वयं करता है . बेहूदा  टिप्पणियों को हटाया जा सकता है.
            हरेक ब्लॉगर को यह भी ध्यान रखना चाहिये कि वह ब्लॉगिंग के चक्कर में न तो अपनी सेहत के साथ खिलवाड़ करे और न ही परिवार की ज़रूरतों को नज़र अंदाज़ करे . समय-सीमा का ध्यान रखते हुए ब्लॉगिंग का शौक़ पूरा करें.
                   जो ब्लॉग  धार्मिक कट्टरता, राजनैतिक विद्वेष और अशालीन सामग्री से युक्त हैं, उन्हें  उपेक्षित कर देना ही मुनासिब हैं. ऐसा करके हम सभी ब्लॉग जगत की गरिमा बनाये रखने में अपना  योगदान दे सकते हैं . आने वाले समय में ब्लॉगिंग  का भविष्य सुनहरा है क्योंकि ब्लॉगर दिल से लिखता है दबाव में नहीं .
                                    जय हिंद 
                                - शिखा कौशिक
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चवन्नी का अवसान : चवनिया मुस्कान

सच तो ये है कि चवन्नी से परिचय बहुत पहले हुआ और "चवनिया मुस्कान" से बहुत बाद में। आज जब याद करता हूँ अपने बचपन को तो याद आती है वो खुशी, जब गाँव का मेला देखने के लिए घर में किसी बड़े के हाथ से एक चवन्नी हथेली पर रख दिया जाता था "ऐश" करने के लिए। सचमुच मन बहुत खुश होता था और चेहरे पर स्वाभाविक चवनिया मुस्कान आ जाती थी। हालाकि बाद में चवनिया मुस्कान का मतलब भी समझा। मैं क्या पूरे समाज ने समझा। मगर उस एक दो चवन्नी का स्वामी बनते ही जो खुशी और "बादशाहत" महसूस होती थी, वो तो आज हजारों पाकर भी नहीं महसूस कर पाता हूँ।

15 अगस्त 1950 से भारत में सिक्कों का चलन शुरू हुआ। उन दिनों "आना" का चलन था आम जीवन में। आना अर्थात छः पैसा और सोलह आने का एक रूपया। फिर बाजार और आम आदमी की सुविधा के लिए 1957 में दशमलव प्रणाली को अपनाया गया यानि रूपये को पैसा में बदल कर। अर्थात एक रूपया बराबर 100 पैसा और 25 पैसा का सिक्का चवन्नी के नाम से मशहूर हो गया।

भले ही 1957 में यह बदलाव हुआ हो लेकिन व्यवहार में बहुत बर्षों बाद तक हमलोग आना और पैसा का मेल कराते रहते थे। यदि 6 पैसे का एक आना और 16 आने का एक रूपया तो उस हिसाब से एक रुपया में तो 16x6 = 96 पैसे ही होना चाहिए। लेकिन उसको पूरा करने के लिए हमलोगों को समझाया जाता था कि हर तीन आने पर एक पैसा अधिक जोड़ देने से आना पूरा होगा। मसलन 3 आना = 3x6+1=19 पैसा। इस हिसाब से चार आना 25 पैसे का, जो चवन्नी के नाम से मशहूर हुआ। फिर इसी क्रम से 7 आने पर एक पैसा और अधिक जोड़कर यानि 7x6+2 = 44 पैसा, इसलिए आठ आना = 50 पैसा, जो अठन्नी के नाम से आज भी मशहूर है और अपने अवसान के इन्तजार में है। उसके बाद 11 आने पर 3 पैसा और 14 आने पर 4 पैसा जोड़कर 1 रुपया = 16x6+4 = 100 पैसे का हिसाब आम जन जीवन में खूब प्रचलित था 1957 के बहुत बर्षों बाद तक भी।

हलाँकि आज के बाद चवन्नी की बात इतिहास की बात होगी लेकिन चवन्नी का अपना एक गौरवमय इतिहास रहा है। समाज में चवन्नी को लेकर कई मुहाबरे बने, कई गीतों में इसके इस्तेमाल हुए। चवन्नी की इतनी कीमत थी कि एक दो चवन्नी मिलते ही खुद का अन्दाज "रईसाना" हो जाता था गाँव के मेलों में। लगता है उन्हीं दिनों मे किसी की कीमती मुस्कान के लिए "चवनिया मुस्कान" मुहाबरा चलन में आया होगा। चवन्नी का उन दिनों इतना मोल था कि "राजा भी चवन्नी ऊछाल कर ही दिल माँगा करते थे"। यह गीत बहुत मशहूर हुआ आम जन जीवन में जो 1977 में बनी फिल्म "खून पसीना" का गीत है।

"मँहगाई डायन" तो बहुत कुछ खाये जात है। मँहगाई बढ़ती गयी और छोटे सिक्के का चलन बन्द होता गया। 1970 में 1,2और 3 पैसे के सिक्के का चलन बन्द हो गया और धीरे धीरे चवन्नी का मोल भी घटता गया। चवन्नी का मोल घटते ही "चवन्नी छाप व्यापारी", "चवन्नी छाप डाक्टर" आदि मुहाबरे चलन में आये जो क्रमशः छोटे छोटे व्यापारी और आर०एम०पी० डाक्टरों के लिए प्रयुक्त होने लगा।

और आज चवन्नी का इतना मोल घट गया "मंहगाई डायन" के कारण कि आज उसका का अतिम संस्कार है। चवन्नी ने मुद्रा विनिमय के साथ साथ समाज से बहुत ही रागात्मक सम्बन्ध बनाये रखा बहुत दिनों तक। भले आज से चौवन्नी का अंत हो जाय लेकिन ये मुहावरे, ये गीत बहुत दिनों तक चौवन्नी जीवित रखेंगे। अतः मेरी विनम्र श्रद्धांजलि है चवन्नी को चौवानिया मुस्कान के साथ उसके इस शानदार अवसान पर।
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