अवध सम्मान

'अवध सम्मान' से नवाजे गए कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव
लखनऊ। जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया दम्पति कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। उनके इस जूनून के कारण ही आज हिंदी ब्लागिंग को आधिकारिक तौर पर भी विधा के रूप में मान्यता मिलने लगी है. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव को 'न्यू मीडिया एवं ब्लागिंग' में उत्कृष्टता के लिए एक भव्य कार्यक्रम में 'अवध सम्मान' से सम्मानित किया गया. जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया, पर यह पहली बार हुआ जब किसी दम्पति को युगल रूप में यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया. ब्लागर दम्पति को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहाँ न्यू मीडिया के रूप में ब्लागिंग की सराहना की, वहीँ कृष्ण कुमार यादव ने अपने संबोधन में उनसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए जा रहे सम्मानों में 'ब्लागिंग' को भी शामिल करने का अनुरोध किया. आकांक्षा यादव ने न्यू मीडिया और ब्लागिंग के माध्यम से भ्रूण-हत्या, नारी-उत्पीडन जैसे मुद्दों के प्रति सचेत करने की बात कही. अन्य सम्मानित लोगों में वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी, चर्चित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, ज्योतिषाचार्य पं. के. ए. दुबे पद्मेश, वरिष्ठ आई.एस. अधिकारी जय शंकर श्रीवास्तव इत्यादि प्रमुख रहे.
कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को सम्मानित करते उ.प्र. के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव

जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खा चुके कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव, साहित्य और ब्लागिंग में भी हमजोली बनकर उभरे हैं. कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग और हिन्दी-साहित्य में एक चर्चित नाम हैं, जिनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती हैं और उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये। कृष्ण कुमार यादव का ब्लॉग 'शब्द-सृजन की ओर' (http://www.kkyadav.blogspot.in/) जहाँ उनकी साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से रूबरू करता है, वहीँ 'डाकिया डाक लाया' (http://dakbabu.blogspot.in/) के माध्यम से वे डाक-सेवाओं के अनूठे पहलुओं और अन्य तमाम जानकारियों को सहेजते हैं. आकांक्षा यादव अपने व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' (http://shabdshikhar.blogspot.in/) पर साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों और विशेषत: नारी-सशक्तिकरण को लेकर काफी मुखर हैं. इस दम्पति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 98 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’ को 75 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 68 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है. सबसे रोचक तथ्य यह है कि यादव दम्पति ने अभी से अपनी सुपुत्री अक्षिता (पाखी) में भी ब्लागिंग को लेकर जूनून पैदा कर दिया है. पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) का ब्लाग ’पाखी की दुनिया’ (http://pakhi-akshita.blogspot.in/) बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी काफी लोकप्रिय है और इसे 98 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है। इसके अलावा इस ब्लागर दम्पति द्वारा 'उत्सव के रंग', 'बाल-दुनिया', 'सप्तरंगी प्रेम' इत्यादि ब्लॉगों का भी सञ्चालन किया जाता है.

इस अवसर पर उ.प्र. विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय, रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, केबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव, अनुप्रिया पटेल, मेयर दिनेश शर्मा सहित मंत्रिपरिषद के कई सदस्य, विधायक, कार्पोरेट और मीडिया से जुडी हस्तियाँ, प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकर्मी व खिलाडी इत्यादि उपस्थित रहे. आभार ज्ञापन जी न्यूज उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के संपादक वाशिन्द्र मिश्र ने किया.
                                                                                                                            अफसर सागर
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कहानी एक क्रान्तिकारी अनाथ की

एक अनाथ बच्चा जो अंधकार युग में पैदा हुआ, पैदा होने से पहले पिता का देहांत हो गया, 6 वर्ष के हुए तो माता भी चल बसीं,अनाथ थे पर समाज में दीप बन कर जलते रहे, आचरण ऐसा था कि लोगों ने उनको सादिक़ " सत्यवान" और अमीन " अमानतदार" की अपाधि से रखी थी। चालीस वर्ष के हुए तो समाज सुधार की जिम्मेदारी सर पर डाल दी गई। जब सत्य की ओर आमंत्रन शुरू किया तो दोस्त दुश्मन बन गए, सच्चा और अमानतदार कहने वाले पागल और दीवाना कहने लगे, गालियाँ दीं, पत्थर मारा, रास्ते में कांटे बिछाए, सत्य को अपनाने वालों को कष्टदायक यातनाएं दीं,  3 वर्ष तक सामाजिक बहिष्कार किया जिसमें जान बचाने के लिए वृक्षों के पत्ते तक चबाने की नौबत आ गई, सांसारिक भोगविलास और धन सम्पत्ति की भी लालच दी, पर उन सब को ठुकरा दिया और सत्य की ओर बुलाते रहे।
 जब अपनी धरती बांझ सिद्ध हुई तो निकट शहर के लोगों को सत्य की ओर बुलाया, परन्तु शहर वालों ने उन पर पत्थर बरसाए, पूरा शरीर खून से तलपत हो गया और बेहोश हो कर गिर पड़े। फिर भी उनकी भलाई की प्रार्थना करते रहे, एक दिन और दो दिन की बात न थी निरंतर 13 वर्ष तक देश वालों ने उनको टार्चर किया, यहाँ तक कि उनको और उनके साथियों को अपने ही देश से निकाला, उनके घर बार और सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा कर लिया। जन्मभूमि से निकालने के बाद भी उनकी शत्रुता में कमी न आई, दस वर्ष में 27 बार युद्ध किया, उनके पूरे जीवन में उन पर 17 बार जानलेवा आक्रमण किया। पर सत्य को अपनाने वालों की संख्या धीरे धीरे बढ़ती ही रही।
अंततः जिस जन्मभूमि से उनको निकाल दिया गया था 8 वर्ष के बाद उस पर विजय पा लिया। ज़रा सोचिए वह  इनसान जिन को निरंतर 21 वर्ष तक चैन से रहने नहीं दिया जाता है आज अपने शत्रुओं पर क़ाबू पा ले रहा है... दुनिया का क़ानून यही कहेगा कि 21 वर्ष के शत्रुओं को कष्टदाइक सज़ा मिलनी चाहिए थी। पर उस सज्जन ने उन सब की सार्वजनिक क्षमा की घोषणा कर दी। जिसका परिणाम क्या हुआ...? 
लोग समझ गए कि यह स्वार्थी न था.. हर ओर से लोग इस सत्य को अपनाने लगे...दो वर्ष के बाद जब उनका देहांत हुआ तो उस से पहले उनके अनुयाई एक लाख चवालिस हज़ार की संख्या में उनके साथ एकत्र हुए थे। क्या आप जानते हैं इस महा पुरुष को....? 
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अविवाहित बेटी का भरण-पोषण अधिकार


अविवाहित बेटी का भरण-पोषण अधिकार 


दंड प्रक्रिया सहिंता १९७३ की धारा १२५ [१] के अनुसार ''यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति -
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[ग] -अपने धर्मज या अधर्मज संतान का [जो विवाहित पुत्री  नहीं है ],जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है ,जहाँ  ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण -पोषण करने में असमर्थ है ,..........
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भरण पोषण करने की उपेक्षा करता है  या भरण पोषण करने से इंकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ,ऐसी उपेक्षा या इंकार साबित होने पर ,ऐसे व्यक्ति को ये निर्देश दे सकेगा कि वह अपनी ऐसी संतान को ऐसी मासिक दर पर जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे भरण पोषण मासिक भत्ता दे .
और इसी कानून का अनुसरण  करते हुए मुंबई हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति के यू चंडीवाल  ने बहरीन में रहने वाले एक व्यक्ति को उसकी सबसे बड़ी बेटी के भरण पोषण का खर्च देने का आदेश दिया है हालाँकि वह बालिग हो गयी है .अदालत द्वारा १६  अक्टूबर को फैसले में कहा गया कि इस मामले में सबसे बड़ी बेटी न सिर्फ अविवाहित है बल्कि अपनी माँ पर आश्रित है इसलिए वह भरण पोषण का खर्च पाने की हक़दार है .
                                            शालिनी कौशिक 
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सौ हकीम और एक नीम बराबर है।


नीम कडवा है लेकिन इसके गुण मीठे है,तभी तो नीम के बारे मे कहा जाता हैकि सौ हकीम और एक नीम बराबर है।

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एक विलुप्त कविता / रामधारी सिंह "दिनकर"


आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" का जन्म दिवस है | उनकी इस रचना के साथ उन्हे अनेकानेक नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि |
बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें,
आज क्या है कि देख कौम को गम है।
कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में
कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है?
भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में?
कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती तुम्हें शरम है?
आग लगे उस धन में जो दुखियों के काम न आए,
लाख लानत जिनका, फटता नही मरम है।
दुह-दुह कर जाति गाय की निजतन धन तुम पा लो
दो बूँद आँसू न उनको यह भी कोई धरम है?
देख रही है राह कौम अपने वैभव वालों की
मगर फिकर क्या, उन्हें सोच तो अपन ही हरदम है?
हँसते हैं सब लोग जिन्हें गैरत हो वे सरमायें
यह महफ़िल कहने वालों को बड़ा भारी विभ्रम है।
सेवा व्रत शूल का पथ है गद्दी नहीं कुसुम की!
घर बैठो चुपचाप नहीं जो इस पर चलने का दम है।

(सन 1938 में पटना में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि महासम्मेलन क आयोजन किया गया था जिसमें काशी नरेश विभूति नारायण सिंह, सर गणेश दत्त, बाबू रज्जनधारी सिंह आदि गणमान्य लोग मौज़ूद थे। दिनकर जी ने उस महाजाति सम्मेलन के लिए यह कविता लिख भेजी थी जिसे उसमें स्वागत-गान के रूप में पढ़ा गया था। कविता कोश के सहयोगी पश्चिमी सिंहभूम, झारखण्ड के निवासी श्री रवि रंजन ने बाबू रज्जनधारी सिंह के गाँव 'भरतपुरा' में बने उनके निजी पुस्तकालय से यह कविता उनकी नोटबुक से ढूँढ निकाली है। इस कविता का कोई शीर्षक नहीं दिया गया है।)

सौजन्य-"कविता कोश"
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ग़ज़लगंगा.dg: हमने रिश्ता बहाल रखा था

एक सांचे में ढाल रखा था.
हमने सबको संभाल रखा था.

एक सिक्का उछाल रखा था.
और अपना सवाल रखा था.

सबको हैरत में डाल रखा था.
उसने ऐसा कमाल रखा था.

कुछ बलाओं को टाल रखा था.
कुछ बलाओं को पाल रखा था.

हर किसी पर निगाह थी उसकी
उसने सबका ख़याल रखा था.

गीत के बोल ही नदारत थे
सुर सजाये थे, ताल रखा था.

उसके क़दमों में लडखडाहट थी
उसके घर में बवाल रखा था.

उसकी दहलीज़ की रवायत थी
हमने सर पर रुमाल रखा था.

साथ तुम ही निभा नहीं पाए
हमने रिश्ता बहाल रखा था.

-देवेंद्र गौतम
ग़ज़लगंगा.dg: हमने रिश्ता बहाल रखा था:

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सोशल मीडिया नेटवर्किंग का नया चेहरा worldfloat.com Hndi Blogging Guide (39)

सोशल मीडिया के जमाने में वर्ल्डफ्लोट अपनी पुख्ता पहचान बना रही है। इसके जरिए बिना किसी रुकावट के देश-विदेश के लोगों से संपर्क साधा जा सकता है। वर्ल्डफ्लोट के बारे में जानिए यहां।
सोशल मीडिया ने आज यकीनन दुनिया को छोटा कर दिया है। फेसबुक और कई अन्य वेबसाइटों ने लोगों को एक दूसरे के बेहद करीब ला दिया है। युवाओं में खासतौर पर सोशल नेटवर्किंग साइटें बेहद पसंद की जा रही हैं। ऐसे में एक और सोशल नेटवर्किग वेबसाइट हमारे सामने है। वर्ल्डफ्लोट नामक इस सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट की खासियत अपने तरीके की है। बेशक आप यहां अन्य सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों की तरह दूर बैठे लोगों से बात कर सकते हैं, लेकिन इसका तरीका कुछ अलग है। मूलत: इस वेबसाइट के मार्फत आप दुनिया में दूरदराज के किसी भी व्यक्ति के साथ बातचीत की शुरुआत कर सकते हैं। वेबसाइट के होमपेज में चारों दिशाओं यानी पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण की ओर डायरेक्ट करते संकेतक हैं, जिनमें से किसी एक पर क्लिक करते ही आप उस दिशा के बड़े शहर (यदि वह शहर वेबसाइट का अंश है तो) के लोगों से संपर्क साध सकते हैं। फेसबुक से जुड़ने वाले यदि अपने मित्रों की सूची बनाते हैं, तो वैसी सुविधा यहां भी है, लेकिन इसके साथ ही वह सामने दिख रहे किसी भी व्यक्ति से बातचीत की शुरुआत कर सकते हैं।
वर्ल्डफ्लोट के संस्थापक पुष्कर महाटा कहते हैं कि इस वेबसाइट के निर्माण का विचार उन्हें दो वर्ष पूर्व आया था, जिसके बाद उन्होंने आईआईटी के कुछ इंजीनियरों को लेकर काम की शुरुआत की थी। इस 6 जून को वर्ल्डफ्लोट शुरू हुई और मात्र तीन माह में इस पर पांच लाख से अधिक लोग रजिस्टर्ड हो चुके हैं। इसके बावजूद, पुष्कर महाटा वर्ल्डफ्लोट के व्यवसायीकरण के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि ऐसा करना बहुत जल्दबाजी होगी। कारण ? वह चाहते हैं कि दुनिया भर में वेबसाइट अपनी पहचान बनाए, जिसके बाद इस पर विज्ञापनों की शुरुआत हो।
वर्ल्डफ्लोट को गूगल क्रोम या सफारी की मदद से सर्फ किया जा सकता है। इसकी एक अन्य खासियत यह है कि यदि नई दिल्ली में बैठा व्यक्ति मुंबई के किसी व्यक्ति से बात करना चाहता है तो इसके लिए जरूरी नहीं कि मुंबई में बैठा व्यक्ति ऑनलाइन ही हो। नई दिल्ली में बैठा व्यक्ति उसे संदेश भेज सकता है, जिस दौरान मुंबई में बैठा व्यक्ति ‘इनेक्टिव स्टेज’ में होगा।
पुष्कर महाटा के अनुसार, वह चाहते हैं ऑनलाइन होने के बाद प्रत्येक व्यक्ति दूसरे को उसके स्थान विशेष में महसूस कर सके और फिर अपनी पसंद के अनुसार उससे संपर्क साध सके। इसमें एक दूसरे से बिल्कुल अनजान व्यक्ति आपस में बातचीत कर सकेंगे।
महाटा के अनुसार, दुनिया के 1600 से अधिक शहरों को वेबसाइट का हिस्सा बनाकर ‘जियो-टार्गेटेड एडवरटाइजमेंट’ की शुरुआत की जा सकती है। हालांकि इस कार्य में अभी समय लग सकता है। खुद दर्शन और मनोविज्ञान में रुचि रखने वाले पुष्कर महाटा भवन निर्माण का कार्य करते हैं, लेकिन कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी दखल रखते हैं। वेबसाइट के संस्थापक के तौर पर केंद्रीय कमान उनके हाथ में रहती है, लेकिन इसके लिए वह अपने इंजीनियर साथियों को श्रेय देना नहीं भूलते।
Source : http://www.livehindustan.com/news/lifestyle/lifestylenews/article1-Social-Media-Networking-50-50-262366.html
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हिंदी और उर्दू का फिजूल विवाद -Jawahar lal Nehru


कुछ दिन से फिर हिंदी और उर्दू की बहस उठी है, और लोगों के दिलों में यह शक पैदा होता है कि हिंदी वाले उर्दू को दबा रहे हैं और उर्दू वाले हिंदी को। लेकिन अगर जरा भी विचार किया जाए, तो यह बिल्कुल फिजूल मालूम होता है। साहित्य ऐसे नहीं बढ़ा करते। अक्सर साहित्य का अर्थ हम कुछ दूसरा ही लगाते हैं। हम भाषा की छोटी बातों में बहुत फंसे रहते हैं और बुनियादी बातों को भूल जाते हैं। साहित्य किसके लिए  होता है? क्या थोड़े-से ऊपर के पढ़े-लिखे आदमियों के लिए होता है या फिर आम जनता के लिए? जब तक हम इसका जवाब न दें, उस समय तक हमें साहित्य के भविष्य का रास्ता ठीक तौर से नहीं दिखेगा।
और अगर हम इस बात का निश्चय कर लें, तब हमारे और झगड़े हिंदी-उर्दू आदि के भी हल हो जाएं। पहली बात जो हमको याद रखनी है, वह यह है कि आजकल का साहित्य बहुत पिछड़ा हुआ है। किसी भी यूरोप की भाषा से मुकाबला किया जाए, तो हम काफी पिछड़े हुए हैं। जो नई किताबें हमारे यहां निकल रही हैं, वे अव्वल दर्जे की नहीं होतीं। और कोई आदमी आजकल की दुनिया को समझना चाहे, तो उसके लिए आवश्यक हो जाता है कि वह विदेशी भाषाओं की किताबें पढ़े।
नई विचारधाराएं अभी तक हमारे साहित्य में कम ही पहुंची हैं। इतिहास, विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति इत्यादि पर हमारी भाषाओं में माकूल पुस्तकें बहुत कम हैं। जो लोग इन बातों के सीखने के प्यासे हैं, उनको मजबूरन और जगह जाना पड़ेगा। बहुत सारे प्रश्न उठते हैं। लेकिन मैं इस समय चंद बातों की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूं।
1. मेरा पूरा विश्वास है कि हिंदी और उर्दू के मुकाबले से दोनों को ही हानि पहुंचती है। वह एक दूसरे के सहयोग से ही बढ़ सकती हैं। और एक के बढ़ने से दूसरे को भी फायदा पहुंचेगा। इसलिए उनका संबंध मुकाबले का नहीं होना चाहिए, चाहे वे कभी अलग-अलग रास्ते पर ही क्यों न चलें। दूसरे की तरक्की से खुशी होनी चाहिए, क्योंकि उसका नतीजा अपनी तरक्की होगा। यूरोप में जब नए साहित्य (अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इटालियन) बढ़े, तब सब साथ बढ़े, एक दूसरे को दबाकर और मुकाबला करके नहीं।
2. इसके माने यह नहीं कि हर एक के प्रेमी अपनी भाषा की उन्नति की कोशिश न करें, लेकिन वह दूसरे की विरोधी कोशिश न हो और मूल सिद्धांत को सामने रखती हो।
3. यह खाली उर्दू-हिंदी के लिए नहीं, बल्कि सब हमारी बड़ी भाषाओं के लिए- बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम- यह बात साफ कर देनी चाहिए कि हम इन सब भाषाओं की तरक्की चाहते हैं और कोई मुकाबला नहीं। हर प्रांत में वहां की भाषा ही प्रथम है। हिंदी या हिन्दुस्तानी राष्ट्रभाषा अवश्य है और होनी चाहिए। लेकिन वह प्रांतीय भाषा के पीछे ही आ सकती है।
4. हिंदी और उर्दू का संबंध बहुत करीब का है और फिर भी कुछ दूर होता जा रहा है। इससे दोनों को हानि होती है। हमें दो बातें समझनी हैं और हालांकि वे दो बातें ऊपरी तौर से कुछ विरोधी मालूम होती हैं, फिर भी उनमें कोई असली विरोध नहीं है। एक तो यह कि हम ऐसी भाषा लिखें और बोलें, जिसमें संस्कृत या अरबी और फारसी के कठिन शब्द कम हों। इसी को आम तौर से हिन्दुस्तानी कहते हैं। कहा जाता है और यह बात सही है कि ऐसी बीच की भाषा लिखने से दोनों तरफ की खराबियां आ जाती हैं। एक दोगली भाषा पैदा होती है, जो किसी को भी पसंद नहीं आती और जिसमें न सौंदर्य होता है, न शक्ति। यह बात सही होते हुए भी बहुत बुनियाद नहीं रखती और मेरा विचार है कि हिंदी और उर्दू के मेल से हम एक बहुत खूबसूरत और बलवान भाषा पैदा करेंगे, जिसमें जवानी की ताकत हो और जो दुनिया की भाषाओं में एक माकूल भाषा हो। हमें याद रखना है कि भाषाएं जबरदस्ती नहीं बनतीं या बढ़तीं। साहित्य फूल की तरह खिलता है और उस पर दबाव डालने से वह मुरझा जाता है। इसलिए अगर हिंदी-उर्दू भी अभी कुछ दिन तक अलग-अलग झुकें, तो हमको उस पर ऐतराज नहीं करना चाहिए।
5. लिपि के बारे में यह विल्कुल निश्चय हो जाना चाहिए कि दोनों लिपियां- देवनागरी और उर्दू- जारी रहें और हर एक को यह अधिकार हासिल हो कि जिसमें चाहे, वह लिखे। अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि एक प्रांत में हिंदी लिपि को दबाते हैं, जैसे सरहदी प्रांत, या दूसरे प्रांत में उर्दू लिपि को मौका नहीं मिलता। हमें एक तरफ की बात नहीं कहनी है, बल्कि यह सिद्धांत रखना है कि हर जगह दोनों ही लिपियों को पूरी आजादी होनी चाहिए।
6. मेरी राय में हर भाषा और हर लिपि को पूरी आजादी होनी चाहिए, अगर उसके बोलने और लिखने वाले काफी हों। मसलन, अगर कलकत्ते में काफी तमिल बोलने वाले रहते हैं, तो उन्हें यह अधिकार होना चाहिए कि उनके स्कूलों में तमिल भाषा में पढ़ाई हो। जाहिर है कि एक प्रांत के राजनीतिक कार्य या अन्य कई काम बहुत सारी भाषाओं में नहीं हो सकते। वह तो प्रांत की ही भाषा में हो सकते हैं। उत्तर भारत और मध्य भारत में जहां हिन्दुस्तानी भाषा जनता की है, वहां एक भाषा और दो लिपियां सब जगह आजादी से चलनी चाहिए। इसके माने यह नहीं है कि हर एक को दो लिपियां सीखनी पड़ेंगी। यह बच्चे पर बहुत बोझा हो जाएगा। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि कुछ लोग दोनों लिपियां सीखें।
7. हिंदी और हिन्दुस्तानी शब्दों पर बहुत बहस हुई है और गलतफहमियां भी फैली हैं। यह एक फिजूल की बहस है। अगर इस बहस को बंद करने के लिए हम बोलने की भाषा को हिन्दुस्तानी कहें और लिपि को हिंदी या उर्दू कहें, तो इससे साफ-साफ मालूम हो जाएगा कि हम क्या कह रहे हैं।
8. यह हिन्दुस्तानी भाषा क्या हो? देहली या लखनऊ के रहने वाले कहते हैं कि हमारी बोली आमफहम है। इसी को हिन्दुस्तानी बनाओ। लेकिन बनारस और पटना और मध्य भारत या राजपूताना में जाइए, तो काफी फर्क मिलता है और अगर शहरों को छोड़कर देहातों में हम जाएं, तो और भी फर्क, फिर कौन भाषा हमारी हो? हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिए, जो सभ्य हो और जिसे अधिक-से-अधिक जनता समझे। इसको हम बैठकर कुछ कोषों या एक-दूसरे से मुकाबला करके नहीं बना सकते, और न दो-चार साहित्यकार मिलकर ही पैदा कर सकते हैं। इसकी बुनियाद तभी मजबूत पड़ेगी, जब लिखने वाले आम जनता के लिए लिखेंगे और बोलने वाले उनके लिए ही बोलेंगे। तब यह दफ्तरी बहसें कि कितनी उर्दू और कितनी हिंदी, ये सब खत्म हो जाएंगी। जनता फैसला करेगी। हमारे लिए सबसे बुनियादी प्रश्न यही है कि हम आम जनता के लिए अपना साहित्य बनाएं और उनको हमेशा अपने दिमागों के सामने रखकर लिखें।
साभार हिंदुस्तान दिनांक 14 सितंबर 2012
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-262058.html
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Mushayera: हज़ारों साल जी लेते अगर दीदार ना होता

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हुनर कहीं भी सीखें केंद्र देगा प्रमाण-पत्र -मदन जैड़ा

फैजान मोटरगाड़ियों का मिस्त्री है। मगर, यह हुनर उसने किसी ट्रेनिंग स्कूल में नहीं सीखा, बल्कि एक मैकेनिक के यहां काम करते हुए यह सब सीख लिया। ऐसे ही कई लोगों के पास हुनर तो है, पर किसी इंस्टीटय़ूट का सर्टिफिकेट नहीं। सरकार अब ऐसे ही लोगों की पहचान कर उन्हें हुनर का प्रमाण-पत्र देगी। इससे वे न केवल प्रशिक्षित कामगारों की तर्ज पर मेहनताना ले सकेंगे, बल्कि उनके लिए करियर की नई राहें भी खुल जाएंगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नेशनल वोकेशन एजुकेशन क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क योजना के तहत ये प्रमाणपत्र जारी करने का फैसला किया है। जल्द ही सेक्टर स्किल डेवलपमेंट काउंसिल बनेगी, जो यह काम करेगी। इससे पांच वर्षो में करीब तीन करोड़ कामगारों को फायदा होगा। मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी के अनुसार, ऐसे कामगारों को दो श्रेणियों के प्रमाण पत्र दिए जाएंगे। एक रिकग्नाइजेशन ऑफ प्रियर लर्निग (आरपीएल)-1 व दूसरा आरपीएल-2 होगा। आरपीएल-1 उन कार्मिकों को दिया जाएगा, जो तकनीकी या व्यावसायिक कार्य जानने के साथ-साथ थोड़ा बहुत पढ़ना-लिखना भी जानते हैं। आरपीएल-2 तकनीकी काम की अपेक्षाकृत बेहतर समझ रखने वालों को दिया जाएगा। इसके लिए उन्हें एसएससी के समक्ष एक कौशल टेस्ट देना होगा।
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ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

एक लम्हा जिंदगी का आते-आते टल गया.
चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

अब हवा चंदन की खुश्बू की तलब करती रहे
जिसको जलना था यहां पर सादगी से जल गया.

click to Read more: http://www.gazalganga.in/2012/09/blog-post_7.html#ixzz261tqwl6U

ग़ज़लगंगा.dg: चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.:

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खबरगंगा: खुश रहो न !

कई दिनों की बारिश के बाद बादल एकदम चुप से थे..न गरजना न बरसना ... ठंडी हवाएं जरुर रह-रह कर सहला जाती थी...धूली, निखरी प्रकृति की सुन्दरता अपने चरम पर थी ....मुझे पटना जाना था ...ट्रेन में खिड़की वाली सीट मिली (मेरा सौभाग्य )...हमारा सफ़र शुरू हुआ .... दूर तक पसरे हरे-भरे खेत, पेड़ो की  कतारें, बाग़-बगीचे दिखने लगे....मैं  बिलकुल 'खो' सी गयी थी ...कि एक जगह ट्रेन 'शंट' कर दी गयी...माहौल में ऊब और बेचैनी घुलने लगी.. बचने के लिए इधर-उधर देखना शुरू किया कि 'निगाहे' पटरी के पार झाड़ियों में कुछ खोजती औरत पर गयी.....इकहरा बदन ..सांवली रंगत...वह बेहद परेशान दिख रही थी ...पास ही बैठा उसका छोटा सा बच्चा रोये जा रहा था, पर वह, अपनी ही धुन में थी ...मुझे कुछ अजीब सा लगा इसलिए  उन्हें ध्यान से देखने लगी..अचानक उसके हाथ में एक सूखी टहनी नज़र आयी...अब उसके चेहरे पर राहत थी...धीरे-धीरे उसने कई लकड़ियों को इकट्ठा किया ...उसका गठ्ठर बनाया..बच्चे को उठाया और चली गयी...
खबरगंगा: खुश रहो न !:

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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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