क्या गरीब और आम व्यक्ति को इन प्रश्नों का कभी जबाब मिलेगा ?


दोस्तों, मेरी खुली चुनौती है कि-कुछ ऐसे प्रश्न जिनका जबाब किसी राज्य सरकार व मोदी सरकार के साथ ही क्षेत्रीय  पार्षद, विधायक और सांसद से नहीं मिल सकता हैं, क्योंकि यहाँ सब कुछ  गोल-माल या जुगाड़ है.

1. क्या दिल्ली में उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी नगर निगम और दिल्ली पुलिस (क्षेत्रीय थाना) को बिना रिश्वत दिए अपना मकान बनाना संभव है ? यदि हाँ  तो कैसे ?

 

2. यदि किसी गरीब और आम व्यक्ति की अपने क्षेत्रीय पार्षद, विधायक और सांसद से कोई जान-पहचान या अन्य किसी के द्वारा सम्पर्क (जुगाड़ या सिफारिश) नहीं है तो क्या वो व्यक्ति अपना मकान (निर्माण कार्य) नहीं बना सकता है?

 

3. यदि उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी नगर निगम और दिल्ली पुलिस का कहना है  कि ऐसा कुछ (रिश्वत का लेन-देन) नहीं है तो आज उत्तम नगर सहित पूरी दिल्ली में क्षेत्रीय पार्षद, विधायक और सांसद सहित सभी राजनैतिक पार्टियों के जानकार व्यक्तियों और बिल्डरों द्वारा किया जा रहा निर्माण कैसे हो रहा है?

 

4. यदि आप अगर नीचे से लेकर ऊपर तक उनका मुंह मीठा (रिश्वत का लेन-देन) न करवाओ तो क्या आपके मकान को गिरा दिया जाता है या निर्माण कार्य बंद नहीं  करवा दिया जाता है?

 

5. क्या पूरी दिल्ली के क्षेत्रीय पार्षद, विधायक और सांसद के साथ ही दिल्ली नगर निगम का कोई अधिकारी इसका जबाब देगा ?

 

यदि हम सूत्रों की बात माने तो पूरे उत्तम नगर के पिनकोड 110059 (जिस में चार विधानसभा का क्षेत्र आता है) में लगभग 2000 मकानों का अवैध निर्माण हो रहा है. इस तरह से पूरी दिल्ली में एक अनुमान के अनुसार लगभग डेढ़ लाख मकानों का निर्माण हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि-अपने मकानों का निर्माण करने के लिए आपकी ऊँची पहुँच होनी चाहिए, नहीं तो आप अपना मकान ही बना सकते हैं. अवैध निर्माण कार्यों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश केवल कागजों पर सिमटकर रह जाते हैं या किसी गरीब व आम व्यक्ति पर ही लागू होते हैं. जो बेचारा अपना पेट काट-काटकर एक-एक पैसा जोड़कर अपने लिए छत बनाने की कोशिश करता है. अपनी राजनीति चमकाने के लिए राजनैतिक पार्टियों को कुछ कालोनियां अवैध नजर आती है और उनके लिए विकास कार्य अवैध नजर आते हैं. लेकिन जब इनको वहां से वोट लेनी होती है तब उन अवैध कालोनियों में रहने वालों की वोट क्यों नहीं अवैध दिखती हैं ?

दोस्तों, मैं तो अपने क्षेत्र के सांसद, विधायक, चारों पार्षद से पूछ रहा हूँ. देखते हैं क्या कोई जबाब मिलेगा या नहीं ? आप भी पूछे (जब मौत एक दिन आनी है फिर डर कैसा? सौ दिन घुट-घुटकर मरने से तो एक दिन शान से जीना कहीं बेहतर है. मेरा बस यहीं कहना है कि-आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा. फिर क्यों नहीं तुम ऐसा करो कि तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनिया हमेशा याद रखें. धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य कर्म कमाना ही बड़ी बात है) और यदि इस पोस्ट का विषय सही लगा हो तो इस पोस्ट को शेयर करें.                                                                                             

(पार्षद-अंजू गुप्ता, मोहन गार्डन, वार्ड नं. 125)

 (पार्षद-नरेश बाल्यान, नवादा, वार्ड नं. 126)

(पार्षद-शिवाली शर्मा, उत्तम नगर, वार्ड नं. 127)

 (पार्षद-देशराज राघव, बिंदापुर, वार्ड नं. 128)




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नरेन्द्र भाई मोदी का प्रधानमंत्री बनना भारत में आए बड़े बदलाव का प्रमाण

कल 26 मई 2014 को नरेन्द्र भाई मोदी साहब ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उन्हें पिछड़ी जाति का सदस्य माना जाता है। उनका व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा जो भी हो लेकिन पिछड़ी जाति के व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना और हज़ारों साल से अपना वर्चस्व बनाए रखने वाली जातियों के सदस्यों का उनके अधीन काम करना एक बड़ा बदलाव है। यह बदलाव एक दिन में और किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं आया। 
आदरणीय गौतम बुद्ध ने, महावीर जैन ने, चार्वाक ने और बहुत से दूसरे सुधारकों ने सामाजिक न्याय के लिए वर्ण व्यवस्था को उखाड़ने का काम किया। उनके प्रयासों को विफल करने के लिए वर्ण व्यवस्था के रक्षकों ने उन्हें या तो बेअसर कर दिया या फिर उन्हें अपने अधीन ही कर लिया। जैन-बौद्धों के बेअसर होने के बाद जैसे ही वर्ण व्यवस्था ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं, तभी मानव की न्याय चेतना में समानता और आध्यात्मिकता के भाव को पुष्ट करने के लिए भारत में मुसलिम सूफ़ियों का आगमन हो गया। वर्ण व्यवस्था के समाानान्तर इसलाम भी हिन्दुंस्तान में अपनी पकड़ बनाता गया। मुसलिम शासकों की ग़ैर ज़िम्मेदारी और उनकी आपसी लड़ाई झगड़ों ने अंग्रेज़ों को भारत में शासन का अवसर दिया। अंग्रेज़ों ने वर्ण व्यवस्था, छूत-छात और ऊंच-नीच जैसी अमानवीय प्रथाओं को रोकने के लिए गंभीर प्रयास किए और इसके लिए उन्होंने हिन्दू समाज में से ही लोगों को खड़ा किया।
वर्ण व्यवस्था के रक्षक भी इन सुधारकों के प्रयास विफल करने के लिए कमर कस कर खड़े हो गए। स्वामी दयानन्द जी और स्वामी विवेकानन्द जी जैसे बहुत से लोगों ने और हिन्दू रजवाड़ों ने शास्त्रीय वर्ण व्यवस्था की रक्षा के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया लेकिन फिर भी वर्ण व्यवस्था ढह ही गई और ऐसी ढह गई कि वर्ण व्यवस्था के रक्षकों के उत्तराधिकारी अब समता और समरसता के लिए ख़ुशी ख़ुशी काम करते देखे जा सकते हैं। उन्हीं के एकजुट समन्वित प्रयासों के नतीजे में कल पिछड़ी जाति के एक व्यक्ति को सत्ता मिली और वेउसे ख़ुशी ख़ुशाी देखते रहने के लिए मजबूर थे.
भारत में आए इस बड़े बदलाव को देखकर हम भी ख़ुश हैं। वर्ण व्यवस्था ढह चुकी है। अब हरेक जाति का व्यक्ति योग्यता का विकास कर सकता है और अपनी योग्यता से वह सत्ता के किसी भी पद पर पहुंचकर समाज को अपनी सेवाएं दे सकता है। नरेन्द्र भाई मोदी साहब के शपथ ग्रहण को भारत के कायान्तरण के रूप में देखा जाना चाहिए। संकीर्ण सांप्रदायिक तत्व भारत के बदलाव को रोक नहीं सकते, फलतः अब वे इसके साथ बहकर ही कुछ लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जो लोग जो कुछ लाभ उठाएंगे, वह सब सामने आता ही रहेगा। ये अपनी चाल चल रहे हैं और ज़माना अपनी चाल चल रहा है और हम साक्षी भाव से दोनों को देख रहे हैं। 
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वालिद साहब की मौत पर सभी भाई बहनों से दुआ की दरख्वास्त है

कुल्लु नफ्सिन ज़ायक़तुल मौत -आल-क़ुर्'आन
हर जान को मौत का ज़ायक़ा चखना है.
हमारे वालिद जनाब मसूद अनवर ख़ान यूसुफ़ ज़ई साहब का इंतेक़ाल (देहावसान) हो गया है जुमा (26 अप्रैल 2014) और शनिवार (27 अप्रैल 2014)की दरमियानी रात मे 7:25 PM पर. उनकी उम्र तक़रीबन 69 साल थी. सब लोगों से दुआ और इसाले सवाब की दरख्वास्त है. उनकी नमाज़े जनाज़ा असगरिया मदरसा (न्यू बिल्डिंग) में मैने अदा करवाई जिसमे तक़रीबन 500 लोगों ने दुआ ए मगफ़िरत की 27 अप्रैल 2014 को 10:15 अम पर. उनकी तद्फीन हमारे ख़ानदानी क़ब्रिस्तान मे 10:30 AM पर हुई. 
इन्ना लिल्लाही व इन्ना इलैहि राजिऊन.
हम सब अल्लाह के हैं और हमें उसी की तरफ लौट जाना है.
उन्होंने एक अच्छे बाप की सारी ज़िम्मेदारियाँ निभाई हैं. हम अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं कि उसने हमें इतना अच्छा बाप दिया जिसने हमें शहज़ादों की तरह पाला और अपनी ताक़त की हद तक कभी किसी चीज़ की कमी महसूस न होने दी. इसी के साथ उन्होंने हमें हक़ीक़ी दुनिया में जिद्दोजहद करना भी सिखाया जो कि बेहतर मुस्तक़बिल के लिये एक लाज़िमी चीज़ है.
अल्लाह हमारे वालिद साहब की मगफ़िरत फ़रमाये और उन्हें अपने दीदार से नवाज़े और हमारे नेक आमाल को उनकी राहत का सामान बनाये.
हम अल्लाह से अल्लाह की रिज़ा चाहते है. हमारे वालिद साहब की तालीमो तरबियत जो उन्होंने अपने बेटे बेटियों को दी है, उसका नफ़ा सारी इंसानियत को पहुंचे. सबको मुहब्बत और अम्नो अमान नसीब हो, जिसके लिये हमारे वालिद साहब ज़िंदगी भर मेहनत करते रहे.

आमीन.

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भारत की ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ परंपरा-हरि मोहन

लिव इन रिलेशनशिप भारतीय समाज में हमेशा चर्चा का विषय रहा है। सामाजिक रूप से इसे आज भी स्वीकार नहीं किया जाता है। स्त्री का शादी के बगैर पुरुष के साथ रहना सामाजिक दृष्टि से पाप समझा जाता है। घर-परिवार और समाज में लिव इन रिलेशनशिप की बात उठाते ही इसे पश्चिमी देशों की नकल कह कर दरकिनार कर दिया जाता है।

समाजिक ढांचा आज भी यहीं मानता है कि जोड़ियां स्वर्ग से बनकर आती हैं। समाज में गहरी जड़ें जमा चुका यह बह्म सत्य शायद ही कभी टूट पाए! लेकिन, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारतीय समाज में लिव इन रिलेशनशिप( सहजीवन) से मिलती-जुलती परंपरा काफी पुराने वक्त से चली आ रही है। यह आज भी उसी रूप में समाज में विद्यमान है।

लिव इन रिलेशनशिप से मिलने-जुलने वाली यह परंपरा राजस्थान में आज भी कायम है। इस प्रथा का नाम है ‘नाता प्रथा’। राजस्थान की इस इस प्रथा के मुताबिक, कोई शादीशुदा पुरुष या महिला अगर किसी दूसरे पुरुष और महिला के साथ  अपनी इच्छा से रहना चाहती है तो वो अपने पति या पत्नी से तलाक लेकर रह सकती है। इसके लिए उन्हें एक निश्चित राशि चुकानी पड़ती है।

इस प्रथा में महिला और पुरुष के बच्चों और दूसरे मुद्दों का निपटारा पंचायत करती है। उन्हीं के निर्णय के हिसाब से तय किया जाता है कि बच्चे किसके साथ रहेंगे। ये इसलिए किया जाता है कि ताकि बाद में महिला या पुरुष के बिच किसी चीज़ को लेकर मतभेद न हो। वो अपनी जिंदगी अपनी पंसद के व्यक्ति या स्त्री के साथ आराम से काट सके।

राजस्थान में इस प्रथा का चलन ब्राह्मण, राजपूत और जैन को छोड़कर बाकी की जातियों में देखा जा सकता है। गुर्जरों में यह परंपरा यहां खासकर लोकप्रिय है। इस प्रथा से यहां के पुरुष और महिलाओं को तलाक के कानूनी झंझटों से छुटकारा तो मिलता ही है साथ  ही में अपनी पसंद का जीवन साथी के साथ रहने का हक भी मिल जाता है।

हालांकि, बदलते वक्त के साथ इस प्रथा में भी कई विसंगतियां आई हैं। इसका स्वरूप भी बदला है। कई बार तो इस प्रथा की आड़ में महिलाओं को दलालों के हाथों बेचने का घिनौना खेल भी खेला जाता है।

कलर्स चैनल के बहुचर्चित सीरियल ‘बालिका वधू’ में भी इस प्रथा को दिखाया गया है। इस नाटक में आनंदी की सहेली फूली का विवाह इसी नाती प्रथा के तहत उसके देवर के साथ होता है। इस नाटक में दिखाया गया है कि कैसे यह नाता प्रथा जो उजड़ चुके लोगों को फिर से सामाजिक रूप में जीवन जीने का अवसर प्रदान करती है।

अगर किसी स्त्री या पुरुष को किसी दूसरे स्त्री या पुरुष से प्यार है तो नाता प्रथा उसके लिए बेहतर विकल्प है। घर वाले अगर किसी लड़की की जबर्दस्ती कहीं और शादी करवा भी देते हैं तो वो लड़की नाता प्रथा का यूज अपने प्रेमी के साथ रहने के लिए कर सकती है।

इसके लिए उसे निश्चित रकम चुकानी पड़ती है। शादी के बाद भी अगर कोई स्त्री किसी दूसरे पुरुष से प्यार करने लगती है और उसके साथ रहना चाहती है तो वो नाता प्रथा के तहत उसके साथ अपनी इच्छा से रह सकती है।
साभार : http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/How-to-choose-candidate-for-the-PM-of-India/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95-live-in-relationship-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B01
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श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?-Dr. Anwer Jamal

चाय के ठेले पर विकास पुरूष

के बाद अब एक अहम सवाल
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
सांप्रदायिक तत्व धर्म के झंडे लेकर चलते हैं लेकिन मक़सद अपने पूरे करते हैं जो कि धर्म के खि़लाफ़ होते हैं। इसीलिए ये धार्मिक सत्पुरूषों को पीछे धकेलते रहते हैं।
राम मंदिर का मुददा गर्माने और भुनाने वाालों ने प्रधानमंत्री पद के लिए रामचन्द्र जी के वंश में से किसी का नाम आगे क्यों नहीं बढ़ाया?
क्या इन सांप्रदायिक तत्वों को श्री रामचन्द्र जी की सन्तान में कोई योग्य व्यक्ति ही नज़र नहीं आया या फिर उन्हें गुमनामी के अंधेरे में धकेलने वाले यही तत्व हैं?
रामकथा के अनुसार सारी धरती मनु को दी गई थाी और इसी उत्तराधिकार क्रम में यह श्री रामचन्द्र जी को मिली थी लेकिन आज उनके उत्तराधिकारी वंशजों के नाम दुनिया वाले तो क्या स्वयं भारत में उनके श्रद्धालु भी नहीं पहचानते।
श्री रामचन्द्र जी के साथ यह अन्याय क्यों?
यही बात मुसलमानों को भी समझ लेनी चाहिए कि उनके लीडर किसी दीनदार आलिम को अपना रहबर क्यों नहीं मान लेते?
इसके पीछे भी यही कारण है कि ये लीडर दीन के मक़सद को नहीं जो कि अमन और भाईचारा है बल्कि अपने लालच को पूरा करने में जुटे हुए हैं।
चुनाव का मौक़ा इन मौक़ापरस्तों को पहचानने का महापर्व होता है। जनता इन्हें अच्छी तरह पहचान रही है।
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क्या असर लाएंगी ‘यूज़ एंड थ्रो’ के शिकार बुज़ुर्गों की तेज़ाबी बद-दुआएं?

चुनाव की लहर है या यों कहें कि ज़हर की लहर है। हर तरफ़ किसी न किसी नेता का गुणगान किया जा रहा है। इतना भी चलता तो ग़नीमत था। उससे ज़्यादा बुरा यह है कि विरोधी प्रत्याशियों को गालियां दी जा रही हैं, उन्हें पाकिस्तानी एजेन्ट तक बताया जा रहा है। अगर वाक़ई भारत में कोई पाकिस्तानी एजेन्ट चुनाव लड़ रहा होता तो क्या हमारी इन्टेलीजेन्स और चुनाव आयोग उसके खि़लाफ़ कोई कार्रवाई क्यों न करता?
इसका मतलब यह है कि यह एक झूठ है, जिसे नेता पद की गरिमा से गिरकर बोला गया है। झूठ और धोखा किसी धर्म और संस्कृति का अंग नहीं है लेकिन फिर भी चुनाव के दौरान झूठ और धोखेबाज़ी की घटनाएं उफ़ान पर आ जाती हैं। भारत जैसे धार्मिक देश में झूठ और धोखेबाज़ी की ऊंची लहर को देखना उनके लिए कष्टदायक है, जिन्हें देश से प्यार है और जो मानवता को एक और नेक देखना चाहते हैं।
नफ़रत और जातिवादी भावनाएं भड़काकर ख़ून ख़राबा कराने वाले देश के ग़ददारों को इससे कोई मतलब नहीं होता कि उनकी वजह से देशवासियों का कितना जानोमाल तबाह हुआ। पूंजीपति और सामन्तवादी इनके पुराने आक़ा हैं। ये अपनी छिनी हुई शक्ति को फिर से केवल अपने हाथों में सीमित कर लेना चाहते हैं। अपनी ख़ुदग़र्ज़ी को इन्होंने संस्कृति और राष्ट्रवाद के आवरण से ढक दिया है।
इनका सीधा सा गणित है कि देश का भला चाहने वालों को जाति-धर्म के नाम पर बांट दो। फिर अगड़ों के साथ पिछड़ो को जोड़कर आगे बढ़ो और अपने ही जैसे सत्तालोभियों और दल-बदलुओं से सौदेबाज़ी करके राज्य और केन्द्र की सत्ता क़ब्ज़ा लो। इसके बाद सत्ता की मलाई को समुद्र मंथन में निकले अमृत की तरह अपने आक़ाओं को इकतरफ़ा ही सौंप दो। ब्याजख़ोर पूंजीपति की पूंजी और क़र्ज़ में दबे ग़रीब की ग़रीबी को और बढ़ा दो। तोंद वाले व्यापारियों की हवस के लिए पिचके गाल वाले ग़रीबों का आत्महत्या करना इनके लिए चिंता का विषय नहीं है।
हज़ारों लाखों मासूमों का ख़ून नेता कहलाने वाले इन मुजरिमों के ज़िम्मे है लेकिन हर तरफ़ जनता इनकी जय जयकार कर रही है।
ख़ून ख़राबे के दाग़ी मुल्ज़िमान को चुनावी सभाओं में जनता से सम्मान पाते देखकर यक़ीन हो जाता है कि भारत की जनता आज भी बच्चों जैसी भोली है।
चुनाव के दौरान एक होड़ सी मच जाती है कि भोली जनता को कौन सा नेता कितना ज़्यादा भड़काता है?
कहीं कहीं ये नेता ख़ुद ही भडक जाते हैं, जब इनके प्यादे रहे नेता इनका टिकट रूपी पत्ता ही साफ़ कर देते हैं। अब भुगतो, तुमने ही इन्हें सिखाया है कि राजनीति में केवल अपना फ़ायदा देखो, दूसरों की भावनाएं नहीं। इस चुनाव में अनुभवी बुड्ढ़े अपनी आहत भावनाएं लिए लंगड़ा लंगड़ा कर चलते देखे जा सकते हैं। अपमानित होकर अब ये अपने सम्मान के लिए लड़ते हुए देखे जा सकते हैं। ये पहले जिस दल को जिताने के लिए लड़ते थे अब उसे हराने के लिए खड़े हैं।
जनता के साथ छल करने वाले हरेक नेता को मरने से पहले अपमानित होना ही पड़ेगा। यह प्रकृति का नियम है।
हमें किसी व्यक्ति या पार्टी से सरोकार नहीं है लेकिन आदर और शालीनता के साथ भी अपने विरोधी की आलोचना की जा सकती है। दुनिया के सभ्य देशों में चुनाव में ऐसा ही होता है। भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए बल्कि यहां दूसरे देशों से बढ़कर सभ्यता के दर्शन होने चाहिएं। इसके लिए जनता को संयम से काम लेना चाहिए।
जाति, धर्म और क्षेत्र की भावनाएं भड़काने वाले सांप्रदायिक तत्व देशवासियों का भला नहीं करते। यह एक हक़ीक़त है। जनता को इन्हें अपना नेता कभी नहीं चुनना चाहिए, चाहे ये किसी भी धर्म, जाति और प्रांत के हों।
ये भड़काऊ नेता जहां पैदा होते हैं, वहां इन्होंने अपनी कमाई के पैसे से कोई जनता की भलाई का कोई काम नहीं किया होता है। इसीलिए ये दूसरे अजनबी इलाक़ों से खड़े होकर चुनाव लड़ते हैं। पूंजीपति माफ़िया इनके लिए अपना धन ख़र्च करते हैं। जिसे बाद में वे सूद समेत वुसूल करते रहते हैं। सत्ता इस दल की बने या उस दल की, इनके माल में अरबों खरबों रूपये का इज़ाफ़ा होना ही है और पिसना ग़रीब जनता को है। इसलिए वोट देते समय निजी फ़ायदे और जाति-धर्म को न देखकर चुनाव में खड़े उम्मीदवार के कैरेक्टर को ज़रूर देख लें कि उस कोई दाग़ तो नहीं लगा है।
जनता ही आपस में एक दूसरे के काम आती आई है और आती रहेगी। देश की जनता को आपसी एकता को चुनाव के नाज़ुक दौर में बचाकर रखने की ज़रूरत आम दिनों से कहीं ज़्यादा है। पहर भर की लहर है, उसके बाद ये भी ऐसे ही ‘यूज़ एंड थ्रो’ के शिकार हो जाएंगे जैसे कि आज उनके बुज़ुर्ग हो रहे हैं। अपने बड़ों की बद-दुआएं लेकर ये कभी फल नहीं सकते और उनके बड़े उन्हें बद-दुआओं के सिवा कुछ और दे नहीं सकते। वे भी वही बांट रहे हैं जो कि उन्हें मिला है।

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सामाजिक रुढिवाद की देन है हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष-Jagadishwar Chaturvedi


इस्लामिक दर्शन और धर्म की परंपराओं के बारे में घृणा के माहौल को खत्म करने का सबसे आसान तरीका है मुसलमानों और इस्लाम धर्म के प्रति अलगाव को दूर किया जाए। मुसलमानों को दोस्त बनाया जाए। उनके साथ रोटी-बेटी के संबंध स्थापित किए जाएं। उन्हें अछूत न समझा जाए। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को निर्मित करने लिए जमीनी स्तर पर विभिन्न धर्मों और उनके मानने वालों के बीच में सांस्कृतिक -सामाजिक आदान-प्रदान पर जोर दिया जाए। अन्तर्धार्मिक समारोहों के आयोजन किए जाएं। मुसलमानों और हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक अलगाव को दूर करने के लिए आपसी मेलजोल,प्रेम-मुहब्बत पर जोर दिया जाए। इससे समाज का सांस्कृतिक खोखलापन दूर होगा,रूढ़िवाद टूटेगा और सामाजिक परायापन घटेगा।
भारत में करोड़ों मुसलमान रहते हैं लेकिन गैर मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों को यह नहीं मालूम कि मुसलमान कैसे रहते हैं,कैसे खाते हैं, उनकी क्या मान्यताएं, रीति-रिवाज हैं। अधिकांश लोगों को मुसलमानों के बारे में सिर्फ इतना मालूम है कि दूसरे वे धर्म के मानने वाले हैं । उन्हें जानने से हमें क्या लाभ है। इस मानसिकता ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के सामाजिक अंतराल को बढ़ाया है। इस अंतराल ने संशय,घृणा और बेगानेपन को पुख्ता किया है।
मुसलमानों के बारे में एक मिथ है कि उनका खान-पान और हमारा खान-पान अलग है, उनका धर्म और हमारा धर्म अलग है। वे मांस खाते हैं, गौ मांस खाते हैं। इसलिए वे हमारे दोस्त नहीं हो सकते। मजेदार बात यह है कि ये सारी दिमागी गड़बड़ियां कारपोरेट संस्कृति उद्योग के प्रचार के गर्भ से पैदा हुई हैं।
सच यह है कि मांस अनेक हिन्दू भी खाते हैं,गाय का मांस सारा यूरोप खाता है। मैकडोनाल्ड और ऐसी दूसरी विश्वव्यापी खाद्य कंपनियां हमारे शहरों में वे ही लोग लेकर आए हैं जो यहां पर बड़े पैमाने पर मुसलमानों से मेलजोल का विरोध करते हैं। मीडिया के प्रचार की खूबी है कि उसने मैकडोनाल्ड का मांस बेचना, उसकी दुकान में मांस खाना, यहां तक कि गौमांस खाना तो पवित्र बना दिया है, लेकिन मुसलमान यदि ऐसा करता है तो वह पापी है,शैतान है ,हिन्दू धर्म विरोधी है।
आश्चर्य की बात है जिन्हें पराएपन के कारण मुसलमानों से परहेज है उन्हें पराए देश की बनी वस्तुओं, खाद्य पदार्थों , पश्चिमी रहन-सहन,वेशभूषा, जीवनशैली आदि से कोई परहेज नहीं है। यानी जो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर फैलाते हैं वे पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के अंधभक्तों की तरह प्रचार करते रहते हैं। उस समय उन्हें अपना देश,अपनी संस्कृति,देशी दुकानदार,देशी माल,देशी खानपान आदि कुछ भी नजर नहीं आता। अनेक अवसरों पर यह भी देखा गया है कि मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने वाले पढ़े लिखे लोग ऐसी बेतुकी बातें करते हैं जिन्हें सुनकर आश्चर्य होता है। वे कहते हैं मुसलमान कट्टर होता है। रूढ़िवादी होता है। भारत की परंपरा और संस्कृति में मुसलमान कभी घुलमिल नहीं पाए,वे विदेशी हैं।
मुसलमानों में कट्टरपंथी लोग यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान तो भारत के विजेता रहे हैं।वे मुहम्मद बिन कासिम,मुहम्मद गोरी और महमूद गजनवी की संतान हैं। उनकी संस्कृति का स्रोत ईरान और अरब में है। उसका भारत की संस्कृति और सभ्यता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन सच यह नहीं है।
सच यह है कि 15वीं शताब्दी से लेकर आज तक भारत के सांस्कृतिक -राजनीतिक-आर्थिक निर्माण में मुसलमानों की सक्रिय भूमिका रही है। पन्द्रहवीं से लेकर 18वीं शताब्दी तक उत्तरभारत की प्रत्येक भाषा में मुसलमानों ने शानदार साहित्य रचा है। भारत में तुर्क,पठान अरब आदि जातीयताओं से आने शासकों को अपनी मातृभाषा की भारत में जरूरत ही नहीं पड़ी,वे भारत में जहां पर भी गए उन्होंने वहां की भाषा सीखी और स्थानीय संस्कृति को अपनाया। स्थानीय भाषा में साहित्य रचा। अपनी संस्कृति और सभ्यता को छोड़कर यहीं के होकर रह गए। लेकिन जो यहां के रहने वाले थे और जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया था उनको अपनी भाषा बदलने की जरूरत महसूस नहीं हुई। जो बाहर से आए थे वे स्थानीय भाषा और संस्कृति का हिस्सा बनकर रह गए।
हिन्दी आलोचक रामविलास शर्मा ने लिखा है मुसलमानों के रचे साहित्य की एक विशेषता धार्मिक कट्टरता की आलोचना, हिन्दू धर्म के प्रति सहिष्णुता,हिन्दू देवताओं की महिमा का वर्णन है। दूसरी विशेषता यहाँ की लोक संस्कृति,उत्सवों-त्यौहारों आदि का वर्णन है। तीसरी विशेषता सूफी-मत का प्रभाव और वेदान्त से उनकी विचारधारा का सामीप्य है।
उल्लेखनीय है दिल्ली सल्तनत की भाषा फारसी थी लेकिन मुसलमान कवियों की भाषाएँ भारत की प्रादेशिक भाषाएँ थीं। अकबर से लेकर औरंगजेब तक कट्टरपंथी मुल्लाओं ने सूफियों का जमकर विरोध किया। औरंगजेब के जमाने में उनका यह प्रयास सफल रहा और साहित्य और जीवन से सूफी गायब होने लगे। फारसीयत का जोर बढ़ा। 
भारत में ऐसी ताकतें हैं जो मुसलमानों को गुलाम बनाकर रखने ,उन्हें दोयमदर्जे का नागरिक बनाकर रखने में हिन्दू धर्म का गौरव समझती हैं। ऐसे संगठन भी हैं जो मुसलमानों के प्रति अहर्निश घृणा फैलाते रहते हैं। इन संगठनों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव का ही दुष्परिणाम है कि आज मुसलमान भारत में अपने को उपेक्षित,पराया और असुरक्षित महसूस करते हैं।
जिस तरह हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन सक्रिय हैं वैसे ही मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति घृणा पैदा करने वाले संगठन भी सक्रिय हैं। ये एक ही किस्म की विचारधारा यानी साम्प्रदायिकता के दो रंग हैं।
हिन्दी के महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने हिन्दू-मुस्लिम भेद को नष्ट करने के लिए जो रास्ता सुझाया है वह क़ाबिले ग़ौर । उन्होंने लिखा-‘‘ भारतवर्ष में जो सबसे बड़ी दुर्बलता है ,वह शिक्षा की है। हिन्दुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाय। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों,दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढ़ें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से प्रसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिन्दुओं को संकोच न होगा। इसके बिना,दृढ़ बंधुत्व के बिना ,दोनों की गुलामी के पाश नहीं कट सकते,खासकर ऐसे समय ,जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है।’’ 
भारत में मुसलमान विरोध का सामाजिक और वैचारिक आधार है जातिप्रथा,वर्णाश्रम व्यवस्था। इसी के गर्भ से खोखली भारतीयता का जन्म हुआ है जिसे अनेक हिन्दुत्ववादी संगठन प्रचारित करते रहते हैं। जातिप्रथा के बने रहने के कारण धार्मिक रूढ़ियां और धार्मिक विद्वेष भी बना हुआ है।
भारत में धार्मिक विद्वेष का आधार है सामाजिक रूढ़ियाँ। इसके कारण हिन्दू और मुसलमानों दोनों में ही सामाजिक रूढ़ियों को किसी न किसी शक्ल में बनाए रखने पर कट्टरपंथी लोग जोर दे रहे हैं। इसके कारण हिन्दू-मुस्लिम विद्वेष बढ़ा है। सामाजिक एकता और भाईचारा टूटा है। हिन्दू-मुसलमान एक हों इसके लिए जरूरी है धार्मिक -सामाजिक रूढ़ियों का दोनों ही समुदाय अपने स्तर पर यहां विरोध करें।
हिन्दू-मुस्लिम समस्या हमारी पराधीनता की समस्या है। अंग्रेजी शासन इसे हमें विरासत में दे गया है। इस प्रसंग में निराला ने बड़ी मार्के की बात कही है। निराला का मानना है हिन्दू मुसलमानों के हाथ का छुआ पानी पिएं,पहले यह प्राथमिक साधारण व्यवहार जारी करना चाहिए। इसके बाद एकीकरण के दूसरे प्रश्न हल होंगे।
निराला के शब्दों में हिन्दू-मुसलमानों में एकता पैदा करने के लिए इन समुदायों को ‘‘वर्तमान वैज्ञानिकों की तरह विचारों की ऊँची भूमि’’ पर ले जाने की जरूरत है। इससे ही वे सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होंगे। 

Jagadishwar Chaturvedi

: साभार फ़ेसबुक


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होली का भाव और प्रभाव holi 2014

होली के अवसर पर सभी पाठकों को शुभकामनायें. होली आती है और भक्त प्रह्लाद की याद दिलाती है. हालात कितने ही विपरीत हों और शत्रु कितना ही बलशाली क्यों न हो लेकिन अगर आपका विश्वास है कि आपका पालनहार आपका रक्षक और सहायक है तो फिर उसकी मदद आयेगी और हर जगह आयेगी. हज़रत इब्राहीम अलैहिस-सलाम को भी अल्लाह के नाशुक्रे और मुनकिर बादशाह ने बहुत तेज़ आग जलवा कर उसमें फिकवा दिया था लेकिन अल्लाह ने उन्हें बचा लिया. होली महज़ रंगों का त्यौहार ही नहीं है बल्कि यह इस बात को जानने और जांचने का भी अवसर है कि हम ईश्वर-अल्लाह पर कितना भरोसा रखते हैं?
इस बात का पता इससे चलेगा कि जब हमारे सामने कठिनाईयाँ आती है तब हम उस दयालु डाटा से शिकवा तो नहीं करने लगते या फिर मायूसी का शिकार तो नहीं हो जाते ?
होली की यह मूल भावना मन में न रहे तो हुडदंगी लोग होली को अनुशासन और संयम के बन्धन तोड डालने का दिन बनकर रख देते हैं जोकि धर्म और अध्यात्म दोनों के खिलाफ है. धर्म और नैतिकता जिन लोगों का स्वभाव है, उनके लिये होली पुरानी स्मृति को ताज़ा करती है और उनका नैतिक उत्थान करती है.
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गोडसे और गांधी, तमसो मा ज्योतिर्गमय Nathuram Godse and Gandhi

मोहनदास कर्मचन्द गांधी को कल हिन्दुस्तानियों ने याद किया। वह एक राष्ट्रवादी नेता थे। 30 जनवरी 1948 को उन्हें नाथूराम गोडसे ने गोली मार दी थी। वह भी एक राष्ट्रवादी था। गांधी और गोडसे दोनों ही राष्ट्रवादी थे लेकिन दोनों में अंतर था। गांधी जी को उदारता, शांति और सकारात्मकता के लिए जाना चाहता है जबकि गोडसे को संकीर्णता, आतंक और नकारात्मकता के लिए। 
आज हमारे बीच न गांधी जी हैं और न ही गोडसे लेकिन सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्ति वाले लोग आज भी हमारे बीच हैं और हम ख़ुद भी इनमें से किसी एक टाइप के इंसान हैं। सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्ति के बीच संघर्ष और रस्साकशी आज भी जारी है। सकारात्मकता विचारधारा के अंतर को उदारता के साथ स्वीकार करती है और भिन्न मत वालों को उनकी मान्यताओं के साथ जीने का हक़ देती है जबकि नकारात्मकता न अंतर को स्वीकार करती है और न ही विरोध को बर्दाश्त करती है। इसी संकीर्णता की अंतिम परिणति हत्या में होती है। सो नाथूराम गोडसे ने मोहनदास कर्मचन्द गांधी को क़त्ल कर दिया। गांधी जी को आज भी दुनिया उनके विचारों के कारण याद करती है। उनके विचार ग़लत हो सकते हैं, तब भी उनसे जीने का हक़ छीन लेना किसी नागरिक के लिए जायज़ नहीं है।
गोडसे को जायज़ ठहराने वाले कुछ लोग भी समाज में पाए जाते हैं लेकिन ये भी उसी की तरह नकारात्मक से भरे हुए लोग हैं। ये बीमार ज़हनियत के लोग हैं। समय आ रहा है जबकि ये भी सबके लिए जीने के हक़ को मान ही लेंगे जैसे कि इन्होंने जातीय पवित्रता और श्रेष्ठता को त्यागकर समानता और समरसता को अपना लिया है। समय अपने तेज़ धारे में बहाए ले जा रहा है और इनके नारे, नेता और नीतियां लगातार बदलती जा रही हैं।
यह सब हम और आप देख ही रहे हैं। फ़िलहाल यह लेख देखिए-
महात्मा को भूल गई है आज की राजनीति
महात्मा गांधी को लेकर भारतीय समाज और राजनीति ने कई तरह से विमर्श किया है। लेकिन अजीब बात यह है कि भारत की कट्टर सांप्रदायिक राजनीति के दो परस्पर विरोधी ध्रुवों की महात्मा गांधी के बारे में धारणा एक-सी है। दोनों गांधी को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के आखिरी दौर में उन्हें मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन कहा जाने लगा था। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने तो यहां तक कहा था कि गांधी ने कांग्रेस को हिंदू पुनरोत्थान का औजार बना दिया है। दूसरी तरफ, द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के पहले प्रवर्तक वीर सावरकर ने जून 1944 में गांधीजी पर आरोप लगाया कि वह भारत में मुस्लिम राज कायम करना चाहते हैं, भले ही यह अफगान राज हो। सावरकर ने लिखा था- क्या खुद गांधी ने अली बंधुओं के साथ मिलकर पठानों द्वारा अफगानिस्तान पर हमले की साजिश नहीं रची थी? दूसरे हिंदू विचारक बालकृष्ण शिवराज मुंजे ने 1938 में लिखा था- जब से महात्मा का उदय हुआ और उनकी तानाशाही कांग्रेस में बढ़ी है, कांग्रेस ने ऐसा रवैया अपना लिया है, जिसे हिंदुओं के हितों की कीमत पर मुस्लिम समर्थक मानसिकता कहा जा सकता है।
इस सांप्रदायिक वैचारिक ढोल को लगातार पीटने से ही वह माहौल बना, जो असल में गांधीजी की हत्या के लिए जिम्मेदार था। यही बात सम्यक ढंग से सरदार पटेल ने एक पत्र में लिखी थी- उनके (आरएसएस) सारे भाषणों में सांप्रदायिक जहर भरा है और इसी जहरीले वातावरण में एक स्थिति ऐसी बनी, जिससे यह भयानक दुर्घटना (गांधीजी की हत्या) हो सकी। 1947 से पहले मुस्लिम सांप्रदायिकता ने देश की एकता को तोड़ने का निंदनीय प्रयास किया था और आजादी के बाद हिंदू सांप्रदायिकता ने भारतीय राष्ट्रीयता के सामने चुनौतियों के पहाड़ खड़े कर दिए। सांप्रदायिकता का यह जहर वहीं रुका नहीं। गांधीजी की मृत्यु 30 जनवरी, 1948 को हुई थी, पर उनकी आत्मा को तो हमने कई बार छलनी किया। भागलपुर, मलियाना, हाशिमपुरा से लेकर 1992 के बाबरी विध्वंस और 2002 के गुजरात दगों तक इसकी सूची बहुत लंबी है। हाल में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के वक्त वहां कोई गांधीवादी नेता विस्थापितों के बीच बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, मगर महात्मा गांधी ने आजादी मिलने के तुरंत बाद इसके समारोहों में शामिल होने से जरूरी यह समझा कि नोआखली जाकर दंगों की आग को फैलने से रोका जाए।
गांधी के जाने के बाद उनके सत्याग्रह और आंदोलनों का जैसे चरित्र भी बदल गया। जहां चौरीचौरा में हिंसा के बाद उन्होंने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था, वहीं आज के दौर के आंदोलन और सत्याग्रहों की शुरुआत हिंसा व आक्रामक शैली से हो रही है। गांधी हमेशा साधन और मन की पवित्रता की बात करते थे, महात्मा को सच्ची श्रद्धांजलि इस राह को अपनाना ही है।
- के सी त्यागी, राज्यसभा सदस्य
एक बात यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि नाथूराम गोडसे अंग्रेज़ी ड्रेस में है जबकि गांधी जी भारतीय संस्कृति का परिचय देने वाले कपड़ों में खड़े हैं। नाथूराम गोडसे और उसके समर्थकों द्वारा अंग्रेज़ी लिबास पहनकर भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता में विश्वास जताना छल-फ़रेब के सिवा कुछ भी नहीं है। यह धोखा वह दूसरों से ज़्यादा ख़ुद को देते आ रहे हैं और ख़ुद से ख़ुद ही धोखा खाते आ रहे हैं।
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ख़ुशी की कलियों की खेती कैसे करें ? Happiness

हम जब चाहे तब ख़ुश हो सकते हैं, जितना चाहे उतना ख़ुश हो सकते हैं और जब तक चाहे तब तक ख़ुश रह सकते हैं। 
हमें ख़ुश करने वाला अगर कोई है तो वह हम ख़ुद हैं।
हमें कोई हादसा दुख नहीं दे सकता। हमें कोई आदमी दुखी नहीं कर सकता। अगर हमें कोई दुखी कर सकता है तो वह हम ख़ुद ही हैं।
हम अपने आप को नहीं जानते। हम अपने मन को और अपने मन की भावनाओं को नहीं जानते। हम अपने मन के काम करने के तरीक़े को नहीं जानते। इसीलिए हम दुख पाते हैं।
हम बार बार दुख पाते हैं। बार बार दुख पाने से दुखी रहना हमारी आदत बन जाती है और फिर जिस चीज़ की हमें आदत होती है, वही चीज़ हमारी तरफ़ आकर्षित होती रहती है। दुख हमें पहचान लेते हैं और ख़ुशियां हमसे रूठ जाती हैं।
हम अपने भाग्य के लिए कभी ईश्वर को और कभी अपनी सरकारों को दोष देते रहते हैं लेकिन हक़ीक़त इसके खि़लाफ़ है। हमारे दुख का कारण हमारे बाहर नहीं है बल्कि हमारे अंदर है, हमारे मन में है। अरबी में मन को ‘नफ़्स‘ कहते हैं।
हमें 30 साल से ज़्यादा अर्सा हो गया है इस मन यानि नफ़्स पर रिसर्च करते हुए और इसके करिश्मे देखते हुए। अब भी देख रहे हैं।
आप भी देख रहे हैं और जो चाहे वह देख सकता है कि जब एक आदमी को अफ़ीम, चरस, भांग या शराब की आदत पड़ जाती है तो वह जिस शहर में जाता है। उसे वह चीज़ उसी शहर में उपलब्ध हो जाती है।
अगर आपको दुख प्राप्त हो रहे हैं तो इससे आपके सोचने के पैटर्न का पता चलता है।
अगर आप ख़ुशी चाहते हैं तो आपको अपने सोचने के पैटर्न को चेंज करना पड़ेगा। आपको ख़ुश रहने की प्रैक्टिस करनी पड़ेगी। बार बार की प्रैक्टिस से ख़ुश रहना आपकी आदत बन जाएगी और तब ख़ुशियां आपकी तरफ़ आकर्षित होंगी और दुख आपसे रूठ जाएगा।
आप ख़ुश रहेंगे तभी आपके जीवन में ख़ुशी का अहसास कराने वाली घटनाएं होंगी और आप हरेक हादसे से सलामत रहेंगे।
आप सोचते हैं कि पहले ख़ुशी की घटनाएं हों तब मैं ख़ुश होऊंगा। जबकि तत्वज्ञानी आरिफ़ बन्दे जानते हैं कि ख़ुशी की घटनाएं तब होंगी और पै दर पै होंगी जब आप ख़ुश रहने के आदी हो जाएंगे।
अक्सर लोग यह नहीं जानते और जो जान लेते हैं, उनमें से भी बहुत कम लोग ख़ुश रहने का अभ्यास कर पाते हैं। जो कर लेते हैं, वे ख़ुश रहते हैं।
ख़ुशी का अभाव होते ही दुख आ धमकता है। यहां प्रकृति ख़ाली जगह को भरती रहती है।
आप दुख को दूर करना चाहते हैं तो पल भर में कर सकते हैं। आप अपने दिल को ख़ुशी से भर लीजिए। आपका दुख दूर हो जाएगा। यह सहज है।
हम ऐसे ही करते हैं। आप भी ऐसे ही कर लीजिए।
अक्सर लोग कहते हैं कि हम ख़ुश कैसे रह सकते हैं जबकि हमारी आमदनी कम है, हमारे ख़र्चे ज़्यादा हैं, हमारा घर बंटकर पहले से छोटा हो गया है, हमारे घर का एक मेम्बर बीमार है, हमारी जान को मुक़द्दमा लगा हुआ है।
ये सब तो हमारे साथ भी लगे हुए हैं। इसके बावुजूद हम ख़ुश हैं क्योंकि हम जान गए हैं कि यह सब हमारी ग़लत सोच के नतीजे में हुआ है और जब हमने उसे सुधार लिया है तो अब ये सारे हालात भी बदल जाएंगे। हालात बहुत बदल चुके हैं और लगातार बदलते जा रहे हैं।
यहां अल्लाह पर ईमान काम आता है। यहां दुआ काम आती है।
हम निर्बल हैं लेकिन हमारा रब सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। हम उससे अपने भले की दुआ कर सकते हैं और उसे पूरी कर सकता है।
अल्लाह हमारी दुआओं को हमेशा से पूरा करता आ रहा है। अल्लाह हमारे साथ है। हमारे ख़ुश रहने की यह वजह सबसे बड़ी वजह है।
अपनी ग़लतियों, अपनी नादानियों और दुश्मनों की कारगुज़ारियों की वजह से जब हम परेशानियों से घिर से गए और हमारे दिल में ऐसे विचार आने लगे कि यह जीना भी कोई जीना है। इससे तो अच्छा है कि मर जाएं।
तब भी हम मर नहीं पाए क्योंकि अल्लाह को आत्महत्या नापसंद है।
जब हमने अपनी बीवी को तलाक़ देने का पक्का इरादा कर लिया तब भी हम उसे तलाक़ नहीं दे पाए क्योंकि अल्लाह को जायज़ कामों से सबसे ज़्यादा नापसंद तलाक़ देना है।
जो काम अल्लाह को नापसंद है, वह हम कर नहीं सकते। हमारा जीना-मरना उसी की ख़ुशी के लिए है।
अल्लाह हमें राह दिखाता है। अल्लाह बुराई से हमारी हिफ़ाज़त करता है। अल्लाह हमारे दिल को बुरे इरादों और बुरी सोच से पाक करता है। निराशा, अवसाद और नकारात्मकता अल्लाह के बंदे के दिल में आ नहीं सकती और अगर कभी किसी के दिल में आ जाए तो वह ठहर नहीं सकती।
हम अल्लाह के दिखाए रास्ते पर आगे बढ़ते रहे और वह हमारा कल्याण करता रहा, हमारा भला करता रहा।
हमने जितनी दौलत उससे मांगी उसने दी। हमने उससे जो चीज़ मांगी, उसने दी। उसने माध्यम बनाकर भी चीजें दीं और उसने ग़ैब से भी दीं बिना किसी ज़ाहिरी ज़रिये के। उसने रात के अंधेरे में हमें ग़ैब से ‘गैस का ग़ुब्बारा‘ दिया। यह बचपन की घटना है जब हम तक़रीबन चार साल के थे और सर्दी की रात में ज़िद कर रहे थे।
बचपन की ही दूसरी घटना वह है जब हमारी दादी के पैसे खोए गए। उन्होंने कुरआन की सूरत ‘अश्-शम्स‘ पढ़कर दुआ की तो हमने हवा में से पैसे फ़र्श पर गिरते हुए देखे और फिर यही हमारे बेटे के साथ हुआ। उनके साथ दो बार हुआ जब कि ग़ैब से उनके मांगने पर पैसे हवा से गिरे।
चलती हुई आंधियों को जब हम रोकना चाहते हैं तो दुआ करते हैं। वे रूक जाती हैं। वे हमारे बचपन में भी रूक जाती थीं और आज भी रूक जाती हैं।
अगर आप चमत्कार की दुआ करेंगे तो आपके साथ चमत्कार ही होगा।
हमं निर्बल हैं लेकिन हमारा रब समर्थ है। उसकी सामर्थ्य अनंत है। आप अनंत सामर्थ्य वाले का ध्यान कीजिए। आपको ख़ुशी मिलेगी और ख़ुशी मिलते ही आपके दुखों का अंत हो जाएगा।
यह सरल है। यह तुरंत हो सकता है। अगर आपका दुख दूर हो जाता है तो आपके लिए इससे बड़ा चमत्कार क्या होगा ?
यह सबसे बड़ा चमत्कार आप ख़ुद कर सकते हैं।
आप जीतने के लिए पैदा हुए हैं। आप जीत सकते हैं।
‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘
अगर आप जीत सकते हैं तो फिर आप जीतते क्यों नहीं हैं ?
आप ख़ुद भी जीतिए और अपने परिवार को भी जीतना सिखाईये।
इसके बाद किसी रोज़ हम आपको ‘दौलत की खेती‘ करना सिखाएंगे। तब तक आप अपने मन की भूमि पर ख़ुशी की कलियां खिलाईये, ख़ुशी के फूलों की खेती कीजिए। जब आपका मन हरा भरा हो जाएगा तो ख़ुशहाली आपकी तरफ़ ख़ुद ही दौड़ी चली आएगी।
 
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महात्मा गांधी से भी ऊंचा एक व्यक्तित्व khan abdul gaffar khan

जब भी संघर्ष और वह भी जेल में रहकर संघर्ष करने की बात आती है, तो हम या तो महात्मा गांधी को याद करते हैं या नेल्सन मंडेला को या फिर आंग सान सू की को। गांधी को छह-सात वर्ष तक जेल में रहना पड़ा, सू की को 15 वर्ष तक और नेल्सन मंडेला को 27 वर्ष तक। लेकिन यह सब खान अब्दुल गफ्फार खान के संघर्ष के सामने कुछ नहीं, जिन्होंने अपने जीवन के पूरे 42 साल ब्रिटिश राज और फिर पाकिस्तान की जेलों में गुजार दिए। जेल में उनके समान कष्ट और यातनाएं भी किसी ने नहीं झेलीं। सरहदी सूबे की जेलों में तो अक्सर पैरों में लोहे की बेड़ी बंधी रहती थी। बादशाह खां और सीमांत गांधी जैसी उपाधियों से नवाजे गए खान अब्दुल गफ्फार खां ने अपने भाई के साथ मिलकर कभी पठान सीमा प्रांत में खुदाई खिदमतगारों की एक बड़ी अहिंसक फौज खड़ी की थी। 1942 के आंदोलन में जब गांधी के नेतृत्व के बावजूद हिन्दुस्तानी अहिंसक नहीं रह सके, तब पठानों ने अपनी अहिंसा कायम रखी। इस पर गांधी की टिप्पणी थी कि अहिंसा बहादुरों का हथियार है, बुजदिलों का नहीं और पठान एक बहादुर कौम है, वह अहिंसा का पालन करने में समर्थ हो सकी।
अहिंसा की शिक्षा बादशाह खां ने गांधी से नहीं, कुरान से ग्रहण की थी। वह उस दौर के बाकी लोगों से ज्यादा राष्ट्रवादी थे। राजेंद्र प्रसाद जब संविधान सभा के अध्यक्ष बने, तो उनके स्वागत में आठ भाषण दिए गए। इनमें सें सात ने अंग्रेजी में बोलना उचित समझा। अकेले बादशाह खान ही थे, जो हिन्दुस्तानी में बोले। बादशाह खान ने जीवन भर कांग्रेस का साथ दिया था। आजादी की लड़ाई में पठानों ने कांग्रेस को शक्तिशाली बनाया। पठान कांग्रेस के साथ इस वायदे पर थे कि हिन्दुस्तान के आजाद होने के साथ-साथ पठानों को भी आजादी मिलेगी। पर जब समय आया, तो पठानों की इच्छा के विरुद्ध उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान के साथ कर दिया गया। मुस्लिम लीग को वे चुनावी शिकस्त पहले ही दे चुके थे। पठानों के सामने विकल्प, हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के बीच का नहीं, बल्कि पाकिस्तान और पख्तूनिस्तान के बीच रखा जाना चाहिए था। जो नहीं हुआ। कांग्रेस के नेताओं का मानना था कि वे परिस्थितियों के अधीन थे।

बादशाह खान का सवाल था कि ये परिस्थितियां किसने पैदा कीं। एक तरफ बादशाह खान पूरी तरह से विभाजन के विरोधी थे, तो दूसरी ओर सभी राष्ट्रीय नेताओं को विभाजन स्वीकार्य था। गांधी जैसे व्यक्ति भी इसे मूक-दर्शक बनकर देखते रहे। बादशाह खान अकेले पड़ गए थे। सच तो यह है कि स्वतंत्रता की लड़ाई के आखिरी दौर में बादशाह खान ही सत्य, अहिंसा और भाईचारे के एकमात्र प्रतिनिधि थे। यहां वे गांधी से भी ऊपर उठ जाते हैं। इंदिरा गांधी ने तो उनके लिए यहां तक कहा, ‘बादशाह खान के दयालु व्यक्तित्व से आशा की जा सकती है कि वे हमारी विफलताओं को क्षमा कर पाएंगे।’
-उदय प्रकाश अरोड़ा, ग्रीक चेयर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
हिन्दुस्तान दिनांक 20-01-2014, पेज 10 से साभार
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उर्दू अदब को समझना किया आसान संजीव सराफ़ ने


नई दिल्ली। उर्दू शायरी के नाम वेबसाइट 'रेख्ता' ने एक साल में ही लोगों के बीच खास जगह बना ली है। उन लोगों के लिए यह खास है जो उर्दू के ज्यादा जानकार नहीं, मगर उर्दू की मिठास के कायल हैं। शनिवार को रेख्ता की सालगिरह के मौके कई नामी शायर और उर्दू के कद्रदां इकट्ठा हुए। 
'रेख्ता', उर्दू शायरी की एक बड़ी वेबसाइट है। उर्दू से गहरा लगाव रखने वाले उद्योगपति संजीव सराफ इसके फाउंडर हैं। इस जश्न के मौके पर केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद बतौर चीफ गेस्ट मौजूद थे। साथ ही सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया के चेयरमैन यू.के. सिन्हा, फिल्मकार मुजफ्फर अली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व वाइस चांसलर सय्यद शाहिद मेहदी, लेखक शम्सुरर्हमान फारूकी, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नायर, प्रो. शमीम हनफी, उद्योगपति कमल मोरारका, दिल्ली उर्दू अकादमी के चेयरमैन अख्तरउल वासे भी प्रोग्राम में शामिल हुए। 
एक साल पूरे होने के मौके पर वेबसाइट को नया लुक भी दिया गया है। साथ ही, नया कलेक्शन भी अपडेट किया गया है। सादत हसन मंटो के फैंस को यहां उनकी सभी कहानियां मिलेंगी। वेबसाइट में 651 उर्दू शायरों की सात हजार गजलें और नज्में हैं। इस वेबसाइट का सबसे नायाब पहलू यह है कि इसमें उर्दू शायरी को देवनागरी और रोमन लिपियों में भी पेश किया गया है। वेबसाइट को अब तक 154 देशों के करीब ढाई लाख लोग देख चुके हैं।
एक रिपोर्ट साभार
नोट: नई बात यह है कि किसी भी शब्द का अर्थ जानने के लिए बस उस पर क्लिक करना काफ़ी है. देखें-
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