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गुड खाना और गुलगुलों से परहेज करना

जब जब भारत देश में हिंदी दिवस आता है तब एक दिन के लिए कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार हिंदी का गुणगान करते नजर आते हैं और अपनी टिप्पणी/विचारों को ऐसे व्यक्त करते हैं. जैसे उन से ज्यादा बड़ा तो कोई हिंदी प्रेमी इस भारत वर्ष में कोई हैं ही नहीं. उसके बाद 364 दिन हिंदी को अपनी दुश्मन के समान समझते हैं. हिंदी के बड़े-बड़े कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार आदि अपने नाम को सोशल वेबसाईट (फेसबुक,गूगल,ट्विट्टर आदि) पर (अपनी प्रोफाइल में) हिंदी में लिखना तक पसंद नहीं करते हैं, क्योंकि कहीं लोग उनको "अनपढ़ और गंवार" ना समझे.
काश ! हमारे देश के सभी बुद्धिजीवी भी हिंदी के प्रति पूरे ईमानदार होकर ज्यादा से ज्यादा हिंदी का प्रयोग करते हुए अपनी सभी बातें/विचार/रचना हिंदी में फेसबुक/टिवटर आदि पर डाले. तब कुछ हिंदी की स्थिति में सुधार संभव है. आज हिंदी की इतनी बुरी स्थिति हिंदी के चाहने वालों की वजह से है. कई तो कहते हैं कि हम हिंदी से अपनी माँ जितना प्यार करते है.मगर फेसबुक/टिवटर आदि पर अपने विचार/बातें/रचनाएँ अंग्रेजी या रोमन लिपि में डालते हैं यानि गुड खाते हैं और गुलगुलों से परहेज करते हैं. 

 मैंने कई अवसरों पर देखा है कि कई कलाकार (अभिनेता / अभिनेत्री), पत्रकार, कवि और साहित्यकार आदि कमाई तो हिंदी की खाते हैं और जब सोशल वेबसाइट पर अपना स्टेटस (गरिमा) दिखाने के लिए हिंदी से मुँह छुपाते नजर आते हैं. इसमें एक आध अपवाद छोड़ दें, क्योंकि कई लोगों फेसबुक आदि पर हिंदी लिखने से संबंधित जानकारी नहीं होती है. वरना.....अधिकांश के पास समय ही नहीं होता है, क्योंकि हिंदी लिखने के लिए थोड़ी ज्यादा मेहनत और समय की जरूरत है.
फेसबुक  प्रयोगकर्त्ताओं के लिए जानकारी:-
प्रश्न:-मुझे देवनागरी में नाम लिखने से सर्च करने में परेशानी होती है....इसलिए मैंने रोमन में लिखा हुआ है.....जो भी नाम देवनागरी में लिखे हैं, वो सर्च करने पर नहीं मिलते हैं.  
उत्तर:-अपनी प्रोफाइल में हिंदी में नाम कैसे लिखें:-आप सबसे पहले "खाता सेट्टिंग " में जाए. फिर आप "नेम एडिट" को क्लिक करें. वहाँ पर प्रथम,मिडिल व लास्ट नाम हिंदी में भरें और डिस्प्ले नाम के स्थान पर अपना पूरा नाम हिंदी में भरें. उसके बाद नीचे दिए विकल्प वाले स्थान में आप अपना नाम अंग्रेजी में भरने के बाद ओके कर दें. अब आपको कोई भी सर्च के माध्यम से तलाश भी कर सकता है और आपका नाम हर संदेश और टिप्पणी पर देवनागरी हिंदी में भी दिखाई देगा. अब बाकी आपकी मर्जी. हिंदी से प्यार करो या बहाना बनाओ.

पूरा लेख यहाँ  सिरफिरा-आजाद पंछी: गुड खाना और गुलगुलों से परहेज करना पर क्लिक करके पढ़ें.
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हिंदी अति सरल और मीठी भाषा हैं

 युधवीर सिंह लाम्बा भारतीय का कहना कि-हिंदी अति सरल और मीठी भाषा हैं। हिंदी भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। तभी तो देश के बाहर भी हिंदी ने अपना स्थान बना सकने में सफलता हासिल किया है। फ़िजी, नेपाल, मोरिशोस, गयाना, सूरीनाम यहाँ तक चाइना और रसिया में भी हिंदी अच्छी तरह बोली और पढ़ी जाती है।
*हिन्दी के प्रभाव और क्षमता को अब विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियां भी सलाम कर रही है। विश्व में मोबाइल की सबसे बड़ी कंपनी नोकिया ने हाल ही लन्दन में अपने तीन नए मॉडल बाजार में उतारे। आपको ये जानकर खुशी होगी कि इन तीनो मॉडल्स को कंपनी ने हिन्दी का नाम दिया है। इन्हें अमेरिका, यूरोप और एशिया यानी पूरी दुनिया में आशा-300 और आशा-200 मॉडल के फोन लांच किए जाएंगे।
*अटल बिहारी वाजपयी वे पहले भारतीय थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ (1977) में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था। (अटल बिहारी वाजपयी 1977 में विदेश मंत्री थे)
*जुरासिक पार्क जैसी अति प्रसिध्द हॉलीवुड फ़िल्म को भी अधिक मुनाफ़े के लिए हिंदी में डब किया जाना जरूरी हो गया । इसके हिंदी संस्करण ने भारत में इतने पैसे कमाए जितने अंग्रेजी संस्करण ने पूरे विश्व में नहीं कमाए थे ।
*अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 114 मिलियन डॉलर की एक विशेष राशि अमरीका में हिंदी, चीनी और अरबी भाषाएं सीखाने के लिए स्वीकृत की है । इससे स्पष्ट होता है कि हिंदी के महत्व को विश्व में कितनी गंभीरता से अनुभव किया जा रहा है ।
*हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
*बह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन ने भी हिन्दी का समर्थन किया था।
* गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए 'जन-भाषा' हिन्दी सीखने का आग्रह किया ।
*गुजराती भाषा-भाषी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मराठी-भाषा-भाषी चाचा कालेलकर जी को सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने का आदेश दिया।
*सुभाषचंद्र बोस की 'आजाद हिन्द फौज' की राष्ट्रभाषा हिन्दी ही थी।
*श्री अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे।
* नागरी लिपि के प्रबल समर्थक न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र ने तो ई. सन् 1910 में यहां तक कहा था - यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ, 'साधु हिन्दी' में वार्तालाप करूंगा।
* अहिन्दी-भाषी-मनीषियों में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था।
*अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े 'हम एफ-एम' ,जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
पूरा लेख यहाँ पर क्लिक करके पढ़ें.
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"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"




"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"

बहुत पुराना है नारा ;

हकीकतन इससे सबने

पर कर लिया किनारा |



वो औद्योगीकरण के नाम पे,

जंगल के जंगल उड़ाते हैं;

पेड़ काट के नई इमारतों का,

अधिकार दिए जाते हैं |



नीति कुछ ऐसी है-

"जंगल हटाओ, विकास रचाओ !" 

पर कहते हैं जनता से,

"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"
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आबो हवा


नहीं रहा अब

दुनिया पे यकीन,
भरोसे जैसी कोई
अब चीज कम है ;
बदल गये लोग
बदल गई मानसिकता,
बदल गई सोच
खतम हुई नैतिकता ;
हमने ही सब बदला
और कहते हैं आज
कि अच्छी नहीं रही
अब आबो हवा |
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रावण दहन


खुद ही बनाते हैं, खुद ही जलाते हैं,
यूँ कहें कि हम अपनी भड़ास मिटाते हैं |

समाज में रावण फैले कई रूप में यारों,
पर उनसे तो कभी न पार हम पाते हैं |

रावण दहन के रूप में एक रोष हम जताते हैं,
समाज के रावण का खुन्नस पुतले पे दिखाते हैं |

उसी रावण की तरह होता है हर एक रावण,
पुतले की तरह हर रावण को हम ही उपजाते हैं |

हर भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी एक रावण ही तो है,
यहाँ तक कि हम सब अपने अंदर एक रावण छुपाते हैं |

इन सब से मुक्ति शायद बस की अब बात नहीं,
इसलिए रावण दहन कर अपनी भड़ास हम मिटाते हैं |
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अनपढ़ और गंवारों के समूह में शामिल होने का आमंत्रण पत्र

दोस्तों, क्या आप सोच सकते हैं कि "अनपढ़ और गँवार" लोगों का भी कोई ग्रुप इन्टरनेट की दुनिया पर भी हो सकता है? मैं आपका परिचय एक ऐसे ही ग्रुप से करवा रहा हूँ. जो हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु हिंदी प्रेमी ने बनाया है. जो अपना "नाम" करने पर विश्वास नहीं करता हैं बल्कि अच्छे "कर्म" करने के साथ ही देश प्रेम की भावना से प्रेरित होकर अपने आपको "अनपढ़ और गँवार" की संज्ञा से शोभित कर रहा है.अगर आपको विश्वास नहीं हो रहा, तब आप इस लिंक पर "हम है अनपढ़ और गँवार जी" जाकर देख लो. वैसे अब तक इस समूह में कई बुध्दिजिवों के साथ कई डॉक्टर और वकील शामिल होकर अपने आपको फक्र से अनपढ़ कहलवाने में गर्व महसूस कर रहे हैं. क्या आप भी उसमें शामिल होना चाहेंगे?  फ़िलहाल इसके सदस्य बहुत कम है, मगर बहुत जल्द ही इसमें लोग शामिल होंगे. कृपया शामिल होने से पहले नियम और शर्तों को अवश्य पढ़ लेना आपके लिए हितकारी होगा.एक बार जरुर देखें.
हिंदी मैं नाम लिखने की भीख मांगता एक पत्रकार- 
मुझ "अनपढ़ और गँवार" नाचीज़(तुच्छ) इंसान को ग्रुप/समूह के कितने सदस्य अपनी प्रोफाइल में अपना नाम पहले देवनागरी हिंदी में लिखने के बाद ही अंग्रेजी लिखकर हिंदी रूपी भीख मेरी कटोरे में डालना चाहते है.किसी भी सदस्य को अपनी प्रोफाइल में नाम हिंदी में करने में परेशानी हो रही हो तब मैं उसकी मदद करने के लिए तैयार हूँ. लेकिन मुझे प्रोफाइल में देवनागरी "हिंदी" में नाम लिखकर "हिंदी" रूपी एक भीख जरुर दें. आप एक नाम दोंगे खुदा दस हजार नाम देगा. आपके हर सन्देश पर मेरा "पंसद" का बटन क्लिक होगा. दे दो मुझे दाता के नाम पे, मुझे हिंदी में अपना नाम दो, दे दो अह्ल्ला के नाम पे, अपने बच्चों के नाम पे, अपने माता-पिता के नाम पे. दे दो, दे दो मुझे हिंदी में अपना नाम दो. पूरा लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.
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दो पल की खुशियाँ

खुशियों भरा जीवन अब मिलता है कहाँ,
चैन-सुकून हर पल अब रहता है कहाँ,
जीवन हर वक़्त लिए एक छड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

संघर्ष ही जीवन का दूसरा नाम हो गया है,
कठिनाइयों का आना तो अब आम हो गया है,
किस्मत हर वक़्त मुह बाये खड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

भागते ही हम रहते हैं श्वांस भी न लेते,
जीवन को सिद्दत से हम जी भी न लेते,
हम सबको हर वक़्त लगी हड़बड़ी होती होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

कल क्या होगा किसी ने देखा भी नहीं,
निरंतर खुशियों की कोई रेखा भी नहीं,
जिंदगी भी तो बस घड़ी दो घड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |
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हिंदी हिन्दुस्तान है


हिंदी मेरी जान है,

भारत की पहचान है ;
भारत भाल की बिंदी है,
निज भाषा अभिमान है |

खत्री से बच्चन तक ने,
सींचा जिसे वो प्राण है;
संस्कृत के वृक्ष से निकली,
अद्भुत भाषा महान है |

देश को जोड़े एक सूत्र में,
मधुर-सी एक तान है;
है इसका समृद्ध-साहित्य,
हिन्द की ये शान है |

हिंदी ही पूजा है सबकी,
हिंदी ही अजान है;
होली, दीवाली हिंदी है,
हिंदी ही रमजान है |

देश को विकसित कर सकती,
हिंदी गुणों की खान है;
हिंदी अहित है देश अहित,
हिंदी हिन्दुस्तान है |
हिंदी हिन्दुस्तान है |
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राष्ट्रभाषा हिंदी


हिंदी बस एक मात्र नहीं यह मातृभाषा है;
गर्व है मुझको हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा  है |

बिन निज भाषा उन्नति के, राष्ट्र का विकास नहीं;
परदेशी भाषा के बल पे, हो सकता कुछ खाश नहीं |

राष्ट्रभाषा जब हिंदी है, फिर अंग्रेजियत छोड़ दो;
हिन्दुस्तान में रहते हो, तो दोहरी नियत छोड़ दो |

हिंदी को अधिकार मिले, हर कोने में प्रयोग हो,
संसद में, हर राज्यों में, परदेश में भी उपयोग हो |

हिंदी जन-जन की भाषा, जन-जन तक इसका प्रचार हो;
भारत के हर क्षेत्र में पहुंचे, ऐसे नेक विचार हो |

भारत का हर एक वासी, हिंदी का सम्मान करे;
हर कोई सीखे, हर कोई बोले, नहीं कोई अपमान करे |

हिंदी को बना भारत की बिंदी, इसे सर्वत्र चमकाना है;
हर निजी, सरकारी काज में, हिंदी ही अपनाना है |

बुरा नहीं हर भाषा जानो, पर हिंदी ही सर्वोपरि हो;
हो ज्ञान भले हर भाषा का, पर निज भाषा सर्वोपरि हो |
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काव्य का संसार


अनुपम, अक्षय होता है ये काव्य का संसार,
अखिल जगत में अकथ, अकाय और निराकार |


साहित्य की यह विधा अनूठी, पद्य भी कहाय,
हृदय से उत्थित, सरस शब्दों में उकेरा जाय |


भावों की ये मंजूषा, मञ्जीर, मधुर मानिक,
मुतक्का साहित्य का दृढ, मनन करो तनिक |


अमरसरित सी पावन, जनश्रुत ये अपार,
अद्भूत, असम, अनुरक्त है ये काव्य का संसार |


(शब्दार्थ: मञ्जीर=मनोहर, मुतक्का=खम्भा,
अमरसरित=गंगा, जनश्रुत=प्रसिद्द, अनुरक्त=प्रेम युक्त )
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आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

आपके दोस्त का एक और रूप
हम ब्लोगिंग जगत के "अजन्मे बच्चे"( अभी तो अजन्मा बच्चा हूँ मेरे दोस्तों !) हैं और ब्लोगिंग जगत का अनपढ़, ग्वार यह नाचीज़ इंसान का अभी जन्म ही नहीं हुआ है. अभी हम ब्लोगिंग जगत का क.ख.ग सिखने की कोशिश कर रहा हूँ. इसलिए मेरे लिए खासतौर पर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में लिखी गयी टिप्‍पणी पढना मुश्किल कार्य है, इसलिए जिस पोस्‍ट में भी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी  में टिप्‍पणी होती हैं. मैं उसको पढता ही नहीं. हाँ, कभी-२ मेरी पोस्‍ट पर होती है.उसे कैसे न कैसे करके पढता हूँ.जब कभी-२ समय होता है तब उसका देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में अनुवाद भी कर देता हूँ.  इसको दूसरों को भी पढ़ने में कठिनाई होती है.
                   इस बात को सभी ब्लोग्गरों को भी समझना चाहिए। जब आपके विचारों और भावनाओं को कोई समझ ही नहीं पाता है. तब अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का क्या फायदा. मुझे बार-बार गूगल transliteration पर जाकर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को टाईप करना पड़ता है. फिर कापी पेस्ट करता हूँ. मुझे इसी सुविधा की आदत है. बहुत से ब्लॉग पर "हिंदी वर्जन का विजेट " लगा हुआ होता है लेकिन हर ब्लॉग पर ज्यादात्तर नही होता. तब कापी पेस्ट करने में टाईम बहुत लगता है. मगर मै ज्यादात्तर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में ही टिप्पणी करता हूँ.कभी-कभी समय न होने की वजय से ही ज्यादा से ज्यादा 11शब्दों की टिप्पणी रोमन लिपि में करता हूँ. अगर कोई  ओर तरीका हो तो मुझे अवश्य बताए, क्योंकि ऐसा तब ही संभव हो पाता है. जब इन्टरनेट पर नेटवर्क सही से आ रहा हो.
           मै खुद को देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में ही सहज(अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में) समझता हूँ. मै चाहता हूँ कि-सब ब्लॉगर अपने-अपने ब्लोगों पर 'हिंदी वाला विजेट' अपने ब्लॉग पर लगाए और तकनीकी ज्ञाता मुझे मेरे ब्लोगों पर लगाने में मदद करें. मुझे देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में लिखी टिप्पणी पढने में असुविधा होती है.बहुत ज़रूरी ना हो तो मैं भी पढने से टालने की कोशिश करता हूँ. मेरे कंप्यूटर का कीबोर्ड अंग्रेजी में है, किन्तु देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को साफ्टवेयर(गूगल transliteration) में टाईप करके टिप्पणीयां पेस्ट करता हूँ. मै हर संभव कोशिश करता हूँ कि-टिप्पणी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में हो, जब मुझे खुद दूसरो द्वारा देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में की गयी टिप्पणिया पढने में परेशानी होती है. फिर दूसरों को कितनी दिक्कत होती होगी?  मुझे दूसरो द्वारा देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में की गयी टिप्पणिया सुहाती ही नहीं है. यह मेरे दिल के यही ज्जबात है बल्कि किसी का कोई अपमान करने का कोई उद्देश्य नहीं है. क्या हम अंग्रेजी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करके अपने को ज्यादा पढ़ा-लिखा होने का दिखावा नहीं करते हैं? किसलिए और किसके लिए इतना दिखावा? 
              मुझे कभी-कभी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में टिप्पणिया व्यावहारिक(कुछ व्यक्ति हिंदी लिपि में विचारों और भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं) समस्यायों के चलते करनी पड़ती है.जैसे-मोबाईल पर संदेश आदि. वैसे ज्यादात्तर मोबाईल पर संदेश हिंदी लिपि की रोमन लिपि में ही भेजता हूँ. मुझे हिन्दी लिपि के ब्लॉग पर हिन्दी लिपि में ही टिप्पणी अच्छी लगती है और हिंदी लिपि को ही पढने में आनंद आता है. हमारी कथनी और करनी में स्वार्थी राजनीतिकों जैसा फर्क नहीं होना चाहिए.
           आज मेरे प्रकाशन परिवार में सबसे ज्यादा हिंदी लिपि की पत्र-पत्रिकाएँ, लेटर पैड, बिलबुक, प्रचार सामग्री, विजिटिंग कार्ड, मेरे समाचार पत्रों को रजिस्टर्ड करने की कार्यवाही के फॉर्म, शपथ पत्र, समाचार पत्रों के पंजीकरण प्रमाण पत्र आदि, विज्ञापन रेट कार्ड व बुकिंग फॉर्म, रबड़ की मोहरें, समाचारों पत्रों में हिंदी लिपि के विज्ञापन के रेट कम है और अंग्रेजी के ज्यादा है और सबसे ज्यादा हिंदी लिपि में विज्ञापन प्रकाशित हुए है. अपने क्षेत्र से दो बार चुनाव लड़ने की प्रक्रिया के फॉर्म, शपथ पत्र आदि सब हिंदी लिपि में भर कर दे चुका हूँ.  इसके साथ ही अनेकों ऐसी सामग्री भी हिंदी लिपि में है. जो किसी तक अपने विचार और भावना समझाने में सहायक होती है. 

       इन्टरनेट की दुनिया में जनवरी 2010 में प्रवेश करने के मात्र सात-आठ महीने की मेहनत से ही अपनी ईमेल, ब्लॉग, ऑरकुट और फेसबुक की प्रोफाइल आदि की सभी सैटिंग हिंदी लिपि में  ही कर रखी है.ऑरकुट और फेसबुक पर "रमेश कुमार सिरफिरा(Ramesh Kumar Sirfiraa" के नाम से मौजूद हूँ. आज तक लगभग 992 लोगों को ईमेल हिंदी लिपि में भेज चुका हूँ और  अनेकों ब्लोगों पर लगभग 1100  टिप्पणी हिंदी लिपि में कर चुका हूँ. अपने ब्लोगों पर लगभग 20000 शब्दों को हिंदी लिपि में लिख चुका हूँ. अपने  उपरोक्त ब्लॉग  पर  अन्य  व्यक्तियों  को  हिंदी लिपि सिखाने के उद्देश्य से दो पोस्ट हिंदी की टाइपिंग कैसे करें  और  हिंदी में ईमेल कैसे भेजें. पोस्ट  भी  लिखी  थीं. 
         अपनी पत्नी के डाले फर्जी केसों से संबंधित लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में लिखकर न्याय व्यवस्था के अधिकारियों को लिखकर दे चुका हूँ और आने वाले दो महीनों में लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में लिखकर देने वाला हूँ. इसके अलावा जब से मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज हुए तब से पत्नी को समझने के उद्देश्य से लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में बोल चुका हूँ.
           प्रेम विवाह होने से पहले अपनी पत्नी को लगभग 2000 शब्द
हिंदी लिपि लिखकर दे चुका था और लगभग 20000 शब्दों का उच्चारण हिंदी लिपि में कर चुका हूँ.  इसके साथ ही मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज  होने के बाद से हिंदी लिपि के लगभग 200000  क़ानूनी शब्दों को ब्लॉग पर और लगभग 200000 क़ानूनी शब्द अखवार और मैगजींस में पढ़ चुका हूँ.इसके साथ ही हिंदी लिपि के टी.वी चैनलों पर धारा 498A और 406 की चर्चाओं(बहस आदि) में लगभग 200000शब्द और अपने दोस्तों/रिश्तेदारों से उलाने(ताने) के रूप में लगभग 20000 शब्द अपने कानों से सुन चुका हूँ. 
        इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात अपने मात्र साढ़े तीन साल के वैवाहिक जीवन में अपनी पत्नी और सुसराल वालों से लगभग 200000अपशब्द हिंदी लिपि के और 200 अंग्रेजी में सुन चुका हूँ.अब तक लगभग दो करोड़ शब्द हिंदी लिपि के अपनी पत्रकारिता(समाचार पत्र-पत्रिकाओं में) के चलते लिख चुका हूँ और प्रकाशित हो चुके हैं. लगभग दो लाख शब्द हिंदी लिपि के कुव्यवस्था  के चलते शिकायती पत्रों में लिख चुका हूँ और अन्य व्यक्तियों की मदद करने के उद्देश्य से लगभग दो लाख शब्द हिंदी लिपि के उनके शिकायती पत्र और किसी कार्य से जुड़े फोरमों में लिख चुका हूँ. अर्थात पढ़ता हिंदी लिपि हूँ. लिखता हिंदी लिपि हूँ. सुनता हिंदी लिपि हूँ. खाता हिंदी लिपि हूँ, पहनता हिंदी लिपि  हूँ और बोलता भी हिंदी लिपि में हूँ. मुझे इस पर गर्व है कि-मुझे अंग्रेजी नहीं आती है. 
               एक बार आप भी गर्व से कहों हम सच्चे भारतीय है. हिंदी लिपि को लेकर आज मुझ में एक ही कमी है कि 10-11दिन पहले ही एक दोस्त ने मुझे इन्टरनेट पर चैटिंग(वार्तालाप, बातचीत) करनी सिखाई है, वो  मुझे जानकारी न होने की वजह से देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में लिखनी पड़ती हैं. जानकारी प्राप्त होते ही हिंदी लिपि  में बातचीत शुरू कर दूंगा. ऐसा मेरा दृढ संकल्प है.  
आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें
आज सभी हिंदी लिपि ब्लॉगर भाई यह शपथ लें कि-हम आज के बाद  हिंदी लिपि और अन्य लिपियों के ब्लोगों को पढने के बाद भी अपनी टिप्पणी हिंदी लिपि में ही करूँगा और हिंदी लिपि ब्लोगिंग जगत को उंचाईयों पर पहुँचाने के लिए हिंदी लिपि के प्रति ईमानदार बना रहूँगा.अपने ब्लॉग का नाम (शीर्षक) हिंदी लिपि में लिखूँगा. जय हिंद! 
  
नोट : दोस्तों, मैंने अब इनस्क्रिप्ट के माध्यम से  देवनागरी की लिपि द्वारा हिंदी लिखना सीख लिया है और बीस हजार शब्द भ्रष्ट व्यवस्था को लिखकर भेज चुका हूँ. इसके साथ ही ऑरकुट व फेसबुक पर हिंदी में चैटिंग करनी और युटुब पर विडियों लोड करना भाई शाहनवाज सिध्द्की जी ने करनी सिखा दी है. इसके लिए उनका धन्यवाद करता हूँ. यह पोस्ट अपने ब्लॉग पर बहुत पहले लिखी थीं.  
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क्यों सोचते तुम हो अकेले

क्यों सोचते
तुम हो अकेले 
वो भी साथ तुम्हारे
जो नाम तुम्हारा
नफरत से लेते
दिन रात तुम्हें कोसते
चर्चे शहर में करते
चाहते नहीं तो क्या
निरंतर याद तो करते
जो भी  है दिल में
साफ़ साफ़ बताते 
बेहतर हैं उनसे
जो अपना तो कहते
दिल में जहर रखते 
भूले से याद ना करते
देख कर मुस्काराते
पीछे से मुंह चिडाते
इधर हाथ मिलाते
उधर खंजर मारते
24-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर4
497—167-03-11
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मेरी खुशी में शामिल हो जाओ,आज दिल की दीवाली है

मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
चिट्ठी उनकी आयी ,
आज बात मतवाली है
पैमाना सब्र का भर 
गया था
छलकने से पहले ही
याद उनको आयी है
बहुत ज़ख्म दिए उन्होंने
अब मलहम लगाने की 
ख्वाइश है 
बहुत रो लिए थे हम
अब आंसू पोंछने की बारी है
निरंतर इंतज़ार करते थे हम
अब मिलने की बारी है
मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
482—152-03-11
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उनकी किसी चीज़ को नहीं छेड़ता


वो अब
नहीं दुनिया में
फिर भी हैं पास मेरे
कमरे में जिस्म से नहीं
मगर अहसास से साथ मेरे
पर्दों से लेकर दीवारों में 
बसतीं 
बिस्तर की सलवटें,
तकिये पर कुछ बाल उनके
अब भी साथ मेरे
पहने अनपहने कपडे,
सौन्दर्य प्रसाधन
उन्हें मुझ से दूर ना 
होने देते
उनका चश्मा,पसंदीदा 

किताबें
अब भी उनकी चाहत 

दर्शाती
लगता कोई पसंद 

की पंक्ति
अब सुनाने वाली
चाबियों का झुमका,
बड़ा सा पर्स,सुन्दर 
चप्पलें
बाहर चलने का आमंत्रण 

देती
उनकी बातें कानों में 

गूंजती
हर चीज़ उनकी खुशबू से
महकती
कभी प्यार जताना
कभी प्यार से झिडकना
कहाँ भूलता
कमरे में रहना मुझे 

अच्छा लगता
हर तरफ उन्हें पाता
जिस्म से तो दूर हुयीं
रूह से दूर ना जाएँ
निरंतर कामना करता
जो चीज़ जैसी रख कर गयीं
 वैसे ही रहने देता
डरता हूँ, छेड़ने पर 
नाराज़ हो
कमरे से ना चले जाएँ
इस लिए उनकी
किसी चीज़ को नहीं
छेड़ता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
476—146-03-11
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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    14 years ago

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