आज हाई प्रोफाइल मामलों को छोड़ दें तो किसी अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट
(FIR) दर्ज करा लेना ही एक "जंग" जीत लेने के बराबर है. आज के
सम.......पूरा लेख यहाँ रमेश कुमार सिरफिरा: जब प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज न हो पर क्लिक करके पढ़ें.
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फिर खुल जाएगी एक खुली हुई हक़ीक़त
अरविन्द केजरीवाल की अक्ल बड़ी है और उस से
भी कई गुना बड़ा है उनका फैसला . उनकी लड़ाई का फायदा लेने के लिए जो अब तक
उनके हक में चिल्ला रहे थे , वे अब अन्ना टीम के राजनीति में आने के फैसले
को गलत बता रहे हैं . अगर अन्ना टीम हारती है तो इसका मतलब यही होगा कि अन्ना जिस जनता के लिए लड़ रहे हैं उसे भ्रष्टाचार के बजाय जातिगत और सांप्रदायिक हितों की चिंता है.
अन्ना टीम की हार जीत भारतीय जनता के मिज़ाज की हक़ीक़त भी सामने ले आने वाली है.
ग़ज़लगंगा.dg: हमने दुनिया देखी है
भूल-भुलैया देखी है.
हमने दुनिया देखी है.
उतने की ही बात करो
जितनी दुनिया देखी है.
हमने झिलमिल पानी में
अपनी काया देखी है.
तुमने मन के उपवन में
सोनचिरईया देखी है?
उसको देख नहीं पाया
उसकी माया देखी है.
इक मुद्दत के बाद यहां
इक गोरैया देखी है.
लहरों में हिचकोलें खाती
डगमग नैया देखी है.
ग़ज़लगंगा.dg: हमने दुनिया देखी है:
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बिटिया
बाँहे फैलाए तुझे , बिटिया रही पुकार
तुम जालिम बनना नहीं , मांगे हमसे प्यार |
निश्छल , मोहक , पाक है , बेटी की मुस्कान
भूलें हमको गम सभी , जाएं जीत जहान |
क्यों मारो तुम गर्भ में , बिटिया घर की शान
ये चिड़िया-सी चहककर , करती दूर थकान |
बिटिया कोहेनूर है , फैला रही प्रकाश
धरती है जन्नत बनी , पुलकित है आकाश |
तुम बेटी के जन्म पर , होना नहीं उदास
गले मिले जब दौडकर , मिट जाते सब त्रास |
--------- दिलबाग विर्क
***************
अल्लाह के नूर का महीना है रमजान मौलाना -डॉ. मुफ्ती मुकर्रम अहमद (शाही इमाम, फतेहपुरी मस्जिद)
रमजान इस्लामी कैलेंडर का एक महीना है। रमजान में पूरे महीने रोजे रखे
जाते हैं। रोजे का वक्त रहता है, सुबह सादिक से लेकर सूरज के डूबने तक।
रोजे में जब हम खाने-पीने से रुकते हैं, तो इससे हमारे अंदर रूहानी ताकत
बढ़ जाती है और तकवा हासिल हो जाता है। अल्लाह की इबादत के लिए खाने-पीने
और अपनी ख्वाहिशों को छोड़ने का जो जज्बा पैदा होता है, उससे एक तरह से
रूहानी ट्रेनिंग हो जाती है। यह जज्बा सारी जिंदगी काम आता है।
रमजान में दिन में रोजा होता है और रात में तरावीह (नमाज) पढ़ी जाती है।
ये दो इबादतें इस महीने की खास इबादतें हैं। रसूलल्लाह जब हिजरत करके
मदीने आए थे तो दूसरे साल में रमजान के रोजे फर्ज हुए थे और दूसरे ही साल
में जकात फर्ज हुई थी। रोजा एक बहुत ही पाक इबादत है, जिस पर अल्लाह
रोजेदार से बहुत खुश होता है। दुनिया में भी उसकी दुआएं कुबूल होती हैं।
कयामत के दिन भी उस पर हिसाबो-किताब माफ होगा और उसे जन्नत की खुशखबरी दी
जाएगी। रोजेदारों के लिए जन्नत में अलग से दरवाजा है। इसका नाम है— बाबुर
रय्यान। इससे रोजेदार जन्नत में बुलाए जाएंगे। रमजान के महीने में
रोजेदारों के लिए जरूरी है कि वे हर गुनाह से बचें व ऐसा समझों कि उनके
पूरे शरीर का रोजा है। पैगम्बर साहब (स.) ने फरमाया कि अल्लाह ने कहा है
कि बंदे ने रोजा मेरे लिए रखा है और मैं इसका अजर (बदला) दूंगा। रोजेदार
का सीधा ताल्लुक अल्लाह से होता है। तरावीह में कुराने मुकद्दस पढ़ा जाता
है। रमजान में आमतौर पर घरों में भी कुरान शरीफ पढ़ते हैं। पैगम्बर साहब
ने फरमाया है कि एक रात ऐसी आती है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों पर बहुत
ज्यादा ईनाम करता है। वह रात ईद की चांद रात होती है। जिस दिन रमजान का
महीना खत्म होता है, उस दिन उन तमाम लोगों को ईनाम मिलता है, जिन्होंने
पूरे महीने रोजे रखे हों, पूरे महीने तरावीह की नमाज पढ़ी हो।
Hindustan 31 July 2012
Source : http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-246885.html
कवि व्यभिचारी चोर -सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार
एक दिन एक कवि ने शिकायत की कि आप हिंदी के लेखकों को ही क्यों ठोकते हैं? अन्य भाषाओं वाले पढ़ते होंगे, तो क्या सोचते होंगे?’
‘न ठोकता, तो तुम क्या यह सवाल करते? इस पर भी न हंसूं, तो क्या करूं? मैं तो हर बार अपने ऊपर ही हंसता हूं।’
‘जो हास्यास्पद हैं, उन पर हंसें। बाकी पर क्यों? इतने बड़े और महान लेखक हैं और आप उनकी महानता में सुई चुभाते रहते हैं!’
‘हमारे उत्तर-आधुनिक शब्दकोश में ‘महान’ शब्द ‘संदिग्ध’ है। महानता अनेक तुच्छताओं से गढ़ी जाती है। और साथी हिंदी में ऐसा कौन है, जो हास्यास्पद नहीं है? मैं खुद भी उपहासास्पद हूं। लोग मुझे पचौरी की जगह ‘कचौरी’ बोलते हैं। कई तो कहते हैं :उसे कचौरी की तरह खा जाऊंगा..। मैं डरा रहता हूं कि कहीं सचमुच खा गया, तो मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा?’
वह हंसकर बोले: ‘पचौरी की तुक तो कचौरी ही है। इसमें क्या गलत है?’
‘काश! मेरा नाम कचौरी होता। नाम लेते ही मुंह में पानी आता। आप भी नाश्ता कर सकते।’
‘जब आप ही एब्सर्ड बनाएंगे, तो हिंदी वालों की इज्जत कौन करेगा? आप गंभीरता के दुश्मन हैं। कई सीनियर कवि नाराज हैं।’
गंभीरता की बात न करें श्रीमान! सारे गंभीरों को जानता हूं। सब ‘नॉन सीरियस’ हैं। कविवर केशवदास ने कवियों को किस कैटेगरी में रखा है? ‘व्यभिचारी और चोर’ की कोटि में-
चरन धरत चिंता करत, भावत नींद न भोर।
सुबरन को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर।
‘ये ‘सुबरन’ क्या है?’
‘कभी हिंदी की क्लास अंटेंड की है? साहित्यशास्त्र पढ़ा? काव्य परंपरा जानी? ‘सुबरन’ के तीन अर्थ हैं : कवि ‘सुंदर वर्ण यानी सही शब्द’ खोजता-फिरता है। व्यभिचारी ‘सुवर्णा नारी’ को खोजता फिरता है। चोर ‘स्वर्ण’ खोजता फिरता है। समझे?’ मैंने पूछा
वह बोले: ‘कवि तो ‘क्रांति का हिरावल दस्ता’ होता है। उसे ‘व्यभिचारी और चोर’ के साथ रखना ‘क्रांति द्रोह’ के बराबर है। आखिर यह केशव कौन है, जो साहित्य में ऐसी बदतमीजी करता है?’
‘केशव हिंदी के काव्य चैंपियन माने जाते हैं-कविता का ओलंपिक होता, तो इस दरिद्र भारत को अकेले कई स्वर्ण दिला देते- एक ‘सुबरन’ से तीनों के ‘कॉमन लक्षण’ बता दिए!’
‘लेकिन कवि व्यभिचारी तो कतई नहीं कहे जा सकते।’
‘केशव के पैमाने से व्यभिचारी भी लगते हैं? आप एक नाम लीजिए- ऊपरी चाकचिक्य में अंदर की बातें छिपा जाते हैं। हमारा मुंह न खुलवाओ!’
‘डरते हैं? बताइए न!’
हमने कहा: हाल ही की बात है। स्त्रीवाद विषयक सेमिनार में जब एक प्रगतिशील वक्ता ने कहा कि ऐसी प्रगतिशीलता और स्त्रीवाद किस काम का, जो एक बीवी गांव में रिजर्व छोड़ दे और दूसरी को दिल्ली में आकर बीवी बना ले? ऐसा कहते ही सेमिनार में ठहाका लगा, जिसके नतीजे में एक साहित्यकार बहिर्गमन कर गया। क्या आप अब भी कहेंगे कि महाकवि केशव ने कवि को ‘व्यभिचारी और चोर’ की संगत में क्यों रखा है?’
इतना सुनते ही कवि जी केशव को और हमें गाली देते हुए निकल गए। कहा : देख लूंगा। केशव की कविता सुनाई, तो धमकी मिली। अकबर इलाहाबादी को सुनाएंगे, तो क्या तोप मुकाबिल होगी?
‘न ठोकता, तो तुम क्या यह सवाल करते? इस पर भी न हंसूं, तो क्या करूं? मैं तो हर बार अपने ऊपर ही हंसता हूं।’
‘जो हास्यास्पद हैं, उन पर हंसें। बाकी पर क्यों? इतने बड़े और महान लेखक हैं और आप उनकी महानता में सुई चुभाते रहते हैं!’
‘हमारे उत्तर-आधुनिक शब्दकोश में ‘महान’ शब्द ‘संदिग्ध’ है। महानता अनेक तुच्छताओं से गढ़ी जाती है। और साथी हिंदी में ऐसा कौन है, जो हास्यास्पद नहीं है? मैं खुद भी उपहासास्पद हूं। लोग मुझे पचौरी की जगह ‘कचौरी’ बोलते हैं। कई तो कहते हैं :उसे कचौरी की तरह खा जाऊंगा..। मैं डरा रहता हूं कि कहीं सचमुच खा गया, तो मेरे बीवी-बच्चों का क्या होगा?’
वह हंसकर बोले: ‘पचौरी की तुक तो कचौरी ही है। इसमें क्या गलत है?’
‘काश! मेरा नाम कचौरी होता। नाम लेते ही मुंह में पानी आता। आप भी नाश्ता कर सकते।’
‘जब आप ही एब्सर्ड बनाएंगे, तो हिंदी वालों की इज्जत कौन करेगा? आप गंभीरता के दुश्मन हैं। कई सीनियर कवि नाराज हैं।’
गंभीरता की बात न करें श्रीमान! सारे गंभीरों को जानता हूं। सब ‘नॉन सीरियस’ हैं। कविवर केशवदास ने कवियों को किस कैटेगरी में रखा है? ‘व्यभिचारी और चोर’ की कोटि में-
चरन धरत चिंता करत, भावत नींद न भोर।
सुबरन को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर।
‘ये ‘सुबरन’ क्या है?’
‘कभी हिंदी की क्लास अंटेंड की है? साहित्यशास्त्र पढ़ा? काव्य परंपरा जानी? ‘सुबरन’ के तीन अर्थ हैं : कवि ‘सुंदर वर्ण यानी सही शब्द’ खोजता-फिरता है। व्यभिचारी ‘सुवर्णा नारी’ को खोजता फिरता है। चोर ‘स्वर्ण’ खोजता फिरता है। समझे?’ मैंने पूछा
वह बोले: ‘कवि तो ‘क्रांति का हिरावल दस्ता’ होता है। उसे ‘व्यभिचारी और चोर’ के साथ रखना ‘क्रांति द्रोह’ के बराबर है। आखिर यह केशव कौन है, जो साहित्य में ऐसी बदतमीजी करता है?’
‘केशव हिंदी के काव्य चैंपियन माने जाते हैं-कविता का ओलंपिक होता, तो इस दरिद्र भारत को अकेले कई स्वर्ण दिला देते- एक ‘सुबरन’ से तीनों के ‘कॉमन लक्षण’ बता दिए!’
‘लेकिन कवि व्यभिचारी तो कतई नहीं कहे जा सकते।’
‘केशव के पैमाने से व्यभिचारी भी लगते हैं? आप एक नाम लीजिए- ऊपरी चाकचिक्य में अंदर की बातें छिपा जाते हैं। हमारा मुंह न खुलवाओ!’
‘डरते हैं? बताइए न!’
हमने कहा: हाल ही की बात है। स्त्रीवाद विषयक सेमिनार में जब एक प्रगतिशील वक्ता ने कहा कि ऐसी प्रगतिशीलता और स्त्रीवाद किस काम का, जो एक बीवी गांव में रिजर्व छोड़ दे और दूसरी को दिल्ली में आकर बीवी बना ले? ऐसा कहते ही सेमिनार में ठहाका लगा, जिसके नतीजे में एक साहित्यकार बहिर्गमन कर गया। क्या आप अब भी कहेंगे कि महाकवि केशव ने कवि को ‘व्यभिचारी और चोर’ की संगत में क्यों रखा है?’
इतना सुनते ही कवि जी केशव को और हमें गाली देते हुए निकल गए। कहा : देख लूंगा। केशव की कविता सुनाई, तो धमकी मिली। अकबर इलाहाबादी को सुनाएंगे, तो क्या तोप मुकाबिल होगी?
Source : http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-246281.html
दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 29-7-2012 पृष्ठ संख्या 14
बच्चों की मैगज़ीन की Top 5 Websites
बालेन्दु शर्मा दाधीच।।
बच्चों को इंटरनेट पर हल्के-फुल्के मनोरंजन की तलाश रहती है लेकिन कई बार वे भटककर गलत जगह पहुंच जाते हैं। जो माता-पिता बच्चों को मनोरंजक और शिक्षाप्रद साहित्य पढ़ते देखना चाहते हैं, वे अक्सर निराश होते हैं क्योंकि बच्चों के मतलब की अच्छी भारतीय वेबसाइटों की संख्या कम है। आप अपने बच्चों को इन वेबसाइटों के बारे में बताएं, जो साफ-सुथरी और अच्छी कहानियां, कविताएं, गेम और ऐक्टिविटीज़ को प्रमोट करती हैं।
chandamama.com चंदामामा बच्चों की बहुत पुरानी और लोकप्रिय पत्रिका है और चंदामामा डॉट कॉम उसी पत्रिका का ऑनलाइन वर्जन है। यहां बच्चे न सिर्फ कहानियां, पहेलियां आदि पढ़ सकते हैं बल्कि जिन्हें लिखने का शौक है, वे अपनी रचनाएं भी पोस्ट कर सकते हैं। यहां चंदामामा पत्रिका में बरसों से छपती रही कहानियों का संग्रह भी है, यानी बच्चे पढ़ना शुरू करेंगे तो सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। यह वेबसाइट हिंदी समेत कई भाषाओं में है।
pitara.com
बच्चों के लिए साफ-सुथरी और सुरक्षित वेबसाइट है पिटारा डॉट कॉम। यहां काफी वरायटी दिखाई देती है। इस अंग्रेजी साइट में छह खास-खास हिस्से हैं, जिन्हें टेलस्पिन, मैगजीन, डिस्कवर, एक्टिविटीज, गेम्स और रेफरेंस नाम दिए गए हैं। टेलस्पिन और मैगजीन सेक्शंस में कहानियां, लेख और मनोरंजक जानकारियां हैं। फन ऐक्टिविटीज में आर्ट ऐंड क्राफ्ट से जुड़ी गतिविधियां सिखाई जाती हैं। डिस्कवर और रेफरेंस में ऐसी सूचनाएं हैं जो बच्चों का ज्ञान बढ़ाएंगी और पढ़ाई में भी उपयोगी साबित होंगी।
dimdima.com
डिमडिमा डॉट कॉम भारतीय विद्या भवन की तरफ से चलाई जाने वाली वेबसाइट है जो इसी नाम की एक पत्रिका का ऑनलाइन वर्जन कही जा सकती है। पत्रिका के पुराने अंकों की सामग्री यहां आर्काइव्ज के रूप में मौजूद है। लेकिन उसके साथ-साथ प्ले ऐंड विन, क्राफ्ट ऐंड ऐक्टिविटीज, फन जोन, स्टोरी टाइम और पोयट्री कॉर्नर जैसी चीजें बच्चों को पसंद आएंगी। यहां बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों, शिक्षकों और स्कूलों के लिए भी अलग सेक्शन हैं। विज्ञान, इतिहास, भूगोल और पर्यावरण जैसे विषयों पर भी अच्छी सामग्री है।
kidswebindia.com
किड्सवेबइंडिया डॉट कॉम पर सिर्फ मनोरंजक चीजें ही नहीं हैं बल्कि बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से जुड़े राय-मशविरे भी दिए जाते हैं। जैसे यह कि इम्तिहानों के वक्त तैयारी कैसे करें और तनाव से कैसे बचें। अपने देश, इतिहास, संस्कृति, त्योहारों वगैरह के बारे में बहुत सी जानकारी यहां है जो सीखने के साथ-साथ होमवर्क में भी काम आएगी। पहेलियां, चुटकुले, गेम्स जैसी टाइमपास चीजें भी हैं।
balmitra.com
बालमित्र डॉट कॉम वेबसाइट चार हिस्सों में बांटकर पेश की गई है - अबाउट इंडिया, स्टोरी बुक, लैंग्वेज बुक और रीडर्स स्पेशल। जैसा कि नाम से जाहिर है, पहले हिस्से में भारत के बारे में ब्योरेवार जानकारियां दी गई हैं और स्टोरी बुक में लोककथाएं और दिलचस्प कहानियां हैं। बहरहाल, लैंग्वेज बुक सेक्शन लाजवाब है जहां बच्चे हिंदी, मराठी, तेलुगू, मलयालम, तमिल और अंग्रेजी जैसी भाषाएं भी सीख सकते हैं।
बच्चों को इंटरनेट पर हल्के-फुल्के मनोरंजन की तलाश रहती है लेकिन कई बार वे भटककर गलत जगह पहुंच जाते हैं। जो माता-पिता बच्चों को मनोरंजक और शिक्षाप्रद साहित्य पढ़ते देखना चाहते हैं, वे अक्सर निराश होते हैं क्योंकि बच्चों के मतलब की अच्छी भारतीय वेबसाइटों की संख्या कम है। आप अपने बच्चों को इन वेबसाइटों के बारे में बताएं, जो साफ-सुथरी और अच्छी कहानियां, कविताएं, गेम और ऐक्टिविटीज़ को प्रमोट करती हैं।
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pitara.com
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डिमडिमा डॉट कॉम भारतीय विद्या भवन की तरफ से चलाई जाने वाली वेबसाइट है जो इसी नाम की एक पत्रिका का ऑनलाइन वर्जन कही जा सकती है। पत्रिका के पुराने अंकों की सामग्री यहां आर्काइव्ज के रूप में मौजूद है। लेकिन उसके साथ-साथ प्ले ऐंड विन, क्राफ्ट ऐंड ऐक्टिविटीज, फन जोन, स्टोरी टाइम और पोयट्री कॉर्नर जैसी चीजें बच्चों को पसंद आएंगी। यहां बच्चों के साथ-साथ अभिभावकों, शिक्षकों और स्कूलों के लिए भी अलग सेक्शन हैं। विज्ञान, इतिहास, भूगोल और पर्यावरण जैसे विषयों पर भी अच्छी सामग्री है।
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Source : http://navbharattimes.indiatimes.com/top-websites-for-childrens-magazines/articleshow/15090418.cms
लोग "दूसरों" की विकृतियों के माहिर हो चले हैं
विकृति को समझना मुनाफ़े का सौदा है। कविता और लेख लिखो तो कोई टिप्पणी नहीं देता मगर किसी की विकृति को पहचान लो लोग अपनी राय देने आ जाते हैं मगर शर्त यह है कि विकृति ‘दूसरों‘ में से किसी की होनी चाहिए।
अपना कोई हो तो उसे संविधान और झंडे की तौहीन करने की भी पूरी छूट है। कोई नंगेपन और समलैंगिकता का हामी हो तो हो। उसकी सोच विकृति नहीं मानी जाएगी क्योंकि वह अपने गुट का है। अपनी विकृति पर चर्चा न करना और दूसरों की विकृतियों पर तब्सरा करना भी एक विकृति है। इसे कौन समझ पाएगा ?
दूसरा सुनेगा नहीं और अपनी विकृति लोग दूर करेंगे नहीं तो सुधार कैसे होगा ?
खबरगंगा: 'डायन' : औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका
वे बचपन के दिन थे ....मोहल्ले में दो बच्चों की मौत होने के बाद काना-फूसी शुरू हो गयी और एक बूढी विधवा को 'डायन' करार दिया गया...हम उन्हें प्यार से 'दादी' कहा करते थे...लोगो की ये बाते हम बच्चों तक भी पहुची और हमारी प्यारी- दुलारी दादी एक 'भयानक डर' में तब्दील हो गयी... उनके घर के पास से हम दौड़ते हुए निकलते कि वो पकड़ न ले...उनके बुलाने पर भी पास नहीं जाते ...उनके परिवार को अप्रत्यक्ष तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया ....आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे बदले व्यवहार ने उन्हें कितनी 'चोटे' दी होंगी ...और ये सब इसलिए कि हमारी मानसिकता सड़ी हुई थी....जबकि हमारा मोहल्ला बौद्धिक (?) तौर पर परिष्कृत (?) लोगो का था ..!...................................
खबरगंगा: 'डायन' : औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका:
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खबरगंगा: 'डायन' : औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका:
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ग़रीबों की मदद करने वाला ग़रीब BAI FANG LI चला गया
ग़रीबों की मदद करने वाला ग़रीब चला गया.
वह हम सबके लिए एक मिसाल छोड़कर गया है.
BAI FANG LI was a Tricycle Driver for 20 years and has Donated 350,000 Renminbi to support the EDUCATION OF 300 STUDENTS WHO LIVE IN POVERTY.One winter, he gave his last 500 Renminbi to their Teacher, “THIS IS WILL BE MY LAST DONATION AS I AM NO LONGER FIT TO WORK”. He Passed Away at the Age of 93.
मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ .
मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ .
जुबैर अहमद अपने ब्लॉग ''बी.बी.सी ''में लिखते हैं कि राजेश खन्ना जी को शायद तनहाइयाँ मर गयी .तन्हाई शायद यही तन्हाई उनकी जिंदगी में अनीता आडवानी के साथ लिव -इन- रिलेशन के रूप में गुज़र रही थी न केवल फिल्मो में बल्कि आज सभी जगह देश हो या विदेश शहर हो या गाँव अपनों के साथ छोड़ने पर बड़ी उम्र के लोग तनहाइयों में जीवन गुज़ारने को विवश हैं और उनमे से कितने ही ये रास्ता अपनाने लगे हैं जिसकी शायद उन्होंने उम्र के आरंभिक दौर में आलोचना की होगी.
अभी हाल ही में शामली [उत्तर प्रदेश ]में ओम प्रकाश -गसिया प्रकरण चर्चा में रहा .बेटों ने बाप की वृद्धावस्था में देखभाल नहीं की और एक अन्य महिला ने जब सेवा -सुश्रुषा की तो उसे अपनी पेंशन जो स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हें मिलती है ,दिलाने के लिए उन्होंने कोर्ट-मैरिज की सोची ये समाचार फैलते ही बेटों के आराम में खलल पड़ा और उन्होंने इसे रोकने को एडी चोटी का जोर लगा दिया .हाल ये है कि प्रतिष्ठा व् जायदाद बच्चों के लिए बूढ़े माँ-बाप से ऊपर स्थान रखते हैं और जब प्रतिष्ठा पर आंच आती है या जायदाद छिनने की नौबत आती है तब उन्हें बूढ़े माँ-बाप की याद आती है और तब ये कथित युवा पीढ़ी उन्हें ''सठिया गए हैं ''जैसे तमगों से नवाजने लगती है .
बच्चों का माँ-बाप के प्रति ये रवैय्या बड़ों को ऐसी परिस्थिति में डाल देता है कि वे गहरे अवसाद के शिकार हो जाते हैं .अपने बच्चों के प्रति मोह को वे छोड़ नहीं पाते और उनके तकलीफ देह व्यवहार को ये सोच कर ''कि जिंदगी दो चार दिन की है ''सहते रहते हैं .
फिल्मे समाज का आईना हैं .चाहे अवतार हो या बागवान दोनों में बच्चों के व्यवहार ने माँ बाप को त्रस्त किया है किन्तु उनमे जो आदर्श दिखाया गया है वही हमारे समाज के बुजुर्गों को अपनाना होगा उनमे बच्चों के व्यवहार से माँ बाप को टूटते नहीं दिखाया बल्कि उन्हें सबक सिखाते हुए दिखाया गया है .उनमे दिखाया गया है कि ऐसे में माँ बाप को बच्चो के प्रति क्या व्यवहार अपनाना चाहिए.
जो माँ बाप अपने बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करते हैं उन्हें जिंदगी जीने लायक बनाते हैं उन्हें अपने को अपने बच्चों के सामने लाचार बनने की कोई ज़रुरत नहीं है .अवतार व् बागवान में तो फ़िल्मी माँ बाप है जो कोई कार्य करते हैं और उन्हें सफलता मिल जाती है असलियत में ऐसा बिरलों के साथ ही होता है इसलिए ऐसे में बच्चों को सबक सिखाने के लिए कानून भी माता पिता का साथ देता है
दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा १२५ में पत्नी ,संतान और माता पिता के लिए भरण-पोषण के लिए आदेश दिया गया है . धारा १२५[१] कहती है कि यदि पर्याप्त साधनों वाला कोई व्यक्ति -
''[घ]अपने पिता या माता का ,जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं,भरण पोषण करने की उपेक्षा करता है ,या भरण पोषण करने से इंकार करता है तो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ऐसी उपेक्षा या इंकार साबित हो जाने पर ऐसे व्यक्ति को ये निर्देश दे सकेगा कि वह अपने पिता या माता के भरण पोषण के लिए ऐसी मासिक दर पर ,जिसे मजिस्ट्रेट ठीक समझे ,भरण पोषण मासिक भत्ता दे .''
बालन नायर बनाम भवानी अम्मा वेलाम्मा और अन्य ए .आई .आर १९८७ केरल ११० में केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि धारा १२५ विपत्ति में पड़े पिता के लिए भी भरण पोषण की व्यवस्था करता है और यह संविधान के अनुच्छेद १५[३] एवं 39 के अनुकूल है .
डॉ.श्रीमती विजय मनोहर अरबत बनाम कांशी राम राजाराम सवाई और अन्य ए.आई.आर. १९८७ एस.सी.११०० में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अपने माता पिता का भरण पोषण करने का दायित्व न केवल पुत्रों का है अपितु अविवाहित पुत्रियों का भी है .
इस प्रकार कानून ने भी वृद्ध माता पिता की सहायता के लिए व्यवस्था की है किन्तु इस सहायता से लाभ उठाना और उपेक्षित व्यवहार कर घर परिवार समाज में अव्यवस्था फ़ैलाने वाले बच्चों को सीधे रास्ते पर लाने का कार्य तो उन वृद्ध माता पिता को स्वयं ही करना होगा .संतान मोहपाश में बंधे इन लोगों को अपने बच्चों को सही रास्ते पर लाने का दायित्व स्वयं ही निभाना होगा ताकि आगे आने वाले बच्चों के लिए ये एक ऐसा सबक बने जिसे नज़रंदाज़ कर अपने कर्तव्य को भूलने की गलती कोई भूल से भी न करे .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]
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