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देखो फिर से नभ की ओर

चेहरा क्यूँ दिखता कमजोर।
देखो फिर से नभ की ओर।।

तारे जहाँ सदा हँसते हैं,
और चमकता चंदा।
जी सकते तो जी लो ऐसे,
छूटेगा हर फंदा।
आग उगलता सूरज फिर भी,
लेकर आता नूतन भोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।

नदियों की खुशियाँ तो देखो,
गीत हमेशा गाती है।
हर विरोध के पत्थर को भी,
सँग बहा ले जाती है।
तब उसकी मस्ती बढ़ती जब,
घटा घिरे घनघोर
देखो फिर से नभ की ओर।।

भले तोड़ ले कोई सुमन को,
फिर भी वह तो हँसता है।
और सुगंध भी कैद नहीं है,
हवा के सँग सँग बहता है।
चिड़ियों की कलरव में धुन है,
मत कहना तू शोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
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"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"




"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"

बहुत पुराना है नारा ;

हकीकतन इससे सबने

पर कर लिया किनारा |



वो औद्योगीकरण के नाम पे,

जंगल के जंगल उड़ाते हैं;

पेड़ काट के नई इमारतों का,

अधिकार दिए जाते हैं |



नीति कुछ ऐसी है-

"जंगल हटाओ, विकास रचाओ !" 

पर कहते हैं जनता से,

"पेड़ लगाओ, देश बचाओ !!"
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आबो हवा


नहीं रहा अब

दुनिया पे यकीन,
भरोसे जैसी कोई
अब चीज कम है ;
बदल गये लोग
बदल गई मानसिकता,
बदल गई सोच
खतम हुई नैतिकता ;
हमने ही सब बदला
और कहते हैं आज
कि अच्छी नहीं रही
अब आबो हवा |
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रावण दहन


खुद ही बनाते हैं, खुद ही जलाते हैं,
यूँ कहें कि हम अपनी भड़ास मिटाते हैं |

समाज में रावण फैले कई रूप में यारों,
पर उनसे तो कभी न पार हम पाते हैं |

रावण दहन के रूप में एक रोष हम जताते हैं,
समाज के रावण का खुन्नस पुतले पे दिखाते हैं |

उसी रावण की तरह होता है हर एक रावण,
पुतले की तरह हर रावण को हम ही उपजाते हैं |

हर भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी एक रावण ही तो है,
यहाँ तक कि हम सब अपने अंदर एक रावण छुपाते हैं |

इन सब से मुक्ति शायद बस की अब बात नहीं,
इसलिए रावण दहन कर अपनी भड़ास हम मिटाते हैं |
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सूखे नैन



नहीं आते आंसू,
सुख गया सागर,
इतना बहा कि अब
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

याद है मुझको
तेरा वो रूठना,
दो बुँदे बहके
तुझे मन थी लेती,
जहर गई वो बूंदें
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

आंसू नहीं मोती हैं
तुम्ही तो थे कहते,
एक भी ये मोती
तुम बिखरने नहीं देते,
खो गए वो मोती
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

वर्दी पहने जब निकले थे
दी मुस्कान के साथ विदाई,
आँखों में था पानी
दिल रुलाता था जुदाई,
सुख गया वो पानी,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

तब भी बहुत बहा था
जब ये खबर थी आई
देश रक्षा में तुने
अपनी जान है लुटाई,
पर अब नहीं बहते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |

जानती हूँ मैं
तुम नहीं हो आने वाले,
पर ये दिल ही नहीं मानता
तेरा इंतज़ार है करता,
करवटें बदल रोते-रोते,
इंतज़ार में तेरे
मेरे सूखे नैन |
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दो पल की खुशियाँ

खुशियों भरा जीवन अब मिलता है कहाँ,
चैन-सुकून हर पल अब रहता है कहाँ,
जीवन हर वक़्त लिए एक छड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

संघर्ष ही जीवन का दूसरा नाम हो गया है,
कठिनाइयों का आना तो अब आम हो गया है,
किस्मत हर वक़्त मुह बाये खड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

भागते ही हम रहते हैं श्वांस भी न लेते,
जीवन को सिद्दत से हम जी भी न लेते,
हम सबको हर वक़्त लगी हड़बड़ी होती होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |

कल क्या होगा किसी ने देखा भी नहीं,
निरंतर खुशियों की कोई रेखा भी नहीं,
जिंदगी भी तो बस घड़ी दो घड़ी होती है,
इसलिए दो पल की खुशियाँ भी बड़ी होती है |
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आतंक का अंत



क्या होगा कभी,
इस आतंक का अंत ?
क्या निज़ात पायेंगे,
देर से ही सही या तुरंत ?

आये दिन हो जाता है विस्फोट,
कई जिंदगियों का अस्तित्व उखड जाता है,
हो जाते हैं अनाथ कई मासूम,
और न जाने कितनो का सुहाग उजड़ जाता है |

अस्पतालों का भी तब विहंगम दृश्य होता है,
किसी का हाथ तो किसी का पैर धड़ से अदृश्य होता है |

विस्फोट की आवाज तो क्षणिक होती है,
पर कईयों के कानों में वो जिंदगी भर गूंजती है |

नेता इस में भी राजनीति से नहीं चुकते,
सरकार के नुमाइंदें भी समाधान नहीं, बस आश्वाशन देते हैं |

कब इस दहशत के माहौल से उबरेंगे ?
कब हमारी जिंदगियों की कीमत होगी और वो सुरक्षित होगी ?
कब तक दिल दहलाने वाले ये दृश्य हम देखते रहेंगे ?
कब तक अपनों को इस कदर हम खोते रहेंगे ?

क्या होगा कभी,
इस आतंक का अंत ?
क्या निज़ात पायेंगे,
देर से ही सही या तुरंत ?

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देश तुम्हारे साथ है अन्ना



भ्रष्टाचार पर तीर की भाँति,
अन्ना आँधी चल निकली है।
भ्रष्टाचारियों!! सावधान अब,
जनता भी जगने चली है।

लोकपाल बिल हो मंजूर,
जनता की भी भागेदारी हो।
सख्त नियम और सख्त कदम हो,
भ्रष्टों की न साझेदारी हो।

हाथ से हाथ जुड़ते ही रहे,
देशहित में सब साथ हो चलें।
यह आँधी बस कामयाब हो,
हम अन्ना के हाथ बन चलें।

देशभक्ति के भाव को दिल में,
फिर से अब जगाना होगा।
गोरों को गाँधी ने खदेड़ा,
हमे अपनो को भगाना होगा।

अन्ना ने जो दी है ज्वाला,
इसे अग्नि बनाना होगा।
अन्ना के संग सर उठाकर,
भ्रटाचार जलाना होगा।

क्रांति की अगणित मशालें,
अब हमारे हाथ है अन्ना।
तुम अकेले नहीं हो यहाँ,
देश तुम्हारे साथ है अन्ना।

भारत माता की जय।



इस कविता का लिंक
मेरा ब्लॉग-मेरी कविता
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इंसान की फितरत....


http://atulshrivastavaa.blogspot.com

सेकंड,
मिनट,
घंटा,
दिन,
महीना,
और साल.....।
न जाने
कितने कैलेंडर
बदल गए
पर मेरे आंगन का
बरगद का पेड
वैसा ही खडा है
अपनी शाखाओं
और टहनियों के साथ
इस बीच
वक्‍त बदला
इंसान बदले
इंसानों की फितरत बदली
लेकिन
नहीं बदला  तो
वह बरगद का पेड....।
आज भी
लोगों को 
दे रहा है
ठंडी छांव
सुकून भरी हवाएं.....
कभी कभी
मैं सोचता हूं
काश इंसान भी न बदलते
लेकिन
फिर अचानक
हवा का एक  झोंका आता है
कल्‍पना से परे
हकीकत से सामना होता है
और आईने में
खुद के अक्‍श को देखकर
मैं शर्मिंदा हो जाता हूंhttp://atulshrivastavaa.blogspot.com

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कुछ लोग हर धर्म में गंदे होते

हर धर्म के उसूल
अच्छे होते
धर्म के नाम पर
हर धर्म में धंधे होते
कुछ लोग हर धर्म में
गंदे होते
धर्म के नाम पर
मतलब साधते
भोले भालों लोगों को
बरगलाते
निरंतर धर्म के नाम पर
सियासत करते
ऐसे लोगों को पहचानों
इनके जाल में ना फंसो   
खुद भी बचो
औरों को भी बचाओ
22-04-2011
731-153-04-11
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खुदा

लोग मंदिर,
मस्जिद में मुझे ढूंढते
धर्म के ठेकेदारों से
पता मेरा पूंछते
निरंतर नए तरीकों से
मुझे खोजते
फिर भी मुझे पाते नहीं
मैं इंसान के दिल में रहता
ईमान और इंसानियत में
बसता
लालच से नफरत मुझे
सूरज बन
उजाला दिन में करता
रात को
चाँद बन कर निकलता
जो दिल से ढूंढता,
सिर्फ उसे मिलता
17-04-2011
696-120-04-11
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क्यों सोचते तुम हो अकेले

क्यों सोचते
तुम हो अकेले 
वो भी साथ तुम्हारे
जो नाम तुम्हारा
नफरत से लेते
दिन रात तुम्हें कोसते
चर्चे शहर में करते
चाहते नहीं तो क्या
निरंतर याद तो करते
जो भी  है दिल में
साफ़ साफ़ बताते 
बेहतर हैं उनसे
जो अपना तो कहते
दिल में जहर रखते 
भूले से याद ना करते
देख कर मुस्काराते
पीछे से मुंह चिडाते
इधर हाथ मिलाते
उधर खंजर मारते
24-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर4
497—167-03-11
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मेरी खुशी में शामिल हो जाओ,आज दिल की दीवाली है

मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
चिट्ठी उनकी आयी ,
आज बात मतवाली है
पैमाना सब्र का भर 
गया था
छलकने से पहले ही
याद उनको आयी है
बहुत ज़ख्म दिए उन्होंने
अब मलहम लगाने की 
ख्वाइश है 
बहुत रो लिए थे हम
अब आंसू पोंछने की बारी है
निरंतर इंतज़ार करते थे हम
अब मिलने की बारी है
मेरी खुशी में 
शामिल हो जाओ
आज दिल की दीवाली है
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
482—152-03-11
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उनकी किसी चीज़ को नहीं छेड़ता


वो अब
नहीं दुनिया में
फिर भी हैं पास मेरे
कमरे में जिस्म से नहीं
मगर अहसास से साथ मेरे
पर्दों से लेकर दीवारों में 
बसतीं 
बिस्तर की सलवटें,
तकिये पर कुछ बाल उनके
अब भी साथ मेरे
पहने अनपहने कपडे,
सौन्दर्य प्रसाधन
उन्हें मुझ से दूर ना 
होने देते
उनका चश्मा,पसंदीदा 

किताबें
अब भी उनकी चाहत 

दर्शाती
लगता कोई पसंद 

की पंक्ति
अब सुनाने वाली
चाबियों का झुमका,
बड़ा सा पर्स,सुन्दर 
चप्पलें
बाहर चलने का आमंत्रण 

देती
उनकी बातें कानों में 

गूंजती
हर चीज़ उनकी खुशबू से
महकती
कभी प्यार जताना
कभी प्यार से झिडकना
कहाँ भूलता
कमरे में रहना मुझे 

अच्छा लगता
हर तरफ उन्हें पाता
जिस्म से तो दूर हुयीं
रूह से दूर ना जाएँ
निरंतर कामना करता
जो चीज़ जैसी रख कर गयीं
 वैसे ही रहने देता
डरता हूँ, छेड़ने पर 
नाराज़ हो
कमरे से ना चले जाएँ
इस लिए उनकी
किसी चीज़ को नहीं
छेड़ता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
476—146-03-11
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गर्मियों की छुट्टियां

अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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