अंदाज ए मेरा: शीर्षक सुझाएं.....: कुछ दिनो पूर्व एक अखबार के शीर्षक और इसे लेकर फेसबुक पर चली लंबी बहस ने काफी कुछ सोचने मजबूर किया। अखबार में एक खबर का फालोअप था और शीर्ष...
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fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के
25 गैस सिलिंडरों के फटने की घटना को छोड़ दें तो ब्रह्मेश्वर मुखिया का श्राद्धकर्म शांति पूर्वक संपन्न हो गया. 13 जून को इस मौके पर दर्जनों सांसद, विधायक और अन्य जन प्रतिनिधि श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे. इससे पता चलता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया भले ही एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन रणवीर सेना के संस्थापक थे लेकिन राजनीतिज्ञों के बीच उनकी अच्छी पैठ थी. वर्ष 2002 में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी से पूर्व उन्हें चेहरे से उनके बहुत करीबी लोग ही पहचानते थे. निश्चित रूप से उनमें सत्ता की राजनीति के खिलाडियों की अच्छी तादाद थी. यह राजनैतिक संपर्क जेल में तो नहीं ही बने होंगे.जाहिर है कि नक्सल विरोध इसका मूल तत्व रहा होगा. अगड़ी जातियों के मतों का आकर्षण भी प्रेरक रहा होगा. यदि नहीं तो क्या किसी नक्सली नेता की मृत्यु पर भी श्रद्धांजलि देने के लिए ये जन प्रतिनिधि जायेंगे?
रणवीर सेना सामंतों और बड़े किसानों के हित में नक्सलियों के साथ हिंसक युद्ध के लिए बनी निजी सेना थी. इसमें मुख्यतः भूमिहार जाति के लोग थे. नक्सलियों से लड़ने के लिए इससे पूर्व बिहार में राजपूतों की कुंवर सेना, सनलाईट सेना, ब्राह्मणों की आज़ाद सेना, कुर्मियों की भूमि सेना जैसी कई सेनाएं बन चुकी थीं. लेकिन वे नक्सलियों से लड़कर मृतप्राय हो चुकी थीं. रणवीर सेना सबसे अंत में बनी और दर्जनों जनसंहारों को अंजाम देकर अगड़ी जातियों की हितैषी खूंखार संस्था के रूप में चर्चित हो चुकी थी. हालांकि इस सेना ने आमने सामने की लड़ाई से हमेशा परहेज़ किया. हरिजनों को नक्सली मान कर अचानक हमले में उनका संहार करना इसकी मुख्य कार्यशैली थी. चाहे वह गांव नक्सल समर्थक हो अथवा नहीं. कहते हैं कि मियांपुर जनसंहार के बाद ब्रह्मेश्वर मुखिया को यह पता चला कि भूमिहारों पर हमला करने वाले नक्सली हरिजन नहीं बल्कि यादव हैं. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने पटना में अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषित किया था कि अब उनकी लड़ाई हरिजनों से नहीं यादवों से है. इस वक्तव्य के बाद लालू प्रसाद सबसे ज्यादा परेशां हुए थे. उन्होंने मुखिया के साथ गुप्त बैठक कर भूमिहार और यादव जाति के बीच इस संभावित जंग को रोक दिया था. इसके बाद से ही बिहार में जनसंहारों का सिलसिला थमा था. वर्ग संधर्ष के नाम पर जातीय युद्ध का एक लम्बा दौर चला था.
fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के:
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ग़ज़लगंगा.dg: मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.
जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.
कई बार लौटा हूं उसकी गली से
कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!
कभी दोस्ती की रवायत निभाए
कभी वो पलटकर पलटवार कर दे.
कोई मेरी छत के करे चार टुकड़े
कोई मेरे आंगन में दीवार कर दे.
मैं क्या उसको समझूं, मैं क्या उसको जानूं
मेरा हक भी जो मुझको थक-हार कर दे.
वो है या नहीं है, नहीं है कि है
यही सोच मुझको न बीमार कर दे.
----देवेंद्र गौतम
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आखिर आमिर क्यों मांगे माफ़ी भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) से
भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) पता नहीं क्यों आमिर खान से बार बार माफ़ी मांगने की अपील कर रहा है | आमिर के कार्यक्रम "सत्यमेव जयते" में डॉक्टरों के बारें में जो भी दिखाया गया वही यथार्थ है | देखा जाय तो उसमे कम ही दिखाया गया | स्थिति तो उससे भी ज्यादा भयावह है | आज कोई भी डॉक्टर बनना चाहता है तो सिर्फ इसलिए की इस "धंधे" में बहुत "कमाई" है | नौकरी से अलग कमाई, प्राइवेट प्रेक्टिस से अलग कमाई और तरह तरह के कमीशन से अलग कमाई | इसके अलावा भी कई तरह के मौके मिल जाते हैं इन्हें कमाने के | मेरा निजी अनुभव है की बहुत से डॉक्टर मेडिकल दूकान वालों से मोती कमीशन खाने के लिए सिर्फ वही दवा लिखते हैं जो उसी दूकान में मिले और वो भी बहुत महँगी-महँगी | टेस्ट वगैरा के लिए खाश लैब में ही भेजते हैं जहाँ परसेंटेज मिलता है, उसमे भी बिना मतलब के टेस्ट |
अभी हाल में अपने नानाजी को कान और गला के एक डॉक्टर के पास ले गया | १५० उनकी फीस थी | पर कहा गया की २ चीज़ दिखाना है तो २ फीस लगेगा | ३०० रुपये देकर दिखने गया तो डॉक्टर ने जांच के बाद ७-८ दवाइयां लिख दी और साथ में ५-६ तरह के खून जाँच, मूत्र जाँच इत्यादि | डॉक्टर का ही स्टाफ बकायदा लैब और दवा दुकान तक पंहुचा भी आया | दवाइयां सारी १५० के आस-पास थी प्रति पत्ता | मैंने तो नानाजी को जाँच वगैरा के लिए मना किया पर वो माने नहीं और जाँच करवा ली | अगले दिन रिपोर्ट लेके डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर साहब ने कहा सब ठीक है बस हिमोग्लोबिन की कमी है और एक दवा और लिख दी |
ये तो कुछ भी नहीं | लोगों को न जाने और क्या-क्या झेलना पड़ता है | जो भी आज डॉक्टर है सिर्फ पैसा कमाने के लिए ही | समाज सेवा के लिए ये पेशा अपनाने वाले १००० में २ ही होंगे | फिर अगर इस सच्चाई को दिखाया गया तो इसमें गलत क्या है ? हाँ उस कार्यक्रम में एक-दो बातें गलत हो भी सकती है लेकिन वस्तुस्थिति कमोवेश यही है | वैसे सिर्फ डॉक्टरों पर ये आरोप लगाना गलत होगा | आज तो जो भी जिस पेशे में है सिर्फ पैसों के लिए ही है | कोई छात्र अपना करियर चुनने से पहले अपनी पसंद से ज्यादा इस बात पे ध्यान देता है की नौकरी किसमे जल्दी मिलेगी और पैसा कमाई किसमे ज्यादा होगा | पर डॉक्टरों के बारे में बोला इसलिए जा रहा है क्योकिं भारत में लोग डॉक्टर को भगवान् का दर्ज़ा देते हैं | और किसी पे उतना विश्वास नहीं होता जितना डॉक्टरों पे होता है |
खबरगंगा: अप्रत्याशित नहीं है रणवीर सेना के संस्थापक की हत्या
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भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में तडके सुबह रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पूरे बिहार में तनाव की स्थिति बनी हुई है. हांलाकि नक्सली संगठनों और निजी सेनाओं के बीच कई दशकों के खूनी संघर्ष और जनसंहारों की फेहरिश्त की जानकारी रखने वालों के लिए यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है. उन्हें जमानत पर रिहा कराये जाने के साथ ही उनकी हत्या की आशंका व्यक्त की जाने लगी थी. वास्तविकता यह है कि समय के अंतराल में रणवीर सेना का स्वरूप, उसकी प्राथमिकतायें पूरी तरह बदल चुकी हैं और अब मुखिया जी इसके लिए अप्रासंगिक हो चुके थे. उनके व्यक्तिगत समर्थकों की जरूर एक बड़ी संख्या है लेकिन संगठन को अब उनकी जरूरत नहीं रह गयी थी.
अब रणवीर सेना और नक्सली संगठनों की लड़ाई में ठहराव सा आ गया है. नरसंहारों का सिलसिला थम सा गया है. ऐसे संकेत मिले हैं कि रणवीर सेना अपने आर्थिक स्रोतों की रक्षा और हथियारबंद लड़ाकों की उपयोगिता को बरकरार रखने के लिए हिन्दू आतंकवादी संगठन में परिणत हो चुकी है. यह बदलाव मुखिया जी के जेल में बंद होने के बाद का है. सेना का नेतृत्व करोड़ों की उगाही के जायज-नाजायज स्रोतों को किसी कीमत पर हाथ से नहीं निकलने दे सकता था. अब इस बात की आशंका थी कि मुखिया जी कहीं उसमें हिस्सा न मांग बैठें. संगठन के वर्तमान कार्यक्रमों में हस्तक्षेप न करें. 80 के करीब पहुंच चुके मुखिया जी सेना के अंदर और बाहर कई लोगों की आंख की किरकिरी बने हुए थे. हत्या की सीबीआई जांच की मांग हो रही है. जांच के बाद संभव है कि उनकी हत्या के रहस्यों का खुलासा हो जाये.
----देवेंद्र गौतम
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नपुंसक विरोध
केन्द्र सरकार का तुगलकी - फरमान एकाएक २३-०५-२०१२ को पेट्रोल की कीमत ७-५४ रुपये
पैसे प्रति लीटर बढ़ा दी गयी। देश के हर पेट्रोल पम्पों पर अपनी अपनी
गाड़ियों के साथ रात १२ बजे तक ग्राहकों की भारी भीड़ ताकि अपने अपने
संसाधन और वाहन के हिसाब से वे अधिक से अधिक पेट्रोल भराकर बढ़ी हुई कीमत
को कुछ दिन के लिेए "मात" दे सकें। वैसे भी दूरगामी परिणामों के बारे में सोचने की फुर्सत किसे है? उस भारी भीड़ में पेट्रोल पम्प वाले ने अपनी "आसन्न व्यावसायिक क्षतिपूर्ति" के लिए किसको कितना कम पेट्रोल दिया यह एक अलग प्रसंग है। मगर यह भीड़ "स्वतः-स्फूर्त" थी जिसमें कितनों को खाली हाथ भी लौटना पड़ा।
आज ३१-०५-२०१२ को तमाम विपक्षी दलों और संगठनों द्वारा पेट्रोल की मूल्य-वृद्धि के खिलाफ "भारत बन्द" का आयोजन किया गया है। उम्मीद है २३-०५-२०१२ की रात में मूल्य-वृद्धि से पहले भराये गए पेट्रोल अब तक खत्म हो गए होंगे। क्या वही "स्वतः-स्फूर्त" जनता की भीड़ विरोध में आज सड़कों पर उतरेगी? कभी नहीं। सम्भव ही नहीं है क्योंकि राजनैतिक दलों और आम जनता के बीच मे सिर्फ "वोट" का व्यावसायिक सम्बन्ध ही तो रह गया है।
हाँ सड़कों पर उतरेगी वो प्रायोजित भीड़ जिनका स्वार्थ राजनैतिक दलों और संगठनों से जुड़ा हुआ है। फिर सड़कों पर होगा वही गुण्डई का नंगा नाच, सरकारी (जनता) सम्पत्ति का नुकसान और दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी छीनने का खेल जिसे हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर टी० वी० में देखेंगे। शाम में तथाकथित बुद्धिजीवियों की टीम के साथ "प्राइम टाइम" में आकर न्यूज चैनल वाले अपने अपने ज्ञान का पिटारा खोलेंगे, चैनल का टी० आर० पी० बढ़ेगा। सबेरे देश के हर हिस्से में स्थानीय "प्रभावशाली लोगों" की प्रमुखता के साथ अखबारों में फोटो और उनके "कारनामे" का समाचार जो सम्बन्धित दल के आकाओं तक पहुँचे। शाम तक हम सब भूल जायेंगे और अगली सुबह से "फिर वही बात रे वही बात"।
केन्द्र सरकार का कई राजनैतिक दलों द्वारा दिल्ली में दिलो जान से समर्थन के बावजूद वे इस भारत बन्द में शामिल होने का जोर शोर से विज्ञापन भी कर रहे हैं ताकि "आमलोगों" को पुनः बेवकूफ बनाने में वे सफल हो सकें। इस नपुंसक विरोध का क्या मतलब? आम जनता क्यों नहीं है राजनैतिक दलों के साथ? यह सवाल भी कम मौजूं नहीं है। देश के रहनुमाओं द्वारा छः दशकों से लगातार छली गयी जनता की स्थिति उस रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग की तरह है जो तूफान आने से पहले अपने सर को बालू में यह सोचकर छुपा लेता है कि "अब मेरा तूफान कुछ नहीं बिगाड़ सकता"। खैर--- जय हो भरतवंशी सन्तान - मेरा भारत महान।
आज ३१-०५-२०१२ को तमाम विपक्षी दलों और संगठनों द्वारा पेट्रोल की मूल्य-वृद्धि के खिलाफ "भारत बन्द" का आयोजन किया गया है। उम्मीद है २३-०५-२०१२ की रात में मूल्य-वृद्धि से पहले भराये गए पेट्रोल अब तक खत्म हो गए होंगे। क्या वही "स्वतः-स्फूर्त" जनता की भीड़ विरोध में आज सड़कों पर उतरेगी? कभी नहीं। सम्भव ही नहीं है क्योंकि राजनैतिक दलों और आम जनता के बीच मे सिर्फ "वोट" का व्यावसायिक सम्बन्ध ही तो रह गया है।
हाँ सड़कों पर उतरेगी वो प्रायोजित भीड़ जिनका स्वार्थ राजनैतिक दलों और संगठनों से जुड़ा हुआ है। फिर सड़कों पर होगा वही गुण्डई का नंगा नाच, सरकारी (जनता) सम्पत्ति का नुकसान और दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी छीनने का खेल जिसे हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर टी० वी० में देखेंगे। शाम में तथाकथित बुद्धिजीवियों की टीम के साथ "प्राइम टाइम" में आकर न्यूज चैनल वाले अपने अपने ज्ञान का पिटारा खोलेंगे, चैनल का टी० आर० पी० बढ़ेगा। सबेरे देश के हर हिस्से में स्थानीय "प्रभावशाली लोगों" की प्रमुखता के साथ अखबारों में फोटो और उनके "कारनामे" का समाचार जो सम्बन्धित दल के आकाओं तक पहुँचे। शाम तक हम सब भूल जायेंगे और अगली सुबह से "फिर वही बात रे वही बात"।
केन्द्र सरकार का कई राजनैतिक दलों द्वारा दिल्ली में दिलो जान से समर्थन के बावजूद वे इस भारत बन्द में शामिल होने का जोर शोर से विज्ञापन भी कर रहे हैं ताकि "आमलोगों" को पुनः बेवकूफ बनाने में वे सफल हो सकें। इस नपुंसक विरोध का क्या मतलब? आम जनता क्यों नहीं है राजनैतिक दलों के साथ? यह सवाल भी कम मौजूं नहीं है। देश के रहनुमाओं द्वारा छः दशकों से लगातार छली गयी जनता की स्थिति उस रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग की तरह है जो तूफान आने से पहले अपने सर को बालू में यह सोचकर छुपा लेता है कि "अब मेरा तूफान कुछ नहीं बिगाड़ सकता"। खैर--- जय हो भरतवंशी सन्तान - मेरा भारत महान।
ग़ज़लगंगा.dg: कौन किसकी पुकार पर आया
कौन किसकी पुकार पर आया.
जो भी आया करार पर आया.
तेज़ रफ़्तार कार पर आया.
कौन गर्दो-गुबार पर आया?
सबकी गर्दन को काटने वाला
आज चाकू की धार पर आया.
जो छपा था महज़ दिखावे को
मैं उसी इश्तेहार पर आया.
शाख दर शाख कोपलें फूटीं
खुश्क जंगल निखार पर आया.
उसने दोजख से इक उछाल भरी
और जन्नत के द्वार पर आया.
एक सौदा निपट गया गोया
लाख मांगा हज़ार पर आया.
सबके तलवे लहूलुहान मिले
कौन फूलों के हार पर आया?
जीत पर उतना खुश नहीं था मैं
जो मज़ा उसकी हार पर आया.
एक तूफ़ान थम गया गौतम
एक दरिया उतार पर आया.
----देवेंद्र गौतम
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देखो फिर से नभ की ओर
चेहरा क्यूँ दिखता कमजोर।
देखो फिर से नभ की ओर।।
तारे जहाँ सदा हँसते हैं,
और चमकता चंदा।
जी सकते तो जी लो ऐसे,
छूटेगा हर फंदा।
आग उगलता सूरज फिर भी,
लेकर आता नूतन भोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
नदियों की खुशियाँ तो देखो,
गीत हमेशा गाती है।
हर विरोध के पत्थर को भी,
सँग बहा ले जाती है।
तब उसकी मस्ती बढ़ती जब,
घटा घिरे घनघोर
देखो फिर से नभ की ओर।।
भले तोड़ ले कोई सुमन को,
फिर भी वह तो हँसता है।
और सुगंध भी कैद नहीं है,
हवा के सँग सँग बहता है।
चिड़ियों की कलरव में धुन है,
मत कहना तू शोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
तारे जहाँ सदा हँसते हैं,
और चमकता चंदा।
जी सकते तो जी लो ऐसे,
छूटेगा हर फंदा।
आग उगलता सूरज फिर भी,
लेकर आता नूतन भोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
नदियों की खुशियाँ तो देखो,
गीत हमेशा गाती है।
हर विरोध के पत्थर को भी,
सँग बहा ले जाती है।
तब उसकी मस्ती बढ़ती जब,
घटा घिरे घनघोर
देखो फिर से नभ की ओर।।
भले तोड़ ले कोई सुमन को,
फिर भी वह तो हँसता है।
और सुगंध भी कैद नहीं है,
हवा के सँग सँग बहता है।
चिड़ियों की कलरव में धुन है,
मत कहना तू शोर।।
देखो फिर से नभ की ओर।।
दहेज मांगने वाले गधे और कुत्ते से भी बदतर हैं
गधा और कुत्ता दो जानवरों का नाम है। इन्हें गाली के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है।
गधे का अर्थ बेवक़ूफ़ लिया जाता है और कुत्ते का अर्थ लालची लिया जाता है।
गधे और कुत्ते, दोनों की ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि वे दहेज कभी नहीं मांगते।
दहेज एक बुरी रस्म है। जिसने इसकी शुरूआत की उसने एक बड़ी बेवक़ूफ़ी की और जिसने भी सबसे पहले दहेज मांगा, उसने लालच की वजह से ही ऐसा किया। आज भी यह रस्म जारी है। एक ऐसी रस्म, जिसने लड़कियों के जीवन का नर्क बना दिया और लड़कों को आत्म सम्मान से ख़ाली एक बिकाऊ माल।
यही बिकाऊ दूल्हे वास्तव में गधे और कुत्ते से बदतर हैं। इनके कारण ही बहुत सी बहुएं जला दी जाती हैं और बहुत से कन्या भ्रूण मां के पेट में ही मार दिए जाते हैं।
ये केवल दहेज मांगने की ही मुल्ज़िम नहीं हैं बल्कि बहुत हत्याओं में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष इनका हाथ होता है।
20 मई 2012 को आमिर ख़ान के टी. वी. प्रोग्राम ‘सत्यमेव जयते‘ का इश्यू दहेज ही था। उन्होंने दहेज के मुददे को अच्छे ढंग से उठाया। उन्होंने कई अच्छे संदेश दिए।
अभिनय प्रतिभा का सार्थक इस्तेमाल यही है।
गधे का अर्थ बेवक़ूफ़ लिया जाता है और कुत्ते का अर्थ लालची लिया जाता है।
गधे और कुत्ते, दोनों की ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि वे दहेज कभी नहीं मांगते।
दहेज एक बुरी रस्म है। जिसने इसकी शुरूआत की उसने एक बड़ी बेवक़ूफ़ी की और जिसने भी सबसे पहले दहेज मांगा, उसने लालच की वजह से ही ऐसा किया। आज भी यह रस्म जारी है। एक ऐसी रस्म, जिसने लड़कियों के जीवन का नर्क बना दिया और लड़कों को आत्म सम्मान से ख़ाली एक बिकाऊ माल।
यही बिकाऊ दूल्हे वास्तव में गधे और कुत्ते से बदतर हैं। इनके कारण ही बहुत सी बहुएं जला दी जाती हैं और बहुत से कन्या भ्रूण मां के पेट में ही मार दिए जाते हैं।
ये केवल दहेज मांगने की ही मुल्ज़िम नहीं हैं बल्कि बहुत हत्याओं में भी प्रत्यक्ष और परोक्ष इनका हाथ होता है।
20 मई 2012 को आमिर ख़ान के टी. वी. प्रोग्राम ‘सत्यमेव जयते‘ का इश्यू दहेज ही था। उन्होंने दहेज के मुददे को अच्छे ढंग से उठाया। उन्होंने कई अच्छे संदेश दिए।
अभिनय प्रतिभा का सार्थक इस्तेमाल यही है।
शायद जीवन को मिले एक नया विस्तार
आँगन सूना घर हुआ, बच्चे घर से दूर।
मजदूरी करने गया, छोड़ यहाँ मजबूर।।
जल्दी से जल्दी बनें, कैसे हम धनवान।
हम कुदाल बनते गए, दूर हुई संतान।।
ऊँचे पद संतान की, कहने भर में जोश।
मगर वही एकांत में, भाव-जगत बेहोश।।
कहाँ मिला कुछ आसरा, वृद्ध हुए माँ बाप।
कहीं सँग ले जाय तो, मातु पिता अभिशाप।।
जैसी भी है जिन्दगी, करो सुमन स्वीकार।
शायद जीवन को मिले एक नया विस्तार।।
मजदूरी करने गया, छोड़ यहाँ मजबूर।।
जल्दी से जल्दी बनें, कैसे हम धनवान।
हम कुदाल बनते गए, दूर हुई संतान।।
ऊँचे पद संतान की, कहने भर में जोश।
मगर वही एकांत में, भाव-जगत बेहोश।।
कहाँ मिला कुछ आसरा, वृद्ध हुए माँ बाप।
कहीं सँग ले जाय तो, मातु पिता अभिशाप।।
जैसी भी है जिन्दगी, करो सुमन स्वीकार।
शायद जीवन को मिले एक नया विस्तार।।
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है
अजब मसायल से वास्ता है
न हल है कोई न रास्ता है
गुज़र रहा है ज़माना कुछ यूं
उसूल कोई न ज़ाब्ता है
मिज़ाज क्यूं हो गया है ऐसा
ग़र्ज़ किसी से न वास्ता है
ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है
निशात के दिन गुज़र गए ‘शाज़‘
उदास लम्हों से राब्ता है
शाज़ रहमानी,
कटिहार, बिहार
न हल है कोई न रास्ता है
गुज़र रहा है ज़माना कुछ यूं
उसूल कोई न ज़ाब्ता है
मिज़ाज क्यूं हो गया है ऐसा
ग़र्ज़ किसी से न वास्ता है
ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है
निशात के दिन गुज़र गए ‘शाज़‘
उदास लम्हों से राब्ता है
शाज़ रहमानी,
कटिहार, बिहार
ग़ज़लगंगा.dg: रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
घर से निकला तो हूं, किधर जाऊं?
पेड़ की छांव में ठहर जाऊं?
धूप ढल जाये तो मैं घर जाऊं?
हर हकीकत बयान कर जाऊं?
सबकी नज़रों से मैं उतर जाऊं?
जो मेरा जिस्मो-जान था इक दिन
उसके साये से आज डर जाऊं?
जाने वो मुझसे क्या सवाल करे
हर खबर से मैं बाखबर जाऊं.
जिसने रुसवा किया कभी मुझको
फिर उसी दर पे लौटकर जाऊं?
क्या पता वो दिखाई दे जाये
दो घडी के लिए ठहर जाऊं.
वो भी फूलों की राह पर निकले
मैं भी खुशबू से तर-ब -तर जाऊं.
अपना चेहरा बिगाड़ रक्खा है
उसने चाहा था मैं संवर जाऊं.
मैंने आवारगी बहुत कर ली
सोचता हूं कि अब सुधर जाऊं.
----देवेंद्र गौतम
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