हिंदी ब्लागर किस पोस्ट को ज़्यादा पढ़ते हैं ?-एक सर्वे जनहित में


एक बार एक कवि ने कहा था कि आपको पोस्ट लिखने की ज़रूरत ही नहीं है। बस वक्ष वक्ष वक्ष और ऐसे ही अल्फ़ाज़ लिख दीजिए। लोग पागलों की तरह उसे ऐसे पढ़ने के लिए टूट पड़ेंगे जैसे उन्होंने कभी वक्ष देखा ही न हो।
कुछ शरपसंद ब्लागर ऐसे हैं कि जब उनकी बात नहीं मानी जाती तो वे अपने निजी मुददे को सांप्रदायिकता से जोड़ देते हैं। कहते हैं कि फ़लां ब्लाग पर उस विशेष पार्टी की औरतों के नाम और फ़ोटो हैं और उस ब्लाग की पोस्ट में ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ भी हैं और ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ वाली पोस्ट उस ब्लाग पर सबसे ज़्यादा पसंद की जा रही हैं।
भाई पढ़ने वाले भी तुम्हारी पार्टी के ही हैं। इस तरह तो तुम ख़ुद यह बता रहे हो कि हमारे लोग उन पोस्टों पर टूट कर पड़ते हैं जिनमें ऐसे वैसे अल्फ़ाज़ हों।
उसी ब्लाग पर सैकड़ों दूसरी पोस्टें भी हैं जिनमें ये अल्फ़ाज़ नहीं हैं। उन्हें पढ़ा होता तो ‘लाइक‘ के कालम में वे दूसरी पोस्टें आ जातीं जिनमें टेक्नीकल जानकारी या दूसरी बातें बताई गई हैं।
‘लाइक‘ कालम में ऐसी वैसी पोस्टों को लाया कौन ?
हिंदी ब्लागर ही लाए हैं और कौन लाया है !!!
इसी विशेष ब्लाग पर नहीं हर ब्लाग पर ऐसी पोस्टों के पाठक सबसे ज़्यादा मिलेंगे।
अपने ब्लाग का स्टैट चेक करो तो पता चलता है कि हिंदी ब्लागर कैसे कैसे घिनौने अल्फ़ाज़ लिखकर पढ़ने का मसौदा तलाश करते हैं।
यह देखा तो कुछ औरतों ने तो औरतपने ही हदें पार करके ही लिखना शुरू कर दिया। बाद में ये ऐसे लजाती हैं जैसे कि , जैसे कि ...
शीर्षक में प्यार, बोल्ड और वासना अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल कीजिए और फिर देखिए कि आपके पाठक कितने ज़्यादा बढ़ जाते हैं। हिंदी ब्लागरों को यही सब पसंद है।
दीन धर्म की बात बताने वाले ब्लाग पर ब्लागर जाते ही कहां हैं ?
ब्लागर अच्छी चीज़ें पढ़ना शुरू करें तो हरेक ब्लाग का ‘लाइक‘ कालम अपने आप बदल जाएगा।
जो भी कविता करने वाली बोल्ड होकर लिखे, उसे पढ़ो ही मत और वह लिखे और ब्लागर पढ़ें तो फिर उछल कूद मत मचाओ कि हाय ! हमारा पढ़ा हुआ सबसे ज़्यादा पढ़ा हुआ क्यों बन गया ?
ज़्यादा उछल कूद मचाओगे तो पर्दा तुम्हारा ही खुलेगा कि तुम इंटरनेट पर बीवी बच्चों को छोड़कर दिन रात पढ़ते क्या हो ?
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विज्ञान ने खोजा गॉड पार्टिकल

बह्मांड की उत्पत्ति और जीवन के सृजन संबंधी कई प्रश्नों का जवाब देने में सक्षम गॉड पार्टिकल को बुधवार को खोज लिया गया।

स्विटजरलैंड और फ्रांस की सीमा पर स्थित 27 किलोमीटर लंबी एक भूमिगत सुरंग में हिग्स बोसोन पर वर्ष 2009 से दिन-रात शोध कर रही यूरोपीय परमाणु शोध संगठन (सर्न) की दो टीमों (एटलस) और (सीएमएस) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में इससे मिलते-जुलते कण के अस्तित्व की बात स्वीकार की।

सर्न की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हमें अपने आंकड़ों में एक नए कण के पाए जाने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह हमारे शोध संयंत्र लार्ज हेड्रोन कोलाइडर के 125 और 126 जीईवी क्षेत्र में स्थित है। यह एक अद्भुत क्षण हैं। हमने अब तक मिले सभी बोसोन कणों में से सबसे भारी बोसोन को खोज निकाला है। सर्न ने इन नए आंकड़ों को सिग्मा 05 श्रेणी में स्थान दिया है, जिसके मायने होतें हैं नए पदार्थ की खोज। सेर्न के महानिदेशक राल्फ ह्यूर ने कहा कि प्रकृति को लेकर हमारी समझ में इजाफा करने की दिशा में हमने एक मील का पत्थर हासिल कर लिया। सेर्न के शोध निदेशक सेर्गियो बर्तालुकी ने हिग्स बोसोन के आस्तित्व की दिशा में प्रबल संकेत मिलने पर गहरी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारे लिए इतने अद्भुत नतीजों को लेकर उत्साहित नहीं होना बेहद चुनौतीभरा काम है। हमने पिछले वर्ष ठान लिया था कि 2012 में या तो हम हिग्स बोसोन को खोज निकालेंगे अथवा हिग्स थ्योरी को ही खारिज कर देंगे। हम एक अहम पड़ाव पर पहुंच गए हैं और भविष्य में इन आंकड़ों पर और अधिक प्रकाश पड़ने से हमारी समझ में इजाफा होगा। हिग्स बोसोन पर आए मौजूदा नतीजे वर्ष 2011 के आंकड़ों पर आधारित हैं और इस वर्ष के आंकड़ों पर भी अभी भी अध्ययन चल रहा है। हिग्स बोसोन पर 2011 के आंकड़ों से जुड़ी सेर्न की विस्तृत रिपोर्ट के इस महीने के आखिर तक जारी होने की उम्मीद है। इन नतीजों के जारी होने के साथ ही ब्रह्म कण (गॉड पार्टिकल) अब एक रहस्य या परिकल्पना मात्र नहीं रह गया है। ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने वर्ष 1964 में इस कण की परिकल्पना को जन्म दिया था। इस कण का नाम हिग्स और भारतीय वैग्यानिक सतरूद्रनाथ बसु के नाम पर रखा गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले चार दशकों के दौरान हिग्स बोसोन के आस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर पाए। ऐसा माना जाता है कि 13.7 अरब वर्ष पहले जब बिग बैंग कहलाने वाले महाविस्फोट के जरिए ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई होगी तो हिग्स बोसोन आस्तित्व में आया होगा और इसी से पदार्थ तथा दूसरे कणों की रचना हुई होगी तथा आकाशगंगाओं नक्षत्रों तथा जीवन इत्यादि ने आकार लिया होगा। वैज्ञानिक इसी वजह से इसे ब्रह्माकण (गॉड पार्टिकल) का नाम देते हैं। सृष्टि में हर चीज को कार्य करने के लिए द्रव्यमान की आवश्यकता होती है। अगर इलेक्ट्रानों में द्रव्यमान नहीं होता तो परमाणु नहीं होते और परमाणुओं के बगैर दुनिया में किसी भी चीज का सृजन असंभव था। डा हिग्स ने इसे लेकर सिद्धांत की खोज की जिसे आगे चलकर (हिग्स सिद्धांत) के तौर पर जाना गया। इससे कणों का द्रव्यमान सुनिश्चित्त करना संभव हो सका। डा हिग्स ने कहा कि इस माडल को काम करने के लिए एक सबसे भारी कण की आवश्यकता थी जिसे हिग्स बोसोन का नाम दिया गया। हिग्स बोसोन अभी तक एक परिकल्पना मात्र ही था लेकिन वैज्ञानिकों को चूंकि इसके कुछ विशेष लक्षण ज्ञात थे इसलिए उन्हें पता था कि अगर वे इसे खोजने की मुहिम छेड़ते हैं तो यह कैसा दिखाई देगा। हिग्स बोसोन का द्रव्यमान बाकी सभी बोसोन कणों में सबसे अधिक था। सेर्न के वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्म कण की खोज सुपर कणों और डार्क मैटर की खोज का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।
दैनिक हिन्दुस्तान दिनांक 5 जुलाई 2012 में प्रकाशित
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Blog News: धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल

अख्तर खान साहब ने वह पोस्ट ही मिटा डाली है जो उनके सचिव ने भास्कर डोट कॉम से एक अंश उठाकर उनके ब्लॉग  पर पोस्ट बना दी थी. जिन ब्लॉगर्स ने अख्तर साहब के ब्लॉग पर मात्र एक अंश पर आपत्ति प्रकट की , उनमें से किसी ने भास्कर डोट कॉम की पूरी पोस्ट  पर भी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की जो कि 8 गुना ज़्यादा है , है न कमाल की बात ?
कुछ हिंदी ब्लॉगर्स ऐसी दोहरी सोच लेकर भी बुद्धिवादी कहलाते हैं.
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Blog News: धर्म के नाम पर 'सेक्स' का खेल
PHOTOS: धर्म के नाम पर कुछ यूं खेला जाता रहा है 'सेक्स' का खेल!

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आत्महत्या, ड्रग्स और परिवार नियोजन


आज भारत में हर चौथे मिनट पर एक नागरिक आत्महत्या कर रहा है. हरेक उम्र के आदमी मर रहे हैं. अमीर ग़रीब  सब मर रहे हैं. उत्तर दक्षिण में सब जगह मर रहे हैं। हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सब मर रहे हैं। बच्चे भी मर रहे हैं। जिनके एक दो हैं वे ज्यादा मर रहे हैं और जिनके दस पांच हैं वे कम मर रहे हैं। जिनके एक बच्चा था और वही मर गया तो माँ बाप का परिवार नियोजन सारा रखा रह  जाता  है। दस पांच में से एक चला जाता है तो भी माँ  बाप के जीने के सहारे बाक़ी रहते हैं। जिन्हें दुनिया ने कम करना चाहा वे बढ़ रहे हैं और जो दूसरों का हक़ भी अपनी औलाद के लिए समेट  लेना चाहते थे उनके बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं  या फिर ड्रग्स लेकर मरने से बदतर जीते रहते हैं। 
कोई अक्लमंद अब इन्हें बचा नहीं सकता। ऊपर वाला ही बचाए तो बचाए . 
लेकिन वह किसी को क्यों बचाए जब वह  उसकी मानता ही नहीं .
जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।
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खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी

आज के एक अखबार की लीड खबर का शीर्षक है 'कड़े तेवर दिखायेंगे पीएम'. उप शीर्षक है 'पेट्रोल सस्ता कर डीजल महंगा करने की तैयारी' 
संप्रंग सर्कार कठोर फैसले लेने का यह बेहतर मौका मान रही है. अर्थात वह हमेशा ऐसे लेने के लिए मौके की ताक में रहती है जिससे आम आदमी का जीवन और कष्टमय हो जाए. उस आम आदमी का जिसके लिए प्रतिदिन 28  रुपये के खर्च करने की क्षमता को काफी मान रही है यह सरकार. क्योंकि इसी में आबादी के उस हिस्से की भलाई है जिसके बाथरूम की मरम्मत के लिए 35  लाख रुपये भी कम पड़ते हैं. देश का एक बच्चा भी जानता है की तमाम जिंसों की ढुलाई डीजल चालित वाहनों से होता है. डीजल को महंगा करने से उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें कैसे कम होंगी कम से कम हमारे जैसे मंद बुद्धि के लोगों की समझ से बाहर है. पीएम अर्थशास्त्री हैं. हो सकता है उनके अर्थशास्त्र में ऐसा कोई गणित हो. या फिर यह भी हो सकता है कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का यह सिद्धांत कि अपने चरम पर पहुंचकर हर चीज विलीन हो जाती है काम कर रहा हो. सरकार को यकीन हो कि महंगाई को उसके चरम तक पहुंचा दो वह खुद ही ख़त्म हो जायेगी.
पेट्रोल की कीमत घटने से एलिट क्लास के उन लोगों को राहत मिलेगी.जिनके पास धन है. जिनकी क्रयशक्ति बेहतर है. लेकिन डीजल की कीमत बढ़ने पर निम्न मध्यवर्ग और मजदूर-किसान यानी हर वर्ग के लोग प्रभावित होंगे. इसी तरह रसोई गैस की राशनिंग जैसे कड़े कदम उठाने की तैयारी हो रही है. बाकी कड़े फैसले भी जनता पर कहर ढानेवाले ही हैं. अब भारत की जनता पांच वर्ष के लिए सत्ता की बागडोर थमाने की भूल कर ही बैठी है तो भुगतना तो उसी को पड़ेगा. इसलिए जनाब! आप चिंता मत कीजिये. जो मर्जी हो कर लीजिये. पूरी आबादी का गला घोंट दीजिये. लेकिन भगवान के लिए कुछ तो शर्म कीजिये आखिर आप 2014  में जनता को क्या मुंह दिखायेंगे.  

----देवेंद्र गौतम  

खबरगंगा: देश को रसातल में ले जाने की तैयारी:

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माही ! हमें तुम्हारी चिंता है !

गुडगाँव की माही पिछले कई घंटों से बोरवेल में ज़िंदगी और मौत से संघर्ष कर रही है ! आज से कई साल पहले मैंने एक पोस्ट लिखी थी ! आज भी वह मुझे उतनी ही प्रासंगिक लगती है जितनी उस वक्त थी जब मैंने इसे लिखा था ! सोनू और माही के साथ हुए इन हादसों के बीच और भी कई ऐसे ही हादसे हो चुके हैं जिनमें कई मासूम बच्चों ने अपनी जान गँवा दी है !  हर बच्चा प्रिंस की तरह खुशनसीब नहीं निकला जो सेना और प्रशासन की अथक मेहनत के बाद बोरवेल से सकुशल जीवित बाहर निकल आया था ! आज मैं सभी लोगों से यही अपील करना चाहती हूँ अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए किसी और की मुखापेक्षा ना करें ! स्वयं सतर्क रहें और प्रयत्नशील हों !

और सोनू हार गया

    मासूम सोनू ने गहरे बोरवेल में अपनी जान गँवा दी। चार दिन तक गड्ढे के अन्दर् मौत और ज़िन्दगी के बीच लम्बी खींचतान चलती रही और गड्ढे के बाहर ग्रामीणों और अधिकारियों के बीच आरोपों प्रत्यारोपों का निष्प्रयोजन लम्बा सिलसिला चलता रहा। वहाँ लहरा पुरा में हज़ारों ग्रामवासी बोरवेल के पास और सम्पूर्ण देश में करोड़ों दर्शक टी वी के सामने चार दिन तक साँस रोके सोनू के गड्ढे से सही सलामत बाहर आ जाने की प्रतीक्षा करते रहे। लेकिन सभी की प्रार्थनायें निष्फल हो गयीं। किसी की ग़लती का ख़ामियाज़ा उस अबोध बालक ने अपने प्राणों की आहुती देकर चुकाया। आश्चर्य होता है जो ग्रामवासी चार दिन तक खाना पीना सोना सब भूल कर दिन रात बोरवेल के पास सोनू को स्वयम बाहर निकालने की अनुमति देने के लिये प्रशासनिक अधिकारियों से जूझते रहे वे दुर्घटना से पहले चार मिनिट का समय निकाल कर किसी पत्थर से उस एक डेढ़ फीट के गड्ढे को ढँक क्यों नहीं सके ? क्या हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ अपने घर के दरवाज़े के अन्दर तक ही सीमित है ? क्या हम और हमारे बच्चे सड़कों और रास्तों का उपयोग नहीं करते ? तो फिर हम वहाँ उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक क्यों नहीं हैं ? घर के दरवाज़े के बाहर घटी हर दुर्घटना के लिये क्यों हम सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने के लिये तत्पर रहते हैं ? क्या नागरिकों का कोई दायित्व नहीं है ? आवश्यक्ता है खुद को चौकस और चुस्त दुरुस्त रखने की। जिस जगह बोरवेल खोदने का काम आरंभ हो उस मोहल्ले के निवासियों को स्वयम काम के ख़त्म होने तक सबकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये और ठेकेदार या खुदाई करने वाले काम बन्द करने के बाद गड्ढे को ठीक से ढँक कर गये हैं या नहीं इसकी देख रेख करनी चाहिये। जिस गाँव में बोरवेल खुदे वहाँ के प्रधान को खुद अपनी निगरानी में यह काम करवाना चाहिये। अन्यथा ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी और कई मासूम सोनू की तरह ज़िन्दगी की जंग हारते रहेंगे। नेताओं से मेरी अपील है कि वे भोले भाले ग्राम वासियों को उकसा कर सिर्फ भड़काने का काम ही ना करें उन्हें उनके कर्तव्यों के प्रति भी सचेत करें क्योंकि यह तो निश्चित है जो लोग ज़रा से इशारे पर आगजनी , पथराव ,  घेराव कर सकते हैं , घंटों के लिये जाम लगा सकते हैं , हड़ताल , आन्दोलन और संघर्ष कर सारी व्यवस्था को तहस-नहस कर सकते हैं वे सही दिशा निर्देश मिलने पर एक सुन्दर , स्वस्थ और सुरक्षित समाज का निर्माण भी कर सकते हैं।
साधना वैद
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ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.

पहले खुली हवा में पौधे उगते थे
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.

लाख यहां मन्नत मांगो, मत्था टेको
आस यहां  पर किसकी पूरी होती है.

खाली हाथ कहीं कुछ काम नहीं बनता
हर दफ्तर की कुछ दस्तूरी होती है.

किसको नटवरलाल कहें इस दुनिया में
जाने किसकी क्या मजबूरी होती है.

उनका एक लम्हा कटता है जितने में
अपनी दिनभर की मजदूरी होती है.

-----देवेंद्र गौतम

ग़ज़लगंगा.dg: रिश्तों की पहचान अधूरी होती है:

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जरुरत नहीं हिंदी सीखने की??

ऑस्ट्रेलियाई सरकार द्वारा ये बयान दिया जाना की भारत जाने वालें उनके राजनयिकों को वहां की भाषा (हिंदी) सीखने की जरुरत नहीं है, हम सबका, हिंदी का और समूचे भारत का अपमान है | उनका ये मानना है भारत में सारे काम-काज अंग्रेजी में ही होते हैं और भारत एक अंग्रेजी लोकतंत्र है | अन्य कोई भी देश जैसे चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस आदि जाने वाले राजनयिकों को वहां की भाषा सीखना अनिवार्य है पर भारत जाने वालों का काम अंग्रेजी से ही चल जायेगा | भले ही यह कहकर उन्होंने हमारा अपमान किया हो पर उनकी बातें सच ही तो है | एक तरह से ये हमारे और हमारी सरकार के लिए बहुत ही शर्म की बात है और चेहरे पे जूता पड़ने जैसा है | हम और हमारी सरकार जब स्वयं अपनी भाषा की इज्ज़त नहीं कर पाते तो कोई और क्या करेगा ?
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अंदाज ए मेरा: शीर्षक सुझाएं.....

अंदाज ए मेरा: शीर्षक सुझाएं.....: कुछ दिनो पूर्व एक अखबार के शीर्षक और इसे लेकर फेसबुक पर चली लंबी बहस ने काफी कुछ सोचने मजबूर किया। अखबार में एक खबर का फालोअप था और शीर्ष...
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fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के


25 गैस सिलिंडरों के फटने की घटना को छोड़ दें तो ब्रह्मेश्वर मुखिया का श्राद्धकर्म शांति पूर्वक संपन्न हो गया. 13 जून को इस मौके पर दर्जनों सांसद, विधायक और अन्य जन प्रतिनिधि श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुंचे. इससे पता चलता है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया भले ही एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन रणवीर सेना के संस्थापक थे लेकिन राजनीतिज्ञों के बीच उनकी अच्छी पैठ थी. वर्ष 2002 में नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी से पूर्व उन्हें चेहरे से उनके बहुत करीबी लोग ही पहचानते थे. निश्चित रूप से उनमें सत्ता की राजनीति के खिलाडियों की अच्छी तादाद थी. यह राजनैतिक संपर्क जेल में तो नहीं ही बने होंगे.जाहिर है कि नक्सल विरोध इसका मूल तत्व रहा होगा. अगड़ी जातियों के मतों का आकर्षण भी प्रेरक रहा होगा. यदि नहीं तो क्या किसी नक्सली नेता की मृत्यु पर भी श्रद्धांजलि देने के लिए ये जन  प्रतिनिधि जायेंगे?
रणवीर सेना सामंतों और बड़े किसानों के हित में नक्सलियों के साथ हिंसक युद्ध के लिए बनी निजी सेना थी. इसमें मुख्यतः भूमिहार जाति के लोग थे. नक्सलियों से लड़ने के लिए इससे पूर्व बिहार में राजपूतों की कुंवर सेना, सनलाईट सेना, ब्राह्मणों की आज़ाद सेना,  कुर्मियों की भूमि सेना जैसी कई सेनाएं बन चुकी थीं. लेकिन वे नक्सलियों से लड़कर मृतप्राय हो चुकी थीं. रणवीर सेना सबसे अंत में बनी और दर्जनों जनसंहारों को अंजाम देकर अगड़ी जातियों की हितैषी खूंखार संस्था के रूप में चर्चित हो चुकी थी. हालांकि इस सेना ने आमने सामने की लड़ाई से हमेशा परहेज़ किया. हरिजनों को नक्सली मान कर अचानक हमले में उनका संहार करना इसकी मुख्य कार्यशैली थी. चाहे वह गांव नक्सल समर्थक हो अथवा नहीं. कहते हैं कि मियांपुर जनसंहार के बाद ब्रह्मेश्वर मुखिया को यह पता चला कि भूमिहारों पर हमला करने वाले नक्सली हरिजन नहीं बल्कि यादव हैं. ब्रह्मेश्वर मुखिया ने पटना में अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर घोषित किया था कि अब उनकी लड़ाई हरिजनों से नहीं यादवों से है. इस वक्तव्य के बाद लालू प्रसाद सबसे ज्यादा परेशां हुए थे. उन्होंने मुखिया के साथ गुप्त बैठक कर भूमिहार और यादव जाति के बीच इस संभावित जंग को रोक दिया था. इसके बाद से ही बिहार में जनसंहारों का सिलसिला थमा था. वर्ग संधर्ष के नाम पर जातीय युद्ध का एक लम्बा दौर चला था.

---देवेंद्र गौतम
fact n figure: कुफ्र टूटा खुदा-खुदा कर के:

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ग़ज़लगंगा.dg: मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.

जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.

कई बार लौटा हूं उसकी गली से
कहीं मुझसे मिलने से इनकार कर दे!

कभी दोस्ती की रवायत निभाए
कभी वो पलटकर पलटवार कर दे.

कोई मेरी छत के करे चार टुकड़े 
कोई मेरे आंगन में दीवार कर दे.

मैं क्या उसको समझूं, मैं क्या उसको जानूं 
मेरा हक भी जो मुझको थक-हार कर दे.

वो है या नहीं है, नहीं है कि है 
यही सोच मुझको न बीमार कर दे.

----देवेंद्र गौतम 


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आखिर आमिर क्यों मांगे माफ़ी भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) से

भारतीय चिकित्सा संघ (आईएमए) पता नहीं क्यों आमिर खान से बार बार माफ़ी मांगने की अपील कर रहा है | आमिर के कार्यक्रम "सत्यमेव जयते" में डॉक्टरों के बारें में जो भी दिखाया गया वही यथार्थ है | देखा जाय तो उसमे कम ही दिखाया गया | स्थिति तो उससे भी ज्यादा भयावह है | आज कोई भी डॉक्टर बनना चाहता है तो सिर्फ इसलिए की इस "धंधे" में बहुत "कमाई" है | नौकरी से अलग कमाई, प्राइवेट प्रेक्टिस से अलग कमाई और तरह तरह के कमीशन से अलग कमाई | इसके अलावा भी कई तरह के मौके मिल जाते हैं इन्हें कमाने के | मेरा निजी अनुभव है की बहुत से डॉक्टर मेडिकल दूकान वालों से मोती कमीशन खाने के लिए सिर्फ वही दवा लिखते हैं जो उसी दूकान में मिले और वो भी बहुत महँगी-महँगी | टेस्ट वगैरा के लिए खाश लैब में ही भेजते हैं जहाँ परसेंटेज मिलता है, उसमे भी बिना मतलब के टेस्ट |
अभी हाल में अपने नानाजी को कान और गला के एक डॉक्टर के पास ले गया | १५० उनकी फीस थी | पर कहा गया की २ चीज़ दिखाना है तो २ फीस लगेगा | ३०० रुपये देकर दिखने गया तो डॉक्टर ने जांच के बाद ७-८ दवाइयां लिख दी और साथ में ५-६ तरह के खून जाँच, मूत्र जाँच इत्यादि | डॉक्टर का ही स्टाफ बकायदा लैब और दवा दुकान तक पंहुचा भी आया | दवाइयां सारी १५० के आस-पास थी प्रति पत्ता | मैंने तो नानाजी को जाँच वगैरा के लिए मना किया पर वो माने नहीं और जाँच करवा ली | अगले दिन रिपोर्ट लेके डॉक्टर के पास गया तो डॉक्टर साहब ने कहा सब ठीक है बस हिमोग्लोबिन की कमी है और एक दवा और लिख दी |
ये तो कुछ भी नहीं | लोगों को न जाने और क्या-क्या झेलना पड़ता है | जो भी आज डॉक्टर है सिर्फ पैसा कमाने के लिए ही | समाज सेवा के लिए ये पेशा अपनाने वाले १००० में २ ही होंगे | फिर अगर इस सच्चाई को दिखाया गया तो इसमें गलत क्या है ? हाँ उस कार्यक्रम में एक-दो बातें गलत हो भी सकती है लेकिन वस्तुस्थिति कमोवेश यही है | वैसे सिर्फ डॉक्टरों पर ये आरोप लगाना गलत होगा | आज तो जो भी जिस पेशे में है सिर्फ पैसों के लिए ही है | कोई छात्र अपना करियर चुनने से पहले अपनी पसंद से ज्यादा इस बात पे ध्यान देता है की नौकरी किसमे जल्दी मिलेगी और पैसा कमाई किसमे ज्यादा होगा | पर डॉक्टरों के बारे में बोला इसलिए जा रहा है क्योकिं भारत में लोग डॉक्टर को भगवान् का दर्ज़ा देते हैं | और किसी पे उतना विश्वास नहीं होता जितना डॉक्टरों पे होता है | 
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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