Baawri Piya Ki - Sonu Nigam - Baabul

Song: Baawri piya ki
Singer: Sonu Nigam
Movie: Baabul
Year: 2006
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पाकिस्तान में ईसाईयों के घर क्यों जला दिए ?

पाकिस्तान के लाहौर में कथित ईशनिंदा के आरोप में लोगों ने ईसाईयों की कॉलोनी पर हमला बोल दिया। हमलावरों ने इनके घरों में जमकर तोड़फोड़ की और घर जला दिए। इसके विरोध में ईसाई समुदाय के लोगों ने विरोध-प्रदर्शन किया। तस्वीरों में देखते हैं कैसे घरों पर हुआ हमला और कैसे छलका ईसाईयों का दर्द। अपना घर जलाए जाने के बाद महिलाएं यहां पहुंची और रो पड़ीं।
इस घटना के विरोध में इसाई समुदाय के लोगों ने लाहौर में विरोध-प्रदर्शन किया। पुलिस ने दो हमलावरों को गिरफ्तार भी किया।

दीन की जानकारी न होने या उसकी जानकारी ग़लत होने से ही ज़ुल्म वुजूद में आता है। इसलाम का अर्थ है शांति। मुसलिम वह है जिसके अमल से शांति क़ायम हो और वह बनी रहे। मुसलिम बनने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। दूसरों को उनका हक़ देना पड़ता है लेकिन राजनीति इसके खि़लाफ़ चलती है।  
क़त्ल और ख़ून ख़राबा शैतानी अमल है। किसी समुदाय की बात पर मुसलमानों को ऐतराज़ हो तो वे सिर्फ़ हाकिमों से शिकायत कर सकते हैं। उन्हें किसी के घर जलाने का कोई हक़ नहीं है। मुसलमानों को कुछ भी करने से पहले यह ज़रूर देखना चाहिए कि इस मामले में अल्लाह का हुक्म और उसके नबी स. का तरीक़ा क्या है ?
इसलामी हुकूमत में अगर किसी ग़ैर मुस्लिम ज़िम्मी (जिसकी हिफ़ाज़त का ज़िम्मा सरकार पर हो) को सताया जाता है तो पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब स. ने फ़रमाया है कि
 ‘‘जिसने किसी मुआहिद (यानी ज़िम्मी) का क़त्ल किया वह जन्नत की ख़ुशबू तक न सूंघ सकेगा।’’
ज़ालिम मुसलमानों को अपने अंजाम से डराने के लिए यह हदीस काफ़ी है। 
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इरादा मज़बूत हो तो औरत को ख़ुशहाली मयस्सर आ सकती है Mahila Diwas

दुनिया सलामत है। दीन भी सलामत है। दीन धर्म से अलग हटकर रास्ते बनाने वाले भी अपने अपने काम कर रहे हैं। 8 मार्च का दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के तौर पर मनाया जाता है। किसी के लिए साल में एक दिन मुक़र्रर करने का मतलब होता है, पूरे साल में हमने उसके प्रति जो किया है, उसका हिसाब किताब लगाना और अपना गुण दोष जांचना। आज हम देख रहे हैं कि औरत पिछले साल जहां थी, कुछ मैदानों में उससे आगे बढ़ी है तो सेहत और हिफ़ाज़त के मैदानों में उसे चोट खानी पड़ी है। उसे ख़रीदा और बेचा भी गया, उसका जबरन अपहरण भी किया गया, उसे उसकी पसंद के युवक से शादी करने के एवज़ में क़त्ल भी किया गया और अपने मां-बाप की इज़्ज़त की ख़ातिर निगाहें झुका कर चलने वाली लड़कियों के साथ बलात्कार भी किया गया। औरत की आबरू को बुरी तरह तार तार किया गया। छोटी छोटी बच्चियों को दरिंदों ने अपनी हवस का निशाना बनाया।
दीन धर्म को मानने वालों के रहते हुए यह सब हुआ। आधुनिक बुद्धिजीवियों की सतर्क निगरानी के बावजूद यह सब हुआ। अगले साल जब यह दिन आएगा, तब भी हम यही सब कह रहे होंगे।
यह सब नहीं होना चाहिए।
आदमी ठान ले तो यह सब नहीं हो सकता। आदमी पहाड़ को काटकर मैदान बना सकता है। आदमी पहाड़ पर ट्रेन चला सकता है। आदमी चांद को छू सकता है और वह मंगल को खोदकर ज़मीन पर ला सकता है। अगर यही आदमी चाहे तो वह अपनी मां, बहन और बेटियों को हिफ़ाज़त और इज़्ज़त भी दे सकता है।
अगर आज औरत को यह सब मयस्सर नहीं है तो यह हमारे इरादे की कमज़ोरी का सुबूत है।
किसी शायर ने कहा भी है -
कहिये तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएं
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

कितना अच्छा हो, अगर साल 2013 में यह नज़ारा देखने को मिले कि परंपरागत और आधुनिक समाज में यह होड़ लगे कि देखें कौन औरत को हिफ़ाज़त और सम्मान देने में दूसरे को पछाड़ता है ?
मज़बूत इरादे और सकारात्मक प्रतियोगिता के ज़रिये हम औरतों को वह सब दे सकते हैं, जो उनका वाजिब हक़ है।
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आखिर कानून के राज का वो परिन्दा है कहां ?

कहीं आंसुओं में ना बह जाये सपनों का महल!

उत्तर प्रदेश में गुण्डाराज सभी न्यूज चैनलों पर यही खबर प्रमुखता से चल रही है! तमाम बहस, बयान आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। सूप-चलनी तक का नेता मिशाल देते फिर रहे हैं। सपा के एक बड़े नेता ने तो यू0पी0 में बिगडते कानून व्यवस्था के लिए विरोधी दलों पर ठिकरा फोड डाला। यू0पी0 के कुण्डा में पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी  सी0 0 जियाउल हक की हत्या कर दी जाती है। उसके साथ गये हमराही उसे मरता छोड भाग जाते हैं। हत्या के साजिश का आरोप प्रदेश सरकार के एक बाहुबली मंत्री पर लगता है। मंत्री जी हत्या के तीसरे दिन बडी ईमानदरी से अपना इस्तीफा प्रदेश सरकार के मुखिया को सौंपते है, सदन में अपने उपर लगे आरोपों पर सफाई देते हैं। उसके बाद मीडिया से मुखातिब होते हैं... सी0 0 से अच्छे सम्बंध होने का हवाला देते हैं, साथ ही कहते हैं अगर हत्या की नौबत आती तो मैं सरकार में था तबादला नहीं करा देता! एक तरफ तो सरकार के मुखिया बेहतर कानून व्यवस्था की बात करते हैं और कहते हैं कानून के नजर में सब बराबर है चाहे वह मंत्री, विधायक हो या आम आदमी, दूसरी तरफ उन्ही के सरकार का बाहुबली मंत्री मीडिया में कहता है कि दिक्कत होती तो तबादला नहीं करा देता! अब यहां सवाल खड़ा होना लाजमी है कि दिक्कत होने या कोई नौबत आने पर तबादला करवा दिया जाता! तो इसके क्या मायने हो सकते हैं? इसके तो यही मायने निकाला जा सकता है कि ईमानदारी से काम करना, जिससे किसी शासित दल के नेता, मंत्री या विधायक पर अंगुली उठे। या तो उसे मोड दिया जाए या तोड दिया जाए!
 

बात यहीं खत्म नहीं होती है सी0 0 के हत्या का एफ. आई. आर. तब दर्ज होता है जब उसके पत्नी के द्वारा शव लेने से इंकार कर दिया जाता है! पुलिस महकमा के लिए इससे बड़ी शर्मिंदगी की क्या बात हो सकती है कि उसके एक जांबाज ईमानदार अधिकारी की हत्या होती है और उसके हत्या का मामला तब दर्ज होता है जब उसकी पत्नी द्वारा शव लेने से इंकार कर दिया जाता है! बावजूद इसके प्रदेश के मुखिया प्रदेश में कानून का राज होने का दंभ भरते हैं। आखिर कानून के राज का वो परिन्दा है कहां? जिसके होने का दावा बारहा प्रदेश के मुखिया द्वारा किया जा रहा है? अगर सपा के तकरीबन साल भर के राज में कानून व्यवस्था पर गौर फरमाया जाए तो बकौल सी0एम0 वो भी सदन में भारतीय जनता पार्टी के सतीश महाना और पीस पार्टी के मोहम्मद अयूब और एक अन्य सदस्य लोकेन्द्र सिंह के सवाल के लिखित जवाब में कहा कि पिछले साल मार्च से दिसंबर 2012 तक राज्य मे 27 साम्प्रदायिक दंगे हुए। सी0एम0 ने पिछले 15 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह चन्द रोज बाद अपनी सरकार का पहला साल पूरा करेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि मथुरा, बरेली और फैजाबाद में बड़े दंगे हुए। बरेली और फैजाबाद में धार्मिक असहिष्णुता के कारण और मथुरा में विविध कारणों से दंगे हुए। 
अब सवाल ये खड़ा होता है कि इन सभी हंगामा खेज हालात के बावजूद किस कानून व्यवस्था के राज ही बात की जा रही है? सी0एम0 साहब को पता होना चाहिए कि सरकार में जब तक आपराधि प्रवित्ती के लोग रहेंगे तब तक कानून व्यवस्था की बात करना बेमानी होगा! आप खुद देख सकते हैं कि किस तरफ पशु तस्कर का स्टिंग आपरेशन करने पर एक एस0 पी0 को पैदल कर दिया जाता है, सी0एम0ओ0 का अपहरण करने के आपरोप से बरी कर फिर एक आपराधिक चरित्र वाले नेता को मंत्री का ताज पहनाया जाता है! आखिर क्या जरूरत आन पड़ी है कि आपराधि छवि के लोगों को मंत्रीमण्डल में शामिल किया जाए? सी0एम0 साहब प्रदेश की जनता ने आपको बहुमत बड़े आस व उम्मीद से दिया है। ताकि उसके हर कदम पर आपकी सरकार साथ खड़ी दिखाई दे। वर्ना अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है बसपा को सकार से बेदखल किए हुए जनता को। आखिर इस लचर कानून व्यवस्था के बल पर किस मुंह से आप दिल्ली जाने का समर्थन हासिल कीजिएगा? आपके शासन का यह रवैया कहीं नेता जी के सपनों को ना तोड़ दे? वही सपना जो दिल्ली का है, पी0एम0 का!
-एम. अफसर खां सागर
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ज़िया उल हक़ सीओ की हत्या के संदर्भ में नास्तिक दार्शनिकों और आम नागरिकों की थ्योरी और प्रैक्टिकल का एक विश्लेषण

राजा भैया के इलाक़े प्रतापगढ़ जिले के बलीपुर गांव में कुछ ग़ुंडों ने ज़िया उल हक़ सीओ, यू. पी. पुलिस को शनिवार की रात ( 2 फ़रवरी 2013) बड़ी बेरहमी से मार डाला। वह जवान थे, जोशीले थे और ईमानदार भी। वे ग़ुंडों से भिड़ गए। उन्होंने अपनी नई नवेली दुल्हन और अपने बूढ़े माँ बाप का ख़याल भी न किया। हरेक ऐसा नहीं कर सकता। दूसरे भी ऐसा न कर सके। वे पहले देखते रहे और फिर उन्हें बदमाशों के क़ब्ज़े में देखकर भाग लिए। उनमें से कुछ को भागने की सज़ा भी मिल गई। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। इस तरह के मामले में यही सज़ा मिलती है। सस्पेंड होने वाले जानते हैं कि वे कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे। इसमें ख़र्च भी कम आएगा।
अगर वे गोली चला देते तो कई बदमाश मारे जाते। उनके परिवार वाले मानवाधिकार आयोग में जाते और तब इन पुलिस वालों पर मासूम नागरिकों के क़त्ल का केस चलता। जांच में ज़्यादा रूपया ख़र्च हो जाता। केस की पैरवी में भी ख़र्च होता और अगर सज़ा हो जाती तो जेल में कई साल भी ख़र्च हो जाते और नौकरी भी हाथ से चली जाती। मैदान से भागने वाले उम्रदराज़ और व्यवहारिक मालूम होते हैं। उन्होंने गोली नहीं चलाई तो केवल एक मारा गया और अगर वे गोली चला देते तो कई लोग मारे जाते और ख़ुद भी सज़ा पाते और हो सकता है कि फ़ायर मिस हो जाते तो उनके हाथों ख़ुद भी मारे जाते।
कोई पूछ रहा है कि मैदान से भागने वाले ये पुलिसकर्मी वर्दी पहनते हुए आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?
पूछने वाले भाई ब्लॉगर प्रवीण शाह जी हैं। वह रिटायर्ड फ़ौजी भी हैं और नास्तिक भी। फ़ौज में नास्तिक हैं तो पुलिस में भी होंगे। नास्तिक मौत के बाद किसी क़ुरबानी का बदला मिलने में यक़ीन नहीं रखते। हो सकता है कि कायर भगोड़े भी नास्तिक ही हों। उनकी मान्यता को सामने रखकर कोई उनसे पूछे तो वे क्या जवाब दे पाएंगे ?
कि अगर वे भगोड़े भागने के बजाय वहां शांति व्यवस्था क़ायम करने की कोशिश में मारे जाते तो वे अपना चेहरा कैसे देख पाते क्योंकि परलोक तो होता नहीं है और मरकर वे महज़ मिट्टी का ढेर रह जाते ?
वे यही बता दें कि अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जाने वाले ज़िया उल हक़ मरने के बाद अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?,
भागने वाले आईने में अपना चेहरा न देख पाएं तो भी उनके बीवी-बच्चे और मां बाप तो उनके चेहरे देख पाएंगे।
ज़िया उल हक़ के परिवार वाले क्या उनका चेहरा देख पाएंगे ?
साल भर में ही विधवा होने वाली उनकी बीवी परवीन उनका चेहरा कैसे देख पाएगी ?
भागने वालों ने जीवन पाया, अपना परिवार बचाया। 
मरने वाले ने क्या पाया ?
यह सवाल उनसे किया जा रहा है जो कि दिन रात यही कहते हैं कि ईश्वर और परलोक नहीं है।
ईश्वर और परलोक को मानने वाले तो फ़र्ज़ के लिए अपनी जान दे सकते हैं कि उनकी क़ुरबानी का बदला समाज दे या न दे लेकिन ईश्वर ज़रूर देगा। वह उन्हें हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत देगा। उसके परिवार उसके बाद दुख उठा भी लेंगे तो क्या, मरने के बाद वे भी उससे वहीं आ मिलेंगे। मोमिन अर्थात आस्तिक ऐसा माानते हैं लेकिन नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। अगर हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा तो फिर कोई दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान भला क्यों देगा ?
नास्तिकता लोगों को अच्छाई का फल मिलने से निराश करती है क्योंकि दुनिया में अच्छाई करने वाले सभी लोगों को उनके जीते जी भी अच्छा बदला नहीं मिलता। मरने के बाद वह क्या दे पाएगी ? 
इससे पहले भी बहुत लोग अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जा चुके हैं और उन्हें भुलाया भी जा चुका है। अगर लोगों से उसकी सुरक्षा करते हुए जान देने वाले 10 जांबाज़ पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम पूछे जाएं तो वे 5 नाम भी न बता पाएंगे। इस हश्र के लिए कौन मरना चाहेगा ?
लोग अक्सर पुलिस की कार्यशैली की आलोचना करते हैं कि कहीं दंगा फ़साद हो जाए तो वे देर से आते हैं और आकर भी वे अपना फ़र्ज़ ढंग से नहीं निभाते। भीड़ बेक़ाबू हो और वे कम हों तो अपनी जान बचाकर भाग जाते हैं। 
आपकी नास्तिकता ने उन्हें ऐसा बना दिया है। समाज की संगदिली और नाशुक्री ने उन्हें ऐसा बना दिया है। वे समाज से ही आते हैं। समाज के लोगों को देखना चाहिए कि वे जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं, उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?
मरने वाले अपनी जान से गए और राजनीति और समाज में कोई परिवर्तन न आया। क़ातिल माफ़िया बदस्तूर हावी हैं। जनता इन्हीं को चुनती है। देश का क़ानून यही बनाते हैं। ऐसा लग रहा है कि थोड़ा बहुत जो भी मिल रहा है, इनकी दया से मिल रहा है। जो इनसे भिड़ेगा, वह अपनी जान से जाएगा। अगर भागकर अपनी जान बच सकती है तो कोई अपनी जान क्यों गवांए ?
जान गंवाकर उसे क्या मिलेगा ?
सिर्फ़ यही कि वह अपना चेहरा बिना किसी शर्मिंदगी के देख पाएगा ?
जब शहीदों को जनता भुला देती है तो इन भगोड़ों को शर्मिंदगी का अहसास भी नहीं होता बल्कि उन्हें अपने फ़ैसले पर गर्व होता है कि हम अक्लमंद थे, हमारा फ़ैसला सही था। वह हमारी बात मानता तो वह भी बच सकता था।
इस तरह के भगोड़े जगह जगह अपनी अक्लमंदी के फ़ैसलों को बड़े गर्व से बयान करते हैं और उनकी हराम की कमाई पर चाय-दारू पीने वाले उनकी वाह वाह करते हैं।
शहीदों के घरों में हाय, हाय और मातम है और भगोड़ों के घरों में वाह वाह और जान बचने की ख़ुशी का। उनके घरों में से कोई एक भी उन्हें शर्म नहीं दिलाता। यह हमारे समाज की तस्वीर है। इसीलिए कोई भगोड़ा यह फ़िक्र क्यों करे कि 
या 
अपने ही जैसे बाक़ी साथियों का सामना वह कैसे करेगा ?
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सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 14

सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना फेसबुक रत्न सम्मान प्रविष्टि संख्या - 14: ग़ज़ल सोचो तुम तन्हाई में  लुटते हम दानाई में । उथले जल में कुछ न मिले  मिलता सब गहराई में । दौलत को सब कुछ माना  उलझे ...
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आतंकवाद का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?

किसी आदमी की हत्या के बाद पुलिस इस बात पर भी विचार करती है कि इस आदमी की हत्या रंजिशन की गयी है या फिर किसी लाभ के लिये की गयी है ?
आतंकवाद का मक़सद राजनीतिक लाभ उठाना होता है. इसलिये आतंकवादी घटनाओं के बाद यह भी देखा जाना चाहिये कि इस आतंकवादी घटना का राजनीतिक लाभ किसे मिलेगा ?

बम धमाकों का मक़सद लोगों को मारना नहीं होता. बम धमाकों से ज़्यादा लोग तो शराब पीकर मर जाते हैं या ब्याजखोर महाजन के डर से आत्महत्या कर लेते हैं.
ये आतंकवादी दरअसल अमन के दुश्मन हैं। इनके कुछ आक़ा हैं, जिनके कुछ मक़सद हैं। ये लोकल भी हो सकते हैं और विदेशी भी। जो कोई भी हो लेकिन इनके केवल राजनीतिक उद्देश्य हैं। ये लोग चाहते हैं कि भारत के समुदाय एक दूसरे को शक की नज़र से देखें और एक दूसरे को इल्ज़ाम दें। कुछ तत्व नहीं चाहते कि जनता अपनी ग़रीबी और बर्बादी के असल गुनाहगारों को कभी जान पाए। जनता का ध्यान बंटाने और उन्हें बांटकर आपस में लड़ाने की साज़िश है यह किसी की। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं, उन तक पहुंचना भी मुश्किल है और उन्हें खोद निकालना भी। कुछ जड़ों से तो लोग श्रृद्धा और समर्पण के रिश्ते से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में कोई क्या कार्रवाई करेगा ?
इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा !
उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!
और एक नज़र डा०  अनवर जमाल का यह मज़मून भी देखें -
Hindi Bloggers Forum International (HBFI): आतंकवाद के ख़ात्मे का एकमात्र उपाय Aatankwad Free India
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नरेन्द्र मोदी जी के प्रति मौलवी महमूद मदनी के विचारों में नरमी का कारण ? Maulana Mehmood Madni

गुजरात दंगों पर महमूद मदनी नरेन्द्र मोदी जी के अफ़सोस को पर्याप्त मानते हैं। उनकी यह नरमी प्रधानमंत्री बनने की संभावना रखने वाले व्यक्ति से मधुर रिश्ता बनाने की क़वायद है। उनके चाचा अरशद मदनी साहब ने कांग्रेस में उन्हें जमने नहीं दिया। अपनी क़िस्मत आज़माने के लिए अब महमूद मदनी के पास विकल्प ही क्या है ?
इसी तरकीब से मदनी ख़ानदान ने अरबों रूपये की संपत्ति अर्जित कर ली है। मुसलमानों के ये रहनुमा मुसलमानों को राह तो क्या दिखाते, ये तो उनके जज़्बात की भी नुमाईन्दगी नहीं करते।
नरेन्द्र मोदी जी के विषय में मौलवी महमूद मदनी के बयान को लेकर आज दैनिक ‘हिन्दुस्तान‘ में एक लेख छपा है। देखिए-
कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार

मदनी साहब, आखिर यह माजरा क्या है? कयास पर कयास लग रहे हैं। लोग अपनी-अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ा कर पता करने में लगे हैं। बीजेपी खुश है! माफ कीजिएगा, मुझे अचानक ‘रंगा खुश’ याद आ गया। बेचारी सेकुलर पार्टियों का तो मुंह ही उतर गया। सारे देश के मुल्ला-मौलवियों की नींद अचानक टूट गई। दारुल उलूम देवबंद जैसी संस्था से जुड़े और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी का दिल अगर नरेंद्र मोदी को लेकर पसीजने लगे, तो धमाका तो होगा ही।

वैसे मदनी साहब का कहना है कि उन्होंने अपने इंटरव्यू में सिर्फ जमीनी हकीकत का जिक्र किया था कि गुजरात में बहुत-से मुसलमानों ने इस बार मोदी को वोट दिया। बिहार में भी नीतीश कुमार के कारण कई जगहों पर मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है। यानी ‘बड़ा चेंज आ रहा है, सिचुएशन चेंज हो रही है और यकीनन गुजरात के लोग (मुसलमान) अलग तरीके से सोच रहे हैं।’ हालांकि, वह आगे साफ करते हैं कि जरूरी नहीं कि जो कुछ गुजरात और बिहार में घटित हो रहा है, उसका प्रतिबिंब पूरे देश में दिखे, लेकिन उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही, जिसकी तरफ शायद लोगों का ध्यान नहीं गया। उन्होंने कहा, ‘2002 की दुर्घटना को जितने गर्व के साथ वह (मोदी) लेते आए हैं, वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट है कि हम कह दें कि सब ठीक है।’ जब उनसे पूछा गया कि अब तो मोदी उन सब बातों की कोई चर्चा नहीं करते और सिर्फ विकास की बात करते हैं, तो मदनी साहब का जवाब था,‘कुछ अफसोस (गुजरात दंगों पर) होना चाहिए था। विकास इंसाफ के बगैर कैसे होगा?’ और मदनी ने यह भी साफ किया कि उनकी नजर में सेकुलर पार्टियां मोदी या बीजेपी से बेहतर नहीं हैं!

इसका क्या मतलब निकाला जाए? आखिर मौलाना महमूद मदनी अचानक ऐसी अटपटी संभावनाओं के स्वप्न क्यों बुनने लगे कि 2014 आते-आते मुसलमानों को बीजेपी और मोदी अच्छे भी लगने लग सकते हैं। और सेकुलर पार्टियों से मौलाना का मोहभंग अभी ही क्यों हुआ? क्या सचमुच मुसलमान सेकुलर पार्टियों से निराश हो चुके हैं और उन्हें नए ठिकाने की तलाश है? या फिर सचमुच मौलाना मोदी को विकास-पुरुष मानने लगे हैं और उन्हें लगता है कि अगर मोदी वाकई प्रधानमंत्री बनने ही वाले हैं, तो फिर देश के मुसलमान अपने गुजराती भाइयों से सीखते हुए क्यों न मोदी से दोस्ती के रिश्ते कायम करें। हो सकता है कि मौलाना को लगा हो कि अगर यूरोपियन यूनियन इतने बरसों के बाद मोदी से फिर संवाद शुरू करता है, तो मुसलमान भी अगर अपना नजरिया बदलने के बारे में सोचें, तो पहाड़ थोड़े ही टूट पड़ेगा। आखिर बिहार और गुजरात के उदाहरण सामने हैं।
पूरे इंटरव्यू में मौलाना मदनी ने एक बार भी नहीं कहा कि मोदी को माफी मांगनी चाहिए। शायद उन्हें मालूम है कि मोदी कतई माफी नहीं मांगेंगे, इसीलिए वह कहते हैं कि मोदी को दंगों पर अफसोस जताना चाहिए। यह सब बहुत चौंकाने वाला है, खासकर तब, जब यह शिगूफा उस देवबंद से आया हो, जिसने अभी डेढ़ साल पहले ही मोदी की तारीफ करने के आरोप में अपने गुजराती कुलपति मौलाना गुलाम वस्तानवी को बरखास्त कर दिया था और उनकी बरखास्तगी में मौलाना महमूद मदनी का बड़ा हाथ था। तब से अब तक स्थिति में सिर्फ एक बदलाव हुआ है, वह यह कि बहुत-से लोगों को लगने लगा है कि मोदी प्रधानमंत्री पद के तगड़े दावेदार हैं और अगर कहीं बाजी मोदी के हाथ लग ही गई, तो ऐसे में उनकी गोटियां सही जगह होनी चाहिए।
बहरहाल, मदनी साहब की दिली ख्वाहिश क्या है, वही जानें। यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। हम तो इस शिगूफे को खुरच-खुरच कर देखना चाहते हैं कि इसका मकसद आखिर क्या हो सकता है? मदनी के इंटरव्यू पर जिस तरह दनादन मुस्लिम धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उन्हें देखकर तो नहीं लगता कि मोदी के मामले में आम मुसलमानों के मन में अगले साल-डेढ़ साल में कोई नरमी आएगी। गुजरात का मुसलमान विकल्पहीनता की जिस लाचारी के तले घुट-घुटकर जीने को अभिशप्त है, वैसी कोई स्थिति देश भर में कहीं भी मुसलमानों के सामने नहीं है। उनके सामने विकल्प ही विकल्प हैं। पिछले कई चुनावों को देखें, तो मुस्लिम वोटों में एक खास तरह का पैटर्न दिखता है, वह है, वोटों के नितांत स्थानीय ध्रुवीकरण का, यानी जिस चुनाव क्षेत्र में जो उम्मीदवार बीजेपी को हराने में सबसे ज्यादा सक्षम हो, उसे वोट दिया जाए। मुझे लगता है कि इस बार यह ध्रुवीकरण पहले से और भी ज्यादा मजबूती से होगा।
तो फिर यह शिगूफा क्यों? मोदी भी जानते हैं और मदनी भी कि हमेशा से बीजेपी के विरुद्ध रहे मुस्लिम वोटर को ऐसे रातों-रात बहलाया नहीं जा सकता। लेकिन इस तरह की बातें अगर हवा में तैरती रहें, तो मोदी को दो बड़े फायदे होंगे। पहला यह कि मुसलमानों में उनके समर्थक कुछ ऐसे प्रभावशाली प्रवक्ता निकाल आएंगे, जो आम मुसलमानों के बीच धीरे-धीरे यह संदेश फैलाते रहें कि मोदी से दुश्मनी पालने में नुकसान ही नुकसान है। न गुजरा हुआ समय वापस लाया जा सकता है और न ही पहले हो चुके नुकसान की भरपायी हो सकती है। भलाई इसी में है कि मुसलमान पिछली बातों को भूलकर विकास की गाड़ी में सवार हो लें। ऐसे प्रचार से मुसलमानों के विरोध की धार कुंद होती जाएगी। दूसरा फायदा यह होगा कि मोदी एक तरफ तो दुनिया को यह दिखाने में कामयाब हो जाएंगे कि मुसलमानों में भी उनकी स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है और दूसरी तरफ वह ‘सेकुलर माइंडसेट’ वाले हिंदू वोटरों के बीच भी अपनी धुली छवि के साथ विकास के अपने झुनझुने की अपील बढ़ा पाएंगे।
मोदी युद्धकला के सिद्धहस्त खिलाड़ी हैं, प्रचार युद्ध में उनका कोई जवाब नहीं। ‘इमेज वॉर’ की बारीकियों को उनसे बेहतर भला और कौन समझता है, इसका सबूत वह पिछले विधानसभा चुनाव में और अभी यूरोपियन यूनियन के मामले में दे चुके हैं। यह नया शिगूफा भी उसी की एक कड़ी है। अभी-अभी अपनी रणनीति में भी उन्होंने व्यापक बदलाव किया है और महाकुंभ में मथी गई ‘हिन्दू लहर’ पर सवार होने की बजाय फिलहाल ‘इन्क्लूसिव डेवलपमेंट’ के मुखौटे को पहनने का फैसला किया है।
Source : http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-310631.html
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सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना ब्लॉग रत्न प्रविष्टि संख्या - 8

सादर ब्लॉगस्ते!: शोभना ब्लॉग रत्न प्रविष्टि संख्या - 8: ग़ज़ल इस मतलबी जहां के तलबगार हम नहीं  दिल की सुनें सदा, करें व्यापार हम नहीं | चाहा तुझे, पूजा तुझे , माना खुदा तुझे  ये बात...
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वैदिक काल में माधवी का विवाह संस्कार vivah sanskar

इंटरनेट पर एक लेख नज़र से गुज़रा जिसमें कहा गया था कि हमारा विवाह संस्कार है। यह मुसलमानों के निकाह से उत्तम है क्योंकि वह एक क़रार होता है। उन्होंने यह अपील भी की थी कि हिन्दू विवाह को एक संस्कार ही माना जाए। इस विषय को जानने के लिए हमने वैदिक इतिहास में विवाह और स्त्री की स्थिति पर नज़र डाली तो वहां कोई एक निश्चित बात न मिली। इसी दौरान राजा ययाति की कन्या माधवी के विवाह संस्कार पर भी नज़र पड़ी।


संक्षेप में यह कथा ऑनलाइन भारतकोष के अनुसार इस प्रकार है कि गालव ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के शिष्य थे। विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से 800 ऐसे घोड़े मांगे जिनका रंग चन्द्रमा के समान सफ़ेद हो और उनके कान एक ओर से काले हों। गालव निर्धन थे। वह घोड़े जुटाने के लिए राजा ययाति के पास गया। ययाति के पास ऐसे घोड़े नहीं थे जैसे कि विश्वामित्र ने मांगे थे। ययाति ने गालव को अपनी कन्या माधवी दान में दे दी। गालव माधवी को लेकर सबसे पहले अयोध्या के राजा हर्यश्च के पास गया। उसने माधवी से वसुमना नामक राजकुमार प्राप्त किया और गालव को शुल्क के रूप में 200 घोड़े दिए। इसके बाद गालव माधवी को एक एक करके काशी के अधिपति दिवोदास के पास गया। उसने माधवी से प्रतर्दन नामक पुत्र प्राप्त किया और उसके शुल्क में गालव को 200 घोड़े दे दिए। उसके गाद गालव माधवी को लेकर भोजनगर के राजा उशीनार के पास गया। उसने भी माधवी से शिवि नामक पुत्र प्राप्त किया और उसने भी गालव को शुल्क के रूप में 200 घोड़े दिए। इसके बाद गालव और भी जगह गया और हरेक जगह से 200 घोड़े ले लेकर उसने 1000 घोड़े इकठ्ठा कर लिए। वितस्ता नदी पार करते समय उनमें से 400 घोड़े नदी में बह गए। गालव ने बचे हुए 600 घोड़े और माधवी को अपने गुरू विश्वामित्र को दे दिया। उन्होंने भी माधवी से एक बच्चा पैदा किया। उन्होंने गालव को माधवी लौटा दी और ख़ुद जंगल चले गए। गालव गुरूदक्षिणा के भार से मुक्त हो चुका था। उसने राजा ययाति को उसकी कन्या माधवी वापस दे दी और ख़ुद भी वन को प्रस्थान किया।
मशहूर लेखक भीष्म साहनी ने माधवी की कथा पर एक उपन्यास भी लिखा है जिसे राजकमल प्रकाशन से मंगाया जा सकता है।
माधवी की कथा के माध्यम से तत्कालीन वैदिक समाज में विवाह संस्कार की विविधताओं का अच्छा परिचय मिलता है।
किसी की भावनाएं आहत न हों, इसलिए हम अपना कोई नज़रिया पेश नहीं कर रहे हैं। अपना नज़रिया आप ख़ुद तय करें कि आप अपनी बहन-बेटियों का संस्कार करना पसंद करेंगे या कि क़रार ?
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छब्बीस साल के युवक ने रचाया आठवां विवाह 8 patniyan



छठी पत्नी ने खोली पोल
शहडोल : शहडोल जिले में कैशवाही चौकी अंतर्गत पतेरा टोला निवासी छब्बीस वर्षीय एक युवक द्वारा सात शादियां रचाने के बाद गुरुवार को एक नाबालिग के साथ आठवीं शादी करने का मामला सामने आया है.
महिला आयोग की सदस्य वंदना मण्डावी के समक्ष उमेन्द्र की इस करतूत का खुलासा उसकी छठी पत्नी देवकी बाई महरा ने किया.
कैशवाही चौकी के ग्राम कुम्हारी निवासी देवकी महरा ( 24 ) ने महिला आयोग की सदस्य मण्डावी के समक्ष आवेदन देते हुए बताया कि सात सितंबर 2009 को उसका विवाह शपथ-पत्र के माध्यम से जैतपुर थाना के ग्राम पतेरा टोला निवासी उमेंद्र प्रसाद महरा के साथ हुआ था. कुछ समय तक तो सब ठीक-ठाक चला, फिर एक वर्ष पहले पति ने उसे छोड दिया. कई बार वह पति के पास गई, लेकिन वह अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुआ.
आवेदन के अनुसार इस बीच देवकी को पता चला कि उसका पति इससे पहले भी पांच बार विवाह रचा चुका है और वह उसकी छठे नंबर की पत्नी है. पांचों पत्नियों के साथ भी कुछ माह गुजारने के बाद वह सभी को छोडता गया.
देवकी ने महिला आयोग को दी गई शिकायत में बताया कि उमेंद्र ने सात फरवरी को आठवां विवाह कंठी टोला निवासी 16 वर्षीय एक नाबालिग लडकी से रचाया. हालांकि इस बात की जानकारी कैशवाही चौकी एवं जैतपुर थाने में दी गई थी. पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन सिर्फ शादी नहीं करने की सलाह देकर लौट आई. इसका नतीजा यह निकला कि आठवां विवाह संपन्न हो गया.
शिकायतकर्ता के अनुसार आठ शादियां रचाने वाले उमेंद्र का उद्देश्य अय्याशी था. उसने बताया कि उमेंद्र को जब पता चलता कि उसकी पत्नी गर्भवती हो गयी है तो वह उस पर गर्भपात के लिए दबाव डालता. पत्नी के गर्भपात के लिए तैयार नहीं होने पर वह उसे छोड, दूसरा विवाह कर लेता था.
महिला आयोग की सदस्य वंदना मंडावी ने बताया कि देवकी के आवेदन पर आयोग ने संज्ञान लिया है.
source : http://www.prabhatkhabar.com/node/262806
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लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है


लहसुन के सेवन से रक्त में थक्का बनने की प्रवृत्ति बेहद कम हो जाती है, जिससे हृदयाघात का ख़तरा टलता है। यह बिंबागुओं (Platelates) को चिपकने से रोकता है। थक्कों को गलाता है। धमनियों को फैलाकर रक्तचाप घटाता है। हाई ब्लड प्रेशर वालों के लिए यह अमृत के समान है। नियमित लहसुन को दूध में उबालकर लेते रहने से ब्लडप्रेशर कम या ज़्यादा होने की बीमारी नहीं होती।
  • कॉलेस्ट्रोल की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कॉलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक या उससे भी कम हो सकता है। जिगर के अंदर मेटाबोलिज्म में सुधार लाकर कोलेस्ट्रॉल कम करता है और एरिथमिया को नियमित करता है। 'जर्नल ऑफ न्यूट्रीशन' के एक अध्ययन के मुताबिक लहसुन के सेवन से कोलेस्ट्रॉल में 10 फीसदी गिरावट आती है। यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।
  • लहसुन की तीक्ष्णता और रोगाणुनाशक विशेषता के कारण यह चिकित्सा जगत में उपयोगी कंद है। मेहनतकश किसान-मजदूर तो लहसुन की चटनी, रोटी खाकर स्वस्थ और कर्मठ बने रहते हैं। षडरस भोजन के 6 रसों में से पाँच रस लहसुन में सदैव विद्यमान रहते हैं। सिर्फ 'अम्ल रस' नहीं रहता। आज षडरस आहार दुर्लभ हो चला है। लहसुन उसकी आपूर्ति के लिए हर कहीं सस्ता, सुलभ है। लहसुन को गरीबों का 'मकरध्वज' कहा जाता है। वह इसलिए कि इसका लगातार प्रयोग मानव जीवन को स्वास्थ्य संवर्धक स्थितियों में रखता है। हेल्थ एक्सपर्ट हर रोज सुबह-उठकर ख़ाली पेट लहसुन की दो-तीन कलियां गुनगुने पानी से लेने की बात कहते हैं।
  • तेज गंध वाली लहसुन एक संजीवनी है जो कैंसर, एड्स और हृदय रोग के विरुद्ध सुरक्षा कवच बन सकती है। त्वचा को दाग़-धब्बे रहित बनाने, मुंहासों से बचने और पेट को साफ़ करने में भी लहसुन बढिय़ा है। इसे बादी कम करने वाला माना जाता है, इसीलिए बैंगन या उड़द की दाल जैसी बादी करने वाली चीजों में इसे डालने की सलाह दी जाती है। यह खून को साफ़ कर शरीर के अंदरूनी सिस्टम की सफाई करता है। अगर आपका वजन अधिक है और इसे कम करना चाहते हैं तो सुबह-शाम लहसुन की दो-दो कलियां खाएं। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत करने, कैंसर, अल्सर और हैमरॉयड से लडऩे में लहसुन को फ़ायदेमंद बताया गया है। इसमें मौजूद सल्फर से एलर्जी महसूस करने वाले इसे न ही खाएं और न ही त्वचा पर लगाएं।
पूरी इल्मी जानकारी भारत डिस्कवरी पे -

http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B2%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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