राजा भैया के इलाक़े प्रतापगढ़ जिले के बलीपुर गांव में कुछ ग़ुंडों ने ज़िया उल हक़ सीओ, यू. पी. पुलिस को शनिवार की रात ( 2 फ़रवरी 2013) बड़ी बेरहमी से मार डाला। वह जवान थे, जोशीले थे और ईमानदार भी। वे ग़ुंडों से भिड़ गए। उन्होंने अपनी नई नवेली दुल्हन और अपने बूढ़े माँ बाप का ख़याल भी न किया। हरेक ऐसा नहीं कर सकता। दूसरे भी ऐसा न कर सके। वे पहले देखते रहे और फिर उन्हें बदमाशों के क़ब्ज़े में देखकर भाग लिए। उनमें से कुछ को भागने की सज़ा भी मिल गई। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। इस तरह के मामले में यही सज़ा मिलती है। सस्पेंड होने वाले जानते हैं कि वे कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे। इसमें ख़र्च भी कम आएगा।
अगर वे गोली चला देते तो कई बदमाश मारे जाते। उनके परिवार वाले मानवाधिकार आयोग में जाते और तब इन पुलिस वालों पर मासूम नागरिकों के क़त्ल का केस चलता। जांच में ज़्यादा रूपया ख़र्च हो जाता। केस की पैरवी में भी ख़र्च होता और अगर सज़ा हो जाती तो जेल में कई साल भी ख़र्च हो जाते और नौकरी भी हाथ से चली जाती। मैदान से भागने वाले उम्रदराज़ और व्यवहारिक मालूम होते हैं। उन्होंने गोली नहीं चलाई तो केवल एक मारा गया और अगर वे गोली चला देते तो कई लोग मारे जाते और ख़ुद भी सज़ा पाते और हो सकता है कि फ़ायर मिस हो जाते तो उनके हाथों ख़ुद भी मारे जाते।
कोई पूछ रहा है कि मैदान से भागने वाले ये पुलिसकर्मी वर्दी पहनते हुए आईने में अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?
पूछने वाले भाई ब्लॉगर प्रवीण शाह जी हैं। वह रिटायर्ड फ़ौजी भी हैं और नास्तिक भी। फ़ौज में नास्तिक हैं तो पुलिस में भी होंगे। नास्तिक मौत के बाद किसी क़ुरबानी का बदला मिलने में यक़ीन नहीं रखते। हो सकता है कि कायर भगोड़े भी नास्तिक ही हों। उनकी मान्यता को सामने रखकर कोई उनसे पूछे तो वे क्या जवाब दे पाएंगे ?
कि अगर वे भगोड़े भागने के बजाय वहां शांति व्यवस्था क़ायम करने की कोशिश में मारे जाते तो वे अपना चेहरा कैसे देख पाते क्योंकि परलोक तो होता नहीं है और मरकर वे महज़ मिट्टी का ढेर रह जाते ?
वे यही बता दें कि अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जाने वाले ज़िया उल हक़ मरने के बाद अपना चेहरा कैसे देख पाएंगे ?,
भागने वाले आईने में अपना चेहरा न देख पाएं तो भी उनके बीवी-बच्चे और मां बाप तो उनके चेहरे देख पाएंगे।
ज़िया उल हक़ के परिवार वाले क्या उनका चेहरा देख पाएंगे ?
साल भर में ही विधवा होने वाली उनकी बीवी परवीन उनका चेहरा कैसे देख पाएगी ?
भागने वालों ने जीवन पाया, अपना परिवार बचाया।
मरने वाले ने क्या पाया ?
यह सवाल उनसे किया जा रहा है जो कि दिन रात यही कहते हैं कि ईश्वर और परलोक नहीं है।
ईश्वर और परलोक को मानने वाले तो फ़र्ज़ के लिए अपनी जान दे सकते हैं कि उनकी क़ुरबानी का बदला समाज दे या न दे लेकिन ईश्वर ज़रूर देगा। वह उन्हें हमेशा के लिए स्वर्ग का सुख, जन्नत की राहत देगा। उसके परिवार उसके बाद दुख उठा भी लेंगे तो क्या, मरने के बाद वे भी उससे वहीं आ मिलेंगे। मोमिन अर्थात आस्तिक ऐसा माानते हैं लेकिन नास्तिक कहते हैं कि मरने के बाद ऐसा कुछ नहीं मिलेगा। अगर हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं मिलेगा तो फिर कोई दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान भला क्यों देगा ?
नास्तिकता लोगों को अच्छाई का फल मिलने से निराश करती है क्योंकि दुनिया में अच्छाई करने वाले सभी लोगों को उनके जीते जी भी अच्छा बदला नहीं मिलता। मरने के बाद वह क्या दे पाएगी ?
इससे पहले भी बहुत लोग अपने फ़र्ज़ के लिए मारे जा चुके हैं और उन्हें भुलाया भी जा चुका है। अगर लोगों से उसकी सुरक्षा करते हुए जान देने वाले 10 जांबाज़ पुलिस अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम पूछे जाएं तो वे 5 नाम भी न बता पाएंगे। इस हश्र के लिए कौन मरना चाहेगा ?
लोग अक्सर पुलिस की कार्यशैली की आलोचना करते हैं कि कहीं दंगा फ़साद हो जाए तो वे देर से आते हैं और आकर भी वे अपना फ़र्ज़ ढंग से नहीं निभाते। भीड़ बेक़ाबू हो और वे कम हों तो अपनी जान बचाकर भाग जाते हैं।
आपकी नास्तिकता ने उन्हें ऐसा बना दिया है। समाज की संगदिली और नाशुक्री ने उन्हें ऐसा बना दिया है। वे समाज से ही आते हैं। समाज के लोगों को देखना चाहिए कि वे जो कह रहे हैं और जो कर रहे हैं, उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?
मरने वाले अपनी जान से गए और राजनीति और समाज में कोई परिवर्तन न आया। क़ातिल माफ़िया बदस्तूर हावी हैं। जनता इन्हीं को चुनती है। देश का क़ानून यही बनाते हैं। ऐसा लग रहा है कि थोड़ा बहुत जो भी मिल रहा है, इनकी दया से मिल रहा है। जो इनसे भिड़ेगा, वह अपनी जान से जाएगा। अगर भागकर अपनी जान बच सकती है तो कोई अपनी जान क्यों गवांए ?
जान गंवाकर उसे क्या मिलेगा ?
सिर्फ़ यही कि वह अपना चेहरा बिना किसी शर्मिंदगी के देख पाएगा ?
जब शहीदों को जनता भुला देती है तो इन भगोड़ों को शर्मिंदगी का अहसास भी नहीं होता बल्कि उन्हें अपने फ़ैसले पर गर्व होता है कि हम अक्लमंद थे, हमारा फ़ैसला सही था। वह हमारी बात मानता तो वह भी बच सकता था।
इस तरह के भगोड़े जगह जगह अपनी अक्लमंदी के फ़ैसलों को बड़े गर्व से बयान करते हैं और उनकी हराम की कमाई पर चाय-दारू पीने वाले उनकी वाह वाह करते हैं।
शहीदों के घरों में हाय, हाय और मातम है और भगोड़ों के घरों में वाह वाह और जान बचने की ख़ुशी का। उनके घरों में से कोई एक भी उन्हें शर्म नहीं दिलाता। यह हमारे समाज की तस्वीर है। इसीलिए कोई भगोड़ा यह फ़िक्र क्यों करे कि
या
अपने ही जैसे बाक़ी साथियों का सामना वह कैसे करेगा ?