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बिटिया




बाँहे फैलाए तुझे , बिटिया रही पुकार
तुम जालिम बनना नहीं , मांगे हमसे प्यार  |

निश्छल , मोहक , पाक है , बेटी की  मुस्कान 
भूलें हमको गम सभी , जाएं जीत जहान |

क्यों मारो तुम गर्भ में , बिटिया घर की शान 
ये चिड़िया-सी चहककर , करती दूर थकान | 

बिटिया कोहेनूर है , फैला रही प्रकाश 
धरती है जन्नत बनी , पुलकित है आकाश |

तुम बेटी के जन्म पर , होना नहीं उदास 
गले मिले जब दौडकर , मिट जाते सब त्रास |

                     --------- दिलबाग विर्क  

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कुंड़लिया ----- दिलबाग विर्क


बहुरंगी ये तोहफे , बांटे सांता क्लॉज ।
यीशू के जन्म दिन की , याद दिलाए आज ।।
याद दिलाए आज , मिली थी सच को सूली ।
थी बहुत बड़ी बात, न थी घटना मामूली ।।
सच कब है आसान , है तलवार ये नंगी ।
पर सच से ही विर्क , बने जीवन बहुरंगी ।।


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कुंड़लिया ----- दिलबाग विर्क


       अफजल- कसाब से कई , ठूंसे हमने जेल ।
       फाँसी लटकाए नहीं , देश रहा है झेल ।।
       देश रहा है झेल , किया खर्च करोड़ों में ।
       पारा बनकर बैठ , ये गए हैं जोड़ों में ।।
       कहे विर्क कविराय , मिले ऐसा इनको फल ।
       फिर भारत की तरफ , न देखे कोई अफजल ।।

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कुंड़लिया ----- दिलबाग विर्क


दफ्तर लगते दस बजे, औ ' आठ बजे स्कूल ।
अजब नीति सरकार की , टेढ़े बहुत असूल  ।
टेढ़े बहुत असूल , फ़िक्र ना मासूमों की 
ए.सी. में बैठकर , बात हो कानूनों की ।
न सुनें हैं फरियाद , न दर्द जानते अफ़सर
जमीं के साथ विर्क , कब जुड़ेंगे ये दफ्तर ?
                  
                                         दिलबाग विर्क 

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कुंड़लिया ----- दिलबाग विर्क

  आशा से संसार है, रखना दिल में आस 
 मंजिल होगी पास में, करते रहो प्रयास ।
 करते रहो प्रयास , झोंक दो पूरी ताकत 
 जीवन होगा सफल, न टिक पाएगी आफत ।
 मत डालो हथियार, हराती हमें हताशा 
 कहत विर्क कविराय, अमृतधार है आशा ।

                         --------- साहित्य सुरभि

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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क



     माना  कि  जुदाई  से  गए  थे  बिखर  से  हम 
     नामुमकिन तो था मगर, संभल गए फिर से हम. 
                           साहित्य सुरभि 
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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क

                                     
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अग़ज़ल-- दिलबाग विर्क


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पतन { कविता }---दिलबाग विर्क

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हाइकु गीत ----- दिलबाग विर्क


                 
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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क



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कविता ----- दिलबाग विर्क



                       महत्वाकांक्षा                   

                      भाग - 1
                      भाग - 2
                      भाग - 3
                      भाग - 4

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कविता ----- दिलबाग विर्क

                 चीरहरण 

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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क


   शाम हो चुकी है , डूब रहा है आफ़ताब यारो 
  मुझे भी पिला दो अब तुम घूँट दो घूँट शराब यारो .

 दिन तो उलझनों में बीता , रात को ख्वाबों का डर है 
 या बेहोश कर दो या फिर कर दो नींद खराब यारो .

 बुरी चीजों को क्योंकर गले लगा लेते हैं सब लोग 
 तुम खुद ही समझो , नहीं है मेरे पास जवाब यारो .

 जश्न मनाओ , आसानी से नहीं मिला मुझे ये मुकाम 
 खूने-जिगर दे पाया है , बेवफाई का ख़िताब यारो .

 एक छोटा-सा दिल टूटा और उम्र भर के गम मिल गए 
 नफे में ही रहे होंगे , लगाओ थोडा हिसाब यारो .

 किसे सजाकर रखें किसे न , बस 'विर्क' यही उलझन है
 मुहब्बत में मिला हर जख्म निकला है लाजवाब यारो .

                            * * * * * 
                                         साहित्य सुरभि 
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लघु कथा ----- दिलबाग विर्क


              जानवर                      
अनजान गली में से गुजरते समय एक कुत्ते को बैठे देखकर हमारे कदम ठिठके .थोडा संभलकर पास से निकलने की सोची .जानवर है , क्या भरोसा कब टांग पकड़ ले . हम दोनों ने यही सोचा .
" आदमी भी तो एक जानवर है , सभ्य जानवर ."-मैंने अपने दोस्त से कहा .
" हाँ , जानवर तो है ,लेकिन सभ्य नहीं , बल्कि सभ्य होने के बाबजूद भी .'- मेरे मित्र ने दार्शनिक अंदाज़ से कहा .
" वो कैसे ?"-मैंने हैरानी से पूछा .
" आदमी सभ्य है ,इसमें कोई शक नहीं , लेकिन वह जानवर भी है . जानवर की तरह वह कभी भी हमला कर सकता है आपके सामान पर , आपकी जान पर व आपकी इज्जत पर ... तभी तो घर से बाहर आकर हम अनजान आदमियों से ऐसे ही सचेत रहते हैं जैसे हम अभी इस कुत्ते के पास से गुजरते समय थे ."-उसने बात स्पष्ट की .
               उसकी बात पर जब मैंने गौर किया तो समाचार पत्रों ,टी.वी.चैनलों पर दिखाए जाने वाले दुष्कर्म ,लूट-मार भरे समाचार मेरी आँखों के सामने घूम गए . मुझे भी यकीन आ गया उसकी बात पर .वास्तव में आदमी जानवर ही तो है ,सभ्य होने के बाबजूद भी .

                       * * * * *   साहित्य सुरभि 
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कुंडलिया ----- दिलबाग विर्क


बेटी मरती गर्भ में ,हम सब जिम्मेदार 
चुप्पी धारण की तभी ,होता अत्याचार .
होता अत्याचार , हुई प्रताड़ित नारी 
वेदों का है देश  ,लगाते कलंक भारी .
कहत 'विर्क' कविराय , हो रही इससे हेठी 
कहलाओ इन्सान , मारो गर्भ में बेटी .

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                        हेठी --- अपमान ,बेइज्जती 
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कुंडलिया ----- दिलबाग विर्क


बुराई रही जीत है  , अच्छाई की हार
सब पासे उल्टे पड़े ,कलयुग की है मार .
कलयुग की है मार ,रावण राम पे भारी
हार रहा है धर्म , जीतती दुनियादारी .
बुराइयां छोड़कर  , तुम सीखना अच्छाई 
कहत ' विर्क ' कविराय  , जगत से मिटे बुराई .

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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क


बहुत हो गई, अब छोडो यारो ये तकरार बे-बात की 
जिंदगी जन्नत बने, इसके लिए निभानी होगी दोस्ती .

ये वो शै है जो हर पल आमादा है लुप्त होने को 
जब मिले, जहाँ मिले, जी भरकर समेट लेना ख़ुशी .

प्यार के सब्ज़ खेत भला लहलहाएंगे तो कैसे, जब तक 
वफा की घटा, दिलों की जरखेज ज़मीं पर नहीं बरसती .

वहशियत नहीं मासूमियत हो, नफरत नहीं मुहब्बत हो 
ऐसे ख्वाबों को पूरा करने में तुम लगा दो जिंदगी .

माना दौर है तूफानों का, यहाँ नफरतों की आग है 
फिर भी हिम्मत हारना, है तुम्हारी सबसे बड़ी बुजदिली .

न तो नफरत की बात कर 'विर्क', न उल्फत से गिला कर 
किस्मत तेरी रंग लाएगी, तू खुद को बदल तो सही .

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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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