‘मौलाना‘ के भेस में छिपे हैं कुछ राहज़न भी

हिंदी दैनिक हिंदुस्तान के संपादकीय में आज (28 January 2011) दारूल उलूम देवबंद में चल रहे संघर्ष का विश्लेषण किया गया है। संपादक महोदय की संवेदनाओं को मोहतमिम मौलाना गुलाम मुहम्मद वस्तानवी साहब के साथ देखकर अच्छा लगा। उन्होंने उनके व्यक्तित्व की भी तारीफ़ की और उनकी उन घोषणाओं की भी जिनमें उन्होंने कहा है कि वे मदरसे के पाठ्यक्रम में विज्ञान, इंजीनियरी और चिकित्सा आदि भी शामिल करेंगे। इन घोषणाओं को संपादक महोदय ने उदारवादी और सुधारवादी क़रार दिया जो कि वास्तव में हैं भी और मौलाना वस्तानवी का विरोध करने वालों को उन्होंने पुरातनपंथी और कट्टरवादी क़रार दे दिया और निष्कर्ष यह निकाला कि दारूल उलूम देवबंद में जो संघर्ष फ़िलहाल चल रहा है वह वास्तव में पुरातनपंथियों और सुधारवादियों के बीच चल रहा है।
यह निष्कर्ष सरासर ग़लत है। जो लोग मौलाना वस्तानवी का विरोध कर रहे हैं वे पुरातनपंथी और कट्टर (बुरे अर्थों में) हरगिज़ नहीं हैं। उन्होंने भी दारूल उलूम देवबंद के पाठ्यक्रम में कम्प्यूटर और हिंदी व गणित आदि विषय शामिल किए हैं और हिंदी की भी वही किताब वहां पढ़ाई जाती है जो कि बाज़ार में सामान्य रूप से उपलब्ध है, जिसमें कि राम, सीता और हनुमान की कहानियां लिखी हुई हैं। अगर वे सामान्य अर्थों में कट्टर और पुरातनपंथी होते तो वे ऐसा हरगिज़ न करते या कम से कम वे हिंदी की ऐसी किताब तो चुन ही सकते थे जिसमें कि रामायण की कहानी के बजाय मुसलमान बुजुर्गों के क़िस्से होते। किसी चीज़ को देखे बिना महज़ लिखित सूचनाओं के आधार पर जब निष्कर्ष निकाला जाता है तो वे निष्कर्ष इसी तरह ग़लत होते हैं जैसे कि आज के संपादकीय में निकाला गया है।
जो लोग देवबंद में रहते हैं वे जानते हैं कि देवबंद का एक आलिम घराना संघर्ष का इतिहास रखता है। वह दूसरों से भी लड़ता है और खुद अपनों से भी। उसकी लड़ाई का मक़सद कभी मुसलमानों का व्यापक हित नहीं होता बल्कि यह होता है कि ताक़त की इस कुर्सी पर वह नहीं बल्कि मैं बैठूंगा। वर्तमान संघर्ष के पीछे भी असली वजह कट्टरता और पुरानी सोच नहीं है बल्कि अपनी ताक़त और अपने रूतबे को बनाए रखने की चाहत है। यह संघर्ष पुरातनपंथी सोच और उदारवादी सोच के बीच नहीं है बल्कि दरअस्ल यह संघर्ष दो ऐसे लोगों के दरम्यान है जिनमें से एक आदमी मौलाना वस्तानवी हैं जो मुसलमानों और देशवासियों के व्यापक हितों के लिए सोचते हैं और दूसरा आदमी महज़ अपने कुनबे के हितों के लिए। यह संघर्ष परोपकारी धार्मिक सोच और खुदग़र्ज़ परिवारवादी सोच के दरम्यान है। परिवारवादी खुदग़र्ज़ो के साथ भी वही लोग हैं जो कि उन्हीं जैसे हैं, जिनके लिए इस्लाम और इंसाफ़ के बजाय अपने निजी हित ज़्यादा अहम हैं। ये लोग अक्सर इस्लाम के नाम पर पहले अपने पीछे मुसलमानों की भीड़ इकठ्ठी करते हैं और फिर सियासत के धंधेबाज़ों से उन्हें दिखाकर क़ीमत वसूल करके अपने घर को महल में तब्दील करते रहते हैं और बेचारे मुसलमानों का कोई एक भी मसला ये कभी हल नहीं करते। मुसलमान सोचता है कि ये रहबरी कर रहे हैं जबकि ये रहज़नी कर रहे होते हैं। मुसलमानों की दशा में लगातार बिगाड़ आते चले जाने के असल ज़िम्मेदार यही ग़ैर-ज़िम्मेदार खुदग़र्ज़ हैं। धर्म की आड़ में ये लोग अर्से से जो धंधेबाज़ी करते आए हैं, मौलाना वस्तानवी के आने से उसे ज़बरदस्त ख़तरा पैदा हो गया है। उनका वजूद ही ख़तरे में पड़ गया है। यही वजह है कि वे मौलाना वस्तानवी का विरोध कर रहे हैं और इसके लिए छात्रों को अपना मोहरा बना रहे हैं। वे नहीं चाहते कि दारूल उलूम देवबंद में कोई ऐसा ढर्रा चल पड़े जिसकी वजह से मदरसे के छात्रों  और आम मुसलमानों में दोस्त-दुश्मन और रहबर और रहज़न की तमीज़ पैदा हो जाए और उनके लिए अपनी ग़र्ज़ के लिए उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाए।
यही असल वजह है दारूल उलूम देवबंद में जारी मौजूदा संघर्ष की। इस संघर्ष को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि मौलाना वस्तानवी इसमें विजयी रहेंगे क्योंकि एक तो वजह यह है कि उम्मीद हमेशा अच्छी ही रखनी चाहिए और दूसरी बात यह है कि गुजरात के मुसलमान आर्थिक रूप से बहुत मज़बूत हैं और वे आर्थिक रूप से दारूल उलूम देवबंद की बहुत इमदाद करते हैं। उन्हें नज़रअंदाज़ करना या उनके साथ धौंसबाज़ी करना आसान नहीं है, ख़ासकर तब जबकि वे अपने विरोधी की नीयत को भी पहचान चुके हों कि उनके विरोधी की नीयत इस्लाम का हित नहीं है बल्कि खुद अपना निजी हित है। देवबंद की जनता और मीडिया के समर्थन ने भी मौलाना वस्तानवी के विरोधियों की हिम्मत को पस्त करना शुरू कर दिया है। दारूल उलूम देवबंद में बेहतर तब्दीली के लिए मीडिया एक बेहतर रोल अदा कर सकता है और उसे करना भी चाहिए क्योंकि मुसलमानों के साथ साथ अन्य देशवासियों के हित में भी यही है।

हमने 28 जनवरी 2011 को यह लेख लिखा था और जिन चाचा भतीजा को ज़िम्मेदार माना था इस पूरे हंगामेबाज़ी का। मौलाना वस्तानवी ने भी अपने हटाए जाने के बाद अब खुलकर कहा है कि उन्हें हटाने के पीछे मदनी ख़ानदान का हाथ है।
जिस तरह राजनीति के मैदान में भ्रष्ट तत्वों ने क़ब्ज़ा जमा लिया है, ठीक ऐसे ही बहुत से भ्रष्ट तत्वों ने इस्लाम की तालीम देने वाले मदरसों को अपने निजी रूतबे को ऊंचा करने के लिए क़ब्ज़ा लिया है। राहबरी के रूप में राहज़नी करना इसी को कहा जाता है।
ये राहज़न जब कभी बयान या फ़तवा देते हैं तो वह भी इस्लाम की कल्याणकारी भावना को सामने रखकर नहीं देते बल्कि यह देखकर देते हैं कि उसमें इन्हें क्या मिल रहा है। जब समूह का लीडर समूह की हितचिंता छोड़ देता है तो फिर वह समूह पिछड़ता चला जाता है। मुसलमानों के साथ आज यही हो रहा है।
जब मुसलमान सोचता है कि वह अन्य समूहों से पिछड़ क्यों रहा है तो ‘मौलाना‘ के भेस में छिपे हुए ये राहज़न बताते हैं कि यह हिन्दुस्तान है यहां हिन्दू तुम्हारे साथ भेदभाव कर रहे हैं। इसीलिए तुम पिछड़ रहे हो।
इसके बाद ये राहज़न अपनी तरफ़ से ध्यान हटाने के लिए मुसलमानों को हिन्दुओं से भिड़ा डालते हैं, कभी आरक्षण दिलाने के नाम पर और कभी किसी और नाम पर लेकिन यह कभी क़ुबूल नहीं करते कि इस्लाम में एकता के ऊपर ज़ोर दिया है, उसे तोड़ने वाले हम हैं। इस्लाम ने सामूहिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए ज़कात-ख़ैरात की व्यवस्था की है, उस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने वाले हम हैं और ‘मुस्लिम बैंकों‘ के रूप में मुसलमानों के धन पर सरकारी बैंकों से सूद खाने वाले भी हम ही हैं, जबकि इस्लाम में सूद-ब्याज खाना हराम है।
जब ऐसे लोग इस्लाम की नुमाइंदगी करते हैं तो फिर इस्लाम का सही पैग़ाम मुसलमानों तक ही सही नहीं पहुंच पाता तो ग़ैर-मुस्लिमों तक सही कैसे पहुंच सकता है ?
इस्लाम के बारे में ग़लतफ़हमियां फैलने की बड़ी वजहों में से एक वजह यह भी है।
इस सबके बावजूद अच्छी बात यह है कि लोग लगातार जागरूक हो रहे हैं और इन तत्वों के लिए यह बात सबसे बड़ी चिंता है। लोगों को जागरूकता से दूर रखने के लिए भी ये लोग सिर्फ़ इसीलिए कोशिश करते हैं ताकि इनकी साज़िशें बेनक़ाब न हो जाएं जबकि इस्लाम चाहता है कि लोग क़ुरआन को भी मानें तो उसे पढ़कर और सोच-समझकर मानें।
ऐसे लोग कब तक मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व पद पर अपना क़ब्ज़ा जबरन बनाए रखते हैं ?
यह आने वाला समय ही बताएगा लेकिन हक़ीक़त यह है कि अगर मुस्लिम समुदाय पाखंडियों को ‘नो मोर‘ कर दे तो न सिर्फ़ उसके बहुत से मसले ख़तम हो जाएंगे बल्कि हमारे देश और दुनिया में बसने वाले दूसरे भाईयों की भी बहुत सी चिंताएं दूर हो जाएंगी।
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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क



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ब्लॉगर्स मीट वीकली ( 1 ) A virtual step to be unite .

श्री रूपचंद शास्त्री ‘मयंक‘
सभी हिंदी भाषी भाईयों को अनवर जमाल का प्रणाम और सलाम !
सबसे पहले हम आदरणीय श्री रूपचंद शास्त्री ‘मयंक‘ जी का स्वागत और अभिनंदन करते हैं। आज वह इस सभा के सभापति की हैसियत से हमारी सरपरस्ती फ़रमा रहे हैं।
हम उनका शुक्रिया अदा करते हैं। 

प्रेरणा अर्गल
प्रेरणा अर्गल जी आज हमारे साथ इस गोष्ठी का संचालन करेंगी और हम इनका भी स्वागत और अभिनंदन करते हैं। प्रेरणा जी ने बहुत कम समय में ही हिंदी ब्लॉगिंग में ख़ुद को स्थापित कर लिया है। उनकी लगन का नतीजा ही तो है कि वे आज आपके सामने हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल के साप्ताहिक समारोह का संचालन करने के लिए मौजूद हैं।

सभा की शुरूआत एक स्वागत गान से की जाती है जिसके रचनाकार हैं हमारे आदरणीय सभापति श्री रूपचंद शास्त्री ‘मयंक‘ जी -

 
सभी हिंदी ब्लॉगर्स का ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली‘ की इस पहली 
महफ़िल में
‘प्रेरणा अर्गल‘ आपका सादर स्वागत करती है। स्नेही जनों यह महफ़िल सजाई गईहै आपस में अपने सुख-दुख साझा करने के लिए। वे सुख-दुख जिन्हें हम अपने लेखन में जगह देते हैं और वे सुख-दुख भी यहां शेयर किए जा सकते हैं जिन्हें हम संकोचवश किसी से कह नहीं पाते। अकेलेपन के दंश को दूर करने केलिए ही यह गोष्ठी यहां आयोजित की जा रही है और हरेक सोमवार को की जाती रहेगी। आपसे सहयोग की आशा है और इसे बेहतर बनाने के लिए आपसे सुझाव आमंत्रित करती हूं। मेरी इस पेशकश में इस मंच के संयोजक डा. अनवर जमाल मेरे साथ मौजूद हैं। मैं अभी नई हूं जहां  भी भूलवश कमी रह जाए या नज़र आये उसे आप सभी लोग ठीक कर दीजिएगा। इसी विनती के साथ पेश है पहले उन पोस्ट्स का चर्चा जिन्हें इस सप्ताह में ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशल‘के गौरवशाली मंच से पेश किया गया।

सबसे पहले
  अनशन को हिट करने के नायाब नुस्ख़े Political Game -शैलेश गपोड़ी
  ट्रेन हादसा: पत्रकारों का पागलपन महेंद्र        श्रीवास्तवजी  बता रहे हैं / 

 ब्लॉगर्स अपनी भूल कैसे सुधारें? Hindi Blogging Guide
Blogging Guide (15)
 खबरगंगा: प्रिंट मीडिया : devendra gautam·
 आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें  रमेश कुमार जैन उर्फ़"सिरफिरा"
 कंप्यूटर क्रांति खा रही है याददाश्त इंसान की Hindi Blogging Guide (18)
 बब्लीजी अपनी आशा को अपनी अभिब्यक्ति  आसमान के द्वारा पेश कर रही हैं /
 साधना वैद जी  की रचना   मुझे अच्छा लगता है
 सुनील कुमार जी पथ से भटक कर नए पथ की तलाश में  भटका हुआ पथिक !
 हमारी दिव्याजी एक सवाल लेकर आई हैं क्या हमारी मीडिया भटक गयी है /
 नीम पेड़ एक गुण अनेक..........>>>संजय भास्कर जी बता रहे हैं 
 उम्मीद और वेदना ..संगीता स्वरूपाजी के दिल से लिखी अनोखी रचना
 तमिलनाडु मे aadi valli का पूजा मनाया जाता है विद्याजी के द्वारा दी गई जानकारी /
 घमंडी शेर (काव्य-कथा)
 बच्चों के कोने मैं कैलाश शर्माजी की रचना

कसक है आज भी दिल में बी सत्यम शिवम कसक भरी प्रस्तुति
 राजेश कुमारीजी  बयान कर रही हैं एक छोटी सी प्रेम कहानी जो इतिहास बन गई A love story between sea wave and मौंतें
और अब अंत में सावन पर सावन आयो री       प्रस्तुत  प्रेरणा अर्गल द्वारा
आपको ये प्रयास कैसा लगा कृपया आप इस मंच में 

आइये और अपने  विचारों से हमें अवगत कराकर 

हमारा उत्साह बढाइये/आपका बहुत बहुत आभार / 

  
                                            पेशकश : प्रेरणा अर्गल  
और अब अनवर जमाल ...
बहुत ख़ूब प्रेरणा जी, आपने सचमुच बहुत मेहनत की है और एक अच्छी चर्चा पेश की है।  शुक्रिया !
भाईयो, बहनो, दोस्तो और बुज़ुर्गो ! यह हफ़्ता हमें अनम की याद दिला गया।
जनाब मासूम साहब ने हमें एक प्रैक्टिकल सलाह दी, जिसका हमने स्वागत किया। उनकी सलाह आमतौर पर ऐसी होती है जिससे कि आदमी और समाज मे संतुलन आ जाए। इसी वजह से उनकी ताज़ा पोस्ट पर भी औरत और मर्द सभी उनसे सहमत हैं।
कुछ सलाह योगेंद्र पाल जी भी दे रहे हैं ब्लॉग की बेहतरी के लिए
ब्लॉगिंग के उतार चढ़ाव पर भाई ख़ुशदीप सहगल जी अपना नज़रिया एक सिद्ध पुरूष की कहानी के माध्यम से सुना रहे हैं।
जनाब रणधीर सिंह ‘सुमन‘ तो बस एक बार में ही उखाड़ कर रख देते हैं। उन्होंने बिल्कुल ताज़ा घोषणा की है कि ज़मींदार, राजा-महाराजा यह सब देश के ग़द्दार थे।


लेकिन देश को नुक्सान पहुंचाने में वे लोग भी पीछे नहीं हैं जो कि अपने निजी हित के लिए
मौलाना वस्तानवी को उनके पद से हटा देना चाहते हैं। लोग इनसे श्रृद्धा रखते हैं लेकिन ये लोग श्रृद्धालुओं का मार्गदर्शन करने के बजाय तरक्क़ी के रास्ते इन पर बंद कर देते हैं। 
इसीलिए ‘बुराई से मुक्ति कैसे हो ?‘ इस विषय पर मिलकर सोचा जा रहा है।
हमारे महामित्र अलबेला खत्री जी विशाखापत्तनम में मुशायरे में अपना कविता पाठ कर रहे हैं और हमारे भाई ज़ीशान ज़ैदी साहब की किताब का विमोचन लखनऊ में हो चुका है।
दोनों को मुबाकबाद !

 
हिंदी ब्लॉगर्स की एक टीम ‘हिंदी ब्लॉगिंग गाइड‘ भी लिखने में जुटी हुई है और ब्लॉगर्स को तकनीकी ज्ञान देने के लिए एक ‘तकनीकी एग्रीगेटर‘ भी वुजूद में आ चुका है।
इधर तो मासूम साहब बता रहे हैं कि ‘हिंदी ब्लॉगिंग के ज़रिये कमाई अभी एक दूर की कौड़ी है‘
और दूसरी तरफ़ डेढ़ साल के बच्चे ने 5 हज़ार का ईनाम जीत लिया है बिना ब्लॉगिंग किए ही। हिंदी ब्लॉगर्स को आमदनी के लिए इस बच्चे के बाप इंजीनियर  मुनव्वर अली साहब से प्रेरणा लेनी चाहिए। ख़ुशी की बात यह है कि मुनव्वर अली साहब ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल' के ही एक सदस्य हैं।

आपको आकुल जी के पावस दोहे भी पसंद आएंगे और मुशायरा पर यह ग़ज़ल भी।
वंदना जी को सता रही है किसानों की चिंता 
 जबकि मनीष कुमार खेदावत को याद आ रहा है  वो स्कूल का गुज़रा ज़माना || 
और बिल्कुल आज सुबह सुबह हमारी वाणी देखी तो एक अजीब सी घटना हुई। श्री मनोज कुमार जी की पोस्ट ‘विचार आते हैं‘ पर क्लिक किया तो पेज पर लिखा हुआ मिला कि यह पृष्ठ ही मौजूद नहीं है, तो सॉरी मनोज जी।
इस ब्लॉग पर मोहतरमा संगीता स्वरूप जी देख रही हैं ‘लक्ष्य विहीन सा पथ‘


दुआ कीजिये कि अमरेंद्र शुक्ला जी को चैन आ जाए .

 और आखि़र में बता दें कि आज हम ब्लॉगिंग में जहां भी हैं उसकी बुनियाद में 
हमारे उस्ताद जनाब उमर कैरानवी साहब का बड़ा योगदान है। मालिक उनका भला करे और सबका भला करे, आमीन ! 


एक नई वेबसाइट

सेहत, शिक्षा, इंटरनेट से लेकर चीज़ों को ख़रीदने-बेचने तक के बारे में आपको उपयोगी जानकारी चाहिए तो यह वेबसाइट आपको काफ़ी नफ़ा पहुंचा सकती है.

दोस्तो ! ब्लॉगर्स मीट वीकली का एक ख़ास मक़सद है आपस में जुड़ना। इस की यह पहली गोष्ठी है। इस पोस्ट के प्रकाशित होने के बाद 8 घंटे तक यह गोष्ठी अविरल भाव से चलती रहेगी और फिर अध्यक्ष महोदय जी के अध्यक्षीय संबोधन के बाद यह गोष्ठी औपचारिक रूप से पूर्ण और संपन्न हो जाएगी। एक पोस्ट के तौर पर इसका लुत्फ़ लोग बाद तक भी उठाते रहेंगे।
अपनी इस सामूहिक कोशिश को हम अब आपकी नज़्र करते हैं।
आपके सुझाव का सदा स्वागत है।
जीवन के अनुरक्त तरानों को, ख़ुश हो करके गाना 
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ताज़ा ताज़ा 
और अभी अभी (5 :45 PM पर) पता चला है कि 
शालिनी कौशिक जी ‘भारतीय नारी‘ ब्लॉग में जुड़ने का आमंत्रण दे रही हैं 
और इसकी घोषणा वह पहले ही कर चुकी थीं ‘रचना जी‘ के फ़ैसले के बाद। 
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मुझे मेरा मेरे परिजनों सी बिछड़ने का जमाना याद आया .........

मुझे मेरा मेरे परिजनों सी बिछड़ने का जमाना याद आया .........

में श्रीमती रिजवाना अख्तर मेरे शोहर अख्तर खाना  अकेला के साथ मेरे बेटे शाहरुख़ खान को अमिति युनिवेरसीटी नोयडा में एडमिशन दिलवाने गये थे ..२३ जुलाई को हम दिल्ली हमारी ननद  के यहाँ से रवाना हुए और शाहरुख को लेकर अमिति पहुंचे ..अमिटी में देश के दूरदराज़ इलाकों से कई बच्चे अपने माता पिता के साथ आये थे हर माँ बाप का दिल अपने बच्चों में अटका हुआ था ..कहते है के तोते में जादूगर की जन  होती है लेकिन आजकल कलियुग में बच्चों में माँ बाप की जान होती है ..खेर मेरे बच्चे शाहरुख का एडमिशन हुआ अनाउंस हुआ के अब बच्चे हमारे हुए कोई बच्चा होस्टल छोड़ कर नहीं जायेगा ..खेर हम बच्चे को होस्टल छोड़ने गए लेकिन अब मुझ से सहा नहीं जा रहा था मेरे आंसू थे के उबल कर उफान कर बाहर आ रहे थे में अपनी सिसकियाँ नहीं  दबा पा रही थी ..मेरे बच्चे ने मुझे भांप लिया और मुझ से कहा के मम्मी पढाई में यह तो होता ही है आप फिकर क्यूँ करती हो आना जाना लगा रहेगा ..मेरे शोहर मुझ पर थोड़ा इस वक्त भावुक होने पर नाराज़ हुए लेकिन फिर मेने दिल को मजबूत किया और बच्चे को कहा के बेटा मुझे ही मेरा तीस साल पहले का मंजर याद आ गया मुझे भी ऐसे ही मेरे मम्मी पापा टोंक से अजमेर होस्टल पढने के लियें छोड़ कर गए थे और तब मेने भी भावुक हुए रोते बिलखते मेरे माँ बाप से यही अल्फाज़ कहे थे ......................श्रीमती रिजवाना अख्तर कोटा राजस्थान
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खुदी के हाथ से निकला......


खुदी के हाथ से निकला तो फिर हलाक हुआ.
कफे-गुरूर में हर शख्स जेरे-खाक हुआ.

हरेक तर्ह की आबो-हवा से गुजरा हूं
ये और बात तेरी रहगुजर में खाक हुआ.

वो रातो-रात चमकने लगा सितारों सा 
उसे तराशने वाला भी ताबनाक हुआ.

ये कच्चे धागों का बंधन है या तमाशा है
अभी-अभी हुई शादी अभी तलाक हुआ.

मैं उससे अपनी तबाही का सबब पूछुंगा
अगर कभी मुझे मिलने का इत्तिफाक हुआ.

तलब की आखिरी मंजिल अजीब मंजिल है
की इस मुकाम पर जो पहुंचा वो हलाक हुआ.

मुहब्बतें मिलीं मुझको न नफरतें गौतम
अजीब रंग में दामन जुनू का चाक हुआ.

-----देवेंद्र गौतम  

http//gazalganga.in
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राजरानी -रवीन्द्रनाथ टैगोर Robindra Nath Taigore

जन्म: 7 मई 1861 को कलकत्ता में। साहित्य के लिए 1913 का नोबेल पुरस्कार। यह उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय। ‘गीतांजलि’, ‘गोरा’, ‘घरे-बायरे’ आदि प्रमुख रचनाएं।
मृत्यु: 7 अगस्त 1941
कल तुम्हें अच्छी नहीं लगी थी चण्डी को लेकर की गई बकवास। वह एक तस्वीर मात्र थी। मोटी-मोटी लाइनों से बनी हुई, उसमें रस नहीं था। आज तुमसे कुछ कहूंगा, वह सच्ची बात होगी।’
कुसुमी अत्यंत उत्फुल्ल होकर बोली, ‘हां, हां, वही कहो। तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था, मनुष्य कहानी में लपेट कर बराबर सच्ची खबरें देता रहता है। एकदम हलवाई की दूकान सजाये रखता है। सन्देश के भीतर छैना पहचान में नहीं आता।’
दादा महाशय बोले, ‘यह न होने पर मनुष्य के दिन नहीं कटते। कितने ही आख्य-उपन्यास, पारस्य-उपन्यास, पंचतंत्र, न जाने क्या-क्या सजाये गये हैं। मनुष्य बहुत अंशों में बच्चा होता है, उसे रूपकथाओं से भुलाना पड़ता है। और भूमिका की जरूरत नहीं है। इस बार शुरू किया जाए।’ एक था राजा, उसकी राजरानी नहीं थी। राजकन्या की खोज में दूत गये अंग, बंग, कलिंग, मगध, कौशल और काञ्ची। वे सब आकर खबर देते कि महाराज, उन्होंने क्या देखा है। किसी की आंखों के पानी में मोती बरसते हैं, किसी की हंसी से मानिक गिरते हैं। किसी का शरीर चन्द्रमा के प्रकाश से गढ़ा गया है-यह जैसे पूर्णिमा की रात्रि का स्वप्न हो। राजा सुनते ही समझ गये, बातें बढ़ा कर कही जा रही हैं। राजा के भाग्य से सच्ची बात नहीं जुटती अनुचरों के मुंह पर। वे बोले, ‘मैं स्वयं देखने जाऊंगा।’
सेनापति बोले,‘तो फौज बुलाऊं?’
राजा बोले, ‘लड़ाई लड़ने नहीं जा रहा हूं।’
मंत्री बोले, ‘तो पात्र-मित्रों को खबर दूं?’
राजा बोले, ‘पात्र-मित्रों की पसंद को लेकर कन्या को देखने का काम नहीं चलेगा।’
‘तो फिर राजहस्ती तैयार करने को कह दूं?’
राजा बोले, ‘मेरे दो पांव हैं।’
‘साथ में कितने प्यादे जाएंगे?’
राजा बोले, ‘मेरी छाया जायेगी।’
‘अच्छा, तो फिर राजवेश पहनिये-चुन्नी-पन्ना का हार, माणिक्यजड़ित मुकुट, हीराजड़ित कंकन गजमोती के कुण्डल।’
राजा बोले, ‘मैं राज-परिधान तो पहने ही रहता हूं, इस बार संन्यासी का परिधान पहनूंगा।’
सिर पर लगा लीं जटा, पहन ली कोपीन, शरीर पर मली भस्म, कपाल पर लगाया तिलक, और हाथ में लिया कमंडल व बेल की लकड़ी का डंडा। ‘बमबम महादेव’ कह कर निकल पड़े मार्ग पर। देश-देश में चर्चा फैल गई-बाबा पिनाकीश्वर उतर आये हैं हिमालय की गुहा से, उनकी एक सौ पच्चीस वर्ष की तपस्या समाप्त हो गई है।
राजा पहले गये अंग देश में। राजकन्या खबर पाकर बोलीं-‘बुलाओ मेरे पास।’
कन्या के शरीर का रंग उज्जवल श्यामल, बालों का रंग जैसे फिड के पंख, दोनों आंखों में हिरण जैसी चौंक पड़ने वाली दृष्टि। वे बैठी हुई श्रृंगार कर रही थी। कोई बांदी ले आई स्वर्णचंदन का लेप, जिससे मुंह का रंगा ऐसा हो जाए जैसे चम्पा का फूल हो। कोई ले आई भ्रगलाञ्जन तेल, उससे केश ऐसे हो जाएं जैसे पंपासरोवर की लहरें हों। कोई ले आई मकड़ी के जाल जैसी साड़ी। कोई ले आई हवा से भी हल्की ओढ़नी। यही करते-करते दिन के तीन पहर बीत गये। किसी तरह भी कुछ मन के मुताबित नहीं हुआ। संन्यासी से बोलीं, ‘बाबा, मुझे ऐसे आंखों को भ्रम में डालने वाले साज का पता बता दो, जिससे राज-राजेश्वर को चकाचौंध लग जाए, राजकाज पड़ा रह जाए, केवल मेरे मुंह की ओर देखते ही दिन-रात बिताते रहें।’
संन्यासी बोले, ‘और कुछ भी नहीं चाहिए?’
राजकन्या बोलीं, ‘नहीं, और कुछ भी नहीं।’
संन्यासी बोले, ‘अच्छा, तो मैं जाता हूं, फिर मिलूंगा।’
राजा वहां से गए बंग देश में। राजकन्या ने सुनी संन्यासी के नाम की चर्चा। प्रणाम करके बोलीं, ‘बाबा, मुझे ऐसा कंठ दो, जिससे मेरे मुंह की बातों से राजराजेश्वर के कान भर जाएं, सिर घूम जाए, मन उतावला हो उठे। मेरे अतिरिक्त और किसी की भी बात उनके कान में न पड़े। मैं जो बुलवाऊं, वही बोलें।’
संन्यासी बोले, ‘उसी मंत्र को खोजने के लिए निकला हूं। यदि मिलेगा तो लौट कर भेंट करूंगा।’
कह कर वे चले गये।
गये कलिंग में। वहां दूसरी ही हवा थी अन्त:पुर में। राजकन्या मंत्रणा कर रही थीं कि जिस तरह से काञ्चीराज को जीत कर उनका सेनापति वहां की रानी का सिर नीचा कर दे सकता है, और कौशल का घमंड भी उन्हें सहन नहीं हो रहा था। उसकी राजलक्ष्मी को बांदी बना कर, उनके पांवों में तेल मलने के काम में लगा दिया जाएगा।
संन्यासी की खबर पाकर बुलवा भेजा, बोलीं, ‘बाबा, सुना है, श्वेतद्वीप में सहस्रघ्नी अस्त्र है, जिसके तेज से नगर-ग्राम सब कुछ जल कर भस्म हो जाते हैं। मैं जिनसे विवाह करूंगी, मैं चाहती हूं, उनके पांवों के पास बड़े-बड़े राजबंदी हाथ जोड़े खड़े रहें और उन राजाओं की स्त्रियां बन्दिनी होकर कोई तो चंवर डुलाये, कोई छत्र पकड़ कर खड़ी रहे और कोई मेरा पनडब्बा लाये।’
संन्यासी बोले, ‘और कुछ नहीं चाहिए तुम्हें?’
राजकन्या बोलीं, ‘और कुछ भी नहीं।’
संन्यासी बोले, ‘उन देशों को भस्म कर देने वाले अस्त्र की खोज में जा रहा हूं।’
संन्यासी चले गये। ‘बोले, धिक्कार है।’ चलते-चलते आ पड़े एक वन में। खोल फेंके जटाजूट। झरने के पानी में स्नान करके शरीर की भस्म धो डाली। तब तीन प्रहर का समय हो चुका था। धूप तेज थी, शरीर भ्रांत था, क्षुधा प्रबल थी।
आश्रम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते नदी के किनारे जाकर देखी एक पत्तों की कुटिया। उस जगह एक छोटा चूल्हा बना कर एक लड़की ने साग-सब्जी चढ़ा रखी थी रांधने के लिए। वह बकरियां चराती थी वन में, वह मधु (शहद) एकत्र कर राजमहल में भेज देती थी। दिन कट गया था इसी काम में। अब सूखी लकड़ी जला कर शुरू किया था रसोई बनाना। उसके पहनने के कपड़ों में दाग लग रहे थे, उसके दोनों हाथों में दो शंख की चूड़ियां थीं, कान में लगा रखी थी एक धान की सींक। दोनों आंखें थीं भंवरे की तरह काली। स्नान करके उसने भीगे बालों को पीठ पर फैला दिया था जैसे बादलों से पूर्ण रात्रि का अंतिम प्रहर हो।
राजा बोले, ‘बड़ी भूख लग रही है।’
लड़की बोली, ‘थोड़ा-सा सब्र करिए, मैंने रसोई चढ़ा दी है, अभी तैयार हो जाएगी आपके लिए।’
राजा बोले, ‘और तुम क्या खाओगी तब?’
वह बोली, ‘मैं वन की लड़की हूं, जानती हूं कि कहां से फल-फूल इकट्ठे करके पाये जा सकते हैं। वही मेरे लिए ढेर हो जाएंगे। अतिथि को अन्न देकर जो पुण्य होता है, गरीबों के भाग्य में वह तो सहज ही नहीं जुट पाता।’
राजा बोले, ‘तुम्हारा और कौन है?’
लड़की बोली, ‘मेरे बूढ़े पिता हैं, वन के बाहर उनका छोटा-सा घर है। मेरे अतिरिक्त उनका और कोई नहीं है। काम खत्म करके कुछ खाने को ले जाती हूं उनके पास। मेरे लिए वे राह देख रहे हैं।’
राजा बोले, ‘तुम अन्न लेकर चलो, और मुझे दिखा दो वे सब फल-मूल, जिन्हें स्वयं इकट्ठे करके खाती हो।’
कन्या बोली, ‘मुझे अपराध जो लगेगा।’
राजा बोले, ‘तुम देवता का आशीर्वाद पाओगी। तुम्हें कोई भय नहीं है। मुझे राह दिखाती हुई ले चलो।’
पिता के लिए तैयार की हुई अन्न की थाली वह सिर पर रख कर ले चली। फल-फूल संग्रह करके दोनों जनों ने उसी को खा लिया। राजा ने जाकर देखा, बूढ़ा बाप फूंस के घर के दरवाजे पर बैठा है। वह बोला-‘बेटी, आज देर क्यों हो गई?’
कन्या बोला, ‘पिताजी, अतिथि को लाई हूं तुम्हारे घर में।’
वृद्ध व्यस्त होकर बोला, ‘हमारा गरीबों का घर है, क्या देकर मैं आतिथ्य सेवा करूं?’
राजा बोले, ‘मैं तो और कुछ भी नहीं चाहता, पाई है तुम्हारे कन्या के हाथ की सेवा। आज मैं विदा लेता हूं। किसी दूसरे दिन आऊंगा।’
सात दिन सात रात बीत गये, इस बार राजा आये राजवेष में। उनके घोड़े-रथ सब कुछ रह गये वन के बाहर ही। वृद्ध के पांवों के समीप सिर रख कर प्रणाम किया, बोले-‘मैं विजयपत्तन का राजा हूं। रानी ढूंढ़ने को निकला था देश-विदेश में। इतने दिनों बाद पाई है- यदि तुम मुझे दान करो, और कन्या राजा हो।’ वृद्ध की आंखें पानी से भर गईं। आया राजहस्ती-लकड़हारिन लड़की को बगल में बैठा कर राजा लौट गये राजधानी को।
अंग, बंग, कलिंग की राजकन्याओं ने सुनकर कहा, छि:।
(‘पहिला नम्बर’ संग्रह से साभार, अनुवादक : राजेश दीक्षित)
source : http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-181982.html
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कंप्यूटर क्रांति खा रही है याददाश्त इंसान की Hindi Blogging Guide (18)

अभी हाल ही में एक शोध में यह बात सामने आई है कि लोग अब चीज़ों को अपने दिमाग़ में याद रखने के बजाय गूगल के भरोसे रहने लगे हैं। वे चीज़ों को याद रखने की आदत खोते जा रहे हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि जब ज़रूरत होगी तो गूगल या किसी भी सर्च इंजन के ज़रिये उसे आसानी से खोज लेंगे। कंप्यूटर क्रांति का यह एक काला पक्ष है। नए ब्लॉगर्स के सामने सर्च इंजन और कंप्यूटर के ये नकारात्म पक्ष भी रहने चाहिएं। प्रस्तुत लेख इन्हीं बातों को रेखांकित करता है :
यह सवाल अक्सर पूछा जाता है, ‘कितनी मेमोरी है?’ लेकिन यह स्मृति या मेमोरी इंसान की नहीं, कंप्यूटर की, पेन ड्राइव की और मोबाइल की होती है, जिनमें हम ढेरों सूचनाएं, संगीत, फिल्में और न जाने क्या-क्या भरकर रखते हैं। लेकिन इन सबसे हमारी स्मृति का क्या हो रहा है? शोधकर्ताओं का कहना है कि स्मृति के इतने सारे साधन हमारी अपनी स्मृति को नष्ट कर रहे हैं। जब हमें यह मालूम होता है कि अमुक चीज हमारे कंप्यूटर की मेमोरी में सुरक्षित है, तो हम उसे याद रखने की कोशिश नहीं करते। दिमाग सहज रूप से उन्हीं चीजों पर ध्यान देता है और उन्हें ही याद रखता है, जिनके बारे में यह जानकारी होती है कि वे चीजें किसी और स्मृति में सुरक्षित नहीं हैं। शुरू में जब जानकारी या ज्ञान को सुरक्षित करने के कोई साधन नहीं थे, तब लोगों ने याद करने के तरीके अपनाए। फिर लिपि का आविष्कार हुआ और लिखना व संग्रह करना आसान हुआ, तो याद रखने का सिलसिला कम हुआ। लेकिन आदिम काल से स्मृति के साथ एक परिघटना और जुड़ी होती है, जिसे ‘ट्रांजेक्शनल’ या विनिमय स्मृति कहते हैं, यानी एक परिवार या समूह में रहने वाले लोग स्वाभाविक रूप से याद रखने वाली बातों को बांट लेते हैं। कोई व्यक्ति कुछ चीज याद रखता है, कोई व्यक्ति दूसरी चीज, क्योंकि उन्हें मालूम है कि वक्त आने पर दूसरे से पूछ लिया जाएगा। मां जानती है कि बेटे को याद है कि 40 सेंटीमीटर के कितने इंच होते हैं और बेटा जानता है कि मां को याद है कि उसकी नई जीन्स कहां रखी है। पिता क्रिकेट मैच की तारीखों के लिए बेटे पर निर्भर रहते हैं और बेटा जानता है कि पिता को याद होगा कि स्कूल की फीस कब जमा करनी है। लेकिन कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक साधनों ने बात कुछ आगे बढ़ा दी है, क्योंकि स्मृति हमारा ऐसा भंडार है, जिसकी सहायता से हम ज्यादा रचनाशील, ज्यादा कुशल और तेज होते हैं। जैसे कोई क्रिकेट खिलाड़ी खेल के बीच अपने कोच के पास सलाह लेने नहीं जा सकता, वैसे ही हम हर वक्त कंप्यूटर के पास नहीं दौड़ सकते।
जो भी साधन हमने बनाए हैं, वे हमारी बेहतरी के लिए हैं, हमें कमजोर बनाने के लिए नहीं। एक विख्यात लेखक का वैज्ञानिक उपन्यास है, जिसमें सुदूर भविष्य में कहीं दूसरे ग्रह से आकर लोग धरती के सारे वैज्ञानिक उपकरणों को बेकार कर देते हैं, और इस तरह धरतीवासियों के गुलाम बनने का खतरा सामने आ जाता है। तब धरती को जो व्यक्ति बचाता है, वह अकेला ऐसा है, जो जबानी जोड़-गुणा-भाग वगैरा कर सकता है, वह इस कौशल के सहारे सारे उपकरणों को चला देता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारे वक्त में ओलंपिक में दौड़-कूद के जो विश्व रिकॉर्ड हैं, उतनी तेज दौड़ना या कूदना कुछ शताब्दियों पहले आम बात थी। प्रसिद्ध नृवंशशास्त्री क्लॉड लेवी स्ट्रास ने लिखा है कि अभी-अभी तक कुछ ऐसी आदिवासी जातियां थीं, जो दिन में तारे देख सकती थीं। हवाई जहाजों और रेडियो-टेलीस्कोप के जमाने में ऐसी शारीरिक क्षमताओं की कमी उतनी अखरती नहीं है, लेकिन हमारी स्मृति भी कंप्यूटर के हवाले हो जाए, यह तो ठीक नहीं। कुछ ही वक्त पहले याददाश्त पर इतना जोर दिया जाता था कि यह डर होने लगा था कि कहीं यह जोर रचनाशीलता को कुंद न कर दे। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने तब शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों के दिमाग में जानकारी ठूंसना नहीं है। जानकारी तो पुस्तकालयों में है, उन्हें पुस्तकालयों का उपयोग सिखाना चाहिए। एक शताब्दी के भीतर ऐसी स्थिति आ गई कि हम स्मृति के खत्म होने की आशंका जताने लगे हैं।
Source : http://www.livehindustan.com/home/detailpage.php?menuvalue=0&pagevalue=&storyvalue=181007&categoryvalue=116&SubCat=
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