राजरानी -रवीन्द्रनाथ टैगोर Robindra Nath Taigore

जन्म: 7 मई 1861 को कलकत्ता में। साहित्य के लिए 1913 का नोबेल पुरस्कार। यह उपलब्धि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय। ‘गीतांजलि’, ‘गोरा’, ‘घरे-बायरे’ आदि प्रमुख रचनाएं।
मृत्यु: 7 अगस्त 1941
कल तुम्हें अच्छी नहीं लगी थी चण्डी को लेकर की गई बकवास। वह एक तस्वीर मात्र थी। मोटी-मोटी लाइनों से बनी हुई, उसमें रस नहीं था। आज तुमसे कुछ कहूंगा, वह सच्ची बात होगी।’
कुसुमी अत्यंत उत्फुल्ल होकर बोली, ‘हां, हां, वही कहो। तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था, मनुष्य कहानी में लपेट कर बराबर सच्ची खबरें देता रहता है। एकदम हलवाई की दूकान सजाये रखता है। सन्देश के भीतर छैना पहचान में नहीं आता।’
दादा महाशय बोले, ‘यह न होने पर मनुष्य के दिन नहीं कटते। कितने ही आख्य-उपन्यास, पारस्य-उपन्यास, पंचतंत्र, न जाने क्या-क्या सजाये गये हैं। मनुष्य बहुत अंशों में बच्चा होता है, उसे रूपकथाओं से भुलाना पड़ता है। और भूमिका की जरूरत नहीं है। इस बार शुरू किया जाए।’ एक था राजा, उसकी राजरानी नहीं थी। राजकन्या की खोज में दूत गये अंग, बंग, कलिंग, मगध, कौशल और काञ्ची। वे सब आकर खबर देते कि महाराज, उन्होंने क्या देखा है। किसी की आंखों के पानी में मोती बरसते हैं, किसी की हंसी से मानिक गिरते हैं। किसी का शरीर चन्द्रमा के प्रकाश से गढ़ा गया है-यह जैसे पूर्णिमा की रात्रि का स्वप्न हो। राजा सुनते ही समझ गये, बातें बढ़ा कर कही जा रही हैं। राजा के भाग्य से सच्ची बात नहीं जुटती अनुचरों के मुंह पर। वे बोले, ‘मैं स्वयं देखने जाऊंगा।’
सेनापति बोले,‘तो फौज बुलाऊं?’
राजा बोले, ‘लड़ाई लड़ने नहीं जा रहा हूं।’
मंत्री बोले, ‘तो पात्र-मित्रों को खबर दूं?’
राजा बोले, ‘पात्र-मित्रों की पसंद को लेकर कन्या को देखने का काम नहीं चलेगा।’
‘तो फिर राजहस्ती तैयार करने को कह दूं?’
राजा बोले, ‘मेरे दो पांव हैं।’
‘साथ में कितने प्यादे जाएंगे?’
राजा बोले, ‘मेरी छाया जायेगी।’
‘अच्छा, तो फिर राजवेश पहनिये-चुन्नी-पन्ना का हार, माणिक्यजड़ित मुकुट, हीराजड़ित कंकन गजमोती के कुण्डल।’
राजा बोले, ‘मैं राज-परिधान तो पहने ही रहता हूं, इस बार संन्यासी का परिधान पहनूंगा।’
सिर पर लगा लीं जटा, पहन ली कोपीन, शरीर पर मली भस्म, कपाल पर लगाया तिलक, और हाथ में लिया कमंडल व बेल की लकड़ी का डंडा। ‘बमबम महादेव’ कह कर निकल पड़े मार्ग पर। देश-देश में चर्चा फैल गई-बाबा पिनाकीश्वर उतर आये हैं हिमालय की गुहा से, उनकी एक सौ पच्चीस वर्ष की तपस्या समाप्त हो गई है।
राजा पहले गये अंग देश में। राजकन्या खबर पाकर बोलीं-‘बुलाओ मेरे पास।’
कन्या के शरीर का रंग उज्जवल श्यामल, बालों का रंग जैसे फिड के पंख, दोनों आंखों में हिरण जैसी चौंक पड़ने वाली दृष्टि। वे बैठी हुई श्रृंगार कर रही थी। कोई बांदी ले आई स्वर्णचंदन का लेप, जिससे मुंह का रंगा ऐसा हो जाए जैसे चम्पा का फूल हो। कोई ले आई भ्रगलाञ्जन तेल, उससे केश ऐसे हो जाएं जैसे पंपासरोवर की लहरें हों। कोई ले आई मकड़ी के जाल जैसी साड़ी। कोई ले आई हवा से भी हल्की ओढ़नी। यही करते-करते दिन के तीन पहर बीत गये। किसी तरह भी कुछ मन के मुताबित नहीं हुआ। संन्यासी से बोलीं, ‘बाबा, मुझे ऐसे आंखों को भ्रम में डालने वाले साज का पता बता दो, जिससे राज-राजेश्वर को चकाचौंध लग जाए, राजकाज पड़ा रह जाए, केवल मेरे मुंह की ओर देखते ही दिन-रात बिताते रहें।’
संन्यासी बोले, ‘और कुछ भी नहीं चाहिए?’
राजकन्या बोलीं, ‘नहीं, और कुछ भी नहीं।’
संन्यासी बोले, ‘अच्छा, तो मैं जाता हूं, फिर मिलूंगा।’
राजा वहां से गए बंग देश में। राजकन्या ने सुनी संन्यासी के नाम की चर्चा। प्रणाम करके बोलीं, ‘बाबा, मुझे ऐसा कंठ दो, जिससे मेरे मुंह की बातों से राजराजेश्वर के कान भर जाएं, सिर घूम जाए, मन उतावला हो उठे। मेरे अतिरिक्त और किसी की भी बात उनके कान में न पड़े। मैं जो बुलवाऊं, वही बोलें।’
संन्यासी बोले, ‘उसी मंत्र को खोजने के लिए निकला हूं। यदि मिलेगा तो लौट कर भेंट करूंगा।’
कह कर वे चले गये।
गये कलिंग में। वहां दूसरी ही हवा थी अन्त:पुर में। राजकन्या मंत्रणा कर रही थीं कि जिस तरह से काञ्चीराज को जीत कर उनका सेनापति वहां की रानी का सिर नीचा कर दे सकता है, और कौशल का घमंड भी उन्हें सहन नहीं हो रहा था। उसकी राजलक्ष्मी को बांदी बना कर, उनके पांवों में तेल मलने के काम में लगा दिया जाएगा।
संन्यासी की खबर पाकर बुलवा भेजा, बोलीं, ‘बाबा, सुना है, श्वेतद्वीप में सहस्रघ्नी अस्त्र है, जिसके तेज से नगर-ग्राम सब कुछ जल कर भस्म हो जाते हैं। मैं जिनसे विवाह करूंगी, मैं चाहती हूं, उनके पांवों के पास बड़े-बड़े राजबंदी हाथ जोड़े खड़े रहें और उन राजाओं की स्त्रियां बन्दिनी होकर कोई तो चंवर डुलाये, कोई छत्र पकड़ कर खड़ी रहे और कोई मेरा पनडब्बा लाये।’
संन्यासी बोले, ‘और कुछ नहीं चाहिए तुम्हें?’
राजकन्या बोलीं, ‘और कुछ भी नहीं।’
संन्यासी बोले, ‘उन देशों को भस्म कर देने वाले अस्त्र की खोज में जा रहा हूं।’
संन्यासी चले गये। ‘बोले, धिक्कार है।’ चलते-चलते आ पड़े एक वन में। खोल फेंके जटाजूट। झरने के पानी में स्नान करके शरीर की भस्म धो डाली। तब तीन प्रहर का समय हो चुका था। धूप तेज थी, शरीर भ्रांत था, क्षुधा प्रबल थी।
आश्रम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते नदी के किनारे जाकर देखी एक पत्तों की कुटिया। उस जगह एक छोटा चूल्हा बना कर एक लड़की ने साग-सब्जी चढ़ा रखी थी रांधने के लिए। वह बकरियां चराती थी वन में, वह मधु (शहद) एकत्र कर राजमहल में भेज देती थी। दिन कट गया था इसी काम में। अब सूखी लकड़ी जला कर शुरू किया था रसोई बनाना। उसके पहनने के कपड़ों में दाग लग रहे थे, उसके दोनों हाथों में दो शंख की चूड़ियां थीं, कान में लगा रखी थी एक धान की सींक। दोनों आंखें थीं भंवरे की तरह काली। स्नान करके उसने भीगे बालों को पीठ पर फैला दिया था जैसे बादलों से पूर्ण रात्रि का अंतिम प्रहर हो।
राजा बोले, ‘बड़ी भूख लग रही है।’
लड़की बोली, ‘थोड़ा-सा सब्र करिए, मैंने रसोई चढ़ा दी है, अभी तैयार हो जाएगी आपके लिए।’
राजा बोले, ‘और तुम क्या खाओगी तब?’
वह बोली, ‘मैं वन की लड़की हूं, जानती हूं कि कहां से फल-फूल इकट्ठे करके पाये जा सकते हैं। वही मेरे लिए ढेर हो जाएंगे। अतिथि को अन्न देकर जो पुण्य होता है, गरीबों के भाग्य में वह तो सहज ही नहीं जुट पाता।’
राजा बोले, ‘तुम्हारा और कौन है?’
लड़की बोली, ‘मेरे बूढ़े पिता हैं, वन के बाहर उनका छोटा-सा घर है। मेरे अतिरिक्त उनका और कोई नहीं है। काम खत्म करके कुछ खाने को ले जाती हूं उनके पास। मेरे लिए वे राह देख रहे हैं।’
राजा बोले, ‘तुम अन्न लेकर चलो, और मुझे दिखा दो वे सब फल-मूल, जिन्हें स्वयं इकट्ठे करके खाती हो।’
कन्या बोली, ‘मुझे अपराध जो लगेगा।’
राजा बोले, ‘तुम देवता का आशीर्वाद पाओगी। तुम्हें कोई भय नहीं है। मुझे राह दिखाती हुई ले चलो।’
पिता के लिए तैयार की हुई अन्न की थाली वह सिर पर रख कर ले चली। फल-फूल संग्रह करके दोनों जनों ने उसी को खा लिया। राजा ने जाकर देखा, बूढ़ा बाप फूंस के घर के दरवाजे पर बैठा है। वह बोला-‘बेटी, आज देर क्यों हो गई?’
कन्या बोला, ‘पिताजी, अतिथि को लाई हूं तुम्हारे घर में।’
वृद्ध व्यस्त होकर बोला, ‘हमारा गरीबों का घर है, क्या देकर मैं आतिथ्य सेवा करूं?’
राजा बोले, ‘मैं तो और कुछ भी नहीं चाहता, पाई है तुम्हारे कन्या के हाथ की सेवा। आज मैं विदा लेता हूं। किसी दूसरे दिन आऊंगा।’
सात दिन सात रात बीत गये, इस बार राजा आये राजवेष में। उनके घोड़े-रथ सब कुछ रह गये वन के बाहर ही। वृद्ध के पांवों के समीप सिर रख कर प्रणाम किया, बोले-‘मैं विजयपत्तन का राजा हूं। रानी ढूंढ़ने को निकला था देश-विदेश में। इतने दिनों बाद पाई है- यदि तुम मुझे दान करो, और कन्या राजा हो।’ वृद्ध की आंखें पानी से भर गईं। आया राजहस्ती-लकड़हारिन लड़की को बगल में बैठा कर राजा लौट गये राजधानी को।
अंग, बंग, कलिंग की राजकन्याओं ने सुनकर कहा, छि:।
(‘पहिला नम्बर’ संग्रह से साभार, अनुवादक : राजेश दीक्षित)
source : http://www.livehindustan.com/news/tayaarinews/tayaarinews/article1-story-67-67-181982.html

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