बाबाजी खाना तैयार है, खा लीजिये, चलिये। पोते आराध्य की आवाज़ सुनकर मैंने पढ़ने की मेज से सिर उठाया। बेटा ! पापा गये, मैंने पूछा तो आराध्य  ने बताया कि पापा तो बिज़ी हैं, देर से आयेंगे।
मैं सोचने लगा, बेटे के पास तो समय ही नहीं होता पिता से बात करने का। मैं सोचता गया कि जैसे स्त्रियों को सदैव सहारा-सराहना चाहिये; बचपन में माता, पिता, भाई, तदुपरान्त पति-पुत्र; इसी प्रकार पुरुष को भी तो सहारा चाहिये होता है। बचपन में असहाय बालक के लिये मां-बहन, बाद में पत्नी-बेटी, वृद्धावस्था में बेटी-बहू आदि।
          सेवानिवृत्ति के पश्चात मुझे लगता है मैं पुनः बचपन में गया हूं। जैसे बचपन में अपने कमरे में कुर्सी पर बैठकर सोचते रहना, पढ़तेलिखते रहना, कभी-कभी गृहकार्य में हाथ बंटा देना, खाना-पीना या कुछ सामाजिक कार्य कर देना। उसी तरह मैं अब भी अपनी कुर्सी पर बैठकर सोचता, पढ़ता, लिखता रहता हूं, कभी कोई समाज का कार्य कभी-कभी गृहकार्य में हाथ बंटा देता हूं। पहले खाने-पीने, सहारे के लिये मां-बहन थीं, तदुपरान्त पत्नी बेटी और अब वही कार्य पुत्रवधू, नाती-पोते कर रहे हैं। मूलतः परिवार का मुखिया ( जो उस समय पिता की भूमिका में होता है ) तो सदैव ही परिवार के पालन-पोषण की व्यवस्था में ही व्यस्त रहता है, इन सब से असम्पृक्त। वह तो अपने पारिवारिक निर्वहन के रूप में, आर्थिक व्यवस्था में व्यस्त रहकर ही समाज, देश, राष्ट्र की सेवा में रत होता है। उसे कब समय होता है दादी-बाबा से संवाद करने का। संबाद तो प्रायः दादी-बाबा, पोते-पोती ही आपस में करते हैं। इसीलिये कहा जाता है कि प्रायः पोता ही बाबा के पद चिन्हों पर चलता है, पुत्र की अपेक्षा। जैसे पहले मेरे पिता इस भूमिका में थे, बाद में मैं स्वयं और अब वही दायित्व कृतित्व मेरे पुत्र द्वारा निभाया जा रहा है। यह तो जग-रीति चक्र है, विष्णु का चक्र है, पालन,पोषण चक्र; संसार चक्र है, जीवन चक्र, वंश चक्र,---भव चक्र है। यह परिवर्ती-क्रमिक चक्र सामाजिक क्रम है। यही तो मानव का नित्य याथार्थिक, सार्थक जीवन क्रम है, जिससे वंश, जाति संसार उन्नति-प्रगति को प्राप्त होता है। ---

परिवर्तिन संसारे को मृत वा जायते।
जातो, येन जातेन याति वंश समुन्नितम॥
          यद्यपि आजकल आणविक ( मौलेक्यूलर) परिवार में दादी-बाबा का महत्व घटता जा रहा है। पितामाता के दायित्व वहु-विधात्मक होने से पुत्र-पुत्रियों पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जा रहा फ़लतः परिवार के पुत्र-पुत्री, भावी पीढ़ी प्रायः दिशा विहीन होती जा रही है……
       अभी भी सोच ही रहे हैं बाबाजी….खाना ठंडा हो रहा है। मुझे भी भूख लग रही है……. आराध्य  की अधीरता भरी आवाज़ से मे्री तन्द्रा भंग हुई। मैंने मुस्कुराकर आराध्य की ओर देखा…..हां..हां चलो……हाथ धो लिये या नहीं।
------डॉ. श्याम गुप्त

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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क


मेरा बोलना मुझे कितना महंगा पड़ा 
मैं लफ्ज़-दर-लफ्ज़ खोखला होता गया .

मैंने की थी जिनसे उम्मीद मोहब्बत की 
पैसा उनका ईमान था , पैसा उनका खुदा . 

दोस्त  बाँट  लेते  हैं  दर्द  दोस्तों  के 
देर हो चुकी थी जब तलक ये वहम उड़ा .

कुछ बातें खुद ही देखनी होती हैं मगर 
मैं हवाओं से उनका रुख पूछता रहा .

उस किनारे पर तब गूंजें हैं कहकहे 
इस किनारे पर जब कोई तूफां उठा .

तन्हा होना ही था किसी-न-किसी मोड़ पर 
यूं तो कुछ दूर तक वो भी मेरे साथ चला .

तुम मेरी वफाओं का हश्र न पूछो ' विर्क '
मेरा नाम हो गया है आजकल बेवफा .
  
                * * * * *
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एकजुट हो जाओ इससे पहले कि जलकर ख़ाक हो जाओ

एक अहम  मज़मून आप देख सकते हैं यहाँ


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जिस राजस्थान को खून से सींचा हे आज इस राजस्थान का स्थापना दिवस हे

जिस राजस्थान को खून से सींचा हे आज इस राजस्थान का स्थापना दिवस हे लेकिन अफ़सोस के यह दिवस आज तो क्रिकेट की भेंट चढ़ गया दुसरे सरकार ने इस दिन को अब गम्भीरता से लेना छोड़ कर केवल रस्म निभाने तक ही सिमित कर दिया हे एक छोटी गोष्ठी एक प्रदर्शनी और अख़बार में छोटी सी खबर बस हो गया राजस्थान स्थापना दिवस . 
दोस्तों राजाओं का यह स्थान जहां २२ रियासतों ने अपना खून बहाया हे आज़ादी की लढाई में अंग्रेजों के आगे कुछ्ने घुटने टेके तो कुछ ने जान गंवाई हे कहते हें के राजस्थान में जिस राजा के पास बेहिसाब सम्पत्ति और अपने दुर्ग भवन हें वोह कहीं ना कहीं अंग्रेजों की गुलामी में थे लेकिन टोंक और आदिवासी क्षेत्रों सहित कई ऐसी जगह भी हें जहां आज ना तो दुर्ग हे ना किला हे और ना ही वहां के नवाब राजा बहुत अधिक सम्पन्न हे ऐसे में यही वोह लोग थे जो अंग्रेजों के खिलाफ थे और इसीलियें इन्होने मरते दम तक गुलामी स्वीकार नहीं की और गरीब बने रहे . 
आज कहने को तो राजस्थान स्थापना दिवस हे लेकिन सभी राजा महाराजा जो अंग्रेजों के रक्षक और आज़ादी के भक्षक थे वोह सभी अपने अपने इतिहास रुपयों से लिखवाकर आज महान बन गये हें लेकिन कर्नल तोड़ और दुसरे इतिहासकारों ने राजस्थान के इन दलालों की पोल खोल कर रख दी हे कोटा पर अंग्रेजों को भगा कर जनता ने कब्जा किया मेहराब खा और लाला हर दयाल का इतिहास कोटा में सिर्फ इसीलियें गम कर दिया गया के कहीं इस इतिहास से राजाओं की देश के साथ गद्दारी और अंग्रेजों की गुलामी के किस्से आम ना हो जाएँ यहाँ मेहराब खान शहीद के मजार पर फुल चढाने पर पहरे इसलियें लगा दिए जाते हें के कहीं मेहराब खान के नाम से राजा रजवाड़ों की अन्रेजों की दलाली और देश से गद्दारी का इतिहास ना खुल जाये ऐसे हजारों किस्से  हे जो राजस्थान की कोख में छुपे हें हें .
३० मार्च १९४९ को देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जब राजस्थान के २२ रियासतों को मिलाकर एक राजस्थान की घोषणा करके गये तो सबसे पहले कोटा रियासत ने राजस्थान में शामिल होने की पहल कर राजस्थान की स्थापना की बुनियाद में अपनी भूमिका निभाई और इसीलियें राजस्थान की पहली राजधानी कोटा को बनाया गया कोटा के दरबार को यहाँ का राज्यपाल बनाया गया , राजस्थान की स्थापना में टोंक रियासत ने अपना सब कुछ राजस्थान सरकार को समर्पित कर दिया और खुद फकीर हो गये , राजस्थान की इस लड़ाई में अंग्रेजों ने यहाँ की जनता पर काफी ज़ुल्म भी ढहाए हें यहाँ  बांसवाड़ा में १५०० आदिवासियों ,सिरोही में २५०० लोगों का सामूहिक नरसंघार किया गया लेकिन राजस्थान की स्थापना पर इन सामूहिक नरसंहारों और आज़ादी के शहीदों को याद तक नहीं किया जाता हे केवल कंगूरे बने राजा महाराजा जो आज भी कानून को अपनी जेब में रख आकर राजा महाराजा बने हें सियासत और सम्मान उन लोगों के इर्द गिर्द ही घूमता हे ऐसे में राजस्थान दिवस काहे का हालत यह हें के ७२ साल बाद भी राजस्थान की अपनी भाषा राजस्थान को मान्यता दिलवाने के लियें यहाँ जनता को संघर्ष करना पढ़ रहा हे . खेर इस दिवस पर राजस्थान की स्थापना  की नीव की ईंट बने  शहीदों को नमन श्रद्धांजली और जो गद्दार आज मजे कर रहे हे उनके चेहरे जनता के सामने आयें इसी उम्मीद के साथ जय राजस्थान ......... . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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सरकार की सुप्रीम कोर्ट से भी चालबाजी

देश के भ्रष्ट सुप्रीमों जो सरकार के मंत्रियों रिमोट कंट्रोलरों के हमजोली बने हें उन्हें बचाने के लियें सर्कार देश की जनता के साथ तो उन्हें खून के आंसू रुला कर नंगा खेल खेलती ही रही हे लेकिन अब सरकार की हदें देखो के उसने बेईमान लोगों को बचाने के लियें सुप्रीमकोर्ट से भी आँख मिचोली का खेल खेलना शुरू कर दिया हे और सरकार की इन चालबाजियों से अब सुप्रीम कोर्ट भी देश की जनता की तरह तंग आ गयी हे इसीलियें अब सुप्रीमकोर्ट सभी मर्यादाएं ताक में रख कर एक आम आदमी की तरह सरकार पर खीजने लगी हे .
जी हाँ दोस्तों यह एक कडवा सच हे यही सुप्रीमकोर्ट जब ही आम आदमी सुप्रीमकोर्ट के पास भ्रस्ताचार की शिकायतें लेकर जाता था तब यही सुप्रीमकोर्ट जुर्माने से उनकी याचिकाओं  को ख़ारिज कर दी गयी हे लेकिन कहते हें के दर्द का हदसे बढना दवा हो जाता हे और हमारे देश में भी यही हुआ यहाँ यहाँ भ्र्स्थाचार जब चरम सीमा पर पहुंच गया विभिन्न पहलुओं से सरकार ने भ्रस्ताचार और सरकार के खेल को देख लिया तो सुप्रीमकोर्ट को काले धन की सूचि को सार्वजनिक करने के आदेश देना पढ़े लेकिन यह तो सरकार हे उसने सुप्रीमकोर्ट के इन आदेशों को ठुकरा दिए बार बार आदेश देने पर भी इस आदेश की पलना नहीं की गयी . 
देश के खरबों रूपये का गबन करता आरोपी हसन अली को रस्मन पकड़ा गया और  प्रवर्तन निदेशालय ने हाथ ऊँचे कर दिए कोई सुबूत पेश नहीं किये गए मजबूरी में डंके की चोट पर हसन अली को जमानत मिली लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस गोरख धंधे को समझ गया था इसीलियें हसन अली की जमानत ख़ारिज कर उसे हिरासत में भेजा गया कार्यवाही पर खुद ने निगरानी रखी एक दिन दो दिन बस तिन दिन में ही सुप्रीम कोर्ट की समझ में आ गया के यह न्याय नहीं राजनितिक खेल हे हसन अली और उसके साथियों को बचाने की कोशिशें की जा रही हें और जनता के साथ सुप्रीम कोर्ट को भी गुमराह किया जा रहा हे इसलियें सुप्रीम कोर्ट को चीख कर कहना पढ़ा यह क्या तमाशा हे यह क्या हो रहा हे एक आदमी से आज तक साथियों की जानकारी नहीं ली गयी हसन अली के अलावा आज तक और दुसरे लोग परदे में क्यूँ रखे जा रहे हें सुप्रीम कोर्ट ने निदेशालय की इस कार्यवाही पर अविश्वास जताते हुए एस आई टी विशेष दल के गठन के आदेश दिए हें कलि सूचि वाले कोन हें उन्हें सार्वजनिक रूप से जनता के सामने लाने के निर्दश दिए हें लेकिन मेने गिना हे सुप्रीम कोर्ट ने इस नकटी सरकार को १७ बार कठोरता से इस तरह के आदेश दिए हें लेकिन एक आदेश की भी सरकार ने पालना नहीं की हे अब जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने अंगूठा दिखा रखा हे तो फिर आम जनता का तो क्या हाल होगा अंदाजा लगाया जा सकता हे खुदा खेर करे ..................... अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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आज लोग केवल अपने लालच और सहूलियत को जानते हैं

सफ़ेद पोशाक ज़ेबे तन है
जुबाँ पर जिनकी वतन वतन है
'असद' ये हुस्ने तज़ाद कैसा है ?
उन्हीं की जेबों में काला धन है
मुश्किल अल्फ़ाज़
ज़ेबे तन-तन पर सजी हुई
हुस्ने तज़ाद-विरोधाभास
आज लोग केवल अपने लालच और सहूलियत को जानते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए वे तरह तरह के लेबल अपनी हवस पर लगा लेते हैं जिसे इल्म की रौशनी में ही देखा जा सकता है।
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ऐ धरती माँ ..................

ऐ धरती माँ 
में भी तेरा लाल हूँ 
माँ की कोख से 
तो जन्मा हूँ 
बस 
बचपन से 
तेरे आँचल से लिपट कर 
तुझ में मिलकर खेला हूँ 
तेरी हिफाजत के लियें 
बंदूक मेने उठाई हे 
कई बार मेने 
तेरी हिफाजत करते 
चोट भी खाई हे 
मेरे बुजुर्गों ने 
तेरी आन बान शान के लियें 
अपनी जान गंवाई हे 
ऐ धरती माँ 
तू ही बता 
क्या यह सच हे 
कुछ लोग हें 
जो खुद को 
तेरा अपना खास बेटा कहते हें 
यह वोह लोग हें 
जो तेरी सुख शांति एकता अखंडता का 
सोदा करते हें 
यह कहते हें 
के तेरी वोह दोगले इंसान ही 
असली सन्तान हे 
और हमें कहते हें 
के तुम माँ के बेटे नहीं 
तुम तो सोतेली सन्तान हो 
ऐ धरती माँ 
तू ही बता 
एक धरती एक देश एक योजना एक कानून 
फिर हमारे साथ दोहरा सुलूक 
तो क्या 
हम मानलें 
के हम 
तेरी सोतेली सन्तान हें 
देख माँ 
में तुझे बता दूँ 
जब हम बीमार होते हें 
जब हमारे पास पानी नहीं होता हे 
तब हम 
तेरी इस मिटटी को 
अपने चेहरे और हाथ पर 
तेहम्मुम यानी वुजू कर लेते हें 
इसी मिटटी को रगड़ कर 
खुद को पाक कर लेते हें 
और तेरी ही आँचल पर 
बेठ कर 
अपनी नमाज़ पढ़ लेते हें 
ऐ धरती माँ 
मरते हें जब हम 
तब भी तेरी ही गोद में 
हम खुद को छुपा कर सुला देते हें 
तुझ से इतना प्यार 
तुझ पर इतना अटूट विशवास 
तो फिर यह 
दुसरे लोग जो 
तुझे लुटते हें तेरी धरती पर माँ बहनों की अस्मत लुटते हें 
निर्दोषों का कत्ल करते हें 
विश्वास घात ,भ्रष्टाचार करते हें 
ना तुझ में मिलते हें ना तेरी गोद में सोते हें 
फिर तू ही बता 
यह लोग 
केसे और केसे 
तेरी सन्तान हो सकते हे ..तेरी सन्तान हो सकते हें ............... अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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पीराने पीर दस्तगीर या गोस पाक की फातिहा का महीना हे

दोस्तों हमारा देश गंगा जमनी संस्क्रती की बेमिसाल संस्क्रति हे इसीलियें सभी को एक दुसरे के धर्म के बारे में जानकारियाँ होना चाहिए ताके एक दुसरे से मिलकर सभी देशवासी आपस में प्रेम सद्भावना और भाईचारे का हाथ बढ़ाएं .
अभी मुसलमानों के लियें फातिहा ख्वानी का महीना ग्यारवीं के नयाज़ का महीना चल रहा हे इस महीने को आम तोर पर ग्यारवीं के महीने के नाम से ही जाना जाने लगा हे वेसे इस्लाम में इस महीने को रबीउल सानी का महीना कहते हें जो रबीउल अव्वल के बाद आता हे , दोस्तों इस महीने में पीराने पीर दस्तगीर या गोस पाक अब्दुल कादर जिलानी को भी याद किया जाता हे और उनकी याद में ही फातिहा का दोर चलाया जाता हे , इस्लामिक इतिहास के अनुसार लगभग सातवीं सदी में इराक के बगदाद के पास एक गाव जिलानी में अब्दुल कादर जिलानी ने जन्म लिया और इन्होने माँ के पेट में ही कुरान शरीफ हिफ्ज़ कर लिया यानि माँ के पेट में ही इनकी इस्लामिक तालीम पूरी हो चुकी थी और इसीलियें यह जन्म से ही बालपन में सत्य ,अह्निसा और इमानदारी का पाठ पढाने निकल चले थे इनकी इस शोहरत को देख कर सभी पीरों ने इन्हें अपना पीर यानि पिराने पीर दस्तगीर मान लिया था , एक बार बालपन में जब इनकी माँ ने इन्हें इनके कम्बल और कमरी में पढाई के खर्चे के लियें दीनारें सीकर काफिले के साथ भेजा तो रास्ते में काफिले को लुटेरों ने लुट लिया सभी की तलाशी लेकर उनके सामान लुट लिए तब यह खुद  लुटेरों के सरदार के पास गए और उन्होंने कहा के मुझे भी मेरी माँ ने कमरी और कम्बल में दीनारें सीकर दी हें लुटेरों के सरदार ने तलाशी ली और दीनारें देखकर कहा के तुम तो यह बचा सकते थे फिर खुद क्यूँ यह राज़ बताया तब या गोज़ पाक ने कहा के यह मेरी माँ और इस्लाम की शिक्षा हे के जाना चली जाये लेकिन सच नहीं जाना चाहिए बस उस लुटेरों के कबीलों ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया . 
पिराने पीर दस्तगीर गरीबों के हमदर्द और इनको खुदा ने इल्म बख्शा था के यह अपनी ठोकर से मुर्दों को ज़िंदा कर दिया करते थे यह बारह माह रोज़े रखा करते थे और इबादत ऐसी के रात को इशां की नमाज़ के वुजू से सुबह फज्र की नमाज़ पढ़ लिया करते  थे इनकी इसी इबादत पाकीजगी की वजह थी के हर रोज़ रोज़े अफ्तार के वक्त बादशाह, अमीर  और गरीब इनके आगे लज्जतदार पकवान सजा कर रखते थे लेकिन यह सिर्फ किसी गरीब की दी हुई पिन खजूर से रोजा अफ्तारते थे एक दिन एक बादशाह ने झल्लाकर उनसे इस उपेक्षा का कारण  जानना चाहा तो या  गोस पाक ने एक हाथ में बादशाह की रोटी और एक हाथ में गरीब की रोटी लेकर उसे जोर से रस निकलने के लियें दबा दिया तब बादशाह की रोटी में से तो खून रिसने लगा और गरीब की रोटी से पानी बह रहा था बस बादशाह समझ गया और उस दिन से उसने गरीबों पर ज़ुल्म करना बंद कर दिया ऐसे पाक गोस पाक की याद में इस माह को पर्यायवाची के रूप में ग्यारहवीं के महीने के नाम से भी जाना जाता हे इस महीने में सभी लोग फातिहा दिलाकर गरीबों को अच्छा खाना बना कर खिलते हें वोह बात और हे के इस रिवाज को इस फातिहा को अमीरों ने इन दिनों आपस में एक दुसरे अमीर और रिश्तेदारों को दावत देने और खाना खिलाने का फेशन बना लिया हे लेकिन फिर भी कई लोग ऐसे हें जो इन दिनों में केवल गरीबों को ही दावत देकर खाना खिलाते हें . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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मुहब्बत के साथ बने रहें इंसानियत के रिश्ते: सुदाइस

इमाम  ए हरम हिन्दुस्तान आये और उन्होंने इस्लाम का पैगाम दिया जोकि मुहब्बत और इंसानियत से भरा है . इस मौके पर मुल्क भर के अख्बरात और रसाएल उनके पैगाम से भरे नज़र आये . टी वी चैनल्स ने भी अच्छी कवरेज दी . दैनिक भास्कर लिखता है -
दिल्ली। मक्का में मस्जिद हरम शरीफ के इमाम डॉक्टर अब्दुल रहमान अल सुदाइस ने कहा कि मुल्क (हिंदुस्तान) में रहने वालों में मुहब्बत बरकरार रहे और इंसानियत के रिश्ते बने रहें।

इमाम-ए-हरम ने उन्हें सुनने आए लोगों की अपार भीड़ को देखकर सभी का शुक्रिया अदा किया और पूरे जोश के साथ जिंदाबाद के नारे भी लगाए।

रामलीला मैदान में जमीयत उलेमा-ए-हिंद (अरशद मदनी) के बैनर तले आयोजित अजमत-ए-सहाबा कांफ्रेंस में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने आगे कहा कि यहां लाखों की संख्या में लोगों के आने से एहसास होता है कि काबे और इमाम का कितना एहतराम करते हैं।

उन्होंने बताया कि वह अलग-अलग धर्मो के लोग लंबे समय से भाईचारे के साथ रह रहे हैं। यह तारीफ के काबिल है। साथ ही वायदा किया कि वापस मक्के में जाकर हिंदुस्तान में अमन और तरक्की के लिए दुआ करेंगे।

उन्होंने मुस्लिमों को नसीहत देते हुए कहा कि मां-बाप के अलावा टीचर सहाबा (पैगंबर मोहम्मद साहब के सिपहसालार) से मुहब्बत करना बच्चों को सिखाएं और सहाबा पर तंज कसने वालों पर नकेल कसें।

उन्होंने कहा कि इस्लाम की सही तस्वीर पेश करने और सहाबा के बारे में बताने वाला चैनल शुरू होना चाहिए। साथ ही मदरसों में सहाबा के बारे में पढ़ाने पर विशेष कोर्स भी हो। अपने भाषण के अंत में लोगों का शुक्रिया अदा और जोश के साथ जिंदाबाद-जिंदाबाद नारे भी लगाए।

इमाम-ए-हरम के पीछे नमाज पढ़ने के लिए लाखों की संख्या में लोग मौजूद थे। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग जलसे में शामिल होने के लिए आए थे। इमाम-ए-हरम ने जलसे में आने चंद मिनट बाद में ही पहले मगरिब(शाम) और अंत में इशा(रात) की नमाज पढ़ाई। सुदाइस ने अपना भाषण अरबी में दिया। बाद में उसको हिंदी में अनुवाद जमीयत के अध्यक्ष अरशद मदनी ने किया।

जमीयत के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने बताया कि जलसा पूरी तरह से मजहबी है, इसका कोई सियासत से ताल्लुक नहीं है। फिलहाल मुस्लिमों को इस्लाम के बारे में सही ढंग से दूसरे धर्मो के लोगों को समझाना चाहिए। साथ ही पैगंबर और सहाबा के बारे में भी बच्चों को बताएं।

चौदह सौ वर्षो से सहाबा के जरिए जो इस्लाम मिला है, वह पूरी तरह से महफूज है। जलसे को यूपी के जमीयत के अध्यक्ष अशहद सिद्दीकी, मौलाना सलमान, मौलाना शाहिद आदि उलेमाओं ने भी संबोधित किया और इस्लाम और सहाबा के बारे में विस्तार से बताया। संचालन अब्दुल अलीम ने किया।

 
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कठमुल्लों की तडप

ऐसा सभी मानते हैं कि आप जिस प्रकार का व्यवहार दूसरों के साथ करेंगे दूसरे भी वैसा ही आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। यह प्राकृतिक नियम है। इसका अनुपम उदाहरण अभी पाकिस्तान को प्राप्त हो गया। पाकिस्तान मे इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मावलिम्बियों के साथ सदैव ही उपेक्षापूर्ण (अपितु शत्रुतापूर्ण) व्यवहार होता आया है। कभी हिन्दु अथवा सिख अगवा कर लिए जाते हैं "ज़जिया" के लिए, तो कभी उनकी बेटियों को उठा लेते हैं और जबरन धर्म परिवर्तन कर किसी के पल्ले बांध देते हैं। और जब इन सबसे मन न भरे तो ईशनिन्दा का आरोप लगा किसी को भी जेल भिजवा देते हैं।

पाकिस्तान मे अनेक मंदिर एवं गुरुद्वारे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों मे बदल गए हैं, तो कई अपनी पहचान खो कर कूडाघर अथवा अन्य सामुदायिक उपयोग के स्थल बन चुके हैं। पाकिस्तान मे अल्पसंख्यकों की धार्मिक मान्यता को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं इस बात से ही मालूम पडता है। जब ये ऐसी हरकतें करते हैं तो इन्हे अपना कृत्य पौरुष का प्रदर्शन लगता है, इन्हे लगता है कि इस प्रकार ये दुनिया को अपने सामर्थ्य का परिचय दे रहे हैं।

ऐसे मे जब विरोधियों ने भी इनको इनकी भाषा मे जवाब देना प्रारम्भ किया तो इनको मिर्ची लग गई। अरे भाई जब खुद नही झेल पाते हो दूसरों की ऐसी हरकतें तो उंगली क्यों करते हो? उंगली करोगे तो कोइ न कोइ तो उंगली मरोडेगा ही।

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अगज़ल ----- दिलबाग विर्क


                दुनिया की रस्मों से अनजान
                मैं  हूँ  पागल  ,  मैं  हूँ  नादान .

                बंदिशें  इस  कद्र  भारी  पड़ी 
                दिल में दफन हो गए सब अरमान.

                गम कब तक रहेंगे पास मेरे  
                क्या  कहूँ , मैं  तो  हूँ  मेज़बान . 

                बे'मानी  हो  चुके  हैं  अब  तो 
                मेरे  आंसूं  ,  मेरी  मुस्कान .

                कर्जदार हूँ  , बकाया हैं मुझ पर 
                कुछ इसके , कुछ उसके अहसान .

                हिम्मत, किस्मत 'विर्क' सब चाहिए 
                 जिंदगी  है  एक  बड़ा  इम्तिहान  .

                           * * * * * 
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महिला को छेड़ छाड़ के आरोपी को पकड़वाने के लियें टंकी पर चढना पढ़ा

दोस्तों यह मेरा भारत महान यह मेरा प्यारा हिन्दुस्तान जहाँ महिलाओं की पूजा होती हे जहाँ महिलाओं को राजनितिक आरक्षण और मान सम्मान की बात होती हे , जी हाँ दोस्तों मेरे इस देश में राजस्थान की  विपक्ष की नेता वसुंधरा सिंधिया हे ,राजस्थान की संसद गिरजा व्यास महिला आयोग की अध्यक्ष हें यहाँ देश के संचालन का रिमोट सोनिया गाँधी के पास हे तो लोकसभा की अध्यक्षता श्रीमती मीरा कुमार सम्भाल रही हें इसी देश में राजस्थान के एक छोटे जिले बूंदी के गाँव झालाजी का बराना में उसके साथ छेड़ छाड़ करने वालों की गिरफ्तारी  की मांग को लेकर मजबूरी में पानी की टंकी पर चढना पढ़ा हे अब छेड़ छाड़ वाले तो गिरफ्तार नहीं हुए लेकिन महिला जरुर गिरफ्तार हे . 
दोस्तों यह नंगा सच पुलिस की ढिलाई कठोर विचारधारा वाले कुर्सी के गुलाम नेताओं और चरित्रहीन कार्यकर्ताओं को चाहे मामूली सी बात लगे . जो धर्म गुरु बेईमानी के धन से अपने आश्रम मदरसे चलाते हों उनके लियें यह घटना छोटी हे जो कलमकार चंद नोटों के खातिर अपनी कलम को वेश्या के दरबार की तरह से अधिकारीयों और नेताओं के तबले की थाप पर चलाते हों उनके लिए यह घटना एक मजाक हो लेकिन जहां एक महिला द्रोपदी का अपमान करने पर महाभारत रची जाती हो वहां एक महिला के साथ छेड़खानी करने वाले अगर रिपोर्ट करने पर भी पुलिस द्वारा काफी दिनों तक पकड़े नहीं जाएँ और पुलिस व् आरोपी महिला को धमकाएं तो महिला के पास आत्म हत्या के सिवा और दुसरा कोनसा चारा बच जाता हे .
बस इसीलियें राजस्थान में बूंदी जिले के झालानी का बराना गाँव की एक विवाहिता श्रीमती संतोष कहार पत्नी रामभरोस आयु २५ वर्ष  अपने छ साल के बच्चे को रोता बिलखता छोड़ कर ४० फिट ऊँची टंकी पर चढ़ गयी और तेल छिड़क कर आग लगाने का प्रयास करने लगी उसकी माग थी के उसके पड़ोसी हनुमान और रामप्रसाद उसके साथ छेड़ खानी करते हें और पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस उनके खिलाफ कार्यवाही नही करती और इस कारण इनके होसले और बुलंद हो गये हें वोह चीखती रही चिल्लाती रही लेकिन अपराधियों को पकड़ा ना गया केवल उनके खिलाफ निष्पक्ष कार्यवाही का एक कोरा आश्वासन इस महिला को मिला महिला को बच्चे का वास्ता देकर नीचे उतारा गया और महिला की मांग के मुताबिक छेड़खानी करने वाले तो पकड़े नहीं गये लेकिन बेचारी इन्साफ की तलाश में निकली यह महिला आत्महत्या के प्रयास में पकड़ी गयी दोस्तों क्या यही कानून हे क्या यही इन्साफ हे , 
मेरा येह राजस्थान यहाँ पटरियों पर महीनों डकेतों की तरह गुर्जरों का कब्जा होता हे ,यहाँ जाट पटरियों पर कब्जा करते हें महिलाओं ,बच्चो सरपंचों पर लाठियां भांजी जाती हे विधायक एक पुत्र की सुपारी लेकर हत्या होती हे चोकी में बलात्कार के बाद महिला सिपाही की हत्या फिर चोकी में सिपाही की हत्या और फिर यहाँ एक महिला की निर्मम हत्या के बाद उसके आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जाता एक रिश्तेदार आत्मदाह करता हे पुलिस के सामने एक इन्स्पेक्टर फुल मोहम्मद के हाथ पाँव काट कर जिंदा जला दिया जाता हे कोई गिरफ्तार नहीं होता किसी का इस्तीफा नहीं होता विधायक आरोप लगाते हें सी बी आई जाँच नहीं होती तो फिर जनाब बताओ कानून कहाँ हे . दोस्तों बूंदी जिले की इस महिला के अस्मत के सोदाग्रों की कहानी को आरोपियों के बचाने वालों द्वारा छुपायी जा रही हे अख़बार छाप नहीं रहे थे बाथरूम तक की खबर देने वाले टी वी चेनल उसकी सुनवाई नहीं कर रहे थे पुलिस का तो कहना ही क्या था तब इस महिला ने अगर मजबूरी में यह रास्ता अपने तो क्या पुलिस और मीडिया के लियें शर्मनाक नहीं हे दोस्तों यह एक संवेदन शील पोस्ट हे एक भावना एक महिला के दर्द की दास्ताँ हे अगर आपके मन को इस पोस्ट ने छुआ हे तो कोई टिप्पणी ना करे लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक जी गहलोत को यह सच एक पत्र के माध्यम से एक पोस्ट माध्यम से जरुर पहुँचाने की कोशिश करे ताकि पुलिस फिर किसी अबला की छेड़ छाड़ की शिकायत को कचरे के डिब्बे में ना डाले . अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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अनवर भाई आपकी गर्मियों की छुट्टियों की दास्तान पढ़ कर हमें आपकी किस्मत से रश्क हो रहा है...ऐसे बचपन का सपना तो हर बच्चा देखता है लेकिन उसके सच होने का नसीब आप जैसे किसी किसी को ही होता है...बहुत दिलचस्प वाकये बयां किये हैं आपने...मजा आ गया. - नीरज गोस्वामी

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