वन्दना बहन ब्लोगिंग की जिंदगी बन गयी हैं

जिंदगी एक खामोश सफ़र है इसे तो सिर्फ कुशल ग्रहिणी ही जी सकती है ,और इसी लियें वन्दना बहन ब्लोगिंग की जिंदगी बन गयी हैं

ब्लोगिंग की दुनिया  की जिंदगी बहन वन्दना जी
कहते हैं एक कुशल गृहणी माँ ,पत्नी,बहन,दोस्त,बहु और सास सहित ना जाने कितने किरदार निभाती है वोह जब घर को सजाती है तो इंटीरियर डेकोरेटर होती है ,जब घर के सदस्यों के लियें मन पसंद खाना बनाती है तो ऐसे  वक्त पर एक गृहणी डाईटीशन बन जाती है , कुल मिलाकर एक ईंट पत्थर से बने मकान को अगर घर और सपनों का खुशनुमा महल कोई बनाती है तो वोह सिर्फ और सिर्फ एक कुशल गृहणी ही होती है और हमारी बहन ब्लोगर श्रीमती वन्दना जी एक सफल गृहणी हैं यह तो सब जानते ही हैं उनके चेहरे की मुस्कान साफ़ झलकाती है के उनसे कोई नाराज़ नहीं है और वोह सभी की नब्ज़ समझ कर एक सूत्र में पिरोकर बेठी हैं .
बहन वंदना जी जो चटपटा खाना बना कर घर को साफ़ सुथरा कर ,सजा संवार कर, आकर्षक बनाती हैं वही बहन जब थक कर आराम करने का वक्त होता है तब अपने इस आराम के वक्त में वोह, हम और आप से जुड़ कर ब्लोगिंग करती हैं. ब्लोगिंग की दुनिया में उनके बहतरीन अल्फाजों में सजे संवरे विचार जन ब्लॉग पर आते हैं तो सभी लोग उसे पढ़ कर आह और वाह कर बैठते हैं क्योंकि इनकी लेखनी में ,इनके अंदाज़ में, प्यार ,झिडकी,एक अनुभव, एक सीख़ ,एक शिक्षा ,  एक अपनापन भरा पढ़ा है. घर के सारे कामकाज निपटाकर ब्लोगिंग करने वाली वन्दना जी को झूंठ से सख्त  नफरत है ,यह निर्भीक और निडर होकर अपनी बात कहने का साहस रखती हैं और कहती भी है वन्दना जी की एक खासियंत यह भी है के वोह प्रशंसा पसंद नहीं हैं, लेकिन यह गुस्ताखी में कर रहा हूँ और गुस्ताखी सिर्फ इसलियें के वन्दना जी को सच्चाई से प्यार है और सच यही है के वन्दना जी की ब्लोगिंग की तारीफ की जाए यह उनके ब्लोगिंग के प्रति समर्पण के कारण उनका  हक  बन गया है ,और मुझे यकीन है के इस सच्चाई पर वोह मुझ पर नाराज़ हरगिज़ नहीं होंगी . और सच लिखने में अगर हमारी बहन नाराज़ होती है तो हम  पहले ही कान पकड़ कर माफ़ी मांग लेते हैं .
एक निर्मल मन की मुस्कुराती तस्वीर अपनापन और प्यार बिखेरती वन्दना जी कहती हैं के,, ज़ाल जगत रूपी महासागर की में तो एक मात्र अकिंचन बूंद हूँ ,, उनके इन अल्फाजों से उनकी महानता उनका बढ़प्पन झलकता है ,  इनका निवास भारत की राजधानी जो इन दिनों अन्ना की भ्रस्टाचार  की लड़ाई का प्रमुख अखाड़ा बनी है वही दिल्ली है ,वर्ष २००७ से ब्लोगिंग की दुनिया में अपने आलेखों से ब्लोगर भाइयों को ब्लोगिंग टिप्स देने वाली वन्दना जी के अनुभव के कारण ही उन्हें आल इण्डिया ब्लोगर एसोसिएशन की चेयरमेन बनाया गया हे जिस ज़िम्मेदारी को वोह आज तक बखूबी निभा रही हैं .  जिंदगी एक खामोश सफ़र ,एक प्रयास , जख्म जो फूलों ने दिए ,भ्रस्टाचार ,शब्द निराकार उनके प्रमुख ब्लॉग हैं अब तक कुल २४०० ब्लॉग लिख कर बहन वन्दना ८००० से भी अधिक टिप्पणियाँ लूट चुकी हैं वन्दना जी के लेख इतने प्रभावी हैं के इनके ब्लॉग और लेख अख़बारों में भी छपते रहे हैं इन्हें फूलों से बहुत बहुत प्यार हे इसी लिये इन्होने खुद की आई डी भी रोज़ और फ्लोवर के नाम से बनाई है .
मई २००७ से आज तक करीब चार वर्षों में ब्लोगिंग की इस खट्टी मीठी दुनिया में टकराव ,झगड़े फसाद हुए लेकिन वन्दना जी ने सभी विवादों से खुद को बचाकर रखा और हमेशां ब्लोगिंग कल्याण,ब्लोगिंग एकता ,मर्यादित ब्लोगिंग की हिमायत की ऐसी ब्लोगिंग की जिंदगी बनी ब्लोगर बहन वन्दना जी को एक फोजी धांय धांय ब्लोगिंग करने वाले का सेल्यूट सलाम ............... अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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षटपदीय

बुराई जित रही है , अच्छाई की हार 
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दो छोटी बहर की गज़लें ---डा श्याम गुप्त....


१-आप आगये

दर्दे दिल भागये।
ज़ख्म रास आगये।

तुमने पुकारा नहीं,
हमीं पास आगये।

कोइ तो बात करो,
मौसमे इश्क आगये।

जब भी ख्वाब आये,
तेरे अक्स आगये।

इबादत की खुदा की,
दिल में आप आगये ॥

२- हलचल होजाए ......
क्या ना किस पल होजाए।
जाने क्या कल होजाए।

रोकलो अश्क अपने,
यहाँ न दलदल होजाए।

अदाएं और न बिखेरो,
मन ना चंचल होजाए।

पुकारो न इतना दूर से,
श्याम 'न हलचल होजाए॥
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कबीर – कथाओं से परे की कहानी (Kabir: A story beyond legends)


कबीर के बारे में बहुत भ्रामक बातें साहित्य में और इंटरनेट पर भर दी गई हैं. अज्ञान फैलाने वाले कई आलेख कबीरधर्म में आस्था, विश्वास और श्रद्धा रखने वालों के मन को ठेस पहुँचाते हैं. यह कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी (किसी चरित्रहीन ब्राह्मण) की संतान थे. ऐसे आलेखों से कबीरपंथियों की सख्त असहमति स्वाभाविक है क्योंकि कबीर ऐसा विवेकी व्यक्तित्व है जो भारत को छुआछूत, जातिवाद, धर्मिक आडंबरों आदि के घातक तत्त्वों से उबारने वाला है.
कबीर की गहरी जड़ें
कबीर को सदियों हिंदी साहित्य से दूर रखा गया ताकि लोग यह वास्तविकता न जान लें कि कबीर के समय में और उससे पहले भी भारत में धर्म की एक समृद्ध परंपरा थी जो हिंदू परंपरा से अलग थी और कि भारत के सनातन धर्म वास्तव में जैन और बौध धर्म हैं. कबीरधर्म, ईसाईधर्म तथा इस्लामधर्म के मूल में बौधधर्म का मानवीय दृष्टिकोण रचा-बसा है. यह आधुनिक शोध से प्रमाणित हो चुका है. उसी धर्म की व्यापकता का ही प्रभाव है कि इस्लाम की पृष्ठभूमि के बावजूद कबीर भारत के मूलनिवासियों के हृदय में ठीक वैसे बस चुके हैं जैसे बुद्ध.
कबीर जुलाहा कोरी परिवार से हैं. स्पष्ट है कि कबीर कोरी परिवार में जन्मे थे जो छुआछूत आधारित ग़रीबी और गुलामी से पीड़ित था और उससे निकलने के लिए उसने इस्लाम धर्म अपनाया था.
कबीर की छवि पर छींटे
यह तथ्य है कि कबीर के पुरखे इस्लाम अपना चुके थे. इसलिए कबीर के संदर्भ में या उनकी वाणी में जहाँ कहीं हिंदू देवी-देवताओं या हिंदू आचार्यों का उल्लेख आता है उसे संदेह की दृष्टि से देखना आवश्यक हो जाता है. पिछले दिनों कबीर के जीवन पर बनी एक एनिमेटिड फिल्म देखी जिसमें विष्णु-लक्ष्मी की कथा को शरारतपूर्ण तरीके से जोड़ा गया था.
आज भी इस बात पर बहस होती है कि कबीर लहरतारा तालाब के किनारे मिले या गंगा के तट पर. कबीर के गुरु पर विवाद खड़े किए गए. रामानंद नामी ब्राह्मण को उनके गुरु के रूप में खड़ा कर दिया गया. उस कथा के इतने वर्शन हैं कि उन पर अविश्वास करना सरल हो जाता है. वे किसी विधवा ब्राह्मणी की संतान थे या नूर अली के ही घर पैदा हुए इस विषय को रेखांकित करने की कोशिश चलती रहती है. इसमें अब संदेह नहीं रह गया है कि कबीर नूर अली और नीमा की ही संतान थे और उनके जन्म की शेष कहानियाँ उनके व्यक्तित्व से चिढ़ कर ठूँसे गए प्रक्षिप्त अंश हैं.
कबीर का विशेष कार्य - निर्वाण
निर्वाण शब्द का अर्थ है फूँक मार कर उड़ा देना. मोटे तौर पर इसका अर्थ है मन के स्वरूप को समझ कर उसे छोड़ देना और मन पर पड़े संस्कारों और उनसे बनते विचारों को माया जान कर उन्हें महत्व न देना. इन संस्कारों में एक कर्म फिलॉसफी आधारित पुनर्जन्म का सिद्धांत भी है. संतमत के अनुसार निर्वाण का मतलब कर्म फिलॉसफी आधारित पुनर्जन्म के विचार से पूरी तरह छुटकारा है. कबीर की आवागमन से निकलने की  बात करना और यह कहना कि साधो कर्ता करम से न्यारा इसी ओर संकेत करता है.
तत्त्वज्ञान कहता है कि जो भी है इस जन्म में है और इसी क्षण में है. बुद्ध और कबीर अब और यहीं की बात करते हैं. जन्मों की नहीं. वे चतुर ज्ञानी और विवेकी पुरुष हैं, सदाचारी हैं और सद्गुणों से पूर्ण हैं. कबीर के ज्ञान पर ध्यान रखें उनके जीवन संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करें. उन्होंने सामाजिक, धार्मिक तथा मानसिक ग़ुलामी की ज़जीरों को कैसे काटा, यह देखें.
एक तथ्य और है कि कबीर द्वारा चलाए संतमत की शिक्षाएँ और साधन पद्धतियाँ बौधधर्म से पूरी तरह मेल खाती हैं. कबीर ने अपनी नीयत से जो कार्य किया वह डॉ. भीमराव अंबेडकर के साहित्य में अब शुद्ध रूप से उपलब्ध है. उल्लेखनीय है कि डॉ अंबेडकर स्वयं कबीरपंथी परिवार से थे.
चमत्कारों, रोचक और भयानक कथाओं से परे कबीर का सादा-सा जीवन इस प्रकार है:-

कबीर का जीवन
बुद्ध के बाद कबीर भारत के महानतम धार्मिक व्यक्तित्व हैं. वे सुरत-शब्द योग के प्रवर्तक और उसके सिद्ध हैं. वे तत्त्वज्ञानी हैं. एक ही चेतन तत्त्व को मानते हैं और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी हैं. अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मस्जिद, मंदिर आदि को वे महत्व नहीं देते हैं. भारत में धर्म, भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा कबीर की चर्चा के बिना अधूरी होती है.
उनका परिवार कोरी जाति से था जो हिंदुओं की जातिप्रथा के कारण हुए अत्याचारों से तंग आकर मुस्लिम बना था. कबीर का जन्म नूर अली और नीमा नामक दंपति के यहाँ लहरतारा के पास सन् 1398 में हुआ और बहुत अच्छे धार्मिक वातावरण में उनका पालन-पोषण हुआ.
युवावस्था में उनका विवाह लोई से हुआ जिसने सारा जीवन इस्लाम के उसूलों के अनुसार पति की सेवा में व्यतीत कर दिया. उनकी दो संताने कमाल (पुत्र) और कमाली (पुत्री) हुईं. कमाली की गणना भारतीय महिला संतों में होती है. संतमत की तकनीकी शब्दावली में उन दिनों नारी से तात्पर्य कामना या इच्छा से रहा है और इसी अर्थ में प्रयोग होता रहा है. ऐसी प्रयुक्तियों के कारण मूर्ख पंडितों ने कबीर को नारी विरोधी घोषित कर दिया. कबीर तो हर प्रकार से नारी जाति के साथ चलने वाले सिद्ध होते हैं. उन्होंने संन्यास लेने तक की बात नहीं की. वे स्त्री-पुरुष निर्मित गृहस्थ में रहने वाले सत्पुरुष थे.
कबीर स्वयंसिद्ध अवतारी पुरूष थे जिनका ज्ञान समाज की परिस्थितियों में सहज ही स्वरूप ग्रहण कर गया. वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते हैं. मुस्लिम समाज में रहते हुए भी जातिगत भेदभाव ने उनका पीछा नहीं छोड़ा इसी लिए उन्होंने हिंदू-मुसलमान सभी में व्याप्त जातिवाद के अज्ञान, रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया. उनके ऐसे स्वभाव के कारण उन्हें विद्रोही कह दिया गया जो उचित प्रतीत नहीं होता. कबीर आध्यात्मिकता से भरे हैं और जुझारू सामाजिक-धार्मिक नेता हैं.
पंडितों के विरुद्ध कबीर ने खरी-खरी कही जिससे चिढ़ कर उन्होंने कबीर की वाणी में बहुत सी प्रक्षिप्त बातें ठूँस दी हैं और कबीर की भाषा के साथ भी बहुत खिलवाड़ किया है. आज निर्णय करना कठिन है कि कबीर की शुद्ध वाणी कितनी बची है.
कबीर ने सारी आयु कपड़ा बनाने का कड़ा परिश्रम करके परिवार को पाला. सन् 1518 के आसपास कबीर ने 119 वर्ष की आयु में देह त्याग किया.
उनके ये दो शब्द उनकी विचारधारा और दर्शन को पर्याप्त रूप से इंगित करते हैं:-
(1)
आवे न जावे मरे नहीं जनमे, सोई निज पीव हमारा हो
न प्रथम जननी ने जनमो, न कोई सिरजनहारा हो
साध न सिद्ध मुनी न तपसी, न कोई करत आचारा हो
न खट दर्शन चार बरन में, न आश्रम व्यवहारा हो
न त्रिदेवा सोहं शक्ति, निराकार से पारा हो
शब्द अतीत अटल अविनाशी, क्षर अक्षर से न्यारा हो
ज्योति स्वरूप निरंजन नाहीं, ना ओम् हुंकारा हो
धरनी न गगन पवन न पानी, न रवि चंदा तारा हो
है प्रगट पर दीसत नाहीं, सत्गुरु सैन सहारा हो
कहे कबीर सर्ब ही साहब, परखो परखनहारा हो
(2)
मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में
न तीरथ में, न मूरत में, न ही कांद निवास में
न मंदिर में, न मस्जिद में, न काशी कैलाश में
न मैं जप में, न मैं तप में, न मैं बरत उपास में
न मैं किरिया करम में रहता, नहीं योग संन्यास में
खोजी होए तुरत मिल जाऊँ, एक पल की तलाश में
कहे कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूँ विश्वास में
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नरमी का बर्ताव किया जाये और सकारात्मक काम किया जाये Think Positive

खुशदीप सहगल 
१- घूमते हुए हम जा पहुंचे खुशदीप सहगल  जी के ब्लॉग देशनामा पर तो पता चला कि जैसे कुछ लोग सलीम खान का विरोध कर रहे थे , उसी तर्ज़ पर  अब कुछ गलत लोग गीताश्री जी का विरोध कर रहे हैं लेकिन एक फर्क है कि इस बार 'व्यक्ति विरोध' को घटिया वे लोग भी कह रहे हैं जो यह काम खुद करते रहते हैं. लेख अच्छा है और उससे भी अच्छी हैं उसकी टिप्पणियाँ . आप ज़रूर पढ़ें. हमने कहा है कि :
न तो गीता एक दिन में लिखी जा सकती है और न ही कोई एक दिन में गीताश्री बन सकता है . मैं नहीं जानता कि गीताश्री कौन हैं और न ही कभी उन्हें पढने का अवसर ही मिला लेकिन आप बता रहे हैं कि वह एक औरत हैं तो वह ज़रूर अच्छी ही होंगी. इस देश में एक औरत के लिए   घर बाहर काम करना कितना कठिन है  , यह आज किसी से छिपा नहीं है . ऐसे में जिसने अपने लिए जो मक़ाम बनाया है , कैसे बनाया है वही जानता है. 'व्यक्ति विरोध की मानसिकता' नकारात्मक कहलाती है और बुरे नतीजे दिखाती है .
हम गीता जी के घटिया विरोध पर आपत्ति करते हैं. 
 http://www.deshnama.com/2011/04/blog-post_06.html


२- हमारे प्रिय  प्रवीण शाह जी की पोस्ट का विषय भी यही है. वह पूछ रहे हैं कि

सलीम खान से डरते हो आप, आपके दिल में भी कोई जगह तक नहीं उसके लिये... इतने छोटे दिल के साथ कैसे ' हमारी वाणी ' कहला सकते हो आप ?

३-  इन सभी बैटन का हल है कि नरमी का बर्ताव किया जाये और सकारात्मक काम किया जाये . यह समाधान देती हुई पोस्ट भी देखि जा सकती है:

अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया-‘अल्लाह नर्म आदत का है, वह नर्मी को पसंद करता है और नर्मी पर वह कुछ देता है जो सख्ती पर या किसी और चीज़ पर नहीं देता।‘

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जानते भी हो दिल क्या चीज़ है शाहिद


सैफ़ी  सिरोजी की एक ग़ज़ल की पंक्तियाँ कहती हैं-
"उम्र भर करता रहा हर शख्स पर मैं तबसरे,
झांक कर अपने गिरेबाँ में कभी देखा नहीं."
       मुझे इस वक़्त ये पंक्तियाँ पूर्ण रूप से पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के    कप्तान ''शाहिद आफरीदी ''पर अक्षरश :   खरी उतरती प्रतीत हो रही हैं क्योंकि एक ऐसे देश के नागरिक होते हुए ,जिसने कई बार एक ऐसे देश पर आक्रमण किये जिसने हमेशा उसे छोटे भाई का दर्जा दिया और उसकी गुस्ताखियों को नजरंदाज करते हुए उसे सुधरने का अवसर दिया है,वे तंग दिल का ठीकरा उसी बड़े दिल वाले भारत पर ठोक रहे हैं दिल जैसी शै से शायद वे अनजान हैं क्योंकि दिल जिस उदारता का परिचायक है वह उदारता पाकिस्तानी खिलाडियों के व्यवहार में कहीं से लेकर कहीं तक भी दृष्टिगोचर नहीं होती .भारत वह देश है जिसका रिकोर्ड है कि उसने आज तक भी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया है वह हमेशा से दुश्मनों से अपने बचाव के   लिए ही हथियार जुटाता रहा है क्योंकि भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है और इस सोने की चिड़िया को लूटने विश्व भर के यहाँ जुटे रहे और यहाँ की धरती को रक्त रंजित करते रहे ऐसे देश ने हमेशा दोस्तों का साथ दिया है और दुश्मनों का मुहं तोडा है.ऐसे में भारतीयों को तंगदिल कहना शाहिद के   दिमागी तनाव का ही परिचायक है.शाहिद स्वयं कितने दिलदार हैं इसका पता तो सचिन के   शतक को लेकर उनके कथन से ही जाहिर है हालाँकि बाद में वे उस कथन से अपना पल्ला झाड़ चुके हैं किन्तु जो बात मुहं से निकल चुकी है उसे वे चाह कर भी वापस नहीं   ले सकते .मीडिया के   बारे में वे कुछ न ही बोलें तो बेहतर है क्योंकि ये मीडिया ही है जो गलत को गलत और सही को सही का आईना   दिखाता है और पाकिस्तान में क्रिकेट खिलाडियों के  हालिया हाल से भारतीय जनता को रू-ब-रू करता है.यह  पाकिस्तानियों की  दिलदारी ही है जो भारत पाकिस्तान के मैच को जोश व् जूनून से देखने का मदद तैयार करती है और यह भारतीयों की तंगदिली ही है जो किसी के भी कुछ कहने को सिरे से नकार देती है और अपनी दोस्ती में आड़े नहीं आने देती-
"अरफान ज़माने की आदत है बुरा कहना,
है अपनी तबियत के नासाज़ नहीं होती.''
http://shalinikaushik2.blogspot.com/  
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ब्लोगिंग की दुनिया पर रिसर्च कर रही हें शिखा कोशिक

शिखा कोशिक
दोस्तों ब्लोगर की दुनिया पर पेनी नजर रखने और वक्त बा वक्त ब्लोगर भाइयों को अपनी टिप्पणियों अपनी लेखनी के माध्यम से ब्लोगिंग के नये टिप्स देने वाली शिखा कोशिक इन दिनों ब्लोगिंग की दुनिया में लोकप्रिय   हो गयी हे , शिखा कोशिक जो इन दिनों रिसर्च स्कोलर हे लेकिन उनकी ब्लोगिंग और ब्लोगिंग में अहतियात ,अपनापन ,पेनी नज़र , और तेज़ तर्रार लेखनी से स्पष्ट हे के वोह ब्लोगिंग पर भी पेनी नजर रख कर अपनी अतिरिक्त रिसर्च कर रही हे . 
शिखा  कोशिक के बारे में  आपको क्या बताऊं सबसे पहले अगर बात जन्मदिन की करें तो देखो आप सभी जानते हो के महिला की कोई उम्र नहीं होती और कुल सोलह साल पर जाकर हर महिला की उम्र टिक जाती हे और शिखा बहन के उम्र भी सोलह बरस पर आकर टिक गयी हे अब बात करते हें उनकी ब्लोगिग्न की लगभग सितम्बर २०१० से ब्लोगिंग की दुनिया में धूम मचाने आयीं शिखा जी ने ब्लोगिंग की नब्ज़ को समझा इसे टटोला हे और इसीलियें ब्लोगर्स और रीडर की भावनाओं को देखते हुए शिखा जी ने अपने विभिन्न ब्लोग्स पर कई रिसर्च किये हे कई प्रयोग किये हें . 
शिखा जी के ब्लॉग लेखन में जो अपना पन  ,जो एहसास , जो तीखे तेवर और जो पेनापन है उससे स्पष्ट हे के वोह दुसरे कामकाज के अलावा ब्लोगिंग पर भी बहुत महनत करती हे और इसमें उनके निजी स्वभाव की भी अहमियत हें शिखा जी जितना खुद को प्रेम करती हे इतना ही स्रष्टि के हर जीव को प्रेम करती हे इसीलियें वोह सभी का दुःख दर्द ,मानसम्मान समझती हे और इन मर्यादाओं को ध्यान में रख कर ब्लोगिंग करती हे , शिखा जी लिखना ,पढना ,खेलना, और बागवानी का शोक हे इनकी मनपसन्द पुस्तक रामायण हे जबकि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य भी इन्हें बहुत पसंद है . 
शिखा जी कई ब्लोगों   से जुडी हें जबकि भातीय ब्लॉग लेखक मंच की महाभारत के बाद उसकी समानित पुरस्कृत सदस्या हैं . शिखा जी ने विचारों का चबूतरा, नन्हे फरिश्तों के लियें, हम तो हर पल जिए , हिंदी साहित्य पहेली , नेताजी क्या कहते हैं , अर्थली हेवन , विख्यात, मेरी कहानियाँ ,मेरा आपका प्यारा ब्लॉग सहित कई और ब्लॉग तय्यार किये हें जिसके अपने रीडर हें अपने टिका टिप्पणीकार हैं और शिखा जी ने अपने हर ब्लॉग पर हर टेस्ट ,हर आयु वर्ग से जुड़े लोगों के हिसाब से ब्लोगिंग की हे एक ब्लॉग में धार्मिक गाथाओं की झलक  हे तो एक ब्लॉग केवल बच्चों का दिल बहलाने और उनका बोद्धिक स्तर बढाने के लियें हे तो दूसरा ब्लॉग नेताओं को सूधारने के लियें उनकी हरकतें सार्वजनिक करने के लियें तय्यार किया गया हे , एक ब्लॉग साहित्य से जुदा हे तो दुसरा लेखों से भरा पढ़ा हे भाषा में हिंदी भी हे तो अंग्रेजी भी हे जिसकी जेसी पसंद वोह उस तरह से इनके अलग अलग ब्लोगों को पढ़कर इनकी प्रशंसा करता रहता हे सबसे बढ़ी बात यह हे के बहन शिखा ब्लोगिंग की दुनिया की निर्विवाद ब्लोगरों में से एक हे और यह ना काहू से दोस्ती ना काहू से बेर की तर्ज़ पर ब्लोगिंग कर रही हें इसीलियें इनकी लोकप्रियता दिन बा दिन बढती जा रही हे ............ अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 
दोस्तों मेने अपनी २५०० पोस्ट पूरी करने के बाद लेडीज़ फर्स्ट की तर्ज़ पर महिला पर ही ब्लोगिंग की योजना बनाई थी और इसी क्रम में शिखा जी की उपयुक्त पात्रता होने के कारण उन के लियें ब्लोगिंग की हे ......
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डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल-----तेरी रहमत....


तेरी रहमत का भी खुदाया कोई जबाव नहीं ।
कौन कहता है कि मौला तू लाज़बाव नहीं।

तेरी रहमत है कि बन्दों का मददगार है तू,
तेरे  दर पै  कोई फ़कीर  या नबाव नहीं ।

तू रहमगार है, नासिर है न समझ पाए कोई,
इससे बढ़कर तो जहां में कोई अजाब नहीं ।

रोज ही जाते हैं वो तो मयखाने लेकिन,
उनकी तहरीर है पीते ही वो शराब नहीं ।

उसपे ईमान वाले को हो मंदिर या मैखाना,
भूल पाता वो मगर उसका वह शबाव नहीं ।

हमने जो देखलिया  वो खुदाई नूर तेरा,
उससे बढ़कर तो कोई नूरे-आफताब नहीं ।

जिसके होठों पै छलके खुदाई इश्क की मदिरा,
उसकी नज़रों को ज़माने से कोई दुराव नहीं ।

इश्क वालों की यही तो मस्ती है इलाही,
रोज़ पीते हैं मगर दिल के वो खराब नहीं ।

हमने पी रखी है उन आखों की वो मय 'श्याम ,
जिससे बढ़कर तो ज़माने में कोई शराव नहीं
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लघुकथा----- दिलबाग विर्क


         बैकडोर एंट्री                 
" यह बैकडोर व्यवस्था कहीं भी पीछा नहीं छोडती ."- बैंक में मेरे साथ ही लाइन में खड़े एक युवक ने पिछली खिड़की से राशि निकलवाकर जाते आदमी को देखकर कहा .
' कोई मजबूरी होगी .'- मैंने सहज भाव से कहा .
" तो क्या हम बेकार हैं जो घंटे भर से खड़े हैं ? "- उसने कहा .
' चलो वक्त का थोडा नुकसान है , सब्र करो .'- मैंने हौंसला बंधाते हुए कहा .
" अकेले वक्त का नहीं , यह व्यवस्था तो जिंदगियां भी बर्बाद करती है ."-उसकी आवाज़ में रोष था .
' वो कैसे ? '- मैंने पूछा .
" इसी व्यवस्था के कारण कुछ लोग नौकरियां पा जाते हैं तो कुछ गलियों की खाक छानने को मजबूर हो जाते हैं ."-उसने निराश होकर कहा .
' नौकरी में बैकडोर व्यवस्था ? '- मैंने हैरानी से पूछा .
" एडहोक , ठेका , गेस्ट आदि के नाम पर भर्ती बैकडोर एंट्री ही तो है ."
' कैसे ? '- मैंने पूछा .'
" यह नियुक्तियां स्थानीय अधिकारीयों द्वारा बिना मैरिट के की जाती हैं . इनमें सिफारिश और रिश्वत का बोलबाला अधिक होता है . पहुंच वाले नौकरी खरीद लेते हैं और हम जैसे गरीब और सामान्य लोग देखते रह जाते हैं ."-उसने रुआंसा होकर कहा .
' ये भर्ती नियमित तो नहीं होती .'- मैंने तर्क दिया .
" ठीक कहते हैं आप , परन्तु ये लोग यूनियन बनाकर सरकार पर दवाब डालते हैं और वोटों की राजनीति करने वाले नेता इन्हें स्थायी कर देते हैं ."- उसकी आवाज़ में मायूसी थी .
' अच्छा ! ऐसा भी होता है .'- मैं चौंका .
" ऐसा ही तो होता है मेरे महान देश में ."- उसने कटाक्ष किया . मैं उसकी आँखों में सिफारिश के अभाव और गरीबी के कारण नौकरी न खरीद पाने के दुःख और भारतीय समाज में प्रचलित बैकडोर एंट्री की व्यवस्था के प्रति आक्रोश को स्पष्ट देख रहा था . 
                     * * * * *
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आप सभी को हिन्दू नवसंवत्सर २०६८ की शुभकामनाएँ Best Wishes

नया साल जीवन को बेहतर बनाने का एक मौक़ा भी लाता है .
प्रकृति भी इस मौसम में पुराने पत्ते झाड़ देती है, हमें भी अपनी गलतियाँ झड देनी चाहियें.
पुरानी गलतियाँ न दोहराई जाएँ ऐसा मैं अपने लिए चाहता हूँ.
अव्वल तो गलती करने के लायक नहीं होती और किसी मुगालते में हो जाए तो वह दोहराने के लायक तो बिलकुल भी नहीं होती.
हिन्दू साल के शुरू होने का मतलब यह नहीं है कि यह इस्लाम के या मुसलमान के खिलाफ है. कोई भी अच्छी और सही बात कभी इस्लाम के खिलाफ नहीं हो सकती और न ही इस्लाम कभी किसी अच्छी और सही बात के खिलाफ हो सकता है. एकता और समानता के सूत्र बहुत हैं.
लेकिन ये सूत्र खुद बी खुद सामने नहीं आ सकते , इन्हें लाना पड़ता है. नए साल में दूरियां और गलतफहमियां दूर हों और हम सबके विचार और कर्म शुभ और कल्याणकारी हों , मालिक से हम यह दुआ  करते हैं 
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क्रिकेट में खिलाड़ियों ने किया सर उंचा तो तो समाजकंटकों ने किया देश को शर्मसार

दोस्तों यह हिन्दुस्तान हे ,मेरा भारत महान हे यहाँ भाई चारा सद्भावना इस देश की पहचान इस देश की जान हे अगर मानवता इस देश के लोगों में नहीं तो विश्व स्तर पर यह देश बेजान हे लेकिन भारत पाक मेच के दिन की एक घटना ने मुझे इस मानवता पर गम के साथ आंसू बहाने पर मजबूर कर दिया हे और यह बिमारी जो  हमारे देश में कुछ लोगों की ताकत और बहुत बहुत लोगों की चुप्पी कमजोरी के कारण कोढ़ में खाज की तरह बनती जा रही हे इसे हमें रोकना होगा और इसीलियें यह घटना में आप लोगों से शेयर कर रहा हूँ ..............
दोस्तों में जब छोटा था तो हमारे एक पड़ोसी राजपूत अंकल जिन्हें उनका कुत्ता बहुत प्रिय था वोह जब कटकना  हो गया हडकिया हो गया आते जाते को काटने लग गया तो इन अंकल ने बंदूक उठायी उसे कार में बिठाया उनके पुत्र का में मित्र था में भी उनके साथ हो लिया हम जंगल में गये उन्होंने कुत्ते को बाहर निकाला और फिर धाय धाय उस पर गोली दाग दी कुत्ता ढेर हो गया मेने अंकल से डरते डरते कुत्ते को मारने का कारण पूंछा तो उनका जवाब था जब कोई भी जीव मानवता का दुश्मन हो जाए तो उसे मार देना चाहिए ताकि मानवता की सुरक्षा हो सके मेने दुसरा सवाल किया यह कुत्ता तो अच्छी नस्ल का था फिर भी उनका कहना था नस्ल से कुछ नहीं होता शेतान हर नस्ल में होता हे बिमारी हर नस्ल में होती हे और जो शान्ति अमन सद्भाव के लियें खतरा हो उनको मर देना ही अच्छा हे इन फोजी राजपूत अंकल ने इतनी देर में पास के बिल में से निकलते एक काले सांप पर भी गोली चलाई और वोह भी मर गया उस वक्त इन फोजी राजपूत अंकल की बात मेरे समझ में नहीं आई थी लेकिन कल भारत पाक मेच के बाद इन्दोर से लोटने के बाद जब एक घटना मुझे हमारे पड़ोसी ने सुनाई तो मुझे यह घटना याद आ गयी .
जी हाँ दोस्तों जो घटना मुझे सुनाई गयी वोह देश को शर्मसार करने का प्रयास कुछ समाज कंटकों का  था और इसीलियें इस घटना को सुन कर जितनीं ख़ुशी मुझे भारत के क्रिकेट चेम्पियन बनने की हुई उससे खिन ज्यादा दुःख इस घटना पर हुआ ........हमारे पड़ोसी अंकल के  दादा ससुर इन्दोर में केंसर पीड़ित हें उन्हें चिकित्सकों ने अंतिम अवसर का केंसर बताया और कहा के इन्हें घर ले जाओ वहां जितनी इनकी खिदमत हो सके करो पड़ोसी अंकल अपने बीवी बच्चों के साथ इन्दोर और फिर इन्दोर के अस्पताल पहुंचे उस दिन रात को भारत ने पाक को रोंद कर कीर्तिमान बनाया था जीत का नशा भारतीयों पर था लेकिन उसी दिन कुछ राक्षस सडकों पर साम्प्रदायिकता का तांडव कर रहे थे दोस्तों यकीन मानिए रात्रि को इन केंसर पीड़ित बुज़ुर्ग को एक कर में अस्पताल से जब घर लाया जाने लगा एक कार में केंसर पीड़ित और कुछ महिलाये ,दूसरी कार में रिश्तेदार बच्चे चल रहे थे सामने ही भारत माता की जय पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाते हुए करीब दो सो शराबियों का झुण्ड आया और कार में मुस्लिम लिबास की महिलाओं को देख कर घेर लिया पहले इस मरीज़ पर दबाव बनाया के कहो के वन्देमातरम कहों के हम हिन्दुस्तानी हे जब इन मरीज़ से गले का लास्ट स्टेज का केंसर होने के कारण  बोला नहीं गया और आँख से आंसू निकल गये तो इन  समाज कंटकों में से एक ने उनके गाल पर चांटा जड़ दिया कार में ही हमारे पड़ोसी का बच्चा शादाब बेठा था जो केवल दस वर्ष का हे उसके गले में हाथ डाल कर इन जानवरों ने दबाते हुए कहा के तू कह में हिन्दुस्तानी हु ,वन्देमातरम वरना अभी तेरा गला दबाता हूँ ओर्तों में चीख चीत्कार का माहोल था लेकिन इन समाजकंटकों के आगे बेबसी का माहोल था बच्चे ने जो उन्होंने कहा वोह सब दर के मरे कहा इन भेड़ियों को महिलाओं ने केंसर रोगी की पीड़ा के बारे में बताया तो महिलाओं के साथ भी इन लोगों ने अभद्रता की उनका यह शोरशराबा करीब आधे घंटे तक चलता रहा और जब वोह दोनों कारों को अपने घेरे से छोड़ कर गये तब जिस कर में बुज़ुर्ग केंसर रोगी बेठे थे उनकी तरफ देखा तो उनकी आँखें फटी थीं और घर जाने के पहले ही उनकी साँसे थम गयी थी रोते पिटते जब वोह इस लाश को घर ले जा रहे थे तो ऐसे ना  जाने कितने समाज कंटकों की भीड़ का उन्हें सामना करना पढ़ा भारत जिंदाबाद,हिन्दुस्तान जिंदाबाद भारत में रहना होगा तो वन्देमातरम कहना होगा के नारे लग रहे थे यह लोग एक मुस्लिम बस्ती के पास से गुज़रे तो वहां दुसरा नजारा था वहां पाकिस्तान पर भारत की ख़ुशी पर जश्न मनाया जा रहा था फटाखे फोड़े जा रहे थे और नारे लग रहे थे ...... या ख्वाजा तेरा हिन्दुस्तान जिंदाबाद ........... भारत में रहना होगा तो इन्सान बन कर रहना होगा ....... एक दो एक दो जो जानवर हें उन्हें मार दो ..........
कल जब हमारे पड़ोसी और उनके छोटे बच्चे ने इंसानियत को शर्मसार कर देने वाले हिन्दुस्तानियों की यह वहशी दास्ताँ रो रो कर सुनाई तो मेरी भी आँख से आंसू निकल पढ़े और जिस हिन्दुस्तान और जिन हिन्दुस्तानियों पर गर्व हे उनमें से कुछ राक्षसों का यह वहशीपन सुनकर में खुद शर्मसार हो गया और जितनी ख़ुशी जितना गर्व मुझे भारत के क्रिकेट विश्व विजेता बनने पर था उससे कई गुना ज़्यादा दुःख मानवता के इन दुश्मनों की करतूतों पर हो रहा था क्या यही हिन्दुस्तान हे क्या इसे फिर से आप और हम बदल कर इसकी गंदगी साफ़ कर इसे आदर्श हिन्दुस्तान आदर्श भारत मेरा भारत महान नहीं बना सकते अगर हां ......तो दोस्तों अपनी लेखनी की धार से बदल डालो  जानवरों की सोच को अगर वोह इंसान बनते हें तो उन्हें इंसान बना दो लेकिन अगर इंसान नहीं बनते हें तो फिर मेरे बचपन के अंकल की तरह उन्हें सबक सिखा दो उन्हें सबक सिखा दो ................ अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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चलो बुलावा आया है....


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डोंगरगढ  की मां  बम्‍लेश्‍वरी देवी  
(मेरी यह पोस्‍ट पिछले साल अक्‍टूबर महीने में प्रकाशित हो चुकी है। इसे आज से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्रि के मौके पर फिर से प्रकाशित कर रहा हूं। मां बम्‍लेश्‍वरी मंदिर के इतिहास, पौराणिक महत्‍व और मां की महिमा का बखान करती यह पोस्‍ट आपके समक्ष फिर से प्रस्‍तुत है।)
जय माता दी। राजनांदगांव जिले के डोगरगढ़ में स्थित है मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर। हर साल नवरात्रि के मौके पर मां के दरबार में बड़ा मेला लगता है। दूर दूर से लोग मां के दर्शन को आते हैं। मां से मनोकामना मांगते हैं। और मां सबकी मनोकामना पूरी भी करती  है। छत्तीसगढ़ राज्य की सबसे ऊंची चोटी पर विराजित डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी का इतिहास काफी पुराना है। वैसे तो साल भर मां के दरबार में भक्तों का रेला लगा रहता है लेकिन लगभग दो हजार साल पहले माधवानल और कामकंदला की प्रेम कहानी से महकने वाली कामावती नगरी में नवरात्रि के दौरान अलग ही दृश्य होता है। छत्तीसगढ़ में धार्मिक पर्यटन कस सबसे बड़ा केन्द्र पुरातन कामाख्या नगरी है जो पहाड़ों से घिरे होने के कारण पहले डोंगरी और अब डोंगरगढ़ के नाम से जाना जाता है। यहां ऊंची चोटी पर विराजित बगलामुखी मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। हजार से ज्यादा सीढिय़ां चढ़कर हर दिन मां के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु आते हैं और जो ऊपर नहीं चढ़ पाते उनके लिए मां का एक मंदिर पहाड़ी के नीचे भी है जिसे छोटी बम्लेश्वरी मां के रूप में पूजा जाता है। अब मां के मंदिर में जाने के लिए रोप वे भी लग गया है। 
वैसे तो मां बम्लेश्वरी के मंदिर की स्थापना को लेकर कोई स्पष्ट  प्रमाण नहीं है पर जो तथ्य सामने आए हैं उसके मुताबिक  उज्जैन के राजा विक्रमादित्‍य को मां बगलामुखी ने सपना दिया था और उसके बाद डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर कामाख्या नगरी के राजा कामसेन ने मां के मंदिर की स्थापना की थी। एक कहानी यह भी है कि राजा कामसेन और विक्रमादित्य के बीच युद्ध में राजा विक्रमादित्य के  आव्हान पर उनके कुल देव उज्जैन के महाकाल कामसेन की सेना का विनाश करने लगे और जब कामसेन ने अपनी कुल देवी मां बम्लेश्वरी का आव्हान किया तो वे युद्ध के मैदान में पहुंची, उन्हें देखकर महाकाल ने अपने वाहन नंदी से उतर कर मां की शक्ति को प्रमाण किया और फिर दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। इसके बाद भगवान शिव और मां बम्लेश्वरी अपने अपने लोक को विदा हुए। इसके बाद ही मां बम्लेश्वरी के पहाड़ी पर विराजित होने की भी कहानी है। यह भी कहा जाता है कि कामाख्या नगरी जब प्रकृति के तहत नहस में नष्ट हो गई थी तब डोंगरी में मां की प्रतिमा स्व विराजित प्रकट हो गई थी। सिद्ध महापुरूषों और संतों ने अपने आत्म बल और तत्व ज्ञान से यह जान लिया कि पहाड़ी में मां की प्रतिमा प्रकट हो गई है और इसके बाद मां के मंदिर की स्थापना की गई।
      
प्राकृतिक रूप से चारों ओर से पहाड़ों में घिरे डोंगरगढ़ की सबसे ऊंची पहाड़ी पर मां का मंदिर स्थापित है। पहले मां के दर्शन के लिए पहाड़ों से ही होकर जाया जाता था लेकिन कालांतर में यहां सीढिय़ां बनाई गईं और मां के मंदिर को भव्य स्वरूप देने का काम लगातार जारी है। पूर्व में खैरागढ़ रियासत के राजाओं द्वारा मंदिर की देखरेख की जाती थी बाद में राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने ट्रस्ट का गठन कर मंदिर के संचालन का काम जनता  को सौंप दिया। अब मंदिर में जाने के लिए रोप वे की भी व्यवस्था हो गई है और मंदिर ट्रस्ट अस्पताल धर्मशाला जैसे कई सुविधाओं की दिशा में काम कर रहा है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु मां के दिव्य स्वरूप को देखकर यहीं रूक जाने को लालायित रहते हैं। मां के मंदिर में आस्था के साथ हर रोज हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के कई हिस्सों से मंदिर में लोग आते हैं और मां से आशीर्वाद मांगते हैं। आम दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या तो फिर भी कम होती है लेकिन नवरात्रि के मौके पर मां के मंदिर में हर दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मां के दरबार में आने वाला हर श्रद्धालु खुद को भाग्यशाली समझता है और मां के दर्शन कर लौटते वक्त उसके जेहन में अगली बार फिर आने की लालसा जग जाती है।

डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी  के दो मंदिर हैं। एक मंदिर पहाडी के नीचे है और दूसरा पहाड़ी के ऊपर। पहाडी के नीचे के मंदिर को बड़ी बमलई का मंदिर और पहाड़ी के नीचे के मंदिर को छोटी बमलई का मंदिर कहा जाता है।

मां बम्लेश्वरी  मंदिर को  लेकर कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां

00   एतिहासिक और धार्मिक  नगरी डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं। एक मंदिर 16 सौ फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जो बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। समतल पर स्थित मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है।

00   ऊपर विराजित मां और नीचे विराजित मां को एक दूसरे की बहन कहा जाता है। ऊपर वाली मां बड़ी और नीचे वाली छोटी बहन मानी गई है।

00   सन 1964 में खैरागढ़ रियासत के भूतपूर्व नरेश श्री राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह ने एक ट्रस्ट की स्थापना कर मंदिर का संचालन ट्रस्ट को सौंप दिया था।

00   मां बम्लेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास लगभग 2200 वर्ष पुराना है। डोंगरगढ़ से प्राप्त भग्रावेशों से प्राचीन कामावती नगरी होने के प्रमाण मिले हैं। पूर्व में डोंगरगढ़ ही वैभवशाली कामाख्या नगरी कहलाती थी।

00   मंदिर के पुराने पुजारी और जानकार बताते हैं कि राजा विक्रमादित्य को माता ने स्वप्‍न  दिया था कि उन्हें यहां की पहाड़ी पर स्थापित किया जाए और उसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। ऐसा भी कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य के स्वप्‍न के बाद मंदिर का निर्माण राजा कामसेन ने कराया था।

00   मां बम्लेश्वरी मंदिर के इतिहास को लेकर कोई स्पष्ट  तथ्य तो मौजूद नहीं है, लेकिन मंदिर के इतिहास को लेकर जो पुस्तकें और दस्तावेज सामने आए हैं, उसके मुताबिक डोंगरगढ़ का इतिहास मध्यप्रदेश के उज्जैन से जुड़ा हुआ है।

00   मां बम्लेश्वरी को मध्यप्रदेश के उज्जैयनी के प्रतापी राजा विक्रमादित्य की कुल देवी भी कहा जाता है।

00   ऐसी किवदंती है कि राजा वीरसेन की कोई संतान नहीं थी। वे इस बात से दुखी रहते थे। कुछ पंडितों की सलाह पर राजा वीरसेन और रानी महिषमतिपुरी मंडला गए। वहां पर उन्होंने भगवान शिव और देवी भगवती की आराधना की। उन्होंने वहां एक शिवालय का निर्माण भी कराया। इसके एक साल के भीतर रानी गर्भवती हुई और उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र का नाम मदनसेन रखा गया।  इसके बाद राजा वीरसेन ने पुत्र रत्न प्राप्त होने को शिव और भगवती की कृपा मानकर मां बम्लेश्वरी के नाम से डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी का मंदिर बनवाया।

00  इतिहासकारों और विद्वानों ने इस क्षेत्र को कल्चूरी काल का पाया है लेकिन अन्य उपलब्ध सामग्री जैसे जैन मूर्तियां यहां दो बार मिल चुकी हैं, तथा उससे हटकर कुछ मूर्तियों के गहने, उनके वस्त्र, आभूषण, मोटे होठों तथा मस्तक के लम्बे बालों की सूक्ष्म मीमांसा करने पर इस क्षेत्र की मूर्ति कला पर गोंड कला का प्रमाण परिलक्षित हुआ है।

00  यह अनुमान लगाया जाता है कि 16 वीं शताब्दी तक  डूंगराख्या नगर गोंड राजाओं के अधिपत्‍य में रहा। यह अनुमान भी अप्रासंगिक  नहीं है कि गोंड राजा पर्याप्त समर्थवान थे, जिससे राज्य में शांति व्यवस्था स्थापित थी। आज भी पहाड़ी में किले के बने हुए अवशेष बाकी हैं। इसी वजह से इस स्थान का नाम डोंगरगढ़ (गोंगर, पहाड़, गढ़, किला) रखा गया और मां बम्लेश्वरी का मंदिर चोटी पर स्थापित किया गया।

अन्य जानकारियां

00   एतिहासिक और धार्मिक स्थली डोंगरगढ़ में कुल 11 सौ सीढिय़ां चढऩे के बाद मां के दर्शन होते हैं।

00   यात्रियों की सुविधा के लिए रोपवे का निर्माण किया गया है। रोपवे सोमवार से शनिवार तक सुबह आठ से दोपहर दो और फिर अपरान्ह तीन से शाम पौने सात तक चालू रहता है। रविवार को सुबह सात बजे से रात सात बजे तक चालू रहता है। नवरात्रि के मौके पर चौबीसों घंटे रोपवे की सुविधा रहती है।

00   बुजुर्ग यात्रियों के लिए कहारों की भी व्यवस्था पहले थी पर रोपवे हो जाने के बाद कहार कम ही हैं।
00   मंदिर के नीचे छीरपानी जलाशय है जहां यात्रियों के लिए बोटिंग की व्यवस्था भी है।

00   डोंगरगढ़ में मां बम्लेश्वरी के दो मंदिरों के अलावा बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकी मंदिर, शीतला मंदिर,  दादी मां मंदिर भी हैं।

00  मुंबई हावड़ा मार्ग पर राजनांदगांव से डोंगरगढ़ जाते समय राजनांदगांव में मां पाताल भैरवी दस महाविद्या पीठ मंदिर है, जो अपनी भव्यता के चलते दर्शनीय है। जानकार बताते हैं कि विश्‍व के सबसे बडे शिवलिंग के आकार के मंदिर में मां पातालभैरवी विराजित हैं। तीन मंजिला इस मंदिर में पाताल में मां पाताल भैरवी, प्रथम तल में दस महाविद़़यापीठ और ऊपरी तल पर भगवान शंकर का मंदिर है।
00  मां बम्लेश्वरी मंदिर में ज्योत जलाने हर वर्ष देश और विदेशों से हजारों श्रद्धालु आते हैं। हालत यह है कि मंदिर में वर्तमान में ज्योत के लिए जो बुकिंग कराई जा रही है है, वह वर्ष 2015 के क्वांर नवरात्रि के लिए है।

00   ट्रस्ट समिति अस्पताल संचालित करती है। अब मेडिकल कालेज खोले जाने की भी योजना है।

00   मंदिर का पट सुबह चार बजे से दोपहर एक बजे तक और फिर दोपहर दो बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है। रविवार को सुबह चार बजे से रात दस बजे तक मंदिर लगातार खुला रहता है।
00   नवरात्रि के मौके पर मंदिर का पट चौबीसों घंटे खुला रहता है।

डोंगरगढ़ कैसे पहुंचे

00   डोंगरगढ़ के लिए ट्रेन और सड़क मार्ग दोनों ओर से रास्ता है।

00   मुबई हावड़ा रेल मार्ग पर हावड़ा की ओर से राजधानी रायपुर के बाद डोंगरगढ़ तीसरा बड़ा स्टेशन है। बीच में दुर्ग और राजनांदगांव रेलवे स्टेशन पड़ता है।

00   रायपुर से डोंगरगढ़ की रेल मार्ग से दूरी लगभग 100 किलोमीटर है।

00   राजनांदगांव जिला मुख्यालय से डोंगरगढ़ की रेल मार्ग से दूरी 35 किलोमीटर है।
00   सड़क  मार्ग से डोंगरगढ़ के लिए राजनांदगांव जिला मुख्यालय से दूरी 40 किलोमीटर है और नेशनल हाईवे में राजनांदगांव से नागपुर की दिशा में जाने के बाद 15 किलोमीटर की दूरी पर तुमड़ीबोड गांव से डोंगरगढ़ के लिए पक्की सड़क मुड़ती है जो सीधे डोंगरगढ़ जाती है।

00  डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन जंक्शन की श्रेणी में आता है। यहां सुपर फास्ट ट्रेनों को छोड़कर सारी गाडियां रूकती हैं, लेकिन नवरात्रि में सुपर फास्ट ट्रेनें भी डोंगरगढ़ में रूकती हैं।
00  डोंगरगढ़ जाने वाले यात्रियों के लिए रायपुर से लेकर राजनांदगांव तक यात्री बसों और निजी टैक्सियों की व्यवस्था रहती है।

00  डोंगरगढ़ के लिए निकटस्थ हवाई अड्डा रायपुर के माना में स्थित है।

00   डोंगरगढ़ में यात्रियों की सुविधा के लिए ट्रस्ट समिति द्वारा मंदिर परिसर में धर्मशाला का निर्माण किया गया है। रियायती दर पर यहां कमरे मिलते हैं। मुफ्त में भी धर्मशाला के हाल में रूकने की व्यवस्था है।

00   यात्रियों के लिए रियायती दर पर भोजन की व्यवस्था भी रहती है। ट्रस्ट द्वारा मंदिर के नीचे और बीच में केंटीन संचालित है।

00   नवरात्रि पर विभिन्न संगठनों द्वारा नि:शुल्‍क भंडारा की व्यवस्था भी की जाती है।

00   डोंगरगढ़ में यात्रियों की सुविधा के लिए होटल और लाज भी उपलब्ध है।

00   डोंगरगढ़ आने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने तुमड़ीबोड के पास मोटल बनाया है।

00  डोंगरगढ़ चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है और पहाड़ों पर हरियाली यहां मन मोह लेती है।

00   डोंगरगढ़ में एक पहाड़ी पर बौद्ध धर्म के लोगों का तीर्थ प्रज्ञागिरी स्थापित है। यहां भगवान बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है।

00  डोंगरगढ़ में वर्ष भर छत्तीसगढ़ी देवी भक्ति गीतों की शूटिंग होते रहती है और प्रदेश के अलावा बाहर के कलाकार यहां लगातार आते रहते हैं।http://www.atulshrivastavaa.blogspot.com/

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