इस्लाम को शांति का धर्म बताने वाले चुप क्यों हैं

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  • Friday, March 4, 2011
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  • अहसास की परतें - old
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  • पाकिस्तान एवं दूसरे देशों मे जो हालात बन रहे है वो इस तथ्य को स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि मुस्लिम जन मानस अभी भी कट्टरपंथ को ही अपना अंतिम ठिकाना मानते हैं। अन्यथा क्या कारण था कि मिश्र मे आंदोलन मे मुस्लिम ब्रदरहुड की सहभागिता को सहज रूप से स्वीकार किया गया? जबकि सब जानते हैं कि यह दल कट्टरपंथ के उभार का ही नतीजा है। अभी लीबिया मे जो आंदोलन हो रहे हैं उसमे भी लादेन का हाथ बताया जा रहा है। इसके पहले अफगानिस्तान मे तालिबान के पाषाण युग से मुक्ति दिलाने वाले हामिद करजई को अब तक पठान स्वीकार नही कर पाए हैं और उसके पीछे जाएं तो ईरान मे शाह के शाह का नेस्तनाबूद एक कट्टरपंथी आंदोलन के द्वारा ही हुआ था।

    बात पाकिस्तान की करें, यहां के माहौल मे तो आम हिन्दु तो आम हिन्दु वहां के सांसद और विधायक भी अपने को सुरक्षित नही पाते, पिछले २ वर्षों मे ३ माननीयों ने देश छोडा है, शेष हिन्दुओं कि तदाद तो और ज्यादा है, कानूनी और गैर कानूनी दोनो रूप मे।

    वहां के समाज मे अल्पसंख्यक और वास्तविक धर्म निरपेक्ष कितने बेबस हैं यह जानने के लिए पिछले दो माह की दो घटनाएं ही काफी हैं -

    ४-जनवरी २०११ को पश्चिमी पंजाब के राज्यपाल सलमान तासीर की निर्मम हत्या।
    २-मार्च-२०११ को संघीय अल्पसंखयक मंत्री शहबाज भट्टी का बेदर्दी से कत्ल।
    इस पर तुर्रा यह की हत्यारों को आम माफी दिलाने के लिए धरना प्रदर्शनों के दौर चल रहे हैं पाकिस्तान के शहरों मे। हमारे मुस्लिम नेता गण जो झूठे आकंडे और तर्क दे कर यह जब तब सिद्ध करने की व्यर्थ चेष्टा करते रहते हैं कि इस्लाम शांति का धर्म है, इस घटाना पर किसी अंधे गूंगे बहरे की भांति बैठा है, मानो उसे कुछ मालूम ही नही।

    अगर सच मे इस्लाम मे शांति की बात की गई होती तो आज इतना खून खराबा जो इस्लाम के नाम पर हो रहा है वो न होता।

    2 comments:

    DR. ANWER JAMAL said...

    इसलाम के धात्वर्थ में ही शांति निहित है
    @ भाई समीक्षा सिंह जी ! आपको यहां सौदेबाज़ी की भाषा बोलने के लिए नहीं लाया गया है बल्कि विरोध के लिए ही लाया गया है। आप जिस बात को भी ग़लत समझें, उसका भरपूर विरोध करें, चाहे वह हिन्दू हो या फिर मुस्लिम हो। ग़लत बात हरेक की ग़लत होती है।
    आपका यह लेख समस्या को चिन्हित करने का एक अच्छा प्रयास है। कृपया अपनी भाषा को संयत रखें ताकि आपके विचारों से ज़्यादा से ज़्यादा लोग लाभान्वित हो सकें। मैं आपकी मदद करना चाहता हूं। अतः आप भी हिंदी ब्लागर्स फ़ोरम इंटरनेशनल के नियमों की अवहेलना से बचें।
    धन्यवाद।
    अब इसके बाद आपको यह जान लेना चाहिए कि इसलाम के धात्वर्थ में ही शांति निहित है। इसलाम का पालन न करने के कारण ही आज चारों तरफ़ अशांति है। मुसलमानों में आज नमाज़ अदा करना और कुरआन के हुक्मों पर चलने के बजाय दुनिया की दौलत जमा करने का जज़्बा पाया जाता है। ज़कात अदा करने वाले मुसलमान भी कम हैं। ईरान का शाह ऐसे ही मुसलमानों में से था और हुस्नी मुबारक और गद्दाफ़ी और दीगर सऊदी बादशाह भी पक्के खुदग़र्ज़ हैं। इनके कारण होने वाली समस्याओं के पीछे इसलाम पर न चलना है। अतः आप अपने निष्कर्ष में ग़लत हैं।
    इसी तरह आप भी गाली-गुप्पड़ करने के बजाय तथ्य केंद्रित बात करके अपनी बात को सभ्य समाज में कही और सुनी जाने लायक़ बना सकते हैं। नफ़रत किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि वह तो खुद एक समस्या है। समस्या हिंदू समस्या या मुस्लिम समस्या नहीं होती। आप जहां भी कोई समस्या देखें, उसका हल ढूंढने की कोशिश करें।

    अहसास की परतें - old said...

    अनवर तुम हमेशा कहते रहते हो कि इस्लाम का विस्तार हो रहा है, और जब हम इस्लाम मे किसी गलत बात की ओर इंगित करते हैं रो तुम कहते हो कि ये सच्चे मुस्लिम नही हैं, तो पहले तुम यह बताओ कि इस दुनिया मे पक्के मुलिम कितने हैं जिससे कि मैं आगे तुमसे बात करते समय उसका ख्याल रखूं, और तुम भी इस्लाम के बढते प्रभाव का वर्णन करने के पहले उसको ध्यान मे लाओ।

    मैं ने अगर कभी किसी को कडी बात कही है तो मै सदैव उसके पक्ष मे खडा हुआ और स्पष्ट किया है कि ऐसा क्यों बोला। संभवतः यह मेरे टिप्पणी के बारे मे है, तो महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले लेख के लेखक तो आपके प्राण प्रिय सलीम हैं उनका दुर्भावना पूर्ण लेख तो पसंद आएगा ही, मै तनिक भी प्रभावित नही इससे।

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