समस्या हिंदू समस्या या मुस्लिम समस्या नहीं होती Try to understand

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  • Friday, March 4, 2011
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  • DR. ANWER JAMAL
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  • @ भाई समीक्षा सिंह जी ! आपको यहां सौदेबाज़ी की भाषा बोलने के लिए नहीं लाया गया है बल्कि विरोध के लिए ही लाया गया है। आप जिस बात को भी ग़लत समझें, उसका भरपूर विरोध करें, चाहे वह हिन्दू हो या फिर मुस्लिम हो। ग़लत बात हरेक की ग़लत होती है।
    आपका यह लेख समस्या को चिन्हित करने का एक अच्छा प्रयास है। कृपया अपनी भाषा को संयत रखें ताकि आपके विचारों से ज़्यादा से ज़्यादा लोग लाभान्वित हो सकें। मैं आपकी मदद करना चाहता हूं। अतः आप भी हिंदी ब्लागर्स फ़ोरम इंटरनेशनल के नियमों की अवहेलना से बचें।
    धन्यवाद।
    अब इसके बाद आपको यह जान लेना चाहिए कि इसलाम के धात्वर्थ में ही शांति निहित है। इसलाम का पालन न करने के कारण ही आज चारों तरफ़ अशांति है। मुसलमानों में आज नमाज़ अदा करना और कुरआन के हुक्मों पर चलने के बजाय दुनिया की दौलत जमा करने का जज़्बा पाया जाता है। ज़कात अदा करने वाले मुसलमान भी कम हैं। ईरान का शाह ऐसे ही मुसलमानों में से था और हुस्नी मुबारक और गद्दाफ़ी और दीगर सऊदी बादशाह भी पक्के खुदग़र्ज़ हैं। इनके कारण होने वाली समस्याओं के पीछे इसलाम पर न चलना है। अतः आप अपने निष्कर्ष में ग़लत हैं।
    इसी तरह आप भी गाली-गुप्पड़ करने के बजाय तथ्य केंद्रित बात करके अपनी बात को सभ्य समाज में कही और सुनी जाने लायक़ बना सकते हैं। नफ़रत किसी समस्या का हल नहीं है बल्कि वह तो खुद एक समस्या है। समस्या हिंदू समस्या या मुस्लिम समस्या नहीं होती। आप जहां भी कोई समस्या देखें, उसका हल ढूंढने की कोशिश करें।
    Please also see to make understand-
    http://hbfint.blogspot.com/2011/03/blog-post_2411.html

    5 comments:

    शिखा कौशिक said...

    बहुत सही बात कही है.

    Dr. shyam gupta said...

    जमाल जी, अच्छी-बुरी इन्सानी समस्या को बतायें,पूछें व सुलझायें..शास्त्रार्थ करें... दूसरे के धर्म, समाज, राष्ट्र व इतिहास के बारे में किसी को कुछ भी पूछने का अधिकार नहीं है....क्योंकि बिना श्रद्धा के उनके बारे में समझना असंभव है ...

    DR. ANWER JAMAL said...

    @ डा. श्याम गुप्ता जी ! आपकी बात से श्री कृष्ण जी और मैं दोनों ही सहमत नहीं हैं और हम दोनों के बीच में आद्य शंकराचार्य , कबीर , नानक और दयानंद आदि बहुत से संत माने जाने वाले लोग भी सहमत नहीं हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी आपकी विचारधारा के खिलाफ आए दिन इस्लाम के बारे में लिखता रहता है । ऐसी निराधार बातें केवल आपके मन की उपज हैं वर्ना आप प्रमाण दीजिए , है कोई प्रमाण ?

    अहसास की परतें - समीक्षा said...

    जमाल अगर तुम यह सोचते हो कि मैं ब्लॉग जगत मे सौदे बाज़ी के लिए आया हूं तो गलत हो इसके लिए मैं कहीं भी दुकान खोल कर बैठ जाता अपने ज़मीर को मार कर दूसरों की हां मे हां मिलाता, पर मैं तो अपनी बात को सबके सामने रखते समय किसी भी प्रकार की सौदेबाजी की बात दूर दूर तक नही सोचता, पर हां यह जरूर सोचता हूं कि जब हिन्दु भी मुस्लिमों की भांति उन्मादी व्यवहार पर उतर आएगी तो माहौल कितना भयंकर होगा। इसी के तहत मैने तुम्हे सिर्फ चेतावनी दी थी कि जिस प्रकार से तुम हुन्दुओं के मान को मलिन करने का प्रयत्न कर रहे हो उसकी प्रतिक्रिया महंगी पडेगी। तुम तो बच जाओगे, पर मारा जाएगा निर्दोष मुस्लिम।

    मेरा काम गाली देना नही है पर जब तुम्हारे प्राण प्यारे सलीम ने अपने ब्लॉग मे अपने पैरों पर खड़ी महिलाओं के उपर अनर्गल आक्षेप लगाए तो मैने विरोध किया और उसमे भी गाली नही थी, अब उस comment को सबके सामने लाओ और voting करा लो कि मै सही हूं या उसको delete करने मे तुम? तो मेरी भाषा मे समस्या नही है, समस्या तुम्हारे द्वारा अपने परम मित्र को बचाने मे है।

    तुम और तुम्हारे साथी हमेशा कहते रहते हैं कि इस दुनिया मे २५% मुस्लिम हैं (पता नही किस आंकडे के अनुसार) और हमेशा इसमे हो रही बढोत्तरी की बात करते रहते हैं, पर जब भी किसी मुस्लिम के द्वारा किया गया अनैतिक काम सामने लाते हैं तो तुरंत तुम उसे इस्लाम से खारिज कर देते हो। ऐसे मे सबसे पहले यह ज़रूरी हो जाता है कि तुम मुस्लिमों की सही सही संख्या बताओ और यह भी बताओ कि कौन से समुदाय इसमे सम्मिलित हैं और कौन से नही तब मै तुमसे इस्लाम की शिक्षा पर बात करूंगा, तब तक सभी नमाज़ पढने वाले मेरे लिए मुस्लिम हैं। और मेरा निष्कर्ष यही रहेगा अगर तुम इसे बदलना चाहते हो तो आंकडो (जो मैने मांगे हैं) के साथ आओ।

    सच नफरत कोइओ हल नही पर गंदगी से मुझे नफरत है, क्या करूं।

    अहसास की परतें - समीक्षा said...

    शिखा जी मैने जो comment सलीम खान के पोस्ट पर लिखा था उसमे कोइ गाली नही थी फिर भी delete किया गया, क्योंकि मैने स्त्रियों को गुलाम बनाने के छद्म प्रयास का विरोध किया।

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